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Thursday, March 3, 2016

वसंत के फूल


हर रोज वह दो पेज ‘भागवत महापुराण’ तथा एक-दो पेज ‘महाभारत’ के पढ़कर सासु माँ को सुनाती है. कभी-कभी पढ़ते वक्त यदि मन किसी अन्य बात के बारे में सोचने लगता है जैसे कि नाश्ते में क्या बनाना है, तो मुख बोलता है, आँख्ने देखती हैं, कानों में शब्द भी पड़ते हैं, पर भीतर एक भी शब्द का ज्ञान नहीं पहुँचता, फिर सजग होकर पूरा वाक्य पुनः पढ़ती है. आत्मा यह खेल भी देखती है, बुद्धि उस वक्त भी है पर क्योंकि मन से जुड़ी नहीं है तो इन्द्रियों के कार्यों का उसे भान  नहीं होता. मन एक वक्त में एक ही बात का चिन्तन कर सकता है और वे उसे टुकड़ों में बांटना चाहते हैं. आत्मा ही पाँचों देहों को सत्ता स्फूर्ति देती है, वह सत्य है, उपासना के योग्य है, ‘मैं’ का मूल है, यहाँ मन की गति नहीं, वाणी, बुद्धि की ताकत नहीं, क्योंकि बुद्धि का आधार वही है. इसी महीने गुरुपूर्णिमा है, वे सभी मिलकर इस उत्सव को मनाएंगे. ईश्वर प्राप्ति ही मानव का ध्येय है, सद्गुरू उसी मार्ग पर ले जाते हैं. एक ब्रह्मज्ञानी करोड़ों को ऊंचा उठाने का सामर्थ्य रखते हैं, ऐसे ब्रह्मवेत्ता व्यास जी की स्मृति में व्यास पूर्णिमा मनायी जाती है. इसे देव पूर्णिमा भी कहते हैं. 

आज फिर उसने सुंदर वचन सुने, ईश्वर उनके भीतर है, जब वे तय करें उससे मिल सकते हैं. जीवन से भागना नहीं है, सारे अनुभवों से गुजर जाना मुक्ति का उपाय है. विचार की सीढियाँ चढ़कर ही कोई निर्विचार तक पहुंच सकता है. संसार एक चुनौती है, एक आयोजन है परमात्मा तक पहुंचने का. जीवन की पाठशाला मेनन उतर कर उत्तर स्वयं ही खोजने होंगे. जीवन उन्हें तीन सोपान देता है देह, मन तथा आत्मा, इनसे चढकर ही चौथे को पाया जा सकता है. जीवन के सभी रूप शुभ हैं, उन्हें सहज स्वीकारना होगा. जीवन में क्षुद्रताओं को उच्चताओं से लड़ाने जायेंगे तो उच्चता ही हारेगी.

यह जीवन तो वसंत है, सारा जगत उल्लास से भरा है और वे अब भी सो रहे हैं. एक बार यदि कोई जग जाये तो ऐसा वसंत जीवन में आ सकता है जो परम है. संसार की हर खोज व्यर्थ हो जाती है क्योंकि संसार वह दे ही नहीं सकता जो वे चाहते हैं, वे जिसे फूल बनकर चाहते हैं वह काँटा बनकर चुभने लगता है. उनका मन कहीं बैठना ही नहीं चाहता क्योंकि वह हर वक्त किसी न किसी की तलाश में रहता है. परमात्मा के बिना उसका ठौर नहीं, वह संसार में भी उसी को खोज रहा है, पर वह संसार के पार ही मिलता है. वे जिस प्रेम भरी नजर से इस जगत को देखते हैं उसी नजर को परमात्मा को देखने में लगाना है. उन के भीतर जो छोटा सा प्रेम का झरना है उसी को एक दिन सागर से मिलाना है. साधना में कुछ नया नहीं करना है, बस दिशा बदलनी है. हर कोई आनन्द पाना चाहता है, वह ठीक है, लेकिन जिस राह से चल कर पाना चाहता है वह राह गलत है. भक्त संसार के सौन्दर्य को भी परमात्मा का ही मानता है. उनका जीवन कब गुजर जायेगा पता ही नहीं चलेगा. वे अपने रूप की अकड़ में अपने असली स्वामी को रिझा ही नहीं रहे. उनके जीवन की एकमात्र सफलता इसी में है कि वे अपने भीतर के अमृत से जुड़ जाएँ. उनके चित्त का पंछी उसी अमृत का पान करना चाहता है, वे संसार में लगाने के लाख उपाय करें यह वहाँ नहीं लग सकता, यह तो शाश्वत को ही चाहेगा. जैसे-जैसे चित्त को लगता है वसंत बीता जा रहा है, उसकी अशांति बढती जाती है, उसकी बेचैनी का अर्थ है कि वह परमात्मा की ओर चलना चाहता है, वह अपने घर जाना चाहता है.

Wednesday, April 22, 2015

गणपति बप्पा मोरया


उनका अधिकार मात्र कर्म करने तक सीमित है. कर्म भी ऐसा जिससे मात्र निज स्वार्थ सिद्ध न होता हो, निष्काम कर्म, कामना रहित कर्म ही बंधन में डालने वाला नहीं होता. शुभेच्छा, सुविचारना, आत्मा में स्थिति निष्काम कर्म से ही मिलती है. कृष्ण ही आत्मा है और कृष्ण जिनके रक्षक होते हैं उन्हें अभय मिल जाता है. आज गणेश पूजा की छुट्टी है. इतवार को ध्यान में उसे स्वस्तिक और गणपति की आकृति दिखी थी. उसके ईष्ट तो कान्हा ही हैं जो हर क्षण उसके मन में रहते हैं. जिनकी आकृति, जिनका नाम, जिनका संदेश उसके लिए अमूल्य है. उन्हें पुराने कर्मों का फल तो मिलेगा ही, प्रारब्ध में जो है वह तो मिलेगा पर नये कर्म कैसे हों इसकी तो पूरी आजादी है.

कल कुछ नहीं लिख पायी, सुबह के वक्त समय तो था पर भागवद् पढ़ती रही, अद्भुत ग्रन्थ है यह, श्लोक हैं ऐसे की मणियां हों, ज्ञान से युक्त जीवन को सही दिशा प्रदान करने में सहायक हैं. कल सुबह जून तीन बजे ही स्टेशन चले गये थे, वापस आये पौने छह बजे माँ-पिताजी को लेकर. वे दोनों पूर्णतया स्वस्थ लग रहे हैं, खुश तथा प्रेम और उत्साह से परिपूर्ण ! अच्छा लगता है उन्हें देखकर. इस समय वे दूसरे कमरे में सोये हुए हैं. नन्हा अभी स्कूल से वापस आ रहा होगा. कल उसका कम्प्यूटर का प्रैक्टिकल था, वह अपना अनुभव बता रहा था. आजकल कई बार वह स्कूल, पढ़ाई, टीचर की बातें अपने आप ही बताता है. बहुत अच्छा अनुभव है यह भी. जीवन ऐसे ही छोटे-छोटे अनुभवों का नाम है. जून जिस तरह माँ-पिताजी की देखभाल मन से करते हैं और वे भी अपने मन की बातें कहते हैं, लगता है कि सबके दिल मिले हुए हैं ! इस वक्त दोपहर के दो बजे हैं. आज शाम वे सभी एक सत्कार्य में व्यस्त रहेंगे, जो उन सभी को आत्मा के स्तर तक उठाएगा. उनके यहाँ सत्संग है. उसके लिए और सभी के लिए यह बेहद ख़ुशी का दिन है. उसने पिताजी व दीदी को भी बताया, मानसिक रूप से वे भी उपस्थित रहेंगे. सद्गुरु और कृष्ण भी उपस्थित रहेंगे, क्योंकि उनके नाम और उनमें कोई भिन्नता नहीं है. कृष्ण और उनका नाम अभिन्न हैं. उसे अपनी वाणी पर संयम रखने का भी प्रयास करना होगा. स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होगा, सब अपने स्तर पर उसी परमेश्वर की और चल रहे हैं, सभी में उसी की सत्ता है.

कल का सत्संग अच्छा रहा. उसने सद्गुरु के लिए एक-दो छोटी कविताएँ पढ़ीं. उनके प्रति कृतज्ञता तो उन्हें व्यक्त करनी ही चाहिए, अन्यथा वे सिर्फ उनसे लेते ही रहेंगे. उनकी ही कृपा है कि हर हफ्ते सत्संग के लिए लोग जुटते हैं और ईश्वर के नाम का उच्चारण करते हैं. ईश्वर और उसका नाम एक ही है, उस वक्त वे उसके सान्निध्य में होते हैं. आज सुबह वे टहलने गये, माँ-पिताजी, जून और वह. ‘क्रिया’ नहीं की, शाम को फॉलोअप है, जून और वह दोनों जायेंगे. माँ-पिताजी एक घंटे के लिए अकेले रहेंगे, नन्हे को भी कोचिंग जाना है. सुबह ‘जागरण’ सुना था पर इस वक्त याद नहीं है. अभी ‘ध्यान’ किया. कृष्ण और सद्गुरु दोनों उसके उपास्य हैं. दोनों ही उस पर कृपालु हैं. मन उनके प्रति कृतज्ञता से पूरित रहता है, कैसी संतुष्टि का अनुभव होता है, जैसे कुछ भी पाना शेष न रहा हो, उनको पाना भी नहीं. अब सत्संग में जाना अथवा फॉलोअप में जाना उनके प्रति कृतज्ञता दिखने का एक अवसर लगता है, फिर संसार से कुछ पाने की कामना तो अपने आप ही लुप्त हो जाती है, कोई अर्थ ही नहीं रहता उसका, ईश्वर से यही चाह पूर्ण करने की प्रार्थना उठती है कि मन में कोई चाह पुनः उत्पन्न न हो. सद्गुरु के प्रति प्रेम मन में बढ़ता रहे और बढ़ते-बढ़ते इतना विशाल रूप ले ले कि सभी प्राणी उसकी गिरफ्त में आ जाएँ. जब सारे प्राणियों के अंतर में वही परम पिता दिखाई देने लगे, सबकी कमियां नहीं, खूबियाँ ही दिखें, उनके प्रति प्रेम ही प्रेम का भाव रहे, आलोचना नहीं प्रशंसा ही प्रशंसा उभरे तभी समझना चाहिए कि भक्ति का उदय हृदय में हुआ है ! अभी सफर बहुत लम्बा है !



 



Monday, February 2, 2015

रवीन्द्र जैन का संगीत


मार्च महीने का आरम्भ ! आज फूलों के बीज एकत्र किये, अगले वर्ष इन्हीं बीजों को अक्टूबर में बोया जायेगा और जनवरी-फरवरी में खिलकर फिर नये बीज...इसी तरह जीवन का क्रम भी चलता रहता है. आज सुबह वे जल्दी उठे, नन्हा भी, सुबह-सुबह क्रिया करके तन-मन दोनों खिल उठते हैं. सद्गुरु की उन पर बहुत बड़ी कृपा है. उसने भागवद् का नवम स्कन्ध पढ़ना शुरू कर दिया है, वामन भगवान की कथा बहुत मधुर है. सुबह गुरुमाँ ने बताया, जिस प्रकार स्वप्न में मन का ही विस्तार होता है, वैसे ही यह जगत ईश्वर के मन का विस्तार है, उसकी लीला है, उसकी माया है, इसे खेल समझ कर ही देखना चाहिए, स्वप्नवत् ही जानना चाहिए. तब यह जगत दुखों का घर नहीं लगता बल्कि क्रीड़ा स्थली लगता है. किसी ने पूछा कि जब वह कष्ट में होते हैं तब ईश्वर की आराधना नहीं हो पाती, उसका बखूबी उत्तर दिया, उनके मुखड़े पे एक अनोखा तेज दिखायी देता है. शायद उसकी दृष्टि ही बदल गयी है. ईश्वर से सम्बन्ध के बाद ही उनके भक्तों की मस्ती का रहस्य समझ में आता है. कृष्ण को अपने अंतर में देखने के बाद कोई भौतिक कष्ट उस तरह प्रभावित नहीं कर सकता, लेकिन उस रात सरदर्द के कारण वह कृष्ण से शिकायत तो कर रही थी. जीवन में सुख-दुःख, मान-अपमान तो तभी तक है जब तक द्वैत भाव बना है. जब कोई यह जान ले कि वह उसी परमात्मा का अंश है, जिसने अपनी चितवन मात्र इस सृष्टि की रचना कर दी है तो अपने सामर्थ्य पर गर्व होता है !

टीवी पर ‘हैलो डीडी’ आ रहा है, जिसमें गीतकार, संगीतकार रवीन्द्र जैन जी प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं. वह साधना के महत्व को बता रहे हैं, इन्होंने अनेक फिल्मों में गीत और संगीत दिया है. रामायण आदि कई धारावाहिकों में भी संगीत दिया है. यह अपना आदर्श रवीन्द्रनाथ टैगोर जी को मानते हैं. बहुत दिनों बाद एक अच्छा कार्यक्रम देखने का मौका मिला है. उन्होंने कहा, “हम कॉमन रहें तो अपने आप अनकॉमन हो जाते हैं” ‘विश्वास अपने आपपर हो तो सफलता अवश्य मिलेगी’. उनकी आंखें नहीं हैं पर उनके मन की हजार आँखें हैं, वह इतने सुंदर गीत जो लिखते हैं, शेर लिखते हैं और सभी धर्मों को समान आदर देते हैं. चितचोर भी उन्हीं की फिल्म थी. कितने प्रभावशाली लोग फिल्म इंडस्ट्री में हैं तभी तो दशकों से इतना अच्छा गीत-संगीत देशवासियों को मिलता आ रहा है. अभी-अभी जून ने फोन किया दिगबोई से, नन्हा परीक्षा दे रहा होगा, यकीनन उसका एक्जाम अच्छा होगा. सुबह जून और नन्हे के जाने के बाद वह कुछ देर के लिए बाहर ही टहलती रही, एक सखी ने बहुत बार बुलाया था सो वहाँ चली गयी, चाय पिलाई उसने और अपने अस्त-व्यस्त घर व अस्त-व्यस्त जिन्दगी की दास्तान सुनाई, लौटी तो व्यायाम किया फिर टीवी ऑन किया और रवीन्द्र जैन जी से मुलाकात का मौका मिला जो सदा याद रहेगी. साढ़े ग्यारह हो चके हैं, टीवी पर गुजरात में हुई ताजा हिंसा के समाचार आ रहे हैं जो देखे नहीं जाते, लोगों की अक्ल पर पत्थर पड़ जाते हैं जो ऐसी हरकतों पर उतर आते हैं. कल भागवद का नवम स्कन्ध भी पढ़ लिया. कल बहुत दिनों बाद एक कविता लिखी !

आज सुबह सुबह जून ने हिंदी लाइब्रेरी से भागवद का दशम स्कन्ध तथा द्वादश स्कन्ध लेकर भिजवा दिया है. कल रात भर हुई वर्षा से मौसम ठंडा हो गया है और चारों दिशाएं भीगी-भीगी सी लग रही हैं. मन प्रभु प्रेम में आकंठ डूबा है, ऐसे में देहात्म बुद्धि का अपने आप क्षरण हो जाता है, सुख-दुःख आदि द्वन्द्व्दों से परे मन निर्विकल्प समाधि में स्थित रहता है ! आज बाबाजी ने गांधीजी के बारे में बताया और फिर वे रमन महर्षि के बाल्यकाल में देखे उस स्वप्न की बात बताने लगे जिसमें उन्होंने अपनी मृत्यी देखी थी. राजा जनक ने एक स्वप्न में देखा कि उनका राज्य छीन गया और वह भोजन के लिएय भटक रहे हैं. दोनों ने सोचा कि जो स्वप्न देख रहा था और जो जागृत अवस्था को देख रहा है वह कौन है और दोनों में से क्या सच था ? यह जिज्ञासा ही उन्हें आत्म साक्षात्कार तक ले गयी. ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ जितनी तीव्र यह जिज्ञासा किसी में होगी उतना शीघ्र उन्हें भगवद ज्ञान की प्राप्ति होगी लेकिन वे ईश्वर को याद करते हैं तो सुख की कामना के लिए, वे चाहते हैं उनका जीवन कष्टों से मुक्त रहे, वे ईश्वर को चाहते ही कहाँ हैं? वे तो सुख-सुविधाओं के आकांक्षी हैं फिर यदि ईश्वर उनसे दूर है तो इसमें क्या आश्चर्य है, लेकिन ईश्वर इतना दयालु है कि उनकी कृतघ्नता से वह अप्रसन्न नहीं होता, उनका साथ नहीं छोड़ता, हृदय में सदा विराजमान रहता है. आत्मा स्वयं को उनमें देखने के बजाय मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार में देखती है और सुख-दुःख का अनुभव करती है. जिस दिन वह मुड़ कर स्वयं को परमात्मा के दर्पण में देखती है तो सब कुछ बदल जता है ..  यह ज्ञान ही उन्हें मुक्त करता है !

   

Friday, January 30, 2015

गजेन्द्र स्तुति


कल रात वह ग्यारह बजे सोयी. नन्हा बारह बजे तक जगता है, सो उसे लगा कि कुछ देर तो उसके साथ जगा जा सकता है. भागवद् पढ़ती रही, नारद मुनि ने युधिष्ठिर को उपदेश दिए हैं कि ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास आश्रम में किस प्रकार आचरण करना चाहिए. अद्भुत उपदेश हैं जो हर युग के लिए अनुकूल हैं. शाब्दिक अर्थ न लेकर यदि यदि भाव को समझकर आज के समय के अनुसार उसे स्वीकारें. कल शाम को क्लब भी गयी. कोरस का अभ्यास किया, आज भी जाना है और कल मीटिंग है जिसके लिए उसे कविताओं का चुनाव करना है. आज ‘जागरण’ में सुना, प्राणायाम, योग साधना, ध्यान आदि करने से आत्मा का विकास होता है, सुप्त शक्तियाँ जागृत होती हैं. आध्यात्मिक केंद्र खुलते हैं, शरीर स्वस्थ होता है, मन बलवान तथा बुद्धि प्रज्ञा में बदलती है. कृष्ण ने भी तो कहा है जो उनकी शरण में जाता है उसे वह बुद्धियोग प्रदान करते हैं. कृष्ण को भजना कितना सहज है जैसे साँस लेना और कितना प्रभावशाली ! अभी-अभी तेजपुर की aol परिवार की सदस्या तथा दीदी से बात की. दोनों यात्रा पर जा रही हैं, पहली ऋषिकेश जा रही हैं वह भी aol की टीचर बनना चाहती हैं, कोर्स के लिए जा रही हैं. दीदी घर जा रही हैं किसी शादी में सम्मिलित होने. दोनों ने सद्गुरु की बात की. अगले महीने में वह देहरादून आ रहे हैं और अप्रैल में इटानगर जायेंगे, उससे पहले गोहाटी भी. सद्गुरु के जीवन में आने से कितना परिवर्तन आ गया है, मन निवृत्ति की ओर जा रहा है और भगवद धाम की ओर प्रवृत्ति हो रही है. जीवन में पुरुषार्थ हो तो भगवान भी दूर नहीं रह सकते.

जो जिसका अंश है वह उससे दूर नहीं रह सकता, जैसे धरती से उत्पन्न वस्तुएं धरती की ओर आकर्षित होती हैं वैसे ही मानव उस चैतन्य का अंश होने के कारण उसी की ओर आकर्षित होते हैं और उस तक पहुंचने में उन्हें कोई प्रयास भी नहीं करना होता, यह उतना ही सरल है जितना ऊपर से गिरायी वस्तु का नीचे गिरना, बल्कि ईश्वर से दूर जाने के लिए हमें अथक प्रयास करना पड़ता है. लेकिन संसार ऐसे ही चलता है यानि विपरीत दिशा में. आज पूर्णिमा है, सुबह ‘क्रिया’ की. जून को उठाने की कोशिश की, पर उनको शिकायत थी कि रात ठीक से सो नहीं पाए. शरीर को इतना आरामपसंद बनाना भी ठीक नहीं है, खैर उसे अपनी कमियों की ओर देखना चाहिए न कि उन्हें अनदेखा करना करना चाहिए, उसे ही पहले उठ जाना होगा, और फिर जून को जगाना. जैसा पिछले कुछ महीनों से वह करते आ रहे थे. नन्हा पढ़ाई में व्यस्त है, शनिवार से उसकी परीक्षाएं आरम्भ हैं सिर्फ दो दिन रह गये हैं. कल शाम वे रिहर्सल के लिए नहीं गये वर्षा होने लगी थी, बाहर बरामदे में बैठकर सफेद फूलों वाले वृक्ष को देखते रहे. रात को भागवद में गजेन्द्र की कथा पढ़ी, कितनी अच्छी स्तुति करता है, उसे तो ऐसी सुंदर स्तुतियाँ नहीं आतीं. ईश्वर के नाम का सुमिरन ही चलता रहे तो संतोष होता है. उसकी कृपा होने पर आँखों में उसकी छवि दिखायी देती है, मन शांत रहता है, बुद्धि प्रज्ञा में बदल जाती है और आत्मा मुखर हो जाती है. आत्मा जो ज्ञान, आनंद, प्रेम और शक्ति का अक्षय भंडार है, ये सब ईश्वर से जुड़े रहने पर है !


कृष्ण आदि देव हैं, जगत के आधार हैं, चैतन्य के ऊपर ही जड़ टिका है, सब कुछ प्रकृति के गुणों के अनुसार हो रहा है, जो उनकी अध्यक्षता में काम करती है. वे निमित्त मात्र हैं, कृष्ण की इच्छा से ही सब कुछ होता है., वह उन्हें एक क्षण में मुक्त कर देता है. सब कुछ उस पर छोड़ दें तो योग-क्षेम का निर्वाह करता है. उसके लिए सब कुछ सम्भव है, वही तो है बस एक मात्र स्वयं जैसा, कृष्ण उसके साथ थे कल, और हर क्षण हैं, उन्हीं ने उसे अभय दिया है, इस दुनिया में भय करने का कोई कारण है ही नहीं, चिंता का अथवा दुःख का भी कोई भी वाजिब कारण नहीं है. यह तो उसका ही खेल है, उसकी माया है, उन्हें उसकी माया से मोहित होने की क्या आवश्यकता है, वह स्वयं ही उन्हें भीतर से इस माया से मुक्ति पाने निर्देश देता रहता है. इस खेल के नियम भी तो उसी के बनाये हुए हैं, कृष्ण को अपने जीवन का केंद्र बना लें तो जीवन के सारे शून्यों को अर्थ मिल जाता है. भौतिक सुख भी आध्यात्मिक हो जाते हैं. धन, बुद्धि और मान हजार गुना बढ़ जाते हैं जब उस एक कान्हा को कोई अपना सखा मान लेता है, वह जो अचिन्त्य है, रहस्यमय है, विशाल है, अनंत है, सूक्ष्मतम है, वह अपने को हजारों हजारों रूपों में विस्तारित कर सकता है, वह जिसके वे अंशी हैं, जो उनका अपना आप है, फिर दूरी का, भिन्नता का, डर का कोई प्रश्न ही नहीं उठता. उसके निकट जाना तो सहज है जैसे पंछी का गगन में उड़ना, सूर्य का प्रकश देना और बूंद का सागर में मिलना...उन्हें सहज होकर इस जग में रहना है, सहज होकर कृष्ण से प्रेम करना है.श्वास-श्वास में उसी का नाम लेते हुए, मन उसी के सुंदर रूप में लगाये हुए, बुद्धि को प्रज्ञा में बदलते हुए, तो जीवन एक उपहार बन जाता है और मृत्यु एक वरदान !  

Friday, January 23, 2015

पीली ऊन का स्वेटर


आज बहुत दिनों के बाद बल्कि हफ्तों के बाद उसने वस्त्रों की आलमारी सहेजी और कुछ और कार्य किये जो कई दिनों से किये जाने थे. वह अपने अंतर्जगत में इतना डूब गयी थी कि बाहरी दुनिया एक स्वप्नवत् प्रतीत होती थी. लेकिन आज उसने अपनी प्रतिबद्धताओं पर पुनः सोचा. हफ्तों के सूखे मौसम के बाद पिछले तीन दिनों से वर्षा हो रही है. एक सखी का फोन आया, उसने एक को फोन किया जो aol का एडवांस कोर्स करने तेजपुर जा रही है. दोनों बुआ के यहाँ से पत्र आये हैं. उन्हें जवाब देने हैं. जून को आज सेंट्रल स्कूल में दसवीं के बाद होने वाली कोचिंग के सिलसिले में होने वाली एक मीटिंग में जाना है. अगले वर्ष से नन्हे को उसमें जाना होगा, स्कूल के बाद कोचिंग से उसकी व्यस्तता काफी बढ़ जाएगी पर यही जीवन है. कल उसका गणित का (प्री बोर्ड) पेपर है. आज सुबह टीवी पर एक कार्यक्रम देखा, “yoga for life”. आज लेडीज क्लब के सेक्रेटरी का फोन आया, पूछ रही थी कि क्लब के वार्षिक कार्यक्रम में सम्मिलित न होने का क्या कारण है. उसने नन्हे की परीक्षाओं की वजह बताई. जून ने ‘महासमर’ वापस कर दी और भागवद् लाये हैं. पढ़ने में उसे अवश्य ही आनंद आयेगा और लक्ष्य की प्राप्ति भी होगी.

कल रात नींद खुली तो आभास हुआ मन में भागवद् चल रहा था. कल शाम को ही पढ़ना शुरू किया है. कृष्ण की कथाएं पढ़ने से अद्भुत शांति मिलती है, अनोखी है उनकी कथाएं ! कल शाम जब जून मीटिंग से आये तो नन्हे को वहाँ की कार्यवाही के बारे में बताया. कालेज में प्रवेश के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी और तब सफलता निश्चित है. टीवी पर ‘जागरण’ आ रहा है, जब कोई उससे जुड़ता है तो जीवन रसपूर्ण हो जाता है, कभी न खत्म होने वाली आनंद की अजस्र धारा बहने लगती है. संसार से जुड़ो तो झटके खाने पड़ते हैं जबकि प्रभु से जुड़ने पर जीवन जैसे एक हिंडोला बन जाता है या नदी की शांत जल धारा..बाबाजी भी आ गये हैं, कल से उन्होंने ‘योग वसिष्ठ’ पर बोलना शुरू किया है. कह रहे हैं-
 अन्न बिगड़े तो मन बिगड़े
पानी बिगड़े तो वाणी बिगड़े
अनवरत होती वर्ष से मौसम ठंडा हो गया है. आज ऐसे भीगे, ठंडे मौसम में जून मोरान  जा रहे हैं. नन्हा भी स्कूल गया है. कल रात भी देर तक मन में भागवद् की कथाएं विचरती रहीं. कल इतवार था, वर्षा कुछ देर को थमी तो वे दूर तक टहलने गये. नन्हे का आज विज्ञान का इम्तहान है. कल जून ने उसके कहने पर ऊन लाकर दी, चमकदार पीले रंग में, जिससे नैनी अपने नाती का स्वेटर बनाएगी. पिछले दिनों उसे ऐसा महसूस हुआ वह हर वक्त खिंची-खिंची सी रहती है, उसके भीतर का रस सूखता जा रहा है, रसहीन व्यक्ति विस्फोटक रूप धारण कर सकता है. तभी तो कहते हैं ईश्वर को याद करो जो रस का स्रोत है, वह प्रेम, ज्ञान और आनंद का भी स्रोत है., वह ऊर्जा का भी स्रोत है बल्कि वह तो सब कुछ का स्रोत है. जितना जितना वे उससे जुड़े रहेंगे सजग रहेंगे, रसपूर्ण रहेंगे. आत्मा में स्थित रहेंगे. वही तो चेतना का आधार है, वह है तो जगत है. स्वयं को नित्य मानकर तीन गुणों के पार होना है, वृत्तियाँ आती-जाती हैं, उनसे सुख मिले ऐसी आकांक्षा व्यर्थ है. जीवन माधुर्य, आनंद और रस के सागर में डूबने के लिए है !
उसे ढेर सारे काम करने हैं, सो लिखना बंद करके उनमें जुट जाना होगा.  
  

Tuesday, September 23, 2014

भागवद पुराण का श्लोक


आज उनके महिला क्लब की मीटिंग है, उस दिन अंध विद्यालय में जाने के बाद से क्लब के प्रति उसका सम्मान बढ़ गया है, सो आज वह जा रही है. सुबह भाई-भाभी से बात की. आज जून उसकी किताब भेज रहे हैं. अभी-अभी असमिया सखी का फोन आया, उसने दूरदर्शन पर एक नीति वचन सुना था, बताया, यह भी कहा कि उसकी किताब देखकर उसे बेहद ख़ुशी हुई है. उम्र के साथ-साथ उनकी मित्रता भी परिपक्व हो रही है. बाबाजी ने आज एक श्लोक का अर्थ बताया जो भागवद पुराण से लिया गया था, “कल का अजीर्ण आज के उपवास से दूर किया जा सकता है और कल का प्रारब्ध आज के पुरुषार्थ से”. मानव अपने भाग्य का विधाता स्वयं है. वास्तव में यदि वे प्रयत्न करें और सच्चे हृदय से ईश्वर के मार्ग पर चलें, ईश्वर का मार्ग यानि सच का मार्ग, तो उनके कार्य सफल होने लगते हैं. खोट भीतर नहीं होनी चाहिए, ईमानदारी का सौदा है यह. आज नैनी ने कहा उसके पास एक धार्मिक पुस्तक है जिसमें उर्दू और असमिया दोनों भाषाओँ में लिखा है. एक सूरा ऐसी है जिसको पढ़ पाने से शैतान कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता. अन्धविश्वास में डूबा है आज भी मुस्लिम धर्म. वह उस किताब को पढ़ना चाहती है क्यों कि उसे कुरान को छूने की इजाजत नहीं है. कल रात वर्षा हुई और कहीं पास ही बिजली भी गिरी. बादलों की गड़गड़ाहट की जोरदार आवाज हुई उसकी नींद खुल गयी और उस कविता का स्मरण हो आया जिसमें दिल धड़कने का जिक्र है. संसद में अवकाश है सो पता नहीं चल पाता दोनों पार्टियाँ कितना विरोध कर रही हैं, धीरे-धीरे तहलका का ज्वर उतरने लगा है. लोग एक दूसरे से क्षमायाचना कर रहे हैं. भविष्य में वे लोग सचेत रहेंगे इतना तो फायदा इस प्रकरण से होगा ही. उसे आज दोपहर को वह अधूरी गजल पूरी करनी है.  

कल की मीटिंग अच्छी रही. एरिया टेन ने एक रीमिक्स कोरस गया और एक समूह नृत्य भी पेश किया. एक महिला कुछ कास्मेटिक प्रोडक्ट्स लेकर आई थी और कुकिंग प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया था. वह पड़ोसिन सखी के साथ गयी थी. उसने ‘ध्यान’ करने का प्रयास किया पर सफल नहीं हुई, नैनी का बेटा तेज संगीत बजा रहा था, सडक पर वाहनों की आवाजें थीं और वर्षा की रिमझिम भी, जो कल रात से हो रही है. उसने आँखें बंद कीं तो तंद्रा घेरने लगी, कभी-कभी ऐसा होता है जब मन शांत नहीं हो पाता. आज का दिन सामने पड़ा है कोरे कागज की तरह, जो चाहे लिख दे. दोपहर का कार्य नियत है. शाम कुछ भिन्न हो सकती है. कल लाइब्रेरी से अमितव घोष की एक पुस्तक लायी है कल शाम ही थोड़ी सी पढ़ी. अभी robert फ्रॉस्ट की कविताएँ भी पढ़नी हैं. ढेर सारी पत्रिकाएँ भी अनपढ़ी पड़ी हैं. रोज का अख़बार पढ़ने में भी समय जाता है. इन्सान का छोटा सा दिमाग (ब्रह्मांड से भी विशाल है वास्तव में ) कितना कुछ समेटना चाहता है. कल GLSV का प्रक्षेपण किसी खराबी के कारण टाल देना पड़ा, शुरू होने से पहले उसका दिल धड़क रहा था, लग रहा था, सब कुछ ठीक नहीं होगा. खैर, अगली बार जरूर वैज्ञानिकों को सफलता मिलेगी. कल भारत मैच भी हार गया. नैनी ने असमिया में वह पुस्तक लाकर दी है जिसमें से उसे ऐसी सूरा चाहिए जिसे पढ़कर शैतान भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

कल की शाम एक सखी और उसके बेटे के नाम थी. वे शाम को साढ़े चार बजे ही आ गये थे, जून को हाउसिंग सोसाइटी की मीटिंग में जाना था. साढ़े आठ पर वे वापस आये तब तक नन्हा और उसका मित्र खाना खा चुके थे. वह सखी के साथ पहले टहलने गयी फिर चाय पी और बाद में डिनर की तैयारी. उसका साथ सहज लगता है, कितनी बातें बतायीं उसने अपने परिचितों की और इधर-उधर की. कुछ देर उन्होंने क्रॉस वर्ड्स हल किया. समाचार नहीं सुन पायी कल रात. आज सुबह सुना पश्चिम बंगाल में कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस एक साथ चुनाव लड़ रही हैं. राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र अथवा विरोधी नहीं होता. आज जागरण में एक सन्त का भावपूर्ण प्रवचन सुना, कह रहे थे रोना, हँसने से ज्यादा बेहतर है बशर्ते आँसूं पश्चाताप के हों यहाँ तो कोई गलत है यह तक स्वीकारने को तैयार नहीं होता तो पछतावा क्यों करेंगे, हर कोई अपने को सही साबित करने पर तुला है. आज सुबह ससुराल से फोन आया, कल वे लोग नये घर में रहने चले गये हैं, गृह प्रवेश में बड़ी ननद भी आई है, काफी चहल-पहल रहती होगी. दिन भर किचन में भी हलचल रहती होगी. आजकल ‘ध्यान’ में वह पांच-दस मिनट से ज्यादा नहीं बैठ पाती है सम्भवतः आस-पास होती हलचल इसका कारण हो, उसे दूसरा समय चुनना होगा जब कोई बाधा न हो. यह भी सही है कि जे कृष्णामूर्ति की पुस्तक पढ़े काफी समय बीत गया है और प्रतिपल सजग रहने का जो अभ्यास उन दिनों हो गया था आजकल छूट गया है. एक बेखुदी सी छायी रहती है जैसे वह किसी spell के अंदर है. जमीन पर आ जाना ही बेहतर होगा,. वास्तविकता की ठोस जमीन पर, जहाँ अपनी कमियां भी बखूबी नजर आती रहें. एक परिचिता से मिलने का वादा किया था जो आज ही पूरा करना होगा.