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Thursday, May 30, 2019

शब्दों के बीज



आज हफ्तों बाद सुबह लिखने का सुयोग मिला है. कल रात से लगातार वर्षा हो रही है. भीषण गर्जना के कारण रात को एक बार नींद खुल गयी, जब आई तो बहुत दिनों बाद एक दुःस्वप्न देखा. पिताजी व माँ को भी स्वप्न में काफ़ी देर तक देखा. उन्होंने कोई फोटो खोजने को कहा था, जब पूछा, मिल गया तो याद आया, अभी तो खोजना भी शुरू नहीं किया. एक स्वप्न में उन्हें मदद के लिए बुलाती है, आवाज भी दी है, और कानों से उसे सुना भी. स्वप्नों की दुनिया कितनी विचित्र होती है. आज धौती व नेति दोनों की, तन हल्का लग रहा है. जून ने कहा है अपना सोनी का नोटपैड मृणाल ज्योति के एक टीचर को दे देंगे. कोई वस्तु किसी के काम आये, इसीमें उसकी सार्थकता है. दीवाली के लिए घर की सफाई का कार्य चल रहा है, पर हो सकता है इस दीवाली पर वे बंगलूरू जाएँ. वहाँ की दीवाली भी देखने योग्य होगी.

आज 'हिंदी दिवस' है. व्हाट्सएप पर संदेश भेजे. फेसबुक पर हिंदी दिवस की शुभकामनायें दीं. इसके अलावा तो हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कुछ नहीं किया. छोटा सा लेख या कविता जो हिंदी के महत्व को दर्शाती हो, अभी भी लिखी जा सकती है. बचपन से हिंदी की कहानियाँ पढ़ते-पढ़ते हिंदी के लेखकों-कवियों का सान्निध्य प्राप्त करते-करते यह भाषा इस तरह भीतर घुल-मिल गयी है कि थोड़े से प्रयास से ही कुछ भीतर से झरने लगता है. शब्दों के बीज जो बचपन में बोये थे मन की धरती पर, वह आज विचारों की पत्तियां और शाखाओं के रूप में खिल रहे हैं. वे ऋणी हैं इस भाषा के, जिसने उन्हें सूर, तुलसी के रूप में कृष्ण और राम का अवतार दिया. गीतों और कविताओं की एक लम्बी श्रंखला जो हिंदी के साहित्य को समृद्ध कर रही है, उनकी धरोहर है. इसे सम्भालना है, इससे पोषित होना है और इसे पल्लवित भी करना है !

शाम के सात बजे हैं, कुछ देर पूर्व ही वे डिब्रूगढ़ से आये हैं. उसने कुछ वस्त्र खरीदे और जून ने विवाह के कार्ड्स पर लगाने के लिए स्टिकर्स लिए. नन्हे से बात की, वह परसों मुम्बई जा रहा है. कोकिला बेन और हिंदुजा अस्पताल के मैनेजमेंट से मिलने, वे उसकी कम्पनी के बड़े क्लाइंट हैं. अपनी मेहनत के बल पर कम्पनी आगे बढ़ रही है, पर वह अपनी सेहत का ध्यान ठीक से नहीं रख पाता है. आज जून ने दोपहर का लंच अकेले किया, दोपहर को उसे महिला क्लब द्वारा चलाये जाने वाले छोटे बच्चों के स्कूल जाना पड़ा. डेढ़ घंटे से भी कुछ ज्यादा समय सभी अध्यापिकाओं के साथ अध्यक्षा का भाषण सुनते हुए बिताया. उसे आश्चर्य होता है, वह इतना समय तक बिना थके कैसे बोल लेती हैं. आज श्वास लेते हुए कई बार पूल की चौड़ाई पार की. प्राणायाम करते समय भी श्वास को पूरी तरह अनुभव किया, इतने वर्षों से श्वास को देखने का ध्यान किया है पर श्वास को आरम्भ से अंत तक इस तरह महसूस पहले नहीं किया था. सुबह टहलने गयी तो चलने में जरा भी प्रयास नहीं करना पड़ रहा था. उठने से पूर्व एक स्वप्न में अपने किसी पूर्व जन्म का दृश्य देखा, एक कहानी जैसा. जिसमें एक लड़की दरजिन के पास कपड़े सिलवाने जाती है, जिसे किसी शाह ने उसके लिए खरीदे हैं. इस जन्म के कई सवालों के जवाब इस स्वप्न में मिल गये.  

Tuesday, February 3, 2015

कृष्ण की लीलाएँ


आज नन्हे की हिंदी की परीक्षा है, नहाने गया है हर रोज की तरह बार-बार कहने पर, इन्सान अपनी प्रकृति का दास होता है. कृष्ण ने सच ही कहा है कि गुणों को गुण वर्तते हैं. लोग अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करते हैं और कर्म बंधन में पड़ जाते हैं क्योंकि यही कर्म उनके अगले जन्म के कारण बनते हैं फिर यह क्रम चलता ही रहता है, पर कभी तो इस पर रोक लगानी होगी. तीनों गुणों के पार पहुंचना होगा. कृष्ण की कृपा जिसपर हो वह गुणातीत हो जाता है. ईश्वर के शरणागति होने पर वह अभय प्रदान करते हैं. भागवद में कृष्ण की कथा पढ़कर मन प्रफ्फुलित हो उठता है. पूतना, अघासुर, बकासुर, तृणासुर, शकटासुर और नरकासुर कितने असुरों को वह खेल-खेल में ही परास्त करते हैं. भीतर के छह असुर काम, क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर का भी नाश करते हैं और उच्च पदों पर ले जाते हैं, अद्भुत हैं कृष्ण और उनकी लीलाएं ! आज गुरुमाँ ने ध्यान की महत्ता पर बल दिया, लेकिन ध्यान का फल तो भक्ति ही है न, जब उसका मन कृष्ण का चिन्तन बिना ध्यान के भी करता रहता है तो क्या ध्यान की फिर भी आवश्यकता है. सम्भवतः है क्योंकि अभी भक्ति का पौधा कोमल है, उसे सहारा चाहिए, जैसाकि भागवद में कई जगह पढ़ा कि हृदय में भक्ति उदय होने पर भौतिक कार्यों से मन धीरे-धीरे अपने आप विरक्त होने लगता है, कुछ छोड़ना नहीं है बल्कि अपने आप छूटता जाता है !

कृष्ण उनके अन्तरंग हैं, वह उनके मन के उस कोने तक भी पहुँचे हुए हैं, जहाँ वे स्वयं भी नहीं गये हैं. उनसे संबंध आदिकाल से है, सदा से है, नित्य है और जो भी सुख-दुःख इस जग में होने वाले संबंधों से पाते हैं वे मात्र उसका प्रतिबिम्ब हैं. प्रतिबिम्बों से कोई कब तक मन बहला सकता है. सारे जप-तप नियम का उद्देश्य है मन की शुद्धि ताकि मन उस प्रियतम का दर्शन कर सके. मन समाहित हो सके, उस एक की शरण में जा सके जहाँ से वह आया है. मन चेतन है, सत् है, आनंद स्वरूप है, पर वे तो मन के इस रूप को नहीं पहचानते, जैसे कोई किसी महापुरुष के संपर्क में तो हो पर उसके गुणों से अनभिज्ञ हो तो उसे कोई अनुभूति नहीं होगी. परम सत्य को न जानने के कारण ही वे उससे दूर रहते हैं, अनजान रहते हैं जबकि वह अंशी इसकी जानकारी देना चाहता है. भागवद की कथा जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है उसका कृष्ण के प्रति प्रेम भी बढ़ रहा है, वह उसे अपने और निकट लगने लगा है. उसके प्रति सखाभाव दृढ़ होता जा रहा है. वह प्रेम स्वरूप है, वह माधुर्य की मंजुल मूर्ति है, वह अनोखा है, उससे प्रेम किये बिना कोई रह नहीं सकता. ब्रज की गोपियों के पास उसकी बांसुरी सुनके घर पर रुके रहने का कोई कारण नहीं था. कृष्ण केवल प्रेम और माधुर्य ही नहीं ज्ञान का अवतार भी हैं, वह योगेश्वर हैं, वह भक्ति मार्ग के साथ-साथ ज्ञान और कर्म योग की शिक्षा देते हैं. वह ज्ञान के अथाह स्रोत हैं. जब यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड उन्हीं की कृति है तो उनसे अलग कुछ हो भी कैसे सकता है और ऐसे कृष्ण उनके मनों में रहते हैं !

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिख सकी, किसी दिन जब मन उर्वर होगा तो डायरी के ये खाली पेज भी पहले की भांति भर जायेंगे. आज ध्यान गहन नहीं हुआ, पता नहीं मन के किस कोने से एक संशय ने फन उठाया है, जिसे अभी कुचल देना चाहिए और इस मिथ्या भावना को पनपने का मौका नहीं देना चाहिए. आत्मभाव में स्थित रहकर ही वे अपनी बुद्धि पर लगे जंग को हटा सकते हैं.


   

Friday, October 31, 2014

प्रेमचन्द की कहानियाँ


आज उसका जन्मदिन है, सुबह से कई फोन आ चुके हैं. सखियों के, भाई बहनों के, पिता का फोन और मामीजी का जवाब भी आ गया है. सुबह से कई बार माँ को याद कर चुकी है, उनका फोटो देखती है तो हाथ अपने आप ही जुड़ जाते हैं. शाम को छोटी सी पार्टी है. आज सुबह एक कहानी टाइप की, नन्हे को हिंदी में भावार्थ लिखाया, अब वह सो रहा है वरना यह समय भी उसी के साथ बीतता. कुछ देर पहले सोचा क्यों न समय का सदुपयोग करते हुए बैठक की थोड़ी सफाई ही कर दी जाये पर हाथ के झाड़न से वह थर्मस कप टूट गया जो मंझले भाई ने विवा हके अवसर पर उसे तोहफे में दिया था. खैर..पर उसका कुछ असर और कुछ इसका कि बगीचे में पत्ते बिखरे हैं, नैनी ने अभी तक सफाई नहीं की है, मन उत्साहित नहीं है. जन्मदिन पर क्या उदास होने का भी हक नहीं है ! यूँही मन भी बदलते मौसमों की तरह होता है जैसे कोई बाहर के मौसम का साक्षी रहता है उसमें अपनी इच्छा से फेर बदल नहीं कर सकते वैसे ही भीतर के मौसमों को साक्षी भाव से देखते रहना होगा. शाम को कोई दूसरा मौसम आ जायेगा. जून और नन्हा दोनों ने उसे बहुत सुंदर कार्ड्स दिए हैं. उसने सोचा एक कविता यदि लिखे तो मन फिर अपने आप में लौट आए !

न ही परसों और न ही कल वह ‘जागरण’ सुन सकी, आज सुना है. मौसम की तरह मन शांत है. रात भर होने के बाद इस समय वर्षा रुकी हुई है. मन में ईश्वर के लिए यानि अच्छाई के लिए, सत्य के लिए चाह बनी रहे, स्मृति बनी रहे तो संसार का आश्रय नहीं लेना पड़ेगा. निर्भयता का भाव उदय होगा. ईश्वर कार्य का प्रेरक भी है, निर्वाहक भी है, और फलदाता भी है. उसकी स्मृति बनाये रखें तो जीवन की नाव अबाध गति से चलती रहेगी. मन. बुद्धि और अहंकार के शोर में ईश्वरीय प्रेरणा सुनाई नहीं पडती. वह इतने निकट है कि उससे निकट कोई और नहीं. वह हर क्षण सद्कार्यों के लिए प्रेरित करता है लेकिन मन अनसुनी करता है. और संसार के शोर को सुनने के लिए अपने को व्यस्त रखता है.

आज दीदी का जन्मदिन है, सुबह उन्हें फोन पर शुभकामनायें दीं. पिता से भी बात हुई, मकान का सौदा हो गया है. इसी महीने रजिस्ट्री भी हो जाएगी, सम्भवतः जून को जाना पड़े. इस समय नन्हा और वह दोनों घर पर नहीं हैं. वह अपनी स्वाभाविक प्रसन्नता के मूड में नहीं है. बाबाजी की बात पूर्णरूप से सही है जब कोई ईश्वर का स्मरण करता है तो अंदर का स्रोत अपने आप खुल जाता है. इधर जन्मदिन के बाद से वह सुबह ठीक से ध्यान आदि नहीं कर पा रही है, हो सकता है इसका कोई शारीरिक कारण भी हो, वही हरमोन का चक्कर, खैर इस महीने की साहित्य अमृत भी आ चुकी है, प्रेमचन्द की कहानियों की किताब भी लायी है, सो हिंदी का वातावरण तो है घर में और नन्हे को हिंदी भी पढ़ा रही है पर लिखें के लिए समय व एकांत चाहिए जो फ़िलहाल नहीं मिल पाते, थोड़ी ही देर में वे दोनों आते होंगे. लंच का समय होने वाला है.




Thursday, September 18, 2014

सद्भावना यात्रा


आज की सुबह बहुत व्यस्त रही, सुबह वे रोज की तरह उठे, नन्हा और जून स्कूल और ऑफिस गये, इसी बीच उसने कुछ देर बगीचे में काम किया. सूखे फूलों को काटा फिर बड़े भाई से फोन पर बात की. उन्हें दिल्ली में किसी प्रकाशक का पता मालूम करने को कहा जो हिंदी कविताओं की पुस्तक छापता हो. उसकी पुस्तक आकार लेती प्रतीत हो रही है. जून ने कल रिपोर्ट लिखवाई थी, प्लम्बर आया उसके पहले गैरेज में स्थित जंक्शन बॉक्स देखने व सीमेंट से उसे ठीक करने दो अलग-अलग समूह आये. उनमें से एक व्यक्ति ने आंवले मांगे, उसने अपने लिए भी आंवले तुड़वाये. सुबह दो सखियों से बात की, तीन कवितायें टाइप कीं, यही सब करते कराते जून के आने का वक्त हो रहा है. प्रवचन में मन नहीं लगा न पाठ में, जब आस-पास इतना कुछ चल रहा हो तो मन जिसे एक मौका चाहिए, फुर्र से उड़ जाता है. कल दोपहर को भी भाई का फोन आया था, माँ के जाने के बाद उनमें थोड़ा बदलाव तो आया लगता है, शायद उन सभी पर किसी न किसी रूप में असर डाला है इस होनी ने, वह जो इतने दिनों से पुस्तक छपवाने का स्वप्न भर देखा करती थी, रोज इस पर काम कर रही है. समय बहुत कम है, कौन जाने कोई कब इस जहां से चला जाये वक्त रहते यदि नहीं चेते तो सिवा पछतावे के और कुछ हाथ नहीं आएगा.

आज नन्हे का हिंदी का इम्तहान है, उसने कल शाम को आधे दोहे के अर्थ के अलावा कुछ नहीं पूछा, अब वह आत्मनिर्भर हो गया है. कल जून ने भी पिता से बात की. सभी अपनी तरह से उसे समझाना चाहते हैं. पिता के अनुसार जिस तरह कोई गिरे हुए दूध का अफ़सोस नहीं करता वैसे ही किसी के जाने का भी दुःख नहीं करना चाहिए. भाभी के अनुसार उसे अपना दुःख सभी के साथ बांटना चाहिए. भाई ने कहा, वक्त लगेगा पर धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा. इस क्षण उसके मन में लेशमात्र भी दुःख नहीं है, लेकिन वे कारण धीरे-धीरे स्पष्ट हो रहे हैं जिनके कारण इतने दिनों तक वे परेशान थे. सर्वप्रथम तो अपराध भावना कि तेहरवीं पर वे जा नहीं पाए, दूसरे घरवालों को अपनी बात ठीक से समझा न पाना और तीसरा और सबसे बड़ा कारण तो उस स्रोत का न रहना जिससे वह जुड़ी थी और वे सारे दृश्य तथा वेदना, जो अंदर तक महसूस की.

आज नन्हे का आखिरी इम्तहान है. धूप निकली है, परसों रात की आँधी-वर्षा के बाद मौसम कुछ ठंडा अवश्य हो गया है. कल दोपहर भर वह कवितायें टाइप करती रही अब पूरी सौ हो चुकी हैं. शाम को जून ने कुछेक को प्रिंट भी कर दिया है. इसी हफ्ते उन्हें जाना भी है. उसका मन सभी के प्रति स्नेह से भरा हुआ है, माँ के प्रति जो उसका प्रेम था वह कई धाराओं में बंट गया लगता है. एकाएक ही सभी भाभियाँ बहुत प्रिय लगने लगी हैं और उनके परिवारों के प्रति सदा शुभकामनायें प्रस्फुटित होती रहती हैं, इस बार की अपनी यात्रा को ‘सद्भावना यात्रा’ का नाम देना उचित रहेगा. कल रात भी उसने सपने में सभी को देखा. माँ को भी देखा, पर सुखद अनुभूति थी. वे सभी यहाँ आए हुए हैं और वे उन्हें क्लब ले गये हैं. कल नन्हे का गणित का पेपर बहुत अच्छा नहीं हुआ लेकिन वह जल्दी ही सामान्य हो गया, उसका देर तक परेशान रहना उन्हें भी अच्छा नहीं लगता.  


कल सुबह व्यस्तता के कारण डायरी नहीं खोल पाई, लेकिन पिछले एक महीने की व्यस्तता रंग लायी है और आज सुबह ही उसकी किताब की दो पांडुलिपियाँ पूरी तरह से तैयार हो गयी हैं, और जब इतना कार्य जून और नन्हे की मदद से व ईश्वरीय प्रेरणा से सम्पन्न हो गया है तो भविष्य भी उज्ज्वल होगा. परसों उन्हें जाना है, अभी पैकिंग नहीं हुई है. इस बार का जाना हर बार से थोड़ा अलग है, कल छोटे भाई का भावपूर्ण पत्र आया जिसे पढ़कर आँखें बरस पड़ीं, जून ने उसे संभाला, यह ऐसा दुःख है जिसको दूर होने में शायद सारी उम्र लग जाएगी. उस दिन जब वह माँ कविता पर काम कर रही थी, कैसे गैस पर रखे चावलों को जलने से एक आवाज ने बचा लिया था. उसे यह एक चमत्कार ही लगा था, वह किचन में चावल रखकर भूल गयी थी, अचानक बर्तन गिरने की आवाज हुई, दौड़ कर गयी तो वहाँ कोई नहीं था, खिड़की भी बंद थी, किसी पक्षी या बिल्ली के आने की कोई जगह नहीं थी, यहाँ तक कि कोई बर्तन भी गिरा हुआ नहीं था, फिर वह आवाज...उस क्षण उसने माँ को अपने पास ही महसूस किया था. इसी तरह वे सब किसी न किसी रूप में उनकी स्मृति को उनकी उपस्थिति को हमेशा अपने आस-पास पाते हैं, पाते रहेंगे. पिछली रात तेज गर्जन-तर्जन के साथ वर्षा हुई, इस वक्त थमी है. नन्हा अपने मित्र के यहाँ गया है. आज सुबह ‘जागरण’ में प्रेरणादायक वचन सुने, कुछ देर ध्यान भी किया. संगीत का अभ्यास पिछले कई हफ्तों से छूट गया है. उसने सोचा है, वापस आने पर पुनः शुरू करेगी, 

Monday, June 9, 2014

अमलतास की गंध



There was a doctor, oh no ! there is a doctor, who can see the mind of patients, who believes that bodily ailments are only shadows  of mental condition. If one is sad then red cells in his blood will diminish and then he  will be exerted without sufficient  oxygen and then he will be more sad. Blood pressure will decrease and consequently spirit will be low and so on… yesterday she met a doctor which said similar things, and lo.. all her weakness, fatigue, timidness have vanished like they were not there at all. Thank you doctor.

Today is hottest day of this summer, they went for morning walk at 5-10 am, it was pleasant but not cool even at that hour. She has switched on AC and cool air is calming her down. All went well except when she scolded Nanha for doing work slowly. Now she will do her music practice and Nanha will go to his friend’s place to fetch a CD.

अभी सुबह के साढ़े आठ ही हुए हैं और तापमान ३२ डिग्री हो गया है, सुबह साढ़े चार बजे जब वे घूमने गये, तब भी धूप तेज थी. आज दोपहर को एक सखी महीनों बाद उनके यहाँ आ रही है. वे लंच साथ करेंगे और वह उसे सूट की कटिंग में मदद करेगी, उसने सोचा, इस बात के लिए उसे उसका शुक्रगुजार रहना चाहिए, पर वे कितनी जल्दी सब भुला देते हैं. ईश्वर ने उन्हें इतना कुछ बख्शा है, हर कदम पर उनका साथ देता है पर उसके प्रति भी अभिमानी मन कृतज्ञ होना नहीं चाहता, कुतर्क करता है, जीवन शांत चल रहा है, कल शाम जून ने फिर उससे शिकायत की, मगर शिकायती लहजे में नहीं, वह वैसे भी उसका बहुत ख्याल रखते हैं, कल दोपहर दफ्तर से फोन करके याद दिलाया कि उसे आयरन कैप्सूल ले लेना चाहिए. आज वे नन्हे के स्कूल गये हैं, हेड मिस्ट्रेस से मिलना है, स्कूल को कम्पनी की तरफ से सहायता दी जा सकती है या नहीं इस सिलसिले में बातचीत करनी है, यानि पूरी समाज सेवा. जून को इस तरह के कामों में बहुत आनन्द आता है. उसने पडोस की लड़की को पढ़ाना शुरू किया था, पर अब नन्हे का स्कूल भी बंद है, उसके पास समय की कमी है, सो उसकी समाज सेवा सुविधा जीवी है.

Today, it is cloudy, but not cool, stuffy and closed weather, went for morning walk, air was fresh with fragrance of amaltas and gulmohar. Yesterday  her friend came and they spent good time together. Since last one week one lady katha vachak is reciting ‘Bhagvad puran’ in her sweet voice and delightful manner, she is so energetic and full of zeal. She and one other babaji is her morning companions. They teach her to live at ease with herself, to be good to others at any cost, not give much importance to worldly things. Every thing in this world is perishable, only truth is eternal, and to know this is everyone’s goal. Jun was busy whole day yesterday but he was fresh in the morning reading computer at home. Nanha is watching TV since last one hour, enjoying his holidays.


   

Tuesday, May 27, 2014

होली की गुझिया


Her mind is full of worries of all kind. It is not a good sign. Last night when jun asked about application and bio data for forthcoming interview, she was nervous, why is it so ? she has no confidence. She does not believe in herself,  thinks, she is a loser but then she thought, she could do any thing in the world. यह भीरूता यह कायरता उसमें  से आ गयी है, क्या यह उसके विकारों का प्रभाव है, विकार जो राग-द्वेष से उत्पन्न होते हैं, राग-द्वेष जो अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति  मिलने पर निर्भर करते हैं. मन को शांत रखने का उस पर नजर रखने का कार्य तो वह हर वक्त करने का प्रयास करती है, पर उसके मानसिक उद्वेगों का सबसे ज्यादा प्रभाव उसके बाद जून को पड़ता है, पर उनका  प्रेम इतना विशाल है कि उसकी सारी कमियों को नजर-अंदाज कर देता है. He is so loving and caring by heart. He is a jewel, a best thing ever happened to her. She loves him so much and respects him as much. उसका विशाल हृदय नूना के क्षुद्र हृदय की कमियों को भी ढांप लेता है, वह उसके जैसा बनने का प्रयास करेगी, मनसा, वाचा, कर्मणा तीनों तरह से.

Month of march ! month of colours, holi, joy and flowers, month of mango baur  and coo coo of koel,month of hope and happiness. Last night she heard her Assamese song and poem with some friends and felt a different feeling of achievement and satisfaction. Now she wants to record some other songs also. she is at ease with herself, Today their AC is being serviced so can  not sing.

कल रात पहले तो तेज वर्षा व तूफान की वजह से नींद में खलल पड़ा फिर स्वप्नों के कारण नींद गहरी नहीं आई शायद यही कारण है आँखें भारी हैं. सुबह-सुबह अपने आप मन में होली के लिए पंक्तियाँ उभरने लगीं और देखते ही देखते उन सभी के लिए दो-दो लाइनें तैयार हैं जो होली के विशेष भोज में सम्मिलित होने आयेंगे. कल शाम उन्होंने गुलाब-जामुन बनाये, आज गुझिया बनानी हैं.  सुबह-सुबह ही दीदी का फोन आया, वह सोच ही रही थी कि घंटी बजी, वहाँ सभी लोग आज होली खेल रहे हैं.

कल होली थी, रंगों का यह उत्सव उन्होंने सोल्लास मनाया. कल ही नन्हे का परीक्षा परिणाम भी मिला, उसे बहुत अच्छे अंक मिले हैं. उसके साथ-साथ नूना की भी मेहनत का नतीजा है सो ख़ुशी स्वाभाविक है, पर यह तो शुरुआत है अगले दो-तीन सालों में उसे और मेहनत करनी होगी, उसे भी ज्यादा समय देना होगा. नन्हा इस वक्त दादा-दादी के साथ टीवी देख रहा है, कुछ दिनों की बात है फिर वे और उनकी वही दिनचर्या रह जाएगी. The Gospel of Buddha उसे सही समय पर मिली है, उसका मन जो छोटी-छोटी बातों से परेशान हो जाता है, परिस्थितियां थोड़ी सी भी प्रतिकूल हुईं की संतुलन बिगड़ने लगता है, सहनशक्ति का इस्तेमाल करना तो दूर की बात है सहन करना चाहिए इसी बात को सिरे से गलत मानने लगता है. क्रोध, द्वेष और नफरत के बीच स्वयं को जलाने लगता है, ऐसे में प्यार, आदर्श और सत्य के महत्व को दर्शाता भगवान बुद्ध का उपदेश मन पर मरहम सा लगता है. कितने सादे-सरल शब्दों में जीवन के रहस्यों को सुलझा कर रख दिया है. मन पर हर वक्त नजर रखते हुए जीवन यात्रा में सुख के रास्तों पर चला जा सकता है वरना काँटों की चुभन से बचने का कोई उपाय नहीं. Mind is the source either of bliss or of corruption.




Tuesday, May 20, 2014

माटी की महक से उगती कविता



It is a warm pleasant morning, she has done all morning chores and has half an hour to think and write. Life is going on smoothly, all seems to be well and as per planned. Yesterday in the meeting  went to the mike and sang four lines of one Assamese song which she had learned last year for chorus competition. She was testing herself and one friend said it was not bad, enjoyed the rangoli competition also, which was well arranged.  Today while ironing the idea of publishing her book of of poems came to her mind. She has to select, refine and arrange them which are in different diaries. Books are her real friend and to own self written book would be a great thing.  

जीवन की छोटी-छोटी खुशियों, सफलता और आशाओं के हिंडोले में झूलता मन संतुष्ट प्रतीत होता है. करने को इतना कुछ है, खोजने को, देखने को, ढूँढने को, महसूस करने को और सजाने-संवारने को, पढने-लिखने को, गुनने और गुनगुनाने को कि किसी और बात की ओर ध्यान नहीं जाता, राजनीति, अख़बार की सुर्खियाँ व्यर्थ लगती हैं, धर्म के नाम पर जाति के नाम पर हिंसा के अतिरिक्त ये राजनेता समाज को क्या देते आ रहे हैं ?

उस क्षण से वह बात उसके मन में मंडरा रही है, अपनी उस तथाकथित मूर्खता पर मन कभी चिढ़ता है कभी हँसता भी है, लेकिन एक पल के लिय भी भूलता नहीं, हो सकता है कुछ देर और सताये फिर अपने आप ही किसी कोने में थक कर बैठ जाये आखिर कितनी देर उछले-कूदेगी. रह-रह कर जो कचोटता है वह उसकी चेतना है या उसकी भीरुता, कुछ समझ में नहीं आता, क्यों अपनी ही समझ से परे हो गयी है, उसे वह करना उचित था या नहीं स्वयं ही इसका फैसला करने में असमर्थ है, इसे ही विडम्बना कहते हैं सो उसने तय किया इसका फैसला वक्त पर छोडती है. आज भी कल का सा वक्त है, कल शाम कम्प्यूटर पर एक कविता लिखी और एक(वही जिसको लेकर मन में इतनी उथल-पुथल मची है) रिकार्ड की. आज बहुत दिनों बाद टीवी पर एक साहित्यिक कार्यक्रम देखा. हिंदी के समालोचक डा. नामवर सिंह के साथ एक कविताओं की किताब( कवि कुमार अंजुम या ऐसा ही कुछ नाम था) पर एक चर्चा थी, ‘झूठ का संसार’ और ‘हारमोनियम की दुकान से’ दो कविताएँ सुनीं. कवि का मुख्य स्वर मुक्त होने की आकांक्षा है, सीधे सपाट शब्दों में उसने भी मुक्ति की आशा व्यक्त करती एक कविता लिखी थी जो इस बार की क्लब मैगज़ीन में छपी है.

जनवरी विदा लेने को है, नया साल आया और एक महीना सौगात में दे गया. कल रात वर्षा हुई, सुबह उठे तो मिट्टी की सोंधी महक पूरे वातावरण में व्याप्त थी, एक तरफ सूरज भी चमक रहा था वहीं बादल भी गरज रहे थे, पर अब चारों ओर शांति है. हल्की सी धूप है. The meaning of culture में culture and poetry पढ़ रही थी, जीवन में कविता तत्व का होना भी सुसंकृत होने का प्रमाण है. रोजमर्रा के जीवन में कई ऐसे अनुभव होते हैं, ऐसे दृश्य दीखते हैं जिनमें कविता छुपी होती है, पतझड़ के पीले झरे पात, काले बादलों की ओट से झांकता रक्तिम रवि, घास में खिला एक अकेला पुष्प और इन सबसे प्रभावित होता संवेदनशील मन व नयन. कोई नया विचार, विचार भी विचार को जन्म देता है. कल एक परिचिता घर आयीं जो पिछले एक साल से कह रही थीं, उन्हें कुछ हिंदी गाने और गजलें लिखवानी थीं, कैसेट दे गयी हैं. रोचक काम है !

एक शीतलता से भरा रविवार का दिन.. उसने वही नई ड्रेस पहनी है जो पिछले हफ्ते स्वयं सिली थी. एक नई पुस्तक भी पढ़नी शुरू की है, The diary of a young girl by Anne Frank. बहुत रोचक किताब है. नन्हा अपने इम्तहान की तैयारी में व्यस्त है. जून टीवी पर शबाना आजमी की एक नई फिल्म देख रहे हैं, ‘बड़ा दिन’. बीच-बीच में वह भी देख लेती है.





मैटिल्डा - रोआल्ड डाल का रोचक उपन्यास


जाने कितना बोझ मन पर उठाये वह घूमती रहती है, कभी-कभी बोझ हल्का हो जाता है पर फिर चढ़ जाता है. अपनी असमर्थता का बोझ, आलस्य का, कर्महीनता का, समय के साथ न चल पाने का, अधूरे कामों का और प्रमाद में ड़ूबे रहने का बोझ. हर वक्त कोई सम्भालता रहे, संवारता रहे ऐसा तो सम्भव नहीं, कोई दीये की बाती भर चढ़ा देगा, रास्ता तो खुद ही तय करना होगा कोई नक्शा बना कर दे देगा मंजिल तो खुद ढूँढनी होगी. इस बोझ तले दबे-दबे आत्मविश्वास भी चूर-चूर हो जाता है और जीवन जो कभी अर्थमय हो गया था, अर्थहीन नजर आता है. स्वयं से अपेक्षाएं न रखे ऐसा भी नहीं हो सकता, फिर उन अपेक्षाओं पर खरा न उतरने पर हर वक्त अपनी फटकर सुनना भी अच्छा नहीं लगता तो फिर राह कैसे मिले, अच्छा हो कि हर दिन अपने लिए छोटे-छोटे लक्ष्य तय कर ले जिनको उस दिन पूरा करने का भरसक प्रयत्न करे यदि किसी कारण वश न हो पाए तो अगले दिन के कामों में उनको जोड़ ले.

आज बहुत दिनों बाद लिख रही है. पिछले दिनों व्यस्त थी जून के स्वेटर में, नन्हे को पढ़ाने में, घर के दूसरे कामों में और इसी तरह दिन गुजरते गये. सर्दियों का मौसम जैसे अब जाने को है और वसंत की आमद-आमद है. इस समय टीवी पर हजरत अमीर खुसरो का मेघ मल्हार राग पर आधारित एक सुंदर गीत बज रहा है. आज रात दस बजे अखिल भारतीय कवि सम्मेलन है, असम आने से पूर्व कई वर्षों तक हर साल यह कवि सम्मेलन रेडियो पर सुना करती थी, भारत की सारी भाषाओँ की कविताएँ सुनना बहुत अच्छा लगता था. कल २६ जनवरी है, यहाँ ‘बंद’ होगा पर वे दोपहर को उस भोज में जायेंगे जिसमें सभी मित्र एक-एक डिश बना कर लाते हैं. उन्हें एक जगह रात्रि भोज के लिए भी जाना है. आज कई दिनों बाद पड़ोसिन से भी बात की, साथ वाले घर में है पर फोन का ही सहारा लेना पड़ा, उसका स्वास्थ्य पिछले कुछ दिनों से ठीक नहीं था. उसका बेटा संगीत की प्रथमा परीक्षा देने वाला है. आज नन्हा भी उसी की तरह परीक्षा से भयभीत था, उसकी यह घबराहट स्वाभाविक नहीं है और है भी. परीक्षा को लेकर थोड़ी बहुत चिंता सभी को होती है. कल जून का स्वेटर पूरा हो गया. उसे याद आया, आज छोटी बहन के विवाह की वर्षगाँठ है, डाक्टरी की उसकी ट्रेनिंग का अंतिम चरण है.

मन में बसाया है अपने को वह क्या जाने प्रीत है क्या
एक आवाज सुनी तो जाना गीत है क्या संगीत है क्या ?

परसों रात कविताएँ सुनते-सुनते ही वह सो गयी, कुछ बहुत अच्छी थीं, भाव गहरे थे शब्द भी सुंदर और कुछ साधारण थीं. सुबह जून ने फोन पर बताया ‘ऊर्जा संरक्षण’ पर लिखी उसकी  कविता पर प्रथम पुरस्कार मिला है. योग्यता चाहे वह किसी भी क्षेत्र में क्यों  हो वह कभी व्यर्थ नहीं जाती. एक सखी को फोन किया पर बात नहीं हो सकी सो मन में खलबली सी है. अभी कुछ देर पहले संगीत अध्यापिका ने पुस्तक भिजवाई है जिससे वह प्रश्न पत्र हल कर सके. दोपहर को सिलाई का काम भी शुरू करना है, अभी कपड़ों की अलमारी भी सहेजनी है, फिर कम्प्यूटर पर हिंदी में लिखना भी सीखना है. Matilda ने क्या योजना बनाई है अपनी शिक्षिका को बचाने की यह जानने की उत्सुकता को भी शांत करना है जो किताब खत्म करके ही हो सकती है. शाम को क्लब की मीटिंग भी है. दो चिट्ठियां भी लिखनी हैं, पर सबसे पहले Matilda और शेष सब बाद में. नन्हे को भी यह किताब बहुत अच्छी लग रही है और उसे तो इतनी पसंद आई की कि कल  पार्टी में एक नन्ही बच्ची को देखा तो उसी में ढूंढने लगी, यूँ वह भी काफी समझदार थी.






Wednesday, March 19, 2014

सफलता के सात सुनहरे सूत्र


ठंडी हवा शीतलता दे रही है और हरीतिमा आँखों को सुकून. आज श्री अरविंद पर एक कार्यक्रम देखा, विलक्षण प्रतिभा के धनी श्री अरविंद महान चिंतक थे, भारत के प्रति प्रेम से परिपूर्ण, इस देश की यात्रा को आगे ले जाने वाले एक मनीषी ! कल शाम लाइब्रेरी से दो पुस्तकें लायी, तसलीमा नसरीन की ‘लज्जा’ और दीपक चोपड़ा की ‘Seven golden laws for success’. कल शाम ही पहला अध्याय पढ़ा, ध्यान, मौन और दूसरों का आकलन न करने का प्रण, तीन बातों पर जोर दिया है. घटनाओं, मनुष्यों, परिस्थितियों को आंकते चले जाने की आदत ही दुखी रखती है. कल दोपहर अखबर में ‘हरिवंश राय बच्चन’ का एक इंटरव्यू पढ़ा, काट कर फ़ाइल में रखने योग्य है. कल जून नन्हे के स्कूल गये थे, सभी टीचर्स से मिले, सभी ने उसकी तारीफ की तथा उपयोगी सुझाव दिए. हिंदी लेखन के कोर्स में एक प्रश्न प्रेमचन्द की कहानी ‘कफन’ पर है, जून ने कहा है कि वह हिंदी पुस्तकालय से उनकी पुस्तक ला देंगे. जून हमेशा सहायता करने को तैयार रहते हैं. आज वह उसे ‘सैकिया प्रिंटर्स’ भी ले जायेंगे, लेडीज क्लब के बुलेटिन लाने के लिए. आज महादेवी वर्मा की एक कविता पढ़ी, ‘जो तुम आ जाते एक बार’, अज्ञात प्रेमी के लिए उनकी तड़प स्पष्ट शब्दों में व्यक्त है. वह रहस्यमय व्यक्ति या शक्ति, अथवा ईश्वर कोई भी रहा हो, रचने की प्रेरणा उसी ने दी. किसी की प्रतीक्षा, प्रतीक्षा के लिए..जैसे कला कला के लिए.

शमशेर की कविता ‘उषा’ पढ़ाई, कविता अच्छी है, पर सीधी सपाट नहीं, नील जल में झिलमिल गौर देह... का क्या तात्पर्य है, सूरज या सफेद बादल.. सम्भवतः बादल ही. आज सुबह अलार्म सुनते ही उठ बैठे वे. रात को नूना दीपक चोपड़ा की किताब पढकर सोयी थी, सपनों को व्यवस्थित करती रही, वह कहते हैं, हर दिन मिलने वाले हर व्यक्ति को कुछ न कुछ देना चाहिए, चाहे वह एक फूल हो, एक शुभकामना हो अथवा कम्प्लिमेंट ही क्यों न हो ! कुछ देर पूर्व पड़ोसिन से बात हुई, उसकी तबियत फिर खराब है, अस्वस्थ होने को लोग इतना सामान्य क्यों मानते हैं, स्वस्थ रहना, चुस्त रहना तो हर एक का कर्त्तव्य है और जीवन का सबसे बड़ा सुख भी. इस वक्त, इस क्षण में वह स्वयं को बहुत स्पष्ट देख पा रही है, मानसिक स्तर पर कोई उहापोह नहीं है, जीवन से कोई शिकायत नहीं, कोई उलाहना नहीं देना. जो हो रहा है वही होना चाहिए था, इस सृष्टि में हर घटना के पीछे एक कारण है, भविष्य में जो होगा वह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि वर्तमान में कोई क्या कर रहा है. यदि वर्तमान संतुष्टि प्रदान करता है, उसे अपने लाभ के लिए साधा जा सकता है. अपने लाभ में अपने परिवेश का, अपने परिचितों का, समाज का सबका लाभ है.

जो क्रम उसने सुबह निर्धारित किया था, अभी तक तो उसके अनुसार चल रही है, आधा घंटा ध्यान, आधा घंटा व्यायाम, आधा घंटा लेखन..इसी बीच दो फोन भी कर लिए. एक सखी से बात की तो लगा...नहीं उसे किसी का मुल्यांकन नहीं करना है, वह जैसी है, वैसी है, और जैसा सोचती है उसे वैसा सोचने का हक है. अंततः आज उनका कम्प्यूटर इंस्टाल हो गया, जून और नन्हा दोनों उसमें व्यस्त हैं, उसे भी बुलाया तो हाथ जोड़कर उसने माउस पर हाथ रखा, हल्के से छूने पर भी स्क्रीन पर चित्र बदल जाते हैं, उसमें वे गीत सुन सकते हैं, चित्र बना सकते हैं, लिख सकते हैं, फिल्म देख सकते हैं, जितने CD उनके पास हैं अभी सारे नहीं देखे हैं. एक नई दुनिया के द्वार उनके लिए खुल गये हैं.

जून को कुछ देर पहले फोन किया, लगा, जैसे कोई उनके पास बैठा था, सो, ‘ठीक है’, ‘हाँ’ के अलावा कोई उत्तर नहीं दे रहे थे. आज एक सखी के विवाह की सालगिरह है, उसके लिए एक कविता लिखने का प्रयास किया. कल सुबह नहाते समय उसकी आंख में रीठे-आंवले का पानी चला गया था, अभी तक हल्का दर्द है. अभी ग्यारह भी नहीं बजे हैं पर धूप इतनी तेज है कि लगता है दोपहर बाद का वक्त हो. आज से खिड़कियाँ खोलकर रखने के दिनों की शुरुआत हो गयी है और  हल्के रंगों के ढीले-ढाले सूती वस्त्र पहनने के दिन भी, जो सर्दियों की शुरुआत में सहेज कर रख दिए गये थे. उसे अचानक महसूस हुआ आज कहीं कुछ छूटा हुआ सा लग रहा है, जैसे कोई बहुत जरूरी बात कहीं रह गयी हो. वर्तमान में रहने के सुनहरे नियम के अनुसार उसे फ़िलहाल तो किचन में जाना चाहिए. खिड़की से गन्धराज के फूलों की और कमरे में रखे गुलाब की बासी मीठी महक हवा में भर गयी है.  



नर्मदा की पावनता - RIVER SUTRA


आज सुबह से उसे असमिया सखी का ख्याल आ रहा है, एक बार फिर वे उसके घर गये और लगा कि वह अपने आप में इस कदर व्यस्त थी कि उन्हें महसूस होने लगा, उनका स्वागत मन से नहीं किया जा रहा है. जीवन में ऐसे क्षण तो आते ही रहते हैं. कभी न कभी अमैत्री का दुःख सभी को उठाना पड़ता है जिसने भी मित्रता का सुख लिया है. उसने कुछ देर पूर्व DCH के पेपर पढ़े, सितम्बर से पूर्व उसे प्रश्नपत्र हल करके भेजना है तथा परियोजना कार्य की रिपोर्ट भी भेजनी है. कल शाम को फोन आया कि सुबह कम्प्यूटर लेने बस स्टैंड जाना है पर जब जून और नन्हा तैयार होकर गये तो पता चला ‘डॉलफिन कोरियर सर्विस’ के दफ्तर में सिर्फ दो ही बॉक्स आये थे, तीसरा बॉक्स जिसमें मुख्य हिस्सा था कम्प्यूटर का, वह लोड करना ही भूल गये थे या किसी और कारण से वह नहीं पहुंचा. यानी एक दिन का और इंतजार.

कल शाम when they came back after evening walk. Nanha told about the phone call, jun confirmed the arrival of computer. They went to fetch it and till 9.30 in the evening installation was not completed. Today again enginer will come  and do the remaining job. She told her friends they said that they will come come to see it. It’s 8 am her student came and they read a poem“प्रेम”  written by  माखन लाल चतुर्वेदी. टीवी पर अटल जी का १६ अप्रैल को असम में ‘नर  नारायण सेतु’ के उद्घाटन के समय दिया गया भाषण आ रहा है. प्राकृतिक सौन्दर्य में तो असम अद्वितीय है ही यहाँ के बीहू नृत्य की बात भी निराली है. अल्फ़ा के कारण फैले आतंकवाद का जिक्र भी उन्होंने किया. कल गीता मेहता की पुस्तक  A River Sutra में संगीत के शास्त्रीय रूप का वर्णन पढकर सारेगामापाधानीसा का वास्तविक अर्थ समझ में आया. सा से नी तक की ध्वनियाँ प्राकृतिक स्वरों से ली गयी हैं. हरेक के लिए एक रंग भी निर्धारित किया गया है. संगीत की साधना और रागों को उनके सही रूप में पकड़ना एक तपस्या ही तो है, एक भी राग यदि सही अर्थों में समझ में आ जाये और उसके रूप का भाव हो तभी संगीत का ज्ञान हो सकता है. Peacock sa - black
calf calling its mother re – twang
Bleating of goat ga – gold
Cry of the Heron ma – white
Song of Nightingale pa – yellow
The neighing of a horse dha – indigo
Elephant's trumpet ni – green

कल कम्प्यूटर इंजीनियर उनका कम्प्यूटर अपने घर ले गये, इन्स्टालेशन में कुछ दिक्कतें आ रही थीं, जिन्हें वह दूर नहीं कर पा रहे थे, अब ३-४ दिन और लगेंगे. उसके बाद ही सही मायनों में उसका आना माना जायेगा. कल स्कूल से आकर नन्हे ने सभी पीरियड्स के बारे में बताया तो उसकी बातों से लग रहा था वह वहाँ की पढ़ाई से संतुष्ट है. अध्यापक कोर्स के अलावा बहुत कुछ बताते हैं. कल हेयर कट के बारे में कहा था, पर क्लब में बारबर नहीं था. सुबह माँ-पापा से बात हुई, उन्हें लगा जून दिल्ली से वहाँ भी जायेंगे, मामी जी भी आई हुई थीं. कल उसने  A river sutra पूरी पढ़ ली, अच्छी किताब है. नर्मदा नदी को इतना पवित्र मानते हैं, उसे मालूम ही नहीं था, गंगा-यमुना के अलावा अन्य नदियों के बारे में वे बहुत कम ही जानते हैं. उसने ध्यान दिया कि जब वह कोई पुस्तक पढ़ती है तो उसे सतही तौर पर ही याद रख पाती है, पुस्तक खत्म करने की जल्दी होती है, आगे क्या हुआ उसे जानने की उत्सुकता. इसलिए बहुत गहरे नहीं उतर पाती. पुस्तक की सुन्दरता को, भावों को तो पकड़ पाती है पर शिल्प पर उतना ध्यान नहीं जाता.  

उनकी कल की शाम हर रोज से अलग थी. जून ऑफिस से आए तो नन्हे ने टीचर का आर्डर बताया You need a hair cut उसे भी होमियो पैथिक डाक्टर के यहाँ जाना था, सो सभी निकल पड़े, एक तो डॉ के यहाँ काफी भीड़ थी दूसरे मंगलवार होने के कारण नाई की एक भी दुकान नहीं खुली थी. नन्हा निराश होकर बैठा था जब वे डॉ के यहाँ से आये, पर अब गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हो रही थी. उसका एक फ्यूज उड़ गया था, फोन करके एक मित्र को बुलवाया, वे मकैनिक लेकर आए और गाड़ी ठीक हुई, लौटने में काफी देर हो गयी. आज सुबह ससुराल से फोन आया, पिता अपने किसी परिचित के लिए MBA के बाद होने वाली summer training के बारे में पूछ रहे थे. उनकी आवाज हमेशा उत्साह से भरी रहती है सुनकर अपने में भी ख़ुशी स्वयमेव पैदा हो जाती है. जबकि कभी किसी से बात करने के बाद एक उदासी की लहर छा जाती है.





Monday, March 17, 2014

नीना गुप्ता का धारावाहिक - सांस


आज बीहू है, टीवी पर भारत-आस्ट्रेलिया क्रिकेट पेप्सी कप का फाइनल आ रहा है, भारत के जीतने के आसार कम ही नजर आ रहे हैं. छुट्टी के दिन सारी दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो जाती है, देर से उठे, न व्यायाम हुआ न ध्यान... नाश्ते में खीर खायी, लंच में खिचड़ी. सुबह एक स्वप्न देख रही थी, उसका असर देर तक रहा यहाँ तक कि अब भी है, इन्सान कभी-कभी स्वयं के असली रूप को कितना स्पष्ट देख पाता है और अक्सर यह रूप कई परतों में छिपा रहता है. हो सकता है उसकी यह राय हारमोंस के कारण हो, या फिर यही वास्तविक वह है. कल जून एक कैसेट लाये थे “युग पुरुष” नाना पाटेकर और मनीषा कोइराला थे उसमें. फिल्म अच्छी थी मगर उसे लगा, चलेगी नहीं. कल शाम एक मित्र के यहाँ गये, वहाँ गृह स्वामिनी ने पनीर की पूड़ी खिलाई with grated carrot and coriander, स्वादिष्ट थी. वापस आकर ‘सांस’ देखा, नीना गुप्ता अपने ही क्रोध का शिकार बन गयी है, औरतों के साथ यही तो विडम्बना है, अन्याय का विरोध करे तो भी उसकी हार है और न करे तब तो है ही. कुछ देर पहले एक सखी का फोन आया, पर आजकल उसका मन बातें करने का नहीं होता, सम्भवतः आजकल वह स्नेह शून्य हो गयी है, अब हारमोंस को दोष देने का वक्त फिर आ गया है.

आज भी बीहू का अवकाश है, उसकी छात्रा ने तो बल्कि यह कहा कि आज ही बीहू है. बंगाल में आज से नया साल भी शुरू हो रहा है. आज वे जल्दी उठ गये थे, कल जून तिनसुकिया से कम्प्यूटर टेबल के लिए नया टॉप लाये थे, वह भी लगा दिया है. आज लंच में वे तरबूज खाने वाले हैं, इस मौसम का पहला तरबूज ! नन्हा सुबह से अंग्रेजी पढने में लगा है. अगले महीने से उसके यूनिट टेस्ट हैं. उसे home alone देखनी है पर पहले पढ़ाई, फिर फिल्म.. यह तय किया है, थोड़ा मुँह जरुर बनाया उसने पर बाद में समझ गया. नये स्कूल में किताबें भी ज्यादा हैं और पढ़ाई भी. उसकी कुछ किताबें उसे भी रोचक लगीं. कल उसका मन हिंदी लेखन की किताब पढ़ने में नहीं लग रहा था, बार-बार उन्हीं सिद्धांतों को दोहराने से शायद बोरियत महसूस होने लगी थी. कल शाम फिर वर्षा हुई थी पर आज धूप निकली है, मौसम का असर भी इंसानी फितरत पर पड़ता होगा, पड़ता ही है. आज सामान्य महसूस कर रही है. अभी एक घंटा रियाज करना है, किसी को बिना डिस्टर्ब किये घर में रियाज करना भी अपने आप में एक कला है.

जून को कल रात नींद नहीं आई, शायद उसकी वजह से. वह स्वयं तो उनके स्नेह की अधिकारिणी बने रहना चाहती है, प्रेम में हल्के से भी दुराव की पीड़ा क्या होती है उसे उसका मन पहले महसूस कर चुका है, पर कल वह क्यों नहीं समझ पायी. आज उसे संगीत की कक्षा में सुबह ही जाना है. वर्षों बाद अकेले बैठे गाते-गुनगुनाते समय इन अध्यापिका से सीखा संगीत बहुत याद आएगा. कल दूँ भर की कड़ी धूप के बाद शाम को हुई मूसलाधार वर्षा के कारण हवा में ठंडक है. नन्हा आज सुबह जल्दी से उठ गया, जैसे-जैसे बड़ा हो रहा है, जिम्मेदारी समझ रहा है. कल रात स्वप्न में दोनों ननदों को देखा, छोटी ननद दूसरे बच्चे के आने की तयारी कर रही है. एक स्वप्न में देखा एक लडकी उससे एक गीत सीखना चाहती है. जे कृष्णा मूर्ति की पुस्तक पढ़ ली है, उनके अनुसार सचेतन मन से वर्तमान में जीवन जीना चाहिए संवेदन शील मन हो जो पिटी-पिटाई लकीरों पर न चले बल्कि अपना रास्ता स्वयं खोजे.






Tuesday, January 7, 2014

गुलजार की कविताएँ


आज सुबह से तन थका-थका लग रहा है, साथ ही मन भी, शायद नींद न पूरी होने से ऐसा हुआ है, पिछले तीन दिनों से सुबह साढ़े चार बजे उठ जाती है, नींद उससे थोड़ा पहले ही टूट जाती है. मौसम आज अपेक्षाकृत गर्म है, जबकि सुबह वर्षा हुई थी. कल शाम क्लब में एक सीनियर मेम्बर ने उससे हिंदी में कुछ लिखने व बोलने का काम दिया नृत्य-नाटिका के लिए, पर शायद उन्हें उसका बोलने का तरीका नहीं भाया, खैर...कोरस की तयारी ठीक चल रही है, मीटिंग का दिन आने में चार दिन शेष हैं, फिर वह नन्हे की पढ़ाई पर ध्यान दे पायेगी. कल दोपहर मुखड़े का अभ्यास किया, सोमवार को जाने से पहले अन्तरा करेगी. कल सुबह एक सखी से बात हुई तो उसे सुझाव देने बैठ गयी बागवानी के लिए, जो उसे शायद ही अच्छा लगा हो, भविष्य में ध्यान रखेगी. क्लब से लौटने में कल देर हो गयी थी, आकर नूडल्स बनाये पहली बार डिनर में, नन्हा और जून दोनों को पसंद आये. कल ptv में ‘यह आजाद मुल्क’ एक धारावाहिक का अंश देखा, दिल को झकझोर कर रख देने वाला एक मंजर था उसमें. सारे पात्र गहरे तक उतर जाते हैं उसके...काफी तीखा व्यंग्य भी था.

आज भी क्लब गयी थी, गाने का अभ्यास नहीं हुआ पर नृत्य कलाकारों के लिए चाय का प्रबंध उसे देखना था. कल भी आना है, परसों जन्माष्टमी है, वे लोग मन्दिर जायेंगे और एक मित्र के यहाँ भी, जहां वे घर पर मन्दिर सजाते हैं. उसने फोन करके जून को क्लब आने के लिए कहा, पर निकलने में थोड़ी सी देर हो गयी, सो वह उदास थे और उन्हें देखकर वह भी.

आज ही वह दिन है, जो उनके लिए महत्वपूर्ण है, अर्थात उनकी नई कमेटी के लिए, दस बजे उसे क्लब जाना है, दोपहर को शाम के लिए ढेर सारे सैंडविचेज बनाने हैं और शाम को तो जाना ही है. कल रात देर तक नींद नहीं आई, आज के लिए बातें सोचता रहा मन, सुबह अलार्म न बजने पर भी उसी मन ने उठा दिया. आज ठीक से पढ़ा सकी, विद्या निवास मिश्र का निबन्ध ‘मेरा गाँव मेरा घर’ बहुत अच्छा है. सुबह से ही सेक्रेटरी के तीन-चार फोन आ चुके हैं, वह उससे ज्यादा ही नर्वस हैं, वह इस वक्त अंश मात्र भी नर्वस नहीं है, जे कृष्णामूर्ति की पुस्तक, जो सौभाग्य से दोबारा मिल गयी है, में कई अच्छे सुझाव पढ़े, व्यक्ति को निरिक्षण करने, सुनने और समझने की कला सीखनी चाहिए और मन को हमेशा पूर्वाग्रहों से मुक्त रखना चाहिए.

आज की सुबह सामान्य दिनों की तरह ही गुजर रही है. सुबह उठी तो बादल थे, अँधेरा भी था, सूरज अभी भी बादलों के पीछे आराम कर रहा होगा. गुलजार की कविताएँ पढ़ीं, उनमें एक दर्द है और एक पहचान भी लगती है उनसे, शायद हर कवि मन एक सा धडकता है. अभी कुछ देर पूर्व उसी बातूनी सखी का फोन आया, छोटा बेटा अस्वस्थ है, वह खुद भी ठीक नहीं है, नौकरी करना क्या इतना आसान है, घर-परिवार अपना सुख-आराम सब कुछ भुलाना पड़ता है. नैनी के बेटे ने साइकिल ठीक करने के लिए सहायता मांगी है, कल दोपहर को बैक डोर पड़ोसिन आई थी, उसे यह पता भी करना था कि वह नैनी को कितने पैसे देती है, उसने अहसास दिलाया कि वह ज्यादा दे रही है. ईश्वर ने इतनी सामर्थ्य दी है तभी यह सम्भव है. कल शाम दस दिनों के बाद घर पर रहना भला लग रहा था. जून कल खेलने भी जा पाए.


Friday, September 13, 2013

फोन की घंटी


उस दिन आधा वाक्य बीच में ही छोडकर जो डायरी बंद की तो आज चौथे दिन ही खुल पायी है. नन्हा पिछले दो दिनों से अपने आप उठ जाता है, इस समय कम्प्यूटर क्लास गया है, कल घर की मासिक सफाई की, साफ-सुथरा घर सुंदर लग रहा है. कल शाम वे एक मित्र के यहाँ गये उनका तबादला हो गया है, सारे वक्त श्रीमती कपड़ों, गहनों, सामान की ही बातें करती रहीं, पूरी तरह से भौतिकवादी, इसके उपर वह कुछ सोचना ही नहीं चाहतीं, पर उसे इस बात पर कोई आपत्ति क्यों होनी चाहिए भला ?

टीवी पर एक नया कार्यक्रम देखा, अच्छा लगा, दिमाग को सोचने पर विवश करता है, उसका व्यवहार, उसका चिन्तन कितना सही है, कितना गलत, इसे आईने की तरह दिखाता है. लेकिन इन्सान अपने-आप को जिस ढर्रे में ढाल लेता है उससे बाहर निकलना उसे नहीं आता है. जून ने कहा फोन पर उसका अपनी सखी से बात करने का तरीका rude था और बजाय इसके कि वह अपनी गलती स्वीकारती, उसने सिरे से उसकी बात को ही काट दिया, क्योंकि गलत मान लेने से पीड़ा होती, शायद उसी पीड़ा को गुस्से के रूप में निकाल रही थी, पर हुआ उसका उल्टा ही, क्रोध से और पीड़ा उत्पन्न हुई.

कल रात पता नहीं कब वर्षा शुरू हुई और अभी तक रुक-रुक कर हो रही है. वातावरण ठंडा और नम हो गया है, उसके सिर में हल्का दर्द है जो कुछ तो उसकी उसी परिचित अवस्था के कारण है और कुछ आज सुबह से शुरू हुई व्यस्तता के कारण. लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि इंतजार करने पर देर होती है. वैसे यह बात जीवन के हर क्षेत्र के लिए किसी सीमा तक सत्य है, कोई जिस चीज के पीछे भागता है वह उतनी ही दूर जाती है, और लोग तभी तक किसी वस्तु की चाहना भी करते हैं जब तक वह मिल नहीं जाती. सुबह ढेर सारे कपड़े प्रेस किये, दोपहर को हिंदी कक्षा लेने गयी, शाम की नन्हे को पढ़ाया, अगले हफ्ते से उसके यूनिट टेस्ट शुरू हो रहे हैं, आज से उसके लिए तैयारी आरम्भ कर दी है. सो सुबह से न तो टहलने गयी न व्यायाम किया, कमर का घेरा फिर बढ़ता जा रहा है, पैदल चलना कितना आवश्यक है. कल उसने उस सखी से पूछा क्या उसका फोन पर बात करना उसे खटका था, तो उसने ‘न’ में उत्तर दिया, लेकिन इससे उसे अपने फोन वार्तालाप पर गर्व नहीं होना चाहिए, क्योंकि उसे स्वयं पता है कि फोन पर शीघ्र सामान्य नहीं हो पाती.

परसों रात को उनके बगीचे व गैराज में भागता हुआ एक चोर घुस आया था, नैनी व उसके परिवार ने दूर से देखा बाद में उसे पकड़ लिया गया. रात के साढ़े बारह हुए थे, उसकी नींद एक बार दूर से चोर-चोर की आवाज सुनकर खुल तो गयी थी, शायद जून की भी, पर उठकर बाहर जाने की जरूरत महसूस नहीं की. क्योंकि एक तो शोर स्पष्ट नहीं था, दूसरे नींद में थे, थोड़ा सा डर भी लगा था कुछ क्षण के लिए, पर बाद में निर्भयता का पाठ स्मरण हो आया, आजकल जरूरत होने पर उसे पढ़ी-सुनी वे बातें याद आ जाती हैं जो अँधेरी राह में जलते दीये का काम करती हैं.

आज जून का जन्मदिन है, कल उनके लिए कार्ड बनाया था लगभग इसी वक्त, उसमें रंग भर भर रही थी पर वह जब लंच पर आये तो छोटी सी बात ने बड़ा रूप ले लिया जैसे कि एक चिंगारी पल भर में विशाल आग का रूप ले लेती है और बाद में वे दोनों ही मन ही मन पछताए, शरमाये. पिछले दिनों कई बार उसके मन में यह विचार आता रहा था कि आजकल सही अर्थों में वे साथी का जीवन बिता रहे हैं, एक-दूसरे को समझने लगे हैं, और एक-दूसरे को उसकी सारी खामियों सहित अपना चुके हैं, वे हर वक्त साथ थे ऐसा लग रहा था, तन से ही नहीं मन से भी, पर कल जो भी कुछ हुआ उसने एक बड़ा झटका दिया है और एक सच को सामने लाकर खड़ा कर दिया है कि इस जग में कुछ भी निश्चित नहीं है, कुछ भी शाश्वत नहीं है, कुछ भी ऐसा नहीं है जिस पर पूरी तरह भरोसा कर लिया जाये. पति-पत्नी के रिश्ते में भी एक-दूसरे पर अन्धविश्वास उचित नहीं. लेकिन शाम को और रात्रि सोने से पूर्व वे दोनों एक-दूसरे से बिना कुछ कहे बहुत कुछ कहते जा रहे थे. वे डरे हुए थे कहीं ऐसा दोबारा न हो, कहीं उनके घर की और मनों की शांति फिर से न उजड़ जाये, वे एक-दूसरे को खो देने के भय से भी ग्रसित थे. पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ रहते हुए इतने जुड़ जाते हैं कि उन्हें खुद भी इसका अहसास नहीं होता, उनकी हर बात एक-दूसरे में उलझी हुई होती है, जकड़े हुए, एक-दूसरे में बंधे हुए कि थोड़ी सी दूरी जैसे लहुलुहान कर जाती है, छिल जाता है मन और रूह भी काँप जाती है. जून के बिना उसका जीवन खोखला है, अधूरा, निरर्थक और नितांत अनचाहा !

उनकी सांसें आपस में घुल गयी हैं
सिर्फ तन ही नहीं मन भी हर क्षण जुड़ता है
और अब पकड़ इतनी मजबूत हो गयी है कि
दुनिया की बड़ी से बड़ी तलवार भी इसे काट नहीं सकती
कोई किसी को यूँ ही नहीं सौप देता
अपना आप, अपनी आत्मा
प्यार के अनमोल खजाने को पाकर ही अपना सब कुछ खाली कर दिया है
किसी के नाम लिख दिया है मन को
फिर सपने सा क्यों लगता है कभी–कभी संसार
शायद इसलिए कि.. यहाँ सब कुछ बदलने वाला है...




Friday, August 16, 2013

बुद्ध पूर्णिमा


आज उनके यहाँ फोन लग गया, पीएंडटी फोन. अब जब चाहें जिससे चाहे बातें कर सकते हैं. कल शाम उसकी एक परिचिता ने फोन करके पूछा, क्या वह उनके स्कूल में एक महीने के लिए हिंदी पढ़ाने के लिए तैयार है, वह खुद एक महीने के लिए घर जा रही हैं और कोई टीचर नहीं है उनकी कक्षा लेने के लिए. पर उसे सम्भव नहीं लगता, सुबह सात बजे से दोपहर एक बजे तक उसे घर से बाहर रहना होगा, जून के लिए खाना सुबह से बना कर रख जाना होगा, फिर घर की सफाई और सारे काम... वह कभी राजी नहीं होंगे.

कल दोपहर बाद वह कुछ परेशान थी, उसकी एक सखी ने शाम को आने के लिए कहा था, उसने सारी तैयारी कर ली थी पर अचानक उसका फोन आया वे नहीं आ पायेंगे, तो उसके सब्र का बांध टूट गया और वह जानती है यह सिर्फ उसी घटना के कारण नहीं था बल्कि पिछले दिनों का मन में एकत्र गुबार था. उसे यह अहसास हो रहा था कि वह कुछ भी ऐसा नहीं कर पा रही है जो उसकी दृष्टि में सार्थक हो. एक अजीब से खालीपन का अहसास और एक ऐसी भावना जो तब उत्पन्न होती है जब अपने कुछ भी न होने का अहसास होता है. उस दिन उसकी इतनी इच्छा होते हुए भी जून उसके साथ वोट डालने नहीं गये, उनका नाम थो था ही, पर कहने पर नाराज हो गये. उसे लगता है उनके बीच एक रिश्ता भय का है जो और सारे रिश्तों पर हावी हो जाता है. वह उसे कभी उदास या कमजोर नहीं देख पाते, उनके सामने उसे सदा ही खुश और बहादुर नजर आना है. उन्हें किसी को परेशान देखकर सांत्वना देना या समझाना नहीं आता, बल्कि खुद भी परेशान हो जाते हैं, शायद यही फर्क है स्त्री और पुरुष में, लेकिन वह उसे और नन्हे को बहुत चाहते हैं, जैसे वे दोनों उन्हें.

आज सुबह दादा वासवानी ने बहुत विनम्रता पूर्वक बहुत सुंदर ज्ञान दिया. उनकी मुस्कान अप्रतिम है और शब्द उनके मुख से ऐसे झरते हैं जैसे बहुमूल्य मोती. उन्होंने कहा, अगर कोई स्वस्थ और प्रसन्न रहना चाहता है तो उसे अपना दृष्टिकोण सकारात्मक रखना होगा, नकारात्मक भावनाएं जीवन को अभिशाप बना देती हैं. उस दिन जून ने भले ही उसे नाराज होकर समझाया पर उसे उस भाव दशा से बाहर निकल लाये, उसने मन ही मन उन्हें धन्यवाद दिया. इस बार की यात्रा से वापस आते समय पिता ने उसे कुछ कापियां तथा नोटबुक्स दी थीं, उनमें से एक उसने आज पढ़ी, उसमें विचारों और सुझावों का एक खजाना है. विभिन्न विषयों पर छोटे-छोटे अनुच्छेद लिखे हैं. मनुष्य विचारों का एक पुतला ही तो है, जैसा कोई सोचता है वैसा ही वह हो जाता है. स्वस्थ रहने के लिये स्वस्थ विचार होने चाहिए. यह शत-प्रतिशत सही है क जिस दिन उसके मन में द्वेष के विचार पनपते हैं तो मन उखड़ा-उखड़ा सा रहता है और जब कभी प्रकृति की सुन्दरता को देखकर कोई अच्छा सा विचार, चाहे एक क्षण के लिए ही क्यों न हो, आता है, तो मन कैसे खिल जाता है

आज बुद्ध पूर्णिमा है, नन्हा अभी तक सो रहा है, जून टीवी पर गुड मोर्निंग इंडिया दख रहे हैं, विनोद दुआ ने यह कार्यक्रम शुरू किया है कुछ दिनों से. सुबह जागरण में ‘गिरी महाराज’ से सुना, जीवन में संयम होना चाहिए. पूरे वक्त उसे अपनी वाचालता का स्मरण होता रहा, पता नहीं क्यों उसे लगता है जब वे किसी के यहाँ गये हों या कोई उनके यहाँ आया हो तो चुप बैठना अच्छा नहीं है, और वह माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए अपनी तरफ से किसी विषय या व्यक्ति  पर बातचीत शुरू कर देती है. पर हर बार पछतावा होता है, किसी व्यक्ति के पीछे उसके बारे में बात नहीं करनी चाहिए या फिर अपनी निजी बातें भी हरेक को बताने की क्या आवश्यकता है. सिर्फ बोलने के लिए बोलना तो असंयमित होना ही कहा जायेगा. वह वादे क्योंकि निभाती नहीं इसलिए वादा नहीं करेगी पर यह प्रयास अवश्य करेगी कि भविष्य में सोच-समझ कर ही बोले.