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Friday, April 8, 2016

फूलों की घाटी


आज उसने अपने तीन ढीले-ढाले किन्तु सुंदर लिबास एक परिचिता दर्जिनी को दिए, वर्षों से उन्हें ऐसे ही पहनती आ रही थी, उसने कहा है, उन्हें उसके नाप का बना देगी. मौसम आज भी भीगा-भीगा है, एक बादलों भरा दिन ! कल अवकाश था, शाम को वे क्लब गये एक हास्य फिल्म दिखाई गयी. एक जगह साधना सत्र में ‘क्रिया’ करायी जानी थी, पर उसने जाने की जिद नहीं की, अब कोई आग्रह नहीं रह गया है, जून जाना नहीं चाहते सो वे दोनों वही करेंगे जो दोनों को पसंद है, ताकि अमन बना रहे. ‘क्रिया’ का अंतिम उद्देश्य भी तो अमन ही है न. फिर प्रेम करने का दम भरने वाले जिसे प्रेम करते हैं उसके लिए अपनी इच्छाओं का त्याग ही करना जानते हैं. ‘क्रिया’ से कुछ पाना भी शेष नहीं रहा, अपनी आत्मा व परमात्मा को जिसने एक बार एक जान लिया अब उसके लिए जगत में पाने योग्य कुछ शेष नहीं रहता, जिसे अमृत मिल गया अब वह और क्या चाहेगा. अगले महीने जून को दस दिनों के लिए बाहर जाना है, तब सम्भव हुआ तो कहीं भी जा सकती है, आर्ट ऑफ़ लिविंग, मृणाल ज्योति तथा अन्य किसी सेवा कार्य के लिए ! कल आचार्य राम की गोमुख यात्रा का विवरण पढ़ा, बहुत अच्छा लगा. वे भी कभी जायेंगे पहाड़ी यात्रा पर, फूलों की घाटी, बद्रीनाथ, केदारनाथ और धौला ! यह इच्छा भी वह अनंत को समर्पित करती है, वह चाहेगा तो फलीभूत होगी. ईश्वर हर क्षण उसका सहायक है, वह उसका मित्र है !

सत्संग एक साधक के लिए अमृत के समान है. आचार्य श्री का संग किया तो उसे भी कोई देवदूत मिल गया है. ध्यान में कितना अभूतपूर्व अनुभव घटा, जैसे कोई प्रेम से भिगो गया हो. एक मूर्ति क्षण भर में कितना-कितना स्नेह लुटा गयी, वह कोई दिव्य आत्मा थी शायद. सुबह प्राणायाम के बाद भी आज्ञा चक्र पर एक सुंदर विग्रह के दर्शन हुए. सूर्यदेव की कोई भव्य मूर्ति या कृष्ण..कोई उससे कुछ कहना चाहता है, वही परमात्मा है, वही इस जगत का नियंता है !


आज समय मिला है कि बैठकर अपने तथाकथित अधूरे रह गये कार्यों की एक सूची बनाये, ऐसे तो मानव के सारे कार्य कभी पूर्ण नहीं हो सकते, मृत्यु की घड़ी आ गयी हो फिर भी लगता है कुछ छूट गया है. सबसे पहले बात पत्रों की, दो पाठकों के पत्र आये थे, जिनका जवाब देना है. एक पत्र गुरु माँ को भी लिखना है भावांजलि भेजते हुए. कविताएँ टाइप करनी हैं, किताबों की आलमारी साफ करनी है नये कमरे की. लाइब्रेरी की किताब बदलनी है, कविगोष्ठी के आयोजन के बार में विचार करना है. आज कविताएँ पढ़ीं दिनकर की और भी कुछ कवियों की, अज्ञेय की भी. सभी के शब्दों के पीछे एक सवाल छिपा है, सभी को परम सत्य की तलाश है, उस परम सत्य की जो उन्हें झलक दिखाकर छिप गया है, जैसे कोई लुभाकर कुछ छिपा ले. कवि होना ही एक खोज होना है, भीतर एक हीरा होने का पता तो जिसे चल जाये पर वह हाथ नहीं आये. कवि न समाज का अंग रह पाता है जैसे और लोग रहते हैं, मात्र यांत्रिक जीवन जीने वाले और न ही वह संत की सी तृप्ति का अनुभव कर पाता है, वह इन दोनों के मध्य में रहता है, एक मधुर प्यास लिए, वह आनन्द के चरम को भी अनुभव करता है तो पीड़ा के गह्वर में भी उतरता है.

Thursday, February 25, 2016

संस्कारों के बीज


फिर एक अन्तराल ! नये वर्ष का चौथा महीना बीतने को है, कितने ही पल हाथ से गुजरते जा रहे हैं, कुछ खट्टे कुछ मीठे, वह साक्षी है उन सभी की. सभी के प्रति सम्मान का भाव सदा मन में रहता है पर कभी-कभी वाणी कठोर हो जाती है, पूर्व के संस्कार कभी-कभी प्रकट हो जाते हैं. उनकी भावनाएं चाहे शुद्ध हों पर कर्म जब तक उनकी साक्षी नहीं देते तब तक वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते. आज सुबह इतने वर्षों में पहली बार स्वीपर को भी उसके क्रोध का प्रसाद मिला. चाहे उनके क्रोध करने का कारण कितना भी सही क्यों न हो पर क्रोध सदा करने वाले को तथा जिस पर किया गया हो उसे, दोनों को जलाता है, क्योंकि क्रोध में वे द्वैत का शिकार होते हैं. क्रोध क्षणिक पागलपन ही है, वही बात जो वे क्रोध में कह रहे हैं, शांत भाव से भी तो कह सकते हैं. क्रोध के बाद सिवाय पछतावे के कुछ भी हाथ नहीं आता. उसके भीतर अभी भी कितनी नकारात्मक भावनाएं भरी हैं. इतने वर्षों का ध्यान भी उन्हें मिटा नहीं पाया, बीज रूप में वे संस्कार पड़े हैं जो मौका मिलते ही पनप उठते हैं, लेकिन गुरू का ज्ञान तत्क्षण हाजिर हो जाता है और भीतर प्रतिक्रमण होने लगता है, पुनः हृदय पूर्ववत शांत हो जाता है. लेकिन जहाँ वे शब्द गये हैं वहाँ तो पीड़ा पहुँच ही चुकी है, दूसरे की गलती होने पर भी उसे पीड़ा पहुँचाने का उन्हें कोई हक नहीं बनता, उसमें उनकी ही हार है, स्वयं के लिए ही उन्हें शांत रहना सीखना होगा.


सुबह पांच बजने से पूर्व उठी, सद्विचारों को सुना. क्रिया आदि की. भीतर झाँका तो पाया सम्मान पाने की, अपने लिखे लेख पर कुछ प्रतिक्रिया सुनने की आकांक्षा भीतर बनी हुई है. उसका लिखने किसी अन्य के लिए महत्वपूर्ण क्यों हो ? किसी को क्या पड़ी है कि पहले तो वह पढ़े फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी दे. यदि वह लिखती है तो इसलिए कि उसे उसमें सुख मिलता है, बस वही उसका प्राप्य होना चाहिए. ईश्वर ने उसे यश का भागी बनाकर अहंकार से भरने के लिए तो इस संसार में नहीं भेजा है. उसके जीवन का उद्देश्य परम सत्य को पाना ही तो है, उसमें बाधक हैं यश, सुख-सुविधाएँ, अति व्यस्तता. उसका जीवन तो कितना साधारण है, यहाँ एकांत है, समय है, साधना का उपयुक्त वातावरण है. ऐसा सहज, सरल, स्वाभाविक जीवन पाकर और क्या चाहिए. आत्मस्वरूप में स्थिति बनी रहे, बोध बना रहे, किसी को उसके कारण रंचमात्र भी पीड़ा न हो, उसके मन को भी कभी कोई दुःख स्पर्श न करे. सहज हों उसके सभी कार्य, उसके सभी संबंध भी सहज हों तभी तो भीतर सत्य प्रकट होगा. उसके लिए अनुकूल वातावरण भीतर बनाना है, कोई चाह नहीं, कोई कामना नहीं, कोई आकांक्षा नहीं, बस एक प्रतीक्षा ! कब आएगा वह, और एक अटल विश्वास कि वह परम भीतर प्रकटेगा अवश्य ! वह अस्तित्त्व, वह चिन्मय तत्व जो भीतर कभी नाद तो कभी प्रकाश रूप में दिखाई देता है, वह स्पष्ट हो उठेगा, पर उसके पूर्व धो डालना होगा सारा कलुष, धो डालनी होगी सारी आतुरता, सारा द्वेष, सारी असंवेदनशीलता, भरना होगा प्रेम से भीतर का वातायन !

Thursday, February 4, 2016

नदी का पाट


फिर एक अन्तराल, इस बीच बहुत कुछ घटा. जून के दफ्तर में दो-तीन दिन काम ज्यादा रहा. आर्ट ऑफ़ लिविंग के एक टीचर ने क्रिया करवाई. ड्राइंग-डाइनिंग में पेंट हुआ और आत्मा का ज्ञान दृढ़तर हुआ, उस पर जून की नाराजगी का असर पहले से कम हुआ, उन पर भी कम होना ही था, वह भी आत्मा के बारे में सुनने लगे हैं. दीदी दुबई से लौट आई हैं. उसे सभी की चिंता करने का मोह भी घटा है. सप्रयास कोई कार्य नहीं करना है. नियमित कर्त्तव्य तथा सहज प्राप्त कार्य व सेवा के कार्य बांधने वाले नहीं होते. उसे हर हाल में इसी जन्म में मुक्त होना है. परमात्मा की व सद्गुरु की उसपर विशेष कृपा है. उसे बुद्धि योग मिलाया है. भीतर की सूक्ष्मतम सच्चाईयों को समझने की बुद्धि प्रदान की है. अनवरत अनहद नाद की धुन गूंजती है, आत्मा का आनन्द फूट-फूट पड़ता है सो और नये कर्म बंधने का प्रयास व्यर्थ ही होगा. उसे संतोष का धन प्राप्त हुआ है. कितने जन्मों में उसने वही गलती दोहराई होगी पर इस जन्म में नहीं, सद्गुरु को देख-सुन कर तो जरा भी नहीं. वह कितने सहज हैं, मुक्त, आनन्द से भरे. उनके भीतर भी वही आत्मा है. सत्, चित् आनन्द वही परमात्मा है. आज ध्यान में उसकी उपस्थिति का अहसास हुआ. मन है ही नहीं, एक मौन है जो भीतर पसरा है, शांत नदी के चौड़े पाट की तरह जिसमें आकाश अपना चेहरा देखता है !

परमात्मा से प्रेम हो जाये तो यह जगत होते हुए भी नहीं दिखता. वह प्रेम इतना प्रबल होता है कि सब कुछ अपने आप साथ बहा ले जाता है, शेष रह जाता है निपट मौन, एक शून्य, एक खालीपन, लेकिन उस मौन में भी एक नये तरह का संगीत गूँजता है, वह खालीपन भी भरा हुआ है कुछ खास ही तत्व से. अभी कुछ देर पहले फोन की घंटी बजी, वह उठा नहीं पायी, पता चल गया लेडीज क्लब की किस सदस्या का था, वह अवश्य उस लेख के बारे में बात करना चाह रही होगी जो उन्हें क्लब के लिए लिखना है. कल उसे डेंटिस्ट के पास जाना था. एक दांत में rct कराने. कोई भय नहीं था. मन शांत था. डाक्टर ने दांत में दवा भरकर छोड़ दिया है, लगातार दवा की गंध मुंह में आ रही है. किन्तु उसने स्वयं को देह मानना छोड़ दिया है सो वह गंध परेशान नहीं कर रही. वह अपना सभी कार्य सामान्य रूप से ही कर पा रही है. बैंगलोर में एक सखी का आपरेशन होना था, हो गया है, शायद इतवार को वह लौट आये. दीदी से पता चला, छोटी भांजी आई है, उससे बात करनी है. कल शिवरात्रि है, उनके यहाँ सत्संग है. आज भी वर्षा हो रही है, मार्च का महीना यहाँ ऐसा ही होता है.
जैसे-जैसे कोई परमात्मा के निकट होता जाता है, वह सरल और सहज होता जाता है, तब छोटी और बड़ी बातों में कोई भेद नहीं रहता, सारे भेद मिट जाते हैं. वह पहले छोटी-छोटी बातों में उलझा रहता था, उनसे दूर हुआ और स्वयं को ऊपर उठाया फिर उन ऊपर की बातों से भी दूर हुआ और एक चक्र जैसे पूर्ण हुआ, अब कोई भेद नही रहा.


कल सत्संग में कम लोग आये, हलुए का प्रसाद बच गया. आज गुरूजी ने बताया, देह, मन, बुद्धि, प्राण, चित्त, अहंकार तथा आत्मा इन सातों स्तरों के बारे में जानना चाहिए. आत्मा के कारण ही इनका अस्तित्त्व है. एक अर्थ में सभी को आत्मा कहा जा सकता है, धीरे-धीरे उनसे ऊपर उठते जाना है, फिर आत्मा से भी परे स्थित परमात्मा को जानना है. 

Wednesday, October 28, 2015

कान्हा और राधा


क्रिया और पदार्थ दोनों से परे है आत्मा, कोई कितना भी जप, तप, ध्यान आदि करे, सब मन व बुद्धि के स्तर तक ही रहेगा तथा पदार्थ तो सम्भवतः वहाँ तक भी नहीं ले जाते, जहाँ से मन व बुद्धि लौट-लौट आते हैं. वह अछूता प्रदेश है आत्मा का, वहाँ कुछ भी नहीं है न कोई दृश्य न द्रष्टा, न कोई ध्वनि न प्रकाश, केवल शुद्ध चैतन्य, वहाँ कोई भाव भी नहीं, अभाव भी नहीं..वहाँ शुद्ध चेतना अपने-आप में है, बस वह परमात्मा में है या कहें वही परमात्मा भी है. उस क्षण दोनों एक हो जाते हैं और जब वही चेतना मन, बुद्धि के साथ जुड़कर संसार की ओर मुड़ती है तो जीवात्मा कहलाती है. आज सदगुरु ने नारद भक्ति सूत्र पर आगे बोलना शुरू किया, कितना सरल है उनसे गूढ़ शास्त्रों का अध्ययन करना, जो लोग उनके सम्मुख बैठे थे, वे कितनी तृप्ति का अनुभव करते होंगे. इस जन्म में उसके भाग्य नहीं हैं कि निकट से वह ज्ञान ले, पर टीवी के माध्यम से से ही सही उसका जीवन हर दिन उच्च होता जा रहा है. परमात्मा अपनी कृपा हर पल बरसाता है और अब उसे उस कृपा को समेटना भी आने लगा है, भीतर की प्रसन्नता का अनुभव अब अन्यों को भी लाभ देने लगा है, सभी जगें यही तो सद्गुरु की कामना है !

जीवात्मा में कारण शरीर, तेजस शरीर तथा आत्मा तीनों होते हैं. मृत्यु के समय तीनों स्थूल शरीर को छोड़ देते हैं तथा कारण शरीर में जो कर्मों का लेखा जोखा होता है उसी के अनुसार नया शरीर मिलता है. उसका अगला जन्म अवश्य ही किसी संत के करीब ही होगा, संतों के प्रति उसके मन में सहज स्वाभाविक प्रेम जो है. आज सद्गुरु ने होली का महत्व बताया. होली के एक दिन पहले भगवान शिव ने कामदेव को जलाया था होलिका भी जलकर राख हुई थी अर्थात उन्हें कामनाओं को दग्ध करना है, द्वेष को जलाना है तथा घर में जो भी टूटा-फूटा पुराना सामान है उसे भी जलाना है ताकि नये वर्ष में नया जीवन मिले. फागुन के बाद चैत्र का महीना नये साल का पहला महीना ही तो है. दूसरे दिन सभी खुश होते हैं तथा रंगों से एक-दूसरे को नहलाते हैं ! कल होली है उसे सभी के लिए कुछ लिखना है, दो-दो पंक्तियाँ ही सही, ऐसा कुछ जो उन्हें गुदगुदा जाये. उनका नया कमरा बन कर तैयार हो गया है, जून उसके लिए एक पेपर पर नाम भी लिख कर लाये हैं, सतनाम ध्यान कक्ष अगले हफ्ते वे उसे सजायेंगे जैसे कि उसने पहले कल्पना की थी. आज उसके लिए कार्पेट का आर्डर देने तिनसुकिया जाना है, उसकी पुस्तक का काम भी आगे बढ़ रहा है. जून उसकी पूरी सहायता कर रहे हैं, उस दिन के उसके रोष का असर हुआ है.


पिछले तीन-चार दिन व्यस्तता में बीते, पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार करके जून ले आये हैं. लेख का कार्य भी हो गया है, अब शेष है नये कमरे को सजाने का कार्य जो आज सम्भवतः हो जायेगा जब कारपेट आ जायेगा. उसकी साधना भी कम हुई पर नीरू माँ कहती हैं कि क्रिया और पदार्थ दोनों के बिना ही ज्ञान को हृदय में धारण करने से ही परम तत्व की प्राप्ति हो जाती है. सदा यह याद रहे कि वह आत्मा है, मन, शरीर व् बुद्धि नहीं है. आत्मा का गुण है शांति, जब भीतर का वातावरण शांत हो, प्रेमपूर्ण हो, आनन्दपूर्ण हो और संतुष्टि से भरा हो तो मानना चाहिए कि आत्मा में स्थिति है. पूर्ण सजग रहकर इसे बनाये रखना तथा मन, बुद्धि आदि में यदि कोई हलचल हो भी तो उसे साक्षी भाव से देखने भर से ही वह हलचल जैसे उत्पन्न हुई थी वैसे ही नष्ट हो जाती है. आत्मा में सारे ही गुण हैं, जहाँ प्रेम है वहाँ किस बात की कमी हो सकती है ? संसार के सुख जिसे फीके लगते हैं उसे ही इस आत्मा की प्राप्ति होती है, सद्गुरु की कृपा से ही उसे यह अमूल्य धन प्राप्त हुआ है और परमात्मा की कृपा से ही सद्गुरु जीवन में आते हैं ! नये कमरे के लिए काफी पहले जून एक सुंदर मूर्ति लाये थे, वह कृष्ण उसके ध्यान कक्ष में राधा के साथ विराजमान हैं, उसमें उसने प्राण प्रतिष्ठा की है अब वह जीता-जागता है, जड़ नहीं है, वह सदा उनके साथ है. सद्गुरु की मुस्कुराती हुई तस्वीर भी इस कमरे की शोभा बढ़ा रही है, उन्हें देखकर चेहरे पर अपने-आप ही मुस्कान आ जाती है, वह भी उनके साथ हैं. मीठी-मीठी गुंजन जो उसके दायें कान से सदा सुनाई देती है, उन्हीं का पता बताती है. 

Thursday, September 10, 2015

कृपा की बदली


सद्गुरु की कृपा हर क्षण उसके साथ है, गुरू के वचन अमृत के समान होते हैं जो भीतर की सारी कलुषता को धो डालते हैं. उसका मन इस समय शक्ति से भरा है, भविष्य के प्रति आशावान तथा वर्तमान के प्रति सजग ! परमात्मा हर क्षण उसके साथ है, कभी-कभी वह उसे याद न करे तो ‘वह’ उसे याद करता है और तब बिना किसी वजह के वह मुस्कुराने लगती है, गाने और नाचने लगती है. वह अनोखा है, अद्भुत है. उसकी महिमा के गीत यूँही तो नहीं गाये गये. वह क्या है यह तो शायद वह भी नहीं जानता..
सद्गुरु कहते हैं, कोई समस्या मूलक भी बन सकता है और समाधान मूलक भी. यदि वह केंद्र से जुड़ा रहता है तो समाधान दे सकता है, जुड़े रहने के लिए एक आधार चाहिए एक सूक्ष्म तन्तु जो भक्ति ही हो सकती है. यदि कोई परिधि पर ही रह गया तो दूसरों के साथ-साथ स्वयं के लिए भी  समस्या खड़ी कर सकता है. आत्मा केंद्र है, मन परिधि है, मन स्वयं ही योजनायें बनाता है फिर उन्हें तोड़ता है. वह कल्पनाओं का जाल अपने इर्द-गिर्द बुन लेता है. उन्हें सच्चाई की ठोस जमीन चाहिए न कि कल्पना का हवा महल.. वे सत्य के पारखी बनें !


आज ध्यान से पूर्व उसने प्रार्थना की कि सुदर्शन क्रिया के लाभ पर कुछ ज्ञान मिले. भीतर एक विचार कौंध गया ध्यान के दौरान, ‘क्रिया असम्भव को सम्भव बना देती है’. इस एक वाक्य में ही सारी बात छुपी है. हो सकता है सद्गुरु और भी कुछ कहना चाहते हों पर उसका मन ध्यान में भी चुप होकर कहाँ बैठता है. खैर..असम्भव काम तो मन को शांत करना ही है उनके लिए और क्रिया इसे भी सम्भव कर देती है. क्रिया भीतर का सुख देती है, भीतर का द्वार खटखटाना सिखाती है. भीतर अमृत से भरा घट है, जिस पर मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के चार पर्दे पड़े हैं, क्रिया उन्हें हटाती है. न जाने कितने जन्मों की कितनी गांठें भीतर बाँध रखी हैं कितने दुःख, कितने भय तथा दर्द भीतर दबे पड़े हैं. क्रिया उन्हें निकाल कर अंतः करण स्वच्छ करती है, जैसे कोई ब्यूटी पार्लर जाये और नया सा, सुंदर सा होकर बाहर निकले वैसे ही मन को सुंदर बनाने का काम करती है. सहज होकर, निरहंकार भाव से यदि कोई क्रिया करे तो ‘वह’ अपना काम सुगमता से कर पायेगी. ब्यूटीशियन जैसे चाहे सिर को घुमाये वे कहाँ दखल देते हैं, क्रिया भी मन की ब्यूटीशियन है. पूरा खाली होकर मन उसके हवाले हो तो चाहे जिधर से वह उसे मोड़े..फिर जब बाहर आए तो मन आत्मा के दर्पण में चमचम करता हुआ दीखेगा, वे शायद स्वयं ही उसे न पहचान सकें !


सद्गुरु कहते हैं अपना प्रेम चढ़ाओ तो कृपा रूप में वही वापस मिलेगा, उसके अंतर्मन का सारा प्रेम उन्हीं चरणों में समर्पित है. प्रसाद भी वही होता है जो प्रभु के चरणों में अर्पित करके वापस मिलता है. जो वे देते हैं उससे कई गुना लौटकर ‘वे’ उन्हें देते हैं. उनकी कृपा का बखान करना सूर्य को दीप दिखने जैसा ही है, फिर भी हृदय चाहता है कि वाणी उसका बखान करे, आँखें चाहती हैं कि आंसू उनका बखान करें और मन चाहता है कि भाव उसका अनुभव कर उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैलाए ! कल शाम उसे ऐसा अनुभव हुआ कि अध्यात्म में रूचि होना ही एक कृपा है जो किसी-किसी पर बरसती है. वे शब्दों द्वारा किसी को आत्मा का कितना ही बखान क्यों न करें, वह न तो उसकी मिठास का अनुभव कर पायेगा न ही उसके रस का, वैसे ही जिसे कोई अनुभव नहीं है वह पढ़कर ‘रस’ का अनुभव कैसे कर पायेगा. परमात्मा स्वयं रसपूर्ण है पर उसका स्वाद तो उसकी अनुभूति होने पर ही मिल सकता है. उसने अब निर्णय लिया है कि जब तक कोई स्वयं न पूछे अनुभूतियों का जिक्र नहीं करना है, न ही उन्हें ईश्वर का बखान करना है जो यह भी नहीं जानते कि वे कौन हैं ? वे कहाँ उस ज्ञान की कद्र कर पाएंगे जो परम है, सत्य है. उनकी कोई गलती नहीं है, अभी उन्हें और चलना है, एक न एक दिन तो वे भी इस पथ के राही बनेंगे. उसे अपने भीतर उस अनंत प्रेम को छिपाए-छिपाए रखना है, प्रभु के सिवाय कोई उसे नहीं चाहता ! 

Friday, August 14, 2015

टिंडे की सब्जी


आज सुबह चार बजे ही नींद खुल गयी, रात को जल्दी सो गयी थी. मन अपेक्षाकृत शान्त है, किन्तु अभी भी पहले की सी स्थिरता नहीं आई है. यात्रा में ध्यान में जो व्यवधान पड़ा उसका असर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है. मन में बेवजह ही विचार चलते रहते हैं, कभी भूत के, कभी भविष्य के, कभी आत्मग्लानि के, कभी अहंकार के, वह साक्षी भाव से सभी को देखा करती है. उनके भीतर कितना कुछ भरा पड़ा है. एक ब्रहमांड बाहर है तो एक उनके भीतर भी है. कभी-कभी ध्यान में कुछ चेहरे दीखते हैं, कौन हैं वे, शायद उसके किसी पिछले जन्म के परिचित या उसके स्वयं के चेहरे ! उस दिन कैसा अजीब स्वप्न देखा था, एक पौधे के तनों के सिरों पर जानवरों के चेहरे, पौधा और जन्तु एक साथ. पौधा जैसे कीट बन गया था या कीट जैसे पौधा बन गया था. उसे यह बताने के लिए स्वप्न आया होगा कि द्वैत नहीं है. सब एक ही है. उस दिन आश्रम में भी तो यही विचार बार-बार मूर्त होता हुआ लग रहा था कि सभी कुछ एक ही तत्व से बना है, एक ही तत्व भिन्न-भिन्न रूपों में प्रगट हो रहा है. सब उसी एक आत्मा का विस्तार है. दृष्टिकोण यदि विशाल हो तो सारे छोटे-छोटे भेद, दुःख, दर्द खत्म हो जाते हैं. सद्गुरु उन्हें इसी विशाल दृष्टि को अपनाने को कहते हैं. मेरे-तेरा का झगड़ा अब बहुत हो चुका, अब तो उत्सव की बेला है, अमृत बरस रहा है, ज्योति जल रही है, प्रकाश में नहाना है तथा अमृत छकना है. भीतर तृप्ति तभी मिलेगी, नहीं तो जगत के सामान भरते-भरते उम्र निकल जाएगी और हाथ कुछ भी नहीं आएगा. उनके सम्मुख हर क्षण दो रास्ते होते हैं, एक प्रेय दूसरा श्रेय, चुनाव उन्हें करना है तभी कल्याण होगा !

जून आज आ गये हैं, उनका गला खराब है, इस समय आराम कर रहे हैं. आज सुबह वह देर से उठी, रात को देर तक पढ़ती रही फिर कुछ देर ध्यान किया और सुबह स्वप्न देखती रही. सद्गुरु कहते हैं जैसे ही नींद खुले उठ जाना चाहिए, सोये रहना ठीक नहीं है, तमस बढ़ता है, प्रमाद ही मृत्यु है. आज पढ़ा कि आयु मिली है ईश्वर की प्राप्ति के लिए, वे व्यर्थ ही सोकर गंवा देते हैं, उतनी देर ध्यान –भजन करें तो यह कमाई होगी. उसे ईश्वर ने कितनी सुविधाएँ दी हैं ध्यान-भजन के लिए, आजकल तो विशेष रूप से, थोड़ा सा घर का काम और हाथ में ढेर सारा समय परमात्मा को याद करने के लिए. आज दो घंटे ध्यान करने का प्रयत्न किया, पता नहीं कितनी देर वास्तव में ध्यान घटित हुआ. मन आजकल वश में नहीं रहता, यहाँ तक कि क्रिया के वक्त भी इधर-उधर भाग जाता है, वह शेष समय उस पर ध्यान नहीं देती शायद इसीलिए ! गुरुमाँ ने कहा था कि जो विचारों से मुक्त है वही  मुक्त है. अब से मन पर ज्यादा ध्यान रखेगी. आज यहाँ कई दिनों बाद धूप निकली हाई. पहली बार एसी चलाया इस वर्ष. पहली बार टिंडे बने हैं. जून दिल्ली से लाये हैं, भिस, टिंडे तथा बेबी कॉर्न. कल दीदी का फोन आया था, परसों जीजाजी से बात की उन्हें लगा कि उसके भीतर वैराग्य ज्यादा ही जाग रहा है. उसकी एक सखी का भी यही विचार है उसकी सासूजी ने बताया और इधर उसे लगता है कि राग छूटता ही नहीं, राग-द्वेष से मुक्त मन ही तो ध्यानस्थ हो सकता है. सद्गुरु कहते हैं कुछ जान के चलो, कुछ मान के चलो, वे साधना के पथ पर प्रगति कर रहे हैं यह मानना ही चाहिए तभी प्रेरणा मिलेगी.     


Monday, July 13, 2015

सिलचर में कुछ दिन


मन जैसे खाली हो गया है, कुछ लिखने को नहीं है, कुछ कहने को भी नहीं है. वे घर में कुल मिलाकर दो ही प्राणी हैं, पर बात करने लायक कुछ भी नहीं है. उसके भीतर कोई विरोध नहीं है, न ही कोई अपेक्षा, एक उदासीनता है और शांति है. ऐसी शांति जिसे बाहर का कुछ भी खंडित नहीं कर पाता. सुबह पांच बजे नींद खुली, धूप तेज थी फिर भी सासुमाँ टहलने गयीं. हिम्मत की उन्होंने. आयीं तब तक उसकी ‘क्रिया’ खत्म नहीं हुई थी. चाय के लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ा. धैर्य दिखाया. फिर सात बजे उसे योग साधना का कार्यक्रम देखकर आसन करने थे सो उन्हें नहाने के लिए भेजा, फिर धैर्य दिखाया उन्होंने. बाल बनाने के लिए कहा, सुनकर उठीं. आलस्य के कारण शाम को एक ही बार बाल बनाने से कम चल जायेगा वे सोच रही थीं. उन्हें शायद इस बात पर भी थोड़ा रोष हुआ हो जब कहा कि सब्जी में तेल अधिक है. अब वह बड़ी हैं, पूज्या हैं, ठीक है लेकिन हर नयी पीढ़ी स्वयं को पुरानी पीढ़ी से अधिक जागरूक मानती है. उसे उन्हें कुछ भी कहने में कोई संकोच नहीं होता क्योंकि उसके भीतर उनके लिए अथाह प्रेम है, इस जगत के हर एक प्राणी के लिए, हर जीव के लिए, उस परमात्मा के लिए और परमात्मा के नाते उसकी सृष्टि के लिए प्रेम के सिवाय कोई भाव आ भी कैसे सकता है. जो एक बार परमात्मा के प्रेम में पड़ जाता है, वह सदा के लिए उसमें डूब जाता है !

आज ध्यान में सद्गुरु को अपने मन के निकट पाया, ध्यान में मन साधारण मन नहीं रह जाता कुछ और ही हो जाता है. मन आश्रम पहुंच गया और ऐसा प्रतीत हुआ वह उसका चिर-परिचित स्थान है अपना घर ! सुबह नींद चार बजे ही खुल गयी. आज टीवी पर गुरूजी को देखा. मस्ती का आलम था, भजन चल रहे थे फिर प्रश्न पूछे गये, हर प्रश्न का संक्षेप में सटीक उतर देना कितनी गूढ़ कला है पर जितनी सहजता से वे उत्तर देते हैं लगता ही नहीं कि उन्हें कुछ करना पड़ रहा है, वे सभी कुछ सहज होकर करते हैं. आज सुबह वह योग साधना कर रही थी कि फोन की घंटी बज उठी, उठने का मन नहीं हुआ, तारतम्य टूट जाये तो आसन ठीक से नहीं हो पाते. जाने कौन होगा, जो भी हो उससे मन ही मन क्षमा मांगती है. आज आषाढ़ की अमावस्या है, फलाहार का दिन. नन्हा और जून सिलचर में हैं. कल दोपहर तक ज्ञात होगा कि नन्हे को अगले चार वर्ष कहाँ बिताने हैं. सासू माँ  कल पैर में दर्द की शिकायत कर रही थीं, उनके पैर में घाव हो गया है और घुटने में दर्द है. इलाज चल रहा है. उसे लगता है बुढ़ापे में उन्हें ही रोगों का सामना करना पड़ता है जो जीवन भर अपने शरीर की देखभाल नहीं करते. उसके दायीं तरफ के घर में अस्सी वर्ष की वृद्धा को सब कुछ भूल गया है, अपना नाम भी !

आज सत्संग पंजाबी सखी के यहाँ था. उसने कहा कि सुबह सिर में दर्द था. इतने वर्षों तक ‘क्रिया’ करने की बाद भी वह इससे छुटकारा नहीं पा सकी, आश्चर्य होता है. अपने स्वास्थ्य के प्रति लोग जागरूक क्यों नहीं रहते ? जून ने फोन किया कि नन्हा रात को देर तक होटल में भी जगता है, टीवी देखता है जिससे उनकी नींद खराब होती है. एक बच्चा अपने पिता की अवज्ञा कर मनमानी करता है और मोह-माया में डूबा पिता कठोर नहीं हो पाता. लोग जीवन में जो भी दुःख उठाते हैं उसके जिम्मेदार स्वयं होते हैं. बचपन में ज्यादा लाड-प्यार के कारण माता-पिता बच्चों की हर इच्छा पूरी करते हैं, वह उसी का आदी हो जाता है. यहाँ घर में चाहकर भी वह माँ से घुलमिल कर बातें नहीं कर पाती है, ज्यादा बातें करना उसे पसंद भी नहीं  और दूसरे वह ऊंचा सुनने लगी हैं, तीसरे वह किसी न किसी की बारे में बात करने लगती हैं, चौथे उसके पास खाली वक्त भी नहीं होता. वह स्वयं भी देख रही हैं और इस तरह चुपचाप अपना-अपना काम किये जाने की अभ्यस्त होती जा रही हैं. कम बोलने से उनकी भी ऊर्जा बचेगी. उसे व्यर्थ ही स्वयं को दोषी नहीं ठहराना चाहिए. बस वाणी की मधुरता का ध्यान अवश्य रखना चाहिए !

बाहर भी शांति है और भीतर भी, आजकल उसे जरूरत से ज्यादा एक शब्द भी बोलना अच्छा नहीं लगता. जून और नन्हा आज कोलकाता जा रहे हैं. अभी सफर में कई दिन रहना है, ईश्वर उनकी सेहत ठीक रखे. वे स्वयं ही अपना ख्याल रखेंगे. ईश्वर उन्हें सद्प्रेरणा देगा. वह तो सदा ही देता है. उसने सोचा वे स्वयं ही अनसुनी कर देते हैं. वह सद्मार्ग पर चलने को कहता है पर वे स्वभाव वश उसी रास्ते पर चलते हैं जिसपर गड्ढा है, वे बार-बार गड्ढे में गिरते हैं, फिर उठकर सोचते हैं कि अब नहीं, पर स्वभाव, आदत हावी हो जाती है. होश में नहीं रहते न, होशपूर्वक जीना ही जीने कि कला है. सद्गुरु भी यही कहते हैं कि सजग रहो. वह निर्भयता का अनुभव करती है, सही बात कहने से डरती नहीं तथा अपने भीतर अनोखे आनंद का अनुभव करती है. सद्गुरु कि कृपा उस पर हो रही है. उसकी सबसे बड़ी कमी है वाणी का दोष, क्रोध तथा अहं. हर दिन की दिनचर्या लिखते समय इस बात का जिक्र सबसे पहले करना चाहिए कि पूरे दिन में कितनी बार वाणी का दोष हुआ और कितनी बार क्रोध तथा अहंकार का शिकार हुई !


Wednesday, June 3, 2015

पैर की मोच



इन्सान जो चाहता है, वह एक न एक दिन उसे मिलकर ही रहता है. चाहे परिस्थितियां वैसी न हों, जिसमें उसने वह कामना की थी. सेवा का अवसर मिले ऐसा उसने चाहा था पर इस तरह नहीं. खैर इसी का नाम जीवन है, यहाँ उतार-चढ़ाव उसी तरह आते हैं जैसे सागर में ज्वर-भाटा, यह प्रकृति का नियम है. समय सदा एक सा नहीं रहता. आज सुबह वे पौने पांच बजे उठे. कल रात को सोने में थोड़ी देर हो गयी थी. क्रिया आदि की, व्यायाम नहीं कर पायी, जो सांध्य-भ्रमण से हो जायेगा यदि जून समय पर आ गये. वह बिलकुल नहीं घबराए हैं सासु माँ के पैर की मोच देखकर. जो उनकी अनुपस्थिति में अपनी एक परिचिता के साथ उनकी किसी परिचिता के घर जाने पर उन्हें लग गयी है. ईश्वर उन सभी को ऐसी दृढ़ता दे. उनके मनों को इतनी शुद्धता भी कि किसी के प्रति कोई नकारात्मक विचार भी न पनपे. सभी अपने-अपने स्वभाव के अनुसार करते, कहते हैं.

कल से उसे गुरूजी बहुत याद आ रहे हैं, उनकी कृपा दृष्टि उस पर अवश्य हुई है ! आज क्रिया के बाद भी अद्भुत अनुभव हुआ, पहले वंशी की आवाज सुनाई दी फिर कहीं से विचार आया कि ससुराल में पिताजी बच्चों को डिब्बा खोल कर दिखा रहे हैं और रंग-बिरंगे हिलते-डुलते से कुछ आकार डिब्बे में दिखे, उस क्षण कुछ और सोचा होता तो वह भी दिखा होता. बाद में गुरूजी की भी एक झलक दिखी. ईश्वर की कृपा ही धूल के एक कण को हिमालय की विशालता प्रदान करती है. सीमित को असीमित कर देती है. उनका ज्ञान अद्भुत है और सबसे अद्भुत है उनका प्रेम...उसका मन एक ऐसी शांति से भर गया है, असीम स्नेह से, अनंत प्रेम से और अनोखे आनंद से कि इस क्षण यदि मृत्यु उसके सम्मुख आये तो बाहें फैलाकर उसका भी स्वागत करे. उसके 
हाथ इतने बड़े हो गये हैं कि सारा ब्रह्मांड उनमें समा सकता है !


शाम हो चुकी है, वे अभी टहल कर आये हैं. दिन भर कोई गंभीर अध्ययन नहीं किया, बल्कि आजकल पढ़ने का समय कम ही निकाल पाती है. पर मन में चिंतन चलता है. पढ़े हुए को मथकर उसे पचाने के लिए अलग से कोई समय नहीं निकलना पड़ता, कार्य करते हुए ही मनन चलता रहता है. कोई नकारात्मक विचार मन में टिकता नहीं, फौरन कृष्ण का नाम अंतर में प्रतिध्वनित होने लगता है. कभी कोई मन्त्र या भजन की पंक्ति चलती रहती है, फ्लैश बैक म्यूजिक की तरह. कृष्ण बिलकुल सच्चा वादा करते हैं कि उनके भक्तों के कुशल क्षेम का भार वह अपने सिर पर ले लेते हैं. इसलिए जीवन जितना सहज और हल्का आज लगता है वैसा पहले नहीं था, कुछ वर्षों पहले. अब ऐसा लगता है जैसे हर वक्त ही वह ध्यान में है. एक अनोखी ख़ुशी पोर-पोर से फूटती रहती है, फूल से जैसे सुवास फूटती है. कहीं कोई चाह शेष ही नहीं रह गयी है, जीवन जब उस जीवन दाता ने दिया है तो उसे ही यह अधिकार है कि उसे चलाये. वह जो उसके दिल में रहता है, जो उसे उससे ज्यादा जानता है., जो उसके विचारों को सतह पर आने से पूर्व ही पढ़ सकता है, जो जीवन का स्रोत है. 

Thursday, May 21, 2015

लोहड़ी के गीत


दस बजे हैं सुबह के, अभी कुछ देर पूर्व ही ‘क्रिया’ की. सुबह अलार्म सुना तो था, पर ठंड के कारण और रात को सोने में देर हो जाती है, इस वजह से अथवा तो प्रमाद के कारण फौरन बिस्तर नहीं छोड़ा, फिर नन्हे को स्कूल भेजने के कार्य में व्यस्त हो गयी. नैनी, स्वीपर के जाने के बाद ही बैठी, महाभारत व भगवद् गीता का पाठ करने के बाद. सुबह जून से बात की. वह परसों पिताजी से मिलने जा रहे हैं. आज यहाँ ठंड बहुत ज्यादा है, कोहरा और बादल दोनों ही हैं, अभी तक धूप नहीं निकली है. सुबह सत्संग भी नहीं सुना, कुछ देर स्वयं का ही भागवद पाठ सुना. कृष्ण की कथा का अमृत है भागवद्, जिसे पढ़कर उसके हृदय में कृष्ण के लिए अथाह प्रेम उमड़ा था. वह इतनी प्यारी बातें कहते हैं अपने ग्वाल-बाल मित्रों से, गोपियों से, सखा उद्धव से और मित्र अर्जुन से कि बरबस उन पर प्यार आता है. वह सभी को निस्वार्थ प्रेम करते हैं, बिना किसी प्रतिदान की आशा के, एकान्तिक प्रेम और जो उन्हें प्रेम करता है उसे वह अभयदान देते हैं, वह उनके निकट आकर निर्भय हो जाता है. ध्यान में उसे उनके क्षणिक दर्शन होते हैं, क्योंकि उसका ध्यान टिकता नहीं है.. पर ऐसा होगा एक दिन अवश्य कि साक्षात वह उसे मिलेंगे. वह उसकी हर बात जानते हैं. उसकी सारी छोटी-बड़ी इच्छाएं उनपर उजागर हैं. उसकी सारी कमियों के वह साक्षी हैं. उसका प्रमाद व लापरवाही भी उनसे छुपी नहीं है और उसका प्रेम भी..वह तो प्रकट होने को आतुर हैं, वे ही ऐसे अभागे हैं कि मन को इतर विषयों से मुक्त नहीं कर पाते, मन में संसार प्रवेश किया रहे तो उसे बिठाये कहाँ ? मन की ही चलती है ज्यादातर, वे जो वास्तव में हैं पीछे ही कहीं छिपे रह जाते हैं. जैसे कोई अपने ही घर में सबसे कोने में दुबका रहे और घर पर पड़ोसी कब्जा कर लें, वही हालत उनकी है. दुनिया भर की फिक्रें वे करते हैं बिना किसी जरूरत के पर जो वास्तव में उन्हें करना चाहिए उसके लिए समय नहीं निकाल पाते. आत्मा में रहकर ही विशुद्ध प्रेम का अनुभव होता है. आज नन्हे की किताब में तीन कार्ड देखे जो उसके क्लास की लडकियों ने दिए थे, यह भी एक तरह का प्रेम है !

आज लोहड़ी है, स्नान करते समय बचपन में लोहड़ी पर गाए जाने वाले गीत याद आ रहे थे. एक सखी ने फोन करके मुबारकबाद दी. जून को अभी-अभी फोन किया, वह घर पहुंच गये हैं, चाय पी रहे थे. उन्होंने मिठाई भिजवाई है, अभी उस दिन उनका भिजवाया गया सामान ऐसे ही पड़ा है, उनके बिना खाने का नन्हा और उसका दोनों का ही मन नहीं करता. आज नन्हे का स्कूल बंद है, देर से उठे वे. नौ बजे थे, वह ‘क्रिया’ कर रही थी कि एक परिचिता मिलने आयीं, नन्हे ने कह दिया, माँ नहा रही हैं, यह भी एक तरह का मानसिक स्नान ही तो है. जैसे दिन भर में देह व वस्त्रों पर धूल जम जाती है, वैसे ही मन पर भी विकारों की मैल चढ़ जाती है, जिसे हर सुबह वे क्रिया के माध्यम से स्वच्छ करते हैं. स्वाध्याय के माध्यम से भी उसे सुंदर बनाते हैं जैसे वह मन पर लगाने वाले क्रीम, लोशन आदि है.

ठंड आज भी बहुत है, नन्हा ऐसी ठंड में साइकिल से कोचिंग के लिए गया है. वह यहाँ हीटर के पास बैठी है. जून अभी घर पर हैं, सुबह उनसे बात हुई. उन्होंने पिता और भाई की तरफ से उसके लिए कोट खरीदा है, नन्हे के लिए भी स्वेटर खरीदे हैं. पहले ही वह सामान भिजवा चुके हैं. वे कितना भी सोचें कि अब उन्हें और कुछ नहीं चाहिए, पर जब भी नया कुछ मिलता है तो उसे लेते समय झिझकते नहीं और कर्मों के बोझ सिर पर चढाये ही जाते हैं. दुनिया ऐसे ही चलती है और ऐसे ही वे बार-बार जन्म लेते रिश्ते बनाते व निभाते चले आते हैं. ज्ञान होता भी है तो थोड़े से सुख के लिए उसे अपनी सुविधानुसार मोड़ लेते हैं. जीवन ऐसे ही चलता चला जाता है. आज ध्यान करते-करते और गीता पाठ करते समय भी कृष्ण की बातें जैसे मन को भीतर तक छूना चाहती थीं पर मन तो फोन पर की बातों में उलझा था, मन टिकता नहीं एक जगह, जब वे उसे प्रलोभन का शिकार होने देते हैं. आज सद्गुरु ने बताया, जीवन जितना परमार्थ के लिए होगा, सामर्थ्य उतना ही बढ़ेगा, स्वकेंद्रित होकर वे अपनी ही हानि करते हैं, स्व का विस्तार करना होगा. गहराई से देखें तो वे सभी एक ही तत्व से बने हैं, एक ही तत्व की तरफ जा रहे हैं. सभी को एक उसी की तलाश है...

Wednesday, April 8, 2015

कच्चे धागे पक्के रंग


आज सुबह ‘क्रिया’ के बाद ध्यान अपने आप लग गया, फिर भ्रामरी करते समय अद्भुत  दृश्य दिखे, कितनी सुन्दरता भीतर छिपी है. ईश्वर जहाँ है वहाँ तो सौन्दर्य बिखरा ही होगा. ईश्वर प्राप्ति की उसकी आकांक्षा को इन चिह्नों से बल मिलता है. सुबह सुना था, साधना को कभी त्यागना नहीं है, बाहरी परिस्थितियाँ कैसी भी हों, भीतर की यात्रा पर जाने से वे रोके नहीं. एक वर्ष होने को आया है उसे प्रथम अनुभव हुए. अगले वर्ष में और प्रगति होगी और उसे पूर्ण विश्वास है कि इसी जन्म में उसे आत्म साक्षात्कार होगा. उसे संगदोष का विशेष ध्यान रखना होगा, जल में कमल के समान रहने की कला सीखनी होगी ताकि संसार प्रभाव न डाल सके. वाणी का संयम सबसे अधिक आवश्यक है. मन को भीतर की ओर मोड़ना है. मधुमय, रसमय और आनंद मय उस प्रभु को पाना किना सरल है. अंतर्मुख होना है. चित्त की लहरों को शांत कर उसका दर्पण स्पष्ट करना है, वह अटल तो शाश्वत है ही.

अभी-अभी उसका ध्यान इस बात की ओर गया कि शीघ्रता पूर्वक लिखने से उसका लेख बिगड़ गया है. ईश्वर को चाहने वाले का तो सभी कार्य सुंदर होना चाहिए, क्योंकि वह इतना सुंदर है ! कृष्ण के बारे में कल विवेकानन्द के विचार पढ़े, वह उन्हें महापुरुष मानते थे, बहुत सम्मान करते थे और मन ही मन उन्हें प्यार भी करते रहे होंगे, ईश्वर भी मानते रहे होंगे. कृष्ण ऐसे मनमोहक हैं कि उनके बारे में पढ़कर, जानकर उन्हें कोई भी चाहे बिना नहीं रह सकता है. आज धूप सुबह से ही नजर आ रही है. सुबह वे आधा  घंटा देर से उठे, नन्हे को स्कूल नहीं जाना था, पर साढ़े छह तक सभी कार्य कर योगासन के लिए तैयार थी . सुबह संत मुख से तुकाराम के जीवन पर आधारित घटनाएँ सुनी. सभी संतों ने काफी कष्ट झेले हैं, उसके बाद ही उन्हें मान्यता मिली है. आग में तपकर ही सोना निखरता है. गुरुमाँ ने अंगुलिमाल की कथा सुनाई. अतीत कैसा भी यदि कोई सच्चे हृदय से पश्चाताप करे और भविष्य में ज्ञान का मार्ग पकड़े तो ईश्वर उसे तत्क्षण स्वीकारते हैं. अतः अतीत में न रहकर वर्तमान में रहने का उपदेश संत देते हैं. कर्म के सिद्धांत के अनुसार यदि वे इसी क्षण से सुकृत करें तो भविष्य सुधार सकते हैं. पिछले कर्मों का फल उठाने का सामर्थ्य ईश्वर देते हैं फिर कष्ट कष्ट कहाँ रह जाता है. उसने अपना मार्ग तय कर लिया है, मन में जो भी थोड़ी बहुत आशंका थी उसे गुरू की कृपा ने मिटा दिया है और अब ईश्वर ही एकमात्र उसके जीवन का केंद्र है, जिसका हाथ पकड़ा है और ईश्वर ने उसका !


आज छोटे भाई का जन्मदिन है, उससे फोन पर बात की पर बधाई देना भूल गयी, राखी की शुभकामनायें जरुर दे दिन. पिताजी आज घर पर अकेले रहेंगे, उनका समय टीवी, अख़बार, किताबें और संगीत में अच्छा गुजरता है. बड़े भैया-भाभी का फोन भी आया, छोटी बहन को उन्होंने किया. छोटी ननद का आया, बड़ी को उन्होंने किया. अब बाबाजी आ गये हैं, कह रहे हैं, रक्षाबन्धन आवेश और आवेग को नियंत्रित रखने का दिन है. सारे भयों से मुक्त होने का दिन है, ईश्वर के निकट जाने का तथा सभी के लिए मंगल कामनाएं करने का दिन है. कच्चे धागों का लेकिन सच्चे प्रेम का दिन है. अपने चित्त को अवसाद से बचना है, चित्त की सौम्यता की रक्षा हर हाल में करनी है. अभी प्रभात की सुमधुर बेला है, मन स्वतः ही शांत है, दिन भर सप्रयास इसे इसी भाव में रखने का पर्ण है ताकि रात्रि को सोते समय भी ईश का ध्यान शांत भाव में दृढ़ रखे ! अभी पड़ोसिन का फोन आया वह भी उनके साथ ‘मृणाल ज्योति’ जाएगी. आज पूर्णिमा है, उपवास का दिन, होता अक्सर यह है कि इसी दिन उसे व्यस्तता ज्यादा होती है, उपवास के दिन भर मौन रहने का विचार मन में है एक दिन तो ऐसा होगा ही. 

Friday, March 6, 2015

परीक्षा का परिणाम


ज्ञानी कैसा होता है इसका बखान अभी सुना, बाबाजी आज अपने ब्रह्मानन्द में मस्त थे. उनकी आंखों में कितना संतोष था, कितना प्रेम और कितना अपनापन ! जब टीवी में देखकर वह अपनी सुधबुध खो देती है, मन निर्विचार हो जाता है तो उन्हें प्रत्यक्ष देखने व सुनने से कितना लाभ होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है. वह इतनी सीधी, सच्ची और सरल भाषा में बात कहते हैं कि कोई अनपढ़ भी समझ ले. वह इतनी ऊंची पदवी को प्राप्त कर चुके हैं तभी इतने सरल व सहज हैं. उधर गुरुमाँ ने भी बुल्लेशाह की काफी गाकर मन मोह लिया. ईश्वर को पाने की प्यास हृदय में तीव्रतर हो जाती है जब ऐसा सत्संग मिलता है, पर फिर सांसारिक उलझनें मन को हर ले जाती हैं. आज सुबह एक परिचिता के यहाँ फोन किया, जहाँ योग शिक्षक ठहरे हुए थे, कोर्स के दौरान सुदर्शन क्रिया करने की अनुमति लेनी थी. पर उनसे बात नहीं हो पायी. मन को सभी प्रकार की इच्छाओं से मुक्त करना है चाहे वह इच्छा सुदर्शन क्रिया की ही हो. आकर्षण का फल सदा ही बुरा होता है चाहे वह आकर्षण अच्छी वस्तु का या बुरी वस्तु का. ‘क्रिया’ का उद्देश्य तो मन को एकाग्र कर के बुद्धि को भेदते हुए आत्म दर्शन करना है, जो इस क्षण भी हो सकता है यदि मन को शांत कर ले. सहज प्राप्य वस्तु को स्वयं ही दुर्लभ बनाकर उसे पाने की चेष्टा ही तो कर रही है, जैसे कि उसका महत्व बढ़ जायेगा. जैसे वे सहज प्राप्य ईश्वर को, आत्मा को, भिन्न-भिन्न उपायों से खोजते फिरते हैं. मन को खाली करना है पर उसे भरते रहते रहते हैं, शब्दों से और विचारों से, जो मानसिक जुगाली का ही काम करते हैं. वह जो शब्दों से परे है शब्दों से पकड़ में नहीं आ सकता. उसने यह अनुभव किया कि कामना मुक्त होना कितना शान्तिप्रद है और कामना करना तन-मन में कितनी लहरों को उत्पन्न करता है. जून आज डिब्रूगढ़ जाने वाले हैं. लंच पर नहीं आएंगे.

इस समय साढ़े ग्यारह हुए हैं, जून आज भी अभी तक नहीं आये हैं. नन्हे को बारह बजे कोचिंग क्लास में जाना है. वह अभी कुछ देर पूर्व ही व्ययाम करके उठी है. कल शाम को दो पत्र लिखे, हफ्तों से उनका जवाब देना रह जाता था. मौसम आज बेहद अच्छा है. सुबह संगीत अभ्यास किया. अगले महीने परीक्षा है. आज छोटी बहन का फोन आया, पंजाब बार्डर पर है. अभी कब तक रहना होगा कहा नहीं जा सकता. युद्ध के बादल छा रहे हैं. उसने बताया, छोटे भांजे को पचासी प्रतिशत अंक मिले हैं, दो दिन बाद नन्हे का भी परीक्षा परिणाम आने वाला है, अभी से सभी की निगाहें टिकी हैं, कुछ लोग मिठाई खाने की बात भी कह चुके हैं. यकीनन परिणाम अच्छा ही होगा. शाम को उन्हें दो जगह जाना है. हायर सेकेंडरी स्कूल में ‘हिंदी साहित्य सभा’ के लिए तथा बाद में ‘क्रिया’ के लिए. आज मन शांत है, कल जैसी उथल-पुथल नहीं है. कल सम्भवतः उसे कुछ हो गया था, गुरू की कृपा से ‘बहुत कुछ’ होने लगा है न उसी में से ‘कुछ’.

आज उसे एक और अनुभव हुआ, अहंकार बहुत सूक्ष्म होता है, कई बार उसे लगता है कि वह इससे मुक्त हो रही है पर इसकी जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि थोडा सा अनुकूल अवसर आने पर यह अंकुरित हो जाता है. गुरू कितने उपायों से इसे तोड़ना सिखाते हैं, पर वह उनसे ही नाराज हो जाती है. ईश्वर मानव के कार्यकलापों के साक्षी हैं, वे हर पल नजर रखते हैं, वह उपद्रष्टा हैं ! वह यह भी देखते हैं कि किस तरह वे अपने अहम् को पोषते हैं. यह जो कुछ बनने की, कुछ कर गुजरने की प्रवृत्ति है वह भी अहम् का रूप है. वह ही उन्हें कार्य करने की अनुमति देते हैं, लेकिन वह अनुमति उनके स्वभाव तथा पुर्वकर्मों द्वारा नियत किये हुए प्रारब्ध के अनुसार ही होती है. जीवन में जब भी कभी मानसिक उद्वेग या पीड़ा का अनुभव होता है इसके पीछे उसका अहंकार ही जिम्मेदार है. अहम् को चोट लगती है तो पीड़ा होती है और यह अहम् सत्य नहीं है मिथ्या है. इसको परत दर परत वे खोलते जाएँ तो वहाँ कुछ बचता ही नहीं. यह खोखला है, पोला है, इसका अस्तित्त्व है ही नहीं. वे इसे मान बैठे हैं. इस झूठ ने उन्हें सत्यरूपी ईश्वर से दूर किया हुआ है गुरू की नजरों में स्वयं को कुछ साबित करना भी अहम का विकृत रूप है और यह घृणित भी है. गुरू के समक्ष यदि वे अज्ञानी बनकर पूर्णतया खली होकर जायेंगे तभी तो गुरू कुछ प्रदान कर पाएंगे अन्यथा तो उनका ज्ञान ही उनके रस्ते में आयेगा. पूर्णत विनम्र होकर ही गुरू को रिझाया जा सकता है !     





Saturday, February 7, 2015

स्वेटर्स की धुलाई


कल शाम वह पहली बार aol के सत्संग में गयी. ॐ के उच्चारण से आरम्भ हुआ और फिर एक के बाद एक कई भजन गए गये. कृष्ण, राम, शिव और गणेश के नामों का उच्चारण संगीत के साथ श्रद्धापूर्वक किया गया. प्रसाद बंटा फिर एक महिला ने अपने अनुभव सुनाये. तेजपुर से इटानगर तक उनकी कार में गुरूजी ने सफर किया उनसे बातें की, पूरा परिवार बेहद उत्साहित व प्रसन्न था मानों उन्हें गुरू रूप में अमूल्य निधि मिल गयी हो. गुरू की महिमा ऐसी ही होती है. वापस लौटने में उसे देर हो गयी, पौने आठ बज गये जबकि चर्चा अभी जारी थी, जून को लेने भी जाना पड़ा और उन्हें इतनी देर होना भी नहीं भाया. खैर...भविष्य में क्या होगा भविष्य ही बतायेगा. रात को देर तक गुरूजी के बारे में सोचती रही. मन में कई विचार आ जा रहे थे, सब कुछ जैसे अस्पष्ट सा हो गया था. दो नावों पर पैर रखने वाले की स्थिति सम्भवतः ऐसी ही होती है. उसे अपना मार्ग स्वयं ही खोजना होगा. उपासना की भिन्न-भिन्न विधियों के जाल में स्वयं को उलझाना ठीक नहीं है. कृष्ण को अपने जीवन का आधार मानकर उससे ही ज्ञान पाना होगा. इस बार ‘महाभारत’ भी वे लाये हैं. स्टेशन पर ही मिल गया. अभी आरम्भ से पढ़ना शुरू नहीं किया है. कल द्वितीय खंड की भूमिका पढ़ी. सफाई का कार्य अभी चल रहा है, दो-एक दिन और चलेगा.

आज ‘जागरण’ में ध्यान की विधि सिखा रहे थे. सुंदर वचनों से हृदय प्रफ्फुलित हो उठा. कुछ देर संगीत अभ्यास किया फिर एक परिचिता आयीं अपने तीन-चार वर्ष के पुत्र को लेकर. जाते समय वह नन्हे के तीन-चार खिलौने लेता गया जो उसकी आदत है. अगले दिन माँ सबको वापस भिजवाती हैं. पुत्र मोह इन्सान से क्या-क्या करवाता है. आज नन्हा वाशिंग मशीन में स्वेटर धोने का कार्य कर रहा है. सभी स्वेटर धोकर अगली सर्दियों तक सहेज कर रखने होंगे. कल कुछ वस्त्र मृणाल ज्योति में देने के लिए निकाले, सोमवार को एक अन्य महिला के साथ वह वहाँ जाएगी. एक अन्य परिचिता का फोन आया, मुख्य अधिकारी की विदाई के लिए उन्हें दो कविताएँ चाहियें.


आज सुबह पौने पांच बजे उठी. जून ने मच्छरों के कारण नेट के अंदर ही क्रिया करने की तैयारी कर रखी थी जब वह ब्रश आदि करके कमरे में आयी. कल पहली बार एसी भी चलाया, गर्मी एकाएक बढ़ गयी थी. आज फिर बादल छा गये हैं. सुबह घर में सभी से बात हुई, पिताजी काफी ठीक लगे. छोटी बहन मेजर बनने वाली है मई में, उसे बधाई देनी है. गुरू माँ ने कहा, जिसके हृदय में प्रेम नहीं वह धार्मिक नहीं हो सकता, दिल में प्रेम हो, सरलता, सहजता हो, विश्वास हो तो ईश्वर की तरफ चलने के पात्र बन सकते हैं वे. ईश्वर जो उनके भीतर है उन्हें उनसे भी ज्यादा अच्छी तरह जानता है. उसे बाह्य आडम्बरों से कुछ भी लेना-देना नहीं है, वह तो मन, बुद्धि का साक्षी है. वे कितने भले हैं अथवा कितना ढोंग क्र रहे हैं, उसे सब पता है इसलिए उसके सम्मुख कोई दुराव नहीं चल सकता. खुले मन से उसे पुकारना है, खुली आँखों से उसे निहारना है. जिस मन में कोई छल न हो, जिन आँखों में कोई भ्रम न हो..