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Monday, March 23, 2020

नारियल का पानी


वही कल वाला समय है. रात्रि का भोजन भी बन गया है, शाम का नाश्ता भी हो गया है, दोपहर की योग कक्षा भी हो गयी है. आज आठ महिलाएं आयी थीं, अच्छा लगता है उन्हें आसानी से प्राणायाम करके शांत होकर बैठते हुए देखना. ताजे नारियल का प्रसाद दिया जो बगीचे से तुड़वाया था, उसका पानी बहुत मीठा था, कोई भी कोल्ड ड्रिंक उसका मुकाबला नहीं कर सकता. आज तीनों कविताओं को सजा कर पीडीएफ बना दिए, ब्लॉग पर दो पोस्ट प्रकाशित कीं. सुबह ध्यान किया, मन कितना शांत है आज. ध्यान अनमोल है, इस जीवन का सबसे कीमती अनुभव है ध्यान ! हल्का सात्विक भोजन खाने से तन भी कितना हल्का अनुभव कर रहा है. आज सुबह से एक भीनी-भीनी गन्ध भी श्वासों में महसूस हो रही है, जिसका स्रोत कहीं नजर नहीं आता. जून ने फोन पर बताया नौ दर्जन राखियां खरीद ली हैं, ताकि उसे बनानी न पड़ें। बच्चों को सिखाने के लिए, पहले का जो सामान पड़ा है, उससे कुछ तो बना ही लेंगे. आज दोपहर क्लब की प्रेसीडेंट को मृणाल ज्योति की सहायता राशि बढ़ाने के लिए कहा, वह मान गयी हैं, अगले महीने कमेटी मीटिंग में प्रस्ताव रखेंगी ऐसा उन्होंने कहा. उन्हें मनाना ज्यादा मुश्किल नहीं था. आज शाम को सत्संग है. शाम के पांच बजे हैं, कुछ देर पहले एक कविता बन गयी, एक पंक्ति का सन्देश पढ़ा था यूनिवर्स के नोट्स में, वे जीवित हैं, यही सबसे बड़ा चमत्कार है. वाकई जीवन अपने आप में ही अंतिम उद्देश्य है. जीवन का और भला क्या उद्देश्य हो सकता है. आज भरवां शिमला मिर्च व लौकी की सब्जी बनाई है, जून की पसन्द की. दोपहर बाद वह आ गए, सदा की तरह ढेर सारा सामान लाये हैं दिसम्बर में उनकी दुबई यात्रा के लिए भी एक ड्रेस. दिल्ली में उनके दर्जी ने इस बार कह दिया, आपका वजन बहुत बढ़ गया है, आजकल टहलने का समय बढ़ा दिया है. टीवी पर सुना केरल में भारी वर्षा से बाढ़ का खतरा बढ़ गया है, देश के कई भागों में वर्षा के मौसम में तबाही मच जाती है. यमन में एक बस पर हुए हमले में कई बच्चे मारे गए व घायल हो गए, दुनिया में दुःख और हिंसा बढ़ती जा रही है. मोदी जी ने बायो फ्यूल पर रौशनी डाली, यह सरकार हर क्षेत्र में नए-नए प्रोजेक्ट शुरू कर रही है, अगली बार यह और मतों से जीतकर आने ही वाली है. दो दिनों का अंतराल ! सीपीएम के पूर्व नेता सोमनाथ चटर्जी का कोलकाता में देहांत हो गया है. संसद के अध्यक्ष काल में उन्होंने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देशहित में काम किया, भारत उन्हें सदा याद रखेगा. परसों मृणाल ज्योति की वार्षिक सभा थी, सुबह ही वे चले गये थे और तीन बजे लौटे. जून की भी एक आवश्यक मीटिंग थी, दोपहर बाद ही वे घर आये. कल बच्चों ने स्वतन्त्रता दिवस के लिए तिरंगे झंडे बनाये. आज सुबह स्कूल में योगासन का क्रम लिखित रूप में दे दिया ताकि उसकी अनुपस्थिति में वे लोग आसानी से योग अभ्यास करवा सकें. आज दोपहर तेज वर्षा हुई, हफ्तों पहले बच्चों ने जो नावें बनाई थीं, आज उन्हें तैराने का अच्छा मौका हाथ लगा. सुबह स्कूल जाते समय सहअध्यापिका ने कहा, खेत सूख रहे हैं, पानी ही नहीं है, ड्राइवर ने भी यही कहा, और आज ही इतना पानी बरसा है कि सारे खेत पानी से लबालब हो गए होंगे. हिमाचल प्रदेश व केरल में बाढ़ से नुकसान भी हो रहा है. आज विशेष तरीके से सब्जी बनाई थी, सब ठीक था पर बाद में देर तक गैस पर रह गयी, थोड़ी सी जल गयी है. स्वतन्त्रता दिवस व जून के जन्मदिन के लिए कुछ मित्र परिवारों को फोन पर आमन्त्रित किया है, परसों दोपहर एक बजे तक वे सभी आएंगे. उसने मन ही मन उन सामानों की लिस्ट बनायी जो को-ऑपरेटिव स्टोर से लाने हैं.

Friday, September 19, 2014

बादल और सूरज


कल रात फिर माँ को सपने में देखा. वे सभी थे. पिता, सभी भाई-बहन. वह काम कर रही थी, जैसे कि सशरीर हों, वास्तव में वह नहीं थीं, फिर वह पलंग पर बैठ जाती हैं और पानी मांगती हैं. वे उन्हें पानी नहीं दे पाते क्योंकि उनका भौतिक अस्तित्त्व नहीं है. मंझला भाई बोतल से उन्हीं के सामने पानी पी रहा है और वह गिड़गिड़ाती हैं, फिर दुःख और क्रोध से कहती हैं कि उन्हें पानी न देकर क्या वे सब जीवित रह पाएंगे? कैसा अजीब सा स्वप्न था, पर स्वप्न का अर्थ ही है अजीब...इसके बाद ही वह जग गयी और यही सोचती रही कि उसके ही मन ने इसे गढ़ा होगा, वास्तव में ऐसा नहीं होगा कि माँ को अंतिम समय में पानी की जरूरत रही हो और वह उन्हें न मिला हो. पर अब इन बातों का कोई अर्थ नहीं है, जाने वाले एक बार जाकर वापस नहीं आते. कल जून ने “बस इतना सा सरमाया” की spiral binding भी करवा दी. नन्हे ने उस दिन कवर पेज भी कम्प्यूटर पर प्रिंट कर दिया था. माँ की कृतज्ञ है कि न होने पर भी उन्होंने उसे इतना बल दिया. कल शाम वे उड़िया मित्र के यहाँ गये. सखी की तबियत ठीक नहीं थी पर उसने अच्छी आवभगत की अब वापसी पर घर आने का निमन्त्रण भी दे दिया है. आज सुबह से सूरज निकला है अभी पैकिंग का कुछ काम शेष है. जून के आने से पहले समाप्त हो जाने से अच्छा है वरना वह बहुत जल्दी परेशान हो जाते हैं.

आज सुबह पिता से बात की, ठंड वहाँ कम हो गयी है सो ज्यादा गर्म कपड़े ले जाने की आवश्यकता नहीं है. इस समय फिर आकाश बादलों से ढका है, धूप निकलती है तो सब कितना स्पष्ट दिखाई देता है ऐसे ही जब मन पर अज्ञान के बादल छाये हों तो कुछ भी स्पष्ट नहीं सोच पाता. ज्ञान की एक किरण ही कितना प्रकाश भर देती है. सुबह बंगाली सखी ने उसकी कविताओं की तारीफ की उसने अपने पति से उनके बारे में सुना था. कल दो और मित्र परिवारों ने भी पांडुलिपि देखी. एक रचियता के लिए सबसे सुखद पल वे होते हैं जब कोई उसकी रचना को पढ़े व समझे.    

मार्च का मध्य आ गया है. फरवरी के अंतिम सप्ताह में वे यात्रा पर निकले थे. उस दिन के बाद आज पहली बार डायरी खोली है. वे तीन दिन पहले वापस आ गये थे, आने के बाद सफाई आदि के कार्य से निबट कर पुनः पुस्तक के काम में जुट गयी है. अभी भी आठ-दस दिनों का काम शेष है. नन्हा सुबह सोकर उठा तो पेट दर्द की शिकायत कर रहा था, उसे सम्भवतः अपच हो गया है. सुबह एक सखी से बात हुई उसने कहा, वह कहानियाँ भी लिखे, एक बार पहले भी उसने यह बात कही थी. उसकी अगली पुस्तक कहानियों की हो सकती है, विचार बुरा नहीं है. अज सुबह छोटी बहन से बात की, वह थोड़ी चुपचुप लगी, परिवार से दूर होने के कारण या वे उससे मिलने नहीं गये शायद इस बात का मलाल हो या उसका वहम् भी हो सकता है. आज नन्हे को नई किताबें लेने स्कूल जाना है जून उसे दोपहर को ले जायेंगे.




Sunday, December 22, 2013

कड़क चाय और भुट्टे का सूप


Today is D-Day ie her birth day ! since morning she has received so many B’day wishes that she is full of gratitude towards all of them and Almighty ! He is always with her. सुबह-सुबह वे बेड में ही थे कि पिता का फोन आया, कल उन्हें उसका पत्र मिला, पत्र से उन्हें व जून के मित्र जो कल वहीं थे, दोनों को ख़ुशी हुई, छोटे भाई ने भी फोन पर पत्र मिलने की बात कही. पत्रों की महत्ता उसे एक बार फिर महसूस हुई. दीदी का फोन आया, माँ उनके पास गयी हैं, भारत के बाहर से जीजाजी का फोन आया. छोटी भाभी के पिता ने भी फोन किया. यहाँ भी सखियों ने विश किया, उसे यह गीत भी याद आया जो पाकिस्तानी रेडियो पर बचपन में सुना था, मेरी सालगिरह है बोलो.. बोलो..बोलो न हैप्पी बर्थडे टू मी..

कुछ दिन पहले तक बल्कि कल तक ही उसे लग रहा था  कि जन्मदिन पर ख़ुशी के साथ-साथ उदासी भी होगी. एक साल और गुजर जाने की, पर ऐसा नहीं है...केवल ख़ुशी का ही अहसास है जो तन और मन के पोर-पोर में छाया है. जून और नन्हा भी इसमें शामिल हैं.

आज सुबह की खुली धूप के बाद ही अचानक बादल आ गये और लगातार बरस रहे हैं. मन भीगा-भीगा सा उनके साथ एकात्मकता महसूस कर रहा है, असम का यह भी एक अनोखा अनुभव है. आज बहुत दिनों के बाद इत्मीनान से उसने फोन पर दो सखियों से बात की, एक ने कहा, आजकल ब्लाउज में छोटी बांह रखने का फैशन है, पर उसने कहा वह फैशन के अनुसार नहीं अपनी सुविधा के अनुसार कपड़े पहनती है. पड़ोसी कुछ दिन बाहर घूमने के बाद आए हैं, उनका बेटा जो नन्हे का मित्र है, तब से इधर ही है, नन्हा उसके साथ बहुत खुश है, वह इतनी बातें कर सकता है, आमतौर पर उसे देखने पर अहसास नहीं होता.

रिमझिम गान सुनाती बरखा
मन-प्राण हर्षाती बरखा
हौले हौले से बादल के
उर से नेह लुटाती बरखा
स्वप्न सुन्दरी सी अम्बर से
उतर रही लहराती बरखा
मोती सी उज्ज्वल बूंदों का
झिलमिल हार बनाती बरखा

आज इस वक्त सुबह के दस बजने में दस मिनट पर जब छत पर चलता पंखा अचानक बिजली चली जाने से थम गया है, बाहर से छत से टपकती इक्का-दुक्का बूंदों की ध्वनि के सिवा कुछ पंछियों की आवाजें सुनायी दे रही हैं, कोई महीन कोई तीखी आवाज.  बाहर हॉट वाटर सिस्टम में गर्म पानी भाप के साथ उछल-उछल कर थम गया है. वह अपने आप के सम्मुख बैठी है, सुबह ध्यान में २५ मिनट कैसे बीत गये पता ही नहीं चला, गीता पढ़ने बैठी तो –पता नहीं क्यों बार-बार पढ़े शब्द जैसे टकरा कर लौट आये, मन के भीतर तक नहीं गये. एक सखी से बात की, उसका फोन खराब था अन्यथा उसी ने कर लेना था, पर वह उसके साथ हिसाब-किताब वाली मित्रता नहीं रखना चाहती. वह अलेप, निर्लेप या कोई ऐसा ही शब्द जिसका अर्थ हो मुक्त, निर्बाध...किसी भी तरह के मानसिक उहापोह से आजाद रहना चाहती है. जून का गला खराब है, कल शाम वे उसे कमजोर दिखे, शायद उनकी अस्वस्थता का अनुमान वह नहीं लगा पा रही है, उनकी देखभाल ठीक से नहीं कर पा रही है, उन्हें आराम की जरूरत है. उसे अस्वस्थता के नाम से ही चिढ़ है, सम्भवतः स्वस्थ मनुष्य यह भूल ही जाता है कि अस्वस्थ होने पर कैसा लगता है.

कल शाम उसने ‘कॉर्न सूप’ बनाया, घर में उगे ताजे मकई का सूप बहुत स्वादिष्ट बनता है. कल रात सोने से पहले वे किसी बात पर बहुत हँसे और उसने हँसने पर चार पंक्तियाँ भी गढ़ लीं पर रात को सपने में रोना पड़ा, जून को (पर स्वप्न में वह बदले से लग रहे थे) वाशिंग मशीन से करेंट लग जाता है. दादी जी की बात याद आ गयी जब वे कहती थीं, ‘हासे दा विनासा होसी’ ! आउटलुक में मंटों की कुछ दिल-दहलाने वाली कहानियाँ पढ़ीं, १९४७ की याद दिलाना आज की पीढ़ी के लिए आवश्यक है.

अपने आप से बातें करना अच्छा लगता है,
हम भी पागल हो जायेंगे ऐसा लगता है

आज कुछ ऐसी ही कैफियत हो रही है उसके मन की. कल रात को वह बहुत गुस्से में थी, जे कृष्णामूर्ति के अनुसार वह गुस्सा ही थी उस पल, उनका माली ठीक से बगीचे की देखभाल नहीं करता इस बात पर. उपाय यही है कि आज से नियमित एक घंटा वह स्वयं काम करे. आज सुबह  उठी तो लगा जैसे कल रात की बात भूल गयी है, ध्यान के समय भी ज्यादा याद नहीं आई पर बाहर जाकर देखा तो नैनी के बेटे को बुलाये बिना नहीं रह सकी, माली के साथ वह भी सहायता करेगा. कल शाम को एक मित्र परिवार आया उसने चाय कुछ कड़क बना दी, इतने वर्षों से चाय बना रही है पर सही अनुपात का ज्ञान अभी तक नहीं हुआ है. नन्हे को आज क्लास के बाद एक चित्रकला प्रतियोगिता में भी जाना है, जो Assam Science Association की तरफ से विश्व पर्यावरण दिवस के उपलक्ष में हो रही है. पेड़ों के नाम एक कविता और बगीचे में काम करना पर्यावरण के प्रति उसका उपहार होंगे.

Saturday, December 7, 2013

जयपुर- गुलाबी शहर


कल रात फिर पानी बरसता रहा पर  इस वक्त थमा हुआ है. सुबह ही फोन करके माँ-पिता को अपनी यात्रा के बारे में बता दिया, वे प्रसन्न हुए. कल शाम क्लब से वापस आकर वे अपने पड़ोसी के यहाँ गये उन्होंने नया फर्नीचर लिया था, मेज बहुत सुंदर और भारी थी. वह ट्रेन में पढ़ने के लिए अपने साथ जेन ऑस्टेन की कोई किताब ले जाना चाहती थी पर नहीं मिली, एम. आर. आनन्द की The Big Heart लायी है कल. seven summers अब खत्म होने वाली है.

उसकी सखी ने पहले कल सुबह के नाश्ते के लिए फिर रात के खाने के लिए आमंत्रित किया, उसने मना कर दिया फिर उसके जोर देने पर आज रात भोजन साथ-साथ खाने के लिए राजी हो गयी. वह सब्जियां बनाकर लाएगी उसे रोटियां बनानी हैं. अब जून को पता नहीं कैसा लगे क्योंकि वे लोग आठ बजे के बाद ही आएंगे. खैर, दोस्ती की खातिर थोड़ी असुविधा तो सहनी ही पड़ेगी दोनों परिवारों को ही. सुबह जल्दी ही आँख खुल गयी और उठने से पहले ही जून से थोड़ी चर्चा भी हो गयी, वह उन्हें अपनी बात समझा नहीं पायी और वह अपने पुराने ख्यालात वाले मन को लिए रहे कि यात्रा में पति-पत्नी को एक दूरी बनाये रखनी चाहिए. वे एक अन्य परिवार के साथ राजस्थान घूमने जा रहे हैं, साथ-साथ यह यात्रा उन तीनों को एक-दूसरे के करीब भी तो लाएगी. इंसानी रिश्ते सही माहौल, सही अपनाइयत पाकर ही पनपते हैं, वे एक समूह में होंगे फिर भी एक इकाई तो रहेंगे. उन लोगों को यानि उस परिवार को जानने का मौका भी मिलेगा जरा और करीब से. नन्हा आजकल कहानी की किताबों में व्यस्त रहता है, वह घर में रहते हुए भी इतना शांत रहता है कि उसकी उपस्थिति का पता नहीं चलता.

राजमहल होटल गुवाहाटी- आज सुबह सात बजकर दस मिनट पर उनकी बस चली और ठीक बारह घंटे बाद गोहाटी पहुंच गयी. यात्रा अच्छी रही सिवाय रास्ते में देख तीन दुर्घटनाओं के दृश्यों के तथा अंतिम एक-दो घंटों के जब बस शहर में प्रवेश कर रही थी. हवा में इतना प्रदूषण था कि साँस लेने में दिक्कत होने लगी थी, घर की साफ-सुथरी हवा तब याद आ रही थी. दोपहर का खाना उन्होंने रास्ते में पड़ने वाले होटल wild grass में खाया. नन्हा बहुत खुश है बस में वह बोर हो रहा था. उसे थकन का जरा भी अनुभव नहीं हो रहा है, जबकि वह थक गयी है. जून भी बहुत उत्साहित नहीं लग रहे हैं. सुबह साढ़े चार बजे उन्हें उठना है और छह बजे की ट्रेन से दिल्ली जाना है.  

नीलम होटल जयपुर-सुबह चार बजे ही वे उठ गये और छह बजे राजधानी ने प्लेटफार्म छोड़ दिया. वे चार परिवार थे सो यात्रा आराम से गुजरी. समय समय पर चाय नाश्ता व खाना खाते तथा बातें करते-करते. अगले दिन सुबह दस बजे दिल्ली पहुंच गये, स्टेशन पर उतरते ही ठंड लगी, स्वेटर्स तो जून ने गोहाटी से ही वापस भिजवा दिए थे, लेकिन थोड़ी ही देर में तन उस ठंड का अभ्यस्त होगया. पहले वे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन गये पर जयपुर के लिये ट्रेन शाम पांच बजे से पहले नहीं थी सो वापस बीकानेर हाउस गये जहाँ से बस मिल गयी रास्ते में Midway में लंच लिया. जो बहरोड़ में एक बहुत अच्छा स्टॉप था, उन्होंने वहाँ  कुछ ज्यादा ही समय लगा दिया, बस के ड्राइवर को उनके लिए देर तक बस रोकनी पड़ी. दिल्ली से जयपुर का रास्ता सुंदर था. बस स्टैंड से कुछ दूरी पर उनका यह होटल है. नहा धोकर रात के खाने के लिए निकले तो एक मारवाड़ी भोजनालय में चले गये वहाँ बेहद मिर्च-मसाले वाला खाना मिला, कोई भी ढंग से नहीं खा सका, स्वाद ठीक करने के लिए दही चीनी माँगनी पड़ी. सोने में बहुत देर होग यी, वे थके हुए भी थे, सो बहुत अच्छी नींद आई.







Monday, September 2, 2013

पड़ोस की बिल्ली


आज नन्हा पानी की बोतल ले जाना भूल गया, जबकि वह उसके बैग के निकट ही रख देती है. बस में चढ़ने के बाद उसने इशारा  किया, पर जब तक वह घर जाकर बोतल लेकर आती बस को चले ही जाना था, उसने सोचा यही ठीक है कि आज वह पानी के बिना ही रहे, तभी भविष्य में ऐसी भूल नहीं करेगा. परसों शाम को लेडीज क्लब की मीटिंग है, फोन करके सबको बताना है, कल तैयारी भी करनी होगी. आज सुबह से पड़ोस के बच्चे की सूसी नाम की एक बिल्ली उनके स्टोर में आकर सोयी है, शायद उसे यह घर भी अपना घर लग रहा है. उसे आवाज सुनाई दी, धोबी आ गया था, वैसे भी आज इधर-उधर की बातें लिख कर वह पेज भर रही थी, सही मायनों में जिसे आत्मशोध कहते हैं या आत्मज्ञान उसके करीब जाने का प्रयास नहीं था. आज ध्यान में अपेक्षाकृत सफलता मिली. मन को जब चाहे तब संयमित कर पाने की विद्या कुछ-कुछ सध रही है. पर कल दोपहर को उसे नैनी पर क्रोध करना पड़ा, क्या वह असंयम नहीं था, शायद नहीं, क्योंकि वह सोच-समझ कर उठाया गया कदम था. क्या इसका अर्थ यह नहीं कि यदि कोई गलत कार्य करे और उसे उचित ठहरने के लिए तर्क का सहारा ले तो कार्य सही हो जाता है. उसे तो लगता है क्रोध एक प्रभाव में आकर किया जाता है सम्मोहन की अवस्था में और वह मन का ही एक रूप है.

आज सुबह नन्हे को उठाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी, उसकी एक आँख तो चिपकी होने के कारण खुल ही नहीं रही थी. आज न तो जागरण पर ही ध्यान टिका पायी और न ही बाद में ध्यान के लिए बैठी. मीटिंग के लिए फोन करते-करते ही सारी सुबह निकल गयी. दोपहर पढ़ने-पढ़ाने में, शाम भ्रमण व बागवानी में. कल रात सैलाब में शिवानी को इतना बेबस देखा की उसके दुःख में शामिल हो गयी.

जून के आने में अभी काफी वक्त है और उसका सुबह का काम लगभग समाप्त हो गया है. जागरण में आज दादा का संदेश सुना- what is silence is turning to God बाहर का शोर यदि न भी हो तो हमारे भीतर जो आवाजों का शोर है उसे खत्म करके ही सच्चा मौन पाया जा सकता है. There are voices of desires, of anger, of so many feelings, so many useless thoughts then one can not turn to God even for a single minute. ईश्वर को पाना इतना कठिन क्यों है ? दूरदर्शन पर ‘मजहब नहीं सिखाता’ में हिन्दू-मुस्लिम एकता पर एक भाव प्रवण दृश्य देखा, बच्चों का जन्मदिन मनाने जो नाराज मुसलमान पड़ोसी हिन्दू के घर नहीं आते वे रात को उसकी चीख सुनकर आ जाते हैं. जब तक लोगों में एक-दूसरे के मजहब के प्रति नफरत है तब तक लोग मजहब का असली रूप पहचान ही नहीं सकते. दादा कहते हैं, Make a relationship with God ! पर यह उसके लिए पहले कभी सम्भव था जब वह बरबस यह वाक्य बोला करती थी, God is with her always because he is her friend. लेकिन अब इतनी निकटता अनुभव नहीं कर पाती, भावना पर बुद्धि हावी हो जाती है और कभी-कभी लगता है कि ईश्वर की आवश्यकता ही नहीं है. पर वह जानती है, किसी भी विपत्ति के आने पर उतनी ही श्रद्धा से फिर उसे पुकारेगी. ईश्वर उसका मददगार है क्योंकि उसमें यह चाह है.




  

Sunday, April 7, 2013

कादम्बिनी - हिंदी पत्रिका




नन्हा उस पर गया है, जून ऐसा कई बार कहते हैं, कल शाम को उसे परीक्षा के लिए घबराहट होने की शिकायत करते देख उसे भी इस बात का विश्वास हो गया. इतना छोटा सा बच्चा जिसे सब कुछ याद है, परीक्षा से इस तरह क्यों घबरा सकता है, जब इतनी छोटी थी तो शायद वह भी घबराती होगी, कुछ याद नहीं पड़ता. आज सुबह भी थोडा नर्वस था शायद इसीलिए नाश्ता भी ठीक से नहीं किया, उसने मन ही उसे शुभकामनाएँ भेजीं. जून का फोन आया है उन्हें आज मोरान जाना हैऔर नल से पानी गायब है, कैसे स्नान होगा और फिर खाना बनेगा. सवा नौ हो चुके हैं, आज कपड़े भी नहीं धुल पाएंगे.

  आज भी नन्हा नर्वस था पर कल से कहीं कम. केवल दो पेपर और रह जायेंगे उसके आज के बाद. स्वीपर अभी तक नहीं आया है, कल कह रहा था, उसे अस्पताल जाना है ताकि वह  उसकी अनुपस्थिति की खबर सेनिटेशन दफ्तर में न करे. कल रात बेहद गर्मी थी, फिर आधी रात के बाद शायद वर्षा हुई, जिससे कुछ ठंडक हुई, पहले तो उमस के कारण नींद ही नहीं आ रही थी. दो हफ्ते रह गए हैं उन्हें घर जाने में, कभी-कभी लगता है, पहली बार इतना लम्बा सफर अकेले करने जा रही है, जाने कैसे कटेगा. यह भी हो सकता है कि इतना लम्बा सफर करने के बाद नन्हा भी और वह भी कुछ सीखे, साहसी बने. कल शाम कादम्बिनी में एक लेख पढ़ा, प्रज्ञा चक्षु से आत्मा को देखने का जिक्र है उसमें. जानना तो दूर आजकल आत्मा पर विश्वास ही कौन करता है, मात्र देह ही सब कुछ है आज के भौतिकतावादी युग में. देह को सजा-संवार के रख सके वही सभ्य है, वही सफल है. मन और आत्मा तक पहुंचने का न तो किसी के पास समय है और न जरूरत....सच बोलने का साहस कोई करे भी तो सच सुनने को कोई तैयार नहीं. आत्मिक और अध्यात्मिक उन्नति की बातें अब पिछड़ेपन की पर्याय बन गयी हैं.
 
  जून आज तीसरे दिन भी मोरान गए हैं, उन्हें अपने काम में इस तरह व्यस्त देखकर व सफलता मिलने पर उसे खुशी होती है. दोपहर को भोजन के वक्त वे घर पर नहीं होंगे यह बात नन्हे और उसे दोनों को अखरेगी. नन्हे का परसों अंतिम इम्तहान है, उसके लिए अंग्रेजी का पेपर बनाना है, सो यह लिखना छोड़कर पहले वही करने में वह व्यस्त हो गयी.







Monday, March 18, 2013

गर्म पानी का पाइप



  पिछले दो दिन यूँ हीं गुजर गए जैसे हर बार गुजरते हैं. शनिवार को नन्हा स्कूल नहीं गया था, ऐसे में सुबहें थोड़ा व्यस्त हो जाती हैं, उसकी मार्कशीट मिल गयी है, सोशल में दो नम्बर कम हैं बाकि सभी विषयों में शत-प्रतिशत अंक मिले हैं. अभी-अभी एक पत्र लिखा है, घर जाना है पर जाने क्यों यात्रा का उत्साह नहीं है. पत्र में क्या असत्य लिखा था ? क्या वह अपनों से भी अर्थात अपने से भी झूठ बोल सकती है...रात को फिर अजीब स्वप्न देखे..सर्वोत्तम में एक लेख पढ़ा था, उसमें लिखा था नींद गहरी न हो तो स्वस्थ नहीं रहा जा सकता, या फिर...पर जब ‘वह’ उसके पास है तब इतनी माथापच्ची करने की उसे क्या जरूरत है.

  कल मंझले भाई की चिट्ठी आयी, उससे एक सवाल पूछा था उसने, जब वह ‘योगी कथामृत’ पढ़ रही थी. उसने बहुत अच्छा जवाब दिया है. विनोबा जी ने अध्यात्मवादी होने के लिए तीन निष्ठाएं बतायी हैं-
निरपेक्ष नैतिक मूल्यों पर आस्था,
जीवमात्र की एकता और पवित्रता में विश्वास तथा
मृत्यु के बाद भी जीवन की अखंडता में विश्वास

भाई ने तो स्वीकार किया कि पहली निष्ठा में वह खरा नहीं उतरता और अगर वह अपने मन में झांक कर देखे तो... वह भी अभी बहुत पीछे है, प्रयास करती है, मगर कई बार असफल रहती है. विश्वास उसे तीनों में है. अच्छाई में विश्वास हो..यह तो सभी के साथ होता है लेकिन उसका पालन कौन कितना करता है.

  कल उन्हें घर जाना है, जून अवश्य ही मना करेंगे यह डायरी ले जाने के लिए..वह भी सबके साथ कहाँ लिख पायेगी बल्कि एक पतली कॉपी या कुछ पन्ने ले जाने से ठीक रहेगा...अपने विचारों या भावनाओं को उकेरने के लिए.

 लगभग एक महीने बाद वह लिख रही है. यात्रा के दौरान कई खट्टे-मीठे अनुभव हुए, जिन्हें मन के पृष्ठों पर तो आज भी स्पष्ट देख रही है. माँ-पिता का जीवन के प्रति अनूठा उत्साह देखकर मन गहरे तक प्रेरित होता है. घर में सभी से मिलकर अच्छा तो लगा पर एक-दो बार ऐसा भी लगा कि एक औपचारिकता है जो सभी निभाए चले जा रहे हैं.. पर इस पर अफ़सोस नहीं होता..यह तो परम सत्य है कि इंसान हर काम अपनी खुशी पहले देखकर करता है, यह बात सभी के लिए सत्य है. उन्हें यहाँ आए चौथा दिन है, पहले दिन उसकी उड़िया सखी मिलने आई, खाना खिलाया. यानि उम्मीद के दिए जल रहे हैं और कयामत तक जलते रहेंगे. दूसरों के लिए सोचना यदि हम शुरू कर दें तो दूसरे खुदबखुद..आज इस वक्त साढ़े दस बजे हैं, सिर भारी है, शरीर की हल्की सी पीड़ा भी मन को कैसे प्रभावित कर लेती है, तभी जो वास्तव में लिखना चाहिए था वह न लिखकर सिर की बात लिख गयी. नन्हे की ऑंखें यात्रा के दौरान शहर के प्रदूषण से लाल हो गयी थीं, बहुत संवेदनशील हैं वे धूल व धुएं के प्रति.

दिसम्बर का महीना शुरू हो चका है कल से, और उसे खबर भी न हुई, बड़े भैया का जन्मदिन था कल, उन्हें खत या कार्ड कुछ भी तो नहीं भेजा. इस बार उनसे कुछ ही घंटों के लिए मिल सकी, भाभीजी भी काफी बदली हुई लगीं, वह बड़ी बुआ जी की तरह लगीं रुआब वाली और कुछ मूडी..आज सुबह से सोच रही थी कि लिखना है पर अब दो बजे वक्त मिला है, डेढ़ घंटा अखबार व संडे पत्रिका पढ़ रही थी, पर इतना पढ़ने का कुछ फायदा भी हुआ, सतही जानकारी से कोई लाभ होता है, अखबार सरसरी निगाह से ही पढ़ा और संडे भी कुछ पन्नों को छोड़कर. यूँ कहे कि आजकल कोई बात उसे प्रभावित नहीं कर पाती है तो ठीक होगा. ‘गीता’ पढ़ते-पढ़ते ही मन शायद अब किसी भी घटना में बंध नहीं पाता, तटस्थ हो गया है. कल सुबह बाएं तरफ आयी नई तेलुगु पड़ोसिन के यहाँ गयी, उसकी दो जुड़वां बेटियां हैं, अच्छा लगा उनसे मिलकर. दोपहर को दायीं ओर वाली उड़िया पड़ोसिन के पास. कल मन था कि घर में लग ही नहीं रहा था.
कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गए उनके विवाह की वर्षगाँठ थी, उनका बगीचा भी देखा. आज खत लिखने का दिन है, दोपहर को लिखेगी. नन्हे की ऑंखों की लालिमा तिनसुकिया के डॉ की दवा से ठीक हो गयी है, उसे फोन करके धन्यवाद कहना चाहिए. कल रात वे देर तक बातें करते रहे, पर सुबह स्कूल जाने से पहले वह उसकी आँखों में दवा डालना भूल गयी, जून आते ही पूछेंगे. गर्म पानी का पाइप खराब हो जाने के कारण आने के बाद से उन्हें बाथरूम में गर्म पानी नहीं मिल पा रहा है, नहाने के लिए पानी गर्म करना पड़ता है. आज भी प्लंबर नहीं आया है अभी तक.

Wednesday, August 22, 2012

बारिश लायी बाढ़



कल उसने तीन बार लिखने के लिये डायरी उठाई पर हर बार कुछ न कुछ बात हो गयी और आज अभी सुबह के आठ बजे हैं, सोनू अभी उठने वाला है. कल दिन भर व रात भर भी पानी बरसता रहा, मौसम में खुनकी है अर्थात नमी..सुबह एक बार उठकर फिर सो गयी, उठी तो जून तैयार होकर जा रहे थे, नाश्ते में कॉर्नफ्लेक्स व कोला खाकर, यहाँ केले को कोला कहते हैं, शुरू में यह बात उन्हें अजीब लगती थी अब मुँह से कोला ही निकलता है. उसने एक बार फिर खुद से वादा किया है कि आज से उसका ज्यादा ध्यान रखेगी, कल बहुत दिनों बाद लाइब्रेरी से दो किताबें लायी, बाद में वे एक बच्चे के जन्मदिन की पार्टी में गए, अच्छा लगा सभी परिचित लोग थे वहाँ.

कल शाम जून और उसने एक प्यारा सा वादा किया, मधुर बातें कीं, एक दूसरे के स्नेह में डूबते-उतराते रहे, सुबह जल्दी उठ गए तभी आज सभी काम समय से हो गए हैं. कल शाम एक नया परिचित तेलुगु जोड़ा उनके घर आया, श्रीमती राव की एक बात उसे बहुत पसंद है, हर समय टिपटॉप रहती हैं, तैयार चुस्त-दुरस्त. एलआइसी की नौकरी के लिये तैयारी कर रही हैं, परीक्षा सितम्बर में है. इसी हफ्ते माँ व ननद जा रही हैं, जून उन्हें छोड़ने गोहाटी तक जायेंगे. नन्हा बुआ से नाश्ता खा रहा है, उसे माँ की साड़ी पर फाल लगानी है, जो उस दिन जल गयी थी उससे प्रेस करते समय.

जून उन्हें गोहाटी तक छोड़कर कल वापस आ गए. दो दिन केवल नन्हा और वह दोनों ही थे घर में, उसने लिखने नहीं दिया, आज भी पेन मांग रहा था, उसे किसी काम में लगाकर वह आयी है. उनके पड़ोस की एक महिला जो बीमार थीं, आज महीनों बाद वापस आयी हैं, बेटे का जन्म हुआ है, गोल गोल शक्ल है बिल्कुल माँ जैसी. कुछ देर पहले वह मिलकर आयी. 

कुछ दिनों का अंतराल और आज छोटे भाई का जन्मदिन है, उसे पत्र लिखेगी उसने मन ही मन सोचा. नन्हा पड़ोस की दीदी के साथ खेल रहा है, आज वह स्कूल नहीं गयी. वर्षा जो यहाँ के जीवन का अविभाज्य अंग है, रात भर होती रही अब भी काले काले बादल बने हुए हैं. सुबह ठंड लग रही है कहकर जून ने नहाने में आनाकानी की तो वह उससे व्यर्थ ही नाराज हो गयी, सोचा है, उसकी पसंद के मूली के परांठे बनाएगी तो वह खुश हो जायेंगे,  

शहर में बाढ़ आ गयी है, बूढी दिहिंग में पानी बहुत बढ़ गया है. कल वे लोग नदी व बाढ़ देखने गए थे. सेटलमेंट एरिया में तो घरों में पानी घुस गया है. सेंट्रल स्कूल जाने वाली सड़क बिल्कुल पानी में डूब गयी है. संभव है रात भर में पानी कुछ कम हआ हो. डिब्रूगढ़ के कई गाँव खाली करवा दिए गए हैं, बहुत से लोग यहाँ भी स्कूलों में रह रहे हैं. बिहार में कल फिर भूचाल आया कुछ सेकंड्स के लिये. पिछले भूकम्प में हजारों व्यक्ति घायल हुए और पांच सौ मारे गए., शायद उससे भी ज्यादा, यहाँ भी पिछले कई दिनों से लगातार वर्षा हो रही है, कुछ देर को थमती है फिर शुरू हो जाती है. मौसम काफ़ी ठन्डा हो गया है.


















Friday, August 3, 2012

चाइनीज ब्यूटीशियन


उनका पत्रिका-क्लब आरम्भ हो गया है. सा. हिंदुस्तान और सारिका आयी हैं, अभी तो कितनी पत्रिकाएँ आयेंगी, ठीक से पढ़ सके इसके लिये दोपहर को सोने का मोह छोड़ने होगा. क्लब से दो पुस्तकें भी लायी है एक बागवानी पर और दूसरी हाउस कीपिंग पर है. जीनिया के पौधे निकल आये हैं. क्यारी में लगाने हैं, गुलदाउदी की कटिंग्स भी लगायी हैं, देखें जड़ पकड़ते हैं या नहीं अगले साल के लिये. उसे अपनी बंगाली मित्र का स्मरण हो आया, जिससे बहुत दिनों से नहीं मिली और जो बागवानी में बहुत रूचि रखती है, उसे जानने की उत्सुकता हुई कि उसने अपने लॉन में क्या लगाया है. नन्हे के स्वेटर का गला खोल कर फिर से बनाया पर बात बनी नहीं, रहीम दास ने कहा है न, टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाये. आज से वह फ्रिज के लिये क्रोशिये का कवर बनाना शुरू कर रही है. नन्हे को कल शाम जून ने डांटा, गुस्से में वह यह भी भूल गए कि वह उनकी बात समझ भी रहा है या नहीं, काश, वह आगे कभी ऐसा न करे.

कल रात बड़े जोरों की वर्षा हुई आंधी और तूफान के गर्जन-तर्जन के साथ, बिजली चली गयी, और अब पानी नदारद है. सुबह-सुबह पानी न हो काम कैसे चलेगा, गनीमत है थोड़ा बहुत पानी तो घर में रहता है फिल्टर में और गर्म पानी तो आता ही है. परसों वे तिनसुकिया गए, मौसम बिल्कुल ही साथ न दे तो बात दूसरी है वरना तिनसुकिया में शिव मंदिर तक जाना एक अच्छा अनुभव है. वह एक चाइनीज ब्यूटीशियन के पास भी गयी, वे लोग कई पीढ़ियों से भारत में बसे हुए हैं, आराम से स्थानीय भाषा बोल रही थी, जबकि आपस में वे चीनी में ही बोल रहे थे. जून ने एक नई मिठाई खरीदी, बहुत स्वादिष्ट थी. कल उसकी पड़ोसिन घर जा रही है एक महीने के लिये, शाम को वे उनसे मिलने जायेंगे.

कल सुबह वह जून से परसों रात की बात पर नाराज क्या हुई कि सभी काम बिगड़ने शुरू हो गए, नन्हें ने अपने कपड़े गंदे कर लिये और वह स्नानघर में थी, जल्दी-जल्दी बिना पोंछे उल्टा गाउन पहन कर बाहर आयी, धुले हुए कपड़े तौलिए सहित नीचे गिर गए, गनीमत है सूखे फर्श पर ही गिरे थे. जब तक वह नन्हे के कपड़े बदले महरी ने सभी नीचे गिरे कपड़ों को मैले कपड़े समझ कर पानी की तरफ खिसका दिया और तभी नन्हें ने पानी अलग गिरा दिया गैलरी में जल-थल हो गया, झटपट झाड़ू से सफाई की कि कहीं वह गिर न जाये...ऐसे में लिखने का समय ही नहीं मिला.

Saturday, July 7, 2012

घड़ी का अलार्म


अभी-अभी वे लोग घर वापस आये हैं, इतवार की अलसाई सी दोपहरी है. गए थे किसी परिचित के घर, पर वे भी शायद इसी तरह कहीं निकले हुए थे, थोड़ा सा घूमघाम कर वापस आ गए. नन्हा रास्ते में ही सो गया था. जून सोने जा रहे हैं. नूना को कोई काम नजर नहीं आ रहा था, सोचा डायरी ही लिखे. आज ठंड भी ज्यादा नहीं है. कौवे की आवाज बार-बार आ रही है और शायद कोई नल भी ठीक से बंद नहीं हुआ है पानी टपकने की आवाज भी रह रह कर आ रही है. और सब शांत है उसके मन की तरह. कोई उद्वेग नहीं, कोई हिलोर नहीं. सोया हुआ कितना अच्छा लगता है मानव, उसने दोनों को सुख की नींद सोये हुए देखा. कल उसके सर में दर्द था, लगभग हर माह ऐसा होता है. आज वह ठीक है. ज्यादा काम जून ने ही किया. महरी भी छुट्टी पर है, ठंड भी कल ज्यादा थी, सूर्य के दर्शन तो आज हुए हैं, आज भी धूप आंखमिचौली खेल रही थी. यहाँ घर पर धूप बस दो बजे तक ही रहती है, उसके बाद न आगे न पीछे. दिसम्बर का एक दिन और शेष है फिर आरम्भ होगा नया वर्ष.

वर्ष का अंतिम दिन. मौसम अच्छा है, धूप कितनी सुहा रही है, कच्ची और गुनगुनी धूप. सोनू नींद में कुनमुना कर फिर सो गया है. आज से एक सप्ताह के लिये क्लब में कार्यक्रम है पर वे नन्हें के साथ बहुत देर नहीं रुक सकते वहाँ. जून आज पहले अर्ध में दफ्तर नहीं गया, वर्ष के अंत में सभी बची-खुची छुट्टियाँ खत्म करते हैं. उनकी घड़ी में अलार्म नहीं है सो नींद भी आज छह बजे के बाद खुली. कल नए वर्ष के तीन गुलाबों वाले कार्ड मिले. धूप फिर चली गयी है सो बाहर बैठने से कोई लाभ नहीं वह उठकर अंदर चली गयी.

Saturday, May 26, 2012

पानी चला गया


कल सुबह पौने नौ बजे पानी व बिजली दोनों नदारद हो गए कुछ घंटो के लिये, वापस आये सवा  तीन बजे, कुछ पानी हमेशा गर्म पानी की टंकी में रहता है सो काम किसी तरह चल गया. कम पानी से काम चलाना कोई उनकी महरी से सीखे, आधी बाल्टी पानी में उसने सारे बर्तन धो दिए फिर उनके इस्तेमाल के लिये कहीं से एक बाल्टी पानी ले आयी. जून ने उसे फिर समझाया कि मनुष्य में हर परिस्थिति में रहने की, सामंजस्य बिठाने की ताकत होनी चाहिए. कल दोपहर गर्मी की वजह से वह बहुत परेशान हो गयी थी.
आज सुबह वे सो ही रहे थे कि उनके पड़ोसी के द्वारा मालूम हुआ कि उनकी पत्नी ने बीती रात साढ़े बारह बजे बेटे को जन्म दिया है, नूना ने सोचा उसका जन्मदिन छह जून को मनाया जायेगा, वह उसे देखने जायेगी,
वह जून के साथ अस्पताल गयी थी उसकी सखी ने बताया कि अंत में आपरेशन करना पड़ा. जून कहता है कि उसके साथ ऐसी कोई समस्या नहीं होगी, काश ! ऐसा ही हो, उसने सोचा. देह का दर्द तो सहा जा सकता है पर मन का भय कहीं ज्यादा है. आजकल उसे रात भर में नींद बहुत कम आती है. उसकी मानसिक असहजता बढ़ गयी है, वह जल्दी-जल्दी अधीर हो जाती है. जून उसे समझाता है पर प्रश्न यह है कि उसे दुःख है ही क्या ? सिवाय उसके मन की दुर्बलता के, और इसे और कोई दूर नहीं कर सकता जब तक कि वह स्वयं न चाहे.


Thursday, February 23, 2012

कोलम्बो का आकाश


आज सुबह फिर उठने में देर हुई, कल रात देर तक वे अपने-अपने बचपन की बातें करते रहे. दोनों के बचपन में कई बातें मिलती-जुलती लगती थीं. सबके बचपन एक से ही होते हैं पर बड़े होकर सब अपने-अपने दायरों में कैद हो जाते हैं. आज सुबह से ही पानी बहुत कम आ रहा था, बाद में बंद ही हो गया. कल नूना ने जून के साथ शर्त लगाई कि भारत-श्रीलंका क्रिकेट टेस्ट मैच में भारत जीतेगा पर मैच अनिर्णीत रहा. अब कल वन डे है इसमें तो भारत को जीतना ही चाहिए, उसने सोचा. कल वे एक असमिया परिवार से मिलने गए थे, उनका बेटा जिंजू बहुत प्यारा है, शर्मीला व शांत स्वभाव का.
आज इतवार है, सितम्बर माह भीगा भीगा ठंडा सा इतवार ! सुबह से आकाश में बादल छाये रहे, यहाँ भी और कोलम्बो के आकाश में भी, मैच देर से शुरू हुआ और कम रोशनी के कारण जल्द खत्म कर देना पड़ा. जून के साथ वह होमियोपैथिक डॉक्टर के यहाँ गयी थी. आज वे फिर एक परिचित के यहाँ गए नूना ने अपने हाथ से बनायी  टैटिंग की लेस उन्हें दी. उसके बाद वे मोटरसाइकिल से दूर तक घूमने गए, खुली सड़क पर इक्का-दुक्का वाहन थे. उसने वही पीला कुरता पहना था. शाम जैसे-जैसे बढ़ रही था मच्छर भी बढ़ रहे थे जो आँखों, बालों से टकरा रहे थे.