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Tuesday, May 19, 2020

फूलों की रंगोली


आज नवम्बर का प्रथम दिन है, उन्हें यहाँ से जाने में  मात्र दस महीने रह गए हैं. आज उसने चार नए फूल झाड़ू मंगवा लिए हैं, जबकि एक झाड़ू चार महीने तो चल ही जाता होगा, अब कुछ भी मंगाने से पहले सोचना होगा. शाम के साढ़े सात बजने को हैं. आज भजन में कम ही महिलाएं थीं, पर अच्छा लगा. गुरूजी कहते हैं मस्त होकर भजन गाना चाहिए. किसी को यह समझने में पल भर की देर नहीं लगती कि कौन केवल अधरों से गा रहा है और कौन दिल से ! उससे पूर्व बगीचे में मालिन से काम करवाया. माली आज काम पर नहीं आया, उसके हाथ में चोट लगी है, वह डॉक्टर के पास नहीं जा रहा है, रोग बढ़ता जा रहा है. बढ़ई काम कर रहा है, खिड़कियों की जाली कई जगह टूट-फूट गयी है, उसे ही ठीक कर रहे हैं. एक मिस्त्री ने नालियों को ठीक-ठाक किया, लगातार तंबाकू खाता रहा, उसकी क्षमता कम हो गयी है, चीजों को ठीक से नहीं कर पा रहा था. बढ़ई भी बहुत दुबला-पतला है. मजदूरों को इतना श्रम करना होता है पर उन्हें पूरी खुराक नहीं मिलती. 

दोपहर को महिलाओं को योग नहीं करवा पायी, बरामदे में पेंटिग का काम तभी खत्म हुआ था, अब दीवाली के बाद ही  अगला सत्र होगा. ब्लॉग्स पर लिखने बैठी तो ज्यादा नहीं लिख पायी, अब पहले की तरह घँटों कम्प्यूटर पर बैठना नहीं भाता, परिवर्तन स्वाभाविक है. नैनी ने कहा, उसे रंगोली के लिए रंग चाहिए, वह अपने पति से कहकर मंगवा सकती है, उसे पैसे देकर कहा, क्योंकि आज तक कभी भी उसने रंगोली के रंग नहीं खरीदे. वह फूलों से ही रंगोली बनाती है सदा. आज सुबह क्लब की एक सदस्या का फोन आया, वह बहुत प्यार से बात करती है, किसी की वाणी में इतनी मधुरता पता नहीं कहाँ से आ जाती है. किसी के भाव मधुर होते हैं यानि दिल का अच्छा होता है पर वाणी कठोर होती है. किसी के कर्म अच्छे होते हैं. जिसमें सभी कुछ अच्छे हों यानि भाव, वाणी और कर्म ऐसे तो कोई सद्गुरु जैसे बिरले ही होते हैं.  कल की प्रतियोगिता में उस मृदुभाषी महिला ने बहुत सुंदर रंगोली बनाई थी. सुबह छोटी बहन से बात हुई, वह दिसम्बर में उनके आने पर स्वागत की तैयारी कर रही है. 

शाम के साढ़े छह बजे हैं. कल सुबह नन्हा व सोनू आ रहे हैं. उन्हें आज ही आना था पर आज सुबह जब एयरपोर्ट के लिए निकलने से पूर्व वेब चेकिंग करते समय पता चला कि टिकट तो कल की है. कुछ पल के लिए तो निराशा हुई, क्योंकि कितने दिनों से इंतजार था इस दिन का, पर बाद में वे सब खूब हँसे। कल इस समय वे यहाँ होंगे. बाहर बरामदे में रंगोली बन गयी है और दीवाली की लाइट्स भी लग गयी हैं. आज दोपहर मृणाल ज्योति में मीटिंग थी, स्कुल में बाड़ लगानी है. स्कूल की दो शाखाओं में भी काम कैसे आगे बढ़े, इस पर चर्चा हुई. विकलांग दिवस की तैयारियां भी चल रही हैं. परसों उन्होंने चार स्कूलों में जाकर उस दिन पहनने के लिए बच्चों को बैज वितरित किये. अगले हफ्ते दीवाली के बाद कुछ अन्य स्कूलों में जाना होगा. 

बाहर वर्षा हो रही है, दीवाली दो दिन बाद है और मौसम यकायक बदल गया है. पिछले दिनों धूप खिली रही, ऐसे ही मन का मौसम भी बदलता रहता है. संशय के बादल छा जाते हैं तो ज्ञान का सूर्य ढक जाता है. कर्मों का बंधन आगे बढ़ने ही नहीं देता, वे चार कदम आगे बढ़ते हैं फिर छह कदम पीछे लौट आते हैं. जून कोऑपरेटिव गए हैं, वहां से दफ्तर जायेंगे, फिर तिनसुकिया होते हुए डिब्रूगढ़ पहुंच जायेंगे, नन्हा व सोनू दो बजे हवाई अड्डे उतरेंगे, उन्हें लेकर आना है. सुबह नींद खुली उसके पूर्व स्वप्न चल रहे थे, कितने जन्मों के कितने स्वप्न.. मन की गहराई को कोई नाप नहीं सकता. देहाभिमान या देहाध्यास छूटता नहीं या वे छोड़ना ही नहीं चाहते. ध्यान के पलों में लगता है अब सब मिल गया पर जगत में जाते ही सब बिखर जाता है. यह बिखरना भी एक स्वप्न मात्र ही है, यह भाव आ तो जाता है पर मन, बुद्धि पर उतनी देर में जो संस्कार पड़ जाता है, वह भविष्य में पुनः फल देगा, एक दुष्चक्र इस तरह चलता रहता है. सजगता और सजगता इसके शिव कोई साधना नहीं अथवा तो पूर्ण समर्पण .. जो भी हो सब उसी परमात्मा का प्रसाद समझकर स्वीकार करना होगा. मन को खाली रखना होगा

Monday, June 27, 2016

आल इज वेल


भजन अभ्यास करने का उद्देश्य है कि आत्मा परमात्मा का अनुभव करे. मन की शांति, देह की निरोगता, सौभाग्य... ये सारी बातें अपने आप ही होने लगती हैं. कल रात टीवी पर कुछ नये कार्यक्रम देखे, सोने गयी तो पीछे वाली लेन से लाउडस्पीकर पर तेज आवाज में बजते गीतों के कारण नींद में व्यवधान पड़ा. सोने-उठने में जैसा अनुशासन जून रखते हैं, वह नहीं रख पाती. आज बाजार जाना है. मृणाल ज्योति के शिक्षकों के लिए नये वर्ष का उपहार- डायरी व पेन, ‘अंकुर’ के बच्चों के लिए भारत व विश्व के मानचित्र तथा घर के लिए सब्जियां व फल खरीदने हैं.

सद्गुरु के वचन अनमोल हैं, वह कहते हैं, साधक चलती-फिरती आग हैं जो सारी बुराइयों को जला कर रख कर देती है, जो बर्फ को पिघला देती है. वे भूल गये हैं कि जीता-जागता प्रकाश उनके भीतर है. मन का विक्षेप, मन की उद्वगिनता तथा मन की कमजोरी तभी उन्हें प्रभावित करती है, जब वे अपने स्वरूप को भूल जाते हैं. श्रद्धा से उनमें समाधि का उदय होता ही है. वीरता के क्षणों में भी पूर्ण होश रहता है. परमात्मा के प्रति समर्पण भी समाधि है ! दृष्टा में पहुंचना ही साधक का लक्ष्य है. वे अगले महीने यहाँ आने वाले हैं. उनके बारे में वे जो भी जानते हैं, उसे ठीक से लिख लेना होगा.


कल माँ की पुण्य तिथि थी. नौ वर्ष हो गये उनके देहांत को. कल भी मंझले भाई ने उन्हें स्वप्न में देखा, उसने भी कई बार उन्हें स्वप्न में देखा है. ऐसे ही एक दिन उनका जीवन भी स्वप्न हो जायेगा. वे भी किसी के स्वप्न में आने वाली छाया मात्र रह जायेंगे. उससे पूर्व उन्हें अपने सत्य स्वरूप को जान लेना है, जान ही लेना है. इस मायामय जगत के आकर्षण इतने लुभावने हैं कि मन टिककर बैठना ही नहीं चाहता, कामनाओं के जाल में इस तरह उलझा हुआ है कि..यश की कामना, समाज के लिए कुछ करने की कामना...अच्छा बनने की कामना..वे एक क्षण को भी कामना से मुक्त नही होते हैं. समाधि के क्षणों में भी कोई जगा रहता है, सबीज समाधि हुई न, कोई रहता है जो उस सुख को अनुभव कर रहा है, दृष्टा बना ही रहता है. उसकी साधना में जैसे एक समतल स्थान आ गया है. सत्संग में जाना भी छूट गया है. सद्गुरु की वाणी सुनती है, पढ़ने का क्रम भी कम हो गया है. लेकिन मन तृप्त है. कोई विक्षेप नहीं है, इसी बात का भरोसा है कि सद्गुरु हर क्षण उनके साथ हैं, वे उनकी आत्मा हैं, वे भीतर का प्रकाश हैं, जो कभी भी कहीं भी नष्ट नहीं हो सकता, तो फिर भय कैसा ? जो उन्हें चाहिए वह पहले से ही मिला हुआ है और जो व्यर्थ है वह मिले या न मिले, क्या फर्क पड़ता है. टाइम पास ही तो करना है इस जगत में, समभाव से निकाल करना है, कोई नया कर्म बंधन बांधना नहीं है, पुराने खत्म होते जाते हैं. कोई आशा नहीं, कोई अपेक्षा भी नहीं, जीवन सहज गति से चलने वाली धारा की तरह बहा जा रहा है. कल क्लब में 3 इडियट्स है, इस फिल्म की बहुत तारीफ़ सुनी है. समाज में कुछ परिवर्तन लाएगी यह फिल्म, यह उम्मीद की जा सकती है. न लाये तो भी कोई हर्ज नहीं, इस सुंदर जगत को जो भी और सुंदर बनाये उसकी प्रशंसा होनी ही चाहिए ! बड़ी ननद की बड़ी बेटी के sms भी सुंदर हैं, नन्हे की कम्पनी का newsletter भी सुंदर है ! उन्होंने सभी को सिंगापुर की तस्वीरों का लिंक भेजा है, देखें, कौन-कौन देख पाता है !

Friday, May 29, 2015

शिशु के नयन


कल शाम को बहुत दिनों के बाद पिताजी से बात की, अच्छा लगा, उन्हें भी अवश्य लगा होगा. कल  योग शिक्षक भी साप्ताहिक भजन में आये थे, उन्हें सर्दी लगी हुई थी पर भावपूर्ण माँ के भजन उन्होंने गाए. उसे माँ शारदा तथा संत श्री रामकृष्ण का स्मरण सत्संग में हो रहा था, सो रात को स्वप्न में उनके दर्शन किये, उनके चुप रहते हुए भी भीतर से जैसे कोई बोल रहा था, जैसे माँ बोल रही थी, अद्भुत था वह स्वप्न ! आज सुबह क्रिया में भी नवीन अनुभव हुआ, क्रिया के बाद ‘सोहम’ शब्द स्पष्ट सुनाई दे रहा था, नाद के बारे में पिछले दिनों पढ़ा भी है. उसे ऐसा लग रहा है अब पिछले कुछ दिनों से आध्यात्मिक यात्रा सुचारू रूपसे चल रही है. वह कान्हा तो अच्छा लगता ही था, रामचरितमानस पढ़ते-पढ़ते तुलसी के राम भी अब अच्छे लगते हैं. कितना प्रेम है राम के अंतर में और कितना प्रेम है तुलसी के हृदय में राम के लिए. भारतीय संस्कृति में धर्म मात्र पढ़ने के लिए अथवा विचारों के लिए ही नहीं है उसे जीवन में उतारने के हजारों ढंग हैं, धार्मिक होने को एक संकीर्ण अर्थ में जब लोग लेते हैं तभी विवाद होता है, धार्मिकता का अर्थ तो है उदारता, सहिष्णुता, प्रेम, करुणा और उस परम आत्मा का साक्षात्कार..इसी जीवन में अपने इन्हीं नेत्रोंसे..उसको जानना और उससे बल पाना, परहित के लिए, यही सद्गुरु बताते हैं !

कल वे अस्पताल गये, एक सखी ने बिटिया को जन्म दिया है, उसको एक नाम नूना ने भी दिया है. उसकी आँखें बहुत स्वच्छ हैं, उनमें से जैसे आत्मा झलकती है. सद्गुरु ने कहा था छह महीने तक बच्चा पूर्णतया निर्दोष होता है, वह ब्रह्म स्वरूप ही होता है. इसी भावना से जब कोई बच्चे का पालन करे तो उसे आनंद का अनुभव होता है. उस आनंद को शब्दों में व्यक्त करना असम्भव है. कल रात को उसने माँ को स्वप्न में देखा, वह किसी स्टेशन पर बैठी है तब अचानक माँ आ जाती हैं. वह भी जानती हैं कि वह शरीर नहीं हैं, नूना भी जानती है कि वह सूक्ष्म शरीर में हैं, पर वह पहले की तरह ही लग रही हैं, पूर्णतया स्वस्थ भी, फिर वह बातें भी करती हैं. वे घर आते हैं, दीदी भी हैं, मेहमान भी हैं, वे सभी को खाने की वस्तुएं देते हैं, माँ को भी, फिर चम्मच गिरने की आवाज आती है तो वह दीदी को कहती है, उन्हें पीने के लिए पानी से भरा गिलास भी देती है. माँ सभी को देख रही हैं, सब उन्हें देख रहे हैं, पर वह ठोस नहीं हैं. उसी स्वप्न में एक कौआ आकर सोये हुए लोगों पर चोंच से आक्रमण करता है, माँ उसे निस्पृह भाव से देख रही हैं. ईश्वर कहते हैं वे स्वयं को गंवाए नहीं, बिखेरें नहीं, आत्मा मन की कल्पनाओं के नीचे सुप्त है, पर है वही जिसकी सबको तलाश है. मौसम अब गर्म होने लगा है. रात को नींद पहले सी नहीं आई. एसी में सोना उसे नहीं सुहाता, हर वर्ष शुरुआत में ऐसा होता है फिर धीरे-धीरे अभ्यास हो जाता है. पर तितिक्षा को तो धारण करना ही होगा. आज जून ने वेज सैंडविच बनाया, बहुत स्वादिष्ट था, नन्हे को भी पसंद आएगा. दीदी ने उस दिन बताया भांजी की बात लगभग तय हो गयी है, उसके लिए दो किताबें भी ली हैं उन्होंने !

पिछले दिनों बहुत कुछ घटा बाहर भी और भीतर भी, बाहर की प्रतिध्वनि भीतर तक सुनाई दी और भीतर की बाहर तक. अब वस्तुएं कुछ स्पष्ट आकार लेती प्रतीत हो रही हैं. जब कोई देहबुद्धि से मुक्त होना चाहता है तो ऐसी बातों का प्रभाव मन पर क्यों लेता है जो उसके विपरीत होती हैं. अहंकार ही इसका कारण है. आलोचना होने पर अहंकार को चोट लगती है और फौरन प्रतिक्रिया होती है, जाहिर है मन के स्तर पर ही होगी, आत्मा के स्तर पर हो ही नहीं सकती. आलोचना को स्वीकार करने का यह अर्थ भी है कि बात सही है और वह इससे मुक्त होना चाहता है. इतनी चेतना रहे तो अंत ठीक होगा, वह एक-एक करके अपनी त्रुटियों को दूर करता चलेगा. सबसे महत्वपूर्ण बात है कि साधना में कोई व्यवधान न पड़ने पाए, चाहे कुछ भी हो वह स्वयं को कितनी भी आलोचना का शिकार होते पाये या प्रतिक्रिया करते, क्योंकि साधना के पथ पर हर कार्य ईश्वर की इच्छा के अनुसार ही होता है, वह साधक को बेहतर बनाना चाहता है, उसे स्वयं भी यही करना है और ईश्वर इसमें मदद करता है.


Friday, April 10, 2015

महाप्रभु का जीवन


गुरू रूपी कीली से कोई जुड़ा रहे तो चक्की में पिसने से बच जायेगा. गुरू की कृपा रूपी छाता लेकर वह वर्षा का भी आनंद ले सकता है. गुरु की कृपा ही तो है जो उसे ध्यान में तारे और चाँद दिखे, कितना अद्भुत दृश्य था, पूर्णिमा का चाँद बादलों से झांक रहा था. मन एक अद्भुत शांति से भर गया है. आत्मभाव में स्थित रहते हुए कितना सुख है, देह व मन, बुद्धि से स्वयं को संयुक्त करके वे व्यर्थ ही अपने को सुखी या दुखी मानते हैं, जबकि संसार की किसी भी वस्तु में ऐसी सामर्थ्य नहीं जो आत्मा को अल्प कष्ट पहुँचा सके. समस्याएँ आती भी रहें पर हृदय में उसकी स्मृति है तो वह दुःख दुःख नहीं लगता. नन्हे का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, जून उसे लेकर होमियोपैथिक डाक्टर के पास जाने वाले हैं. बीमारी पहले नहीं थी बाद में भी नहीं रहेगी सो उसके लिए परेशान होने की क्या जरूरत है, नन्हे को यही समझाना है !

जीवन में ताजगी चाहिए तो जो कुछ उसे मिला है उसे बाँटना चाहिए. तितलियाँ, फूल, खुशबू और प्रेम को तिजोरी में नहीं रख सकते. बहता हुआ पानी ही स्वच्छ रहता है. हवा एक तरफ से प्रवेश करे और दूसरी ओर से निकलने की भी व्यवस्था हो तो सब कुछ ताजा रहेगा. देह तो किसी के वश में है नहीं, यह अस्वस्थ भी होगी और इसका नाश भी होने वाला है, तो कब तक इसके पीछे दौड़ते रहेंगे जबकि सदा रहने वाला अविनाशी मुक्त आत्मा उसके साथ है बल्कि वह स्वयं ही है. कल शाम उसने भागवद् का प्रथम अध्याय पढ़ना आरम्भ किया है जो पहले नहीं पढ़ पायी थी. महाप्रभु चैतन्य के जीवन चरित पर आधारित रचनाएँ भी पढ़ीं. वे तो साक्षात् कृष्ण थे पर उनमें से हरेक को कृष्ण को स्वयं पाना है, उसकी ओर हर कदम स्वयं बढ़ाना है. कोई सद्गुरु, कोई महात्मा  और ईश्वर स्वयं भी उनकी उतनी ही मदद कर सकते हैं जो पहला कदम बढ़ाने की प्रेरणा दे, उसके आगे तो उन्हें स्वयं ही चलना होगा.

aol का हर बृहस्पतिवार को होने वाला साप्ताहिक सत्संग आज उनके यहाँ है. उसके मन में कुछ बातें हैं जो वह सभी से कहने चाहती थी, उसने सोचा लिख कर रखेगी ताकि कोई बात छूट न जाये...उसे सद्गुरु की उपस्थिति का आभास हो रहा था, सभी के रूप में मानो परमात्मा भी वहीं थे. उसने लिखा..वह जो कुछ कहना चाहती है उसका एकमात्र कारण प्रेम है, सद्गुरु और ईश्वर के प्रति प्रेम..उन सभी का आपस में प्रेम. पहली बात- ॐ के गायन से पूर्व सभी दो बार गहरी श्वास लें, तीन बार ॐ कहने के बाद दो सामान्य श्वास लेने के बाद भजन शुरू करेंगे. हर भजन के मध्य दो मध्यम श्वास लेकर नया भजन होगा. अंतिम भजन के बाद सभी अपने स्थान पर रहेंगे और प्रसाद वितरण के लिए एक या दो व्यक्तियों से अधिक की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए. बेसिक कोर्स शुरू हुए एक वर्ष हो चुका है, इस कोर्स से जीवन की एकरसता टूटी थी जीवन में नये उत्साह को अनुभव किया था अब इस सत्संग को भी एकरस न बना लें, यह प्राणों को उत्साह से भरता है. सप्ताह दर सप्ताह मन को निर्मल करता चला जा रहा है, इसका पूरा लाभ तभी मिलेगा जब पूरी तरह मन को इसके साथ जोड़ें. भजन गाते समय मन ईश्वर के प्रति गुरू के प्रति कृतज्ञता के भावों से भरे रहे. सर्वप्रथम अपने-अपने स्थान पर उनका मानसिक पूजन करें और हर भजन के बाद भी नमन करें.

पिछल दो दिन नहीं लिख सकी. शरीर अस्वस्थ हो तो मन भी कैसा हो जाता है. ऐसा नहीं है कि शेष सभी कार्य भी छूट गये हों बस यही एक छूटा अर्थात मन का काम. लिखना तो तभी सम्भव है जब मन किसी एक विचार पर टिके. आज अपेक्षाकृत शरीर ठीक लग रहा है. शाम को एक सखी के यहाँ जाना है, उसे डिबेट में थोड़ी मदद चाहिए. आज सुबह वे समय से उठे. जून आजकल पूरे फॉर्म में हैं. उन्हें अपने काम में इस तरह जुटे देखकर अच्छा लगता है, उतनी ही तन्मयता से योग भी करते हैं. कोर्स किये उन्हें पूरा एक वर्ष हो गया है और कोई भी उनके जीवन में ए परिवर्तन को देख सकता है, जीवन को एक उद्देश्य मिल गया है. मन को एक आधार, तन को साधन और आत्मा को उसकी पहचान. वे पहले से कहीं ज्यादा खुश रहते हैं, ज्यादा स्पष्ट सोच सकते हैं. वस्तुओं को उनके वास्तविक रूप में देखने लगे हैं. दूसरों के प्रति उनका व्यवहार अधिक स्नेहपूर्ण हो गया है. क्रोध उनके लिए अजनबी हो गया है. सद्गुरु का ज्ञान भीतर टिक रहा है. यह उनकी कृपा है. उनके प्रति कृतज्ञता जाहिर करने का सबसे अच्छा उपाय यही है है कि उनके विचारों पर मनन करें जीवन में उतारें. धर्म जो पहले मात्र थ्योरी था अब प्रेक्टिकल हो गया है. उसने प्रार्थना की, जीवन सत्कर्मों से परिपूर्ण रहे और प्रेम का अविरल स्रोत जिसका पता सद्गुरु ने बताया है कभी सूखने न पाए !


Sunday, December 14, 2014

ध्यान के सूत्र


नियमों के पालन से मार्ग प्रशस्त हो जाता है और मुक्ति का मार्ग मिल जाता है ! अनुशासन और नियन्त्रण जीवन को बंधंन मुक्त ही करते हैं, बंधंन में डालते नहीं हैं. इस बात को आजकल वे महसूस कर रहे हैं. जो किसी मार्ग को चुन लेता है तो अस्तित्त्व उसके जीवन की दिशा निर्धारित करता है, वही उसके कुशल-क्षेम की जिम्मेदारी ले लेता है. मन में श्रद्धा रखते हुए कर्म करना मानो मुक्ति के मार्ग पर आगे बढना है. ईश्वर ही जीवन का कर्ता-धर्ता है, उसके प्रति प्रेम ही मन की कृतज्ञता जाहिर करता है, उसने इतना दिया है. वे चाहें उसका उपकार मानें या न मानें तो भी वह हितैषी है, उसे जीवन में उतारना है, अवतरित करना है. वह हर पल बुला रहा है. उसकी पुकार कितनी मोहक है. कल शाम ही वह गोहाटी से वापस लौटी है. सुबह छोटी बहन, पिता, भाई, भाभी, सभी को art of living कोर्स के लिए प्रेरित किया.

मन का धर्म जब ईश्वर भजन बन जाये तब वह अपने आप शुद्ध हो जाता है. दुर्लभ मानव जन्म में दुर्लभ सत्संग भी मिला है इसके लिए वह ईश्वर की कृतज्ञ है लेकिन यह कृतज्ञता दर्शाने का अर्थ है कि अब भी वह उससे पृथक है जबकि वह तो उसके कण-कण में, रोम-रोम में है बल्कि वही तो है. गुरूजी की अमृत वाणी जितना पढ़ती है उतना ही मन अभिभूत हो जाता है. ये हीरे बड़े कीमती हैं जो कौड़ियों के दाम नहीं मिलते. आत्मस्वरूप से वे मुक्त हैं पर मन के स्तर पर बंधंन में हैं. आज एक सुंदर सूत्र सुना, ध्यान के समय जब भी कोई ख्याल उठे तो उस हरकत के पीछे जो बेहरकत है उसे याद करना चाहिए. दो विचारों के मध्य जो विराम रहता है और जिस तरह दो श्वासों के मध्य भी अन्तराल होता है. उस पर ध्यान केन्द्रित करें तो मन शांत हो जाता है. जागृत होकर ही कोई उस अन्तराल को जान सकता है,

शनिवार की शाम को जून ने जब कहा कि कम्प्यूटर अब नहीं चलेगा तो नन्हे को उसने यह बात बतायी. तभी से वह उदास दीखता है. इतवार की सुबह उसकी चुप्पी पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उसने कारण पूछा, वह शांत रहा. फिर कल शाम को भी जब वह चुप्पा बना रहा तो उसे कुछ बातें सुनायीं पर वह अडिग रहा. धैर्य और हिम्मत की उसमें कमी नहीं है बस कमी है तो आत्मसंयम की. गेम खेलते वक्त वह उसमें डूब जाता है और पढ़ाई का हर्ज होता है. इस बार के नम्बर इसकी खबर देते हैं. खैर, धीरे-धीरे वह सामान्य तो होगा ही. कल से ही छुट्टियाँ शुरू हो रही हैं. इस समय टीवी पर ‘गीता पाठ’ आ रहा है. माया के सम्पर्क में आने पर मन इच्छा न होते हुए भी विकार में लिप्त हो जाता है. रजोगुण के सम्पर्क में आने से कामना उत्पन्न होती है, उसकी पूर्ति में बाधा होने से क्रोध, क्रोध ही पाप कर्म में लिप्त करता है. उन्हें रजोगुण का त्याग करना होगा. कल शाम को केन्द्रीय विद्यालय की एक अध्यापिका ने फोन करके ‘विश्व पर्यटन दिवस’ पर जज बनने के लिए आमंत्रित किया. लेडीज क्लब की दो सदस्याओं ने जो वहाँ टीचर भी हैं और गोहाटी वाले ग्रुप में भी थीं, उसका नाम सुझाया था. यह भी एक नया अनुभव होगा और अब तो वह हमेशा उसके साथ है. मुस्कुराता हुआ, शक्ति और ज्ञान का अतुलित भंडार, प्रेम का प्रतीक उसका परम प्रिय ! जीवन के हर पल में, हर परिस्थिति में वह उनके साथ है, उनके कुशल-क्षेम की चिंता करते हुए, प्रेरित करते हुए !  

सुबह की शुरुआत ध्यान से हुई, ईश्वर की कृपा उस पर हुई है जो मन पवित्र विचारों का सान्निध्य ढूँढ़ता है. जून भी सुबह-सवेरे उठकर प्राणायाम करते हैं, उनका भी मन प्रफ्फुलित रहता है. कल रात को छोटी बहन का फोन आया, पहले की अवस्था में शायद वह भी कुछ देर सो न पाती पर अब विचलन क्षणिक होता है. आध्यात्मिक विकास हो रहा है ऐसा प्रतीत होता है. आज गुरू माँ ने कहा, गुरू पर अगाध श्रद्धा रखने पर ही कोई उच्च अवस्था तक पहुँच सकता है.



Thursday, June 21, 2012

नीरज की कविता



आज राजीव गाँधी का जन्मदिन है और हरचंद लोंगोवाल की पुण्य तिथि, दोनों पर समाचारों में सुना. कल रात इतनी जोर से बिजली कड़की लगा कि कमरे की छत टूट कर गिरने ही वाली है. शायद कहीं बादल फटा हो. माँ का पत्र आया है, बच्चे के बारे में कितनी सारी बातें पूछी हैं, सुबह से कितनी बार सोया और उठा है, अब कम से कम दो घंटे तो उसे सोना ही चाहिए. पढ़ा था कि बच्चे नींद में बढ़ते हैं.
कई दिनों तक कुछ नहीं लिखा, कभी व्यस्तता कभी मूड. आज कृष्ण जन्माष्टमी है. बचपन में वे कितने उत्साह से प्रतीक्षा करते थे. उस दिन झांकी सजाते थे, या शाम को झांकियां देखने जाया करते थे. सुबह वह गीता पाठ करती थी. कृष्ण के भजन तो कुछ दिन पूर्व से ही बजने आरम्भ हो जाते थे. और उस दिन तो कृष्ण भजन ही सुनाई देते थे सभी रेडियो स्टेशनों पर गानों की जगह. किन्तु अब तो सभी त्यौहार बस नाम के लिये हैं, रेडियो पर समाचारों से सुनकर पता चल जाता है आज यह त्योहार है, इतना ही बहुत है. उस दिन ‘नीरज’ की कविता सुनी, “युद्ध नहीं होगा”, बेहद सुंदर थी. और शोभा सिंह का इंटरव्यू भी कम नहीं था. दोनों घरों से पत्र आया है, छोटी बहन का मेडिकल में चुनाव हो गया है, बड़ी नन्द का विवाह तय हो गया है. दिसम्बर में होगा,, तिथि अभी तय नहीं हुई है. आज वे नन्हे को पहली बार प्रैम में घुमाने ले गए, शायद थक गया होगा सो शाम के वक्त भी सो रहा है.