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Wednesday, August 27, 2014

कालिया नाग पर नृत्य


आज चाचा नेहरू का जन्मदिवस है “बाल दिवस ! बाबाजी कह रहे हैं, “शरीर स्वस्थ रहे, मन में शांति रहे, हृदय में आनंद रहे, क्योंकि स्वास्थ्य, शांति और आनंद स्वाभाविक हैं, इनके विपरीत अस्वाभाविक हैं. इनको पाने की इच्छा शेष सभी तुच्छ इच्छाओं को निगल जाती है और अंततः वह इच्छा भी स्वयं ही शांत हो जाती है, हृदय शुद्ध हो जाता है और अपने सहज रूप को पा लेता है. आदि भौतिक कर्म से आदि दैविक फल मिले ऐसा प्रयास करना चाहिए क्योंकि वह कर्म स्वार्थ पर नहीं टिका होगा”. आज उसने क्लब की पत्रिका के लिए हिदी की रचनाओं हेतु दो-तीन महिलाओं को फोन किये, उसे भी दो रचनाएँ तैयार रखनी हैं.

आज दोपहर वह असमिया सखी के यहाँ जा रही है, उसे बुनाई में उसकी आवश्यकता है. कल शाम को क्लब की मीटिंग में होने वाले कार्यक्रम के लिए गीत का चुनाव हुआ, ‘तीसरी कसम’ के एक गीत को चुना है, सिखाने वाली हैं एक बंगाली महिला, कल वह पहली बार उनसे मिली, अच्छा स्वभाव है उनका. कल जून ने seven spiritual laws for success भी प्रिंट कर दिए. परसों शाम उन्होंने ही टाइप किये थे. आज सुबह उसने दो बातों के लिए उन्हें टोका, पर गलत बात के लिए टोका न जाये तो.... क्या किया जाये ? परसों नन्हे के स्कूल में वार्षिक उत्सव मनाया जा रहा है.

“अंतः करण की यमुना में सहस्र फन वाला कालिया नाग रहता है, आत्मा रूपी कृष्ण यदि जप और पूजन का नृत्य उसके फनों पर करता रहे तो सदियों की पुरानी आदत शीघ्र नहीं जाएगी, फन टूटेंगे फिर बनेंगे पर अंततः विजय आत्मा की ही होगी”. हमारे मानस में इच्छाओं, कामनाओं, और वासनाओं के अनगिनत सर्प फन उठाये बैठे हैं जिन्हें अपने वश में करना है. आज बाबाजी ने कृष्ण की कथा का सुंदर अर्थ बताया. चित्त जैसा देखता है वैसा होता है, सन्त को देखते ही ईश्वर का स्मरण होना स्वाभाविक है. आज नन्हे को नहाने के लिए जबरदस्ती बाथरूम में भेजा तो वह पूरे चालीस मिनट बाद निकला. इस सारे वक्त वह नहा तो नहीं रहा होगा बल्कि मुँह फुलाकर बैठा रहा होगा.

“रक्तबीज की तरह मन में विकारों के बीज गिरते हैं तो नये विकार उत्पन्न होते हैं, चंडी माँ की तरह रक्तबीज को खप्पर में एकत्र करते हैं तो विकार बढ़ते नहीं. मानस की उपजाऊ धरती न मिले तो बीज नष्ट हो जाते हैं”. बुद्धि के स्तर पर गोयनका जी की कही यह बात उसे समझ में आने लगी है पर व्यवहार के समय इसे अपना नहीं पाती. होशा जगा रहे तो ही यह सम्भव है. अनुभूति वाला ज्ञान जगने लगे तभी यह सम्भव है. आज सुबह दीदी का फोन आया, उन्हें भी गोयनका जी के प्रवचन के बारे में बताया.

दोपहर के एक बजे हैं, आज मसूर की छिलके वाली दाल बनाई थी जो बहुत गरिष्ठ होती है सो आज एक अलसता सी मन पर छाई है. धूप निकल आई है, पिछले दिनों वर्षा के कारण मौसम बेहद ठंडा रहा. कल फोन से सभी के समाचार मिले, वे एक-एक कर सभी को कार्ड भेज रहे हैं जो नन्हे ने बनाये हैं. कल उसे स्कूल से पुरस्कार में पांच किताबें  मिलीं, सभी उपयोगी हैं. आज शाम को उसे एक सखी के जन्मदिन की पार्टी में जाना है. उससे पूर्व जून को क्लब में होने वाली मीटिंग में जाना है जो ग्रेटर नोएडा में बनने वाले फ्लैट्स  के सिलसिले में है. उन्होंने भी एक फ़्लैट बुक किया है. वर्षों बाद जब वे रिटायर होकर यहाँ से जायेंगे तो उनके रहने के लिए एक घर सुरक्षित स्थान पर होगा जहाँ अपने जीवन के शेष दिन शांति से गुजार सकेंगे. नन्हा तब पढ़ाई पूर्ण कर नौकरी कर रहा होगा, उसका परिवार भी होगा. अगले दो दशकों में उनका जीवन कुछ और ही होगा. समय की धारा यूँ ही बहती चली जाएगी. पूसी के दो छोटे-छोटे बच्चों को आज देखा, बाहर भीगी जमीन पर गर्म पानी के बर्नर के पास एक के ऊपर एक सिमटे पड़े थे.  


  

Wednesday, February 5, 2014

बाल दिवस पर मस्ती


आज हफ्तों बाद डायरी खोली है. बहुत दिनों से न लिखने के कारण अभ्यास छूट गया सा लगता है. इस दौरान वे घर जाकर वापस आ भी गये. उसने वापसी में गोहाटी से असम सिल्क की एक साड़ी ली. एक दिन वह तिनसुकिया गयी, बालदिवस पर बच्चों को देने के लिए लेडीज क्लब की तरफ से ढेर सारे गिफ्ट्स खरीदे, जिन्हें कल एक सखी के साथ मिलकर पैक किया. सेक्रेटरी के कहने पर आज सुबह छह सदस्याओं को फोन किये, तेरह को मीटिंग है. जिन्दगी लहरों पर शांत भाव से बहती नाव की तरह आगे बढ़ी जा रही है. आज सवा नौ बजे के लगभग भूकम्प के दो झटके महसूस हुए. पिछले तीन दिनों से मौसम काफी ठंडा हो गया है, वर्षा भी हो रही है, चारों तरफ हरियाली और ठंडक है, ऐसा मौसम उसे भाता है. सुबह वक्त पर उठे वे, नन्हा आज पहली बार यात्रा के दौरान खरीदा ब्लेजर पहन कर स्कूल गया है.

आज ‘बाल दिवस’ है, चाचा नेहरु का जन्मदिन, आज ही ‘गुरुनानक जयंती’ भी है और नूना के पिता का जन्मदिन भी, दादी को अंग्रेजी महीनों का ज्ञान नहीं था उन्हें इतना याद था कि टुबड़ी के दिन पुत्र जन्म हुआ था. पड़ोस के बच्चे का जन्मदिन भी आज है और उड़िया सखी के बेटे का जन्मदिन भी. और इस वर्ष आज ही ‘गुड फ्राइडे’ भी है. कल उनकी मीटिंग अच्छी तरह सम्पन्न हो गयी, ‘रेकी’ पर एक भाषण दिया गया, किन्ही श्री और श्रीमती दास के गजल व भजन ने तो समां ही बाँध दिया. वह सात बजे वापस आ गयी, भोजन बनाया, जून ने सूप बनाकर रखा था, आज उन्होंने फलाहार लेने का व्रत लिया है शाम तक, रात जन्मदिन की पार्टी में जाना है. जून एक पेपर लिख रहे हैं उसी सिलसिले में दफ्तर गये हैं, नन्हा ‘बाल दिवस’ पर दिखाई जाने वाली फिल्म का इंतजार कर रहा है और उसने आज सुबह ‘परमहंस योगानन्द जी’ की पुस्तक पढ़कर पुनः ध्यान किया, मन स्थिर हो पाया मगर कुछ देर के लिए ही. मानव मन को न ही भौतिक सुखों में शांति मिलती है, न ही वह पूरी तरह अध्यात्मिक क्षेत्र में समर्पित हो जाता है, वह त्रिशंकु की तरह बीच में ही रहने को विवश है. लेकिन जो पूर्ण विश्वासी होते हैं उनके साथ ऐसा नहीं होता होगा. उसका शंकालु मन एक ओर टिकता ही नहीं. पिछले कई दिनों की स्वयं के आगे अनुपस्थिति इसी का परिणाम थी.

आज कई हफ्तों बाद संगीत कक्षा में जाना है. सोमवार है हफ्ते का प्रारम्भ. मौसम ठंडा है पर धूप भी पुरजोर है, सो ठंडक भली लग रही है. कल बच्चों के खेल आदि भी हो गये, सुबह जल्दी जाने वालों में वह प्रथम थी, शेष सभी धीरे-धीरे आराम से आ रहे थे. कार्यक्रम ठीक ही रहा जैसे इस तरह के कार्यक्रम होते हैं, कुछ शिकायतें, कुछ गिले. छोटे-छोटे बच्चों ने उत्साह से दौड़ में भाग लिया, उन्हें देखकर विशेषतया एक बच्चे को, जिसका नाम पंछी था, देखकर अच्छा लगा. उसे घर आने में दोपहर के दो बज गये, थकान भी हो गयी थी. भोजन बनाने के साथ ही जून ने सारे कार्य अकेले ही किये जो वे इतवार को मिलजुल कर करते हैं, शाम को वे बाजार होते हुए एक मित्र के यहाँ से गये, जिनके पिता इन दिनों आए हुए हैं, अंकल से मिलकर कई बातों का ज्ञान हुआ. वह अपने पुराने दिनों को बहुत मुग्धता से याद करते हैं, क्या सभी ऐसा करते हैं? युवा भविष्य की ओर देखते हैं और वृद्ध अतीत की ओर. उसने सोचा, अभी व्यायाम करना है, संगीत अभ्यास भी, आधा घंटा टीवी पर सैलाब देखना है, सो लिखना यहीं बंद करेगी, वैसे भी अभ्यास न रहने के कारण लिखने का मूड नहीं बन पा रहा है, किसी दिन देवी सरस्वती की कृपा होगी तो स्वयंमेव ही लेखनी से धरा फूटेगी, वह दिन जल्द ही आये ! आमीन !