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Tuesday, March 7, 2017

श्वेत गैया


आज असमिया सखी के पुत्र का जन्मदिन है, जो कुछ वर्ष पहले तबादले के कारण यहाँ से चली गयी है, उसने फोन किया, वह खुश है कि एक और सखी वह जा रही है. यह संसार ऐसा ही है कोई आता है, कोई जाता है. वे देखने वाले हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं. कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. नन्हा, पिताजी और जून तीनों ने मिलकर गुरूजी के लिए दोपहर के भोजन का इंतजाम किया है. वे कमरे में भोजन कर रहे हैं और वे सभी बाहर खड़े हैं, वह भी बाहर है. गुरूजी हाथ धोने के लिए बाहर आते हैं, उन्होंने श्वेत वस्त्रों पर भूरे रंग का लम्बा चोगा पहना है, जब लौटते हैं, वह उन्हें प्रणाम करती है. उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं है, वह उनके चरणों पर झुकती है और मन में सोचती है यह उसे पहचानते नहीं, कि उनका कोई संबंध नहीं रहा, तब वह सिर ऊपर उठाती है कि एक आँख दिखाई पडती है. सामान्य आँख से दस गुना बड़ी रही होगी. उसका एक-एक भाग पूरा स्पष्ट था, उसके भीतर की सफेदी, काला भाग, द्रवता तथा ऊपर भौंहें भी, फिर वह आंख अपना तारा नीचे करती है और भीतर से एक और काला तारा दिखाई पड़ता है, एक आँख में दो पुतलियाँ देखकर वह आश्चर्य से बेहोश होकर गिरने लगती है, उसे सम्भाल लेते हैं जो लोग वहाँ खड़े हैं. भीतर भाव उठता है कि वह समाधि में प्रवेश कर रही है. इस स्वप्न का अर्थ यही हो सकता है कि परमात्मा की नजर हर वक्त उन पर है, वह एक नहीं दो-दो पुतलियों से, विशाल नेत्र से उन्हें देखता रहता है. कल रात भर वर्षा होती रही, अभी रुकी हुई है.

जून आज मुम्बई गये हैं, वह से बंगलूरू जायेंगे. दोपहर का वक्त है, एक पंछी की आवाज रह रहकर आ रही है. माली को बगीचे में कुछ ज्यादा काम बताया तो वह नम्र शब्दों में कहने लगा कल सुबह उठा दें तो वह कर देगा. सत्संग का असर पड़ने लगा है उस पर. आज पहली बार उसने एक ब्लॉगर की पोस्ट पर कमेन्ट करने के बाद लिखा, नई पोस्ट पर उनका स्वागत है, देखें वह आती हैं या नहीं. आज पिताजी ने चौलाई का साग साफ करते समय वही सब कहा जो माँ कहा करती थीं, तब वे उन पर हँसा करते थे. उन्होंने भीगे स्वरों में उससे यह भी कहा कि उन्हें बीस इंच की एक साइकिल चाहिए. जून के आने पर वह उनसे कहेगी कि इस इच्छा का मान रखें. वह बता रहे थे, चौदह-पन्द्रह वर्ष की उम्र से साइकिल चलाना शुरू किया था. और अगले साठ वर्ष तक चलाते रहे. अब इतना तो अभ्यास उन्हें है ही कि बिना गिरे चला सकें. उन्होंने जीवन भर दूसरों के लिए कार्य किया, स्वाभिमान से जीये. आज अपने मन की बात कहकर उन्हें अवश्य अच्छा लग रहा होगा.  

कल रात उसने स्वप्नों का स्वप्न देखा..The Ultimate Dream ! परसों एक गाय को देखा था, जो बिलकुल श्वेत थी, वह दौड़ती हुई आ रही है, तीव्र गति है उसकी. वह और गाय दोनों एक maze में घुसते हैं, वे नाच रहे हैं और गा रहे हैं, बहुत सुंदर गीत है वह, कुछ दिन पूर्व भी उसने स्वप्न में एक मधुर धुन बनाई थी. कल तो यह देखा कि वह यशोदा है कृष्ण की माँ जो पुनः इस जन्म में कृष्ण के प्रति प्रेम से भर गयी है और वह कृष्ण और कोई नहीं गुरूजी हैं, बाबा रामदेव को भी देखा एक क्षण के लिए, उनके चेहरे पर अप्रतिम तेज है. इस बात का भान होते ही उसके जीवन की बहुत सारी घटनाएँ स्पष्ट होने लगी हैं. दो दिन से नेट नहीं चल रहा है, यह भी अच्छा ही है. वह अन्यों को यश देने के लिए है, यश बटोरने के लिए नहीं. यश की कामना जैसे पूरी तरह गिर गयी है, गिर गया है अहंकार भी, गुरूजी के प्रति उसकी भक्ति का राज भी अब समझ में आने लगा है. आज उन्हें भी वर्षों बाद एक पत्र लिखेगी.   

Tuesday, July 26, 2016

गॉड लव्स फन


अगले दिन समुद्र तट पर कार्यक्रम था लोग फूल, मालाएं व उपहार दे रहे थे जिन्हें वह गुरूजी के हाथ से लेकर कार में रख कर आते थोड़ी देर में पुनः गुरूजी का हाथ भर जाता वह पकड़ा देते, रेत पर धोती पहन कर भागना बड़ा कठिन लग रहा था, डर था कहीं धोती में पैर न फंसे I गुरूजी को अब मंच पर जाना था, उन्हें आगे जाकर आसन बिछाना था, पर लोगों का हुजूम आगे जाने से रोक रहा था, लगभग भीड़ को धकेलते हुए जब तेजी से आगे बढ़े तो अचानक धोती खुल गयी, बहुत शर्म आयी, पर इतनी भीड़ में किसी का ध्यान नहीं था लोग गुरूजी की झलक पाने को बेताब थे जो अभी आने वाले थे, आसन बिछाने का काम किसी अन्य सहयोगी को सौंपा और किनारे पर जाकर धोती ठीक करने लगे, गुरूजी मंच पर पहुँच गए और अपनी जगह पर जाकर बैठ गये, रैम्प पर चल कर जब वह लौटे तो माइक हटा कर मुस्कुराते हुए बोले, अब सब टाइट है न ? हनी शर्म से पानी-पानी हो गये, कहाँ वह सोच रहे थे अच्छा हुआ किसी ने देखा नहीं, गुरूजी तो काफी पीछे थे, अब लगता है गुरूजी ठीक कहते हैं, God Loves Fun” I

उसी टूर की बात है, एक शाम दिन भर के थके एक हाल में जमीन पर ही अपने बैग पर सर रखकर लेट गये, सबके लिये कमरे नहीं थे, मच्छर भी काट रहे थे, माँ की याद भी आ रही थी, अपने घर का सुविधाजनक वातावरण छोड़ कर यहाँ अकेले सोये हैं, मन बहुत उदास था, सोचते-सोचते नींद आ गयी I सुबह क्या देखते हैं एक वरिष्ठ शिक्षक भी निकट ही फर्श पर सोये हैं I उनसे पूछा आपको तो सोने का स्थान मिला था फिर यहाँ कैसे? उनका जवाब सुनकर आँखों से अश्रुपात होने लगा, वे बोले आधी रात को गुरूजी का फोन आया, हनी हाल में अकेला रो रहा है, उसके पास जाओ I लगा कोई है जो माँ से भी ज्यादा ध्यान रखता है I पल भर में सारा दर्द कृतज्ञता में बदल गया I

यात्रा समाप्त हुई और वह घर लौटे, बहुत कुछ बदल चुका था, जीने में आनंद आ रहा था I पहले मन में क्रोध था, हिंसा थी, गुस्सा आने पर हाथ में पकड़ी वस्तु तक तोड़ देता था, why-why मन अब  Wow-Wow मन में बदल चुका था I प्रश्न वाचक चिन्ह ? का घुमाव सीधा होकर विस्मय बोधक ! चिन्ह में परिवर्तित हो गया था I खुशी-खुशी कॉलेज गये, कोर्स कर लिया था, गुरूजी के साथ रहे थे मन एक अद्भुत आनंद व शक्ति का अनुभव कर रहा था I पहले ही दिन कुछ लड़के पकड़ कर रैगिंग के लिये ले गए, मन में जरा भी डर नही था, उन्होंने व्यर्थ के सवाल पूछने शुरू किये, व्यर्थ के काम करने को कहे, मना किया तो दस-बारह लड़कों ने पकड़ लिया और उनके नेता ने लोहे की एक चेन निकाल ली I गुरूजी ने कहा था कि यदि किसी के मन, वाणी और भाव से हिंसा विलीन हो जाती है तो उसके सामने हिंसक प्राणी भी हिंसा त्याग देता है I जरा भी भय नहीं लग रहा था, भीतर गुरूजी के वचनों के प्रति विश्वास था, अचानक उस लड़के ने मारने के लिये उठाया हाथ नीचे कर लिया, कॅालर से पकड़ कर धक्का दिया और वे सब चले गये I उस दिन पता चला कि सबसे बड़ी ताकत क्या है? कि वे ज्यादा शक्तिशाली थे या भीतर का प्रेम व आनंद !  

Monday, July 25, 2016

लाल चावल


तब उम्र भी कम थी टीनएजर के ख़िताब से अभी निकले भर थे I किसी तरह इतना ही कहा कि सोचना पड़ेगा I आगे बढ़े, गुरूजी से मिलने आये एक परिवार में एक छोटी लड़की परीक्षा के आनेवाले परिणाम के भय से रो रही थी, गुरूजी ने कहा, क्यों रोती है? तू तो हर सुबह ओम नमो शिवाय का जप करती है न? लड़की रोना भूल कर आश्चर्य से बोली आपको कैसे पता? मुस्कुराते हुए गुरूजी कहने लगे, मुझे सब पता है I फिर उनसे बोले, कल सुबह सात बजे फ्लाइट है तुम छह बजे तैयार रहना हनी ने फिर कहा, सोच के बताऊँगा आँखों के सामने पिताजी का चेहरा आ रहा था कितनी मुश्किल से कुछ दिनों के लिये आज्ञा मिली थी अब दो हफ्ते और घर से दूर रहने पर वे अवश्य ही बहुत नाराज होंगे I लौट कर मित्रों को बताया तो उनका चेहरा देखने लायक था, उन्हें ईर्ष्या भी हो रही थी और वे खुश भी थे I रात भर सोचते रहा जाऊँ या न जाऊँ, जानना चाहते थे कि गुरु क्या होते हैं? गुरु तत्व क्या है ? अंततः निर्णय लिया कि जाना चाहिए, सुबह साढ़े छह बजे निर्धारित जगह पर पहुँचे तो पता चला गुरूजी चले गए हैं, रात भर जगने के कारण आधा घंटा देर तो हो ही गयी थी I अपना सामान उठाये पीछे लौट ही रहे थे कि एक बार फिर एक वरिष्ठ शिक्षक आये और बोले तुम हमारे साथ ट्रेन से चल रहे हो, तुम्हारा टिकट बना हुआ है, वह एक बार फिर आश्चर्य से भर गये,  समझ में कुछ नहीं आ रहा था, वह शिक्षक बोले, गुरूजी जानते थे कि देर से आओगे इसीलिए ट्रेन का टिकट बनवाया है I
तमिलनाडु पहुँचे तो गुरूजी का व्यस्त कार्यक्रम आरम्भ हुआ, सत्संग, सभाएँ, उदघाटन समारोह, मीटिंग्स, आदि आदि में सारा समय निकल जाता था I वह गुरूजी का बैग और आसन लेकर उनकी कार में पीछे बैठता था I सब कुछ ठीक था पर एक तो दक्षिण भारतीय भोजन फिर उसमें वहाँ लाल चावल मिलते थे, ठीक से खा नहीं पाता था कई बार भूख मिटती नहीं थी संकोच के कारण किसी से कह भी नहीं पाता था I एक दिन गुरूजी ने बुलाया और पूछा, ठीक से खा नहीँ रहे हो? वह चौंके किसने कहा होगा वही प्रश्न उठाने वाला मन सामने आ गया और गुरु की क्षमता पर सहज ही विश्वास नहीं हुआ लेकिन उसके बाद हर दिन उनके लिये उत्तर भारतीय भोजन की व्यवस्था होने लगी I यात्रा के दौरान एक बार कई गाड़ियों का काफिला जा रहा था, गुरूजी ने अपनी गाड़ी एक कच्चे रस्ते पर मोड़ने को कहा, एक कुटीर के सामने कार रुकी, एक बुजुर्ग महिला आयी और बोली कबसे प्रतीक्षा कर रही थी I गुरूजी ने उसे कुछ फल व पैसे दिए, कुछ दिनों बाद पता चला कि उनकी देह शांत हो गयी I
वे यात्रा के दौरान किसी एक स्थान पर ज्यादा नहीं रुकते थे, सारे कपड़े मैले हो गए थे, धोने का समय ही नहीं मिला था I चिंतित थे कि कल गुरूजी के साथ क्या पहन कर जाएंगे, तभी दरवाजे पर किसी ने खटखटाया, गुरूजी बुला रहे हैं, वह फिर डरते डरते उनके पास गये, कहीं कोई भूल तो नहीं हो गयी, एक धोती और अंगवस्त्र देते हुए वे बोले, कल इसे पहन लेना आश्चर्य से वह कुछ देर मौन खड़े रहे, यह बात तो अभी तक किसी से कही भी नहीं थी, कहा, पर उन्हें तो यह पहनना नहीं आता, तो वे कहने लगे इस धोती को साड़ी की तरह पहन लेना और ऊपर से अंगवस्त्र डाल लेना I

Friday, July 22, 2016

एडवांस कोर्स


२००३ आया, कॉलेज में अवकाश था I बैंगलोर आश्रम में एडवांस कोर्स होने वाला था I एक बार फिर मित्रों ने कहा बैंगलोर चलना है I पिताजी को मनाना आसान नहीं था, मन में विचार भी चल रहे थे कि यदि छुट्टियों में यहीं रहा तो पिताजी दुकान पर बिठा देंगे I बैंगलोर जाकर कोर्स नहीं भी किया तो कम से कम एक नया शहर घूमने को मिलेगा, सो युक्ति से पिताजी को मनाया और उन्हें तब महसूस हुआ कि जरूर कोई और भी चाहता है कि वह बैंगलोर आकर कोर्स करें, कि कोई शक्ति है जो उन्हें एक पूर्व निर्धारित मार्ग पर ले जा रही है I वे कुछ मित्र रवाना हुए I यात्रा के दौरान जैसा कि सभी के साथ होता है मन में विचारों की रेल भी चलती रही I इसे हनी why-why माइंड कहते हैं, आश्रम कैसा होगा? क्या रहने के लिये वहाँ कुटीर होंगे? क्योंकि एक सुविधाजनक वातावरण में वह बड़े हुए थे, सदा ए सी में सफर करना, अपनी ही वस्तुएं इस्तेमाल करना, अपने ही बिस्तर पर सोना, ये उनकी प्राथमिकताएँ थीं I किताबों में पढ़ी प्राचीन कथाओं के अनुसार झोपड़ियों वाले आश्रम का एक चित्र मन में बन गया था, किन्तु जैसे ही बैंगलोर आश्रम में कदम रखा मन में सन्नाटा छा गया I सारे विचार एकाएक रुक गए I शाम का समय था आश्रम में उत्सव का माहौल था I देखते ही देखते बत्तियां जल उठीं और सारा आश्रम सुंदरता का मूर्तिमान रूप बन सज उठा I भीतर से आवाज सुनाई दी धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है I अगले दिन से कोर्स शुरू हो गया, जिसमें उन्हें मित्रों से अलग कर दिया गया I मौन का पालन भी करना था, मन में आशा लेकर गये थे कि गुरूजी से भेंट होगी, पर अभी तक नहीं हुई थी, सो उदासी महसूस कर रहा थे I एक संध्या बालकनी में बैठे थे  गुरूजी ने ऊपर देखकर हाथ हिलाया तो हनी ने भी सबके साथ हाथ हिलाया, उन्हें लगा गुरूजी को उनका स्मरण कहाँ होगा, अगले दिन वह दूसरी तरफ बैठे गुरूजी ने फिर उन्हें देख कर हाथ हिलाया, इसके बाद एडवांस कोर्स बहुत अच्छा लगने लगा I पूर्ण मौन चल रहा था जो भीतर से जोड़ रहा था, कई प्रश्न पुनः उठने लगे जिनके जवाब भी भीतर से मिलने लगे I लगा ऐसा बहुत कुछ है जो दिखाई नहीं देता, सुनाई नहीं देता, बचपन के अधूरे सवालों के भी कुछ-कुछ जवाब मिलने लगे थे I

कोर्स के बाद सब प्रतिभागियों की विदाई से पहले गुरूजी एक-एक कर सबसे मिल रहे थे हनी एक कोने में थे वहीं से हाथ हिलाकर विदा ली तो गुरूजी ने हाथ की उंगलियां मोड़ कर जैसे अभिवादन का जवाब दिया मन में आया कहीं गुरूजी उन्हें बुला तो नहीं रहे फिर सोचा इतने सारे लोग प्रतीक्षा में खड़े हैं I वह कुछ ही दूर गये थे कि एक शिक्षक दौड़ते हुए आये और बोले, गुरूजी बुला रहे हैं उनके साथ लौटे तो उन्होंने एक रेलिंग का मार्ग रोक कर वहीं गुरूजी की प्रतीक्षा करने को कहा I अनेक लोग पीछे खड़े थे, गुरूजी वहीं से आने वाले थे I हाथ में पकड़ी माला घुमाते हुए अपने चिर-परिचित अंदाज में वह आये और अचानक उनका हाथ पकड़ कर भागने लगे, वहाँ खड़े लोग भी पीछे भागने लगे, पूरी भगदड़ मच गयी I उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था, कुछ दूर जाकर गुरूजी कहा, जा रहे हो? मत जाओ, आश्रम में रुक जाओ I
उन्होंने कहा, कल तो वापसी की टिकट बुक है, जाना ही होगा I
वे बोले, कल दो सप्ताह के लिये तमिलनाडु जा रहे हैं, लौट र मिलेंगे I
मन ने झट प्रतिक्रिया की, अकेला छोड़ कर खुद तो जा रहे हैं, फिर रुकने को भी कह रहे हैं !
गुरूजी बोले, ऐसा करो तुम भी मेरे साथ चलो उन्हें एक और झटका लगा पहले आश्रम में आकर बिना कुछ किये भीतर मौन का अनुभव, कोर्स के दौरान गुरूजी का हचानना, हाथ पकड़ कर भगाते हुए ले जाना और अब अपने साथ यात्रा का निमंत्रण! 

Thursday, July 21, 2016

हिमाचल के बाशिंदे


पिछले दिनों उसने आर्ट ऑफ़ लिविंग से जुड़े स्वामी मधुसूदन(हनी) की कहानी उनकी जुबानी सुनी और फिर शब्दों में उतारी. बहुत रोचक है. वह हिमाचल के बाशिंदे हैं I पिताजी व्यापारी हैं I वे दो भाई हैं I मधु छोटे हैं, उनके अनुसार स्कूल तथा कॉलेज में वह बहुत शरारती छात्र हुआ करते थे I कुछ मित्रों का एक गैंग था, जो धमाचौकड़ी मचाने में सबसे आगे रहता था I अन्य छात्रों की ऐसी परेशानियों को हल करने का भी उन्हें शौक था जिसमें कुछ दादागिरी करने का मौका मिले I बड़े भाई से सदा उनकी स्पर्द्धा चलती रहती थी I वह जो करते वही मधु भी करना चाहते I ऐसे तो अध्यात्म में कोई विशेष रुचि नहीं थी, यहाँ तक कि टीवी पर कोई दाढ़ीवाले बाबाजी प्रवचन दे रहे हों तो वह चैनल बदल देते थे I किसी बाबा की आँखों में नहीं देखते थे इस डर से कि कहीं वह सम्मोहित न कर दें, लेकिन एक बार जब वह कुछ दिनों के लिये बाहर गये, भैया ने ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ का बेसिक कोर्स कर लिया, लौटे तो उन्होंने भी कोर्स करने की जिद की I पिताजी ने कहा तुम अभी छोटे हो, २० वर्ष के होने पर ही कोर्स कर सकोगे पर वह इतनी प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे, सो फार्म में अपनी उम्र ज्यादा लिखवा कर चले गये I कोर्स में कुछ समझ में नहीं आता था I हर दिन कुछ गृहकार्य दिया जाता था, वह भी नहीं किया, लेकिन सुदर्शन क्रिया करने के बाद भीतर कुछ ऐसा परिवर्तन हुआ जो शब्दों में कहा नहीं जा सकता I मधु जब छठी-सातवीं का विद्यार्थी था तो अक्सर मन में कई विचार उठते थे..... इस सामान्य से प्रतीत होने वाले जीवन के पीछे अवश्य कुछ और भी है... केवल खाना-पीना, पढ़ना और सो जाना मात्र इतना ही तो जीवन का उद्देश्य नहीं हो सकता..... मन में प्रश्न भी उठते थे कि कौन सी शक्ति इस ब्रह्मांड का नियंत्रण कर रही है? मन में इतने विचार कहाँ से आते हैं? जीवन में एक नियमितता कहाँ से आती है? लगता था कि कई बातें एक अंतराल के बाद पुनः घटित हो रही हैं, लेकिन कारण समझ से बाहर था I इन सवालों का जवाब खोजने निकला तो शिक्षकों व मातापिता दोनों ने कहा इस उम्र में ऐसी बहकी-बहकी बातें क्यों करते हो, पढ़ने में मन लगाओ I धीरे-धीरे मन में सवाल उठने बंद हो गए और वह अपनी सामान्य दिनचर्या में व्यस्त हो गये I

सन् २००२ की बात है गुरूजी हिमाचल आ रहे थे, सत्संग स्थल निवास से आधे घंटे की दूरी पर था I जब मित्रों ने कहा सत्संग चलते हैं तो पहले तो मना कर दिया क्योंकि एक तो पिताजी कहीं भी आसानी से जाने नहीं देते थे, दूसरे उन्हें डर था कि सत्संग में जाने से इमेज खराब हो जायेगी, लोग क्या सोचेंगे? कौन उनसे मदद माँगने आयेगा? पर मित्रों ने जोर दिया और किसी तरह पिताजी को राजी कर वहाँ पहुँचे I गुरूजी के आने से पहले मंच पर बायीं ओर बैठ गये बल्कि यह कहना सही होगा कि उन्हें बैठा दिया गया I मन में तर्क-वितर्क चल रहे थे I लोग भजन गा रहे थे और मस्त थे, तार्किक बुद्धि ने सोचा बिना किसी कारण ये इतने प्रसन्न क्योंकर हैं ? तभी गुरूजी का प्रवेश हुआ, वे हाथ में पकड़ी माला को घुमाते हुए लगभग नाचते हुए से आये और आसन पर आराम से बैठ गए I बुद्धि ने कहा कि सत्संग में बड़े-बड़े वीआईपी आये हैं, गुरूजी उनको सम्बोधित करके जरूर कोई गूढ़ ज्ञान की चर्चा करेंगे किन्तु यहाँ तो बात ही कुछ और थी I एकदम अनौपचारिक ढंग से गुरूजी ने पूछा, ‘हाँ, सब कैसे हो? खुश हो? सबने ‘हाँ’ में उत्तर दिया, मन में विचार चलने लगे कैसे गुरु हैं यह?, कि तभी वे मधु की दिशा में पलटे एक पल रुके, फिर सामने देखा.. अगले ही पल फिर पलटे और उंगली से अपनी ओर आने का इशारा किया I सामने जो मित्र था उसे कहा, जाओ गुरूजी तुम्हें बुला रहे हैं, शायद उन्हेँ पानी चाहिए वह गया और लौट आया, गुरूजी ने फिर कहा, नहीँ तुम इधर आओ मेरी बायीं ओर दूसरे मित्र थे उन्हें मंजीरे देकर भेज दिया, पर गुरूजी ने कहा, तुम जो चश्मा लगाये हो इधर आओ, इधर-उधर देखा यकीन नहीं हो रहा था कि उन अनजान को वह क्यों बुला सकते हैं I डरते-डरते उनके पास गया, उन्होंने पूछा, हाँ, हनी कैसे हो? कुछ बोलना चाहा पर जवाब तो कुछ सूझा नहीं, भीतर प्रश्न उठा, आप को मेरा नाम किसने बताया? गुरूजी ने फिर कुछ सामान्य प्रश्न किये, खुश हो? पढ़ रहे हो? बिजनेस भी कर रहे हो? धीरे-धीरे मन संयत हुआ और जवाब दिए पर तार्किक मन भीतर सवाल कर रहा था हजारोँ लोग बैठे हैं और गुरूजी इतनी साधारण बातें कर रहे हैं I अंत में उन्होंने आश्रम आने का निमंत्रण दिया, घबरा कर ‘हाँ’ में सर हिला दिया I अपनी जगह आकर बैठे तो लगा जैसे कोई स्वप्न देखा हो, लेकिन भीतर कुछ बदल गया था I सत्संग के बाद घर पहुँचे तो कितने ही दिनों तक गुरूजी की याद बनी रही फिर अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गये I