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Monday, September 7, 2020

संसार वृक्ष

 संसार वृक्ष 

आज वे घर वापस आ गए हैं. दिन में तेज वर्षा हुई, उस समय वे कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिए आश्रम के शंकरा हॉल में बैठे थे, कवि सम्मेलन अच्छा रहा, जून ने उसकी कविता रिकार्ड भी की.  वहां से बद्रिकाश्रम विशाल में गए, जहाँ गुरूजी से भेंट करने के लिए प्रतीक्षा की. शाम को एक अन्य कक्ष में उनसे मिलवाने ले जाया गया. सुबह से ही गुरूजी अति व्यस्त थे. दर्शन लाइन में सभी से मिलने में उन्होंने घण्टों लगाए थे. उसके पूर्व वे रूद्र पूजा में बैठे थे. शाम को भी मिलने वालों का ताँता लगा रहा. गुरुद्वार पर हर कोई कुछ न कुछ मांग लेकर जाता है, पर जब उसकी उनसे भेंट का वक्त आया, उसने कहा, गुरूजी आप असम आये थे, उन्हें शायद भूल गया हो,  हजारों जगह वह जाते हैं. कोई जवाब देते इसके पूर्व दो लड्डू दिए तब तक पीछे वाली साधिका आगे आ गयी थी. बाद में सभी को एक साथ सम्बोधित किया तो कहा, शुभ विचारों को जितना हो सके लिख कर फैलाना चाहिए, वापस जाकर उसे ब्लॉग्स पर लिखना फिर आरम्भ करना है. आश्रम में बिताये ये तीन दिन उन्हें सदा प्रेरणा देंगे कि मन को संकीर्ण न बनाएं, दृष्टिकोण विशाल हो और मन व्यर्थ के चिंतन से मुक्त रहे. उनका हर नकारात्मक विचार उनके ही विरुद्ध उठाया गया एक शस्त्र होता है और हर सकारात्मक विचार ऊपर चढ़ने के लिए एक सीढ़ी। लक्ष्य है निर्विचारिता... जहाँ चेतन सत्ता सहज ही अपने आप में टिकी होती है. यह जगत एक खेल है और आज तक जो भी उनके साथ घटा है एक स्वप्न से अधिक कुछ नहीं. भगवद गीता का पन्द्रहवां अध्याय भी कहता है कि इस संसार वृक्ष को असंगता की दृढ़ तलवार से काटना है, विचार करने पर इसकी असलियत सामने आ जाती है. यहां से किसी सुख की आशा करना पानी से मक्खन निकलने जैसा व्यर्थ प्रयास है जिसमें श्रम भी होता है और कुछ हाथ भी नहीं आता. शनिवार को उन्हें गृह प्रवेश की पूजा करवानी है , नन्हे ने पंडित जी से बात कर ली है. 


रात्रि के आठ बजे हैं. आज भी दिन भर नए घर में  बीता, कोई न कोई हर घंटे आता  रहा. नन्हा आज जल्दी आया गया है, कह रहा है, कल दिन  भर वह व्यस्त रहेगा. विदेश से कोई टीम आ रही है जिसे उनकी कम्पनी में इन्वेस्ट करने के लिए एक प्रेजेंटेशन देना है, फिर अपने क्लाइंट से मिलाने ले जाना है. सुबह सात बजे उसे दफ्तर पहुँचना है और रात को दस बजे लौटेगा. आज रात को तैयारी भी करनी है, यानि नींद मुश्किल से तीन या चार घंटे की ही हो पायेगी. उसे लगा आज के ये युवा  आधुनिक तपस्वी हैं और देश के विकास में इनका भी हाथ है. आज दोपहर को एसी भी आ गया. जो दो व्यक्ति उसे लेकर आये थे, जून ने उनसे कहा कि ऊपर पहुँचा दें. एक मंजिल तक तो वे ले गए पर इतनी भारी यूनिट को जब दूसरे तल्ले पर ले जाने को कहा तो मना कर दिया. जून को क्रोध आ गया, पर थोड़ी ही देर में वह शांत हो गए और अपनी भूल का उन्हें अहसास भी हो गया. उसने देखा है, नन्हे को कितने ही व्यक्तियों से ना सुननी पड़ता है पर वह शांत बना रहता है. आज व्हाट्सएप पर कवि सम्मेलन की तस्वीरें आयी हैं, गुरूजी के साथ उसकी एक तस्वीर है, कविता पाठ करते हुए भी, कितनी मधुर स्मृतियाँ हैं  ये ! आज नैनी भी आयी थी, नन्हे ने कितने ही सामान मंगवाए हैं,  जिनके ढेर सारे खाली कार्टन आदि उसने बाहर रखे. नयी सीढ़ी भी आ गयी है और आयरन टेबल भी. 


....वह कालेज गयी थी परीक्षा का प्रवेश पत्र लेने, पर नहीं मिला था, अगले दिन फिर गयी, केवल तीन दिन रह गए हैं पहले पेपर में. उस दिन प्रवेश पत्र मिल गया, अब किताबें और किताबों के बीच उसका मस्तिष्क ! वापसी में कितनी तेज हवा चल रही थी, धूल भरा अंधड़ उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगता. बस में किसी के पास रेडियो था. ‘चलते चलते यूँ ही कोई मिल गया था’, आल इंडिया रेडियो से यह गाना बजना शुरू हुआ था कि सूचना आयी, किसी कारण वश यह गाना आपको नहीं सुनवा सकेंगे, यह आवाज सुनाई दी. कोफ़्त हुई बेहद पर इसके बदले जो गीत बजा वह था, मेरी याद में तुम न आँसूं बहाना, मुझे भूल जाना.. हँसी आ गयी खन से ! 


आगे पढ़ा ... आज पहली अप्रैल है, ग्रीष्म ऋतु की शुभारम्भ बेला या दिवस. कल रजाई नहीं ली, और आज से सर्दी को रोकने वाली इस मोटी मैक्सी को छुट्टी और स्वेटर, स्कार्फ को भी. वह इतनी भद्दी दिखती है कि कोई जब कह देता है आज उसके वस्त्र अच्छे लग रहे हैं तो उसे लगता है कि वह स्वयं को सांत्वना दे रहा है. आज उसे यह पढ़कर सहानुभूति हो रही है उस उम्र की लड़कियों के प्रति, स्वयं के प्रति इतनी कठोरता.. अपनी मूर्खता पर भी उसे उन दिनों बहुत भरोसा था. 


Monday, July 20, 2020

समंदर की लहरें



कल शाम वे गेस्टहाउस गए, उस सखी की बिटिया का जन्मदिन था, जो अपना घर देखने आयी थी . उसके पूर्व दो माह बाद एओल टीचर द्वारा करायी सुदर्शन क्रिया में भाग लिया. क्रिया के बाद कुछ ज्ञान चर्चा भी हुई. सार निकला, वे अपना समय तथा ऊर्जा उन लोगों के सामने स्वयं को कुछ सिद्ध करने में लगा देते हैं जिन्हें उनकी जरा भी परवाह नहीं होती. वे अपना प्रेम उन पर लुटाते हैं जिन्हें प्रेम के बारे में केवल अपने हानि-लाभ ही ज्ञात होते हैं.  सरल और सहज रहकर यदि वे अपने काम से काम रखें तो जीवन कितना सुंदर होगा. परमात्मा अपनी कृपा दोनों हाथों से नहीं बल्कि हजार हाथों से लुटा रहा है, उनकी झोली इतनी छोटी है और मोह, कामना के इतने छिद्र हैं उसमें कि वे उसको पहचानें इसके पहले ही वह झर जाती है. वे जो वास्तव में हैं वही जगत के सम्मुख आये, कोई भी दम्भ या दिखावा उन्हें छू न जाये. जून आयकर के सिलसिले मेंआज डिब्रूगढ़ गए हैं. आज सुबह उसे पीठ में जकड़न सी  हुई,  दवा लगाकर हीटिंग पैड से सेंक किया. सो आज सुबह की साधना नहीं हुई, बाद में ध्यान किया कोई जैसे भीतर से पढ़ा रहा था. जगत से लिया हर सुख दुःख के साथ मिला हुआ होता है, जैसे कड़वी दवा पर मीठी परत होती है कुछ ऐसे ही. उन्हें आत्मानुभव बढ़ाते जाना है. जीवन में जो भी परिस्थिति आए उससे कुछ सीखकर आगे बढ़ जाना है यदि असजग रहे तो पत्थर की तरह वह पैरों में बंध जाती है और जितनी गति से वे पहले चल रहे थे उससे भी कम गति रह जाती है. दिन में दो बार और पीठ पर सेंक किया, दोपहर को हल्का भोजन सो अब सब ठीक है. कल उन्हें मतदान करने जाना है, हायर सेकेंडरी स्कूल में सेंटर है. आज सुबह सुना स्वामी अनुभवानंद जी कह रहे थे, परमात्मा से मांगने योग्य वस्तु क्या है ? उन्हें ऐसा दिल मिले जिसमें किसी भी प्राणी के लिए स्वप्न में भी कोई द्वेष या कटुता न हो, ऐसे दिल में ही परमात्मा बसते हैं. 

शाम के चार बजने वाले हैं. टीवी पर चुनाव समाचार आ रहे हैं. पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा की खबरें आ रही हैं. आज सुबह वे वोट डालने गए. पिताजी से बात हुई, वे छोटी भाभी के साथ अठ्ठासी वर्ष की उम्र में भी पैदल चलकर मतदान करने गए.  उन्हें बहुत अच्छा लगी यह बात. आज बड़ी भाभी की चौथी पुण्यतिथि है, भाई ने बहुत सुंदर वीडियो उनकी स्मृति में बनाया है. उनकी बिटिया अगले हफ्ते आ रही है, अब वहीं रहकर जॉब करेगी. छोटे भाई से बात हुई, वह साधना में  अपने समय का सदुपयोग करता है. अब सिओल में पुरस्कार समारोह में मोदी जी का भाषण आ रहा है. इतने प्रभावशाली ढंग से वह भारत की बात कर रहे हैं. वह एक विश्व नेता हैं, सरे विश्व में उनकी बात सुनी जाती है. आज माली की पत्नी ने बताया उसकी बेटी को स्कूल में नृत्य में भाग लेना है, ड्रेस माला आदि खरीदने के लिए  पति ने पैसे नहीं दिये. उसे आवश्यक पैसे दिए और अपना अकाउंट खोलने को कहा, ताकि अपने लिए कुछ बचत कर सके.

पता नहीं वर्षों पूर्व उस दिन उस पन्ने पर क्यों लिखा होगा, 
‘समुन्दर ! तुम कितना बड़ा दर्द हो ! अपनी बाँहों, टांगों से सारा दर्द फेंकते किनारे को, लेकिन किनारा एक ही ठोकर से लौटा देता तुम्हारा दर्द तुम्हीं को !’ 
परीक्षाओं के कारण एक लाभ उसे अवश्य हुआ है कि पढ़ने के लिए एकांत मिल जाता है. न किसी के साथ किसी संबन्धी के घर जाना और न बाजार न फिल्म देखने. पर यह खुशफहमी जल्दी ही दूर हो गयी, भाभी की भाभी आयी और अगले ही दिन उनके साथ गयी ‘सत्ते पे सत्ता’ देखने, केवल उन्नीस दिन रह गए हैं परीक्षाओं को. कम से कम अब तो उसे पढ़ाई के प्रति गम्भीर हो जाना चाहिए. कुछ दिनों की पीड़ा जीवन भर के सुख का आधार बन जाएगी,  इसलिये सहो, जितना सम्भव हो सहो गणित के सवालों की तीखी धारों को अपने मस्तिष्क के तन्तुओं पर... उसे अब अचरज होता है क्या पढ़ाई पीड़ा लगती थी उसे. 


Friday, January 31, 2020

तेनालीरामा का पुत्र


आज सुबह जब वे उठे तो वर्षा हो रही थी, रात्रि को ही आरम्भ हो गयी थी. ड्राइव वे पर ही छाता लेकर कुछ देर टहलते रहे, फिर योग कक्ष में आ गए. कल शाम वहां एक दर्जन योग साधिकाएं थीं, कमरा पूरी तरह से भर गया था, उसने सोचा कमरे के बाहर गैलरी में भी चटाई बिछा कर दो लोगों का स्थान बन सकता है. कल मुख्य सड़क से होकर ट्रेनर ने कार को बाजार की तरफ ले जाने को कहा. सड़क पर पानी भरा था, एक बार उसमें गाड़ी रुक गयी, उसे डिफेंसिव ड्राइविंग करने की जरूरत नहीं है, ऐसा ट्रेनर ने कहा, एक कंट्रोल उसके पास भी है. दोपहर को तीसरे गियर पर गाड़ी चलाई. लर्नर लाइसेंस  के लिए अगले महीने की डेट आयी है, एक परीक्षा देनी होगी डिब्रूगढ़ जाकर. उसने मॉक टेस्ट दिया, कुछ ही प्रश्नों के उत्तर नहीं आते थे. अभ्यास करते-करते आ जायेंगे जैसे एक दिन गाड़ी चलना अभ्यास में आ जायेगा. कुछ देर पहले जून के भूतपूर्व अधिकारी की पत्नी का फोन आया, अधिकारी का गॉल ब्लेडर का ऑपरेशन होना था, लेप्रोस्कोपी करते समय आंत में छिद्र हो गया, हालत बिगड़ने से ओपन सर्जरी करनी पड़ी, अभी भी एक प्रक्रिया शेष है. अभी छह हफ्ते और वहां रहना पड़ेगा .उनका परिवार वहां पहुँच गया है. कल मृणाल जयति के एक टीचर का फोन आया, वह भोजन के बाद आम खा रही थी, जून ने कह दिया दो बजे के बाद फोन करें.  बाद में पता चला उसके पिता का देहांत हो गया, कभी भी किसी के फोन को नजर अंदाज नहीं करना चाहिए. भीतर का मौन खो नहीं सकता पर कभी-कभी विस्मृत हो जाता है. नन्हा अगले हफ्ते सिंगापुर जा रहा है, जून उसी दिन बंगलूरू से वापस आ रहे होंगे, वह इतवार को जा रहे हैं. 

टीवी पर तेनाली रामा धारावाहिक आ रहा है. जिसमें उसका पुत्र भी हो चुका है, जो अपने माता-पिता की बातों को सुन सकता है, उनका जवाब देता है. दर्शक सुन पाते हैं पर वे नहीं सुन पाते. आज योग कक्षा में एक साधिका अपनी माँ को भी लायी थी, उसकी बेटी आज नहीं आयी. शाम को एसी व पंख चलाने के बावजूद कमरे में काफी गर्मी थी, शायद कल पुनः वर्षा हो जाये. 

पौने नौ बजे हैं सुबह के, सफाई कर्मचारी नहीं आया है, कुछ देर पहले उसकी पत्नी आयी थी. ग्यारह वर्ष उनके विवाह को हो गए हैं. दो पुत्र हैं व एक पुत्री. दो पुत्र पहली पत्नी के हैं, जिसकी मृत्यु होने के बाद इनका विवाह हुआ. पांच बच्चों को संभालती है. पति की शिकायत कर रही थी, किसी के साथ चक्कर है, चार-चार दिनों तक घर नहीं आता है. वैसे घर में सब कुछ लेकर देता है, पर कौन पत्नी है जो पति को इस तरह देख सकती है. उसे हिम्मत दिलाने के लिए कुछ शब्द कहे. अपने मन को शांत करने के लिए पूजा करने को कहा तो कहने लगी वे लोग क्रिस्तान हैं. माथे पर लाल बिंदी, साड़ी, मांग में सिंदूर.. वह पूरी हिन्दू लग रही थी. कानपुर में मायका है. पति ने विवाह से पहले बताया भी नहीं कि धर्म परिवर्तन कर लिया है. उससे बात चल ही रही थी कि नैनी की सास भी अपना दुखड़ा लेकर आ गयी. घर के दोनों जवान बेटों ने कल रात नशा करके बहुत झगड़ा किया, दोनों ज्यादा नहीं कमाते पर नशा करने के लिए पैसे जुटा लेते हैं. घर का मुखिया कमाकर लाता है तो घर का खर्च चलता है. वह अपनी बात कहकर थोड़ा शांति प् लेती है, पहले उसकी बात सुनकर वह बेटों को समझाती थी, पर उस समय वादा करने के बाद वे कुछ दिनों बाद फिर वही करते हैं. अजीब गोरखधंधा है यह दुनिया, सुना है गोरखधंधा शब्द का जो अर्थ लगाया जाता है वह गलत है, अब इसका उपयोग नकारात्मक रूप में नहीं किया जा सकता। आज गर्मी बहुत ज्यादा है. सुबह टहल कर आये तो घर में बिजली नहीं थी, लॉन में बैठकर आसन व प्राणायाम किया. मोबाइल पर सदगुरू के मधुर वचन सुने. पहले उनकी आवाज में एक सहज भोलापन झलकता था, जब वे छोटे थे. अब उम्र के साथ-साथ एक परिपक्वता आ गयी है. इसी महीने गुरू पूर्णिमा भी है. 

Wednesday, June 24, 2015

दा-विंसी-कोड-एक रोचक उपन्यास


उन्होंने शब्दों की होली खेली, कुछ शब्दों की बौछार इधर से हुई और कुछ शब्दों की बौछार उधर से और लग गई आग दिलों में. इस होली से तो भगवान ही बचाए. न जाने क्यों वे अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाते फिर वही वाणी के रूप में बाहर आ जाती हैं. जानती है वह कि बाद में पश्चाताप के सिवा कुछ हाथ आने वाला नहीं है. समाज में परिवार में सभी को साथ लेकर चलना है, साधना के लिए स्वार्थी तो नहीं हुआ जा सकता, उसकी आवश्यकता को कोई अन्य कैसे समझ सकते हैं, उसे ही धीरे-धीरे इस पथ पर लाना होगा. संसार का पथ तो अनेक जन्मों में चल कर देख चुकी है, यह बेपेंदी के लोटे जैसा है कितना भी जल डालो यह खाली ही रहेगा. परमात्मा के पथ पर आनंद ही आनंद है, लेकिन इस आनंद का भी यदि लोभ वह करने लगी तो...सहज रहना सीखना होगा, समभाव में रहना. परीक्षा की घड़ियाँ आएँगी पर स्वयं पर नियन्त्रण रखना है.
आज होली है, उसने ज्ञान की पिचकारी का रंग लगाया है, अब कोई और रंग उस पर चढ़ता ही नहीं. होली का अर्थ है सारी पुरानी सड़ी-गली मान्यताओं को ज्ञान की आग में जलाकर मन को खाली कर देना. फिर से नव जीवन का आरम्भ हो, भुला देना सारे शिकवे-शिकायत, तब जो भीतर उमड़ेगा उसमें सारे रंग मिले होंगे.
कल रात को नन्हे ने जब फोन पर कहा कि उसकी तबियत ठीक नहीं लग रही है तो जून और उसका चिंतित होना स्वाभाविक था. उन्होंने उसे आवश्यक निर्देश दिए और अपने रोज के कार्य सामान्य रूप से करते रहे. सुबह वह उठी तो जून ने कहा उन्हें देर तक नींद नहीं आयी, वह नन्हे की अस्वस्थता की बात से परेशान हो गये थे. वह भी जब अपने मन की अवस्था पर नजर डालती है तो उनसे बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती. यह बात और है जब मन को परेशान देखा उसने तो भगवन्नाम का ही आश्रय लिया, परमात्मा को सब कुछ सौंपना चाहा. उससे प्रार्थना भी की. भक्ति के लिए भक्ति अर्थात उससे कुछ भी न मांगे, यह दृढ़ता तो दूर हो ही गयी. उसने उन सबके लिए सुख व स्वास्थ्य माँगा. वह दाता है, सबकी सुनता है, किसी को निराश नहीं करता, उसकी मर्जी से ही वे सब इस दुनिया में आए हैं. वही चैतन्य है, उसका अंश आत्मा रूप से उनमें स्थित है. अभी यह उनका अनुभव नहीं है तभी वे मन की समता खो बैठते हैं. जैसे चित्रकार चित्र बनाता है वे दुःख बना लेते हैं.
कल की रात्रि स्वप्नों भरी थी, नन्हे को कई बार देखा, वह छोटा सा है और खाली फर्श पर सोया है. मन भी कितना पागल है, खुद ही सपने बनाता है और खुद ही परेशान होता है. नन्हे का रिजल्ट आ गया है उसने पहली बाधा पार कर ली है. जून भी निश्चिन्त हुए हैं. उसने da-vinci-code पढ़ ली है, बहुत रोचक किताब है. अज गुरूजी ने ‘योग वशिष्ठ’ पर चर्चा शुरू की. जीवन में दुःख है इसे पहचानना जरूरी है. तभी तो मन के पार जाया जा सकता है.

आज उन्हें यात्रा पर जाना है, इस यात्रा का उद्देश्य है नन्हे को सालभर की कड़ी मेहनत के बाद परीक्षा दिलाकर घर वापस लाना, परीक्षा से पहले उसे उत्साह दिलाना तथा उसका स्वास्थ्य ठीक रहे उसका ध्यान रखना. ईश्वर से प्रार्थना है कि वह उनकी यात्रा को सफल करे.

Wednesday, March 11, 2015

शरदकाल का चन्द्रमा


आज बाबाजी ने उसे जन्मदिन की बधाई दी ! वायु सुखदायी हो ! आकाश सुखदायी हो ! जल सुखदायी हो ! पृथ्वी सुखदायी हो !  अग्नि सुखदायी हो !  जन्मदिन की बधाई हो ! सुबह-सुबह ससुराल से फोन आया फिर दीदी, भाई-भाभी, पिता जी व बड़ी ननद सभी ने जन्मदिन की शुभकामनायें दीं. जून और नन्हे ने भी बधाई दी. नन्हे का रिजल्ट अच्छा रहा है वे सभी खुश हैं, उसकी मेहनत का परिणाम अच्छा होना ही था. आज बाबाजी ने कहा, दान देना अच्छा है और जन्मदिन पर दान देना और भी अच्छा है. गुरुमाँ ने बताया यदि कोई दुखी है तो अपने आसपास दुःख ही फैलाता है, जिसके पास जो होगा वही तो बांटेगा. मन रूपी सागर पर जब ईर्ष्या और क्रोध रूपी फेन न हो तो जल कितना शांत हो जाता है. कल शाम योग वशिष्ठ पढ़कर उसके मन की भी वही स्थिति हो गयी थी. मुक्त, निर्विचार, शांत और स्थिर..मन की यही अवस्था सम्भवतः आत्मा की स्थिति है क्योंकि उस स्थिति को महसूस ही किया जा सकता है. वह स्थूल नहीं है, अति सूक्ष्म है और व्यापक है शरदकाल के चन्द्रमा की भांति. योग वशिष्ठ अद्भुत ग्रन्थ है. बाबाजी ने भी कहा कि वासना ही दुखों की जड़ है. ‘तू भी अपने मन की काढ़ ले भाया’ अर्थात तू भी हृदय से कामनाओं को निकल फेंक. इच्छा जब तक बनी रहती है दुःख ही देती है, लेकिन कृष्ण से मिलने की इच्छा में जो मीठी पीड़ा है वह सुख ही देती है. ईश्वर के बिना इस जगत में कुछ भी पाने के योग्य है क्या ? सब कुछ छोड़ने के ही योग्य दिखाई पड़ता है !

जून का आरम्भ ! मौसम गर्म है और उमस भरा भी, यानि कि सब कुछ सामान्य है. गला थोड़ा सा खराब है पर कल की परीक्षा की वजह से ज्यादा लग रहा है वर्ना तो इतनी परेशानी उसके लिए न होने के बराबर ही थी. सुबह-सुबह अचानक अध्यापक आ गये, वह तैयार नहीं थी. नन्हा एक मित्र के साथ स्कूल गया है, मार्कशीट व फॉर्म दोनों लेन हैं. माली घर गया हुआ है, लॉन की घास बड़ी हो गयी थी सो जून ने एक आदमी को भेजा है जो उम्र में बड़ा है पर मशीन बड़ी अच्छी तरह चला रहा है.  आज बाबाजी को कुछ ही देर सुन पायी. उन्होंने कहा ईश्वर रसमय है और मानव भी रस ढूँढ़ता है पर गलत जगह, जो मिलता नहीं. अस्तित्व उसे उन्नत बनाना चाहता है, वह विपरीत परिस्थितियों में रखकर उसे योग्य बनाना चाहते हैं. गुरू माँ की तरह दुलारते हैं, रास्ता दिखाते हैं, इस तरह ज्ञान देते हैं जो उसकी समझ के अनुसार हो, प्रकृति के अनुसार हो और धीरे-धीरे वह वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर ले, जहाँ समता की निर्मल धारा है, जहाँ स्थित होकर सुख-दुःख नन्हे लगते हैं, उनमें वे फंसते नहीं, जहाँ सहज रूप से जीवन बहता चला जाता है !

कल परीक्षा से वापस आकर मन कैसा तो हल्का होगा था जैसे कोई बोझ सिर से उतर गया हो. आज भी धूप खिली है और मन का कमल भी ! जीवन कितना अनमोल है और कितना मोहक, कितना मधुर ! कान्हा की वंशी की तरह, उसकी मुस्कान की तरह और उसकी चितवन की तरह ! मन में कोई उद्वेग न हो कोई कामना न हो तो मन कितना हल्का –हल्का रहता है. किसी से कोई अपेक्षा न हो, स्वयं से भी नहीं बस जो सहज रूप में मिलता जाये उसे ही अपने विकास में साधक मानते चले. वह लिख ही रही थी कि एक परिचिता आ गयी उसकी बातों से लगा वह अपने परिवार के प्रति अविश्वास से भरी थी, ऐसे लोगों को समझाना पत्थर से टकराने जैसा ही है, वह उसके लिए ईश्वर से प्रार्थना करेगी, शायद कोई चमत्कार हो जाये ! वह गयी तो लंच का समय हो गया था. उसके बाद बहुत दिनों से पेंडिग पड़ी सफाई का कार्य और फिर शाम होने को आ गयी. जून के एक सहकर्मी के वृद्ध पिता अस्पताल में हैं, उसने उनके लिए भी प्रार्थना की, ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वास्थ्य लाभ प्रदान करेंगे, हर एक को उस पीड़ा से गुजरना है. जन्म और मृत्यु के बीच बीमारी और बुढ़ापा सभी को पार करना ही है.    



  

Friday, March 6, 2015

परीक्षा का परिणाम


ज्ञानी कैसा होता है इसका बखान अभी सुना, बाबाजी आज अपने ब्रह्मानन्द में मस्त थे. उनकी आंखों में कितना संतोष था, कितना प्रेम और कितना अपनापन ! जब टीवी में देखकर वह अपनी सुधबुध खो देती है, मन निर्विचार हो जाता है तो उन्हें प्रत्यक्ष देखने व सुनने से कितना लाभ होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है. वह इतनी सीधी, सच्ची और सरल भाषा में बात कहते हैं कि कोई अनपढ़ भी समझ ले. वह इतनी ऊंची पदवी को प्राप्त कर चुके हैं तभी इतने सरल व सहज हैं. उधर गुरुमाँ ने भी बुल्लेशाह की काफी गाकर मन मोह लिया. ईश्वर को पाने की प्यास हृदय में तीव्रतर हो जाती है जब ऐसा सत्संग मिलता है, पर फिर सांसारिक उलझनें मन को हर ले जाती हैं. आज सुबह एक परिचिता के यहाँ फोन किया, जहाँ योग शिक्षक ठहरे हुए थे, कोर्स के दौरान सुदर्शन क्रिया करने की अनुमति लेनी थी. पर उनसे बात नहीं हो पायी. मन को सभी प्रकार की इच्छाओं से मुक्त करना है चाहे वह इच्छा सुदर्शन क्रिया की ही हो. आकर्षण का फल सदा ही बुरा होता है चाहे वह आकर्षण अच्छी वस्तु का या बुरी वस्तु का. ‘क्रिया’ का उद्देश्य तो मन को एकाग्र कर के बुद्धि को भेदते हुए आत्म दर्शन करना है, जो इस क्षण भी हो सकता है यदि मन को शांत कर ले. सहज प्राप्य वस्तु को स्वयं ही दुर्लभ बनाकर उसे पाने की चेष्टा ही तो कर रही है, जैसे कि उसका महत्व बढ़ जायेगा. जैसे वे सहज प्राप्य ईश्वर को, आत्मा को, भिन्न-भिन्न उपायों से खोजते फिरते हैं. मन को खाली करना है पर उसे भरते रहते रहते हैं, शब्दों से और विचारों से, जो मानसिक जुगाली का ही काम करते हैं. वह जो शब्दों से परे है शब्दों से पकड़ में नहीं आ सकता. उसने यह अनुभव किया कि कामना मुक्त होना कितना शान्तिप्रद है और कामना करना तन-मन में कितनी लहरों को उत्पन्न करता है. जून आज डिब्रूगढ़ जाने वाले हैं. लंच पर नहीं आएंगे.

इस समय साढ़े ग्यारह हुए हैं, जून आज भी अभी तक नहीं आये हैं. नन्हे को बारह बजे कोचिंग क्लास में जाना है. वह अभी कुछ देर पूर्व ही व्ययाम करके उठी है. कल शाम को दो पत्र लिखे, हफ्तों से उनका जवाब देना रह जाता था. मौसम आज बेहद अच्छा है. सुबह संगीत अभ्यास किया. अगले महीने परीक्षा है. आज छोटी बहन का फोन आया, पंजाब बार्डर पर है. अभी कब तक रहना होगा कहा नहीं जा सकता. युद्ध के बादल छा रहे हैं. उसने बताया, छोटे भांजे को पचासी प्रतिशत अंक मिले हैं, दो दिन बाद नन्हे का भी परीक्षा परिणाम आने वाला है, अभी से सभी की निगाहें टिकी हैं, कुछ लोग मिठाई खाने की बात भी कह चुके हैं. यकीनन परिणाम अच्छा ही होगा. शाम को उन्हें दो जगह जाना है. हायर सेकेंडरी स्कूल में ‘हिंदी साहित्य सभा’ के लिए तथा बाद में ‘क्रिया’ के लिए. आज मन शांत है, कल जैसी उथल-पुथल नहीं है. कल सम्भवतः उसे कुछ हो गया था, गुरू की कृपा से ‘बहुत कुछ’ होने लगा है न उसी में से ‘कुछ’.

आज उसे एक और अनुभव हुआ, अहंकार बहुत सूक्ष्म होता है, कई बार उसे लगता है कि वह इससे मुक्त हो रही है पर इसकी जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि थोडा सा अनुकूल अवसर आने पर यह अंकुरित हो जाता है. गुरू कितने उपायों से इसे तोड़ना सिखाते हैं, पर वह उनसे ही नाराज हो जाती है. ईश्वर मानव के कार्यकलापों के साक्षी हैं, वे हर पल नजर रखते हैं, वह उपद्रष्टा हैं ! वह यह भी देखते हैं कि किस तरह वे अपने अहम् को पोषते हैं. यह जो कुछ बनने की, कुछ कर गुजरने की प्रवृत्ति है वह भी अहम् का रूप है. वह ही उन्हें कार्य करने की अनुमति देते हैं, लेकिन वह अनुमति उनके स्वभाव तथा पुर्वकर्मों द्वारा नियत किये हुए प्रारब्ध के अनुसार ही होती है. जीवन में जब भी कभी मानसिक उद्वेग या पीड़ा का अनुभव होता है इसके पीछे उसका अहंकार ही जिम्मेदार है. अहम् को चोट लगती है तो पीड़ा होती है और यह अहम् सत्य नहीं है मिथ्या है. इसको परत दर परत वे खोलते जाएँ तो वहाँ कुछ बचता ही नहीं. यह खोखला है, पोला है, इसका अस्तित्त्व है ही नहीं. वे इसे मान बैठे हैं. इस झूठ ने उन्हें सत्यरूपी ईश्वर से दूर किया हुआ है गुरू की नजरों में स्वयं को कुछ साबित करना भी अहम का विकृत रूप है और यह घृणित भी है. गुरू के समक्ष यदि वे अज्ञानी बनकर पूर्णतया खली होकर जायेंगे तभी तो गुरू कुछ प्रदान कर पाएंगे अन्यथा तो उनका ज्ञान ही उनके रस्ते में आयेगा. पूर्णत विनम्र होकर ही गुरू को रिझाया जा सकता है !     





Thursday, February 5, 2015

आम के बौर की गंध


आज सुबह कराची वाले संत से ये सुंदर वचन सुने, “जैसे वे अपना कीमती सामान सुरक्षित रखते हैं वैसे ही अपना मन तथा बुद्धि कृष्ण के भीतर सुरक्षित रख के निश्चिन्त हो जाना चाहिए. अन्यथा मन के चोर उसे ले जायेंगे  अथवा मन अपनी चंचलता के कारण ही भटक जायेगा, खो जायेगा ! मन जब कोई संकल्प करता है तो बुद्धि उसके पक्ष या विपक्ष में निर्णय लेती है. इन्द्रिय रूपी अश्व और मन रूपी लगाम यदि ईश्वर को समर्पित बुद्धि के हाथ में हो जीवन सही मार्ग पर आगे बढ़ेगा !” इस समय पौने दस बजे हैं, साढ़े आठ बजे तक जब तक जागरण सुना और उसके बाद कुछ देर तक तो उसका सुमिरन चलता रहा, फिर व्यायाम, भोजन, दो सखियों से फोन पर बाते करने में विस्मृत हो गया, लेकिन अब पुनः उसी का स्मरण हो आया है. पड़ोसिन की तबियत ठीक नहीं है, उसे दिल की बीमारी है जो कभी-कभी बढ़ जाती है, उससे मिलने जाना है.

भक्ति का अभ्यास करना होता है इसे ही अभ्यास योग या साधना कहते हैं. कृष्ण उन्हें आश्वासन देते हैं कि यदि उनकी ओर जाने का लगाता प्रयास करते हैं तो एक न एक दिन अवश्य सफल होंगे ! भगवद गीता में कृष्ण कई अध्यायों में भक्तियोग पर चर्चा करते हैं पर बारहवें अध्याय में वह स्पष्ट आमन्त्रण देते हैं. आज अभी कुछ देर पूर्व छोटे भाई का फोन आया उसे उनकी भेजी पुस्तकें मिल गयी हैं. ईश्वर हर क्षण उनके साथ है ! कल शाम उसे इसका अभूतपूर्व अनुभव हुआ ! आज मौसम बेहद अच्छा है, ठंडी, सुहानी, शीतल हवा बह रही है जिसमें आम के बौर व फूलों की सुगंध है ! सुबह पांच बजे से कुछ पहले ही उठी, क्रिया की, मन थोडा उद्व्गिन था लेकिन हर पल उसे अपने मन के भाव का बोध रहता है सो कोई भी अनचाहा भाव टिकने नहीं पाता. कृष्ण की स्मृति उसे हटा देती है. आज वह पुरानी संगीत अध्यापिका के यहाँ भी जाएगी, उन्हें पुस्तक देनी है और उनके गोद लिए पुत्र से मिले भी बहुत दिन हो गये हैं. एक और परिचिता को फोन किया पर वह मिली नहीं, कल पता चला कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है. मन में संसार समाया है जहाँ केवल कृष्ण होने चाहिए. हो सकता है वही उसे प्रेरित कर रहे हों. आज कादम्बिनी की समस्यापूर्ति का हल भी पोस्ट किया है.

आज नन्हे की अंतिम परीक्षा है. सुबह से ही वह व्यस्त है. पांच बजे उठी, उसके पूर्व पौने चार बजे जी नींद खुल गयी थी. तिनसुकिया स्टेशन से जून के एक सहकर्मी का फोन आया था, उनकी ट्रेन तीन बजे ही पहुंच गयी थी पर कार तब तक नहीं पहुंची थी. जून की नींद रात को भी डिस्टर्ब रही, सो नन्हे को छोड़ने जाते समय उनके सर में दर्द था. उसका भी हाल कुछ ठीक नहीं रहा. बेवजह ही नैनी पर क्रोध किया, अपने भीतर का उठता क्रोध का आवेग बहुत अजीब लग रहा था, आश्चर्य भी हुआ कि यह था उसके भीतर, जो भीतर न हो वह महसूस कर भी कैसे सकते हैं, फिर कृष्ण के नाम का जप किया, कृष्ण हर संकट में उसकी रक्षा करते हैं. दो परिचितों के फोन आये, दोनों को नन्हे की किताब-कापियों में से कुछ चाहिए. आज सुबह भैया-भाभी, दीदी-जीजाजी से बात हुई, दीदी AOL का कोर्स नहीं कर पा रही हैं, खैर..उन्हें भविष्य में कभी पत्र लिखकर अपने मन की बात कहेगी. पिताजी के यहाँ आने की उम्मीद उसे अब भी है, मई या जून में सम्भवत वह यहाँ आयेंगे. आज ‘आत्मा’ में गीता का बारहवां अध्याय ही चल रहा था. कृष्ण उन्हें आकर्षित करते हैं पर संसार की ओर वे खिंचे चले जाते हैं, उनकी वृत्तियाँ बहिर्मुखी हैं. अन्तर्मुखी होकर कृष्ण को अनुभव करने का प्रयास भी नहीं करते, जबकि उसका आश्रय लिए बिना इस भवबंधन से मुक्ति पाना असम्भव है. उसका मन कृष्ण का आश्रय ले चुका है और अब इससे उसे कोई नहीं अलग कर सकता !
   
 



Tuesday, February 3, 2015

कृष्ण की लीलाएँ


आज नन्हे की हिंदी की परीक्षा है, नहाने गया है हर रोज की तरह बार-बार कहने पर, इन्सान अपनी प्रकृति का दास होता है. कृष्ण ने सच ही कहा है कि गुणों को गुण वर्तते हैं. लोग अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करते हैं और कर्म बंधन में पड़ जाते हैं क्योंकि यही कर्म उनके अगले जन्म के कारण बनते हैं फिर यह क्रम चलता ही रहता है, पर कभी तो इस पर रोक लगानी होगी. तीनों गुणों के पार पहुंचना होगा. कृष्ण की कृपा जिसपर हो वह गुणातीत हो जाता है. ईश्वर के शरणागति होने पर वह अभय प्रदान करते हैं. भागवद में कृष्ण की कथा पढ़कर मन प्रफ्फुलित हो उठता है. पूतना, अघासुर, बकासुर, तृणासुर, शकटासुर और नरकासुर कितने असुरों को वह खेल-खेल में ही परास्त करते हैं. भीतर के छह असुर काम, क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर का भी नाश करते हैं और उच्च पदों पर ले जाते हैं, अद्भुत हैं कृष्ण और उनकी लीलाएं ! आज गुरुमाँ ने ध्यान की महत्ता पर बल दिया, लेकिन ध्यान का फल तो भक्ति ही है न, जब उसका मन कृष्ण का चिन्तन बिना ध्यान के भी करता रहता है तो क्या ध्यान की फिर भी आवश्यकता है. सम्भवतः है क्योंकि अभी भक्ति का पौधा कोमल है, उसे सहारा चाहिए, जैसाकि भागवद में कई जगह पढ़ा कि हृदय में भक्ति उदय होने पर भौतिक कार्यों से मन धीरे-धीरे अपने आप विरक्त होने लगता है, कुछ छोड़ना नहीं है बल्कि अपने आप छूटता जाता है !

कृष्ण उनके अन्तरंग हैं, वह उनके मन के उस कोने तक भी पहुँचे हुए हैं, जहाँ वे स्वयं भी नहीं गये हैं. उनसे संबंध आदिकाल से है, सदा से है, नित्य है और जो भी सुख-दुःख इस जग में होने वाले संबंधों से पाते हैं वे मात्र उसका प्रतिबिम्ब हैं. प्रतिबिम्बों से कोई कब तक मन बहला सकता है. सारे जप-तप नियम का उद्देश्य है मन की शुद्धि ताकि मन उस प्रियतम का दर्शन कर सके. मन समाहित हो सके, उस एक की शरण में जा सके जहाँ से वह आया है. मन चेतन है, सत् है, आनंद स्वरूप है, पर वे तो मन के इस रूप को नहीं पहचानते, जैसे कोई किसी महापुरुष के संपर्क में तो हो पर उसके गुणों से अनभिज्ञ हो तो उसे कोई अनुभूति नहीं होगी. परम सत्य को न जानने के कारण ही वे उससे दूर रहते हैं, अनजान रहते हैं जबकि वह अंशी इसकी जानकारी देना चाहता है. भागवद की कथा जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है उसका कृष्ण के प्रति प्रेम भी बढ़ रहा है, वह उसे अपने और निकट लगने लगा है. उसके प्रति सखाभाव दृढ़ होता जा रहा है. वह प्रेम स्वरूप है, वह माधुर्य की मंजुल मूर्ति है, वह अनोखा है, उससे प्रेम किये बिना कोई रह नहीं सकता. ब्रज की गोपियों के पास उसकी बांसुरी सुनके घर पर रुके रहने का कोई कारण नहीं था. कृष्ण केवल प्रेम और माधुर्य ही नहीं ज्ञान का अवतार भी हैं, वह योगेश्वर हैं, वह भक्ति मार्ग के साथ-साथ ज्ञान और कर्म योग की शिक्षा देते हैं. वह ज्ञान के अथाह स्रोत हैं. जब यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड उन्हीं की कृति है तो उनसे अलग कुछ हो भी कैसे सकता है और ऐसे कृष्ण उनके मनों में रहते हैं !

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिख सकी, किसी दिन जब मन उर्वर होगा तो डायरी के ये खाली पेज भी पहले की भांति भर जायेंगे. आज ध्यान गहन नहीं हुआ, पता नहीं मन के किस कोने से एक संशय ने फन उठाया है, जिसे अभी कुचल देना चाहिए और इस मिथ्या भावना को पनपने का मौका नहीं देना चाहिए. आत्मभाव में स्थित रहकर ही वे अपनी बुद्धि पर लगे जंग को हटा सकते हैं.


   

Friday, January 23, 2015

पीली ऊन का स्वेटर


आज बहुत दिनों के बाद बल्कि हफ्तों के बाद उसने वस्त्रों की आलमारी सहेजी और कुछ और कार्य किये जो कई दिनों से किये जाने थे. वह अपने अंतर्जगत में इतना डूब गयी थी कि बाहरी दुनिया एक स्वप्नवत् प्रतीत होती थी. लेकिन आज उसने अपनी प्रतिबद्धताओं पर पुनः सोचा. हफ्तों के सूखे मौसम के बाद पिछले तीन दिनों से वर्षा हो रही है. एक सखी का फोन आया, उसने एक को फोन किया जो aol का एडवांस कोर्स करने तेजपुर जा रही है. दोनों बुआ के यहाँ से पत्र आये हैं. उन्हें जवाब देने हैं. जून को आज सेंट्रल स्कूल में दसवीं के बाद होने वाली कोचिंग के सिलसिले में होने वाली एक मीटिंग में जाना है. अगले वर्ष से नन्हे को उसमें जाना होगा, स्कूल के बाद कोचिंग से उसकी व्यस्तता काफी बढ़ जाएगी पर यही जीवन है. कल उसका गणित का (प्री बोर्ड) पेपर है. आज सुबह टीवी पर एक कार्यक्रम देखा, “yoga for life”. आज लेडीज क्लब के सेक्रेटरी का फोन आया, पूछ रही थी कि क्लब के वार्षिक कार्यक्रम में सम्मिलित न होने का क्या कारण है. उसने नन्हे की परीक्षाओं की वजह बताई. जून ने ‘महासमर’ वापस कर दी और भागवद् लाये हैं. पढ़ने में उसे अवश्य ही आनंद आयेगा और लक्ष्य की प्राप्ति भी होगी.

कल रात नींद खुली तो आभास हुआ मन में भागवद् चल रहा था. कल शाम को ही पढ़ना शुरू किया है. कृष्ण की कथाएं पढ़ने से अद्भुत शांति मिलती है, अनोखी है उनकी कथाएं ! कल शाम जब जून मीटिंग से आये तो नन्हे को वहाँ की कार्यवाही के बारे में बताया. कालेज में प्रवेश के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी और तब सफलता निश्चित है. टीवी पर ‘जागरण’ आ रहा है, जब कोई उससे जुड़ता है तो जीवन रसपूर्ण हो जाता है, कभी न खत्म होने वाली आनंद की अजस्र धारा बहने लगती है. संसार से जुड़ो तो झटके खाने पड़ते हैं जबकि प्रभु से जुड़ने पर जीवन जैसे एक हिंडोला बन जाता है या नदी की शांत जल धारा..बाबाजी भी आ गये हैं, कल से उन्होंने ‘योग वसिष्ठ’ पर बोलना शुरू किया है. कह रहे हैं-
 अन्न बिगड़े तो मन बिगड़े
पानी बिगड़े तो वाणी बिगड़े
अनवरत होती वर्ष से मौसम ठंडा हो गया है. आज ऐसे भीगे, ठंडे मौसम में जून मोरान  जा रहे हैं. नन्हा भी स्कूल गया है. कल रात भी देर तक मन में भागवद् की कथाएं विचरती रहीं. कल इतवार था, वर्षा कुछ देर को थमी तो वे दूर तक टहलने गये. नन्हे का आज विज्ञान का इम्तहान है. कल जून ने उसके कहने पर ऊन लाकर दी, चमकदार पीले रंग में, जिससे नैनी अपने नाती का स्वेटर बनाएगी. पिछले दिनों उसे ऐसा महसूस हुआ वह हर वक्त खिंची-खिंची सी रहती है, उसके भीतर का रस सूखता जा रहा है, रसहीन व्यक्ति विस्फोटक रूप धारण कर सकता है. तभी तो कहते हैं ईश्वर को याद करो जो रस का स्रोत है, वह प्रेम, ज्ञान और आनंद का भी स्रोत है., वह ऊर्जा का भी स्रोत है बल्कि वह तो सब कुछ का स्रोत है. जितना जितना वे उससे जुड़े रहेंगे सजग रहेंगे, रसपूर्ण रहेंगे. आत्मा में स्थित रहेंगे. वही तो चेतना का आधार है, वह है तो जगत है. स्वयं को नित्य मानकर तीन गुणों के पार होना है, वृत्तियाँ आती-जाती हैं, उनसे सुख मिले ऐसी आकांक्षा व्यर्थ है. जीवन माधुर्य, आनंद और रस के सागर में डूबने के लिए है !
उसे ढेर सारे काम करने हैं, सो लिखना बंद करके उनमें जुट जाना होगा.  
  

Friday, November 29, 2013

परियों के किस्से


इतवार भी बीतने वाला है, जैसे कल शनिवार बिना कुछ कहे-सुने बीत गया. सुबह घर के कार्यों में और दो-तीन फोन करने में बीती, दोपहर सुस्ताने में और शाम कुछ देर फिल्म देखी, फिर एक मित्र परिवार आ गया और रात उसकी नादानी के कारण थोड़ी परेशानी में, जल्दी काम करने के प्रयास में थोड़ा सा हाथ जो जला लिया, सुबह देर से उठी, पर दर्द नहीं था. कल रात और आज सुबह भी आचार्य गोयनका जी की बातें बहुत याद आयीं और मन जल्दी ही संयत हो गया. इतवार के सारे काम निपटाते-निपटाते दो बज गये. नाश्ते में डोसा बनाया था, अभी-अभी बड़ी बहन का फोन आया, उसने उनके घर आने का वादा भी कर दिया है, उनकी यात्रा में केवल दो सप्ताह रह गये हैं, फ़िलहाल तो नन्हे के इम्तहान में सिर्फ एक सप्ताह रह गया है. इस वक्त मन शांत है जीवन सार्थक है यदि जीने का कोई लक्ष्य हो, दोपहर बाद टीवी देखते-देखते महसूस हुआ जून और नन्हा उसके अस्तित्त्व के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, वे हमेशा उसके साथ हैं, इसलिए कभी-कभी वह उनकी उपेक्षा कर जाती है, पर वे उसके लिए v.v.v.i.p. हैं. आज आखिर नैनी की रजाई बन ही गयी, उस दिन सपने में देखा था, उसके दोनों बच्चे नीले रंग की रजाई पिछले गेट से ला रहे हैं,, कौन कहता है, सपने बस सपने ही होते हैं.   

आज बहुत दिनों बाद पीटीवी सुन रही है, जो चैनल वह देखती थी वहाँ उर्दू की बजाय कश्मीरी या पख्तो भाषा में गजलें आ रही हैं. गजलें उसे हमेशा से अच्छी लगती आई हैं. बेहद मीठी भाषा में एक गजल आ रही है पर भाषा कठिन है और अब एल टीवी पर यह गजल... ‘कभी बेकसी ने मारा..कभी बेबसी ने मारा...’
जून का फोन आया है, वह आज देर से आएंगे. कल रात उन्होंने उसे अचम्भित किया यह कहकर कि कल वह income tax के rules के बारे में उसे बतायेंगे. विपसना के बारे में उनका घर आने वाले मेहमानों से बात करना और रात देर तक इधर-उधर की बातें करना अच्छा लगा. अच्छा लगता है इतवार दोपहर को साइकिल से जाकर अख़बार लाना और पढ़ना, शामों को नियमित खेलने जाना. वह अनुशासित हो रहे हैं. पहले इतवार को उनका उनका सबसे बड़ा काम होता था आराम. आज पत्रों के जवाब भी देने हैं, वक्त भी है और मूड भी, वैसे वह मूड की प्रतीक्षा नहीं करती, पत्र लिखना अच्छा लगता है और जवाब तो देना ही चाहिए हर पत्र का जो उनके पास आया है. उनके बगीचे में पत्ता गोभी के साथ इन दिनों टमाटर बहुत हो रहे हैं. फूलों की भी बहार है.

आज नन्हे के स्कूल में पुरस्कार वितरण समारोह था, उन्हें भी बुलाया गया था, पिछले वर्ष के लिए नन्हे को पुरस्कार मिला है. बच्चों ने बहुत अच्छे कार्यक्रम प्रस्तुत किये. एक छोटी लडकी बहुत तन्मयता से नाच रही थी उसके नृत्य में एक अजीब सी कशिश थी.

कहाँ खो गये क्या हो गये
वे मीठे बचपन के दिन
परियां जब सचमुच होती थीं
भूतों के किस्से सच्चे थे
खुशियों का कोई मोल नहीं था
आंसू भी अपने लगते थे

नन्हा आज घर पर है, सुबह से उसे पढ़ा रही थी, समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला, इस समय वह टीवी देख रहा है अभी जून के आने में कुछ मिनट हैं. उसकी परीक्षाओं के बाद उन्हें जाना है, मार्ग में परेशानियाँ तो आएँगी ही छोटी-मोटी और उन्हें सहने के लिए अभी से खुद को तैयार करना होगा, और भी कई छोटे-बड़े लक्ष्य हैं जिन्हें पाना है. जिन्दगी के ये अनमोल पल यूँही गंवाने के लिए नहीं हैं. कभी अपने आप से जो वादे किये थे उन्हें पूरा करना है. खुद की तलाश में जो सफर अभी अधूरा है उसे भी. जीवन का अर्थ सही मायनों में तलाशना है. अपने इर्द-गिर्द जो कुछ भी है उसे बेहतर और बेहतर बनाना है. अपने परिवेश को परिजनों को और अपने आपको भी इस जग में सही और सार्थक ढंग से स्थापित करना है.



Friday, April 26, 2013

रामायण की कहानी-अशोक बैंकर



अचानक घर के सारे के सारे बॉल पेन्स की स्याही जैसे एक साथ ही खत्म हो गयी है, उसे हरी स्याही वाले इस जैल पेन से लिखना पड़ रहा है, जो इतना अच्छा नहीं लिख रहा. मौसम आज भी सुहावना है, शायद यही कारण तो नहीं कि आजकल वह वे सभी कार्य सुबह कर  पाती है, जो ज्यादा गर्मी होने के कारण पहले टाल दिया करती थी, लिखना भी उनमें से एक है. सुबह जल्दी उठने से नन्हे को भी कुछ वक्त दे पाती है, आज से उसके टेस्ट शुरू हैं. कल से नई नैनी सीमा ने काम सम्भाला है, उसने सोचा, देखें, यह कितने दिन टिकती है, पिछले आठ महीनों में यह पांचवीं नैनी है. जून के आने का वक्त हो रहा है, हो सकता है वह आज भी थोड़ा लेट आयें, शनिवार को पूरा एक घंटा देर से आये, उसके पूछने पर नाराज होने लगे.. जल्दी ही मान भी गए, वाकई वह भाग्यशाली है जो इतना अच्छा साथ मिला है उनका...माँ-पिता से मिलने यदि किसी वर्ष न भी जा सके वे लोग तो उसे कोई दुःख नहीं होगा, उसने सोचा अचानक ये बातें उसके मन में क्यों आने लगीं. रक्षाबंधन की स्मृति अभी ताजी है, शायद इसीलिए..

फूलों के कितने गाँव राह में मिले
आते रहेंगे याद सावन के वे झूले

  कल शाम एक परिचित परिवार आया था, यूँ ही उलझ गयी उनसे बातों में, खत्री और क्षत्रिय की बहस को लेकर, उसका कहना था कि खत्री क्षत्रिय का ही अपभ्रंश है, पर वे मानने को तैयार नहीं थे. उनके अनुसार खत्री वे जो लड़ने से घबराते थे, क्षत्रिय वे जो वीर थे. रात भर स्वप्नों के बीच गुजरी, कल ही जून उससे कह रहे थे कि वह व्यर्थ ही छोटी-छोटी बातों पर चिंता करती है. इस तरह के मन को लेकर जीने से तो अच्छा है कि अपने को बहस की स्थिति में डाला ही न जाये. मन भी शांत रहेगा और रिश्ते भी मधुर बने रहेंगे, चाहे ऊपर-ऊपर से ही क्यों न सही. सर्वेंट रूम की बिजली ठीक करने आए इलेक्ट्रीशियन ने घंटी बजाई. लौट कर आई तो उसकी कलम रुक गयी, खाली रहे या कोई काम भी करती रहे तो मन में ढेरों विचार आते ही चले जाते हैं मगर जब कलम उठाओ तो सबके सब गायब. यूँ पिछले आधे घंटे में दो-तीन बार उठना पड़ा है लिखने के दौरान, यूँ लेखन भला क्या होगा, लिखने के लिए एकाग्रता चाहिए और चाहिए विचारों का ठहराव, जो जून की प्रतीक्षा करते समय सम्भव होगा. कल बड़ी ननद का पत्र बिहार से आया, लिखा है वे लोग अब पटना छोड़ देंगे, और पश्चिम में रहेंगे या सुदूर दक्षिण में. दीदी का पत्र कई दिनों से नहीं आया, कल जून ने भी याद दिलाया, कितने साल हो गए उन्हें देखे. उसने सोचा उस सखी के लिए एक अच्छी सी गज़ल या नज्म लिख दे, वह भी कहीं रात भर सोचती न रही हो, उसकी हम राशि है न आखिर.

  आज फिर लिखना रह ही जाता, भला हो पौराणिक कथाओं के लेखक "अशोक बैंकर" का जिनके कारण कुछ न कुछ लिखते रहने की कोशिश जारी रखने का संदेश मिला. आज सुबह समय बिलकुल नहीं था, जून लंच के बाद गए तो कुछ देर सोयी, अखबार पढ़ा और सोसाईटी पत्रिका के पन्ने पलटे जो जून बुक क्लब से लाए थे. सुबह उसने उस सखी को एक क्षणिक उत्साह में फोन किया, इतवार को अपने वहाँ जाने कई बात कही, कुछ विशेष होना चाहिए, सामान्य सामाजिक मुलाकात से हटकर, विशेष स्नैक्स पार्टी, कैरम या कोई फिल्म देखें, फिर सोचा देखें, ईश्वर कितना साथ देता है उसकी योजना सफल होने में.  आज सुबह ‘योगानंद जी’ कि पुस्तक में क्रिया योग नाम का अध्याय पढ़ा, लेकिन पूरी तरह समझ में नहीं आया, यूँ भी पढते समय मन एकाग्र नहीं रह पाता आजकल. पहले जितनी सहजता से ईश्वर आराधना कर पाती थी अब प्रयास करना पड़ता है, शायद लोग जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं..ज्यादा जटिल होते जाते हैं. कभी-कभी कोई पुरानी बात याद आने पर जो उसे आज भी झेंप दिला जाती है या हाल ही की कोई बात जिसे याद करके उसे अच्छा नहीं लगता, वह मस्तिष्क को भुलावा देने के लिए वही पुराना तरीका अपनाती है, नाम-स्मरण, जो उसकी सारी उलझनों को दूर करने का साधन बन सकता था. शायद सभी के साथ या बहुतों के साथ ऐसा होता हो. आज नन्हे का गणित का टेस्ट है, बस दो दिन और फिर छुट्टियाँ यानि मस्ती, मेले में घूमना, शुक्र व शनि को वीडियो गेम खेलने अपने मित्र के यहाँ जायेगा, इतवार को तो उसके मनपसंद टीवी कार्यक्रम हैं ही. उसने मन ही मन उसे स्नेह भेजा और उसके पिता को भी. 

Wednesday, April 24, 2013

गणपति बप्पा मोरया



श्रीलंका में ‘पीपुल्स अलाइंस’ को वरीयता, श्रीमती चन्द्रिका कुमार तुंगे नई प्रधान मंत्री चुनी गयी हैं. आज फिर एक अंतराल के बाद उसने डायरी खोली है, जबकि पिछले कई दिनों से मन में यह बात आ रही थी, अपने विचारों को केंद्रित करने का यही एकमात्र साधन है. पिछली रात से ही मस्तिष्क में विचार मंथन चल रहा है, यहाँ तक कि सुबह प्रार्थना के समय भी मन स्थिर नहीं रह पाया. लगा शायद तन के भारीपन के कारण ऐसा हुआ हो, सो दोपहर भोजन में फल ही लिए, एक नाशपाती और एक सेब. जून भी देर से आने वाले थे, अब तन हल्का है ही डायरी उठाते ही मन भी शांत है. कई बार वादा तोड़ चुकी है सो अब नियमित लिखने का कोई वादा नहीं, जबकि उसे मालूम है, यह उसके लिए नितांत आवश्यक है और वर्षों बाद कभी इस साल की कोई बात देखने के लिए डायरी खोलेगी तो खाली पन्ने उसका मुँह तो नहीं चिढ़ायेंगे. पिछले दिनों अपने करीब आने से बचने के लिए ही भागती रही इन पन्नों से. आज शाम को एक मित्र परिवार में बच्चे के पहले जन्मदिन की पार्टी में जाना है, याद आता है उनकी शादी के बाद उन्हें चाय पर बुलाया था. उसने पिस्ते के छिलकों से एक गणपति की आकृति बड़े से लकड़ी के बोर्ड पर बनाई है, उसे सेलोफेन पेपर से ढकना होगा धूल से बचाने के लिए और शिव-पार्वती की उस पेंटिंग को भी फ्रेम करना है जो भाभी ने बनायी था.

  कल शाम पार्टी में किसी दक्षिण भारतीय महिला ने कहा, यू हैव एन आर्टिस्टिक फेस, वर्षों बाद कोई ऐसी बात  सुनकर मन में कई भूली यादें ताजा हो गयीं. वह उसकी परिचिता नहीं थीं, और न ही उसने उनका नाम पूछा. पर घर आकर बाथरूम के शीशे में अपने ही चेहरे को ऐसे देखा जैसे पहली बार देख रही हो. पार्टी में जाने से पहले वे एक और परिचित के यहाँ गए थे, उसने ध्यान दिया अच्छा सामान स्टोर में रखा है और सामान्य सामान बाहर सजाया है. उसका मन हुआ कहे क्या एक दिन उन्हें घर सजाने में मदद कर दे.. ? जून को उसने कहा, वही, उस कम्प्लीमेंट के बारे में, कुछ नहीं बोले...तारीफ करने के मामले में थोड़ा कंजूस हैं, पर प्यार के मामले में नहीं. उसके स्वास्थ्य को लेकर जरा सा पता चल जाये तो इतना ध्यान रखते हैं..नन्हे का आज हिंदी का टेस्ट है, और सोमवार से उसके यूनिट टेस्ट भी हैं, अब उसे परीक्षा से कोई घबराहट नहीं होती, आनंद आता है. कल पार्टी में एक और परिवार मिला, वही जो उस दिन उनके यहाँ आये थे, जून के बीएचयू के प्रोफेसर तथा उनकी बेटी व दामाद. होस्ट अच्छी लग रही थी, बहुत जीवंत है वह, ढेर सारे स्वर्ण आभूषण और भारी बार्डर वाली साड़ी, थकावट का नामोनिशान नहीं था उसके चेहरे पर, शायद नन्हे के पहले जन्मदिन पर नूना भी इतनी ही खुश थी, किसी ने कहा भी था, बेटे से ज्यादा खुश माँ है. गमले में गुलाब का एक सुंदर फूल खिला है उसने सोचा, जून को दिखाएगी.

  सुबह के सवा दस हुए हैं, शनिवार को इस वक्त वह टीवी के सामने होती हैं, ‘जमीन-आसमान’ के पात्रों के साथ, लेकिन आज बिजली चली जाने के कारण पसीने में तर हवा के झोंके की प्रतीक्षा कर रही है. सचमुच अभी-अभी हवा का एक हल्का सा झोंका उसके चेहरे को सहला गया है. ‘धर्मयुग’ में उस लम्बी कहानी का अंत अच्छा नहीं हुआ, बुरे अंत भाते न हों, लेकिन होते हैं, वेद राही की कहानी में बांधे रखने की क्षमता थी. कल बहुत दिनों बाद वे एक परिचित के यहाँ गए, जून ने कहा, लुकिंग गुड, गले में नेकलेस पहन लेने से कितना अंतर आ जाता है व्यक्तित्व में, उसे अब बढ़ती उम्र के साथ इन बातों का ख्याल ज्यादा आ रहा है, शायद यही उचित भी हो. कल उन लोगों से भगवद् गीता का एक कैसेट भी लायी, अभी ध्यान से बैठकर नहीं सुना है, वाचक की आवाज उतनी मधुर नहीं है, पर उसे आवाज से क्या लेना, उनकी बात पर ध्यान देना होगा. सुबह-सुबह एक स्वप्न देखा, वे लोग घर गए हैं, राखी का दिन है पर वह राखी लाना ही भूल गयी है, सभी भाई बैठे हैं, इतने वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है कि शायद उसकी राखी वक्त पर नहीं मिलेगी. इसी कारण यह स्वप्न आया होगा. कल शाम उन्होंने कैरम खेला. खुली हवा में साइकलिंग की, अब उसे आसान लगती है, अभ्यास न होने के कारण ही पहले उसे परेशानी होती थी.  




Sunday, April 7, 2013

कादम्बिनी - हिंदी पत्रिका




नन्हा उस पर गया है, जून ऐसा कई बार कहते हैं, कल शाम को उसे परीक्षा के लिए घबराहट होने की शिकायत करते देख उसे भी इस बात का विश्वास हो गया. इतना छोटा सा बच्चा जिसे सब कुछ याद है, परीक्षा से इस तरह क्यों घबरा सकता है, जब इतनी छोटी थी तो शायद वह भी घबराती होगी, कुछ याद नहीं पड़ता. आज सुबह भी थोडा नर्वस था शायद इसीलिए नाश्ता भी ठीक से नहीं किया, उसने मन ही उसे शुभकामनाएँ भेजीं. जून का फोन आया है उन्हें आज मोरान जाना हैऔर नल से पानी गायब है, कैसे स्नान होगा और फिर खाना बनेगा. सवा नौ हो चुके हैं, आज कपड़े भी नहीं धुल पाएंगे.

  आज भी नन्हा नर्वस था पर कल से कहीं कम. केवल दो पेपर और रह जायेंगे उसके आज के बाद. स्वीपर अभी तक नहीं आया है, कल कह रहा था, उसे अस्पताल जाना है ताकि वह  उसकी अनुपस्थिति की खबर सेनिटेशन दफ्तर में न करे. कल रात बेहद गर्मी थी, फिर आधी रात के बाद शायद वर्षा हुई, जिससे कुछ ठंडक हुई, पहले तो उमस के कारण नींद ही नहीं आ रही थी. दो हफ्ते रह गए हैं उन्हें घर जाने में, कभी-कभी लगता है, पहली बार इतना लम्बा सफर अकेले करने जा रही है, जाने कैसे कटेगा. यह भी हो सकता है कि इतना लम्बा सफर करने के बाद नन्हा भी और वह भी कुछ सीखे, साहसी बने. कल शाम कादम्बिनी में एक लेख पढ़ा, प्रज्ञा चक्षु से आत्मा को देखने का जिक्र है उसमें. जानना तो दूर आजकल आत्मा पर विश्वास ही कौन करता है, मात्र देह ही सब कुछ है आज के भौतिकतावादी युग में. देह को सजा-संवार के रख सके वही सभ्य है, वही सफल है. मन और आत्मा तक पहुंचने का न तो किसी के पास समय है और न जरूरत....सच बोलने का साहस कोई करे भी तो सच सुनने को कोई तैयार नहीं. आत्मिक और अध्यात्मिक उन्नति की बातें अब पिछड़ेपन की पर्याय बन गयी हैं.
 
  जून आज तीसरे दिन भी मोरान गए हैं, उन्हें अपने काम में इस तरह व्यस्त देखकर व सफलता मिलने पर उसे खुशी होती है. दोपहर को भोजन के वक्त वे घर पर नहीं होंगे यह बात नन्हे और उसे दोनों को अखरेगी. नन्हे का परसों अंतिम इम्तहान है, उसके लिए अंग्रेजी का पेपर बनाना है, सो यह लिखना छोड़कर पहले वही करने में वह व्यस्त हो गयी.







Tuesday, November 6, 2012

नॉर्थ ईस्ट की हरियाली



जून का खत आया है, वह भी उसे लिखेगी, दो पेपर हो जाने के बाद. आज पूरे आठ दिन हो गए, अभी कितने दिन और लगेंगे उसकी आँखों को सफेद होने में. परसों पहला पेपर है, तैयारी हुई है या नहीं यही समझ नहीं आ रहा है, पढ़ती है तो सब याद आता है पर किताब बंद करते ही दिमाग में जैसे कुछ रहता ही नहीं. बिजली गायब है पिछले इतवार की तरह. कैसे बीत गए अस्वस्थता के ये आठ दिन, कैसे?

तीन पेपर हो गए हैं, डायरी लिखे हफ्तों हो गए हैं जैसे, आज सर में दर्द सा क्यों है, लिखते समय भी हो रहा था परीक्षा भवन में. पेपर फिफ्टी-फिफ्टी हो रहे हैं, साठ प्रतिशत के लायक तो नहीं हो पा रहे हैं. देखें क्या होता है. अब गणित का पेपर है, और फिर विज्ञान का, उसमें समय कम है, खैर अब पढ़ाई शुरू करनी चाहिए.

लगभग तीन सप्ताह बाद वह लिख रही है, उसकी परीक्षाएं खत्म हो गयीं, जून बनारस आए, वे सब यहाँ आ गए असम, यहाँ आये भी एक हफ्ता हो गया है, सब ठीक चल रहा है, जून का बेहिसाब ध्यान रखना, वह उन्हें स्वस्थ देखना चाहते हैं और थोड़े मोटे भी. घर से पत्र आए हैं. उसने सोचा कल जवाब देगी.

प्रथम जून, यानि ज्येष्ठ का महीना, पर यहाँ तो यह सावन का महीना ही लगता है. साढ़े दस हुए हैं, उसका सुबह का सब काम हो गया है, अभी कोई नैनी नहीं मिली है, पर उसे बनारस में रहकर काम करने की आदत से लाभ हुआ है, उसे यहाँ का काम इतना आसान लग रहा है, नन्हा अपने मित्र के साथ खेल रहा है. जून को शायद आज दिगबोई जाना है, उन्हें वहाँ से आए कल दो हफ्ते हो जायेंगे.

छोटे भाई व बहन को उसने जवाब दिया, उसके जन्मदिन पर दोनों के कार्ड आए थे. आज उनका एक परिचित परिवार सदा के लिए यहाँ से जा रहा है, अब पता नहीं कभी मिलेंगे या नहीं, वैसे वे दिल्ली जा रहे हैं, हो सकता है कभी मिलें. नन्हा आज अभी तक सोया है. उसके हाथों में निशान पड़ गए हैं, छोटे-छोटे दाने से, बाएं हाथ में साबुन पानी से, उन्हें महरी रखनी ही पडेगी.

कल जून की सातवीं तारीख थी, यानि उनके विवाह को कल पांच वर्ष पांच महीने हो गए. जून ने परसों पूछा, क्या वह नियमित डायरी लिखती है, उसने कहा, “नहीं”, अगर लिखती होती तो ‘हाँ’ कहती, अच्छा लगता उन दोनों को ही. जून यहाँ उनके आने के बाद खाने-पीने का बहुत ध्यान रख रहे हैं, कमर का घेरा बढ़ता जा रहा है और तो कहीं कुछ खास असर नहीं दीखता. नन्हा भी काफी कमजोर हो गया था, अब ठीक है, उसका दाखिला भी कराना है, देखें कहाँ होता है. मौसम यहाँ बहुत अच्छा है, आज सुबह बारिश हुई, इस समय दस बजे हैं, नन्हा गिनती लिख रहा है. मंझले भाई व माँ-पिता के पत्र आए हैं, कल वह उन्हें जवाब देगी. आज सुबह अचानक एक कार्यक्रम देखा, टीवी पर- “गीत के ढंग, संगीत के संग” कितना अच्छा गीत था और आवाज भी उतनी ही अच्छी- “फूलों से बातें करता था, खुशबुओं में रहता था... और दूसरा गीत व उसका संगीत तो अच्छा था आवाज ठीक नहीं थी. टीवी पर कल की फिल्म भी अच्छी थी, “हाफ टिकट” किशोर कुमार का अभिनय लाजवाब था अब कहाँ मिलते हैं ऐसे हीरो.
जून ने कहा है कि आज वे डिब्रूगढ़ जायेंगे. वे घर से सैंडविचेज़ बना कर ले जायेंगे. आज शनिवार है खत लिखने का दिन, तीन-चार खत लिखने हैं. कल रात जून ने एक अजीब कहना चाहिए खराब इंग्लिश फिल्म दिखाई, वह भी कहाँ जानते थे कि यह फिल्म ऐसी होगी. उन्हें साफ-सुथरी कलात्मक हिंदी फ़िल्में ही भाती हैं, ऊटपटांग इंग्लिश फिल्मों से दूर रहना ही बेहतर है. टीवी का रिसेप्शन फिर खराब हो गया है.

परसों वे पहली बार डिब्रूगढ़ विश्व विद्यालय गए, वहाँ का पुस्तकालय देखा, कुछ विभाग भी देखे, अच्छा लगा. चार पत्र लिखे, उसे मैडम को भी एक पत्र लिखना है और एक अपनी सहपाठिनी को. सुबह कितनी तेज धूप थी पर अब बादल छाये हैं. ठंडी हवा बह रही है, कितनी अच्छी जगह है भारत का यह उत्तर-पूर्वी राज्य.




Sunday, November 4, 2012

ठंडा ठंडा संतरा



कल वह अपनी एक सहपाठिनी से एक किताब लायी थी, ‘मापन व मूल्यांकन’ स्पष्ट हो गया है, ‘टी स्कोर व जेड स्कोर’ भी बहुत अच्छी तरह समझाया है इस किताब में. कालेज गयी तो छात्राएँ परीक्षा की तिथियों के बारे में ही बात कर रही थीं, पहली मई से पन्द्रह तक परीक्षाएं हैं, हर पेपर के बीच में दो दिन का अंतराल है सिवाय मनोविज्ञान के पेपर के, टाइम टेबल  उसे तो याद भी हो गया है. ब्लैकबोर्ड पर लिख दिया उसने, और किसी टीचर ने कोई आपत्ति नहीं की, पर सिन्हा मैडम ने कहा ऐसा नहीं करना चाहिए था, क्यों कि अभी तक ऑफिशियली डेट्स नहीं आयी हैं, सो मिटा दिया. आज मार्च का अंतिम दिन है, यानि प्रति पेपर के हिसाब से पांच दिन मिलेंगे, उसने सोचा, अब उसे पूरी व्यूह रचना करके जुट जाना चाहिए. अब लगभग सभी विषयों का कोर्स पूरा होने को है. नन्हा आजकल देर से सोता है, उसे सुलाते हुए उसे ही नींद आ जाती है सो रात को भी देर तक पढ़ नहीं पाती. और आज जल्दी उठ भी गया है, दोपहर को सोना उसे जरा नहीं भाता.

अप्रैल का पहला दिन बीत भी गया, कल दिन भर चार्ट बनाने में ही निकल गया, आज ले गयी थी जमा करने. अब दो-तीन दिन और जाना है, उसके बाद बीच-बीच में एकाध दिन, शायद उन्नीस अप्रैल को विदाई पार्टी होगी, वह भी कुछ कविता या ऐसा ही कुछ पढ़े, ऐसा मन में विचार आया है, उसने सोचा, लिखेंगे कभी मूड होने पर....अलविदा..आज रामनवमी की छुट्टी है, घर पर उतनी पढ़ाई कर नहीं पा रही है, बल्कि कालेज डे में ज्यादा उत्साह रहता है. याद करने का काम अभी तक शुरू नहीं हो पाया है, लगता है चार-पांच बार अच्छी तरह पढ़कर ही जाना होगा, रटना अब उससे हो नहीं पायेगा. ड्राइक्लीनर के यहाँ से साड़ी ले आयी है, कितनी अच्छी लग रही है कोटा चेक की यह साड़ी.

मिसेज सिन्हा भी बस..लडकियाँ उनकी रिस्पेक्ट नहीं करतीं, यही शिकायत करती हैं हमेशा, लेकिन लडकियाँ भी क्या करें..कालेज का कल अंतिम दिन हैं मन में कुछ सुगबुगा रहा है एक कविता...सभी टीचर्स के नाम और बीएड के नाम. सिन्हा मैडम ने पूछा कि कितने प्रतिशत नम्बर आएंगे, उसने साठ प्रतिशत कह दिए..इतने भी नहीं आये तो पढ़ाई किस काम की.

अप्रैल भी आधा बीत गया, जून आए थे, तीन दिन रहे और चले गए, उन्हें पहले दिल्ली फिर आस्ट्रेलिया जाना है. अगले महीने अठारह तारीख को आएंगे अब हमें ले जाने. आजकल गर्मी बढ़ गयी है, पिछले दो-तीन दिन से दोपहर में बिजली गायब हो जाती है, पंखा चलता भी है तो गर्म हवा फेंकता है, दिन भर पंखे की हवा में रहने से बदन कैसा आलस्य से भरा रहता है, मगर क्या करें ? परीक्षा में सिर्फ बारह दिन रह गए हैं, अभी तक सभी कुछ पढ़ा ही नहीं है, याद करना तो दूर, साठ प्रतिशत अंक लाना इतना आसान नहीं है.
आज उसने वह कविता पढ़ दी फेयरवैल पार्टी में. शाम को उसकी सहपाठिनी सीमा आयी थी, उसने ननद से कहा चाय के लिए, वह छोटी-छोटी दी कटोरियों में चना-मूड़ी भी लेकर आयी.

आज इतवार है, उसे जून की याद आ रही है, पिछले इतवार वह यहीं थे. आज दोपहर भर बिजली नहीं थी, गर्मी से ऑंखें और सिर भारी हो रहे हैं, दोपहर को खाना भी नहीं खाया गया, इससमय कुछ खाने का मन हो रहा है, उसने सोचा वह दूध पीकर आती है.

उसे ठंडा-ठंडा संतरा खाने का मन हो रहा है, पर कौन लाकर देगा, सुबह दूध पिया पर हजम नहीं हुआ. पता नहीं उसे क्या हुआ है. उसके साथ यह भी समस्या है की तबियत ठीक न हो किसी काम में मन नहीं लगता. उसने सोचा कि जून उसे दूर रहकर भी शुभकामना भेज रहे हैं, उसे अपने भीतर की हिम्मत जगानी होगी.