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Friday, May 8, 2026

रंग-बिरंगे फल


 
रंग-बिरंगे फल 




एक दिन और बीत गया। सुबह आकाश में बादलों के पीछे से झांकता चाँद देखा और सूरज का नारंगी प्रकाश भी सलेटी बादलों के पीछे से। 

प्रेम का द्वार 

इस पल से गुजर कर आता है 

आनंद झरता है 

वर्तमान में ही 

खिल रहा है

शांति का फूल 

बस ! इस क्षण सजग होने की ज़रूरत है 

हर मिलन अनोखा है 

हर मुलाक़ात संपूर्ण 

यदि कोई अतीत या भविष्य को न लाए मध्य में 

यह सुबह जो आज आयी है 

वह सृष्टि के आरंभ से आज तक 

कभी नहीं आयी पहले 

हर पल छिपाये है जीवन की चाभी 

अपने भीतर 

जीवन का सार यही है 

आज जो फूल खिलेंगे 

वे कल नज़र नहीं आयेंगे ! 

आज ‘स्ट्रेंजर थिंग्स’ का अगला भाग देखा। यह विज्ञान कथा बहुत रोचक है पर विचित्र और रोमांचक भी, किसी हद तक डरावनी, इलेवन की मासूमियत को देखते ही बरबस चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। पता नहीं कब तक इसमें रुचि बनी रहेगी। जून की पीठ में पिछले कुछ दिनों से हल्का दर्द है। वह नेट पर इसके बारे में जानकारी ले रहे हैं। वे दोनों अभी-अभी रात्रि भ्रमण से आये हैं, हवा ठंडी थी और दो बच्चे सड़क पर टेनिस खेल रहे थे, कौन जाने उनमें से कोई एक दिन टेनिस का बड़ा खिलाड़ी बन जाये। जून आज शाम ढेर सारे फल लाए, पपीता, आम, शरीफा, आलूबुख़ारा, तरबूज़, ख़रबूज़, केला और जामुन! कुल मिलकर आठ तरह के रंग-बिरंगे फल। पापाजी से बात हुई, वह निरंतर अभ्यास की बात कहते हैं। जब तक भीतर उस दिव्य चेतना का साक्षात्कार नहीं हो पाता, चाहे एक पल के लिए ही, तब तक निश्चय नहीं हो पाता है।


‘इचिगो इची’ ‘यह पल न आएगा दोबारा’, इस पल की ख़ूबसूरती को इसी पल में अनुभूत किया जा सकता है। एक ख़ज़ाने की तरह अनमोल है यह पल, इसे महत्व देना सीखना होगा, यही है ‘इचिगो इची’ का अर्थ ! उसके जन्मदिन पर दो किताबें मिली थीं, अभी तक पूरी नहीं पढ़ पायी है।दूसरी किताब इकिगाई का अर्थ भी महत्वपूर्ण है। इकिगाइ का अर्थ है जीवन का लक्ष्य, यदि कोई उसे पाने के लिए श्रम करता है तथा नियमित रूप से उसमें कुछ समय लगता है, तो सफलता अवश्य मिलती है। छोटी बहन को ‘स्पंद कारिका’ की रिकार्डिंग भेजी। वह आजकल चित्रकला सीख रही है। कल उसे हैप्पीनेस कोर्स का फ़ॉलोअप भी लेना है। 


आज का इतवार काफ़ी अलग था। सुबह आठ बजे से पहले ही नन्हा और सोनू आ गये थे,  उनके साथ ‘गो-नेटिव’ गये, जहाँ बड़े भाई व भतीजी भी आये, नाश्ता किया। उसके बाद नन्हा ‘गो कार्टिंग’ के लिए ले गया, पर वहाँ बहुत भीड़ थी। इसके बाद एचएएल, भारत का पहला एयरोस्पेस संग्रहालय देखने गये, बहुत सारे लड़ाकू विमानों के मॉडल्स वहाँ देखे। वहाँ का बगीचा भी बहुत शानदार था। इसके बाद पैलेस लीला में दोपहर का भोजन। होटल भी बहुत विशाल और हरियाली से युक्त है। बाग-बगीचे, झीलें झरने सभी कुछ आकर्षक है। 


गुरुजी कह रहे हैं, यही सृष्टि शिव से उपजी है, उसी में स्थित है और उसी में लीन हो जाती है।जैसे एक बालक के नृत्य का उद्देश्य केवल आनंद है, खेल का उद्देश्य भी आनंद है, जीवन का उद्देश्य भी अपने भीतर आनंद महसूस करना और उसे बहाना है। यहाँ हर घड़ी अपने आप में शुरुआत है और अंत भी ! जीवन का हर क्षण अपने आप में पूर्ण है।जब कोई अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होता है, दुर्बल महसूस करता है। शक्ति का स्रोत भीतर है। वे  जगत में  कई भूमिकाएँ निभाते हैं, पर मात्र वही नहीं हैं। अपने शुद्ध रूप में वे अनंत से जुड़े हैं।भक्त वही है जो अस्तित्त्व से जुड़ा है, उसे न कुछ पाना है, न कहीं जाना है।जब मन तनावग्रस्त होता है, साधक साधना का भी त्याग कर देते हैं। प्रमाद तथा आलस्य भी तभी घेर लेते हैं। यदि कोई नियमित साधना करता है तो दुख उसे छू भी नहीं सकता। कई तरह की समाधि का वर्णन भी गुरुजी ने किया। सात्विक शक्तिपात में साधक धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। ज्ञान का कोई अंत नहीं है, ज्ञान व्यक्ति को विनम्र बनाता है, ज़्यादा जानकर भी वे क्या कर लेंगे।जैसे भौतिक ज्ञान का कोई अंत नहीं वैसे ही आध्यात्मिक ज्ञान का भी कोई अंत नहीं है। 


आज सुबह साढ़े दस बजे वे सब बड़े भांजे के परिवार से मिलने पुन: गो-नेटिव जाने के लिए निकले, जो नार्वे से आया हुआ है। दोनों बालिकाओं और बड़ों से मिलकर अच्छा लगा।भोजन अच्छा था पर कुछ गरिष्ठ भी। वह उन्हें तस्वीरें भेजेगी। वापस आकर वे टहलने गये। एक परिचिता का फ़ोन आया, पंचायत की अध्यक्षा ने गाँव के एक स्कूल में बच्चों के लिए एक झूला लगवाने के लिए कहा था, उसी सिलसिले में।जून को पिछले दिनों जो अनुभव हुआ उसके बाद वह उसे सामाजिक कार्यों से दूर ही रहने के लिए कह रहे हैं। यह स्वाभाविक भी है।कल उन्हें ‘रॉकेट्री’- द नांबी इफ़ेक्ट देखने जाना है, जो इसरो वैज्ञानिक नांबी नारायणन के जीवन पर आधारित है। तब तक अवश्य ही जून का मन ठीक हो जाएगा। पापाजी ने कहा, वह भी अध्यात्म को जीवन में सर्वोपरि मानते हैं, इसलिए उन्हें नूना का सृजन अच्छा लगता है। 


Tuesday, November 24, 2020

पका हुआ कटहल

 

आज इस मौसम की अधिकतम गर्मी है ऐसा लग रहा है. योग कक्ष में दो पंखे चलाए और एसी भी. कल से आधा घन्टा देर से आने को कह दिया है. तीन नई साधिकाओं ने आना आरंभ किया है. सुबह वह मृणाल ज्योति गयी, पहले बच्चों को फिर टीचर्स वर्कशॉप में बड़ों को योग कराया. कल भी जाना है, कल वह उन्हें अस्तित्त्व के सात स्तरों के बारे में बता सकती है. देह, प्राण, मन, बुद्धि, स्मृति, अहंकार और आत्मा ! मानव को स्वयं के आत्मा होने की स्मृति नहीं रहती, कभी देह मानकर सुखी-दुखी होते हैं, कभी प्राण मानकर भूख-प्यास से पीड़ित होते हैं तो कभी मन के साथ एकात्म होकर शोक और मोह का शिकार होते हैं. अपनी मान्यताओं के कारण अन्यों को नीचा देखते हैं. अहंकार का शिकार होकर स्वयं को संसार से पृथक मानते हैं. आत्मा निर्विकार है, वह कभी बदलती नहीं है. यदि कोई व्यक्ति अपनी किसी समस्या से परेशान होता है तो वह उसका हल नहीं ढूंढ पाता, अन्य व्यक्ति झट उसका हल बता देता है, जबकि यदि वही समस्या उसके साथ  घटी हो तो वह परेशान हो जाता है, स्वयं को उसका हल नहीं बता पाता. इसका कारण है स्वयं से चिपकाव, उन्हें अपने तन, मन को एक साधन मानकर उसका उपयोग करना है, तब वे मित्र बनेंगे. वे स्वयं को जानें कि किस तत्व के बने हैं. प्रेम, उत्साह, आनंद, शक्ति व ज्ञान आत्मा का स्वभाव है. ध्यान और योग से वे एक अपने भीतर एक ऐसी स्थिति का अनुभव करते हैं जो सहज है. उसी सहज अवस्था में आकर वे जीवन के सहज आनंद का अनुभव कर सकते हैं और उनके माध्यम से चारों ओर भी आनंद का प्रसार होता है. एक परिचिता का फोन आया, उसकी सासु माँ अस्पताल में हैं, शाम को वे देखने गए, उसने उनके लिए प्रार्थना करने को कहा. कितनी सुंदर थी उसकी सास पर मृत्यु, रोग और जरा ने सब बदल दिया. परिवर्तन इस जगत का नियम है.   


रात्रि के आठ बजे हैं, तेनाली रामा में पिछले कुछ दिनों से रानियाँ केवल महिलाओं की सहायता से  राजकाज चला रही थीं, पर आज रामा अपनी सूझबूझ से पुरुषों को भी दरबार में जगह दिलाता है. सृष्टि का नियम यही है, यहां दो पहियों के बिना गाड़ी आगे नहीं बढ़ती. एक में ही जो दो को देख लेता है वह द्वंद्व से मुक्त हो जाता है, जगत में व्यवहार करते समय ही उसे दो का सहारा लेना पड़ता है. आज दोपहर नैनी से पका कटहल कटवाया, बहुत मीठा है, जून को इसकी गन्ध पसन्द नहीं है. सुबह भ्रमण से वापस आकर इस मौसम में पहली बार हरी घास पर गिरे हुए जामुन उठाये  ताजे और मीठे... नन्हे का फोन आया दोपहर को, उसे जन्मदिन की कविता के बारे में बताया, जो सुबह अनायास ही लिखी गयी. कभी कोई भाव इतना तीव्र होता है कि अपने आप ही शब्दों में पिरो लेता है स्वयं को. श्रद्धा सुमन में बाल्मीकि रामायण का अगला अंश लिखा, गुह भरत से कहते हैं, इस वन को तुम घर के बगीचे जैसा ही समझो, अर्थात कोई संकोच न करो. जबकि कुछ देर पूर्व ही वह उस पर सन्देह भी कर रहा था. मानव मन ऐसा ही है पल में टोला पल में माशा ! आज सुबह वर्षा का एक वीडियो भी बनाया.  


और उस पुरानी डायरी की बात... उस दिन के पन्ने पर लिखी सूक्ति थी, बुढ़ापे की झुर्रियां आत्मा पर न पड़ने दो.  पिताजी ने कहा, बुढ़ापे की झुर्रियां शरीर पर भी मत पड़ने दो !  उन्होंने उस दिन उससे उसके स्वास्थ्य तथा आहार के बारे में बातचीत की. वह कह रहे थे कि वह नौकरी में गुलाम हो गये हैं, वह थक गए हैं, पर पापा, रिटायरमेंट के बाद आप काम की तलाश करेंगे, बिना कुछ किये आप रह ही नहीं सकते, इतवार काटना तो मुश्किल होता है आपके लिए. 

उसे पढ़कर आश्चर्य हुआ, क्या कभी ऐसी बात भी हुई थी !   


Friday, March 22, 2019

उपनिषद का श्रवण




आज से ईशोपनिषद सुनना आरम्भ किया है. उपनिषद उन्हें परमात्मा के निकट ले जाते हैं. भारतीय संस्कृति की आत्मा अध्यात्म ही है. आचार्य सत्यजित सरल ढंग से व्याख्या करते हैं. वह कहते हैं, मुख्य ग्यारह उपनिषदों का अध्ययन वह धीरे-धीरे करायेंगे. ईशोपनिषद सर्वश्रेष्ठ माना जाता है. यह यजुर्वेद के एक भाग से लिया गया है. दस उपनिषद ब्राह्मण ग्रन्थों से लिए गये हैं कुछ आरण्यक ग्रन्थों से भी. विद्या, अविद्या, आनंद और तुरीय में अविद्या को छोड़कर तीन अमृत स्वरूप हैं. आत्मा का स्वरूप आनंद है, उसका गुण ज्ञान अथवा विद्या है, वह अविनाशी है. जो सदा एक रूप में न रहे वह अविद्या है. देह निरंतर बदल रही है. जब कोई पदार्थ किसी विशेष गुण में प्रकट हो जाये तो वह विवर्त कहलाता है. माया, कला अथवा अविद्या परमात्मा का विवर्त है. ब्रह्म का एक चरण विश्व के रूप में प्रकट हुआ है, उसके तीन चरण अमृतमय हैं.  

आज मौसम सुहाना है, वर्षा रात भर होती रही. सुबह वे छाता लेकर टहलने गये. जून को डाक्टर ने एक घंटा टहलने के लिए कहा है, इससे उनका स्वास्थ्य भी सुधर रहा है. उन्होंने विटामिन डी व थायराइड का परीक्षण भी कराया है, रिपोर्ट अगले हफ्ते मिलेगी. सभी प्राणी स्वयं को केवल अन्नमय कोश के रूप में जानते हैं. इस तरह तो वे भोजन पचाने का एक उद्योग मात्र ही तो हैं. वे अन्न पर निर्भर हैं पर केवल अन्नमयकोश ही नहीं हैं, वे देह से परे एक ऊर्जा भी हैं, जो स्वयं में पूर्ण है. कल रात स्वप्न में अपने पीले कुरते में उसने एक सैनिक का अवशेष ले जाते हुए देखा, सूखा हुआ. एक दुर्घटना भी देखी, लोगों को घायल अवस्था में देखकर भी वे निर्लिप्त भाव से आगे बढ़ जाते हैं. पर स्वप्न में भी यह ख्याल आया, देखो, वे उनकी मदद नहीं कर रहे हैं. पिछले दो दिन फिर पूर्ण शुद्धि नहीं हुई. देह भारी हो तो मन भ्रमित हो जाता है.

कल मृणाल ज्योति की मीटिंग थी, दस में से केवल चार ही जन थे. इसका कारण वहाँ के दो नये कर्मचारियों की अपेक्षाएं थीं, उनकी मांग थी. कितना सही है, अपेक्षाएं आनंद को घटा देती हैं. उसे भी कुछ कार्य करने हैं. शिक्षक दिवस पर एक प्रेरणात्मक वर्कशॉप करनी है. स्कूल में हर हफ्ते जाना है. आज ध्यान के बाद हाथों में एक अनोखी ऊर्जा का अहसास हो रहा है. उस एक ने उसके हृदय पर अपना अधिकार कर लिया है. धी, धृति, स्मृति में वही समा गया है. जून ने कहा है वह कंपनी में कार्यरत दिव्यांग जनों की सूची दिला सकते हैं तथा स्कूल के पानी का परीक्षण भी करवा सकते हैं. ये दोनो बातें कल मीटिंग में उठी थीं. जून भी मृणाल ज्योति के आजीवन सदस्य बने हैं. इस माह उसका जन्मदिन है उसने सोचा क्यों न इस बार सर्वेंट लाइन के बच्चों व उनकी माओं को भी पार्टी दे.


Wednesday, September 14, 2016

बच्चों की पार्टी


अभी-अभी दो सखियों और वृद्धा आंटी से बात की. कल रात जो पंक्तियाँ लिखी थीं, उनके आधार पर एक कविता लिखी. ऊर्जा जो बहती रहे वही सफल है. एक पल भी व्यर्थ नहीं जाने देना है. भोजन, जल, सूर्य, नींद तथा श्वास सभी तो ऊर्जा के स्रोत हैं, वे लेते ही लेते हैं, लेकिन जब तक देना शुरू नहीं कर देते तब तक उनके भीतर ऊर्जा दोष पैदा करना शुरू कर देती है. रचनात्मकता तभी तो उन्हें स्वस्थ बनाये रखती है. वे एक माध्यम बन जाएँ जिसमें से प्रकृति प्रवाहित हो और अपना काम करती जाये. वे कोई बाधा खड़ी न करें उसके मार्ग में, सारा खेल ऊर्जा का ही है ! मन भी ऊर्जा है और तन भी ! सब चेतना ही है, एक ही तत्व से यह सारा अस्तित्त्व बना है !

आज पिताजी काफी ठीक हैं, पहला सुख निरोगी काया ! वे स्वस्थ रहें तो दुनिया भी सुंदर लगती है वरना सब व्यर्थ मालूम देता है. आज सुबह से ही मन ध्यानस्थ नहीं है. रात को अद्भुत स्वप्न देखा. बच्चों की एक पार्टी है उसमें बच्चों के चेहरे रंगे हैं. एक बच्ची कुछ मन्त्र पढ़ती हुई एक वस्तु उसकी तरफ लाती है और उसका ध्यान लग जाता है. समाधि की अवस्था का अनुभव किया, फिर जब होश आया तो वह अपने स्थान से दूर थी, उड़कर वह वहाँ पहुंची ? अजीब था यह स्वप्न, उनके भीतर अनेक सम्भावनाएं हैं, जिन्हें वे साकार कर सकते हैं, पर वे छोटी-छोटी बातों में लगे रहते हैं. दोपहर भर कम्प्यूटर पर थी, एक नई कविता लिखी, ‘हवा’. गति ही जीवन है, इसलिए बुढ़ापा कितना दुखमय हो जाता है. कुछ नया करने की चाह ही उन्हें सदा युवा बनाये रखती है. कितना कुछ करना शेष है, लेकिन इस करने में आनंद बिखरे, न कि आनंद की लालसा बनी रहे..आनंद की झलक मिले उनके कृत्यों से तभी तो वे अपने अंशी का प्रतिनिधित्व कर पाएंगे.

कल उसकी ‘हवा’ कविता पर तीन प्रतिक्रियाएं मिलीं. नन्हे को भी अच्छी लगी. आज भी सुबह से मन शांत है. उल्लास से चहक नहीं रहा है. सद्गुरू की कृपा सदा उसके साथ है. यह मन ही तो उपद्रव का कारण है, कौन है ‘वह’ जो अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है, कविता भेज दी अब प्रतिक्रिया पाना चाहता है, पहले तो ऐसा नहीं था, पहले कौन पढ़ता ही था उसकी कविताएँ, अब तो उसे पाठक मिले हैं, कौन है जो चाय या कॉफ़ी पीकर तृप्त होना चाहता है, जबकि पता है दोनों शरीर के लिए जरूरी नहीं हैं. कौन है जो कभी-कभी क्षण भर के लिए परेशान हो जाता है, इसका अर्थ हुआ कि जिसे नियंत्रित मानती थी वह मन उसके नियन्त्रण में नहीं है, अर्थात प्राण ऊर्जा शरीर में घट गयी है, अर्थात भीतर अशुद्धि है. विक्षेप, मल, आवरण है. गुरूजी कहते हैं भीतर शुद्धि नहीं है तो मन बेवजह उदास रहता है. उपाय है भोजन कम खाए, चबाकर खाए, और भूख लगने पर ही खाए !

आज जून पिताजी को लेकर डिब्रूगढ़ गये हैं. स्वयं के भी अस्वस्थ हो जाने की जो बात वह माँ को चिढ़ाने के लिए कहते थे, वह सत्य हो गयी है. उनके चले जाने पर माँ अपनी आदत के अनुसार उससे पूछने आयीं, अब वह तो नहीं चली जाएगी उन्हें अकेला छोड़कर, उन्हें लग रहा था पिताजी उन्हें जानबूझ कर छोड़ कर गये हैं. उनके स्वास्थ्य के प्रति कोई सरोकार नहीं दिखाया. उसने कहा, आप समय पर दवा नहीं खातीं, पिताजी इसलिए बीमार हो गये हैं और जून भी, पर बाद में लगा यह बात ठीक नहीं है, हर कोई अपने दुखों के लिए खुद ही जिम्मेदार है. कोई अन्य इसका जिम्मेदार नहीं हो सकता. माँ यह कहती हुईं लौट गयीं कि उन्हें और परेशान कर दिया उसने. उसे अच्छा नहीं लगा, उन्हें लेटने को कहा पर तब से बैठी ही हैं. वृद्धावस्था में व्यक्ति कितना बेबस हो जाता है, हरेक को इस अवस्था से गुजरना है, बच्चा बनने का शौक है तो बूढ़ा भी बनना ही होगा !


Tuesday, July 26, 2016

नीली गर्दन वाली चिड़िया


जीवन पुनः-पुनः एक पहेली बन कर सामने आता है. कितनी बार ऐसा लगता है मानो सारे राज खुल गये अब जो जानना था जान लिया पर आगे चलते ही एक नया मोड़, एक अनजानी डगर, एक नया रहस्य सम्मुख आ खड़ा होता है, और वे भौंचक तकते रह जाते हैं. उसे अपने कर्त्तव्य का पता था, ऐसा लगता था. परमात्मा की कृपा का अनुभव होता है, अपने भीतर उस विराट के साथ एकता का अनुभव होता है, भीतर शांति व आनंद भी पाया है लेकिन जीवन है तो सहज ही कर्म करने की इच्छा जागृत होती है. प्रकृति के वशीभूत होकर सभी कर्म कर रहे हैं. अच्छे-बुरे, खरे-खोटे जैसे भी कर्म प्रकृति में हो रहे हैं वे न्याय हैं अर्थात वैसे ही होने हैं. मन में संकल्प उठते हैं जो कार्यों में परिणत होते हैं. जो इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं, वे स्वप्न बनकर आती हैं, अथवा तो विचारों के रूप में मन में घूमती रहती हैं. जो क्रियान्वित हो जाती हैं, वे तृप्ति दे जाती हैं. यही कर्म दिन-रात चला करता है. इस विशाल सृष्टि का कोई प्रयोजन है क्या ? शायद नहीं, यह आनंद का विस्तार है, प्रेम का प्रदर्शन है, जो आत्मा के सहज गुण हैं..इनका अनुभव करना और इनका अनुभव औरों को कराना ही आत्मा का लक्ष्य है. इसके सिवा इस जग में क्या करने को है ? क्या पाने को है ? और क्या जानने को है ? तो निर्णय यही हुआ कि निज आनंद में मगन रहना और अन्यों को भी ख़ुशी बांटना, बस यही जीवन का मकसद है. ढेर सारी उपलब्धियाँ हासिल करके अभिमान का पुलिंदा बढ़ाए चले जाने से तो बेहतर है कि निरहंकारी होकर मुस्कान बिखेरना ! उसे अब पढ़ने में रूचि नहीं रह गयी है, लगता है पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ..
उस दिन एक सखी से कहा था कि उसकी अनुपस्थिति में उसके पतिदेव व सासुमाँ दोनों उसे याद कर रहे थे, अच्छा लगा था उन्हें. उन्होंने चिड़िया का एक वीडियो दिखाया, जिसमें नीले गले व हरे पंखों वाली एक छोटी सी चिड़िया पेड़ में अपनी चोंच के हथियार से बिल्कुल गोल आकार में एक घोंसला बनाती है, भीतर घुसकर बुरादा निकलती है और घूमकर मुआइना करके आती है, चिड़िया का साथी भी आता है, वह उड़ जाती है और तब वह काम करता है. फिर दोनों मुग्ध भाव से अपने घर को देखते हैं. हर वर्ष वे नया घर बनाते हैं. कौन जाने वे पंछी भी नये हों, नये पेड़ पर बनाते हों हर साल ! उसने कहा था कि एक कविता लिखेगी इन भावों पर. आज वक्त है. मौसम भी अच्छा है. गगन पर बादल हैं, नीचे हरियाली है. पिताजी घर गये हैं. जून ऑफिस में हैं. माँ अपने रोग के कारण थोड़ी परेशान सी उस कमरे में बैठी हैं. खाली बैठे रहने से मस्तिष्क भी कुंद हो जाता है, वृद्धा  हो या वृद्ध कुछ न कुछ करना सबके लिए बहुत जरूरी है. पिताजी के न रहने से माँ का अकेलापन और बढ़ गया है, अभी कुछ देर पूर्व उसे देखने आई थीं और अब आवाज लगा रही हैं, देखना चाहती हैं कि वह मौजूद है या नहीं ! पड़ोसिन से उसने कहा कि वे अपनी लेन तथा पीछे की लेन की महिलाओं व पुरुषों को बुलाकर सत्संग की शुरुआत क्यों न करें. उसके पतिदेव आर्ट ऑफ़ लिविंग के टीचर हैं. देखें क्या होता है, जून भी अब सत्संग में उत्सुक हैं. उसने लिखा-
मदमाता मार्च ज्यों आया
सृष्टि फिर से नयी हो गयी
मधु के स्रोत फूट पड़ने को
नव पल्लव नव कुसुम पा गयी I

भँवरे, तितली, पंछी, पौधे
हुए बावरे सब अंतर में
कुछ रचने जग को देने कुछ
आतुर सब महकें वसंत में I

याद तुम्हें वह नन्हीं चिड़िया
नीड़ बनाने जो आयी थी
संग सहचर चंचु प्रहार कर
छिद्र तने में कर पाई थी I

वृत्ताकार गढ़ रहे घोंसला
हांफ-हांफ कर श्रम सीकर से
बारी-बारी भरे चोंच में
छीलन बाहर उड़ा रहे थे I

आज पुनः देखा दोनों को
स्मृतियाँ कुछ जागीं अंतर में
कैसे मैंने चित्र उतारे
प्रेरित कैसे किया तुम्हीं ने I

देखा करतीं थी खिड़की से
क्रीडा कौतुक उस पंछी का
 ‘मित्र तुम्हारा’ आया देखो
कहकर देती मुझको उकसा I

कैद कैमरे में वह पंछी
नीली गर्दन हरी पांख थी
तुमने दिल की आँख से देखा
लेंस के पीछे मेरी आँख थी I

Tuesday, July 12, 2016

सिंगापुर द्वीप


आज सद्गुरु ने प्रवृत्ति और निवृत्ति का साधना में उपयोग करने के उपाय पर पर कितना अद्भुत ज्ञान सुनाया ! अभी उसकी यात्रा का आरम्भ ही है ऐसा लगता है, अभी आनंद के इस पथ पर चलते ही चले जाना है. आज सभी संबंधियों से फोन पर बात की. बच्चों को होली के लड्डू खिलाये. सुबह नैनी पर क्रोधित हुई पर वह कितना क्षणिक था, न उसपर कोई असर हुआ न उस पर, वह भी शायद उसके गुस्से के पीछे की शांति को अनुभव कर पायी हो या वह भी क्रोध पर काबू पाना सीख रही है. जून ने आज कलाकंद बनाये गिट्स के पैकेट से.

कल होली थी, सुबह कुछ लोग आये, उन्होंने चाय-मिठाई से स्वागत किया. आज वर्षा की झड़ी लगी है. माँ कुर्सी पर बैठे-बैठे ऊँघ रही हैं, पिताजी अखबार पढ़ रहे हैं, चिड़ियों की आवाज आ रही है जो मौन को भंग कर रही है. मौसम ठीक होने पर वह मृणाल ज्योति जाएगी. कल शाम वे भीग गये उस वक्त जब सांध्य भ्रमण से लौट रहे थे. जून उसके कहने पर टहलने जाने को तैयार हुए. वापसी में उन्होंने बहुत संयम किया अपने क्रोध पर, लेकिन शाम को जब नन्हे ने कहा, वह मोटरबाइक पर बैठकर बैंगलोर से पूना तथा फिर मुंबई जायेगा तथा वापस भी उसी तरह आएगा तो उन्हें  बहुत क्रोध आया. दुःख, क्षोभ सभी कुछ था, चिंता भी थी. उनके मना करने पर फ़िलहाल वह मान तो गया है. कल शाम असमिया सखी आयी, उसे आई पॅाड दिखाया, सिंगापुर के फोटो भी. सिंगापुर की यात्रा पर लिखा उसका लेख भी पूर्ण हो गया है.

'
'कोलकाता में रात्रि के दस बज कर दस मिनट हुए थे, और सिंगापुर एयरलाइन्स के जहाज में सीट के सामने लगा स्क्रीन बता रहा था कि... उस वक्त सिंगापुर में बारह बज कर चालीस मिनट हुए थे और..... कोलकाता से सिंगापुर तक २९०५ किमी की यात्रा तीन घंटे चौंतीस मिनटों में पूरी होगी I यह बोईंग खचाखच भरा था, परंपरागत पोषाक पहने सुन्दर परिचारिकाएँ भोजन सामग्री ला रही थीं I जब उनकी बारी आयी, आधी रात बीत चुकी थी I नींद से आखें बोझिल थीं पर धरती से हजारों मील ऊपर कुछ नया खाने का आकर्षण जगाए हुए था, सो थोड़ा कुछ खाकर वे स्वप्न लोक में खो गए I विवाह की सालगिरह सिंगापुर में मनाने का विचार उन्हें एक रविवार को बातोँ-बातोँ में आया था, उनके कई परिचित वहाँ हो आये थे और ढेरों किस्से सुनाते रहते थे. सेंटोसा आइलैंड... बर्ड पार्क.. डाल्फिन शो... तथा अन्य कई रोचक जानकारियाँ हासिल कर वे किसी जागरूक पर्यटक की भांति सिंगापुर जा रहे थे I

एशिया के दक्षिणपूर्व में स्थित विश्व के सबसे छोटे बीस देशों में से एक सिंगापुर काफी समय से पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र रहा है I नये वर्ष में उन्हें इस सुंदर द्वीप की यात्रा का सुखद अवसर मिला था I दिन अभी उगा भी नहीं था कि सिंगापुर कस्टम की औपचारिकताओं को पूरा कर वे चांगी हवाई अड्डे से बाहर निकले I सफेद टोयोटा में फ्रांसिस लेने आया था I स्वच्छ सड़कों के किनारे क़तार बद्ध पेड़ लगे थे I लाल बत्ती पर कार रुकी तो उन्हें थोड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि इतनी सुबह कोई अन्य वाहन नजर नहीं आ रहा था I फिर याद आया कि सिंगापुर मे कानूनों का सख्ती से पालन होता है, यह एशिया के भ्रष्टाचार मुक्त देशों में प्रथम है तथा विश्व के दस भ्रष्टाचार मुक्त देशों में से एक है I होटल पहुंचे, फेंगशुई का प्रतीक होटल की बाहरी दीवार पर बहता हुआ पानी, खम्भों पर लिपटा लाल साटन, फूलोँ से सजा मुख्य द्वार, छत से लटके लाल गुब्बारे.... सभी उसकी सुंदरता बढ़ा रहे थे I अठाहरवीं मंजिल पर डीलक्स रूम की खिडकी से जगमगाती रंगीन रोशनियों का मोहक नज़ारा नज़र आया और वे सफर की सारी थकान भूल गए I

Wednesday, June 1, 2016

नई नवेली कार


जीवन में हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों या कहें अनंत पल खुशियों के आते हैं, बल्कि कहें कि जीवन सुख व आनन्द की एक अनवरत श्रृंखला है. अनगिनत जन्मों को जोड़कर देखें तो न जाने किस अतीत के काल से वे बने हुए हैं. परमात्मा की भांति वे भी अनादि हैं, उसकी भांति वे भी साक्षी हैं, कुछ न करते हुए भी सबका आनन्द लेने वाले, हर श्वास एक आनन्द की लहर की खबर देती है, जो स्वयं ही आनन्द हो उसे भी अपने आनन्द का स्वाद लेने के लिए देह में आना पड़ता है. परमात्मा को मायाविशिष्ट चेतना में आकर लीला का आनन्द लेना पड़ता है तो जीव को स्वप्नविशिष्ट चेतना में ! वे स्वप्न ही तो देख रहे हैं, एक लम्बा स्वप्न जिसमें उन्होंने एक नया रोल धरा है. शरीर, मन व बुद्धि का एक नया संयोग खड़ा किया है. स्वप्न से जागकर ही पता चलता है क उसमें प्रतीत होने वाले सुख-दुःख मिथ्या थे वैसे ही मृत्यु के क्षण में पता चलता है सब कुछ छूट रहा है, एक स्वप्न का अंत हो रहा है. उनका ध्यान यदि मृत्यु से पूर्व इस ओर चला जाये तो सदा के लिए मृत्यु का भय छूट जाये ! जीवन एक खेल ही लगने लगेगा तब !

आज सद्गुरु ने गणेश जन्म का एक नया अर्थ बताया. पर्व के दोष से उत्पन्न आनंद को ज्ञान के द्वारा पावन किया गया. पर्व पार्वती है, मैल दोष है, जिससे आनंद रूपी गणेश उत्पन्न हुआ है, हाथी का सिर ज्ञान है. गणेश को विघ्न हर्ता भी कहते हैं, हाथी के आगे कोई बाधा नहीं टिकती. गणेश का चूहा तर्क का प्रतीक है और बीज मन्त्र का भी. आज छोटे भाई का जन्मदिन है, वह नई कार ले रहा है, blushing red Iten, इत्तेफाक है कि बड़ी ननद भी काली कार ले रही है. आज भी वर्षा थमी नहीं है, पिछले कई हफ्तों से रोज ही बादल बरसते हैं.

सुंदर वचन सुने आज, ‘सत्य के सूर्य को अस्ताचल ले जाने के लिए संध्या रूपी माया आ जाती है ! कमल को जैसे तुषारापात समाप्त कर देता है वैसे ही सत्य को माया समाप्त कर देती है. ऐसी माया को दूर से ही त्याग देना चाहिए, यही जन्म-मृत्यु का कारण है’. अध्यात्म की साधना का मुख्य उद्देश्य संस्कारों से मुक्ति है. कल रात स्वप्न में एक विकार की ग्रन्थि को पूर्ण रूप से देखा तथा उससे मुक्ति का अनुभव भी किया. पिछले पचीस वर्षों मन न जाने कितनी बार स्वयं व्याकुल हुआ और अन्यों को भी किया. माया के चंगुल में फंसकर कषायों के मल में धंस कर न जाने कितना दुःख वे व्यर्थ ही उठाते रहते हैं. भीतर की ग्रंथियाँ कट रही हैं, मन पावन हो रहा है. परमात्मा को वे अपने भीतर प्रकट  होने से रोकते रहते हैं.अशुद्ध वृत्तियों का पर्दा उन्हें उससे दूर ही रखता है, जबकि वह सहज प्राप्य है.

अज दोपहर से बिजली नहीं है, मौसम अच्छा है सो पंखे के बिना भी ठीक लग रहा है. मृणाल ज्योति के लिए एक कविता लिखी है.शाम को प्रिंट करेगी  कल उन्हें वहाँ जाना है, सम्भव हुआ तो पढ़ भी सकती है. जून अभी तक आये नहीं हैं, उनका गला थोड़ा खराब है. कल वह नाहक ही क्रोधित हो रहे थे. मनुष्य अपने आप को नहीं जानता, इसलिए स्वयं को दुःख दिए जाता है. कृष्ण कहते हैं जो न आकांक्षा करता है न द्वेष करता है, वह मुक्त है.



Friday, May 13, 2016

दिल का रास्ता


तुम जमाने की राह से आए
वरना सीधा था दिल का रास्ता”

नजरें झुकाईं और नमन हो गया, पलक झपकने से भी कम समय में दिल में बैठे परमात्मा से मुलाकात हो सकती है पर उनकी आदत है लम्बे रास्तों से चलकर आने की. वे किताबें पढ़ते हैं, ध्यान की नई-नई विधियाँ सीखते हैं. पूजा-अर्चना करते हैं और न जाने क्या-क्या करते रहते हैं. परमात्मा उस सारे वक्त उन्हें देखता रहता है, वे उसके सामने से गुजर जाते हैं, बार-बार उसे अनदेखा कर उसी को खोजने का दम भरते हैं. वे प्रेम को छोड़कर ईर्ष्या को चुनते हैं ! प्रशंसा को छोड़ निंदा को चुनते हैं. सहानुभूति को छोड़ क्रोध को चुनते हैं, शांति को छोड़ शोर को चुनते हैं, वे एकांत को छोड़ भीड़ को चुनते हैं, सहजता को छोड़ दिखावे को चुनते हैं ! वह सब करते हैं जो परमात्मा से दूर ले जाता है और उम्मीद करते हैं कि उनका पाठ, जप-तप परमात्मा के निकट ले जायेगा, ये तो ऊपरी वस्तुएं हैं. परमात्मा को जिस मन से पाना है जहाँ उसका आगमन होना है, उस मन में सब नकारात्मक है, ‘नहीं’ है, निषेध है, उसमें स्वार्थ है, नकार है तो वहाँ वह कैस आएगा, जो सबसे बड़ी ‘हाँ’ है, जो है, जो वास्तविक है, सत्य है, प्रेम है, शांति है, आनंद है. उनका चुनाव ही भटकाता है. जीवन हर कदम पर उन्हें निमन्त्रण देता है, झूमने का, गाने का और प्रसन्नता बिखराने का, सहज होकर रहने का, पर वे उसे गंवाने की कसम खा कर बैठे हैं !

पिछले दिनों मन बिखरा-बिखरा सा रहा, अभी नया-नया केन्द्रित हुआ है, थोड़ी सी प्रवृत्ति उसे हिला देती है. मन को पहचानना उसकी आदतों को जानना कितना कठिन है, कभी-कभी लगता है सब कुछ हाथ पर रखे आंवले की भांति  स्पष्ट है पर जब आशा के विपरीत कुछ घट जाता है तो भीतर कैसा द्वंद्व मच जाता है. जब उसके मन की यह हालत है तो जून के मन की क्या होती होगी, वह कल्पना ही कर सकती है. मृणाल ज्योति गयी थी, उन्होंने बच्चों के कुछ फोटो खींचने को कहा, जो उससे नहीं हो सका, सो दुबारा आने की बात कह कर लौट आई, पर दुबारा इतनी जल्दी जाना सम्भव नहीं था. सो मन पर जैसे कोई बोझ था. सेवा का कार्य भी पीड़ा का कारण बन सकता है, आश्चर्य हुआ. जागृति भी हुई कि सेवा का कार्य जब तक आनंद का सुख का कारण बना रहेगा तब तक दुःख की गुंजाइश बनी ही रहेगी. सेवा भी अनासक्त होकर करनी है ऐसे कि उसमें कर्ताभाव ही न रहे. सेवा से अहंकार की पुष्टि होती हो तो न करना ही ठीक होगा. अहंकार न जाने कितने रूपों में भीतर छिपा रहता है. स्वयं को शुद्ध चैतन्य जानना ही शांति का एकमात्र उपाय है. मन तब केन्द्रित रहता है, उसकी धारा एक ओर बहती है, मन अनुशासित रहता है. तमोगुण से मुक्त हुआ मन रजोगुण से भी मुक्त हो रहा है पर सतोगुण की अदृश्य जंजीरें उसे बांधे हुए हैं ! अभी उन्हें भी तोड़ना है कुछ न होना ही साधक का लक्ष्य है, दुःख से पूर्ण मुक्ति तभी सम्भव है. परमात्मा के प्रति प्रेम तो गौण हो जाता है सभी दुखों से मुक्त होना चाहते हैं.


Wednesday, April 8, 2015

कच्चे धागे पक्के रंग


आज सुबह ‘क्रिया’ के बाद ध्यान अपने आप लग गया, फिर भ्रामरी करते समय अद्भुत  दृश्य दिखे, कितनी सुन्दरता भीतर छिपी है. ईश्वर जहाँ है वहाँ तो सौन्दर्य बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की उसकी आकांक्षा को इन चिह्नों से बल मिलता है. सुबह सुना था, साधना को कभी त्यागना नहीं है, बाहरी परिस्थितियाँ कैसी भी हों, भीतर की यात्रा पर जाने से वे रोके नहीं. एक वर्ष होने को आया है उसे प्रथम अनुभव हुए. अगले वर्ष में और प्रगति होगी और उसे पूर्ण विश्वास है कि इसी जन्म में उसे आत्म साक्षात्कार होगा. उसे संगदोष का विशेष ध्यान रखना होगा, जल में कमल के समान रहने की कला सीखनी होगी ताकि संसार प्रभाव न डाल सके. वाणी का संयम सबसे अधिक आवश्यक है. मन को भीतर की ओर मोड़ना है. मधुमय, रसमय और आनंद मय उस प्रभु को पाना किना सरल है. अंतर्मुख होना है. चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्पष्ट करना है, वह अटल तो शाश्वत है ही.

अभी-अभी उसका ध्यान इस बात की ओर गया कि शीघ्रता पूर्वक लिखने से उसका लेख बिगड़ गया है. ईश्वर को चाहने वाले का तो सभी कार्य सुंदर होना चाहिए, क्योंकि वह इतना सुंदर है ! कृष्ण के बारे में कल विवेकानन्द के विचार पढ़े, वह उन्हें महापुरुष मानते थे, बहुत सम्मान करते थे और मन ही मन उन्हें प्यार भी करते रहे होंगे, ईश्वर भी मानते रहे होंगे. कृष्ण ऐसे मनमोहक हैं कि उनके बारे में पढ़कर, जानकर उन्हें कोई भी चाहे बिना नहीं रह सकता है. आज धूप सुबह से ही नजर आ रही है. सुबह वे आधा  घंटा देर से उठे, नन्हे को स्कूल नहीं जाना था, पर साढ़े छह तक सभी कार्य कर योगासन के लिए तैयार थी . सुबह संत मुख से तुकाराम के जीवन पर आधारित घटनाएँ सुनी. सभी संतों ने काफी कष्ट झेले हैं, उसके बाद ही उन्हें मान्यता मिली है. आग में तपकर ही सोना निखरता है. गुरुमाँ ने अंगुलिमाल की कथा सुनाई. अतीत कैसा भी यदि कोई सच्चे हृदय से पश्चाताप करे और भविष्य में ज्ञान का मार्ग पकड़े तो ईश्वर उसे तत्क्षण स्वीकारते हैं. अतः अतीत में न रहकर वर्तमान में रहने का उपदेश संत देते हैं. कर्म के सिद्धांत के अनुसार यदि वे इसी क्षण से सुकृत करें तो भविष्य सुधार सकते हैं. पिछले कर्मों का फल उठाने का सामर्थ्य ईश्वर देते हैं फिर कष्ट कष्ट कहाँ रह जाता है. उसने अपना मार्ग तय कर लिया है, मन में जो भी थोड़ी बहुत आशंका थी उसे गुरू की कृपा ने मिटा दिया है और अब ईश्वर ही एकमात्र उसके जीवन का केंद्र है, जिसका हाथ पकड़ा है और ईश्वर ने उसका !


आज छोटे भाई का जन्मदिन है, उससे फोन पर बात की पर बधाई देना भूल गयी, राखी की शुभकामनायें जरुर दे दिन. पिताजी आज घर पर अकेले रहेंगे, उनका समय टीवी, अख़बार, किताबें और संगीत में अच्छा गुजरता है. बड़े भैया-भाभी का फोन भी आया, छोटी बहन को उन्होंने किया. छोटी ननद का आया, बड़ी को उन्होंने किया. अब बाबाजी आ गये हैं, कह रहे हैं, रक्षाबन्धन आवेश और आवेग को नियंत्रित रखने का दिन है. सारे भयों से मुक्त होने का दिन है, ईश्वर के निकट जाने का तथा सभी के लिए मंगल कामनाएं करने का दिन है. कच्चे धागों का लेकिन सच्चे प्रेम का दिन है. अपने चित्त को अवसाद से बचना है, चित्त की सौम्यता की रक्षा हर हाल में करनी है. अभी प्रभात की सुमधुर बेला है, मन स्वतः ही शांत है, दिन भर सप्रयास इसे इसी भाव में रखने का पर्ण है ताकि रात्रि को सोते समय भी ईश का ध्यान शांत भाव में दृढ़ रखे ! अभी पड़ोसिन का फोन आया वह भी उनके साथ ‘मृणाल ज्योति’ जाएगी. आज पूर्णिमा है, उपवास का दिन, होता अक्सर यह है कि इसी दिन उसे व्यस्तता ज्यादा होती है, उपवास के दिन भर मौन रहने का विचार मन में है एक दिन तो ऐसा होगा ही. 

Wednesday, February 4, 2015

वेद की ऋचाएं


आज शिवरात्रि है. सुबह दीदी का फोन आया, परसों शाम वह श्री श्री रविशंकर जी के कार्यक्रम में गयीं और अगले हफ्ते AOL का कोर्स करने जा रही हैं. टीवी पर आत्मा आ रहा है जिसमें भक्तियोग की महत्ता पर बल दिया जा रहा है. अभी-अभी एक सखी से बात की, वह शिवरात्रि का व्रत रख रही है, श्री श्री के बारे में भी चर्चा हुई और भौतिक संसार की भी, जो उनके मनों में गहरा समाया हुआ है. कृष्ण को स्थापित करें तो कैसे करें, मन में इतना बड़ा ब्रह्मांड समाया है. जो इसका स्रोत है, जिस तत्व से सारे तत्व उत्पन्न हुए हैं उसी को स्थान नहीं है, यह एक विडम्बना ही तो है. कृष्ण आदि हैं, समस्त सृष्टि का कारण हैं. ज्ञान, प्रेम और आनंद का सागर हैं और वे भौतिक देह नहीं हैं, बल्कि आध्यात्मिक स्फुलिंग हैं जो परम सत्य का अंश हैं. पूर्ण का अंश होते हुए वे क्यों विखंडित जीवन व्यतीत करें, कृष्ण का आश्रय लेने पर ही वे शांति व संतोष का अनुभव करते हैं. ऐसा सुख जो शाश्वत है, जो बदली हुई परिस्थितियों के कारण प्रभावित नहीं होता. यह जगत स्वप्नवत है, क्षणिक है, देह के संबंध भी शाश्वत नहीं हैं. युगों युगों से तो वे संसार के गुलाम रहते आये हैं, यदि इस जन्म में भक्ति का उदय हुआ है तो उसे प्रश्रय देना होगा, आँधी, धूल से उसे बचाना होगा. कृष्ण से स्नेह करना होगा और वह तो हर पल उनसे स्नेह करता है !

भक्ति मार्ग सरल है, लेकिन भक्ति उसी के हृदय में पल्लवित होगी जो सरल हृदय का होगा. भगवद गीता में कृष्ण का वचन है कि निराकार की अपेक्षा साकार की पूजा करना शीघ्र प्रगति प्रदान करता है. अचिन्त्य, अव्यक्त, निराकार रूप की अपेक्षा मनमोहन का सुंदर, सुहावना रूप हृदय को शीघ्र एकाग्र करता है और व्यवहारिक भी है भक्ति मार्ग, इसमें कुछ छोड़ना नहीं पड़ता बल्कि ईश्वर को स्वयं से जोड़ना होता है और धीरे-धीरे भौतिक विषयों से मन अपने आप विरक्त होता जाता है. आज नन्हे की गणित की परीक्षा है, पिछले चार-पांच दिनों में उसने बहुत परिश्रम किया है. जो अवश्य रंग लायेगा. कल सुबह दीदी से पिताजी के स्वास्थ्य की बात की, उनकी आँखों का इलाज चल रहा है, उसने भी बात करनी चाही पर आज सुबह से ही फोन काम नहीं कर रहा है. कल भागवद में वेद की ॠचाओं द्वारा कृष्ण की स्तुति पढ़ी, जैसे सब कुछ स्पष्ट होने लगा, अब कोई संदेह नहीं रह गया है, सारे संशय मिट गये हैं. अध्यात्म जो कभी रहस्य प्रतीत होता था, अपने सारे सौन्दर्य के साथ उसके सम्मुख प्रकट हो उठा है. यह सभी सद्गुरु की कृपा से सम्भव हुआ है. उस दिन जो अनुभव हुआ था उसके बाद ही ज्ञान क्लिष्ट नहीं लगता है. भगवद गीता भी स्पष्ट हुई है पहले कई श्लोक बिना समझे ही पढ़ जाती थी, गुरू की कृपा महान है.

कल रात टीवी पर सद्गुरु को देखा, उनकी मुस्कुराहट मोहने वाली है और सहजता आकर्षक है. ज्ञान की बात वह सरल शब्दों में कहते हैं. “Intelligence with innocence is enlightenment. ‘I don’t know’ becomes beautiful when one starts knowing that he does not know everything or there is lot more to know.” वे जितना जानते हैं वह बहुत कम है इस बात का ज्ञान हो तो अहंकार नहीं होता, वे सहज होते हैं और मन सरल होने पर ही भक्ति को प्राप्त होता है. गुरूजी कहते हैं you are love and you should smile always what may come. AOL के सूत्र उन्हें सदा याद रखने चाहिए तो ही जीवन सुखमय और सरल रहेगा. नन्हे का गणित का पेपर ठीक हुआ है. अगले हफ्ते अंग्रेजी का अंतिम पेपर है और उसके अगले दिन उन्हें  यात्रा पर निकलना है. पिछले पन्द्रह-बीस मिनट से वह फोन पर बात कर रहा है. कल शाम बल्कि रात को कुछ देर उसने भागवत सुनी. गुरूजी का इंटरव्यू भी देखा. धीरे-धीरे उसे भी अध्यात्म का ज्ञान मिल रहा है. रोज सुबह कानों में ईश्वर की चर्चा पडती है और ईश्वर का नाम इतना प्रभावशाली है कि कोई भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता. उसकी भक्ति भी नैतिकता से शुरू हुई थी !


Friday, January 23, 2015

पीली ऊन का स्वेटर


आज बहुत दिनों के बाद बल्कि हफ्तों के बाद उसने वस्त्रों की आलमारी सहेजी और कुछ और कार्य किये जो कई दिनों से किये जाने थे. वह अपने अंतर्जगत में इतना डूब गयी थी कि बाहरी दुनिया एक स्वप्नवत् प्रतीत होती थी. लेकिन आज उसने अपनी प्रतिबद्धताओं पर पुनः सोचा. हफ्तों के सूखे मौसम के बाद पिछले तीन दिनों से वर्षा हो रही है. एक सखी का फोन आया, उसने एक को फोन किया जो aol का एडवांस कोर्स करने तेजपुर जा रही है. दोनों बुआ के यहाँ से पत्र आये हैं. उन्हें जवाब देने हैं. जून को आज सेंट्रल स्कूल में दसवीं के बाद होने वाली कोचिंग के सिलसिले में होने वाली एक मीटिंग में जाना है. अगले वर्ष से नन्हे को उसमें जाना होगा, स्कूल के बाद कोचिंग से उसकी व्यस्तता काफी बढ़ जाएगी पर यही जीवन है. कल उसका गणित का (प्री बोर्ड) पेपर है. आज सुबह टीवी पर एक कार्यक्रम देखा, “yoga for life”. आज लेडीज क्लब के सेक्रेटरी का फोन आया, पूछ रही थी कि क्लब के वार्षिक कार्यक्रम में सम्मिलित न होने का क्या कारण है. उसने नन्हे की परीक्षाओं की वजह बताई. जून ने ‘महासमर’ वापस कर दी और भागवद् लाये हैं. पढ़ने में उसे अवश्य ही आनंद आयेगा और लक्ष्य की प्राप्ति भी होगी.

कल रात नींद खुली तो आभास हुआ मन में भागवद् चल रहा था. कल शाम को ही पढ़ना शुरू किया है. कृष्ण की कथाएं पढ़ने से अद्भुत शांति मिलती है, अनोखी है उनकी कथाएं ! कल शाम जब जून मीटिंग से आये तो नन्हे को वहाँ की कार्यवाही के बारे में बताया. कालेज में प्रवेश के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी और तब सफलता निश्चित है. टीवी पर ‘जागरण’ आ रहा है, जब कोई उससे जुड़ता है तो जीवन रसपूर्ण हो जाता है, कभी न खत्म होने वाली आनंद की अजस्र धारा बहने लगती है. संसार से जुड़ो तो झटके खाने पड़ते हैं जबकि प्रभु से जुड़ने पर जीवन जैसे एक हिंडोला बन जाता है या नदी की शांत जल धारा..बाबाजी भी आ गये हैं, कल से उन्होंने ‘योग वसिष्ठ’ पर बोलना शुरू किया है. कह रहे हैं-
 अन्न बिगड़े तो मन बिगड़े
पानी बिगड़े तो वाणी बिगड़े
अनवरत होती वर्ष से मौसम ठंडा हो गया है. आज ऐसे भीगे, ठंडे मौसम में जून मोरान  जा रहे हैं. नन्हा भी स्कूल गया है. कल रात भी देर तक मन में भागवद् की कथाएं विचरती रहीं. कल इतवार था, वर्षा कुछ देर को थमी तो वे दूर तक टहलने गये. नन्हे का आज विज्ञान का इम्तहान है. कल जून ने उसके कहने पर ऊन लाकर दी, चमकदार पीले रंग में, जिससे नैनी अपने नाती का स्वेटर बनाएगी. पिछले दिनों उसे ऐसा महसूस हुआ वह हर वक्त खिंची-खिंची सी रहती है, उसके भीतर का रस सूखता जा रहा है, रसहीन व्यक्ति विस्फोटक रूप धारण कर सकता है. तभी तो कहते हैं ईश्वर को याद करो जो रस का स्रोत है, वह प्रेम, ज्ञान और आनंद का भी स्रोत है., वह ऊर्जा का भी स्रोत है बल्कि वह तो सब कुछ का स्रोत है. जितना जितना वे उससे जुड़े रहेंगे सजग रहेंगे, रसपूर्ण रहेंगे. आत्मा में स्थित रहेंगे. वही तो चेतना का आधार है, वह है तो जगत है. स्वयं को नित्य मानकर तीन गुणों के पार होना है, वृत्तियाँ आती-जाती हैं, उनसे सुख मिले ऐसी आकांक्षा व्यर्थ है. जीवन माधुर्य, आनंद और रस के सागर में डूबने के लिए है !
उसे ढेर सारे काम करने हैं, सो लिखना बंद करके उनमें जुट जाना होगा.  
  

Tuesday, January 20, 2015

“निर्भव जपे सकल दुःख मिटे”


जीवन में सरलता, सरसता और मृदुता हो, मन में आनंद और भगवद प्रेम हो ! कृष्ण जीवन का केंद्र हो तो यह सब अपने आप ही होने लगता है. नव वर्ष का शुभारम्भ हो चुका है. कल प्रथम दिन मित्रों के साथ बिताया. परिवारजनों से फोन पर शुभकामनाओं का आदान-प्रदान हुआ. परिवार ने संग-संग खरीदारी की. एक शांत और सुखद दिन के बाद अच्छी गहरी निद्रा और प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर ‘क्रिया’. जीवन में गुरू की उपस्थिति होने से सुख और शांति को कहीं खोजने नहीं जाना पड़ता, वह उसी तरह सहज प्राप्य है जैसे हवा और धूप !  टीवी पर ‘जागरण’ सुना, ज्ञान मन को भावना के स्तर पर ले जाता है और मन अपने आप गुनगुनाने लगता है. अंतर में छिपा वह जादूगर मुखर हो उठता है, जैसे तरंगों का आधार शांत जल है वैसे ही मन में उठने वाले विचारों का आधार वही अचल है. वही जो हमें अभय प्रदान करता है. उसका नाम हर श्वास से जुड़ा है. न मरने का भय हो न जीवन के प्रति आसक्ति हो तो ही कोई सच्चा जीवन जी सकता है. जीने की कला उसी कलाकार से सीखनी है जो चिंतन से परे है लेकिन मन को चिन्तन करना सिखाता है. “निर्भव जपे सकल दुःख मिटे” उस अकाल पुरुष को जपने से जीवन उत्सव बन जाता है, प्रेम रक्त बन कर तन में प्रवाहित होने लगता है. उल्लास के पुष्प हृदय में पल्लवित होते हैं. जीवन में निर्भयता और सत्य हो, अंतर में विश्वास हो तो नित्य नवीन रस का उदय होता है, शुभ व्यक्ति को निर्भीक बनाता है और अशुभ को भयभीत करता है.

आज सुबह ध्यान में कृष्ण ने उसे आश्वासन दिया और वह उसके परम हितैषी हैं. उसके अनंत रूप हैं, अनंत नाम हैं और वह अनंत सुख का स्रोत है. वह कहते हैं धर्म की रक्षा करने वाले की रक्षा धर्म करता है. कामना जब हृदय में उठती है तो रिक्त स्थान बन जाता है मानव उसकी पूर्ति करना चाहता है पर यह आवश्यक तो नहीं कि वह रिक्तता भर ही जाये. बाहर से सुख भरने की लालसा ही बताती है कि भीतर रिक्तता है, यदि भीतर का सुख बाहर देने की कला आ जाये तो...ऐसा अद्भुत ज्ञान देने वाला कान्हा, जिसका जन्म और कर्म दिव्य है उसका प्रिय है. कृष्ण ने स्वयं कहा है कि जो उससे प्रेम करता है वह उसे उतना ही प्रेम करता है. उसका प्रेम वह पल-पल महसूस करती है. सारे सुख-दुःख नष्ट हो गये हैं, उहापोह नष्ट हो गया है. उसका नाम कभी भूलता नहीं, मन उसमें रमने लगा है. ‘महासमर’ में कृष्ण का चरित्र अद्भुत है. भीष्म पितामह, युधिष्ठिर, अर्जुन और कुंती सभीके हृदय प्रेम से भर उठते हैं जब कृष्ण उनसे मिलते हैं, बातें करते हैं या उनका जिक्र होता है. गुरुमाँ उसी जादूगर के गीत गाती हैं, ‘जोगिया’ कहकर उसे ही बुलाती हैं. उसने पिछले दिनों नन्हे और जून में भी उसके दर्शन किये यहाँ तक कि कभी-कभी उसकी आँखों में भी उसी की छवि दिखती है. वह अनुपम हैं, सर्वज्ञ हैं, आदि हैं, स्वामी हैं, सूक्ष्मतर हैं, धारक हैं, अचिन्त्य हैं, प्रकाशमान हैं, ज्ञानी हैं. ऐसे भगवान का उन्हें ध्यान करना है, जिससे क्रमशः वे उनके रूप का दर्शन करने में उनके निकट आने में सक्षम हों सकेंगे, वह उनके अंतर में ही हैं पर वे उन्हें देख नहीं पाते, उनकी निकटता भीतर उन्हीं के गुणों को भरने लगेगी लेकिन उन्हें गुणों का नहीं उनका लोभ है !

नित्य सुख, नित्य ज्ञान, नित्य आनंद उनकी मूलभूत आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति सत्संग से होती है. अन्य आवश्यकताओं की भांति उन्हें सत्संग की ओर भी वही ले जाता है, वह उन्हें उनसे ज्यादा जानता है. उनकी उन्नति की उसे उनसे अधिक परवाह है. वह जिससे प्रसन्न होता है उसे सांसारिक आकर्षणों से वियुक्त करता है और जिससे रुष्ट होता है उनके तमोगुण व रजोगुण की वृद्धि देता है. वह उसकी कृतज्ञ है, आभारी है वैसे शब्दों से इस भाव को व्यक्त नहीं किया जा सकता जो वह उसके लिए अनुभव करती है कि उसने उसे सात्विक भावों का आदर करने की क्षमता दी. उसे सहज ही सत्य और अहिंसा प्रिय है, यह उसी की कृपा है. महाभारत में कृष्ण अर्जुन के कई प्रश्नों का उत्तर देते हैं. धर्म-अधर्म, नया-अन्याय, कर्म-अकर्म आदि पर आधारित उसकी कई उलझनों को सुलझाते हैं. पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है कृष्ण उससे ही बातें कर रहे हैं. वह उसे बेहद अपने लगते हैं ऐसा तो इस भौतिक जगत में कोई भी नहीं लगता. बाल्यावस्था से कई बार उसके मन में यह विचार आया है कि इस दुनिया में वह पूर्णत अकेली है कि वह किसी पर भी निर्भर नहीं हो सकती, सिवाय स्वयं के. उसकी अपनी दुनिया थी जो उसने स्वयं ही बनाई थी पर अब उस उस दुनिया में कृष्ण ने अपना अधिकार कर लिया है और इससे उसके सांसारिक संबंध और भी दृढ़ हुए हैं, उनका महत्व समझ में आने लगा है.




Friday, January 9, 2015

ईश्वर का विधान


विवेक रूपी बाण और वैराग्य रूपी धनुष सदा अपने साथ रखना है, जैसे ही कामना रूपी राक्षसी प्रकट हो तो उसका विनाश किया जा सके. ईश्वर की भक्ति का अर्थ है माया से युद्ध, मन की शक्ति का विकास ईश्वर भक्ति में ही होता है. कल उसने चौथी बार सुदर्शन क्रिया की. हर बार की तरह कल भी अतीन्द्रिय अनुभव हुआ. सुख की अनुभूति तो हुई ही फिर स्लेटी फूलों के मध्य नील रंग का कमल दिखा जो बेहद चमक लिए था, फिर कई रंगों के प्रकाश दीखते रहे. कल की क्रिया के दौरान एक बार भी भय का अनुभव नहीं हुआ और समय भी बहुत कम लगा. कुछ देर और क्रिया चलती तो ठीक था पर बुद्धि में अनाग्रह रहे तो ही उचित है. कल योग शिक्षक से उसने कहा कि उसे लग रहा है आज परमात्मा से उसका appointment है. और वह कल उस क्षण से उसके साथ है, बल्कि उसके पहले से ही, हर पल हर क्षण उसके साथ है, वह ख़ुशी बनकर उसके पोर-पोर में समा गया है. सुदर्शन क्रिया में सचमुच सु-दर्शन होते हैं, अद्भुत अनुभव होते हैं. श्री श्री के प्रति मन कृतज्ञता से भर जाता है और उनके योग शिक्षक के प्रति भी. जीवन में एक उजाला बनकर, आनंद का स्रोत बनकर वह उनके जीवन में आए हैं. जून का कहना है कि वे उन्हें एक बार फिर खाने पर बुलाएँ. इस समय साढ़े दस बजे हैं, सब कुछ कितना शांत लग रहा है. आज एक सखी के जन्मदिन की पार्टी में जाना है.

मन प्रशांत होगा तभी उत्तम सुख की प्राप्ति होगी. संशय, आलस्य, प्रमाद से विमुक्त मन ही शांत होगा. शांत मन ही प्रसन्न रहेगा और यही प्रसन्न मन ही ईश्वर को पा  सकता है. वह देह से स्वयं को पृथक जानता है. स्वयं को आत्मा के स्तर पर ले जाकर परमात्मा के सान्निध्य का सुख प्राप्त करता है. वह पूर्ण अमृत का स्वाद लेता है, उसके आनंद की निरंतर वृद्धि होती है. प्रसन्न रहना ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है. वह ईश्वर जीवन के टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलने की समझ देता है, पग-पग पर उनका हाथ थाम लेता है, वह नितांत अपने से भी अपना ईश्वर ही सच्चा मित्र है. उसका नाम ही अंतर्मन को वर्तमान की शांत जलधारा पर स्थिर रखता है. ऐसे प्रभु का सत्संग गुरू कृपा से आज शाम उन्हें प्राप्त होने वाला है.

अभी कुछ देर पूर्व योग शिक्षक से बात हुई, उनका जन्मदिन पहली जुलाई को है. अभी वह ऋषिकेश जायेंगे फिर डिब्रूगढ़ और फिर तेजपुर ‘साधना’ के लिए, और कुछ करने की आवश्यकता भी नहीं है. मन को पवित्र रखने तो सब कुछ अपने आप होता जाता है. ईश्वर हर जगह है उसको देखने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, सभी में ईश दर्शन करके सभी को अपने समान जानकर कोई ईश्वर की अनुभूति कर सकता है. कल शाम क्लब में योग शिक्षक को सुना, फिर एक सखी के यहाँ उनके भजन सुने. एक व्यक्ति इतना शांत, इतना पवित्र, इतना मधुर, समदर्शी और भक्तिभाव से पूर्ण हो सकता है, गुरू के सभी लक्षण उनमें हैं. मन श्रद्धा से भर जाता है. आज सुबह से ही वर्षा हो रही है, जीवन में भी प्रभु प्रेम की वर्षा हो रही है. लेकिन ईश्वर के प्रति वह तड़प, वह खिंचाव जो प्रथम क्रिया के बाद उसने अनुभव किया था वह शांत हो गया है. अब वह उससे एक पल को भी दूर नहीं है, उसके नाम का मानसिक जप वर्तमान में रहने की प्रेरणा देता है. वर्तमान में जीना व्याधियों से मुक्त रखता है. मन फूल की तरह नित नवीन बनकर खिला रहत है.

कल कोर्स का अंतिम दिन था, ध्यान किया फिर सामूहिक भोज व सत्संग, लौटते-लौटते उन्हें साढ़े दस हो गये. सुबह पांच बजे उठाने का वादा जून ने शिक्षक से किया था. उन्होंने उनकी देखभाल का उत्तरदायित्व पूरी तरह निभाया है. चार बजे ही उसकी नींद भी खुली पर उठने की चेष्टा नहीं की. पांच बजे उसे एक स्वप्न आया, कोई कह रहा है, 'पांच बज गये', 'पांच गये'. वह ईश्वर थे या उसकी चेतना.
उसके अंतर में न जाने कहाँ से एक कसक या कचोट ने प्रवेश पा लिया है. यह महीनों बाद हुआ हुआ है, सो यह अपरिचित, अनजाना मेहमान अप्रिय लग रहा है. कल दोपहर से इसका आरम्भ हुआ होगा, एक क्षण को भी सजग न रहो तो कामनाएं मन पर अधिकार जमा लेती हैं. अपने आत्मभाव से वे च्युत हो जाते हैं. ईश्वर का विधान बहुत कठोर है, जिस क्षण उसका पथ छोड़ा अथवा छोड़ने का भाव भी मन में आया तो उसका फल मिले बिना नहीं रहता. मन यदि सद् मार्ग पर चले तो आत्मसुख में रहता है. पूरा प्रभु आराधिया, पूरा जाका नाम. वह ईश्वर जब तक पूरा नहीं मिलता, ज्ञान पूर्ण नहीं होता तभी तक यह विचलन, विक्षेप मन पर छाने का साहस कर सकते हैं. उसका लक्ष्य तो उस पूरे को पाना ही है. वही इसका रास्ता बता सकते हैं. मन और देह में जब तक आसक्ति रहेगी तब तक वह नहीं मिलेगा. अपने अहं को तुष्टि देने का भाव, सुख-सुविधाओं का आकर्षण जब तक रहेगा वह अनवरत सुख इसी तरह बीच-बीच में लुप्त होगा. यही दुःख लेकिन उसी मार्ग पर स्थित करेगा, जब प्रार्थना और हृदय एक हो जाते हैं तभी उसका अभ्युदय होता है. ध्यान ही उसे पावन करेगा. उसकी कृपा अपार है, वे अकृतज्ञ होकर उससे और-और मांगते हैं. उलटी चल चलते दीवाने, दीदारे यार करते आँख बंद करके !