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Thursday, September 20, 2018

सिस्टर शिवानी का कार्यक्रम



शाम के चार बजकर दस मिनट हुए हैं. आज भी क्लब में मीटिंग है. कल बड़े भाई आ रहे हैं, वह उन्हें लेने जाएगी. सुबह वह मृणाल ज्योति गयी थी, शिक्षक दिवस का कार्यक्रम था, क्लब की तरफ से व अपनी तरफ से भी उसने सभी अध्यापिकाओं को उपहार दिए. उनके द्वारा पेश किया कार्यक्रम भी अच्छा रहा. सुबह नींद जल्दी खुल गयी, कुछ देर ध्यान किया बाद में फिर नींद आ गयी, किसी ने आवाज दी उस नाम से जिसमें उसे जून बुलाते हैं. कैसा रहस्यमय यह संसार, कौन है जो बिना मुख के बोलता है, कौन है जो बिना हाथों के छूता है, उस दिन कंधों पर जो स्पर्श किसी ने किया था, वह अभी तक सिहरन पैदा कर देता है. पिछले कुछ दिनों से एक गंध हर समय साथ रहती है. कैसी है यह गंध, क्या है इसका स्रोत..कुछ पता नहीं. आज कई दिन बाद फोन ठीक हुआ, शायद दो-तीन दिन बाद ब्लॉग पर लिखा. कविता कई दिनों से नहीं लिखी, समय भी तो चाहिए और एक भिन्न भाव दशा, अब मन स्थिर हो गया है.

कल भाई की फ्लाईट समय पर थी. दोपहर बाद वे हवाई अड्डे से घर वापस आ गये थे. सुबह भ्रमण के लिए गये. भाई को यहाँ अच्छा लग रहा है. दिन भर कुछ न कुछ क्रिया-कलाप होता है. शाम को क्लब जाना था, वापस आकर भोजन करते और सोते काफी देर हो गयी. आज भी सुबह स्कूल गयी, शाम को क्लब में एक परिचित परिवार का विदाई समारोह था. अच्छा रहा, लौटने में देर हो गयी. भाई तब तक जगे ही थे. अखबार में सुडोकू हल कर रहे थे.

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. समय जैसे तीव्र गति से भाग रहा है. आज वे ड्राइवर के साथ दूर तक घूमने गये, भाई को पाइप ब्रिज दिखाया. उन्होंने ही बाजार से सब्जी भी खरीदी. शाम को योगनिद्रा का अभ्यास किया. लगभग रोज ही एक बार सिस्टर शिवानी को सुनने का क्रम भी बन गया है. वह अस्पताल गयी, एक सखी की सासुमाँ वहाँ भर्ती हैं. उसे देखकर वह प्रसन्न हुई. प्रेम से किया गया छोटा सा कृत्य भी किसी को राहत दे जाता है.

शाम के साढ़े पांच बजे हैं. बाहर से जंगली काली मुर्गी की आवाज लगातार आ रही है, जो अपने पूरे परिवार के साथ बांस की हेज में रहती है. जब बगीचे में कोई नहीं होता तब घूमती फिरती है और शोर मचाती है, बाहर जाकर देखें तो छुप जाती है. अभी कुछ देर पूर्व वे बगीचे में थे. भाई ने एक तस्वीर ली, आंवले के वृक्ष पर बैठी गिलहरी की. आकाश पूर्व में गुलाबी हो रहा था. कल शाम वे भ्रमण पथ पर जाकर आकाश की तस्वीर उतारेंगे. आज जून इटली के शहर ट्यूरिन में हैं, उन्हें वापस आने में चार-पांच दिन और हैं. कल फेसबुक पर एक वरिष्ठ लेखक ने प्रश्न किया, वह फेसबुक पर क्यों है, सहज ही उत्तर लिख दिया, पर उन्होंने उसे टैग करके पोस्ट कर दिया, कितने ही लोगों ने पढ़ा, उसकी एक तस्वीर भी पोस्ट कर दी, कब किस मार्ग से लोगों से जुड़ना होगा, कौन जानता है. विचार किस प्रकार उनका भाग्य बनाते हैं, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज देखा. उन्हें मनसा, वाचा, कर्मणा कितना सजग रहना होगा.

Thursday, September 1, 2016

काफिलों का दौर


बहन की डायरी के कुछ पन्ने पढ़े. हर व्यक्ति अपने भीतर कितना बड़ा संसार छिपाए रखता है. हर व्यक्ति एक अपार सम्भावना लिए इस दुनिया में आता है. उसे वह बचपन से जानती है, पर लगता है कितना कम जानती है. बचपन में माँ उसकी गोद में बहन को लिटा देती थीं और स्वयं घर के काम करती थीं. उसका स्कूल दोपहर बारह बजे का था, फिर याद आता है दीदी उसके लिए सुंदर वस्त्र बनाती थीं, जिन्हें पहनकर वह परी सी लगती थी. स्कूल जाने से बहुत डरती थी. याद है पलंग के नीचे छिप जाती थी, जबरदस्ती उसे स्कूल भेजना पड़ता था. फिर नये शहर में वे दोनों एक स्कूल में गयीं. टीचर उसे चाहती थीं और नूना की कक्षा की छात्राएँ भी उसे मिलकर खुश होती थीं. जब भाभी आ गयीं तब वही उसे तैयार करती थीं. इंटर कालेज में उसने सौन्दर्य प्रतियोगिता जीती थी, फिर मेडिकल की तैयारी और पांच वर्षों के लिए हॉस्टल चली गयी. नूना की शादी हो गयी थी जब वह कालेज में गयी. उसके बाद तो मिलना साल में कभी दो साल में एक बार ही होने लगा. कितना वक्त गुजर गया है. वह चाहती है उसकी डायरी पढ़कर नूना कोई कहानी लिखे, मानव मन की कहानी, उसकी इच्छाओं, कामनाओं की कहानी, पूर्णता को पाने की उसकी तड़प की कहानी, वह भी तलाश रही है लेकिन उसका मार्ग बौद्धिक है. वह चाहती है कि खुद भी बनी रहे और परमात्मा भी मिल जाये, लेकिन परमात्मा को पाने की शर्त यही है कि खुद को तो मिटना होगा, जो मिट गया स्वयं फिर उसकी कोई कहानी नहीं रहती. वह बचता ही नहीं. जून के लिए एक कविता लिखी तो है पर उसमें दर्द समा गया है, उत्साह भरी एक कविता और लिखनी होगी !

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. कल दोपहर मृणाल ज्योति गयी थी, कविता पढ़ी, तारीफ हुई, अच्छा लगा अर्थात जब अपमान होगा तब दुःख भी होगा. ब्लॉग पर जब कोई प्रतिक्रिया करे तो भी अच्छा लगता है, यह खतरनाक है, लेकिन तब भी कोई इस मन को देख रहा होता है, साक्षी सजग रहता है तब कोई खतरा नहीं...कल छोटी भांजी से बात की, उसे पिताजी का इतिहास चाहिए, यानि अपने नाना जी का. उसने याद किया, उनके पिता व का दादा-दादी का नाम, नाना-नानी का नाम भी. पाकिस्तान का एक जिला जन्मस्थान, स्कूल का नाम, विभाजन के समय सोलह वर्ष के थे, पचास किमी पैदल चलकर आये. दो जगह रुका उनका चालीस-पचास हजार लोगों का काफिला. बीच में बच्चे व बूढ़े थे. गाँव के लोग शामिल, हमले भी हुए, फौजियों की जीप साथ थी. पहली रात भोजन मिला, दूसरी रात सामान नहीं था. पानी की दिक्कत भी थी. छोटी बहन चार वर्ष की थी और भाई ग्यारह वर्ष का. उन पर लिखी कविता उसे भेज देगी. जून का मन जो घायल हुआ था अब धीरे-धीरे सहज हो रहा है, आज दोपहर वह कुछ पिघले, उसे उनका ज्यादा ख्याल रखना होगा. वह बहुत भावुक हैं और उनके लिए परिवार ही सर्वोच्च मायने रखता है. वह परिवार के लिए ही जीते हैं, उनका दिल बहुत कोमल है, कामना युक्त है पर वे जन्मों के संस्कार हैं. धीरे-धीरे वह भी स्वयं को जान लेंगे, तब तक उन्हें बहुत स्नेह और सहारे की जरूरत है. उसके जीवन का लक्ष्य तो पूरा हो चुका है अब जो भी प्रारब्ध शेष है वह पाना है और शेष लुटाना है. अनंत प्रेम, अनंत करुणा, अनंत स्नेह और अनंत खुशियाँ..भीतर अनंत खजाना है. परमात्मा उसके माध्यम से प्रकट होने को उत्सुक है, उसने स्वयं को खाली कर दिया है. सद्गुरु उसके माध्यम से गीत बनकर फूटना चाहते हैं. वह उनकी ही वाणी बोल रही है..भीतर एक सन्नाटा है और है अंतहीन फैलाव..जिसमें से ख़ुशी रिसती रहती है...टप टप टप टप...सारी दुनिया उस ख़ुशी की हकदार है और सबसे पहले जून पर उसका हक है..वह उसके जीवन में सर्वोच्च स्थान रखते हैं..उसके अन्तरंग के सहचर हैं..उनसे ही समाज में उसका नाम है. वह स्वस्थ रहें, सानंद रहें..आज तक उससे जो भी पीड़ा उन्होंने पायी है, शायद वह प्रारब्ध का खेल था..जब जागो तभी सवेरा..वह उसके लिए अब आराध्य हैं !


Wednesday, June 22, 2016

हिन्दयुग्म में कविताएँ


कामना संसार की होगी तो कभी पूर्ण नहीं होगी, राम की होगी तो पूर्ण हुए बिना रह नहीं सकती. राम तो मिलेगा ही संसार भी पीछे-पीछे आएगा. जीवन में कितनी बार इस बात का अनुभव हुआ है जब भी उसने अपना सुख संसार पर निर्भर किया, धोखा ही मिला, जैसा चाहा वैसा नहीं हुआ, आशा कितनी बार निराशा में बदली. इस सत्य को यदि वे सदा याद रख सकें और किसी से कोई अपेक्षा न रखें तो मुक्त रह सकते हैं. अपने भीतर ही सुख की खोज करें जो बिखरा ही हुआ है, जो अनंत है. जो असीम है, जो सहज ही प्राप्त है ! उसने सोचा, यदि मानव को वह मिल जाये तो उसका जीवन क्या रुक नहीं जायेगा ? यदि उनकी लालसा सुख की है और सुख उन्हें बिना कुछ किये यूँ ही मिल जाये तो वे कुछ करना ही क्यों चाहेंगे, तो इसका उत्तर भी भीतर से आया कि जिस तरह सुख सहज प्राप्त है, कर्म करने की इच्छा भी स्वाभाविक है, उस स्थिति में उनके कर्म तो होंगे पर वे स्वार्थ से भरे नहीं होंगे, वे बांधने वाले नहीं होंगे, वे उन्हें कष्ट नहीं देंगे, वे भी आनंद को बढ़ाने वाले होंगे. यदि ऐसा है तो क्यों नहीं हर कोई अपने भीतर जाकर उस सुख राशि को खोज लेता ? हर कोई स्थिर बैठना नहीं जानता, भीतर जाना नहीं सीखता, बाहर ही बाहर उसे इस तरह बांधे रखता है कि कोई भीतर है भी इसका भी उसे भरोसा नहीं होता, दिन-रात जो बाहर ही रहता है, उसे पता ही नहीं चलता कि उसके भीतर भी एक आकाश है, जहाँ सूरज उगता है. वह अपने भीतर के हिरण्यमय कोष से अनजान ही रह जाता है. भीतर की दुनिया उसे दूर की, रहस्यमयी सी प्रतीत होती है, जबकि बाहर से उसका दिन-रात का नाता होता है. बुद्धि की सीमा जहाँ समाप्त होती है, हृदय का आरम्भ होता है ! लेकिन वे अपनी बुद्धि पर हद से ज्यादा भरोसा करते हैं. हर कोई दूसरे को मूर्ख तथा स्वयं को बुद्धिमान समझता है. छोटी से छोटी बात में भी वे अपने अहम की पुष्टि चाहते हैं. अहंकार की जड़ इस बुद्धि में ही है, जो उन्हें पश्चाताप के सिवा कुछ देकर नहीं जाती. हृदय में प्रवेश होते ही बुद्धि का चश्मा उतर जाता है. तब कोई छोटा-बड़ा नहीं रहता.   

आज नन्हा आने वाला है, उसने पिछली बार उन्हें स्मरण दिलाया था कि इतने सालों में वे आगे नहीं बढ़े हैं, उनके विवादों का कारण भी वही है और डायलाग भी वही हैं. इस बार भी वह किसी कटु सत्य की ओर इशारा करेगा. बच्चे माता-पिता को बारीकी से परखते हैं. वह स्वयं की कमियों को नहीं देख पायेगा, जैसे वे स्वयं को पूर्ण मानने की गलती कर बैठते हैं. नये वर्ष का आरम्भ हो चुका है, उसकी नये वर्ष की कविता कितने लोगों ने पढ़ी, नेट के माध्यम से उसे कितने पाठक मिले हैं. कितना कुछ लिखना अभी शेष है. यूनिकोड में लिखना भी सीख लिया है, जरा भी कठिन नहीं है. अभी लोहरी व गणतन्त्र दिवस की कविता लिख सकती है तथा विवाह की वर्षगांठ के लिए भी. ‘हिन्दयुग्म’ में कितनी कविताएँ पढने को भी मिलती हैं. हजारों लोग लिख रहे हैं. प्रभु ने उसे भी लेखन की शक्ति दी है, जिसे निखारना, संवारना उसका कर्त्तव्य है, अन्यथा यह उसका अपमान होगा. हर दिन कुछ न कुछ लिख सके ऐसा प्रयास इस नये वर्ष में होना चाहिए, और नहीं तो डायरी ही रोज लिखे, पत्र लिखे चाहे भेजे नहीं. गुरूजी को पत्र लिखने का कार्य भी आजकल छूट गया है. अपनी आध्यात्मिक प्रगति का लेखा-जोखा भी इसलिए रुक गया है, जो यह मान लेता है कि पा लिया है, जान लिया है उसका ज्ञान चक्षु बंद हो जाता है !



Wednesday, June 15, 2016

एकांत - एक का अंत


वे कैसे बेहोशी में जीये चले जाते हैं. ऊपर-ऊपर से सब ठीक लगता है पर सब लीपा-पोती ही है, जरा सा खरोंचो तो भीतर की सच्चाई का अहसास हो जाता है. भीतर ज्वालामुखी है, जहर है, क्रोध की आग है, ईर्ष्या है, जलन है और न जाने क्या-क्या है. सारी शुभकामनायें एक झूठ है, सारा स्नेह एक दिखावा है, इन्सान अपने लिए जीता है, अपने स्वार्थ सिद्ध होते रहें तभी तक उसके संबंध सुमधुर हैं. सदियों से, हजारों सालों से संतजन सत्य ही कह रहे हैं. इस संसार से जो आशा लगाता है, उसके हिस्से में दुःख के सिवाय कुछ भी नहीं आता. दुःख से यदि मुक्ति चाहिए तो अपनी आत्मा का आश्रय लेना होगा, परमात्मा का आश्रय लेना होगा, सद्गुरु का आश्रय लेना होगा. जीवन की कटु सच्चाई को कोई जितना शीघ्र समझ ले उतना ही अच्छा है. यहाँ सारे नाते स्वार्थ पर टिके हैं, इन्सान अकेला ही आता है, वह अकेला ही रहता है, और अकेला ही जाता है. इस अकेलेपन को एकांत बनाकर जो अपने भीतर चला जाये और वहाँ सत्य को पा ले तभी उसका जीवन सफल है, वरना तो चिता की आग तक जाते-जाते उसके मन में चिंता की आग कई बार जल-जल कर बुझेगी और बुझ-बुझ कर जलेगी ! इस आग को बुझाने वाला शीतल जल केवल भीतर ही मिल सकता है, उसे तो उस जल का पता मिल गया है !  

आज नई ड्रेस पहनी है जो खास सर्दियों के लिए जून लाये हैं, वह चार-पांच दिनों के लिए गुवाहाटी गये हैं. वह इस कमरे में हैं जहाँ कम्प्यूटर टेबल लगा दी है, जो उनका योग-ध्यान कक्ष है, तथा नन्हा घर आने पर वह यहीं रहना पसंद करता है. पिछली बार आया था तब उसने असमिया, बंगाली तथा पाकिस्तानी गीतों का एक अच्छा संग्रह नेट से किया. आज कुछ देर तक सुना.


जून कल आ रहे हैं, फ्रिज में सब्जियां भी खत्म हो रही हैं और दालें भी, अपने आप भी बाजार जा सकती है पर सोचती है कि एकाध समय यदि कुछ विकल्प ढूँढ़कर काम चलाया जाये तो अच्छा रहे, सभी कुछ हर समय मौजूद हो तो आदमी का मस्तिष्क जड़ हो जाता है. आवश्यकता आविष्कार की जननी है. शाम को यूँ तो क्लब की तरफ से बाल दिवस के लिए उपहार लेने जाना है. इस बार लेडीज क्लब सामान्य बच्चों के लिए केवल एक फिल्म दिखा रहा है और विशेष बच्चों के लिए सैंडविच, उबले अंडे, चार्ट पेपर, साबुन, टॉवल व एक बाथ टब भी दे रहा है, साथ ही कुछ गेंदें व गुब्बारे भी ! बबल मेकर भी दिया जा सकता है. अगले दिन वे भी बाल दिवस मनाएंगे ‘अंकुर’ के बच्चों के साथ, केक या अन्य़ कोई मिठाई वह घर से बना कर ले जा सकती है. उन्हें पेपर प्लेट्स भी खरीदनी होंगी. इस समय माँ-पिताजी चाय पीकर आराम कर रहे हैं. माली बगीचे में काम कर रहा है, चारों ओर सन्नाटा है, एक शांति ! उसके भीतर भी गहन शांति है, तभी भीतर का संगीत सुनाई दे रहा है. आज ध्यान में एक नवीन अनुभव हुआ, कुछ क्षणों के लिए स्वयं का बोध भी जाता रहा. सद्गुरु का शिव सूत्र सुना, कितना अद्भुत ज्ञान है, बात तो वही एक है, लेकिन उसे कहने के हजार-हजार तरीके हैं. सदियों से संत कहते आ रहे हैं, लेकिन हर किसी का ढंग अनोखा है, एक ही चेतना अनंत रूपों में विराज रही है. वह स्वयं अद्भुत है तो उसका बखान करने वाले भी अनोखे क्यों न हों ?

Saturday, January 16, 2016

शिव सूत्र का अर्थ


आज सुबह गुरूजी को ‘शिवसूत्र’ पर बोलते सुना. इच्छा शक्ति कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं होती और  इच्छा का अंत हुए बिना आनन्द की प्राप्ति नहीं होती, तो करना यह है कि इच्छा को नमस्कार करते हुए उसके पार चले जाया जाये. उससे युद्ध नहीं कर सकते. उसके बावजूद शिव तत्व को पाना है. सद्गुरु के बोल सुनकर लगता है जैसे वह उनके ही मन की बात बोल रहे हैं. जैन संत ने बताया नैतिकता का अर्थ है मानवीय एकता व संवेदनशीलता, सभी के साथ एकता का अनुभव होने से स्वतः ही उनके सुख-दुःख उन्हें प्रभावित करेंगे. उसका हृदय उन सभी की ओर जाता है जो अस्वस्थ हैं, दुखी हैं. वे यदि चाहें तो अपने को उबार सकते हैं, उन्हें कोई राह बताने वाला चाहिए. नैनी व पास के बच्चों को पढ़ाने में वह सफल नहीं हो पा रही है, वे उद्दंड होते जा रहे हैं. वे पल भर भी टिक कर नहीं बैठते, उनका दिमाग एक से दूसरी वस्तु पर बहुत तेजी से दौड़ता है. क्रोध दिखाना ही पड़ता है. उनकी माएँ भी ध्यान नहीं देती, उसे ही कोई उपाय सोचना होगा. जून ने फोटो फ्रेम में फोटो लगा दिए हैं, आश्रम के तथा अंकुर संस्कार केंद्र के बच्चों के. शाम को उनके यहाँ होने वाले सत्संग में दिखाएगी, बच्चे भी देखकर प्रसन्न होंगे. सभी प्रसन्न हों, यही तो उसका उद्देश्य है.

यह संसार एक दर्पण है, या कहें कि सांसारिक संबंध दर्पण हैं, जिनमें उन्हें अपना सच्चा स्वरूप दिखाई पड़ता है. जब वह लोगों से मिलती है तो अपनी सच्चाई को ज्यादा स्पष्टता से देख पाती है. उनके साथ व्यवहार करते समय मन कैसा स्वार्थी, लोभी और कभी-कभी ईर्ष्यालु भी बन जाता है, देह में नकारात्मक संवेदनाएं भी होती हैं, जबकि कुछ लोगों  के संपर्क में आने से ऐसा कुछ भी नहीं होता, तब भीतर का प्रेम प्रकट होता है. लेकिन पहले वर्ग के लोग उसके सच्चे हितैषी हैं, उनके द्वारा ही पता चलता है कि भीतर अभी कितना कचरा भरा है. कभी कभी वे अपनी सहजता व सरलता खो बैठते हैं और हर बार इसका कारण है उनका संकीर्ण मन, आत्मा में तब उनकी स्थिति नहीं होती. किसी ने गुरूजी से पूछा कि ऐसा क्यों होता है तो उन्होंने कहा खेल जानकर इसे दृश्य की तरह देखो, यह भी क्षण भंगुर है, पर यदि यही क्रम जीवन में बार-बार दोहराया जाता है तो चिंता की बात है, क्योंकि तब यह संस्कार बन जाता है और वे अनजाने ही ऐसा व्यवहार करने लगते हैं. संस्कार को तोड़ने के लिये सजगता सर्वोपरि है, जैसे ही भीतर कोई नकारात्मक भाव उठे, उसे वहीँ देखकर समाप्त कर देना होगा ताकि वह आगे अंकुरित ही न हो. कभी मन में अवांछित विचार भी आ जाये तो उससे छूटने का प्रयास विफल ही जाता है जब तक यह न मान लिया जाये मन एक धोखा ही तो है. वास्तव में भीतर ढूढने जाएँ तो मन कहीं है नहीं, ऐसा अनुभव होते ही शांति छा जाती है. तब लगता है सारी साधनाएं खेल है, वे हर वक्त वही हैं जो होना चाहते हैं, लेकिन उनका वह होना उनसे दूर इसलिए हो गया है क्योंकि उस अटूट शांति की धारा से विलग होकर वे स्वयं इस माया की दुनिया में विचरते हैं, भिन्न-भिन्न अनुभव प्राप्त करते हैं. एक स्वप्न से ज्यादा कहाँ है यह माया की रचाई दुनिया. मकर संक्रांति के बाद मौसम में हल्की गर्माहट आ गयी है. कल शाम को सत्संग ठीक तरह, एक घंटा भजन गाते-गाते कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता. संगीत आत्मा को स्पर्श करता है.

वर्षा के कारण मौसम ठंडा हो गया है, भीतर कमरे में भी ठंड का अनुभव हो रहा है. अभी-अभी ध्यान से उठी है. मन शांत है. अनहद की धुन निरंतर सुनाई पडती है आजकल, मधुर वंशी, कभी वीणा, कभी पंछियों का मधुर कलरव. मन विचार शून्य हो तभी सुनाई दे ऐसा भी नहीं, चौबीसों घंटे. गुरुमाँ कहती हैं वह ध्वनि भी सत्य नहीं है. जैसे बंद आँखों से दिखने वाला प्रकाश असत्य है और रात को देखे स्वप्न मिथ्या हैं. ये सब मन का ही चमत्कार हैं. मन आत्मा की शक्ति है लेकिन परमात्मा को जाना नहीं जा सकता क्योंकि वही तो जानने वाला है. इन दार्शनिक प्रश्नों में उलझना व्यर्थ ही है, क्योंकि निरा सिद्धांत किसी काम का नहीं, यदि वह प्रयोग में न आए. परमात्मा जीवन में झलके तभी उसकी सार्थकता है. परमात्मा अर्थात प्रेम, शांति, आनन्द और उत्साह..उनका जीवन उसकी साक्षी दे, वर्तन वैसा हो तभी कहा जायेगा कि उन्होंने धर्म को जाना है. भीतर जब निर्मलता होगी तभी धर्म का वास्तविक रूप वे जान पाएंगे.        

  

Tuesday, December 8, 2015

झील की तलहटी


जब तक कोई अपनी सारी वृत्तियों को इष्ट के चरणों पर विलीन नहीं कर देता तब तक जीवन में विशेषता नहीं होती. एक बार अन्न का दाना अंधकार में दब जाता है तो ही हजार गुना होकर वापस आता है. सद्गुरू को जब कोई समर्पित हो जाता है तो उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता ! जीवन की सारी भयानकता सद्गुरू के मिलने तक ही होती है, उसके बाद तो केवल भगवान ही भगवान जीवन में रहते हैं ! हर घटना तब उसके लिए शुभ ही होती है. नया दृष्टिकोण, नयी विचार धारा, नया जीवन मिलता है ! उसको भीतर से रस मिल जाता है और वह एकाग्र हो जाता है ! यही एकाग्रता फिर सजगता में बदलती है और सजगता ही ध्यान है, सुरत है, प्रेम है, भक्ति है, ज्ञान है !
ज्ञान तो मिल जाता है पर उसमें टिकने के लिए आसक्ति का त्याग करना पड़ता है. सुख के प्रति आसक्ति और कर्म के प्रति आसक्ति इसमें टिकने नहीं देती. टिकने के बाद तो कण-कण में व्याप्त चेतना का सहज ही अनुभव होने लगेगा.

देह प्रत्यक्ष है, आत्मा परोक्ष है. परोक्ष को पाकर ही एक तृप्ति का, शांति का अनुभव होता है. इस शांति को पाकर यदि राग हो जाये तो यह शांति भी अशांति का कारण बन जाती है. उसके भीतर भी मौन उतर आया है, गहरा मौन, विचार आते हैं पर विचार जैसे ऊपर-ऊपर तैरते हैं, नीचे की झील साफ दिखाई देती है. बस चुपचाप इस झील की तलहटी में बिछी ठंडी गीली रेत पर पड़ी सीपियों में से किसी एक पर उसका ध्यान रहता है. वहाँ से ऊपर जगत के कोलाहल में आने का भी मन नहीं होता. ऐसा ही अनुभव आज ध्यान में हुआ जब डेढ़ घंटे से भी ज्यादा कुछ मिनटों तक वह प्रकाश के समुन्दर में डूबती-उतराती रही. वह प्रकाश अब भी गंध रूप में उसके साथ है !

सद्गुरू वह है जिसके ‘भीतर’ को सारी सुप्त शक्तियाँ धारण करने का मौका मिलता है, वह निस्वार्थ भाव से उन शक्तियों का उपयोग जगत के लिए करता है. उसके भीतर अपार करुणा, अपार कृपा होती है, जो सभी को बिना किसी भेदभाव के मिलती है. उसने साधना इन शक्तियों को पाने के लिए नहीं की होती, वे तो सहज प्रेम के कारण ही चेतना का ध्यान करते हैं, आत्मा में रमन करते हैं, क्योंकि उनकी बुद्धि इतनी शुद्ध हो जाती है कि वे इस दृश्य जगत के पीछे अदृश्य सत्ता को देख लेते हैं. जगत की क्षण भंगुरता, परिवर्तन शीलता, स्वप्नावस्था तथा नश्वरता को पहचान उसे त्याग देते हैं. स्वरूप से तो नहीं त्याग सकते पर मन से त्याग देते हैं ! उनके पास सारी दृष्टियाँ होती हैं, वह सारे मार्ग बता देते हैं, अपनी अपनी योग्यता व रूचि के अनुसार साधक उनमें से किसी एक पर चलने के लिए समर्थ है !


जीवन का एक सत्य है कि संसार को किसी का मन नहीं चाहिए, उसकी सेवा चाहिए, बस उनका काम होता रहे, मन की किसी को जरूरत नहीं है और यह मन न ही परमात्मा के किसी काम का है, वह तो मन से परे है, तो ध्यान और प्रेम के मार्ग पर इसे मर ही जाना होगा. अहंकार को ही केवल मन चाहिए, यह इसी के बल पर जीता है. ‘मैं’ है तो इच्छा है, डर है, कामना है, सुख है, दुःख है, यदि ‘मैं’ ही नहीं तो इनमें से कोई भी नहीं और तब मन भी नहीं. बिना अहंकार के जीने वाले को हो सकता है यह दुनिया पागल कहे, पर उसकी भी कोई चिंता नहीं, पागल तो हर व्यक्ति यूँ भी हर दूसरे को समझता ही है. हर कोई स्वयं को बुद्धिमान ही जानता है और दूसरे को नासमझ, तो यदि कह भी दिया तो सुन लेना चाहिए. कोई ध्यान के द्वार से लौटा हो या भक्ति के, इसका पता तो चले, कोई रेखा तो हो जो उसे और एक संसारी को नास्तिक को अलग करती हो, पर सद्गुरू यह भी तो कहते हैं कि भेद नहीं है. दो हैं ही नहीं तो भेद हो कैसे, दूसरा कोई है ही नहीं, जो भी हैं वे भी तो उसी परमात्मा का ही रूप हैं. परमात्मा ही विभिन्न रूपों में अपने को व्यक्त कर रहा है. एक बार अपने भीतर प्रवेश मिल गया तो सारे भेद मिट जाते हैं !    

Wednesday, June 24, 2015

दा-विंसी-कोड-एक रोचक उपन्यास


उन्होंने शब्दों की होली खेली, कुछ शब्दों की बौछार इधर से हुई और कुछ शब्दों की बौछार उधर से और लग गई आग दिलों में. इस होली से तो भगवान ही बचाए. न जाने क्यों वे अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाते फिर वही वाणी के रूप में बाहर आ जाती हैं. जानती है वह कि बाद में पश्चाताप के सिवा कुछ हाथ आने वाला नहीं है. समाज में परिवार में सभी को साथ लेकर चलना है, साधना के लिए स्वार्थी तो नहीं हुआ जा सकता, उसकी आवश्यकता को कोई अन्य कैसे समझ सकते हैं, उसे ही धीरे-धीरे इस पथ पर लाना होगा. संसार का पथ तो अनेक जन्मों में चल कर देख चुकी है, यह बेपेंदी के लोटे जैसा है कितना भी जल डालो यह खाली ही रहेगा. परमात्मा के पथ पर आनंद ही आनंद है, लेकिन इस आनंद का भी यदि लोभ वह करने लगी तो...सहज रहना सीखना होगा, समभाव में रहना. परीक्षा की घड़ियाँ आएँगी पर स्वयं पर नियन्त्रण रखना है.
आज होली है, उसने ज्ञान की पिचकारी का रंग लगाया है, अब कोई और रंग उस पर चढ़ता ही नहीं. होली का अर्थ है सारी पुरानी सड़ी-गली मान्यताओं को ज्ञान की आग में जलाकर मन को खाली कर देना. फिर से नव जीवन का आरम्भ हो, भुला देना सारे शिकवे-शिकायत, तब जो भीतर उमड़ेगा उसमें सारे रंग मिले होंगे.
कल रात को नन्हे ने जब फोन पर कहा कि उसकी तबियत ठीक नहीं लग रही है तो जून और उसका चिंतित होना स्वाभाविक था. उन्होंने उसे आवश्यक निर्देश दिए और अपने रोज के कार्य सामान्य रूप से करते रहे. सुबह वह उठी तो जून ने कहा उन्हें देर तक नींद नहीं आयी, वह नन्हे की अस्वस्थता की बात से परेशान हो गये थे. वह भी जब अपने मन की अवस्था पर नजर डालती है तो उनसे बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती. यह बात और है जब मन को परेशान देखा उसने तो भगवन्नाम का ही आश्रय लिया, परमात्मा को सब कुछ सौंपना चाहा. उससे प्रार्थना भी की. भक्ति के लिए भक्ति अर्थात उससे कुछ भी न मांगे, यह दृढ़ता तो दूर हो ही गयी. उसने उन सबके लिए सुख व स्वास्थ्य माँगा. वह दाता है, सबकी सुनता है, किसी को निराश नहीं करता, उसकी मर्जी से ही वे सब इस दुनिया में आए हैं. वही चैतन्य है, उसका अंश आत्मा रूप से उनमें स्थित है. अभी यह उनका अनुभव नहीं है तभी वे मन की समता खो बैठते हैं. जैसे चित्रकार चित्र बनाता है वे दुःख बना लेते हैं.
कल की रात्रि स्वप्नों भरी थी, नन्हे को कई बार देखा, वह छोटा सा है और खाली फर्श पर सोया है. मन भी कितना पागल है, खुद ही सपने बनाता है और खुद ही परेशान होता है. नन्हे का रिजल्ट आ गया है उसने पहली बाधा पार कर ली है. जून भी निश्चिन्त हुए हैं. उसने da-vinci-code पढ़ ली है, बहुत रोचक किताब है. अज गुरूजी ने ‘योग वशिष्ठ’ पर चर्चा शुरू की. जीवन में दुःख है इसे पहचानना जरूरी है. तभी तो मन के पार जाया जा सकता है.

आज उन्हें यात्रा पर जाना है, इस यात्रा का उद्देश्य है नन्हे को सालभर की कड़ी मेहनत के बाद परीक्षा दिलाकर घर वापस लाना, परीक्षा से पहले उसे उत्साह दिलाना तथा उसका स्वास्थ्य ठीक रहे उसका ध्यान रखना. ईश्वर से प्रार्थना है कि वह उनकी यात्रा को सफल करे.

Tuesday, June 2, 2015

कान्हा की बांसुरी


आज सुबह गुरू माँ को कुछ देर सुना था, कह रही थीं कि अधिकतर महिलाओं को अपने पति की बचत आदि की कोई जानकारी ही नहीं रहती और अचानक जरूरत पड़ने पर बहुत परेशानी होती है. अभी कुछ देर पहले एक अनजान कॉल ने उसे कुछ देर के लिए व्यर्थ ही परेशान कर दिया, जो जून के बारे में पूछ रहा था, पर पता चल गया कि अभी भी डरने की शक्ति है ! जून को उसने फोन भी कर दिया, वह भी परेशान हुए होंगे शायद नहीं, उन्हें उसे अधिक अनुभव है. फोन उनके नये ड्राइवर का था, अभी दुबारा भी आया था, खैर ..जून ने आज ही अपना बीपी भी चेक कराया, थोड़ा अधिक है, उसे उनका ज्यादा ख्याल रखना होगा. किसी की सही कीमत का पता तभी चलता है जब उससे दूर जाने का भय हो. वह अपने मन की इस कमजोरी को नहीं जानती थी, आज का अनुभव कुछ नया सिखा गया है. वे संसार में रहते हैं तो प्रेमवश सभी से बंधे रहते ही हैं, पर इसी बंधन से मुक्ति ही तो मोक्ष है, आसक्ति से मुक्ति छोटे मन के लिए सम्भव नहीं पर जब कोई इस छोटे मन से पार चला जाये तो कोई भय नहीं, उस वक्त वह छोटे मन के साथ थी. आज पिताजी, बड़े भाई व छोटी ननद से बात की. पिताजी अब ठीक हैं पहले से. इसी महीने कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष सत्संग है उसे निमन्त्रण पत्र टाइप करने को दिया गया है, सेवा का छोटा सा कार्य...

आज पूर्णिमा है. रक्षाबन्धन का दिन. ‘जागरण’ में इसके महत्व पर सुना. सद्गुरु और कान्हा उसके लिए एक हो गये हैं. दोनों ही से वह साहित्य के माध्यम से मिलती है, फिर ध्यान के माध्यम से, दोनों मनातीत हैं. कल पढ़ा कि शरीर में होने वाली संवेदनाएं किसी न किसी भावना की द्योतक हैं, यदि संवेदना को देखें और देखते-देखते वह खत्म हो जाये तो वह भावना भी नहीं रहती. ध्यान में तभी उनकी सभी नकारात्मक भावनाएं समाप्त होने लगती हैं और वे साफ-स्वच्छ होकर बाहर निकल आते हैं. ध्यान एक तरह से स्नान ही हुआ न... भीतरी स्नान, फिर जब नकारात्मकता नहीं रहती तब ज्ञान प्रकट होगा, प्रज्ञा जगेगी. अभी रास्ता लम्बा है, पर रास्ता भी कितना मोहक है, अद्भुत है. सद्गुरु का ज्ञान इसे और भी मोहक और आनंद प्रद बना देता है. यह तो जन्मों की साधना है.

आज सत्संग उनके यहाँ है, जून का जन्मदिन है. सुबह से सभी के फोन आ रहे हैं. दो बजने को हैं. शाम बहुत व्यस्त बीतने वाली है. आज भी झकझोरने वाला प्रवचन सुना, संत निर्भीक होता है, वह सिर्फ देता है और जिसे कुछ चाहिए नहीं वह डांट भी सकता है. उनके सम्मुख जाते ही झूठ उजागर हो जाता है. आदर्शवादिता की बातें तो बहुत होती हैं पर उन्हें जीवन में उतारने से वे पीछे हट जाते हैं. सद्गुरु उस कान्हा की बांसुरी की तरह है जो स्वयं पीड़ा सहकर मधुर राग उत्पन्न करती है, वह कटती है, तपती है, विरह की पीड़ा सहती है तभी कृष्ण के अधरों से लगती है, वैसे ही संत, संत होने से पूर्व विरह की आग में जलते हैं फिर प्रभु से दीदार होता है. और प्रभु के मुख बन जाते हैं वह, उसकी तरफ से बोलते हैं, उसका कार्य करते हैं. जब किसी के जीवन में स्वार्थ नहीं रहता, झूठा गर्व नहीं रहता, वह भी उस प्रभु का साधन बन जाता है.



Thursday, May 14, 2015

रेत के महल


“नित्य-अनित्य, पुण्य-पाप का भेद जानना ही विवेक है, आसक्ति मिटाना वैराग्य है. तृष्णा ही दरिद्रता है, जब तृष्णा न हो, मन में समृद्धि हो, वही वैराग्य है. जब विवेक और वैराग्य सध जाये और साधना का सहयोग भी मिले तभी भक्ति का उदय होता है.” सद्गुरु के वचन उसके हृदय को शीतलता से भर देते हैं. कैसी अद्भुत शांति का अनुभव होता है, उनके वचन सुनने से जैसे तृप्ति नहीं होती, पर मन में कहीं गहरे संतुष्टि भरती जाती है. मन उसी तृप्ति को चाहने लगता है. तब इस जगत की बातें बहुत छोटी महत्वहीन लगने लगती हैं. यह माया जाल अपने पुर्जे खोल कर रख देता है. तब कहीं भी मन टिकता नहीं, सिवाय उसके. यह पल-पल बदलता संसार और रेत के महलों से इन्सान के स्वप्न ढहते नजर आते हैं. सब छलावा ही लगता है, सच्चा सिर्फ वही एक लगता है. सारे संबंधों के पीछे टिके स्वार्थ स्पष्ट दीखते हैं. इस जगत की सीमाएं भी दिखती हैं, देह की सीमाएं, रिश्तों की सीमाएं और मनों की सीमाएं. मन जो पल-पल रूप बदलते हैं, जो निश्छल नहीं रह पाते, जो कभी असत्य का सहारा भी ले लेते हैं और कभी सत्य से न डिगने का प्रण लेते हैं, बुद्धि भी रूप बदल लेती है तो फिर कोई किसका भरोसा करे. एक उसी का जो इन सबसे परे है, सभी प्रकृति के गुणों के वशीभूत होकर कार्य कर रहे हैं. मन परवश है, मुक्त वही  है जिसने मुक्त की बाँह थामी है, अपने स्व को जाना है. निज का आनंद जिसने पा लिया वह क्यों जायेगा जगत से आनंद का प्रसाद पाने, वह तो अपने आनंद को लुटाने का ही कार्य करेगा न. सद्गुरु ने उसके भीतर आनंद के जिस स्रोत का पता बताया है, वह अनंत है !

पिछले दो-दिनों से उसका मन संशय ग्रस्त है. संसार उसे अपनी ओर खींच रहा है और ईश्वर की भक्ति अपनी ओर. ऐसा विरोधाभास पहले तो प्रतीत नहीं हो रहा था. हृदय में जैसे कोई कुहरा छा गया है और यह कुहरा दम्भ का हो सकता है. कथनी और करनी में अंतर जितना अधिक होगा, दम्भ का कुहरा उतना घना होगा. मन पर कोई घटना कितनी देर तक प्रभाव डालती रहती है, इससे भी उसके घने होने का सबूत मिलता है. ऐसे में कोई उसकी सहायता कर सकता है तो वह है कृष्ण का प्रेम. उसे अपने स्वभाव में स्थित रहना होगा पूरी निष्ठा के साथ और दिखावे की आडम्बर की कोई आवश्यकता ही नहीं हैं. अंतर का प्रेम अन्तर्यामी उठने से पूर्व ही स्वीकार लेते हैं. जीवन का लक्ष्य एक हो, रास्ता एक हो और मन में दृढ़ता हो, तभी मंजिल मिलेगी. अंतर के प्रेम का झरना सूखने न पाए, रिसता रहे बूंद-बूंद ही सही ताकि संवेदना भीगी-भीगी रहे, वाणी में रुक्षता न आए, न आँखों में परायापन, प्रेम सभी पर समान रूप से बरसे ! साधक के लिए करने योग्य एक ही कर्त्तव्य रह जाता है, वह है इस संसार को असत्य मानना अथवा स्वप्न  मानना. उसके शरणागत होकर उसके संसार में काम आने का प्रयत्न करना, जीवन का लक्ष्य हो ईश्वर, रास्ता हो समर्पण और कर्म हो सेवा तभी वह  मुक्त है !

उसे अपने अवगुणों पर नजर रखनी होगी, वे पनपें नहीं बल्कि जड़ को उखाड़ फेंकना है. सबसे अधिक तो वाणी का दोष है. ज्यादा बोलना हानिप्रद है. बल्कि ज्यादा सोचना भी क्योंकि बोलने और सोचने में ज्यादा अंतर नहीं है. मन के भीतर भी बोलना नहीं होना चाहिए. लोगों से मिलते वक्त भी स्मरण बना रहे, तभी याद रहेगा कितना बोलना है. ईश्वर तो दूर वह स्वयं को भी भुला देती है और परिस्थिति की गुलाम बनकर कुछ भी बोल देती है जिसका परिणाम कभी भी सुखद नहीं होता. दूसरा अवगुण है, समय का दुरूपयोग. जीवन सीमित है, इसका एक-एक क्षण कीमती है. जीवन मिला है जीवन के लक्ष्य को पाने के लिए, सुख-सुविधाएँ जुटाकर देह को आराम देने के लिए नहीं बल्कि नियमों का पालन कर तन, मन, व आत्मा को निर्मल बनाने के लिए. चित्त की शुद्धि ही उसके पाने का मार्ग खोलती है. वही साध्य है और वही साधना !


Friday, March 13, 2015

बारिश और छाता


कबिरा इस जग में आय के अनेक बनाये मीत
जिन बाँधी एक संग प्रीत वही रहा निश्चिंत !

उस एक से जब लौ लग जाती है तो जीवन फूल सा हल्का हो जाता है, कोई रूई के फाहों की तरह गगन में उड़ने लगता है. वह एक इतना प्यारा है, इतना अपना कि दिल भर जाता है उसकी याद में. वह हर पल मित्र की तरह साथ रहता है, कुशल-क्षेम को वहन करता है. उसकी कृपा असीम है, अपार है, उस पर किसी का जितना अधिकार है उतना संसार की किसी भी वस्तु पर नहीं. उसकी सारी बातें ही निराली हैं, उसका बखान करना जितना कठिन है उतना ही आसान भी ! एक शब्द में कहें तो प्रेम वही तो है, सभी में उसका ही प्रकाश है. सद्गुरु की आँखों में उसकी ही तो चमक है, उनकी मुस्कान में उसका ही रहस्य झलकता है, उनके हृदय की गहराई में एकमात्र वही बसता है. उस अशब्द परमात्मा को शब्दों से नहीं जाना जा सकता. वह मौन है उसे मौन में ही ढूँढना होगा. कोई जितना-जितना अपने आस-पास की ध्वनियों के प्रति सजग होता जाता हैं उतना-उतना ही उसे मौन का भी आभास होता है. दो ध्वनियों के बीच का मौन और वह बेहद प्रभावशाली होता है, शब्दों से कहीं ज्यादा, उस मौन में उसे अपने होने का अहसास तीव्रता से होता है. अपने वास्तविक शून्य रूप का ! वही उन्हें पहुंचना है, जहाँ न राग है न द्वेष, न संयोग हैं न वियोग, न अच्छा न बुरा ! उस अद्भुत लोक में प्रवेश करने के लिए जीवन में साधना की आवश्यकता है. ध्यान का अर्थ है कोई अपने को जो आज तक मानता आया है उससे अलग सच्चे स्वरूप को जानना. ईश्वर को जानना हो तो अपने आप को जानना होगा.

आज सुबह ध्यान में नवीन अनुभव हुआ, जैसे वह एक गहरी सुरंग में उतरती जा रही है, फिर कुछ शब्द सुने जो अप्रिय थे. एक बार विपासना में सुना था आत्म मंथन के समय सभी तरह के अनुभव होंगे लेकिन यह याद रखना है जो उत्पन्न होता है वह नष्ट हो जाता है. यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है अत किसी भी अच्छी या बुरी संवेदना को महत्व नहीं देना है. मन को समत्व भाव में स्थिर रखना है. आज सुबह संगीत की कक्षा हुई. दोपहर को एक हास्य फिल्म देखी. अख़बार पढ़ा. नन्हा अभी तक कोचिंग से आया नहीं है, वर्षा हो रही है उसके पास छाता तक नहीं है. परसों शाम वह डांट खाने के कारण बहुत नाराजगी व्यक्त कर रहा था पर कल दोपहर उतनी ही ख़ुशी व्यक्त कर रहा था. हर रात के बाद सवेरा आता है, हर दुःख के बाद सुख. पिछले हफ्ते छोटी बहन का फोन सुनकर उसने उसे व्यर्थ ही सुझाव दिए. अस्वस्थ होना तो कोई भी नहीं चाहता पर अगर कोई किसी कारणवश हो भी जाता है तो दुखी होने का कारण नहीं है. “जो पहले नहीं था वह बाद में भी नहीं रहेगा” और वे मात्र शरीर तो नहीं हैं जो थोड़ी सी परेशानी से ही व्यथित हो जाएँ, भविष्य में ध्यान रखेगी. उन्हें अपनी आत्मिक शक्ति पर भरोसा रखना है. रोग तो शरीर के साथ लगे ही रहते हैं. बड़े-बड़े ऋषि, मुनि, संत यही तो कहते आए हैं कि जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग ये चार व्याधियाँ ऐसी हैं जिनका भाजन हरेक को बनना है. इनसे कोई जीवात्मा बच नहीं सकता. आत्मा जो परमात्मा का ही अंश है अपनी जीने की इच्छा के कारण ही देह धारण करता है और फिर इन चारों के चक्रव्यूह में फंस जाता है. माया का बंधन काट दें तो इन चारों का अस्तित्त्व नहीं रहता ! 


आज तीन महीनों की छुट्टियों के बाद नन्हा स्कूल गया है. उसका हृदय उसके लिए शुभाशीष और शुभकामनाओं से युक्त है. जैसे आज तक वह अपनी पढ़ाई में सफल रहा है वैसे ही आगे भी रहेगा. आज सुबह वे तीनों सुबह चार बजे उठे. वह समय से पहले ही तैयार हो गया था. जून और उसने सुबह साधना भी की. ईश्वर के सम्मुख होकर यदि वे अपने दिन का आरम्भ करें तो दिन भर मन सात्विक भावों से पूर्ण रहता है. कृष्ण उनके अंतर में ज्ञान का दीपक जलाकर स्वयंमेव तम को मिटने का संकल्प करते हैं. कल इस का अनुभव हुआ, गीता का एक श्लोक उसे अपने आप याद आया और मन में विचारों की एक अनवरत श्रृंखला.. जो एक भाव को ही पोषित कर रही थी, प्रवाहित होने लगी, जैसे तेल की धार. उसे विश्वास है कि एक दिन एक ऐसा क्षण इसी जन्म में आयेगा जब उसके मन में ऐसा ठहराव आयेगा जिसके बाद और दौड़ नहीं करनी होगी. जब मन ध्यान में टिकाना नहीं पड़ेगा बल्कि टिका रहेगा. अभी उस लक्ष्य से दूर है, पर कृष्ण उसके साथ हैं. अंतर में उसी का उजाला, बुद्धि में उसी का प्रकाश और आत्मा में उसी का प्रेम...वह प्रिय से भी प्रिय उसके मन पर अपना पूर्ण अधिकार कर चुका है ! वही उसे मुक्त करता है इस जग से !

Thursday, January 29, 2015

इदुलजुहा की रौनक


कल वह छह बजे से थोड़ा पहले उठी, दिन भर संसार का संग किया सो रात को देखे स्वप्न भी ईश्वर के नाम से संयुक्त नहीं थे. कल रात सिर में दर्द था, उस क्षण उसे सचमुच ही संसार दुखों का घर लग रहा था, जैसे शास्त्रों में वर्णन किया गया है. मन बहलाने के लिए वे चाहे लाख प्रसन्नता के उपाय कर लें लेकिन ख़ुशी टिकती नहीं, उसके लिए तो गोविन्द का ही आश्रय ही लेना पड़ेगा. उसने कृष्ण से प्रार्थना की इससे मुक्ति की ! इस जीवन का मोह नहीं रह गया है उसे, किसी भी क्षण इस कठोर दुनिया से उठ जाने के लिए तैयार है लेकिन अगला जन्म भी न हो ...इसकी गारंटी नहीं है सो...कृष्ण को आर्त भक्त नहीं भाते तो सोचा ज्ञान का आश्रय लेना चाहिए. यूँ अगर छोटी-मोटी बातों से मन व्यथित रहा तो मार्ग और भी लम्बा हो जायेगा. इस संसार में तो कहीं ठौर नजर नहीं आता, होश में आ चुके को तो कतई नहीं, पल-पल रंग बदलता है यह जग..स्वार्थ की भाषा बोलता है, पर कृष्ण की नजर से देखो तो कृष्णमय नजर आता है. फिर सब में उसी का रूप और सभी उस पथ के राही दीखते हैं. सब उसी के बनाये खेल के पात्र हों जैसे, तब कोई भेद नहीं रह जाता, कोई आक्रोश नहीं, यह सब एक महानाटक लगता है जिसके सूत्रधार कृष्ण  हैं, और तब मन शांत हो जाता है. अपनेप्रति, सम्बन्धों के प्रति और कर्त्तव्यों के प्रति सजग ! इन्द्रियां तब मन में, मन बुद्धि में, बुद्धि आत्मभाव में स्थित हो जाती है. तन फूल की तरह हल्का, मन रुई के फाहों सा ! कहीं कोई स्थूलता नहीं, कोई भारीपन नहीं, कोई अलगाव नहीं, वाष्प वत आत्मा और उसके निकट परमात्मा..   परसों वह उस सखी के साथ मृणाल ज्योति गयी थी. आज उसने बताया कि अभी वह स्वयं को इसके लिए तैयार नहीं पा रही, वह उस दिन परेशान रही, असहाय बेबस, बच्चों को देखना उससे सहन नहीं हुआ. नूना को भी उस रात स्वप्न आया कि आग लगने पर बच्चों को छोड़कर वह स्वयं अपनी जान बचाने के लिए भाग आती है.

कोई जो चाहता है, वह होता नहीं, जो होता है वह भाता नहीं और जो भाता है वह टिकता नहीं...इस बात को वे जितनी गहराई से समझ लें उतना ही जीवन सरल व सरस होगा. कृष्ण कहते हैं, मन में प्रसाद हो तो यह मानसिक तप है. करने की शक्ति, जानने की शक्ति और मानने की शक्ति सबके भीतर है, जिनका सदुपयोग करना है. कृष्ण की गीता अद्भुत है, विश्व में अनोखा ग्रन्थ है यह, पढ़ो तो लगता है कृष्ण सम्मुख बैठे हैं और प्यार से समझा रहे हैं. कितने भिन्न-भिन्न कोण से वह उन्हें समझाते हैं. कभी थोडा कठोर होते हैं कभी आश्वस्त करते हुए स्नेह देते हैं, कृष्ण की तरह उनकी बोली भी निराली है ! अभी बहुत कुछ सीखना शेष है, ज्ञान का अथाह भंडार सम्मुख पड़ा है, उसमें से मोती चुगने हैं.

कल एक आध्यात्मिक पत्रिका का अंक मिला, परसों भी एक अंक मिला था, छोटी ननद से बात हुई तो पता चला उन्होंने ही subscribe करायी है. आज मौसम ठंडा है, कल रात आंधी-तूफान और वर्षा हुई. कल शाम ही उन्होंने भिंडी के बीज लगवाये थे, पानी डालने का काम प्रकृति ने अपने ऊपर ले लिया. शाम को एक सखी के यहाँ जाना है कल उनकी शादी की सालगिरह है, परसों उन्हें यात्रा पर जाना है सो आज ही मना रहे हैं. उसे भी हेयर कट के लिए जाना है, मन के साथ-साथ देह की साज-संवार तो करनी ही पड़ती है. मानव का दुर्लभ तन ईश्वर ने ही दिया है !

कल इदुलजुहा है, उनकी नैनी के यहाँ ढेरों मेहमान आये हैं, जिनकी वह खातिरदारी कर  रही है. जून का ऑफिस बंद है. उन्हें तिनसुकिया जाना है, उसकी किताबें आ गयी हैं, जिन्हें वहाँ से लाना है. सुबह एक परिचिता के यहाँ कोरस में गाया जाने वाला गीत लेने गयी. उसे गले में खराश लग रही थी सो कुछ दिनों के लिए दही खाना बंद किया है आज से, जून ने भी कुछ दिनों से दूध-दही बंद किया है. उम्र के साथ-साथ खान-पान में कुछ परिवर्तन तो करने ही होंगे.


Wednesday, November 12, 2014

सोलर कुकर का मॉडल


जब चित्त में संसार का कोई भी ख्याल नहीं उठता है तब मन ठहर जाता है, भीतर परम मौन उभरता है और उसी शांति में परमात्मा की झलक दिखाई देती है. ध्यान करते करते जब प्राणायाम की विधि, मन्त्रजप व सारी चेष्टाएँ अपने आप छूट जाएँ तभी ऐसी स्थिति आती है ! जितना सच्चाई भरा व्यवहार होगा उतना अंतःकरण शुद्ध होगा और उतना ही ध्यान टिकेगा, मन में कोई उहापोह न हो कोई द्वेष की भावना न हो, अपने प्रति व दूसरों के प्रति ईमानदार रहें, ईश्वरीय आदर्शों की और जाने की आकांक्षा हो तो जीवन में सहजता आने लगेगी. आज सुबह जो सुना था उसमें से ये बातें उसे याद रह गयी हैं. अभी-अभी छोटी बहन से बात की, कह रही थी सभी को उसकी फ़िक्र है जानकर अच्छा लगा. कल रात को वर्षा हुई सो धूप तो अब नहीं है पर उमस बरकरार है. नन्हा स्कूल से आया तो वह रिहर्सल पर चली गयी वापस आयी तो नन्हा और जून दोनों अपना-अपना कम कर रहे थे. जून का मूड कुछ देर के लिए जरूर बिगड़ा पर उन्होंने अपने को फिर संयत कर लिया. वह चाहे कितनी देर बाहर रहें पर उसका बाहर रहना उन्हें खलता है, इसके पीछे क्या है यह तो वही जानते हैं. दीदी को मेल लिखे चार दिन हो गये हैं पर भेज नहीं पा रही है, जून से कहेगी ऑफिस से ही भेज दें, उन्हें प्रतीक्षा होगी. कल बंगाली सखी का जवाब भी आ गया अभी तक पढ़ा नहीं है.

उसके गले में दर्द है, पिछले दिनों ठंडा पेय पीया, शायद इसी कारण. शनिवार को नाटक है तब तक सभी को सेहत ठीकठाक रखनी है. आज से ठंडा पानी पीना बंद. जब वे स्वस्थ होते हैं तो देह की तरफ ध्यान भी जाता, अस्वस्थता जितनी विवश कर देती है पर बाबाजी के अनुयायियों को विवश होने की क्या आवश्यकता है, वह देह नहीं है, न ही मन या बुद्धि, बल्कि मुक्त, पवित्र, शुद्ध आत्मा है, इन छोटे-छोटे या बड़े भी दुखों का उस पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. कल दोपहर बाद तेज वर्षा हुई, बिजली भी चली गयी, उन्होंने अँधेरे में ही भोजन बनाने की तैयारी की तो पता चला अँधेरे में उनके रसोईघर में किन्हीं और प्राणियों का राज है. नन्हे ने कितनों को भगाया, आज नैनी पूरा किचन धो-पोंछकर साफ कर रही है. उसका काम बढ़ गया है, सो उसने कपड़े धोने के लिए मशीन लगाने का निश्चय किया. वाजपेयी जी के घुटने का सफल आपरेशन हो गया है, ईश्वर उन्हें दीर्घायु दे, देश को चलाने का जो बीड़ा उन्होंने उठाया है उसे पूरा कर सकें, पाकिस्तान के साथ समझौता करने में सफल हों ! आज नन्हा प्रोजेक्ट के लिए बनाया ‘सोलर कुकर’ ले गया है.

“ईश्वर का स्मरण करने से अहम् विसर्जित होता जाता है, राग-द्वेष संसार की चर्चा करने से होता है लेकिन ईश्वरीय चर्चा यदि मन में चलती रहे तो ये नष्ट हो जाते हैं तथा मानसिक दुःख से भी निवृत्ति होती है, एहिक सुखों और सुविधाओं में डूबा हुआ मन विपत्ति आने पर तिलमिला उठता है किन्तु ईश्वरीय भाव में युक्त मन चट्टान की तरह दृढ़ होता है, छोटे-मोटे दुःख वह साक्षी भाव से सहता है ऐसे ही सुख भी उसे प्रभावित नहीं करता वह शांत भाव से नश्वर सुख-दुःख को सहता है. ईश्वर असीम बल से परिपूर्ण करता है, क्योंकि वह पूर्णकाम है, कुछ पाना उसे शेष नहीं है. जितना सुखद जीवन है, उतनी ही सुखद मृत्यु भी है. मृत्यु एक पड़ाव है, नये सफर पर जाने से पहले की विश्रांति है. कर्मों का फल हर किसी को भुगतना पड़ता है. नये कर्म करने की आकांक्षा न रहे और पुराने कर्मों के बंधन काटते चलें तो मुक्त कहे जा सकते हैं”. आज बाबाजी ने उपरोक्त विचार कहे. यह बिलकुल सही बात है और उसे कई बार इसका अनुभव भी हुआ है जब वह ईश्वरीय विचार से दूर चली जाती है स्फूर्ति का अनुभव नहीं करती. सत्कर्म करने के लिए सद्प्रेरणा और सद्गुण उसे उन आदर्शों का सदा स्मरण रखने से ही मिल सकती है. संसार नीचे गिराता है और मन नीचे के केन्द्रों में जाकर तामसिक वृत्ति धारण कर लेता है. सात्विक भाव बने रहें इसके लिए प्रतिपल सजग रहना होगा. ईश्वर की अखंड अचल मूर्ति सदा सर्वदा आँखों के सम्मुख रखनी होगी जो प्रेरित करती रहे. उन का बल, शक्ति और आशर्वाद मिलता रहे, उनका स्नेह मिलता रहे और वह तभी सम्भव होगा जब वह उन्हें दिल से चाहेगी !


Monday, September 15, 2014

यादों की परछाइयाँ




 ध्यान वह स्थिति है जहाँ मन नहीं रहता अथवा तो मन समाहित हो जाता है, न भूतकाल की चिंता न भविष्य की कल्पनाएँ ! संसार समय की बदलती हुई स्थिति को दर्शाता है. ध्यान समय, संसार और विचार तीनों से पार ले जाता है. ध्यानस्थ मन ही ज्ञान का अधिकारी हो सकता है. ध्यान एक तरह से मन का स्नान है, मन उज्ज्वल होता है, हल्का होता है, स्वस्थ होता है अर्थात स्व में टिक जाता है, स्वच्छ होता है अर्थात निर्मल होता है. आज बाबाजी ने कितनी सुंदर बातें कहीं, जगत का अभिन्न उपादान ईश्वर है, जो इस जगत को ईश्वरमय जान लेता है उसका ध्यान टिकता है. आज सुबह छोटी बहन से बात की उसे इसी माह पुनः फील्ड ड्यूटी जाना है, अगले माह ही पूरा परिवार पुनः मिलेगा. कल शाम जून ने उसकी डायरी पढ़ी, वर्षों बाद उन्होंने ऐसा किया है. नन्हे की आज बायोलॉजी की प्रयोगात्मक परीक्षा है. कल रात खाने के समय उसका मनपसन्द कार्यक्रम टीवी पर देखने को नहीं मिला तो कैसे चुप हो गया था, हरेक के पास नाराजगी जाहिर करने का कोई न कोई उपाय है.

इस क्षण ऐसा लग रहा है, सब ठीक है. आज से दो हफ्ते पहले आज ही के दिन वे कितने उदास थे. एक बार पढ़ा था कि जब भी किसी दुःख या विपत्ति का सामना करना पड़े तो उसे दो हफ्ते या दो महीने बाद कल्पना में देखना चाहिए कि उस वक्त उसका क्या प्रभाव पड़ रहा होगा. दुःख की घड़ी में बुद्धि भ्रमित हो जाती है, सही निर्णय लेना तो दूर सही वार्तालाप भी नहीं कर पाते. अब माँ की यादें ही उनके साथ रह गयी हैं, वह स्वयं पूर्ण विश्रांति पा चुकी हैं. उसने याद करने की कोशिश की, पिछले वर्ष या पिछले महीने आज के दिन वे किस मनः स्थिति में थे. दुःख या सुख का अनुभव किया होगा किन्तु कुछ याद नहीं आया, वह समय बीत गया परन्तु वे फिर भी हैं ऐसे ही आज के सुख-दुःख भी बीत जाने वाले हैं. वे साक्षी भाव में उसे देखते चलें. उसमें डूब कर अपनी मानसिक, आत्मिक व शारीरिक ऊर्जा का हनन न करें. सन्त कहते हैं, सारा संसार सपना  है और जो उसे देखने के योग्य बनाता है वह परमात्मा ही अपना है. कल उसने बैक डोर पड़ोसिन के यहाँ, जो घर में ही पार्लर चलाती है, हेयर कट करवाए. बहुत अच्छे तो नहीं कटे पर जून ने कहा ठीक हैं, और उसके जीवन की नैया की पतवार तो उनके ही हाथ में है. गुजरात में कल फिर भूकम्प के झटके महसूस किये गये, भयभीत और पीड़ित लोग और घबरा गये. ईश्वर इतनी परीक्षा क्यों ले रहा है. धीरे-धीरे वहाँ जीवन सामान्य होता जा रहा था. पुनर्निर्माण का कार्य भी शुरू हो चुका है.

कल सुबह जून को उसने जब परेशान होकर कहा कि छोटे भाई ने फरवरी में आने के लिए मना किया था अपने बच्चों की परीक्षाओं के कारण और इस विषय में बहनों से ही उसकी बात हुई है तो वे सोच में पड़ गये. उन्होंने भी तो नन्हे की परीक्षाओं को महत्व देते हुए उनके बाद ही यात्रा करने का निर्णय लिया था. दोनों का ही दिन सोच-विचार में बीता, पर शाम होते-होते उन्होंने निर्णय ले लिया कि अब इस बात को यहीं छोड़कर आगे बढ़ने का वक्त आ गया है. बड़े भाई का फोन आया, उन्हें उसकी फ़िक्र है ऐसा लगा, उन्होंने पुनः फोन करने को कहा है. कल रात वे ठीक से सो पाए, फिर भी एक स्वप्न तो उसने पिछली कई रातों की तरह देखा जो माँ से जुड़ा था. अभी अभी ससुराल से फोन आया वे लोग इस महीने के अंत तक नये मकान में चले जायेंगे.

कल रात छोटे भाई का फोन आया, उसके अनुसार उन्हें इस बात का आभास नहीं था कि आने को मना करना इतना बुरा लगेगा. उन्होंने सामान्य तौर पर यह बात कही थी. छोटी बहन ने माना कि उसने ही पिता को इसके बारे में बताया था. जून ने भी सभी से बात की, इतने दिनों का उहापोह खत्म हो गया. उसने दीदी को भी धन्यवाद देने के लिए फोन किया जिन्होंने भाई को नूना की मनः स्थिति से परिचित कराया पर वह पूजाघर में थीं, उसने जीजाजी को संदेश दे दिया.  

आज सुबह बहुत दिनों बाद वे आराम से उठे, क्यों कि रात आराम से बीती. कल ‘जनगणना’ कार्यालय के कर्मचारी आये, उसने उनके प्रश्नों के उत्तर दिए. उनका घर जाना अब तय हो गया है. मन जैसे हल्का हो गया है. इस दौरान उन्हें भाई व दीदी के शहर भी जाना है. हो सका तो एक दिन के लिए मामीजी से मिलने उनके शहर भी जाना है. बड़ी बुआ जी के साथ भी एक दिन बिताना है. पैतृक निवास पर भी जाना होगा. चचेरी बहन से मिलना है. फुफेरी व ममेरी बहन से फोन पर बात करनी है. छोटी बुआ से भी वह बात करेगी, हो सका तो रास्ते में मासी के घर भी जाएगी. वह उन सब के साथ मिलकर माँ की उन यादों को बांटना चाहती है जो उनके मध्य साझी हैं. इसके अलावा अपनी किताब के लिए प्रकाशक की तलाश करनी है.   


Tuesday, August 6, 2013

आर्मी कैंटीन


अभी कुछ देर पहले ही एक सखी का फोन आया, कल दोपहर को उसने ‘मौन व्रत’ रखा था, सो फोन नहीं उठाया. उसने सोचा गाँधी जी की आत्मकथा में उपवास और मौन के बारे में पढ़ेगी. आज धूप तेज है जो उनके नये लगाये भिंडी और मकई के बीजों के लिए अच्छी है. इस समय उसका मन कैसे एक बात से दूसरी बात पर जा रहा है. आज पीटीवी पर एक मजाहिया ड्रामा भी देखा कुछ देर, कैसे दोनों पति-पत्नी एक दूसरे की मौत का इंतजार करते-करते एक दूसरे की फ़िक्र करने लग जाते हैं. अचानक उसे ख्याल आया बरसों बाद जब जून और वह रिटायरमेंट के बाद जीवन बिता रहे होंगे तो यह सब पढकर हँसेंगे, पर कुछ भी हो, कुछ तो मिलता ही है...घास की नोक पर ओस की बूंद सा सुख का अहसास या सुकून !

कल घर से पत्र आया, माँ ने लिखा है, शायद उसने अपनी पत्र लिखने की आदत छोड़ दी है, लो..और इधर वह उनका पत्र न मिलने से परेशान थी. यानि उन्हें भी पत्र समय पर नहीं मिल रहे हैं. आज बहुत दिनों बाद शाम से ही बादल घिर आये हैं, सुबह ही उसने उड़द दाल की बड़ी बनाई थी, हर साल की तरह किचन में ही सुखानी पड़ेगी. जून अभी क्लब से नहीं आए हैं, नन्हा पढ़ाई में व्यस्त है और वह अभी अभी पीटीवी पर यह सुनकर आ रही है कि इन्सान जिस तरह झाड़ियों से अपना दामन बचाकर निकलता है, वैसे ही संसार में रहते हुए संसार के गुनाहों से बचकर निकल जाना चाहिए. बुराइयाँ बुराई का रूप धरकर नहीं आतीं, वह रूप बदल कर आकर्षित करती हुई आती हैं, और लोग उनके वश में हो जाते हैं, उनसे बचना तभी सम्भव है जब हर वक्त  अल्लाह की मौजूदगी का अहसास होता रहे. अध्यात्मिक उन्नति करने के लिये पहले नैतिक बनना होगा. हर क्षण इस तरह बिताना कि पवित्रता का अहसास हो न कि अपराध बोध का. उसे महसूस हुआ की सारे धर्म एक ही बात कहते हैं.

आज सुबह वह नहाकर ‘एक योगी की आत्मकथा’ पढ़ने बैठी ही थी, फोन की घंटी बजी, अभिमान जगा और मन ने कहा उसी सखी का फोन होगा जिसने उसका फोन नहीं उठाया था, वह भी तो पाठ कर रही है, पर पांच मिनट बाद फिर घंटी बजी, उसी का था, अपने साथ आर्मी कैंटीन ले जाना चाहती थी, वे गये और उसने ढेर सारा सामान खरीदा, उसे भी ख़ुशी का इजहार करते हुए एकाध सामान खरीदना पड़ा और समय तो गया ही, इसी कारण घर में सफाई नहीं हो पायी. एक सखी के कहने पर उसने ढेर सारे मटर छिलवा कर फ्रिज में रखवाए हैं. इस उम्मीद में कि अब उन्हें गर्मी के मौसम में भी मटर-पुलाव व मटर-पनीर खाने को मिल सकेगा. इन्सान जन्मजात संग्रही होता है, अगले क्षण का भरोसा नहीं पर अगले महीनों, सालों के लिए जुगाड़ कर लेता है. मानसिक शांति व स्थिरता भंग करने वाले कारणों में एक यह संचयी प्रवृत्ति भी है.

हवा चलेगी तो मेरी खुशबू बहेगी
पाकिस्तान की शायरा से गुफ्तगू उसे पसंद आई और यह है उनकी गजल-

छुपा हुआ मेरा घर इस्तराब रहने दो
कि कर चुके हो बहुत अभी बात रहने दो

सफर का साथ है यह मंजिलों का साथ नहीं
गुजर ही जायेंगे लम्हे हिसाब रहने दो

शिकस्ता करके इन्हें फासले बढ़ा दोगे
सजे हुए मेरे हाथों में ख्वाब रहने दो

और इसके आगे चंद अश्यार उसके खुद के कुछ इस तरह हैं-

इकतरफा ही सही सिलसिला जारी रहे
जगह दो दिल में खत का जवाब रहने दो

सूखे हुए पत्तों को धीमे से रख वर्कों में
 घर के किसी कोने में किताब रहने दो

बरसों से उजड़े इस वीरान चमन से

 काट दो जंगल जंगली गुलाब रहने दो