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Friday, December 11, 2020

श्वेत बदलियाँ

 


रात्रि के सवा आठ बजे हैं। टीवी पर कारगिल दिवस पर दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में आयोजित कार्यक्रम का सीधा प्रसारण आ रहा है। प्रधानमंत्री का संबोधन प्रेरणात्मक है। कुछ देर पूर्व नन्हे और सोनू से बात हुई, वे लोग काबिनी गए हैं, जो मैसूर से एक घण्टे की दूरी पर है. वे एक ईको रिजॉर्ट में ठहरे हैं. जहां एक नदी भी है, मिट्टी की दीवारों वाला कमरा है, छत भी छप्पर वाली है, पर एसी लगा है भीतर. आधुनिकता और परंपरा का अध्भुत मिश्रण. सुबह एक योग साधिका मिलने आयी, उसका दांया कंधा पट्टी से बंधा था, सिर पर चोट का निशान था, टेप लगा था. बताया, कल शाम को गैरेज के पीछे बगीचे से भिन्डी लेने गयी थी, गिर गयी. हाथ के बल गिरी थी सो कंधे में फ्रैक्चर हो गया. एक महीना लगेगा ठीक होने में. फिर भी वह काफी उत्साह से भरी थी, आत्मिक शक्ति से ओतप्रोत वह हँस रही थी. अगले वर्ष वह भी रिटायरमेंट के बाद कोलकाता जाने की तैयारी करेगी. पिताजी हाल में ही नहीं रहे. पुत्र दिव्यांग है, पर उसकी मुस्कान मिटती नहीं. जिसने अपने हृदय में परमात्मा की उपस्थिति को एक बार महसूस कर लिया है, वह हर हाल में प्रसन्न रह सकता है. एक अन्य साधिका राधा-कृष्ण की भक्त है, उनके भजन पूर्ण मगन होकर गाती है. सुबह स्कूल गयी तो पहली बार यह ड्राइवर आया था, वैसे वह कई वर्षों से गाड़ी चला रहा है पर उसका हाथ उतना सधा हुआ नहीं है. दोपहर को घर के सामने से एक शवयात्रा को जाते देखा. कल शाम ही कम्पनी के उन अधिकारी का काफी समय से चल रही किडनी की समस्या से देहांत हो गया था. शाम को बगीचे में टहल रही थी तो बच्चों ने कहा, आकाश में कितने सुंदर बादल हैं, तस्वीरें उतारने को भी कहा. बच्चों में सौंदर्य बोध स्वाभाविक होता है, उनकी आँखें शुद्ध होती हैं, तीन वर्ष का बालक भी बादल को दिखा कर कह रहा था, कितना सुंदर है ! भगवद्गीता पर व्याख्या सुनी आज, प्रकृति  और पुरुष के द्वारा इस सृष्टि की रचना होती है. जिन चीजों को हम छोड़ना चाहते हैं, वह छूट जाएँ यही मुक्ति है ! प्रेम से भरे रहना भक्ति है, अशांति से मुक्ति रहना शांति है ! रामानुजम की गीता पर व्याख्या पढ़ी कुछ देर. 

सुबह जल्दी नींद खुली, पर जब भ्रमण के लिए तैयार हुई तो आश्चर्यजनक रूप से बन्द हो गयी, आधा घन्टा रुकी रही, घर लौटने के बाद तेज वर्षा पुनः होने लगी. आज राज्यसभा में भी ‘मुस्लिम महिला विवाह सरंक्षण अधिनियम’ ट्रिपल तलाक बिल पास हो गया. आज वाकई मुस्लिम महिलाओं के लिए ख़ुशी का दिन है, मोदी सरकार ने जो कहा था, वह कर दिखाया है. महिलाओं में ख़ुशी का माहौल है. कितनी बड़ी कुरीति है यह तीन तलाक की प्रथा, दुनिया के बीस इस्लामिक देश इस प्रथा को बन्द कर चुके हैं. कश्मीर के बारे में एक कार्यक्रम देखा, सम्भवतः मोदी सरकार कोई बड़ा निर्णय लेने वाली है स्वतन्त्रता दिवस से पूर्व. 


छोटी बहन का जन्मदिन है आज, उसे मोबाइल पर केक काटते हुए देखा, ढेर सारी अन्य वस्तुएं भी थीं, पर एक विशेष व्यंजन था, करेले के चिप्स !उसके लिए एक कविता भेजी थी उसने सुबह. उसे राखियां भेजनी हैं, दो हफ्ते ही शेष हैं. इस बार यहाँ बच्चों को विशेष भोज देना है रक्षा बन्धन पर, यह अंतिम उत्सव होगा उनके जाने से पूर्व. आज भी सुबह से दोपहर तक लगातार वर्षा होती रही, शाम को सामने भ्रमण पथ पर टहलने गयी, मैदान में पानी भर गया था. तस्वीरें उतारीं, काफी अच्छी आयी हैं. आज सुबह देखा, वर्षा में भीगती हुई एक काली जंगली मुर्गी अपनी चोंच में एक कीड़ा पकड़े जा रही थी, लगा अवश्य अपने बच्चे के लिए ले जा रही होगी. तभी झाड़ियों से काला चूजा निकला, जरूर  उसके मुख में डाला होगा. दूर से देख नहीं पायी, प्रेम की भावना हर जीव में प्रकृति की तरफ से मिली है. वे यदि किसी से प्रेम करते हैं तो इसमें उनकी कोई सफलता नहीं है, बल्कि जब वे किसी से द्वेष करते हैं तो इसमें उनका प्रयास अवश्य सम्मिलित है. परमात्मा उन्हें मिला ही हुआ है, संसार उन्होंने खुद बना लिया है. संसार से परमात्मा ढक गया है. 


भक्त के दिल की हालत को बयान करते हुए शब्द फिर उस पुरानी डायरी में पढ़े  महादेवी वर्मा के लिखे - 


वर देते हो तो कर दो ना 

चिर आंखमिचौनी यह अपनी, 

जीवन में खोज तुम्हारी है 

मिटना ही तुमको छू पाना !


तुम चुपके से आ बस जाओ ‘

सुख-दुःख स्वप्नों में श्वासों में, 

पर मन कह देगा ‘यह वे हैं’

आँखें कह देगीं पहचाना !


क्यों जीवन के शूलों में 

प्रतिक्षण आते जाते हो ! 

ठहरो सुकुमार ! गलाकर 

मोती पथ में फैलाऊँ ! 


हंसने में छू जाते तुम 

रोने में वह सुधि आती,  

मैं क्यों न जगा अणु-अणु को 

हँसना-रोना सिखलाऊँ !


Friday, August 9, 2019

काले खट्टे शहतूत



रात्रि के पौने नौ बजे हैं. अभी-अभी जून से बात हुई. वह एयरपोर्ट से सीधे लाजपतनगर गये, सूखे मेवों की दुकान पर, जहाँ से वह पिछले अनेक वर्षों से खरीदारी करते हैं. बात चल रही थी कि कुछ गिरने की आवाज आई, पर सब तरफ देखा, कहीं भी कुछ दिखा नहीं, बाद में बाहर जाकर भी देखा, सब कुछ अपनी जगह व्यवस्थित था. जीवन एक रहस्य है, यह बात मन में कौंध गयी. पिता जी से भी बात हुई, दोपहर को पता चला था, उन्हें ज्वर है, इस समय ठीक थे. आज ही बड़ी बुआ जी से भी बात की, अस्वस्थ हैं, दर्द में थीं. अंत समय में कितना कष्ट होता है किसी-किसी को, और कोई सहज ही देह का त्याग कर देता है. आज दोपहर ब्लॉग पर मृत्यु के बारे में ही लिखा. एक न एक दिन तो देह की मृत्यु होनी ही है. कल सुबह मृणाल ज्योति के किसी काम से अकेले डिब्रूगढ़ जाना है. बहुत पहले सासु माँ जब अस्पताल में थी, कई बार जाया करती थी. दोपहर को बच्चों की संडे क्लास चल रही थी, उड़िया सखी का वीडियो कॉल आया, जो पहले हर इतवार को उसकी मदद किया करती थी, उसने बच्चों से कुछ सवाल पूछे. सभी को बहुत आनंद आया. आज भी पिछले कुछ दिनों की तरह 'मान्डूक्य उपनिषद' की व्याख्या सुनी. जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति से भी परे है तुरीया और इन सबमें  है एक ही आत्मा या ब्रह्म, ऊँ इन चारों का प्रतीक है. वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ इन तीन अवस्थाओं के प्रेरक हैं तथा इनका प्रेरक ब्रह्म ही है.  

जून से बात हुई, उन्हें गले में खराश व हरारत महसूस हो रही थी. ईश्वर से प्रार्थना है कि वह शीघ्र स्वस्थ हो जाएँ. परमात्मा उन्हें शक्ति प्रदान करेंगे. वह सफर में हैं और घर का आराम उन्हें नहीं मिल पायेगा, अभी दो दिन और उन्हें बाहर रहना है. कल रात दो बजे उठना होगा, सुबह की फ्लाईट के लिए. दिन भर गोहाटी में भी व्यस्त रहना होगा. घर आकर ही उन्हें पूरा आराम मिलेगा. इतवार को उनका इंटरव्यू भी है. परमात्मा सदा उसके साथ है. वैश्वानर, तैजस और प्राज्ञ के रूप में वह हर घड़ी सबके साथ है. अभी-अभी टीवी पर समाचार देखे. अमिताभ बच्चन को भारी पोशाक की वजह से शरीर में दर्द हो गया था, डाक्टरों की टीम उन्हें देखने गयी. फुफेरे भाई से बात हुई, बुआ जी अस्पताल में हैं, उनेक पैर का आपरेशन हुआ है. दोपहर को उनकी कितनी बातें याद आ रही थीं. आज काश्मीर में गुरूजी के कार्यक्रम के बारे में वीडियो देखे. कोई-कोई मडिया कितनी गलतबयानी करता है. आज वह पूना में है. वह अपने आराम की परवाह किये बिना जगह-जगह घूमकर लोगों में प्रेम व शांति का संदेश दे रहे हैं. सुबह पाकिस्तान में योग के प्रति बढ़ते आकर्षण पर भी वीडियो देखा, गुरूजी को मानने वाले वह भी हैं. आज भागवद् में कृष्ण का ऊद्ध्व को दिया गया उपदेश भी पढ़ा जिसे बहुत सुंदर ढंग से लिखा गया है. टीवी पर रामदेव जी पर जो कार्यक्रम आ रहा है, उसमें रामकिशन का अभिनय करने वाला बालक बहुत अच्छा काम कर रहा है. बचपन से ही कितना संघर्ष किया है उन्होंने. गुरूकुल में रहकर पढ़ाई की, अपने आदर्शों पर डटे रहे. उनके गुरूजी का भी बहुत बड़ा योगदान है उनके जीवन को गढ़ने में. बालकृष्ण भी बहुत अच्छी तरह बात करता है. आज उम्मीद पर एक कविता लिखी, शायद ब्लॉग समूह पर पहुँच गयी हो.

आज योग कक्षा के बाद 'जल नेति' करना सिखाया, पर शायद ही किसी को इसे करने का उत्साह जगे, क्योंकि जब उसने जलनेति पात्र मंगाने के लिए कहा, तो किसी ने भी हामी नहीं भरी. आज गुरूजी के पुराने वीडियो देखे. नारद भक्ति सूत्र पर वे बोल रहे थे. उनके जीवन पर भी फिल्म बन सकती है. दोपहर को लेखन कार्य किया.

जून दोपहर को एक बजे के थोड़ा बाद ही आ गये थे. भोजन करके दो बजे पुनः चले गये, शाम को लौटे तो हल्की हरारत थी. शाम से ही उपचार आरम्भ कर दिया है. जल्दी ही वह ठीक हो जायेंगे. आज सत्संग पूरा होते ही वर्षा होने लगी, उन पांच साधिकाओं ने मिलकर परमात्मा के नाम का कीर्तन जो किया था. बगीचे में शहतूत लगे हैं आजकल. दिन में कई बार बच्चों की टोली उन्हें तोड़ने जाती है. अभी काफ़ी खट्टे हैं काले रंग के शहतूत. आज एक ब्लागर ने टोन-टोटके आदि के बारे में विचार पूछा. कल वाणी कजी का मेल आया था, ईबुक के बारे में. आज एक कविता लिखी जो ध्यान के अनोखे अनुभव के बाद हुई मस्ती से उत्पन्न हुई थी, कितना अनोखा था आज का अनुभव..अनूठा. ध्यान पर जितना कहा जाये कम है, ध्यान की महिमा अपार है. दीदी ने बड़े पुत्र तथा परिवार से वीडियो चैट करवाई, पता चला बुआ जी अब पहले से बेहतर हैं.


Sunday, March 5, 2017

बरसे बदरिया सावन की


प्राणायाम कराने से उसके एक छात्र में काफी बदलाव आ रहा है, जो पढ़ते-पढ़ते ही सोने लगता था. अभी कुछ देर पहले ही वह पढ़कर वापस गया है, आज काफी सचेत था, उसका ध्यान टिकने लगा है. उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि इस बालक पर अपनी कृपा बनाये रखे. सुबह एक सखी से बात की, वे लोग मकान बदलने वाले हैं, इसी घर की जब वे नये-नये आये थे, कितनी तारीफ़ की थी पर अब इसकी कमियां नजर आ रही हैं. नये घर में सब अच्छा ही होगा यह भी तो नहीं कह सकते, फिर भी बेहतर के लिए प्रयास तो निरंतर चलता ही रहता है, और चलना भी चाहिए. कल उसने एक स्थानीय लेखक की कविताओं की एक किताब के लिए प्रस्तावना लिखी. आज धूप तेज है. कल सुबह सड़क किनारे के पेड़ से आंधी में गिरे आम लाने पर उसने पिताजी को टोका तो वे आज न फूल ही लाये न आम, घर में खिले चाँदनी के फूलों को सजाया है. अपने ही घर में जब सब कुछ हो तो बाहर से लाने की क्या आवश्यकता है, पर मानव के भीतर का नन्हा बच्चा कभी बूढ़ा नहीं होता. अनंतपुर स्टेशन पर एक भयंकर रेल दुर्घटना हो गयी आज सुबह, काफी लोग मृत हुए, काफी घायल हुए, अभी भी कुछ लोग फंसे हुए हैं. जीवन में वैसे ही कितने दुःख होते हैं, ऊपर से यह भयंकर दुःख..

आज फिर वर्षा हो गयी है, मौसम सुहावना है. नन्हे ने कल बताया अगले महीने वह आ सकता है. रात को एक अद्भुत स्वप्न देखा, उसे लग रहा था वह जाग रही है, ध्यान में है, दो काली चीटियाँ दिखती हैं, बिलकुल जीवंत, चलती हुईं, उन्हें देखती है तो कंधे के पीछे से किसी के हँसने की आवाज आती है और यह वाक्य भी, ‘अब मृत्यु ही शेष है जीवन नहीं’ और तभी एक प्रवचन सुनाई देता है स्पष्ट था एक-एक शब्द उसका, वह मुस्का रही है, यह आभास भी हुआ यानि स्वयं को मुस्काते देखा..कैसा अनोखा स्वप्न था यह ! टीवी पर बापू द्वारा इजराइल में गायी रामकथा का प्रसारण हो रहा है, शायद दुनिया का कोई कोना नहीं बचा होगा, जहाँ वह न गये हों. राम का नाम विश्व भर में गूँज रहा है. अभी कुछ देर पहले उपनिषद के उपदेश पढ़े, Indian Philosophy में से, जो पिछली बार पब्लिक लाइब्रेरी से लायी थी. आज कान्हा से बातें भी हुईं, पहली बार कॉफ़ी भी ऑफर की, जागते रहने का मन्त्र उसने दिया. वे जागते हुए भी स्वप्न देखते हैं अर्थात सोये रहते हैं. पिताजी टीवी नहीं देख रहे हैं, बरामदे में बैठे हैं. यूँही बिना कुछ किये बैठे रहना उन्हें अच्छा लगता है. बड़े भाई की बिटिया का दसवीं का परीक्षा परिणाम आ गया, बहुत अच्छा रहा, उसे ९.५ की उम्मीद थी, ९.८ रहा, भैया-भाभी बहुत खुश हैं और सारा परिवार ही खुश है. सरदारनी आंटी की पोती के बारहवींमें ९७.२% अंक प्राप्त किये हैं, उसे याद आया उनके समय में ६०% अंक प्राप्त करने पर ही घर में लड्डू बांटे जाते थे.

आज शाम वे पूजा कक्ष की जगह आंगन में सत्संग करने वाले हैं, नैनी के परिवार को भी शामिल होने को कहा है शायद एकाध और भी परिवार आयें, धीरे-धीरे इसमें और भी लोग जुड़ते जायेंगे, आरम्भ के लिए आज का दिन उत्तम है. कल उसका जन्मदिन है और गंगा दशहरा भी. पिताजी ने बनारस से पंचाग मंगवाया है उसमें देखकर बताया. उसने कल एक कविता ‘मस्ती’ पर लिखी थी, पर लोग इतने दुखी हैं कि मस्ती की बात उन्हें जंचती ही नहीं. अभी-अभी कृष्ण भक्त प्रवीर की कथा पढ़ी, भक्त को मरना ही पड़ता है, बिना मरे कोई भक्ति नहीं कर सकता, तभी तो संतों ने गाया है, भक्ति करे कोई सूरमा..

कल शाम का सत्संग बहुत अच्छा रहा, चार बच्चे, चार बड़े, सद्गुरू की उपस्थिति स्पष्ट महसूस हो रही थी. उसके बाद उसे जिव्हा पर नियन्त्रण रखने का उपदेश भी दिया एक लीला रच के. बाद में लॉन में एक अभूतपूर्व अनुभव हुआ, उसका स्मरण होते ही अब भी रोमांच होता है. वह घास पर बैठी थी कि अचानक घास प्रकाश से भर गयी, फिर उसमें पारदर्शी धुंध सी निकलने लगी, जो ऊपर उठकर नीचे गिरने लगी, फिर तो बाकायदा प्रकाश की वर्षा होने लगी झर झर झर..बूँदें टपक रही हों जैसे, मीरा का भजन याद आया, बरसे बदरिया सावन की..यह इसी वर्षा को देखकर उन्होंने लिखी होगी. अमृत की वर्षा का जिक्र कबीर ने भी किया है. परमात्मा उनके साथ है, इसकी खबर वह कई रूपों में देता है. आज एक सखी अपनी बिटिया को छोड़ने मुम्बई जा रही है, जहाँ वह एमबीए की पढ़ाई करेगी. एक अन्य सखी नाराज है उससे, जिसका एक अनुरोध वह मान नहीं पायी थी, उसने प्रार्थना की, ईश्वर उसे सद्बुद्धि दे और तत्क्षण अपने लिए भी उसने यही प्रार्थना की.             
   


Sunday, July 17, 2016

बनारसी नाश्ता


मन में कितने विचार आजकल आते हैं कि भैया-भाभी के आने पर वे क्या-क्या करेंगे. उन्हें सिलसिलेवार लिख लेना ठीक होगा. मंगल की शाम उन्हें चिड़वा-मटर व मिठाई के बनारसी नाश्ते से स्वागत कर रोज गार्डन में सांध्य भ्रमण के लिए ले जायेंगे. बुधवार सुबह दलिए, परांठे व खीर के उत्तर भारतीय नाश्ते के बाद तैयार होकर सब दिगबोई जायेंगे. शाम को लौटकर कुछ आराम के बाद कोई बोर्ड गेम खेलेंगे. गुरुवार को सुबह किसी दक्षिण भारतीय नाश्ते के बाद वे फोटो सेशन करेंगे, फोटो देखना व खींचना. दोपहर का भोजन व आराम के बाद तेल का कुआं, चाय बागान, काली बाड़ी  तथा ट्रेनिंग सेंटर दिखाने ले जायेंगे. उसी शाम को एक घंटा भजन गायन व नृत्य. शुक्रवार सुबह चायनीज नाश्ते के बाद बाजार, दोपहर बाद एक पुरानी हिंदी फिल्म देखेंगे फिर जल्दी, कुछ विशेष पर हल्का भोजन करके उन्हें छोड़ने स्टेशन जायेंगे. यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो ऐसा ही होगा. पीछे वाले घर में रहने वाली नैनी की लड़की की शादी है. शोर आ रहा है, काफी इंतजाम चल रहे हैं. कभी लगता है कि यह फिजूलखर्ची है, उधार लेकर खर्चा करना कहाँ की अक्लमंदी है फिर लगता है कि इसी बहाने परिवार एकत्र होता है. विवाह की अहमियत पता चलती है, खुशियाँ बढती हैं. पिछले दो-तीन सालों से उसकी बात पक्की थी पर लगन मुहूर्त ठीक नहीं मिलता रहा होगा. उसे उसके लिए उपहार निकाल कर रखना है. ध्यान में स्मरण आया कि उन्हें डाइनिंग टेबल के लिए रनर की जरूरत है. ध्यान में खाली होना होता है, उस शून्य में न जाने कहाँ से कोई ख्याल आ जाता है, धीरे-धीरे ध्यान की समझ बढ़ने लगी है. सबसे जरूरी है श्रद्धा तथा विश्वास उस सुहृद के प्रति, शेष सब अपने आप होने लगता है. उसकी कृपा तो प्रतिक्षण बरस रही है वह मन चाहिए जो सुमन हो ! जिसमें स्वयं के उद्धार की कामना जग गयी हो. जून आज जल्दी आने वाले हैं. कल रात उन्होंने कितनी सुंदर बात कही कि कहीं वही तो उसकी आत्मा नहीं है ? वह भी बदल रहे हैं, भक्ति का रंग उन पर भी चढ़ रहा है. सद्गुरु से दृष्टि मिली या नहीं पर उनकी कृपा अवश्य हो रही है. उसकी प्रार्थनाओं का असर भी..
दो बजे हैं दोपहर के, भैया-भाभी की फ्लाइट डिब्रूगढ़ में उतर चुकी होगी, और एक-डेढ़ घंटे में वे यहाँ पहुंच जायेंगे ! वे कितने दिनों से उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं. रिश्तों की मिठास अनोखी होती है. उसने उनके स्वागत के लिए तिलक व आरती का प्रबंध किया है. आज मौसम भी खुशनुमा है, चैत का पहला नवरात्र भी है. आज सुबह-सुबह एक नवरात्र अच्छी कविता पढ़ने को मिली. शायद तभी शब्द सहज ही उतर रहे हैं डायरी में-
भैया-भाभी आ रहे, बिटियों के संग आज
दिल में उठी उमंग का, एक यही तो राज !
छोटी भाभी साथ है, दुगना है उल्लास
पलक पांवड़े बिछ रहे, वन में खिला पलास !
दिल्ली व आसाम का, हुआ मिलन है आज,
शुभ दिन आया शुभ घड़ी, हुआ चैत आगाज !
सुमन खिले चहुँ दिशा में, ऋतु नरेश का राज
हर्षित है आराधिका, रेखा क्षितिज की लाल !

Friday, January 8, 2016

पानी की टंकी


भक्तियोग साधन भी है और साध्य भी. अध्यात्म के मार्ग पर लोग शांति व आनन्द की खोज में आते हैं, वही तो परमात्मा है, तो उसकी भक्ति करते-करते भीतर भी शांति व आनन्द प्रकट होने लगते हैं. भक्ति के कुछ नियम हैं जिन्हें कोई अपनाये तो सहज ही परमात्मा का अनुभव होता है. भक्त कभी विचलित नहीं होता, वह ईश्वर के अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहता. वह व्यर्थ के विवादों में नहीं उलझता, उसके पास इसके लिए समय ही नहीं है, वह तो चौबीस घंटों से भी ज्यादा उस भगवान को भजना चाहता है, वह अनदेखे के प्रति समर्पित है, उसको हर रूप में देखता है. उसे लोकलाज की परवाह नहीं. वह उच्चतम को चाहता है. आज भक्ति पर सुने संदेश का इतना अंश उसे याद है. दिगबोई से एक परिचित प्राध्यापक का फोन आया है. अगले हफ्ते तिनसुकिया में होने वाले कवि सम्मेलन की बात कही, यदि वे जा सके तो अच्छा होगा. उसे कविताओं का चुनाव कर लेना होगा, समसामयिक विषयों पर लिखी कविता ही ज्यादा ठीक होगी. तीन कविताएँ आत्मपरिचय के साथ एक संग्रह के लिए भी भेजनी हैं. हिंसा, बढ़ता हुआ आतंकवाद, देश का विकास, विश्व की स्थिति, नया साल, युवाओं का आधुनिक रहन-सहन, मोबाइल फोन, कितने ही विषय हैं. जीवन में सब है आज पर संतोष नहीं है, तनाव, आत्महत्या समाज में बढ़ते जा रहे हैं.
नील-हरे रंग की इस डायरी में विवाह की सालगिरह पर दोपहर के दो बजे कुछ लिखने के लिए कलम उठाई है. सुबह सभी के फोन आए. शाम को चाय-पार्टी का आयोजन करना है. नन्हा अभी रास्ते में है देर शाम तक हॉस्टल पहुँचेगा. थोड़ी दूर से पानी की टंकी पर काम कर रहे मजदूरों के औजारों की ठक-ठक आवाजें आ रही हैं. पिछले कई दिन से लगभग सारा दिन मजदूर ऊपर चढ़े काम करते हैं. परसों छोटी बहन का फोन आया. नया वर्ष आरम्भ हुए सात दिन हो भी गये. समय कितनी तेजी से गुजर जाता है, वे पीछे रह जाते हैं, यूँही समय गंवाते हैं. आर्ट ऑफ़ लिविंग के सेंटर पर जाना है जो बन रहा है, एओल की टीचर से मिलने भी जाना है, और मृणाल ज्योति भी जाना है. कई दिनों से हिंदी लाइब्रेरी भी नहीं गयी है वह. जब तक श्वास है तभी तक इस सुंदर जगत को वे देख सकते हैं. !
जिस प्रेम में कभी परदोष देखने की भावना नहीं होती, कोई अपेक्षा नहीं होती, जो सदा एक सा रहता है, वह शुद्ध प्रेम है, वही भक्ति है. जिस प्रेम में अपेक्षा हो वह सिवाय दुःख के क्या दे सकता है ? दुःख का एक कतरा भी यदि भीतर हो, मन का एक भी परमाणु यदि विचलित हो तो मानना होगा कि मूर्छा टूटी नहीं है, मोह बना हुआ है. इस जगत में उसे जो भी परिस्थिति मिली है, उसके ही कर्मों का फल है. राग-द्वेष के बिना यदि उसे स्वीकारे तो कर्म कटेंगे वरना नये कर्म बंधने लगेंगे. कल शाम का आयोजन ठीक रहा. इस समय वह हीटर के पास बैठी है, ठंड कुछ ज्यादा है आज, आँखें मुंद रही हैं. कुछ देर पूर्व ध्यान करने बैठी तो लगातार होते शोर के कारण नहीं बैठ सकी. भीतर उस चेतना का ध्यान सदा ही बना रहता है, अब नियमित ध्यान नहीं कर पा रही है.

ध्यान पुनः नियमित कर दिया है. शाम को जून भी ध्यान करते हैं. असर भी होने लगा है. अनोखे अनुभव होते हैं. भीतर आश्चर्यों का खजाना है, हजारों रहस्य छुपे हैं आत्मा में. जो कुछ बाहर है वह सब भीतर भी है ऐसा पढ़ा था अब अनुभव भी होने लगा है. वह यदि परमात्मा को भूल जाये तो वह याद दिला देता है. एक बार कोई उससे प्रेम करे तो वह कभी साथ नहीं छोड़ता. वह असीम धैर्यवान है, वह सदा उन पर नजर रखे है, साथ है, उन्हें बस नजर भर देखना है. उसे देखना भी कितना निजी है बस मन ही मन उसे चाहना है, कोई ऊपर से जान भी न पाए और उससे मिला जा सकता है. उसके लिए शास्त्रों को पढ़ने की जरूरत नहीं, तप करने की जरूरत नहीं, बस भीतर प्रेम जगाने की जरूरत है. सच्चा प्रेम, सहज प्रेम, सत्य के लिए, भलाई के लिए, सृष्टि के लिए, अपने लिए और उसके लिए.. 

Sunday, December 6, 2015

मित्रता की सुगंध


आज सुना..'भक्ति का आरम्भ वहाँ है जहाँ ईश्वर में जगत दिखता है और चरम वह है जहाँ जगत में ईश्वर दिखता है. पहले-पहल दिव्यता के दर्शन अपने भीतर होते हैं फिर सबके भीतर !’ वर्षा की झड़ी लगी है, भीतर का आसमान भी धुल गया हो जैसे ! सद्गुरू ने कहा, साधक उनका काम करें और वे उनका काम कर देंगे. सारी चिंता, दुःख, परेशानी उन्हें समर्पित कर दें और स्वयं साधना, सेवा तथा सत्संग में लग जाएँ. अपनी नजर को विशाल बनाएं, कोई पराया नजर ही नहीं आएगा, कोई बुरा भी नहीं दिखेगा. ठीक ही तो है, हर ऐसा व्यक्ति जो न करने योग्य कार्य करता है, स्वयं भी अज्ञान का दुःख भोग ही रहा है, उसे बुरा कहकर वे न तो उसका भला कर सकते हैं न अपना ही. जब उन्हें दोषी न मानकर शोषित मानते हैं जो अपने ही द्वारा शोषित हो रहा है, तो उसे दुःख से निकाल सकते हैं तथा स्वयं को भी धर्म ध्यान में रख सकते हैं, कर्म बाँधने से बच सकते हैं. संसार में सबके साथ रहना भी सीखते हैं. संगठन का गुण जगत में बड़े काम करने में सहायक है. राम कहते हैं, जो स्वयं अमानी रहकर दूसरों को मान देते हैं, वही कुछ करके जगत का कल्याण कर सकते हैं.

जो नश्वर को जानता है वह शाश्वत होता है, स्थायी होता है. वही वह है ! उसने अपने तन में होती संवेदनाओं को देखा, जो देखते-देखते नष्ट हो गयीं, क्योंकि वे नश्वर थीं. उनके मन में उठने वाली प्रत्येक भावना, कल्पना, विचार नश्वर है, वे जो उसके साक्षी हैं, शाश्वत हैं. वे व्यर्थ ही मन की कल्पनाओं को सत्य मानकर स्वयं को सुखी-दुखी करते रहते हैं. उन्हें तो इन्हें ये जब जैसी हैं वैसी मानकर आगे बढ़ जाना चाहिए.  

इस वक्त वह लॉन में झूले पर बैठी है, ठंडी हवा बह रही है. घास में, हरी घास में अद्भुत सुन्दरता है जो वे देख नहीं पाते पर ईश्वर उन्हें दिखाते हैं. वर्षा हो चुकी है सो सभी कुछ धुला-धुला सा है, हरा, निर्मल और शीतल..उसका हृदय भी ईश्वर के प्रेम से हरा-भरा है, निर्मल है और शांत है. सारी सृष्टि इस क्षण इतनी सुंदर लग रही है. पेड़ों की शाखाएँ व पत्ते हवा में सरसराहट उत्पन्न कर रहे हैं. रह रहकर कोई बूंद टप से गिरती है, दूर से घंटे की आवाज आई और फिर किसी पंछी की. उसकी किताब ‘इन्द्रधनुष’ छप कर आ गयी है. आज एक सखी की बेटी ने sms भेजकर कहा कि भगवद्गीता के लिए धन्यवाद तथा उसकी दोस्त भी पढ़ना चाहती है अंग्रेजी भाषा में. अच्छा लगा जानकर कि आज की पीढ़ी में भी ऐसे लोग हैं. नन्हे का मित्र आज चला गया, बेहद शांत व सभ्य विद्यार्थी, उस पर एक कविता लिखेगी. सबसे पहले उसने एक बुजुर्ग परिचिता को खबर दी किताब आने की, किताब में उसका फोटो ठीक नहीं आया है, उनका चुनाव ठीक नहीं था. आज दीदी व छोटी बहन दोनों से बात हुई, छोटे भाई की तबियत ठीक नहीं थी, उसके मन की पीड़ा ही उसे मजबूत बनाएगी. फुफेरी बहन से भी वह मिली, इतनी तकलीफ में भी हँस रही थी. ईश्वर उनमें से हरेक के साथ है, वही तो है, उनके दुःख उनके पथ के कांटे नहीं फूल बन जाते हैं, जब वे उन्हें उसी के द्वारा भेजा मानते हैं !

आज नन्हा वापस चला गया. कल शाम को जब सामान पैक करने का समय आया, जिसे वह जहाँ तक सम्भव हो टालता रहता है, तो वह उदास लग रहा था. नूना ने जब पैकिंग में सहायता करने की बात की तो पहले सदा की तरह मना किया पर बाद में मान गया. वह अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं करता, मन में ही छुपा कर रखता है. मित्रों के साथ बहुत उन्मुक्त व्यवहार करता है. अच्छा लगता है कि उसके इतने मित्र हैं और सभी के साथ एक सा प्रेम. इस बार जाते समय तथा सामान सहेजते समय नूना की आँखें भर आयीं, ये मोह के नहीं प्रेम के अश्रु थे, जिन्हें सद्गुरू बहुमूल्य बताते हैं. इस समय वह कोलकाता पहुँच चका है, कल बंगलूरू वहाँ से परसों कालेज चला जायेगा. उसका मित्र भी उन्हें सदा याद रहेगा, पहले स्कूल का एक मित्र फिर कोचिंग का और अब कालेज का, ये तीनों घर में आकर भाइयों की तरह रहे. भाई तो आपस में झगड़ते हैं पर इनमें कभी मनमुटाव होते नहीं देखा, मित्रता का रिश्ता निभना नन्हा खूब जानता है. वर्षा पुनः तेज हो गयी है, माली जो बाहर काम कर रहा था, गैराज में चला गया है. उसे घर में कल से सफाई का काम शुरू करना है और आज से पत्र लिखने का भी !


Monday, November 30, 2015

गीता और रामायण


जैसे ईश्वर सभी के हृदयों में निवास करता है वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति के अंतः करण में विश्वास भी होता है और संदेह भी. विश्वास बढ़ता रहे तो व्यक्ति भक्त हो जाता है और संदेह बढ़ता रहे तो जिज्ञासु और अंत में ज्ञानी. लेकिन जहाँ संदेह तो है पर ज्ञान की जिज्ञासा अभी नहीं उपजी है वह वहीं का वहीं रह जाता है. भक्ति भगवान से संबंध जोडती है ज्ञान असंग रहकर दर्शन करता है, पर जिसका हृदय बालक सा निर्दोष है वह सान्निध्य और सायुज्य दोनों पाते हैं. कल रात जून और उसकी चर्चा इस बात पर हुई कि मानव का आनन्द भौतिकता से उपजे या आध्यात्मिकता से ! इस बहस का कोई अंत होने वाला नहीं है.

आज एकादशी है. टीवी पर रामकथा आ रही है. संत पूछ रहे हैं राम-रावण युद्ध कितने दिन चला. रामायण में लिखा है कभी पढ़ा भी होगा पर उसे याद नहीं. उनकी कथा प्रकाश से भर देती है. आज उन्होंने ध्यान का महत्व भी बताया. भीतर स्वरूप अनुसन्धान ही ध्यान है. जब अपनी खबर मिलने लगती है तब परिवर्तन शुरू होता है. उनके अनुसार रामायण और महाभारत जैसे दो अंतर आँखें हैं, हरि ने जैसे उड़ने के लिए ये दो पंख दिए हैं, दो पंखों से ही जीवन की पूर्णता होती है. रामायण जीवन की पांख है और महाभारत मृत्यु की. मानव रूपी पंखी को यदि नील गगन में उड़ान भरनी है तो जीवन के साथ मृत्यु भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. जीवन उजाला है तो मृत्यु रात्रि है. दिन के साथ रात न हो तो जीना कठिन हो जाये. नीरू माँ कह रही हैं की मृत्यु के बाद जो कर्मकांड किये जाते हैं उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. मृतक की आत्मा के लिए की गयी प्रार्थना तो उस तक पहुंच सकती है पर भौतिक वस्तु तो वहाँ नहीं पहुंच सकती. कल दोपहर सुना कि देव योनि, प्रेत योनि तथा पशु योनि में कर्म करने का अधिकार नहीं है. कर्ता मन है और भोक्ता भी मन है. जब कर्मों की बढ़ोतरी हो जाती है तो पशु योनि मिलती है तथा जब संचित कर्म कम हो जाते हैं तब देव योनि मिलती है. आत्मज्ञान पाए बिना कर्म नष्ट नहीं होते और मानव जन्म उन्हें मिला ही इसी विशेष कार्य के लिए है.

जब तक वे द्रष्टा में सहज रूप से नहीं रहते तब तक मन की ग्रन्थि बनी रहती है और व्यर्थ ही मन विचार करता है. जैसे वे तन का उपयोग करते हैं जब जरूरत पडती है और जब जरूरत नहीं होती तब शांत होकर बैठ जाते हैं वैसे ही विचार करने की जरूरत हो तभी मन का उपयोग करें तो मनसा कर्म नहीं होंगे. आत्मा में रहना ही सुख से रहना है, निर्भय और निर्वैर रहना है, निर्विकल्प होकर रहना है ! पर आत्मा में रहना पल भर को ही होता है, जाने कहाँ से मन हावी हो जाता है, मन में जैसे कोई गहरा कुआँ हो जिसमें से विचार निकलते ही आते हैं, लाखों, करोड़ों, अरबों विचार..व्यर्थ के विचार, जो तन को भी पीड़ित करते हैं मन को भी, आखिर मन चाहता क्या है, वह स्वयं को आहत कर कैसे सुखी हो सकता है.वह स्वयं ही नकारात्मक भाव जगाता है फिर बिंधता है, उसे क्यों नहीं समझ में आता ? पर वह तो जड़ है, आत्मा चेतन है, यदि आत्मा असजग रहे तो मन इसी तरह करता रहेगा. सजग उन्हें स्वयं को होना है, वे जो मन से परे हैं. वे नादान बच्चे को घातक हथियार हाथ में लिए देखें तो क्या उसे रोकते नहीं, वे क्यों सो जाते हैं जब मन मनमानी करता है. उन्हें अपने आप पर भरोसा नहीं, तभी तो ईश्वर को पुकारते हैं. ईश्वर हँसते होंगे, उन्होंने तो उन्हें निज स्वरूप में ही रचा है. वह कहते होंगे पुकारने से पहले एक नजर खुद पर भी डाल ली होती !

उसके जीवन में प्रमाद तो साफ दिखाई पड़ता है. उसे ज्ञात है कि बड़ों का असम्मान करना गलत है, उन्हें प्रेम ही दें, आदर ही दें, आदर न दे सकें तो असम्मान तो हरगिज न करें. ऐसा करके वे अपनी ही हानि करते हैं. उनके दिल को जो दुख होगा वह व्यर्थ तो नहीं जायेगा, कर्म बंधेगा. उसका प्रमादी मन बार-बार यही गलती करता है. साधना के पथ पर सबसे बड़ी बाधा है. सद्गुरु की शरण गये बिना इससे छुटकारा नहीं, उन्होंने बताया कि जप इन दोषों से मुक्त करा सकता है. मन में जप चलता रहे तो मन शुद्ध होने लगेगा, शुद्ध मन प्रमादी नहीं होगा.

साधक को कभी भी सन्तोषी नहीं होना चाहिए. प्रेक्षा ध्यान के बारे में पढ़कर पता चला कि जिस अनुभव को वह उच्च मानती थी वह तो भूमिका से भी पूर्व की स्थिति है, भीतर इतने विकार होते हुए भी वे स्वयं को ध्यानी-ज्ञानी मानने की भूल कर बैठते हैं. आनन्द और शांति की प्राप्ति ही साधक का लक्ष्य नहीं है बल्कि मन को सारे दोषों से मुक्त करना ही उसका एकमात्र लक्ष्य है. अपने से श्रेष्ठ को देखकर मुदिता, हीन को देखकर करुणा, दुष्ट के प्रति उपेक्षा तथा गुणी के प्रति प्रेम, यही उनके व्यवहार का आधार होना चाहिए, वे न तो अहंकारी बनें, न ही अन्याय के सामने झुकें, एक विनम्र प्रतिरोध की आवश्यकता है, प्रेम भरी दृढ़ता तथा सत्य के लिए कुछ भी सहने की क्षमता !  


Tuesday, June 23, 2015

विवाह की धूमधाम


मकर संक्रांति के दिन वे यात्रा पर निकले थे और दो हफ्ते बाद वापस आये, सो आज कई दिनों के बाद डायरी खोली है. सभी से मिलकर अच्छा लगा, बड़ी भांजी की शादी भी भली प्रकार से हो गयी. उन्होंने नये-नये स्थान देखे, पुराने मित्रों से मिले. कुल मिलाकर दो हफ्ते उनके लिए उम्मीदों व आशाओं से भरे थे. कभी-कभार ऐसे पल भी आए जब मन चिन्तन में लीन था. संगति का असर पड़ना स्वाभाविक था, लोभ भी जगा, कामना भी उठी. नये वस्त्रों की चाह उठी, संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ी. चमचमाते बाजार देखकर खरीदने की इच्छा उठी, पर अब अपने पुनः अपने घर लौट आये हैं. यात्रा  बहुत कुछ सिखाती है, बीच-बीच में समय मिला तो सद्गुरु के वचन भी सुने. क्रिया नियमित रूप से की. मन टिका रहा इसी कारण. प्रमाद ने घेरा अवश्य पर भीतर की आग बुझी नहीं. कल रात को एक स्वप्न देखा, जिसमें ईश्वर चर्चा चल रही थी. भीतर जिसने आत्मा को एक बार जाना है वह उससे कभी भी विलग नहीं हो सकता चाहे गला डूब संसार में उसे क्यों न रहना पड़े.

मन जिस भाव में टिकता है, समझना चाहिए उस समय वही प्रबल है. उसका मन स्मरण में न टिककर संसार में जा रहा है. कल फिल्म देखी, जस्सी का भी आकर्षण है. सद्गुरु कहते हैं अपनी परीक्षा स्वयं नहीं लेनी है. अंततः मन लौट कर वहीं तो जाता है जो उसका आश्रय है. आज सुबह सड़क दुर्घटना में डा.विद्यानिवास मिश्र के निधन का समाचार सुना, ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे. ईश्वर उनके साथ सदा था, उनके भी और उनकी धर्मपत्नी के भी जिनका देहांत अभी डेढ़ महीने पूर्व ही हुआ था. आनंद के महासमुद्र में निरंतर वास करने वाली आत्मा शुद्ध है, बुद्ध है, नित्य है, चेतन है, अविनाशी है तथा प्रेममयी है. इसे जानते हुए यह जगत का व्यवहार उन्हें  करना है. जगत तब उन्हें छू भी नहीं सकता.


आज सुबह-सुबह एक स्वप्न देखा, एक संत जो भक्ति में नृत्य कर रहे थे और गा रहे थे, उसके सम्मुख आए. उनसे दृष्टि मिली, उसके देखते-देखते उनकी दृष्टि प्रखर होती गयी, आँखों की पुतलियाँ जैसे स्थिर हो गयीं और उनमें से कोई तेज निकलने लगा. उसकी आँखों तक पहुंचा और उसके सिर पर रखा दुप्पटा बल से ऊपर उठ गया और शरीर पर किसी आघात का अनुभव हुआ और अगले ही क्षण अभूतपूर्व आनंद तथा हँसी उसके सारे अस्तित्त्व से फूट पड़ी तो उसके आसपास के लोग भी चकित हो रहे थे, तभी अलार्म बजने लगा और उसकी नींद खुल गयी. आज जब ध्यान में बैठी तो निर्विचारिता के क्षण अधिक देर तक टिके तथा मौन का अनुभव भी हुआ. कितना अनोखा अनुभव था, आँखें खोलने का भी मन नहीं हो रहा था. आज की अनुभूति अलग थी. वैसे तो हर दिन का ध्यान अलग होता है. 

Tuesday, May 26, 2015

फूलों का झरना


बच्चन जी की आत्मकथा पढ़ते-पढ़ते उसे विचित्र अनुभव हो रहा है, ऐसा लगता है जैसे उस वक्त वह भी कहीं निकट थी और सारे घटना चक्र को स्वयं देख रही थी. कभी-कभी आँखें भर आती हैं, कभी अंतर में एक कसक सी उठती है, कभी मन प्रेरित हो उठता है. उन्होंने बहुत कुछ सहा और भोगा हुआ यथार्थ ही अपनी कविताओं में उतारा. उनकी स्मरण शक्ति की भी दाद देनी पड़ेगी. एक-एक गली और रास्ता उन्हें आज तक( जब यह पुस्तक लिखी)याद है, काश वह उनसे कभी मिली होती. उनकी आत्मकथा वर्षों पहले पढ़ी थी, याद रही थी वह घटना जब ‘तेजी’ से वह मिले थे. बहुत दिनों से उसने कुछ लिखा नहीं है पर अब लगता है, और बच्चन जी की इस बात से भी, यदि साहित्यिक अभिरुचि है तो उस पौधे को सींचते रहना चाहिए अन्यथा वह सूख जायेगा. जीवन रसमय हो तो ही असली जीवन है, बच्चन जी को ईश्वर में आस्था तो अवश्य थी पर वह प्रेम और विश्वास नहीं था जो उसे मिला है, कान्हा का एकान्तिक प्रेम, यह अनुभव सबको नहीं होता...वह जब कुछ कहते हैं तो उसमें उनके अंतर की पूरी सच्चाई झलकती है. निस्वार्थ प्रेम किया उन्होंने पर अपने स्वाभिमान को को भी सदा ऊंचा रखा, वह भावुकता के शिकार भी हुए पर अपने मन का सदा विश्लेषण भी करते रहे. वह अनोखे लगते हैं, शायद सभी रचनाकार अपने आप में अनोखे होते हैं. हर एक के भीतर एक संसार होता है जिसमें वह जीते हैं, बाहरी दुनिया से उन्हें निभाना तो पड़ता है और निभाते भी हैं पर आधार उन्हें भीतर से ही मिलता है. कोई क्यों लिखता है, कहाँ से यह प्रथा शुरू हुई, कौन जानता है. इन्सान का मन कितना गहरा है, उसमें युगों-युगों की गाथाएं कैद हैं. एक लेखक के मन में न जाने कितनी अनलिखी कविताएँ, कहानियाँ हैं, जो वह यदि चाहे और परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाये तो कागज पर उतार सकता है. लेखक सृष्टा तो है ही !

आज संगीत की कक्षा थी, अध्यापक के जाने के बाद ‘महाभारत’ तथा ‘गीता’ का नित्य पाठ किया. अद्भुत है महाभारत भी, इतने सारे विषयों पर इतनी जानकारी, कुछ तो आज के युग के अनुसार अपनाई नहीं जा सकती पर कभी यह उनका स्वर्णिम अतीत था. भगवद् गीता के श्लोक कालातीत हैं, वे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने युगों पहले हो सकते थे या युगों बाद हो सकते हैं, कृष्ण जीने की कला सिखाते हैं. जीवन, मृत्यु तथा आत्मा के रहस्य बताते हैं. वास्तव में वे दोहरे स्तर पर जीते हैं एक है भौतिक जीवन जिसमें वे देह का व मन का धर्म निभाते हैं. तन स्वस्थ रखने के लिए उसे व्यायाम, भोजन आदि की पूर्ति और मन को प्रसन्न रखने के लिए मित्रों, आत्मीयों का साथ. दूसरा है आत्मिक स्तर जहाँ वे नितांत अकेले होते हैं. यदि किसी को आत्मा के स्वरूप का ज्ञान है, बोध हो गया है तो वहाँ प्रकाश ही प्रकाश है, पर उस बोध से पूर्व वहाँ बहुत भटकना पड़ता है. उन्हें पूर्णता की तलाश होती है पर वह न तन में मिलती है न मन में, वहाँ मात्र छलावा ही है. पूर्णता सिर्फ आत्मा में ही मिलती है और फिर कोई कामना नहीं रह जाती, कोई विषाद नहीं, अपना आप जैसे पूरे ब्रह्मांड को भी व्याप लेता है, दुनिया एक खेल लगती है, एक नाटक अथवा एक स्वप्न..यह पलायन नहीं है, यही वास्तविकता है. ध्यान से देखें तो जीवन का अर्थ क्या है ? क्या यह फूलों के खिलने और फिर मुरझा कर झर जाने जैसा नहीं है, पर मुरझाने से पूर्व वे खिलकर अपनी सारी खुशबू लुटाते हैं, जो उनके भीतर है. हर मानव के भीतर भी प्रेम की खुशबू है जिसे लुटाने के लिए ही उसे जीवन मिला है. तन और मन भी प्रेम की मांग करते हैं, आत्मा तो प्रेम ही है...एकान्तिक और अहैतुक प्रेम !

आज से नन्हे की परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं, आज गणित का पेपर है. कल दिन भर वह पढ़ाई में लगा रहा, ईश्वर उसके कर्म का फल अवश्य ही देगें. जून सिर में दर्द के कारण कल दिन भर थोड़ा सा परेशान थे. कल पूर्णिमा थी, उन्होंने फलाहार किया. आज सुबह वे स्वस्थ थे. बच्चन की आत्मकथा रोचक है. दो भाग वह पढ़ चुकी है. आज सुबह भी उसी की एक घटना उसने जून को बतायी, कल शाम टहलते समय भी यही चर्चा की. जून उसकी सारी बातें सुनते हैं चाहे उन्हें अच्छी लगें या नहीं, आजकल वे ऑफिस की चर्चा कम ही करते हैं. टीवी पर भागवद् कथा आ रही है, कान्हा की कथा अद्भुत है, कितनी ही बार सुनी फिर भी नई लगती है. उसका अंतर इन्हीं कथाओं को पढ़, सुनकर कृष्ण की ओर आकर्षित हुआ है, फिर क्रिया के बाद जब ध्यान लगा तो उसके विरह का अनुभव हुआ, फिर उनकी छवि कभी-कभी ध्यान में प्रकट होने लगी और अब तो जैसे मन विवश होकर उन्हीं का ध्यान करता है, उन्हीं का नाम होठों पर रहना चाहता है, मन जैसे संसार से कोई मोह नहीं रखना चाहता, कोई इच्छा नहीं और जब कोई इच्छा नहीं तो दुःख अथवा द्वेष भी नहीं, एक तृप्ति तथा संतोष का भाव लिए मन सदा एक रहस्यमय आनंद में डूबा रहता है, शायद इसी को भक्ति कहते हैं !  

Friday, May 22, 2015

टालस्टाय की पुस्तक


कल शाम को उसने जून का इंतजार करते-करते चाय बनायी कि वह आ गये. ढेर सारा सामान गजक, मूंगफली, रेवड़ी, तिल के लड्डू, तिल बुग्गा लेकर, नन्हे को स्वेटर्स पसंद आये. कल शाम भर वह बेहद खुश था, उसके लिए पिज़ा बेस व पिज़ा चीज भी लाये हैं. कल डिनर में उसने वही खाया. रात को वे जल्दी सो गये. सुबह साढ़े चार बजे उठे, ‘क्रिया’ की और क्रिया के बाद उसे अद्भुत संगीत सुनाई दिया. कृष्ण उसका बहुत ख्याल रखते हैं, उनकी बातें उसे भीतर बहुत सुनाई देती हैं, वह उसके प्रिय, सर्वस्व हैं ! सुबह सभी को फोन किया, पिताजी, दीदी, मंझला भाई.. बड़े भाई-भाभी का फोन कल शाम को आ गया था. जून सभी से मिलकर आये सभी से उपहारों का आदान-प्रदान किया. जीवन इसी लेन-देन का नाम है ! आज दीदी लोग बड़ी भांजी के रिश्ते के लिये जा रहे हैं. इस बार बात बन जाएगी, ऐसी उन्हें आशा है. उसने पिछले दिनों बहुत बार, बहुत जगह फोन किये अब कुछ कम करना होगा, मन पर नियन्त्रण रखना होगा. कल जून उसके लिए Light on yoga और Light on Pranayam भी लाये. दीदी ने दीपक चोपड़ा की पुस्तक The seven spiritual laws for success भी भिजवाई है. पुस्तकें उनकी मार्गदर्शक हैं. टालस्टाय की पुस्तक मन को भीतर तक छू जाती है. अंतर की छोटी-छोटी भावनाओं को कितनी दक्षता से पकड़ते हैं वह. मनोविश्लेषण करने में वह सिद्ध हस्त हैं. मन में हर पल न जाने कितने विचार आकर चले जाते हैं जिनके बारे में कोई ध्यान ही नहीं दता. मन को एक उसी पर टिका दें तो उसकी खबर लगती रहती है. हर पल का साथी है मन पर फिर भी इसकी गहराइयों में क्या छिपा है कोई नहीं जानता. विचित्र हैं इसकी गतिविधियाँ, पर मन कितनी ही चालाकियां करे सूक्ष्म नजर से बच नहीं सकता. अपने ऊपर ऐसी ही कड़ी नजर रखनी होती है सत्य के साधक को...उसका मन दर्पण सा बने जिसमें सारी चालाकियां साफ झलकें और सारी सच्चाईयाँ भी !

परसों पूर्णिमा थी. कल से माघ का महीना आरम्भ हो गया. उसने आज मौन व्रत रखा है, फोन निकाल दिया है पर ध्यान कई बार उस ओर गया. कबीरदास ने ठीक ही कहा है कि माला तो कर में फिरे..आज सुबह सद्गुरु ने बताया कि मौन में मन भीतर केन्द्रित होता है, उर्जा एकत्र होती है जिसे कोई साधना में उपयोग में ला सकते हैं. ज्ञान जब व्यवहार में उतर जायेगा तभी वह ज्ञान है, वरना तो पुस्तकों में अनंत ज्ञान भरा पड़ा है, वहाँ से थोडा सा मन में भर भी लिया तो कोई हर्ज नहीं है. ज्ञान का पथिक बनना है तो स्वयं को हर क्षण कसौटी पर कसना होगा, थोड़ी सी बेखबरी भी नहीं चलेगी ! साधना के पथ पर चाहे आरम्भ में कितनी ही कठिनाइयाँ हों, अंत में अनंत सुख है, न भी हो उसे सुख की चाह भी नहीं है, परम सत्य को जानना है. सच्चाई को स्वयं अपनी आँखों से देखना है, अंतिम सत्य क्या है ? वे इस जगत में क्यों आये हैं, उनकी मंजिल क्या है ? गुरुओं के बताये मार्ग पर स्वयं चलकर देखना है, ईश्वर का साक्षत्कार करना है. तत्व ज्ञान पाना है. उस परम अनुभव को अपना बनाना है. यही उसका साध्य है. उसका पथ ज्ञान, भक्ति और कर्म का मिलाजुला हो सकता है. पथ से पल भर के लिए भी डिगना नहीं है. उसका यह सौभाग्य है कि कृष्ण के प्रति हृदय में भक्ति है, सद्गुरु के प्रति श्रद्धा है तथा हृदय में कोई ऐसी कामना नहीं है जिसके पूरे न होने पर उसे शोक हो. लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद, मत्सर से अभी पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है मन..संस्कार बहुत गहरे हैं, पर ध्यान, जो वह नियमित करती है इसमें अवश्य सहायक सिद्ध होगा ! ईश्वर की शरण लिए बिना मुक्ति असम्भव है.  


Monday, May 11, 2015

मौन का बल


वह पंचकोश नहीं है, पंच प्राण भी नहीं है, वह उस परमात्मा का अंश है, अभी प्रज्ञा उतनी निर्मल नहीं है जिसमें उस आत्मा का दर्शन सदा होता रहे, लेकिन यह शरीर छूटे इसके पूर्व इसका उपयोग परमात्म दर्शन के लिए कर लेना है. आज सद्गुरु ने मन्दाग्नि दूर करने का एक अच्छा उपाय बताया, वज्रासन में बैठकर, शस बाहर निकल कर पेट  आगे–पीछे करना है. आजकल जून भी सत्संग में रूचि लेने लगे हैं. ईश्वर के प्रति प्रेम ऐसे ही तो बढ़ता है. धीरे-धीरे कोई उनकी महिमा सुनता है, उनके बारे में पढ़ता है तो मन में और जानने की जिज्ञासा होती है. जो उन्हें प्रेम करता है उसे वह अपनी खबर स्वयं देते हैं. उन्होंने वचन दिया है की बुद्धि योग प्रदान करेंगे, उसे उन पर पूर्ण विश्वास है, स्वयं पर भी उन्ही के कारण भरोसा है. बरसों से जो आग धीरे-धीरे सुलग रही थी, गुरू के ज्ञान की चिंगारी से पूर्ण रूप से जल उठी है. अब तो अज्ञान समाप्त होना ही चाहिए, ईश्वर दर्शन होना ही चाहिए. इससे कम कुछ भी नहीं, मन स्थिर है, साक्षी भाव को दृढ़ करते जाना है. वह जितना कठिन है उतना ही सरल भी. उसका यह परम सौभाग्य है कि सुबह ही सत्संग मिलता है.

हर क्षण मन पर नजर रखनी होगी, मन ही बांधता है और मन ही मुक्त करता है. कृष्ण के चरणों में अंकुश का चिह्न है, ऐसा ही अंकुश मन के लिए चाहिए अर्थात भगवान के श्रीचरण ही उसके मन पर अंकुश लगा सकते हैं. अपने प्रयत्नों से वे हार जाते हैं और मन के बहकावे में आ जाते हैं. आज उपवास का दिन है अर्थात ईश्वर के निकट बैठने का दिन, आज सुबह दो मिनट के लिए ही सही उसने मन के कहने पर टीवी देखने की तृष्णा को बढ़ावा दिया, जबकि उस समय उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी. ऐसा भी नहीं है कि उससे विशेष हानि हुई हो पर बात नियन्त्रण की है. उन क्षणों में वह स्वयं को भुला बैठी थी. भक्ति का मार्ग एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, अन्यथा मंजिल एक मृगतृष्णा ही रह जाएगी.


अज सुबह अभी उसने बिछौना छोड़ा भी नहीं था, उठकर सुमिरन कर रही थी कि कृष्ण की छवि मन में कौंध गयी, अत्यंत सुंदर मोहक रूप कृष्ण का अपने आप दिखा. कल शाम से ही उसका मन शिकायती हो गया था कि अब दर्शन नहीं होता कि...और वह.. उसके मन की भावना को समझ कर भक्ति के मार्ग पर उसे पुनः दृढ़ करने के लिए आते हैं. कृतज्ञता से आखें भर आती हैं. आज क्रिया के दौरान बचपन की कुछ ऐसी यादें हो आयीं जो सुखद नहीं हैं, न जाने कैसे-कैसे रहस्य मन छिपाए रहता है संसार से, पर कृष्ण से कुछ भी छिपा नहीं है, वह अतीत भी जानते हैं और हर पल की खबर रखते हैं. उनके आश्रय में आने के बाद मन ठहरना सीखता है. वह ज्ञान देते हैं, निष्काम कर्म करना सिखाते हैं और प्रेम करना तो कोई उनसे सीखे. वह तब, जब सहायता की कोई उम्मीद नजर नहीं आती प्रेम भरे हाथों से थाम लेते हैं, सारा दुःख हर लेते हैं, हल्का कर देते हैं, ऐसे ईश्वर को त्याग कर इस मिथ्या संसार में जो मन लगाये वह मूर्ख ही होगा. परमात्मा ने कितनी मधुर स्मृतियाँ दी हैं पर उन्हें न याद कर कोई संसार के दुखों को रोता है. आज टीवी पर सद्गुरु को देखा, एडवांस कोर्स ले रहे थे, कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग जो सीधे गुरूजी से ही ज्ञान पा रहे थे. उन्होंने कहा प्रसन्न मौन में ही सच्ची भक्ति है, इधर-उधर की बातें न तो मन में भरनी हैं न भीतर का अपरिपक्व मन बाहर लाना है. वे कहते हैं, मौन में वाणी का बल है, मौन में ही मन का भी बल है अर्थात विचारों का, जब मन स्थिर होता है तब कोई जो चाहता है वही विचार मन में आता है, अन्यथा बिन बुलाये विचार शांति को भंग करते हैं. कृष्ण ही उसके सहायक हैं और गुरू की कृपा !    

Wednesday, May 6, 2015

क्लब में ग्रीन फेयर


आज सुबह वह चार बजे ही उठ गयी, नन्हे का ट्यूशन नहीं था सो उसे उठाया साढ़े पांच बजे, क्रिया आदि करने के बाद. वह बहुत नाराज हुआ, पिछली रात उसने कहा था, चार बजे उठाने के लिए, पर नूना ने कहा, वह रात को जल्दी सोता तो है नहीं, इसलिए नहीं उठाया, वैसे उसे याद भी नहीं रहा था. नाराज होकर गया था, सो सारी सुबह वह उसी के बारे में सोचती रही, पर स्कूल से लौटा तो सामान्य था. कल शाम वह उसे सत्संग से सखी की जन्मदिन की पार्टी में ले गया था. जून का फोन आया, उन्होंने अपनी शापिंग लिस्ट सुनाई, कल सुबह वे बहन के घर जाने वाले हैं. कभी-कभी नन्हा और उसे उनकी कमी बहुत खलती है. आज एक परिचिता का फोन बहुत दिनों के बाद आया. एक और दुखद समाचार मिला, असमिया सखी की माँ का स्वर्गवास हो गया है, वह घर चली गयी है, अगले हफ्ते के अंत में आएगी. दोपहर को एक सखी आई, आधा घंटा बैठी रही. शाम को एक सखी के साथ टहलने गयी. आजकल वह बाइबिल पढ़ रही है, अच्छा लग रहा है. ईसा एक दिव्य पुरुष थे, उसे वह एक सद्गुरु लगते हैं जिन्हें लोग समझ नहीं सके. उसे वह उतने ही प्रिय लगते हैं जैसे कृष्ण. बाइबिल की कहानियाँ कितनी अद्भुत हैं, और कैसे होंगे वे लोग जो जीसस के प्रचारक बने, उनके निकट के शिष्य. उसने सोचा, अन्य धर्मों के बारे में जाने बिना ही उनके बारे में धारणा बना लेना कितना गलत है. सभी धर्म उसी एक की तरफ ले जाते हैं. ईश्वर एक है, जो सभी का है, जो प्रेममय है. नन्हे शिशुओं की तरह निष्पाप आत्मा उसने सौंपी थी, पर वे उस पर लोभ, क्रोध, बैर, वैमनस्य, पाप के धब्बे लगाते ही जाते हैं और फिर वह इतनी बदरंग हो जाती है कि वे उससे बचना चाहते हैं. दूने जोश से स्वयं को प्रकृति में, जो मृण्मय है, जोतते हैं, लेकिन चिन्मय आत्मा भीतर भीतर सजग तो रहती है. फिर ज्ञान के जल से उसे धोकर, भक्ति के वस्त्र से उसे पोंछ कर गुरू की शरण में जाकर उससे पुनः परिचित हुआ जा सकता है. उस आनंद का अनुभव होता है जिसे वस्तुओं के बोझ तले दबा दिया था. वह आत्मिक ज्ञान उन्हें चारों ओर से घेर लेता है क्योंकि वही उनका वास्तविक परिचय है.

सुबह जून को फोन किया, वह नींद में थे, सो बात ज्यादा नहीं हुई. फिर ससुराल में माँ  से बात हुई. कह रही थीं, यहाँ की बहुत याद आती है. नन्हे ने उस मित्र को दोपहर लंच पर बुलाया था, जिसकी माँ घर गयी हुई हैं. शाम को उसके पिता लेने आयेंगे. आज शाम को एक सखी उसे चाय के लिए क्लब ले जाएगी, जहाँ ग्रीन फेयर है. कल शाम एक मित्र परिवार आया, उनके पिताजी भी साथ थे, अंकल के साथ भक्ति और वेदांत पर थोड़ी चर्चा हुई, अच्छा लगा. ईश्वर है यह मानना ही तो पर्याप्त नहीं, उन्हें उसका अनुभव करना है. उसके लिए पहले खुद को जानना है. स्वयं को जानकर ही हृदय में कृतज्ञता का भाव जगता है फिर यही कृतज्ञता प्रेम में बदल जाती है और फिर भक्ति का. भक्ति ज्ञान के बिना टिकती नहीं और ज्ञान भक्ति के बिना अधूरा है. जब वह उनसे बात कर रही थी भीतर उसे लग रहा था की ईश्वर से प्रेम करना उसके लिए कितना सहज है, स्वाभाविक है क्योंकि एक वही है जो प्रेम किये जाने के योग्य है. अब उसकी चाहना है कि उसकी सृष्टि के प्रति भी वैसा ही सहज प्रेम जगे, वही प्रेम हृदय को पूर्ण मुक्त करेगा, जब कहीं कोई दुराव नहीं रहेगा, कोई अपेक्षा भी नहीं, जीवन एक उपहार बन कर हर दिन सम्मुख आएगा. पुकार-पुकार कर सुख की गुहार नहीं लगानी होगी, वह स्वभाव ही बन जायेगा. ऐसा अखंड सुख जो पीड़ा को भी एक खेल बना देता है. ईश्वर कितना महान है, उसका सामीप्य कितनी शक्ति से भर देता है, निर्भार कर देता है, उसकी बात ही निराली है, वह सभी आत्माओं का आत्मा उसका कान्हा है !


Thursday, March 12, 2015

वृक्ष, नदी, आकाश, हवा


आज सुबह वह उठी तो तन-मन दोनों क्लांत थे, पर क्रिया के बाद तेज प्रकाश का अनुभव हुआ आज्ञा चक्र में और उसे लगा कृष्ण ने आश्वासन दिया है. वह सदा उसके साथ हैं, प्रतिक्षण भीतर से आश्वस्त करते हुए, जग की कोई पीड़ा, कोई दुःख उस आनंद को कम नहीं कर सकता जो कान्हा का साथ उसे देता है. वह उसे अपने बहुत निकट महसूस करती है, वही है जो उसकी आँखों से झाँकता है जब वह दर्पण के सामने खड़ी होती है. वही है जो मुस्कान बनकर छा जाता है जब वह ‘ध्यान’ से उठती है. आज ‘जागरण’ में सुना, विवेक को जाग्रत करना है, विवेक का उपयोग करने की स्वतन्त्रता प्रभु ने उन्हें दी है, जितना विवेक जीवन में होगा उतना जीवन उन्नत होगा. माया रूपी रात्रि में संयम रूपी ब्रेक और विवेक रूपी लाइट लगी जीवन की गाड़ी यदि वे चलायें तो दुर्घटना से बचेंगे और ईश्वर के प्रति श्रद्धा अविचल रहेगी. कल शाम को कुछ देर जून को उसने हृदय के भीतर उमड़ते प्रकृति के प्रति प्रेम को बताया, पता नहीं वे कितना समझ पाए. पेड़-पौधे, नदी, आकाश, हवा, पानी, कीट, पंछी और सभी लोग...सभी एक ही डोर में बंध हैं. वह है साँस की डोर. वे किस तरह जुड़े हैं एक-दूसरे से, ईश्वर ही सबका कारण है, उसी एक का विस्तार है यह सृष्टि. वे इसके प्रति कृतज्ञता से भर जाते हैं, समपर्ण करते हैं, उसे प्रेम करते हैं क्योंकि एक वही है जिसे चाहा जाये और उस एक को चाहने से सभी को चाहना हो जाता है. अहैतुकी भक्ति का उदय हृदय में होता है. ईश्वर जानते हैं कि उनके लिए क्या उचित है, वह उनकी सभी उचित कामनाओं की पूर्ति करते हैं, वही उनके जीवन का आधार है. आज बाबाजी ने अपने चुटीले हाव-भावों से बहुत हँसाया.

It’s a lovely June morning. Rain has just stopped. Breeze is cool and wet. She has finished her morning jobs. Mali is cutting hedge. Nanha went  to his friend’s home in the morning. Music sir came and gave three sargam to learn and aaroh- avroh of rag yaman. So she is continuing in second year. Day before yesterday they went to see the Buri dihing river. It was nice to see the sun setting and water flowing calmly. One fisherman was spreading his net perhaps he was not looking at the beauty of the water but only at the fish in the river. When they for evening walks she always looks at the   trees, flowers and surroundings with an awe. Daily she sees some new tree or some change in them. Nature is very beautiful, human beings are not so, they pretend they act and they want to be beautiful, but it is not that natural. Last evening she attended a meeting in club for Mrinal Jyoti. She and one more lady was assign the job of arranging some special classes in the school once a week. She will definitely enjoy doing it. Today she heard babaji. He was in bliss as always and told many beautiful things about life.

आज पूर्णिमा है, सुबह-सवेरे से ईश्वर की भक्ति की चर्चा कानों में पड़ रही है, ईश्वर उस के प्रति  कृपालु हैं, वह उसे सद्प्रेरणा देते हैं था गुरुजनों को जिन्होंने उसे पा लिया है, उन्हें टीवी के माध्यम से उनके घर भेजते हैं. कर्त्तव्य निष्ठ होकर, प्रेमपूर्वक, भक्तिभाव से उन्हें यह जीवन जीना है. ईश्वर के वे निमित्त मात्र हैं. वही कर्ता है और वही भोक्ता है. वही उसे प्रेरित करता है कि उसे जाने और उसके अंश होने के कारण उसी के समान बनने का प्रयत्न करें अथवा तो स्वयं को पहचानें.   



  

Monday, March 2, 2015

मधुमक्खी सा मन





 रात्रि के दस बज गये हैं, जून अभी तक वापस नहीं आए हैं, जहाँ कोपरेटिव की वार्षिक मीटिंग + डिनर चल रहा है. उसने अभी-अभी शुरू से डायरी के पन्नों पर नजर डाली, कृष्ण को समर्पित मन के उद्गारों से भरे थे वे पन्ने, और इस क्षण भी वह अपने भीतर उसी का उजाला महसूस कर रही है, सिर में कोई नाद धम-धम सुनाई दे रहा है, मन शांत है. शाम को संकल्प किया था कि सुबह जल्दी उठना है और स्नान करके ही ध्यान के लिए बैठना है, पर आज सोने में देर हो रही है. छोटे भाई का पत्र आया है, पिताजी ने उसके पत्र का उत्तर उसी में लिखवा दिया, वे स्वयं अभी नहीं लिख पा रहे हैं, आँखों का इलाज चल रहा है. कल छोटी भांजी को कार्ड भेजा, दीदी को पत्र लिखा आज टीवी पर तूफान की चेतावनी दी गयी, रात को तेज वर्षा होने की सम्भावना है. नन्हा आज बहुत दिनों बाद क्रिकेट खेलने गया, लगता है जून आ गये हैं.

जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता है स्वयं से पहचान..  ‘किसी को उससे भय न हो और किसी से उसे भय न हो’, ऐसा तभी सम्भव है जब स्वयं की दिव्यता का आभास हो जाये, अन्यथा हृदय के विकार दग्ध करते ही रहेंगे. किसी के व्यक्तित्व के निर्माण में भक्ति का बहुत महत्व है, परमेश्वर से बढकर परम मित्र कौन है जो हृदय को मुक्त करने की कला सिखाता है. कल रात उसने बाबाजी को स्वप्न में देखा, वे उनके आश्रम में हैं. उसने उन्हें प्रणाम किया और बताया कि उन्हीं के एक स्कूल में पढ़ाने का कार्य शुरू किया है. नन्हे को भी प्रणाम करने को कहा. स्वप्न में भी उनसे एक सवाल वह पूछ रही थी कि आप जो कहते हैं वह दिल से आता है या सामने लिखा हुआ रखा रहता है, अजीब सा प्रश्न है पर उनका उत्तर था कि सामने लिखा भी रहता है. आज उन्होंने सिन्धी भाषा में प्रवचन किया. झूलेलाल का उत्सव चेट्टी चाँद मनाया जा रहा था. जून वापस आ गये हैं. हड़ताल के कारण उन्हें व किसी को भी दफ्तर में प्रवेश करने नहीं दिया गया. कल भी हड़ताल हुई थी पर उनका विभाग खुला था. आज धूप तेज है, अभी  सुबह के आठ बजे ही गर्मी का अहसास हो रहा है. देश के बाकी हिस्सों में एक महीने से लोग गर्मी का अहसास कर रहे हैं, वे यहाँ के मौसम की शालीनता के कारण उससे बचे थे. कल एक सखी आयी थी परिवार सहित. नूना भी आलोचना करने से रह नहीं पाई. आत्मा पर कोई न कोई दाग रोज बल्कि हर क्षण लगता ही रहता है, फिर ईश्वर के दर्शन क्योंकर हो सकते हैं. विषपान से भी हानिप्रद विषयों का चिन्तन है, सांसारिक विषयों का चिन्तन ही पथ से विचलित करता है, और वे जितना उस जाल में उलझते जाते हैं, स्वयं को बेबस पाते हैं. आशाओं रूपी नदी, जिसकी लहरें मन की वृत्तियाँ है, को पार करना है. पवित्रता, अभय, धैर्य और क्षमा आदि की पतवार के सहारे ही वे इस नदी को पार सकते हैं ! दूसरों के अंदर दोष देखना आसुरी स्वभाव है. अन्यों के गुणों को देखकर मधुमक्खी की तरह उन्हें स्वयं में भरना चाहिए.

कल से नन्हे को सुबह जल्दी उठकर फिजिक्स पढ़ने जाना है, उन्हें उसे चार बजे ही उठाना होगा. शनिवार को तिनसुकिया से वह बालकृष्ण का एक सुंदर चित्र लायी थी, उसे देखते ही मन प्रसन्न हो उठता है. कृष्ण की मुस्कान मन मोहिनी है. वह उन्हें सदा खिले रहने को प्रोत्साहित करती है !

कल से ही उसके मन में कई प्रश्न उठ रहे थे कि आत्मा यदि अजर, अमर और शक्तिमय है तो मानव को इतने दुःख क्यों उठाने पड़ते हैं..यदि परमात्मा ने अपना अंश स्वरूप उन्हें बनाया है तो इतनी पीड़ा इतनी बेचैनी क्यों...दिल में जैसे एक टीस सी उठती है, इन बन्धनों से मुक्त होने की तीव्र आकांक्षा ! जवाब भी मिल जाता है...राग, द्वेष आदि जीव सृष्टि में ही सम्भव हैं, ईश्वर की सृष्टि में ऐसा कुछ भी नहीं है. अपनी प्रकृति और स्वभाव के अनुसार सब प्रेरित हो रहे हैं, तुच्छ स्वभाव को दिव्य स्वभाव में बदलना है. मन को अकारण ही कल्पना करने आदत को भी छोड़ना है, व्यर्थ के चिन्तन अथवा विलाप से बचना है.






Tuesday, February 3, 2015

कृष्ण की लीलाएँ


आज नन्हे की हिंदी की परीक्षा है, नहाने गया है हर रोज की तरह बार-बार कहने पर, इन्सान अपनी प्रकृति का दास होता है. कृष्ण ने सच ही कहा है कि गुणों को गुण वर्तते हैं. लोग अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म करते हैं और कर्म बंधन में पड़ जाते हैं क्योंकि यही कर्म उनके अगले जन्म के कारण बनते हैं फिर यह क्रम चलता ही रहता है, पर कभी तो इस पर रोक लगानी होगी. तीनों गुणों के पार पहुंचना होगा. कृष्ण की कृपा जिसपर हो वह गुणातीत हो जाता है. ईश्वर के शरणागति होने पर वह अभय प्रदान करते हैं. भागवद में कृष्ण की कथा पढ़कर मन प्रफ्फुलित हो उठता है. पूतना, अघासुर, बकासुर, तृणासुर, शकटासुर और नरकासुर कितने असुरों को वह खेल-खेल में ही परास्त करते हैं. भीतर के छह असुर काम, क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर का भी नाश करते हैं और उच्च पदों पर ले जाते हैं, अद्भुत हैं कृष्ण और उनकी लीलाएं ! आज गुरुमाँ ने ध्यान की महत्ता पर बल दिया, लेकिन ध्यान का फल तो भक्ति ही है न, जब उसका मन कृष्ण का चिन्तन बिना ध्यान के भी करता रहता है तो क्या ध्यान की फिर भी आवश्यकता है. सम्भवतः है क्योंकि अभी भक्ति का पौधा कोमल है, उसे सहारा चाहिए, जैसाकि भागवद में कई जगह पढ़ा कि हृदय में भक्ति उदय होने पर भौतिक कार्यों से मन धीरे-धीरे अपने आप विरक्त होने लगता है, कुछ छोड़ना नहीं है बल्कि अपने आप छूटता जाता है !

कृष्ण उनके अन्तरंग हैं, वह उनके मन के उस कोने तक भी पहुँचे हुए हैं, जहाँ वे स्वयं भी नहीं गये हैं. उनसे संबंध आदिकाल से है, सदा से है, नित्य है और जो भी सुख-दुःख इस जग में होने वाले संबंधों से पाते हैं वे मात्र उसका प्रतिबिम्ब हैं. प्रतिबिम्बों से कोई कब तक मन बहला सकता है. सारे जप-तप नियम का उद्देश्य है मन की शुद्धि ताकि मन उस प्रियतम का दर्शन कर सके. मन समाहित हो सके, उस एक की शरण में जा सके जहाँ से वह आया है. मन चेतन है, सत् है, आनंद स्वरूप है, पर वे तो मन के इस रूप को नहीं पहचानते, जैसे कोई किसी महापुरुष के संपर्क में तो हो पर उसके गुणों से अनभिज्ञ हो तो उसे कोई अनुभूति नहीं होगी. परम सत्य को न जानने के कारण ही वे उससे दूर रहते हैं, अनजान रहते हैं जबकि वह अंशी इसकी जानकारी देना चाहता है. भागवद की कथा जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है उसका कृष्ण के प्रति प्रेम भी बढ़ रहा है, वह उसे अपने और निकट लगने लगा है. उसके प्रति सखाभाव दृढ़ होता जा रहा है. वह प्रेम स्वरूप है, वह माधुर्य की मंजुल मूर्ति है, वह अनोखा है, उससे प्रेम किये बिना कोई रह नहीं सकता. ब्रज की गोपियों के पास उसकी बांसुरी सुनके घर पर रुके रहने का कोई कारण नहीं था. कृष्ण केवल प्रेम और माधुर्य ही नहीं ज्ञान का अवतार भी हैं, वह योगेश्वर हैं, वह भक्ति मार्ग के साथ-साथ ज्ञान और कर्म योग की शिक्षा देते हैं. वह ज्ञान के अथाह स्रोत हैं. जब यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड उन्हीं की कृति है तो उनसे अलग कुछ हो भी कैसे सकता है और ऐसे कृष्ण उनके मनों में रहते हैं !

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिख सकी, किसी दिन जब मन उर्वर होगा तो डायरी के ये खाली पेज भी पहले की भांति भर जायेंगे. आज ध्यान गहन नहीं हुआ, पता नहीं मन के किस कोने से एक संशय ने फन उठाया है, जिसे अभी कुचल देना चाहिए और इस मिथ्या भावना को पनपने का मौका नहीं देना चाहिए. आत्मभाव में स्थित रहकर ही वे अपनी बुद्धि पर लगे जंग को हटा सकते हैं.