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Monday, May 25, 2015

परमहंस की कथा


आज सद्गुरु ने सरल शब्दों में ज्ञान योग पर चर्चा की. हृदय की सारी गाँठे जैसे खुलती जा रही हैं. ‘मैं’ और ‘मेरा’ की माया में जो मन उन्हें भटकाता है उसे अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो रहा है. वह अलिप्त है, अकर्ता है, अभोक्ता है, अव्यक्त है, पूर्ण है, आनन्दमय है, ज्ञान से परिपूर्ण है. जैसे आकाश पर बादल आते और चले जाते हैं वैसे ही मन, बुद्धि आदि आत्मा कर चिदाकाश पर आने-जाने वाले बादलों के समान स्थित हैं, ज्ञान का सूर्य निकलता है तो स्वच्छ नीलिमा दिखाई पडती है !

‘साहित्य अमृत’ में श्रीरामकृष्ण परमहंसदेव की अद्भुत कथा पढ़ने को मिली, अनोखे संत थे वह, पर बहुत प्यारे. हँस माने ऐसा पक्षी जो संसार से सार( दूध) को ग्रहण करे और असार (जल) को छोड़ दे. उन्हें भी जीवन में सार्थक क्षणों को अपनाना है. इस छोटे से जीवन में इतना समय किसके पास है कि सभी कुछ ग्रहण करता चले. मन जितना खाली रहे उतना ही अच्छा है. कुछ भी ऐसा न हो जिससे किसी को दुःख हो, कर्त्तव्य का पालन करते हुए शेष सारे समय का उपयोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति में लगाना है. आवश्यकता और इच्छा में भेद को विवेक से समझना है. ज्ञान में जब तक स्थिति नहीं होगी, द्वन्द्वों से मुक्ति नहीं होगी.

आज टीवी पर रामायण का वास्तविक अर्थ सुना, सद्गुरु कह रहे थे, राम अर्थात आत्मा का जन्म किसी के भीतर तब होता है जब दशरथ अर्थात दस इन्द्रियों का मिलन कौशल्या यानि कुशलता से होता है. जीवन में मैत्री भाव और श्रद्धा होती है, जो सुमित्रा और कैकेयी हैं. मन या बुद्धि सीता है, जिसका हरण अहंकार रूपी रावण कर लेता है, तब हनुमान अर्थात श्वास की सहायता से अहंकार को पराजित कर मन को वापस लाते हैं. मन तथा आत्मा का मिलन होता है. इसी तरह महाभारत भी प्रतिपल हो रहा है. एक ओर लोभ आदि दुर्गुणों का प्रतीक दुर्योधन है तो दूसरी ओर सात्विकता का प्रतीक अर्जुन और आत्मा रूपी कृष्ण हैं. उन्हें प्रतिक्षण प्रेय अथवा श्रेय में से चुनना होता है, चयन ही भविष्य की नींव रखता है. आज अख़बार में पढ़ा कि मृत्यु कितनी सृजनात्मक है. जन्म होने की प्रक्रिया सदा एक सी है पर इन्सान कितने विभिन्न तरीकों से मरते हैं. हर व्यक्ति की मृत्यु किसी न किसी खास रोग अथवा कारण से होती है. अनगिनत रोग हैं और कितनी प्राकृतिक आपदाएं हैं. युद्ध, हिंसा, आतंक के शिकार भी होते हैं कुछ लोग और कुछ स्वयं ही अपनी मृत्यु का चुनाव करते हैं. जो जन्मा है वह मरेगा ही यह ध्रुव सत्य है पर जो मरा है वह पुनः जन्मेगा, यह तय नहीं है. वह मुक्त भी हो सकता है !

अभी कुछ देर पूर्व उसने बड़े भाई-भाभी से बात की, आज उनके विवाह की चौबीसवीं वर्षगाँठ है, फिर दीदी-जीजाजी से बात की, सभी ठीक हैं और सभी उसके प्रिय हैं उसी तरह जैसे इस जगत की हर शै उसे प्रिय है, क्योंकि वह सब कुछ उसके कान्हा का है. कृष्ण का नाम उसके कण-कण में एक सिहरन सी जगा देता है और आँखों में नमी, वह इतना असर डालता है कि कभी-कभी उसको याद करते डर लगता है कि किसी ने उसकी यह हालत देख ली तो..ईश्वर से प्यारा कुछ हो भी कैसे सकता है, एक उसी को जान लो तो सब कुछ अपने आप स्पष्ट होने लगता है. एक उसी को चाहो तो प्रकृति भी साथ देने लगती है. एक उसी का आश्रय ले मन, उसी को भजे तो संसार खो जाता है.

प्रातः वे समय से उठे, क्रिया आदि करके बड़ी को सुखाने के लिए रखा, कल दोपहर उन्होंने बनाई थी मेथी की बड़ी पर हमेशा की तरह वर्षा होने लगी, सो ओवन को गर्म करके उस पर रखा. नन्हे का आज फिजिक्स प्रैक्टिकल है. नैनी कल दिन भर नहीं आई थी, आज उसका काम ज्यादा हो गया है. उसे अभी पाठ करना है फिर ध्यान, समय का प्रतिबन्ध ‘ध्यान’ के लिए आवश्यक है ऐसा सद्गुरु ने बताया. जीवन में अनुशासन हो, नियम हो तो एक क्रमबद्धता आती है. मन में भी सुबह-सुबह पवित्र भाव उठते हैं, वैसे तो कृष्ण हर क्षण उसके साथ रहते हैं, वह जो भी है, जैसी भी है उनसे छिपा नहीं है पर वह उन जैसी होना चाहती है, जैसे वह गुणातीत हैं. सृष्टि के भीतर रहते हुए भी इससे अलग हैं. उनसा होने के लिए उनको जानना, उनको सुनना, उनसे प्रेम करना ही एकमात्र उपाय है. अध्यात्म ही अपने आप से मिलाता है !