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Saturday, November 30, 2019

मुक्ति बोध



आज सुबह तेज वर्षा हुई, उसी वर्षा में वे मृणाल ज्योति गए. बच्चों को योग कराया और क्लब की सदस्याओं द्वारा दिया सामान सौंपा. एक अध्यापिका ने कुछ पैसे मांगे थे, वे भी उसे दिए, वर्ष के अंत तक धीरे-धीरे करके लौटा देगी, ऐसा उसने कहा है. पिछले चार दिनों से मन बुद्ध के साथ है. वह बुद्ध के जीवन पर आधारित धारावाहिक देख रही है, जो बुद्ध पूर्णिमा के दिन देखना आरम्भ किया था. उस दिन उनके निर्वाण का दृश्य देखा था. उनके उपदेश हृदय को छू गए थे, फिर जन्म से लेकर उनके बुद्ध बनने तक का संघर्ष देखा. कितने महान थे वे, कितने करुणावान और कितने बड़े तपस्वी किन्तु देवदत्त उन्हें कभी समझ नहीं पाया. उन्हें मरवाने के कितने षड्यन्त्र किये उसने. यशोधरा का त्याग भी अनुपम है, उसने बुद्ध के हृदय को समझ था. स्वयं में स्थित होकर ही कोई सुखों-दुखों के पार जा सकता है. मानव के शुभ कर्म एक दिन मुक्ति पथ पर ले जाते हैं और दुष्कर्म बन्धन की ओर. जिसे बुद्ध निर्वाण कहते हैं उसे ही ऋषि मोक्ष कहते हैं, जहां पूर्ण शांति है, जहां जाकर मन खो जाता है. जो सारे द्वंद्वों से अतीत है. जून आज पाँच दिनों के लिए बाहर गए हैं. अभी कुछ देर बाद नैनी व उसके साथ की महिलाएं आएँगी योग कक्षा के लिए, शाम के योग सत्र को एक घन्टा पहले खिसका दिया है क्योंकि शाम को मीटिंग है, फ्रिज को कल रात से बन्द किया है, भीतर की सारी बर्फ पिघल जाएगी तब वह अपना काम करना शुरू कर देगा. मानव का मन भी कभी कभी नकारात्मकता के कारण जम जाता है, फिर उसे साधना के द्वारा पिघलाया जाता है, पहले सा खुशनुमा हो जाता है, प्रेम की ऊष्मा जो भीतर दबी हुई थी, फिर झलकने लगती है. उसके सर के दाहिने भाग में ज्यादा देर तक स्क्रीन देखने के कारण तनाव महसूस हो रहा है, विश्राम देने से वह ठीक हो जायेगा. पिछले कई दिनों से नियमित लेखन नहीं हुआ. अब समझ-बुझ कर, जागकर लिखना होगा. इस समय मौसम सुहाना है, भीतर एक सहजता का अनुभव हो रहा है, ध्यान के बाद की सहजता ! भीतर के उस अछूते केंद्र का पता उसे भी मिल गया है, वर्षों पूर्व उसकी झलक मिली थी, पर उसमें हर पल स्थित रहने के लिए सजगता बहुत जरूरी है. 

शाम के साढ़े चार बजे हैं. मन बुद्धमय हो गया है. उनकी मंजुल मूर्ति तथा सुंदर देशना भीतर तक छू जाती है. उनके उपदेश सरल हैं और अनुभव से उपजे हैं. वे सिद्धांत की बात नहीं कहते, व्यावहारिक ज्ञान देते हैं वे कहते हैं, सन्देह अति विकट शत्रु है, वह मानव को पतन की ले जाता है. ईर्ष्या, घृणा, क्रोध, अग्नि के समान जलाते हैं और अहिंसा व करुणा आनंद को उपजाते हैं. बुद्ध शीलाचरण की बात करते हैं, फिर ध्यान का मन्त्र सिखाते हैं, जिससे विवेक का जन्म होता है, तथा शील का पालन सहज ही होने लगता है. ध्यान की गहराई में जो ज्ञान मिलता है, वही सच्चा ज्ञान है जिसके प्राप्त होने के बाद शील का पालन प्रयास पूर्वक नहीं करना पड़ता, लेकिन आरम्भ में तो पुरुषार्थ करना होगा, सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अस्तेय तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा. शम, दम, तप, सन्तोष व ईश्वर प्राणिधान का पालन भी करना होगा. आज सुबह उठी तो एक स्वप्न चल रहा था, दुःस्वप्न ही कह सकते हैं अथवा तो पूर्व के किये अशुद्ध कर्मों का फल देने वाला स्वप्न ! बुआ जी को देखा, उनका मुख बिलकुल अलग था. उनकी पुत्री का विवाह हो रहा है. वह रसोईघर में है पर शौच का पालन नहीं किया. अतीत के कितने ही विकर्मों का स्मरण हो आया. वह जगी तो भीतर प्रार्थना चल रही थी. उनका अवचेतन मन नींद में भी सक्रिय रहता है. उठकर टहलने गयी, वर्षा के बाद सब कुछ साफ-सुथरा था, मौसम शीतल था. सद्गुरु को सुना जो कह रहे थे, यदि अपने घर वापस लौटना है तो पहले पूरी तरह थक जाओ, जैसे बुद्ध कहते हैं, अपने भीतर सुख के केंद्र को खोजना है तो जीवन में दुःख है इसे अनुभव करना होगा. भीतर जाकर पता चलता है, परम् आनंद व प्रेम का स्रोत भीतर ही है . आज भी बुद्ध के जीवन की गाथा देखी-सुनी. अब कुछ ही अंक रह गए हैं. मगध, कपिलवस्तु, कौशल आदि राज्यों में ही बुद्ध विहार करते थे, पर उनका धर्म पूरे विश्व में फ़ैल गया जैसे सदगुरू का सन्देश पूरे विश्व में अपनाया जा रहा है. इसी महीने उनका जन्मदिन है, उस दिन वे दोपहर को श्रमदान करेंगे  और शाम को गुरुपूजा में सम्मिलित होंगे. जून आज तमिलनाडु जा रहे हैं, वह जो पौधे ले गए थे, नन्हे ने गमलों में लगा दिए हैं. 

Saturday, December 5, 2015

बुद्धं शरणम् गच्छामि !


आज सत्संग उनके यहाँ है, मौसम गर्म है सो ज्यादा लोग नहीं आएंगे, ऐसे भी आजकल गिने-चुने लोग ही आते हैं. सुबह क्रिया भी पीछे आँगन में की, सुबह साढ़े पांच बजे ही हवा का नाम नहीं था, जैसे प्रकृति की लीला ! उन्हें उसे सहज भाव से स्वीकारना चाहिए. नन्हा सुबह अपने मित्र को लेने रेलवे स्टेशन गया. उसका मित्र बौद्ध है, उसके बाल लम्बे हैं, पीछे बांधता है, चौड़ा चेहरा, दोहरा तन, हिंदी अच्छी बोल लेता है क्योंकि बनारस में रहा है, उसके पिता सारनाथ में बौद्ध विश्व विद्यालय में कार्यरत हैं. गर्मी के कारण उसकी आँखों में हल्का दर्द है तथा जी भी भारी हो रहा है. अभी कुछ देर पूर्व उन्होंने सूप पिया था और सम्भवतः बार बार पानी पीने से भी भरा-भरा सा लग रहा है.

आज सुबह उसने सुंदर शब्द सुने थे, जिन्हें बाद में स्मृति के आधार पर लिख लिया. उनकी साधना इस जन्म में जहाँ तक पहुँचती है, अगले जन्म में वहीं से आरम्भ हो जाती है. कुछ वर्ष पूर्व एक दिन उसने स्वप्न में स्वयं को एक चारपाई पर पड़े देखा था, शायद अंतिम क्षण थे, आस-पास के लोग मन्त्र उच्चार रहे थे, फिर उसने भी ॐ नमो भगवते वासुदेवाय कहना शुरू कर दिया था, और थोड़ी ही देर में वह देह से ऊपर उठ गयी थी, तब कुछ भी समझ में नहीं आया था पर वह स्वप्न आज समझ में आ रहा है. हर पल उनकी भाव मृत्यु हो रही है, क्योंकि वे अज्ञानावस्था में रहते हैं, देह मानते हैं स्वयं को, पर जब ज्ञान होता है और स्वयं को आत्मा जान लेते हैं तब मृत्यु नहीं होती, जिसकी भाव मृत्यु बंद हो गयी, वह मरता ही नहीं, वह अजर, अमर, अविनाशी है. जो भाव मृत्यु है वह अहंकार की है, शरीर की द्रव्य मृत्यु होती है, भाव मृत्यु का परिणाम द्रव्य मृत्यु है. जो-जो कर्म उन्होंने आज तक मन, वाणी और देह से किये हैं उनका बंध तभी तक है जब तक अज्ञानावस्था है. जब तक सफलता अहंकार से भर देती है और असफलता निराशा से तब तक वे देह से ही बंधे हैं. जगत को दोषी न समझना साधना का मुख्य भाग है, यदि किसी को दोषी मान लिया तो फौरन प्रतिक्रमण करके मन को निर्मल कर लेना होगा, नहीं तो कर्म बंधन में पड़ ही जायेंगे. जो स्वयं को आत्मा देखता है वह अन्यों को भी आत्मा देखता है, आत्मा सदा निर्मल है.

आज मौसम अपेक्षाकृत ठंडा है, रात को वर्षा हुई और उसके भीतर का तापमान तो सदा एक सा है. नन्हे के मित्र से सुबह प्राणायाम की बात की, ध्यान की बात की, वह बौद्ध है, ध्यान का संस्कार उसे जन्म से मिला है. वह शांत है, प्राणायाम भी थोडा बहुत जानता है. अच्छा है कि नन्हे का मित्र है उस पर अच्छा प्रभाव डालेगा.

आज नन्हे का जन्मदिन है वे पावभाजी बनाने वाले हैं. उसे सुबह उठाया, फूल और कार्ड दिए. आज ही के दिन वह धरती पर आया था, उनके जीवन को नया अर्थ देने और उन्हें माँ-पिता का पद देने.

वृक्ष के मूल में यदि खाद डालें तो फल प्रदान करता है और प्राणी फल ग्रहण करके खाद देते हैं. जीवन किस तरह एकदूसरे पर आधारित है और एक चक्र में बंधा है. आज उसने आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान का अर्थ सुना. आरम्भ के दो ध्यान त्याज्य हैं और अंत के दो ग्रहणीय. भूत के कारण आत्मग्लानि अथवा भविष्य की चिंता के कारण दुःख में पड़ जाना आर्त ध्यान है जो दुर्गति में ले जाता है. दूसरों को दुःख देने की भावना से रौद्र ध्यान तथा सुख देने की भावना से धर्म ध्यान होता है. धर्म ध्यान का फल मोक्ष है. शुक्ल ध्यान में आत्मा की जाग्रति सदा बनी रहती है. आत्मा का ध्यान मोक्ष का प्रत्यक्ष साधन है. मुक्ति की अनुभूति शुक्ल ध्यान से तत्क्षण शुरू हो जाती है और क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, मोह तथा मत्सर खत्म होने लगते हैं.  


Thursday, October 8, 2015

राम का बोध


आज ‘योग वसिष्ठ’ को पढ़ना पूर्ण किया. इसके अनुसार आत्मा का अनुभव ज्ञान के द्वारा ही हो सकता है. ज्ञान जब तक परिपक्व नहीं होगा तब तक अन्य साधनों द्वारा किया गया अनुभव टिकेगा नहीं. यह सारा जगत ब्रह्म ही है अथवा तो आत्मसत्ता ही जगत का आभास देती है. आदि में इस जगत के होने का कारण नहीं था, केवल चिन्मय तत्व था, उसमें संवेदन हुआ और धीरे-धीरे यह जगत संकल्प रूप से प्रकट हुआ. संकल्प ही सत्य होकर प्रकट होते हैं यह सबका अनुभव है. यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है. जीव वास्तव में शुद्ध आत्मा है जड़ का संयोग होने से स्वयं को जड़ जगत की तरह मानने लगा. जब मन पूरी तरह से खाली हो जाता है तो आत्मा का अनुभव होता है. भीतर से आकाश की तरह निर्लिप्त रहते हुए इस जगत में सहज प्राप्त परिस्थितियों में अपना कार्य मात्र करना है, न कुछ पाना है, न देना है, न कहीं आना है न जाना है. आत्मा अपने आप में पूर्ण है, उसे यह जगत स्वयं से अलग नहीं लगता. अद्वैत ज्ञान का अद्भुत ग्रन्थ है ‘योग वसिष्ठ’. भगवान राम का मोह नष्ट हुआ और परमपद को प्राप्त हुए, राम उसे भी परमपद प्रदान करेंगे !

शुक्रवार की रात से उल्फा ने आतंक का जो दौर शुरू किया है, वह थमने में नहीं आ रहा है. मारने वाले भी घोर अज्ञानी हैं और दया के पात्र हैं. वे नहीं जानते कि कितना बड़ा पाप कर्म अपने लिए बाँध रहे हैं. जो मर गये वे अपने पीछे परिवार जनों को दुखी छोड़ गये. इस सृष्टि में हर क्षण कितना कुछ घटता रहता है. अन्याय भी, अत्याचार भी, जन्म भी, मरण भी. इन सबको देखने वाला परमात्मा सब जानता है वह मरने और मारने वाले दोनों के ह्रदयों में रहता है. माया के कारण ही जीव एक-दूसरे को मित्र-शत्रु मानते हैं, कर्म करते हैं तथा उनके फल भोगते हैं. यहाँ सभी कुछ व्यवस्थित है, प्रकृति में अन्याय नहीं होता. अन्याय होता हुआ लगता है पर वास्तव में सभी कुछ एक क्रम में हो रहा है. ईश्वर की निकटता का अनुभव जिसे होता हो वह सभी के भीतर ईश्वर को देखता है, वह दानव जो बच्चों को मारता है उसके भीतर भी और वह संत जो समाज को ऊपर उठाता है उसके भीतर भी एक ही सत्ता है. परमात्मा हर घड़ी उसके साथ है. नींद खुले उसके पूर्व हर सुबह आत्मा का चमत्कार उसे दीख पड़ता है, संध्या काल का चमत्कार !

आज सदगुरू ने मोक्ष तथा बोध के बारे में कहा. वे कठिन विषयों को कितना सरल बना देते हैं. मोक्ष तो हर कामना के बाद अनुभव में आता ही है तथा बोध आकाश की तरह हर जगह है. हर श्वास के साथ जैसे निश्वास है वैसे ही कर्म के पीछे उससे मुक्ति तो है ही, न हो तो जो सुख कर्म से मिल रहा है वह दुःख में बदल जायेगा. छोटे-छोटे कार्यों में जब मुक्ति का अनुभव कोई करता है तो एक दिन उस परम मुक्ति का भी अनुभव कर लेता है जिसे पाकर कुछ भी पाना शेष नहीं रहता. आत्मा ज्ञान स्वरूप है, वह चेतन सत्ता बोध स्वरूप है जो कण-कण में व्याप्त है. वही चेतन में है वही जड़ में है. जड़ व चेतन के संयोग से जीवन का वह रूप बनता है जो चारों ओर दिखाई देता है. जड़-चेतन के संयोग से तीसरा तत्व बनता है वही अहंकार है. वह यदि स्वयं को जड़ मानकर प्रकृति का अंश मानता है तो वह कर्त्ता तथा भोक्ता है तथा यदि वह स्वयं को चेतन स्वरूप मानता है तो निर्लिप्त रहता है. वह सदा मुक्त है. जड़ के साथ तादात्म्य होने से अहंकार में जड़ता आ जाती है तब क्रोध, मान, माया, लोभ, ईर्ष्या तथा मद आदि का असर होता है वैसे ही चेतन के साथ तादात्म्य करने से आनंद, शांति व प्रेम अपना स्वभाव हो जाते हैं तो भलाई इसी में है कि वे स्वयं को चेतन से जोड़ें.