Showing posts with label कालेज. Show all posts
Showing posts with label कालेज. Show all posts

Wednesday, July 15, 2020

ट्रैफिक कंट्रोल



आज तीसरे दिन भी चार पोस्ट्स प्रकाशित कीं. योग कक्षा में एक साधिका अपनी बिटिया को लायी थी जो गोहाटी यूनिवर्सिटी में इलेक्ट्रॉनिक्स में शोध कर रही है. उसने भी एओल का कोर्स किया हुआ है, सबके साथ सुदर्शन क्रिया की. आज महीनों बाद लौकी के कोफ्ते बनाये, इस मौसम की पहली लौकी जो बगीचे से मिली थी. कल पीएम के जीवन पर चेतन भगत द्वारा निर्मित एक फिल्म देखी, बचपन में चाय बेचते थे और बड़े होने पर भी अपने चचेरे भाई के साथ एक कैंटीन में काम करते थे. संघ के प्रचारक बने. पहले सन्यासी बनना चाहते थे. अद्भुत है उनके जीवन की गाथा ! उनमें दृढ संकल्प शक्ति बचपन से ही थी. 

सुबह उठने से पूर्व एक अद्भुत स्वप्न देखा. परमात्मा की ओर से आया एक और संदेश जो उसे गुलामी से छुड़ाने के लिए है. वह एक परिवार में गयी है, साथ में दो अन्य जन भी हैं. वे पड़ोस के परिवार में चले जाते हैं. वे सब बात कर रहे हैं, फिर नूना किसी पत्थर पर कोई संदेश लिखती है, जब अपना नाम लिखने की बारी आती है तो उस खुरदुरे पत्थर पर कुछ भी लिखा नहीं जाता. नाम का पहला अक्षर नहीं लिखा है, तभी पिताजी कहते हैं, यह कैसा नाम है ? वह पुनः प्रयास करती है पर उस स्थान पर कोई भी रंग या चाक काम नहीं करता. वह उसे छोड़कर एक अन्य काले पत्थर पर लिखकर देखती है. श्वेत अक्षरों में ॐ ॐ लिखती है तो झट से पूरा स्थान भर जाता है, फिर अंत में छोटे अक्षरों में अपना नाम भी लिखती है अंग्रेजी में. तभी भीतर से आवाज आती है, स्वयं के नाम को मिटाना होगा, हाथ से मिटाने का प्रयत्न किया पर मिटा नहीं, यह यशेषणा का प्रतीक है. अगले स्वप्न में एक छोटा सा बच्चा है जो सम्भवतः उसी परिवार का है जिससे मिलने गयी थी, वह रात भर उनके घर पर ही रहा है, सुबह उसे छोड़ने जाना है. दृश्य बदलता है, जून फोन  करके उसके परिवार को कहते हैं कि उसे ले जाएँ. वह चाय बनाती है, पतीले में चाय उबल रही है तभी भीतर से आवाज आती है, इसे गिरा दो, दो सफेद कप भी दिखते हैं, उन्हें भी तोड़ देने का ख्याल आता है. यह आसक्ति है. जब तक भीतर जरा सा भी राग शेष है परमात्मा दूर ही रहता है. वह खाली मन में प्रवेश करता है. मन में कोई भी कामना शेष हो तो मिलन होगा भी कैसे ? 

रात्रि के आठ बजे हैं. वर्षा आरंभ  हो गयी है. कुछ देर पूर्व वे बाहर टहल रहे थे तब बरामदे के बल्ब पर पतंगों की वर्षा हो रही थी, सैकड़ों पतंगों ने गिरकर अपनी जान दे दी. क्या रहस्य है इन पतंगों के जन्म और मृत्यु का, कोई नहीं जानता. कल शाम व आज सुबह शिवानी को सुना, कितने सुंदर व सरल शब्दों में वह जीवन के सूत्र बता देती हैं. कहा, यदि हर घंटे एक मिनट के लिए वे जो भी काम कर रहे हों, उसे रोककर  अपने मन को देखें, ध्यान करें व अपने स्वरूप में स्थित हों तो अगले पूरे घंटे मन नियंत्रण में रहेगा, वह इसे ट्रैफिक कंट्रोल कहती हैं. सुबह बच्चों के स्कूल गयी, भूतपूर्व अध्यक्षा से अंतिम मुलाकात हुई, उन्होंने उस पार्क का उद्घाटन किया जो अभी बनना आरंभ नहीं हुआ है, एक दिन तो बन ही जायेगा. शायद वही ‘नाम’ की अभिलाषा... महीनों बाद आज बंगाली सखी से बात हुई, उसकी इकलौती पुत्री और दामाद कनाडा जा रहे हैं सदा के लिए. 

उसने पढ़ा, कालेज में थी तो स्कूल के दिनों को याद करती थी.... कभी-कभी उसे इंटर के वे दिन याद आते हैं जब राजकीय  इंटर कालेज में छुट्टी होने पर वह गेट पर भीड़ होने के कारण आगे जाने की जल्दी न करते हुए सबसे पीछे खड़े रहकर कबूतरों को देखा करती थी. उस स्कूल में कितने कबूतर थे. उसकी उस मनोस्थिति को या चेहरे के भाव को देखकर कुछेक छात्राएं आश्चर्य में आपस में कुछ कहा करती थीं. वे दिन भी क्या दिन थे, जब कोई चिंता न थी. उस लगा इंसान जहाँ और जब होता है वहाँ सुखी रहना नहीं जानता इसलिए अतीत के गुण गाया करता है. 

अगले दिन वह घर आ गयी थी, अपने कमरे में अपनी मेज पर. चचेरी बहन उसके बारे में कोई बात कह रही होगी, वह कितनी नादान है कितनी भोली मगर आज्ञाकारी बिलकुल नहीं. वह उसके लिये कभी कुछ कर सकी तो कितना अच्छा होगा. कालेज जाना था फ़ीस जमा करने और लाइब्रेरी से किताबें लेने. सबसे मिलने का भी आखिरी दिन था, परीक्षाओं के दौरान किसी को फुर्सत नहीं होती और यह अंतिम वर्ष है कालेज का सो... एक छात्रा ने पढ़ाई के बारे में पूछा तो उससे मिथ्याभाषण किया, वह उसका अहम ही तो था. सच बात कहने की उसमें हिम्मत नहीं. सच बात तो यह थी कि पिछले पांच दिन वह उस तरह बिल्कुल नहीं पढ़ पायी पर कहा, टाइमटेबल के अनुसार पढ़ी थी. इससे धोखा उसे दिया या स्वयं को. एक अन्य सखी मिली कालेज में जो आगे पढ़ना चाहती है पर घर वाले उसका रिश्ता तय कर रहे हैं, वह भी झुक जाएगी अपने मम्मी डैडी और भैया के विचारों से जो शहर के बड़े व्यापारी हैं. एक अन्य सखी मिली जो उसे बहकती हुई सी लगती है, बेवजह के शब्द उगलती. एक ने कहा, ‘आषाढ़ का एक दिन’ बकवास है. एक ने उसकी किताब नहीं लौटाई न ही पैसे दिए हैं जबकि वह उस दिन कह रही थी... और पुस्तकालय से जो पुस्तकें उसने ली हैं उसे देखकर लगता है किसी काम में आने वाली नहीं ...

Tuesday, April 8, 2014

गैराज की सफाई


कल दोपहर पेड़ काटने वाला आदमी काम बीच में ही छोडकर चला गया था, बिना खाए-पिए लगातार छह घंटे वह काम करता रहा. यही तो है भारत का आम आदमी, मजदूर और किसान, इनके विकास के लिए सरकार करोड़ों रूपये खर्च करती है पर इनकी हालत वही रहती है. कल शाम को लाइब्रेरी में ‘२१सवीं सदी में प्रवेश’ पर एक किताब देखी, दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो सारी सुख-सुविधाओं के बीच रहकर भी ग्लोब के दूसरे सिरे पर रहने वाले एक गरीब किसान की पीड़ा का अनुभव कर सकते हैं, यह दुनिया ऐसे ही व्यक्तियों के कारण तो चल रही है और यह ख़ुशी की बात है कि ऐसे लोगों की संख्या ज्यादा होती जा रही है. कल घर से माँ का पत्र आया है, लिखा है छोटी बहन उन्हें बुला रही है पर वह अभी जा नहीं सकतीं. काश ! वह स्वयं कुछ दिनों के लिए उसके पास रह पाती पर यहाँ  नन्हे और जून का काम उसके बिना नहीं चलने वाला है.

नौ बजने को हैं, सुबह सुहानी थी, शीतल हवा और आकाश पर बादलों के बिखरे रंग उसे मोहक बना रहे थे. इस समय वह पहले पहर के मध्य में पहुंच चुकी है. आज गैराज साफ करवाया और ड्राइव वे भी. कल जून ने अपनी कार बेच दी यानि उनकी मारुति ८०० किन्हीं ठेकेदार महोदय को. अब उन्हें नई कार के लिए १५-२० दिन तक इंतजार करना है हो सकता है एक महीना भी. स्कूल से लौटकर जब नन्हे ने यह समाचार सुना तो वह बहुत नाराज हो गया था, उसे लगा आधे घंटे में सामान्य हो गया है. लेकिन बाद में जब उसे गृहकार्य करने को कहा तो उसने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया, शाम को एक मित्र परिवार आया तो जून ने उसे डांट कर पढ़ने बैठने को कहा, उसे लगा न चाहते हुए भी उसे अनुशासन सिखाने के लिए उन्हें ऐसा करना ही पड़ा. Today she read the second lesson of ‘Stop worrying and start living by Dale Carnegie. writer advises to accept the worst and then to think clearly instead of worrying when one faces any problem. कल रात स्वप्न में एक कहानी का प्लाट मिला. नायिका अपने छोटे भाई के साथ उसके कालेज जा रही है. रस्ते में पांच-छह असामाजिक तत्व उनके पीछे हो लेते हैं. एक जगह किसी वजह से उन्हें रुकना पड़ता है. बहुत bold होने का अभिनय करती हुई वह झूठमूठ में नशा करती है और उन्हें अपनी बातों में फंसा लेती है. किसी नशीले द्रव्य के अपने पास होने का भ्रम उन्हें दिलाती है अब सभी उसकी रक्षा का उपाय सोचने लगते हैं साथ चल पड़ते हैं, पर वह अभी भी खतरे से बाहर नहीं है, आगे का स्वप्न कुछ याद नहीं है. कल दोपहर जो कहानी उसने लिखी उसका अंत अभी तक स्पष्ट नहीं हुआ है. नीतेश ने अपने गुम होने की खबर स्वयं ही दी थी जब उसे मामा पर शक हुआ कि उसके पिता को धमकी भरे पत्र वह भेज रहे हैं. मामा सिर्फ अपना मान रखने के लिए रिपोर्ट लिखने व विज्ञापन देने की बात स्वीकारते हैं. लिखना उसे बीच में रोकना पड़ा, दरवाजे की घंटी बजी थी.



Sunday, November 11, 2012

चार्ली चैप्लिन की फिल्म



कल सुरभि का पत्र आया, अच्छा लगा बहुत दिनों बाद कालेज की सखी का पत्र पाकर, शनिवार को उनका पत्र लिखने का दिन होता है, उसने सोचा वह उसी दिन इस पत्र का जवाब देगी. दो माह पूर्व जो परिवार सदा के लिए चला गया था कल उनका पत्र भी आया, वे परसों उनकी कोई खबर न मिलने की बात कर ही रहे थे, सही कहा है किसी ने कि हर रात के बाद जैसे सुबह होती है हर उलझाव के बाद सुलझाव हो जाता है, सोचा उसने, उसकी असमिया सखी से भी शायद एक दिन सुलझाव हो जाय, वक्त का इंतजार करते हैं. हर कार्य अपने समय पर ही होता है. कल तिनसुकिया जाने से पूर्व जून ‘दिल’ फिल्म का कैसेट दे गए थे, पर वह देख नहीं पाई. वे कार्टून फिल्म के भी दो कैसेट लाए हैं नन्हे के लिए. शाम को कोई परिचित परिवार मिलने आया, सात बजे वे स्वयं भी आ गए. आज नन्हा खुशी-खुशी स्कूल गया है. उसने बताया कि कोई बच्चा उसका टिफिन खा जाता है, अभी थोड़ा वक्त लगेगा उसे अपने को स्कूल के माहौल में एडजस्ट करने में. आज भी उसका कोई टेस्ट है. शाम को नाश्ते में उसे आज इडली बनानी है, उसने सोचा सामने वाले घर से थोड़ा सा करी पत्ता व मिर्च ले आते हैं. रात को एक परिवार को डिनर पर बुलाया है, उसकी भी तैयारी करनी है.

आज फिर तीन-चार दिनों के बाद डायरी खोली है. कल उनके पड़ोस में आए एक नए परिवार से मिलना हुआ. रक्षा बंधन का त्योहार आने वाला है, उसने जून से राखियां लाने को कहा है, वैसे यहाँ पर यह उत्सव नहीं मनाया जाता, पर कहीं न कहीं राखियां मिल ही जाएँगी. आज पता नहीं किस कारणवश बिजली नहीं है, ऐसा यहाँ बहुत कम होता है, कुछ देर पूर्व ही वह  हेयर कट करवा कर आयी है, इस नए हेयर स्टाइल में तो उसकी शक्ल ही बिलकुल बदल गयी है. लम्बे बालों का शौक तो है पर सम्भालना मुश्किल है.

आज छोटी बहन का जन्मदिन है, उसे पत्र व कार्ड भेजा था, दीदी आज परिवार सहित बाहर जा रही है, भारत से बाहर. कल उसने एक आठवीं के विद्यार्थी को भी पढ़ाया, पर लगता है चल नहीं पायेगा, जून और नन्हा, जब तक वह पढ़ाती है, बाहर घूमते रहते हैं, हाँ सुबह उनके उठने से पहले वह पढ़ा सकती है. उसने उस छात्र को शनिवार को आने को कहा है.

उन्होंने कल ‘पंचवटी’ फिल्म देखी, अच्छी है मगर अधूरी सी लगी, जैसी कि लगभग हर आर्ट फिल्म लगती है. समझने के लिए उसने फिर से देखी...तब लगा हाँ, इसके सिवा अंत हो भी क्या सकता था. कुछ दिन पहले टीवी पर एक टेलीफिल्म भी देखी, “विवेक” एक कटु सत्य पर आधारित..

नन्हा सुबह कुछ भी खाने में बहुत नखरे करता है, उसे छह बजे उठाकर ही सात बजे कुछ खिलाया जा सकता है. आज उसका स्कूल बंद है, यहीं बैठकर होमवर्क कर रहा है, इतनी बातें करता है कि...पता नहीं बच्चों के पास इतनी उर्जा कहाँ से आती है. उसका खुद का वजन है कि बढ़ता ही जा रहा है, व्यायाम बंद है और जून जबरदस्ती दाल में घी दाल देते हैं.

कल का इतवार पलक झपकते बीत गया. परसों रात चार्ली चैप्लिन की फिल्म देख कर सोये, ‘ए वोमन ऑफ पेरिस’, सो कल देर से उठे, दोपहर को तिनसुकिया जाना था, एक गाउन लिया, लाल रंग का जिस पर एक सुंदर तितली बनी है, आज सुबह उसने नन्हे को फुल शर्ट पहना दी, तो कहने लगा..कुछ अच्छा सा नहीं लग रहा है, शायद उसको गर्मी लग रही थी. पिछले दिनों वह हावर्ड पास्ट का एक उपन्यास Lola Greg  पढ़ने में भी व्यस्त रही, बहुत रोचक है.






Sunday, November 4, 2012

ठंडा ठंडा संतरा



कल वह अपनी एक सहपाठिनी से एक किताब लायी थी, ‘मापन व मूल्यांकन’ स्पष्ट हो गया है, ‘टी स्कोर व जेड स्कोर’ भी बहुत अच्छी तरह समझाया है इस किताब में. कालेज गयी तो छात्राएँ परीक्षा की तिथियों के बारे में ही बात कर रही थीं, पहली मई से पन्द्रह तक परीक्षाएं हैं, हर पेपर के बीच में दो दिन का अंतराल है सिवाय मनोविज्ञान के पेपर के, टाइम टेबल  उसे तो याद भी हो गया है. ब्लैकबोर्ड पर लिख दिया उसने, और किसी टीचर ने कोई आपत्ति नहीं की, पर सिन्हा मैडम ने कहा ऐसा नहीं करना चाहिए था, क्यों कि अभी तक ऑफिशियली डेट्स नहीं आयी हैं, सो मिटा दिया. आज मार्च का अंतिम दिन है, यानि प्रति पेपर के हिसाब से पांच दिन मिलेंगे, उसने सोचा, अब उसे पूरी व्यूह रचना करके जुट जाना चाहिए. अब लगभग सभी विषयों का कोर्स पूरा होने को है. नन्हा आजकल देर से सोता है, उसे सुलाते हुए उसे ही नींद आ जाती है सो रात को भी देर तक पढ़ नहीं पाती. और आज जल्दी उठ भी गया है, दोपहर को सोना उसे जरा नहीं भाता.

अप्रैल का पहला दिन बीत भी गया, कल दिन भर चार्ट बनाने में ही निकल गया, आज ले गयी थी जमा करने. अब दो-तीन दिन और जाना है, उसके बाद बीच-बीच में एकाध दिन, शायद उन्नीस अप्रैल को विदाई पार्टी होगी, वह भी कुछ कविता या ऐसा ही कुछ पढ़े, ऐसा मन में विचार आया है, उसने सोचा, लिखेंगे कभी मूड होने पर....अलविदा..आज रामनवमी की छुट्टी है, घर पर उतनी पढ़ाई कर नहीं पा रही है, बल्कि कालेज डे में ज्यादा उत्साह रहता है. याद करने का काम अभी तक शुरू नहीं हो पाया है, लगता है चार-पांच बार अच्छी तरह पढ़कर ही जाना होगा, रटना अब उससे हो नहीं पायेगा. ड्राइक्लीनर के यहाँ से साड़ी ले आयी है, कितनी अच्छी लग रही है कोटा चेक की यह साड़ी.

मिसेज सिन्हा भी बस..लडकियाँ उनकी रिस्पेक्ट नहीं करतीं, यही शिकायत करती हैं हमेशा, लेकिन लडकियाँ भी क्या करें..कालेज का कल अंतिम दिन हैं मन में कुछ सुगबुगा रहा है एक कविता...सभी टीचर्स के नाम और बीएड के नाम. सिन्हा मैडम ने पूछा कि कितने प्रतिशत नम्बर आएंगे, उसने साठ प्रतिशत कह दिए..इतने भी नहीं आये तो पढ़ाई किस काम की.

अप्रैल भी आधा बीत गया, जून आए थे, तीन दिन रहे और चले गए, उन्हें पहले दिल्ली फिर आस्ट्रेलिया जाना है. अगले महीने अठारह तारीख को आएंगे अब हमें ले जाने. आजकल गर्मी बढ़ गयी है, पिछले दो-तीन दिन से दोपहर में बिजली गायब हो जाती है, पंखा चलता भी है तो गर्म हवा फेंकता है, दिन भर पंखे की हवा में रहने से बदन कैसा आलस्य से भरा रहता है, मगर क्या करें ? परीक्षा में सिर्फ बारह दिन रह गए हैं, अभी तक सभी कुछ पढ़ा ही नहीं है, याद करना तो दूर, साठ प्रतिशत अंक लाना इतना आसान नहीं है.
आज उसने वह कविता पढ़ दी फेयरवैल पार्टी में. शाम को उसकी सहपाठिनी सीमा आयी थी, उसने ननद से कहा चाय के लिए, वह छोटी-छोटी दी कटोरियों में चना-मूड़ी भी लेकर आयी.

आज इतवार है, उसे जून की याद आ रही है, पिछले इतवार वह यहीं थे. आज दोपहर भर बिजली नहीं थी, गर्मी से ऑंखें और सिर भारी हो रहे हैं, दोपहर को खाना भी नहीं खाया गया, इससमय कुछ खाने का मन हो रहा है, उसने सोचा वह दूध पीकर आती है.

उसे ठंडा-ठंडा संतरा खाने का मन हो रहा है, पर कौन लाकर देगा, सुबह दूध पिया पर हजम नहीं हुआ. पता नहीं उसे क्या हुआ है. उसके साथ यह भी समस्या है की तबियत ठीक न हो किसी काम में मन नहीं लगता. उसने सोचा कि जून उसे दूर रहकर भी शुभकामना भेज रहे हैं, उसे अपने भीतर की हिम्मत जगानी होगी.




Thursday, November 1, 2012

देखो मम्मा, चढ़ा बुखार



कल शाम से ही नन्हा कुछ अस्वस्थ लग रहा था, सुबह उठा तो और भी ज्यादा परेशान था, वह उसी के पास बैठी रही, साढ़े ग्यारह बजे निकली, कालेज बंद था सोचा लिफाफे ही खरीद लेगी, खत्म हो गए हैं, कल इतवार है सोच रही है सुबह जल्दी उठकर कपड़े धोएगी, कई दिन से सारा काम माँ पर आ गया है, ननद को बाहर जाना था, वह कल ही वापस आयी है.

पिछले चार दिनों से नन्हे को बुखार चढ़ता-उतरता रहता है, दवा ले रहा है पर उसका असर नहीं हो रहा है, उसका खुद का स्वास्थ्य भी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है, पढ़ाई तो हो नहीं पा रही है पर उसकी चिंता अवश्य है. घर का माहौल भी प्रफ्फुलित नहीं रह गया है, सभी के मन जैसे इस जिंदगी ने स्नेह से वंचित कर दिए हैं, नन्हा ठीक था तब वे उसके साथ हँसते-खेलते थे.
आज वह नन्हे की रिपोर्ट लेने गयी थी, डाक्टर ने रक्त की जाँच करने को कहा, दवा बदल दी है. कल से उसका ज्वर तेज नहीं हुआ है. कल कालेज गयी थी, लाइब्रेरी से किताबें बदलनी थीं. उनसे कुछ नोट्स बनाने हैं, पूर्णिमा मैडम बहुत सहयोगी स्वभाव की हैं, सुधा मैम उतनी ही अक्खड़.

सुबह स्वयं नहाकर फिर सोनू को उठाने आयी, थर्मामीटर लगा रही थी कि सुनील (इसी मकान में रहने वाला दस-बारह साल का बच्चा) ने आकर बताया, भैया आए हैं, वह जानती थी जून जरूर आएंगे, अगले ही पल सीढ़ियों पर चिर-परिचित आवाज जूतों की और वह  अपने हाथ में सूटकेस लिए कमरे में आ रहे थे, वह खुश थी उस क्षण और भय भी था...दुःख था ही,  नन्हे का थर्मामीटर निकालते-निकालते उसकी ऑंखें बरस पडीं, कितने दिनों से आँसू बहना चाहते थे और आज वह आए हैं इतनी दूर से, जिन्हें उन आंसुओं की कद्र थी. नन्हे को देखकर वह भी उदास हो गए, पर अब सब ठीक हो जायेगा, कल उन्हें राजस्थान जाना है दस दिनों के लिए, जब तक लौटेंगे सब सामान्य हो चुका होगा. दोपहर को वे उन्हें लेकर मार्केट गए, उसे दो बेहद सुंदर साड़ियां उपहार में दिलायीं और नन्हे के लिए भी एक ड्रेस खरीदी.

जून किसी काम से बाहर गए हैं, कह गए थे दो-ढाई बजे तक आएंगे, वह जानते नहीं कि हर पल कोई उनका इंतजार करता होगा. अभी-अभी उनका एक पत्र मिला तब उन्हें पता नहीं था कि वह यहाँ आ सकेंगे, आज डीलक्स से दिल्ली, फिर वहाँ से जोधपुर तथा आगे फील्ड, दस दिन बाद एक दिन के लिए पुनः यहाँ और फिर वापस असम. उसने कल्पना में देखा कि परीक्षाओं के बाद वह नन्हे को लेकर अपने माँ-पिता के यहाँ गयी है, वहीं उसे लेने जून आए हैं, फिर वे सब अपने घर गए हैं और जीवन पूर्ववत् हो गया है, खूब घूमना...कहानियाँ पढ़ना.. खूब सारे पानी से जी भर कर नहाना...सब तरह की दालें बनाना..और भी कई काम, जिंदगी में सभी कुछ एक साथ तो नहीं मिल जाता है, कभी धूप कभी छाँव, कभी प्यार तो कभी इंतजार...कभी मिलन तो कभी बिछड़ना..पर अब और नहीं बिछड़ना.

अभी-अभी वह चले गए, कल सुबह आए और आज शाम चले गए पर इस एक रात और दो दिनों में कितना-कितना स्नेह भर गए हैं, उसने वादा किया कि कभी उदास नहीं होगी, उन्हें भी मालूम है और उसे भी की उनकी याद कितनी आयेगी और कभी रुला भी जायेगी लेकिन उनका आना उसे बहुत अच्छा लगा, इतने दिनों से एकाकी मन जो एक ख़ामोशी से भर गया था, उसे तोड़ना कितना सुकून दे गया. कितनी खुशी से भर गया, जो इतनी दूर थे, जिन्हें वह रोज बुलाती थी, वह उसकी आवाज सुनकर एक सच्चे मित्र की तरह उनके पास आ गए. नन्हा भी बहुत खुश है वह जल्दी ठीक हो जायेगा अब. कुछ दिन बाद फिर आएंगे अब उसका समय उसी दिन के इंतजार में कटेगा.

सोनू आज सुबह से उठा है तभी से बहुत परेशान सा है, बात-बात पर रो देता है, दूध नहीं पीना...ब्रश नहीं करना..चाय भी नहीं..और बिस्किट भी नहीं...हर बात में नहीं और ज्यादा कहने पर सिसकियाँ लेकर रोना, उसे लगता है पापा की याद आ रही है. जब तक वह आएंगे तब तक तो बिल्कुल ठीक हो जायेगा, कितना कमजोर हो गया है, पर ठीक होकर पुनः दौडेगा पहले की तरह छत पर, फिर अपने घर में.. वह सोच रही थी आज कालेज जायेगी, पर अब मुश्किल लगता है. बहुत दिनों का गैप हो गया है उसका, अब तो लगता है सब खुद ही पढ़ना होगा. अगर अच्छे नम्बर नहीं भी आए तो कोई बात नहीं, नन्हे से बढकर कुछ नहीं उसके लिए. उसे छोड़कर तो नहीं जा सकती.



Tuesday, October 30, 2012

सारनाथ का टूर



कालेज में नागर मैडम ने कुछ आवश्यक बातें बतायीं, जो हर टीचर पहले भी कई बार दोहरा चुकी है, उसके बाद कोई टीचर नहीं आयी. एक बजे ही वह घर आ गयी थी, रास्ते में अखबार खरीदा और कम्पीटीशन सक्सेस. थोडा बहुत पढ़ते रहना चाहिए, आरती मैडम ने बताया कि यूजीसी परीक्षा की तैयारी करके अगले वर्ष जरूर देनी चाहिए. जून को भी लिखेगी इस बारे में और रही बात नवोदय स्कूल में नौकरी की तो वह  उसके लिए नहीं है. स्वप्ना से उसने सेंट्रल स्कूल के फार्म के लिए कहा है, अभी उसे कल की कक्षा में पढ़ने के लिए पढ़ना है.

फरवरी के पांच दिन बीत गए, आज कालेज में थोड़ी पढ़ाई जरूर हुई. अगले हफ्ते मंगल को उनका सारनाथ जाने का कार्यक्रम है, एक्टिविटी में वही फ़ाइल शेष रह गयी है. जून ने लिखा है कि अप्रैल में जीएम से छुट्टी मांगना उनके लिए बहुत मुश्किल होगा, सिर्फ पांच सीएल लेकर वह यहाँ आएंगे जससे अक्टूबर में ज्यादा छुट्टियाँ ले सकें. पर वह जो दम भरते हैं कि उसके लिए कुछ भी कर सकते हैं, देखें उसकी बात कहाँ तक मानते हैं.

सोमवार होने के बावजूद आज भी कालेज में वही हाल रहा, एक टीचर को छोड़ कर कोई क्लास में ही नहीं आई. कल सारनाथ जाना है.

सारनाथ गयी, नन्हे को नहीं ले जा सकी जैसा उसने सोचा था. ले जाती तो कोई हर्ज नहीं होता पर यह उनकी नागर मैडम उसूलों से बंधी हुई जैसे एक नन्हे के जाने से...खैर प्रोग्राम अच्छा ही रहा, कभी-कभी बोरियत भी हुई लड़कियों के बेहिसाब गाना गाने से. मंदिर भी देखे, स्तूप भी और खंडहर भी, पर उनके बारे में लिखना भी तो है. संग्रहालय भी देखा. जितना स्वयं लिख सकती है वह तो एक-डेढ़ पन्ने का ही होगा..खैर शायद किसी किताब से थोड़ी सहायता मिल जाये. नन्हे के लिए दो-तीन किताबें खरीदीं उसने कहा था, ‘मेरे लिए पुस्तक लाइयेगा’. भोजन जितना ले गयी थी आधा भी खत्म नहीं हुआ था, एक भिखारिन को दे दिया. स्वप्ना, रीता, कविता और एक लड़की, वह खुद, इन पाँचों ने सभी कुछ साथ देखा. लिम्का पिया उसने, जून के साथ कहीं जाने पर वे लिम्का ही पीते थे. घर आते ही उसका पत्र मिला, वह  आस्ट्रेलिया जायेगा. लिखा है, क्या मंगाना है लिस्ट बना लो..वह उसे कितना चाहता है.  

मन परेशान है, आँखें बरसने को आतुर, घबराहट, आक्रोश, दुःख सभी कुछ एक साथ महसूस हो रहा है. जून का एक बहुत प्यारा सा खत मिला है, पर इस मन का क्या करे. खत मिला था तब बहुत खुश थी, पर नन्हे की परवरिश को लेकर एक ऐसी बात हो गयी है कि...समझ नहीं आता क्या होगा अब. कल सारनाथ जाने से पूर्व वह चने की उबली दाल रख गयी थी कि इसको छौंक लगाकर नन्हे को खिला दें, मकानमालिक के यहाँ ब्राह्मणों को खिलाने के लिए खूब मिर्च वाली पूरी-सब्जी बनी थी वह नहीं, पर शाम को आकर देखा तो दाल वैसे ही पड़ी थी, सुबह कालेज जाने से पूर्व वह किसी बर्तन को ढूँढ रही थी तो कटोरी में खराब दाल की महक आयी, तभी उसे फेंक देना चाहिए था, क्योंकि कालेज से वापस आकर पता चला कि वही दाल आज उसे खिला दी, उसे बहुत खराब लगा और उसने कह दिया कि ऐसा नहीं होना चाहिए था, इसी बात पर सभी नाराज हैं. हुआ करें नाराज, आज के बाद नन्हे को बासी तो नहीं खिलाएंगे न.






Saturday, October 20, 2012

बच्चे मन के सच्चे



पिछली बार उसने शिकायत की थी सो इस बार जून पहले से उसके लिए नए वर्ष की कत्थई डायरी रखकर गए हैं, पहले पन्ने पर शुभकामना भी लिख दी है. उसकी यह पंक्ति पढकर मन कुछ स्थिर हुआ है वरना नए वर्ष का पहले दिन इतना उलझन भरा है कि बस.. सब कुछ गड्डमड्ड हो रहा है सुबह से. ऊपर से लाइट भी गायब है. बिजली है मगर उनके यहाँ तार हिल जाने से नहीं आ रही. एक तो इतनी देर से आँख खुली, सारी परेशानी तभी से शुरू हुई, सर में हल्का दर्द भी है, शायद घर से बाहर निकलने पर खुली हवा में ठीक हो जाये. चुपचाप आंख बंद करके बैठी रहे ऐसा ही मन हो रहा है इस समय, पर नन्हे ने ठीक से नाश्ता नहीं किया है, उसने सोचा उसके न रहने पर भी तो ऐसे ही करता होगा. उठो लेट तो सभी काम लेट हो जाते हैं, ग्यारह बजे हैं, बारह बजे वह स्कूल जायेगी, तैयार होने में उसे विशेष देर नहीं लगती. कल रात जून को स्वप्न में देखा, क्लब में है, वह नन्हे को लेकर पैदल ही क्लब जा रही है. वहाँ नए साल का कार्यक्रम है. कल रात नव वर्ष की पूर्व संध्या पर टीवी पर उन्होंने दो अच्छे कार्यक्रम देखे, शायद इसी का परिणाम था यह स्वप्न.

कल दिन की शुरुआत जितनी उलझन भरी थी अंत उतना खराब नहीं था. जून को पत्र लिखते लिखते ही मन हल्का हो गया. उसके प्यार ने हर बार उसे डूबने से बचा लिया है. उसके स्नेह की कोई सीमा नहीं, भले ही उसने वादे न किये हों पर...आज उसका भी पत्र आयेगा. कल गोपिराधा में आठवीं में बहुत दिनों बाद गणित पढ़ाया, ठीक था मगर आज कल से भी अच्छी तरह पढ़ाना होगा, ज्यादा बड़ी प्रमेय है आज. ननद का जन्मदिन है आज, वह शाम को उसे उपहार दिलाने ले जायेगी. कल बड़ी बुआजी का पत्र आया बहुत दिनों के बाद. फुफेरी बहन को चौथा बच्चा हुआ, बेटी, लेकिन उसकी मृत्यु हो गयी, यह पढ़कर उसे दुख नहीं हुआ, बहन भी अजीब स्थितियों का शिकार हो गयी है. कितनी बार दर्द सहेगी, बुआजी भी उसे समझाती नहीं हैं.  
कल जून के चार पत्र आए और विवाह की वर्षगाँठ के लिए एक कार्ड भी. वह तिनसुकिया गए उस कार्ड को लेने. आज गुरु गोविन्द सिंह की जयंती के उपलक्ष में अवकाश है. सुबह से ठंड काफी है, दोपहर को धूप निकली. कल शाम से सोनू की तबियत कुछ ठीक नहीं है, इस समय सोया है, माथा गर्म है, पर उसके पास क्रोसिन भी तो नहीं है.

आज पढ़ने या लिखने के नाम पर शून्य है, यहाँ तक कि न पत्र लिखा न पढा. आज एक कार्ड आया छोटे भाई के फादर इन ला का, इसका हिंदी अनुवाद ठीक सा नहीं लगता. सुबह नाश्ता बना रही थी कि पता चला सात तारीख तक स्कूल-कालेज सब बंद है. उसे अपनी पढ़ाई सलीके से शुरू कर देनी चाहिए, टीचर्स के सहारे रहकर तो कोर्स पूरा हो नहीं सकेगा. आए दिन स्कूल-कालेज बंद रहते है आजकल, या फिर इसी वर्ष ऐसा हो रहा है. शुरू से ही छुट्टियाँ ही छुट्टियाँ, एक तरह से अच्छा ही है नन्हे के लिए और उसके लिए भी, ज्यादा दिन उसे छोड़कर नहीं जाना पड़ा है. पर यह भी लगता है कि इस कारण परीक्षाएं देर से न हों. दोपहर को सोनू को सुलाया, लाइट नहीं थी सो ऊपर छत पर चली गयी किताब लेकर, आधा घंटा भी नहीं हुआ होगा की लाइट आने पर नीचे आयी, नन्हा जगकर रो रहा था, वह उसे ढूँढ रहा था, उसकी तबियत ठीक न होने के कारण ही शायद देर तक सो नहीं पाता. इस समय रात्रि के नौ बजने वाले है, नन्हा खेल रहा है, बच्चे थोड़ी सी उर्जा भी बचा कर रखना नहीं चाहते.





Tuesday, October 16, 2012

चिट्ठी आयी है



सप्ताह का चौथा दिन है, पत्र नहीं आया है, शायद एक साथ मिलें. बड़ी ननद का पत्र आया है वह एक सप्ताह बाद आ रही है, उसी दिन उसका कालेज भी खुल रहा है. कहीं से रेडियो पर बजती पंक्तियाँ उसके कान में पडीं-

फिर दबे पाँव तेरी याद चली आई है
खुदबखुद आने लगा फिर उसी महफिल का ख्याल
जिंदगी मुझको कहाँ आज फिर ले आई है...

परसों रात उसे नींद नहीं आ रही थी, किन्तु बाद में उसकी स्मृति ही सुला पायी. एक बार बहुत वर्ष पहले एक बार ऐसे ही उसकी याद सताई थी, लगा था कि इस क्षण उन्हें निकट होना चाहिए था दुनिया में कुछ हो न हो..दूरियां कम होनी ही चाहिए थीं उस एक क्षण. यह क्या मानसिक दुर्बलता है ? नहीं, यह मानसिक शक्ति है, क्योंकि यही तो प्रेम है, प्रेम में शक्ति है मीलों दूर बैठा प्रिय भी निकट महसूस होता है.

आज कई दिन बाद, एक सप्ताह बाद पत्र मिला है, पढ़कर.. अच्छा लगा ही और मन जैसे उत्साह से भर गया है. जून ने बड़ा सा खत लिखा है, उसे भी लिखना है आज तो मुश्किल लगता है. आठ बजे खाना बनाने जायेगी, नन्हा भी अक्सर उसके साथ किचन में जाता है, फिर तो साढ़े नौ कैसे हो जायेंगे पता ही नहीं चलेगा. उसके बाद उसे ब्रश कराने, सुलाने में भी कम समय नहीं लगता, उसका बीएस चले तो खेलता ही रहे. आज वह बीएड की दो किताबें भी लायी है, उसे आठ गतिविधि फाइलें भी बनानी हैं. धीरे-धीरे सब हो जायेगा,उसने मुस्कुरा कर खुद से कहा.

आज फिर उसके सिर में दर्द है, शरीर में जैसे एक घड़ी लगी है, नियमित हर महीने उसे ऐसा दर्द होता है. सुबह आठ बजे से एक बजे तक कालेज में थी, लौट कर सोने गयी तब से हो रहा है. मन कैसा बोझिल है. पिछले कुछ दिनों से तनाव से घिरी रहती है, कारण क्या है समझ नहीं पाती, कालेज में जितने समय रहती है सब ठीक रहता है, घर आते ही एक अजीब सी घुटन महसूस होती है, जून के खत पहले जल्दी जल्दी आते थे अब देर से आते हैं शायद यही कारण हो या फिर...दो तारीख से अध्यापन आरम्भ हो रहा है, काम इतना ज्यादा है और लेसन प्लान अभी एक भी चेक नहीं हुआ है. दो को उसके तीन पीरियड होंगे. कल गोपीराधा स्कूल भी गयी थी, जहाँ उसे पढ़ाने जाना है. अच्छा लगा, लडकियां भी अनुशासित लगीं. माँ-पिता का पत्र भी कई दिनों से नहीं आ रहा है, वहाँ का कोई समाचार नहीं मिला है, पता नहीं क्यों सब चुप बैठे हैं.

आज सुबह जून को खत लिखा, उसकी याद बहुत आती है इन दिनों. उसे कितने तो पत्र लिखे हैं उसने, पर ज्यादा उदासी भरे ही, क्यों होता है ऐसा यह वह भी जानता है और वह भी... वह भी उसे सब कुछ लिख देता है. पास होने पर वे कभी भले ही दूर हो जाएँ पर दूर होने पर...बिलकुल पास होते हैं. अब जब तक छुट्टियाँ हैं ऐसा ही रहेगा,फिर अध्यापन में व्यस्त होने पर मन शांत रहेगा, एकाग्र रहेगा कालेज की ओर. तभी अचानक यह गीत बज उठा-
तुम मेरे पास होते हो, कोई दूसरा नहीं होता..

आज श्रीमती गाँधी की पाँचवीं पुण्यतिथि है, जब उनका देहांत हुआ था लगता था कि देश का क्या होगा, पर धीरे-धीरे समय के साथ लोग और देश उनके बिना भी रहना सीख गए हैं. इसी तरह घर मेंहोगा, सभी लोग जाने वाले के बिना भी रहना सीख जायेंगे, सीख गए हैं. कल उसे कालेज जाकर तीसरा लेसन प्लान चेक करवाने जाना है और परसों से टीचिंग शुरू है, नवम्बर तो फिर जल्दी बीत जायेगा, दिसम्बर में जून आएंगे. 

Monday, October 15, 2012

जहाज का मॉडल



कालेज में आज उसका दिन ठीक रहा, पूर्णिमा मैडम उसे बहुत अच्छी लगीं, आरती मैडम थोडा दूरी बर्तती हैं, और सिन्हा मैडम भी कम नहीं हैं. शाम को बिजली भी दो बार गयी ऊपर से उमस भरी गर्मी, छोटा सा माचिस की डिब्बियों सा घर, साफ हवा को तरस जाता है मन, कितना याद आता है तब अपना घर खुला–खुला...यहाँ तो..सर्दी का मौसम शायद इतना परेशानी भरा नहीं होगा. सोनू थोड़ा सा खाना खाकर ही सो गया है.

आज पूरा दिन व्यस्तता में ही बीता, आराम भरी व्यस्तता, सुबह के काम तो वही रोज के थे फिर टीवी और तब खोजवां गए, तायी जी के घर, आजकल वह ज्यादा मेहरबान हो गयी हैं. विवाह के इतने वर्षों में दूसरी बार उनके घर गयी, खाना खिलाया और आइसक्रीम. नन्हा सो गया है, कल कालेज की छुट्टी है.

लगभग दो हफ्ते बाद वह लिख रही है. कल शाम नीचे कमरे में तरह-तरह की गंध भरी थीं. सब्जी बनाने की, मिटटी के तेल की, इतवार के कारण सब देर तक वहीं बैठे थे. घुटन सी हुई, कमरे में हवा आने-जाने के लिए मात्र एक खिडकी है, अगर पृरा कमरा एक गंध से भर जाये तो जल्दी मुक्त नहीं हो सकता. कभी कभी धुआँ भर जाता है, क्योंकि अंगीठी या लकड़ी पर भी कभी-कभी खाना बनाते हैं यहाँ. सोचा, ऊपर सोते हैं पर वहाँ भी उमस थी, जैसे इस समय है, सुबह के पौने छह बजे हैं पर हवा का नाम नहीं. बनारस में हवा की बहुत कमी है, वायु प्रदूषण है यहाँ, साँस लेने में खास तौर से इस घर में घुटन सी महसूस होती है. सब कुछ बंद-बंद, पता नहीं कितने पुराने बने हैं ये मकान, इतने सटे-सटे और पतली सी गली में.
कल जून का एक तार मिला, वह  बहुत जल्दी घबरा जाता है. उसन सोचा वह वहाँ अकेला है, वह उसे ऐसी कोई बात नहीं लिखेगी जिससे वह परेशान हो जाये. आज वह कालेज से जल्दी लौट आयी, तीन अध्यापिकाएँ छुट्टी पर थीं. यह पता चला कि अगले हफ्ते कालेज में प्राथमिक उपचार की ट्रेनिंग दी जायेगी.

वह पत्र लिख रही थी कि थकान महसूस हुई कुछ देर आंख बंद करके लेटी रही और फिर लिखने में लग गयी. कल ही आए पिता जी के अच्छे से पत्र का जवाब भी देना है, उसने सोचा नन्हे के दाखिले की बात हो जाये तब लिखेगी. वे लोग मंझले भाई के पास गए थे, उसके घर नन्हीं गुडिया आयी है, उसने सोचा वह उनके लिए एक कार्ड भेजेगी. आज कालेज में छुट्टी हो गयी. उर्दू को द्वितीय भाषा बनाने के विरोध में सभी कालेज बंद करवा दिए गए, पता नहीं कल भी खुलता है या नहीं. कल सुधा मैडम ‘भारत का संविधान’ में से टेस्ट लेंगी. पूर्णिमा मैम अपने बारे में इतना कुछ बताती हैं, अपना सब कुछ कि...उसे लगता है यह अच्छा नहीं है, छात्राओं से इतना घुल-मिल जाना, सिन्हा मैम की पारिवारिक समस्या के बारे में, नागर मैम की तबियत के बारे में, और अपने पिताजी की आँखों के मोतियाबिंद के बारे में बताती रहीं, हर व्यक्ति कितना पीड़ित है.
कल से कालेज बंद है पर उसे बहुत सारा काम करना है, कल एक चैप्टर ही हो पाया. अभी लिखने बैठी ही थी कि बिजली चली गयी, बनारस की समस्याओं में से एक. उसे ‘एस यू पी डब्ल्यू’ का प्रोजेक्ट भी बनाना है, जिसके लिए ताई जी के यहाँ जाना है, उनकी बेटी हस्तकला जानती है. गणित का काम फैकल्टी ऑफ एडुकेशन आने के बाद ही होगा. वह मन ही मन बाकि कामों का भी हिसाब लगती रही, जब तक बिजली न आ जाये कुछ और किया भी तो नहीं जा सकता.

कल उसने जून से फोन पर बात की, कितनी स्पष्ट ..पता नहीं उसने क्या सोचा हो, कितनी मीठी लग रही थी उसकी आवाज, कहा भले ही न ही पर...प्यार ही तो था वह सब. आज बापू की एक सौ बीसवीं जयंती है, कल गाँधी फिल्म देखी, उनकी महानता पर मन झुक गया. आज बदली है गगन में, वह छत पर बैठी है, नन्हा सो रहा है, अभी कुछ देर पहले ही वह भी उठी है, सुबह ही स्वप्न देखा, जब वह बारहवीं में पढ़ती थी उस समय का, सारी स्मृतियाँ सजीव हो गयीं.

आज सुबह ग्यारह बजे वे ताई जी के यहाँ पहुंच गए, शाम को लौटे. उसे एक जहाज का मॉडल बनाना है, काफी बन गया है, बाकी उनकी बेटी बना देगी. वह कॉलेज भी गयी, प्रोजेक्ट के लिए जो चार्ट आदि बनाने हैं, उसके बारे में जानकारी लेने. वापसी में चचेरी बहन के लिए एक फ्रॉक खरीदा, घर आने के बाद उसे लगा कि दुकानदार ने ज्यादा दाम लिया है, मन भारी हो गया पर उसने सोचा इससे मुक्त होना ही होगा, जो हुआ सो ठीक है, कल इसे पार्सल कर देगी. ननद को एक कार्ड लाने को भी कहा है. उसे हल्की भूख महसूस हुई, पर अगले ही पल लगा नहीं, कुछ खाने का मन नहीं है, उसे आश्चर्य भी हुआ कि खाने का वक्त होने पर भूख अपने आप खबर देने लग जाती है. उसने सोचा जून भी तो इस वक्त आकर शाम का टिफिन ले रहे होंगे.