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Friday, March 6, 2015

परीक्षा का परिणाम


ज्ञानी कैसा होता है इसका बखान अभी सुना, बाबाजी आज अपने ब्रह्मानन्द में मस्त थे. उनकी आंखों में कितना संतोष था, कितना प्रेम और कितना अपनापन ! जब टीवी में देखकर वह अपनी सुधबुध खो देती है, मन निर्विचार हो जाता है तो उन्हें प्रत्यक्ष देखने व सुनने से कितना लाभ होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है. वह इतनी सीधी, सच्ची और सरल भाषा में बात कहते हैं कि कोई अनपढ़ भी समझ ले. वह इतनी ऊंची पदवी को प्राप्त कर चुके हैं तभी इतने सरल व सहज हैं. उधर गुरुमाँ ने भी बुल्लेशाह की काफी गाकर मन मोह लिया. ईश्वर को पाने की प्यास हृदय में तीव्रतर हो जाती है जब ऐसा सत्संग मिलता है, पर फिर सांसारिक उलझनें मन को हर ले जाती हैं. आज सुबह एक परिचिता के यहाँ फोन किया, जहाँ योग शिक्षक ठहरे हुए थे, कोर्स के दौरान सुदर्शन क्रिया करने की अनुमति लेनी थी. पर उनसे बात नहीं हो पायी. मन को सभी प्रकार की इच्छाओं से मुक्त करना है चाहे वह इच्छा सुदर्शन क्रिया की ही हो. आकर्षण का फल सदा ही बुरा होता है चाहे वह आकर्षण अच्छी वस्तु का या बुरी वस्तु का. ‘क्रिया’ का उद्देश्य तो मन को एकाग्र कर के बुद्धि को भेदते हुए आत्म दर्शन करना है, जो इस क्षण भी हो सकता है यदि मन को शांत कर ले. सहज प्राप्य वस्तु को स्वयं ही दुर्लभ बनाकर उसे पाने की चेष्टा ही तो कर रही है, जैसे कि उसका महत्व बढ़ जायेगा. जैसे वे सहज प्राप्य ईश्वर को, आत्मा को, भिन्न-भिन्न उपायों से खोजते फिरते हैं. मन को खाली करना है पर उसे भरते रहते रहते हैं, शब्दों से और विचारों से, जो मानसिक जुगाली का ही काम करते हैं. वह जो शब्दों से परे है शब्दों से पकड़ में नहीं आ सकता. उसने यह अनुभव किया कि कामना मुक्त होना कितना शान्तिप्रद है और कामना करना तन-मन में कितनी लहरों को उत्पन्न करता है. जून आज डिब्रूगढ़ जाने वाले हैं. लंच पर नहीं आएंगे.

इस समय साढ़े ग्यारह हुए हैं, जून आज भी अभी तक नहीं आये हैं. नन्हे को बारह बजे कोचिंग क्लास में जाना है. वह अभी कुछ देर पूर्व ही व्ययाम करके उठी है. कल शाम को दो पत्र लिखे, हफ्तों से उनका जवाब देना रह जाता था. मौसम आज बेहद अच्छा है. सुबह संगीत अभ्यास किया. अगले महीने परीक्षा है. आज छोटी बहन का फोन आया, पंजाब बार्डर पर है. अभी कब तक रहना होगा कहा नहीं जा सकता. युद्ध के बादल छा रहे हैं. उसने बताया, छोटे भांजे को पचासी प्रतिशत अंक मिले हैं, दो दिन बाद नन्हे का भी परीक्षा परिणाम आने वाला है, अभी से सभी की निगाहें टिकी हैं, कुछ लोग मिठाई खाने की बात भी कह चुके हैं. यकीनन परिणाम अच्छा ही होगा. शाम को उन्हें दो जगह जाना है. हायर सेकेंडरी स्कूल में ‘हिंदी साहित्य सभा’ के लिए तथा बाद में ‘क्रिया’ के लिए. आज मन शांत है, कल जैसी उथल-पुथल नहीं है. कल सम्भवतः उसे कुछ हो गया था, गुरू की कृपा से ‘बहुत कुछ’ होने लगा है न उसी में से ‘कुछ’.

आज उसे एक और अनुभव हुआ, अहंकार बहुत सूक्ष्म होता है, कई बार उसे लगता है कि वह इससे मुक्त हो रही है पर इसकी जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि थोडा सा अनुकूल अवसर आने पर यह अंकुरित हो जाता है. गुरू कितने उपायों से इसे तोड़ना सिखाते हैं, पर वह उनसे ही नाराज हो जाती है. ईश्वर मानव के कार्यकलापों के साक्षी हैं, वे हर पल नजर रखते हैं, वह उपद्रष्टा हैं ! वह यह भी देखते हैं कि किस तरह वे अपने अहम् को पोषते हैं. यह जो कुछ बनने की, कुछ कर गुजरने की प्रवृत्ति है वह भी अहम् का रूप है. वह ही उन्हें कार्य करने की अनुमति देते हैं, लेकिन वह अनुमति उनके स्वभाव तथा पुर्वकर्मों द्वारा नियत किये हुए प्रारब्ध के अनुसार ही होती है. जीवन में जब भी कभी मानसिक उद्वेग या पीड़ा का अनुभव होता है इसके पीछे उसका अहंकार ही जिम्मेदार है. अहम् को चोट लगती है तो पीड़ा होती है और यह अहम् सत्य नहीं है मिथ्या है. इसको परत दर परत वे खोलते जाएँ तो वहाँ कुछ बचता ही नहीं. यह खोखला है, पोला है, इसका अस्तित्त्व है ही नहीं. वे इसे मान बैठे हैं. इस झूठ ने उन्हें सत्यरूपी ईश्वर से दूर किया हुआ है गुरू की नजरों में स्वयं को कुछ साबित करना भी अहम का विकृत रूप है और यह घृणित भी है. गुरू के समक्ष यदि वे अज्ञानी बनकर पूर्णतया खली होकर जायेंगे तभी तो गुरू कुछ प्रदान कर पाएंगे अन्यथा तो उनका ज्ञान ही उनके रस्ते में आयेगा. पूर्णत विनम्र होकर ही गुरू को रिझाया जा सकता है !     





Wednesday, March 4, 2015

कृष्ण की गीता


ज्ञानी गुरू की कृपा के बिना संसार सागर से पार होना असम्भव है, गुरू का हाथ उनके सिर पर रहे तभी उनका कल्याण होगा. कल के उत्सव में उसने एक कविता पढ़ी, जो सभी ने पसंद की, पर यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना यह कि गुरूजी ने ही उसे प्रेरित किया. कल उनकी पुस्तक पढ़ी. ज्ञान कितना अनमोल है यदि कोई इसे समझे, तो ही !
दोपहर को पन्द्रह-बीस मिनट ही सोयी पर भारीपन छा गया है, जबकि इससे अधिक देर तक ध्यान करने से भी थकान मिट जाती है. ध्यान में अवश्य ऐसी कोई बात है. आज सुबह बाबाजी ने अपने पुराने अनुभवों का जिक्र किया, उन्होंने विपरीत परिस्थियों में सात वर्ष गुजारे. ईश्वर प्राप्ति के लिए कठिन साधना करनी पडती है और आग में तपकर जब वह ज्ञान प्राप्त कर सके तो संत के पद पर लोगों ने उन्हें बैठाया. गुरू पद को प्राप्त करना अत्यंत कठिन है, और शिष्य बनना सम्भवतः उससे भी कठिन. अपने अहम् को मिटा देना होता है. विनम्र होकर ही गुरू से कोई कुछ पा सकता है. वरन अपने मिथ्या  अभिमान से वह स्वयं ही दबता रहेगा. अध्यात्म के मार्ग पर चलना बहुत कठिन है पर उतना ही मधुर भी...मानसिक तप करते करते मन को अपना दास बनाना है. मन ही उन्हें ऊंचाइयों पर ले जायेगा. मन की एक न सुनते हुए ज्ञान की सुनें, विवेक की सुनें तो सही मार्ग से विचलित नहीं होंगे. उसने घड़ी की ओर देखा, अब शाम के खाने की तैयारी का वक्त है.

परमात्मा की शरण में जाने पर हृदय अपने आप पावन होने लगता है. प्रज्ञा स्थूल होने पर ही अकरणीय कर्म कर बैठती है, बुद्धि यदि परमात्मा में स्थिर हो तभी प्रज्ञा सूक्ष्म होगी, यानि ईश्वर को ईश्वर से ही जाना जा सकता है. मन में न जाने कितने जन्मों के संस्कार हैं, जिनकी छाप इतनी गहरी है कि उसे मिटने में समय तो लगेगा ही. ध्यान के समय निर्विचारता की स्थिति आये उसके पूर्व लम्बे रस्ते से गुजरना होगा. कुछ देर के लिए ऐसा लगता है मन खो गया है पर जैसे ही यह भाव आता है फिर कहीं से कोई विचार प्रकट हो जाता है. ध्यान में बैठना लेकिन बहुत अच्छा लगता है. अज गुरुमाँ कहा कि संगीत अपने आप में कठिन साधना है और इसमें वर्षों लग सकते हैं. सुरों को मन में बैठना ही सबसे कठिन है. इस माह परीक्षा के बाद वह संगीत अध्यापक से विदा ले लेगी और पहले स्वयं रियाज करके जितना सीखा है उसे ही पचाना है. कल रात जून को नींद नहीं आयी, उसकी भी नींद थोड़ी डिस्टर्ब रही. शुभ-अशुभ की स्मृति न रहे, शुभ-अशुभ में प्रीति न रहे तो मन शांत रहेगा. कृष्ण ने कहा है, यदि सारे कर्मों को निष्काम भाव से करते हुए चित्त को उसमें लगाये रखेंगे तो वह बुद्धियोग प्रदान करेंगे. सभी परिस्थितियों में समभाव बनाये रखना भी चित्त को प्रभु में लगाये कहने जैसा ही है. अज वह न व्यायाम कर सकी न ध्यान, उसकी एक पुरानी छात्रा आयी थी, कलकत्ता में रहकर पढ़ी क्र रही है. आज सुबह क्रिया के बाद मन बेहद शांत था, बल्कि मन था ही नहीं, सिर्फ एक मौन था !

पिछले दो दिन डायरी नहीं खोली, शनिवार और इतवार इधर-उधर के कामों में कैसे बीत गये पता ही नहीं चला. कल शाम वह aol के भजन में गयी, योग शिक्षक आये थे, जब उन्होंने गुरू वन्दना शुरू की, उसका मन कृतज्ञता से आप्लावित हो गया. आज गुरुमाँ ने ध्यान की विधि बतलायी. विचार यदि आते हैं तो उनसे लड़ना नहीं है, असंग रहना है. एक विचार आता है वह चला जाता है, अगला अभी आया नहीं है. उस क्षण में स्थिर रहना है. गुरुमाँ नित नये तरह के वस्त्र पहनती हैं, बहुत प्यारी लगती हैं. कभी न कभी  इस जीवन में उनसे भेंट हो, यह उसकी हार्दिक इच्छा है और ईश्वर उसकी इच्छाएं सदा पूरी करते आये हैं ! बाबाजी ने बताया किस तरह संकल्प शक्ति को बढ़ाते जाना है. आत्मा में सुना, सब कारणों के कारण कृष्ण हृदय में रहते हैं, शुभ-अशुभ कर्मों तथा विचारों के साक्षी है. वही कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं. शरीर, मन और बुद्धि की दासता को त्याग कर जब कोई कृष्ण के प्रेम का बंधन स्वीकारता है तो सारा का सारा विषाद न जाने कहाँ चला जाता है !