Sunday, August 2, 2015

मोनालिसा की मुस्कान


आज बहुत दिनों का एक ऋण चुकता हो गया, काफी दिनों पहले एक परिचिता आयी थीं, आज सासूजी के साथ वह उनके घर गयी. इस समय वह फिल्म देख रही हैं, आज कोई टीवी बंद करने वाला नहीं है, वरना जून के दफ्तर से आते ही उन्हें टीवी बंद करना होता है. किसी बात की जल्दी नहीं है, अभी कुछ देर पहले ही वे दोनों चाय पीकर आ रही हैं.

आज कर्नाटका में भगवान बाहुबली का मस्तकाभिषेक है. कितनी विशाल मूर्ति है जिसे जल, दूध, घी तथा शहद आदि से नहलाया जा रहजा है. उसे आश्चर्य होता है उनके देश में कितनी ही जातियों और धर्मों के लोग रहते हैं था सभी अपने-अपने उत्सवों को पूरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं. किसी जगह ‘मर्यादा उत्सव’ भी मनाया जा रहा है, महामुनि का भाषण सुना था, वह ‘प्रेक्षा ध्यान’ पर जोर देते हैं, विपश्यना जैसा ही लगता है यह ध्यान भी. आत्मा को जानने की बात तो सरदार जी भी कहते हैं, भीतर जाकर अंड, पिंड, ब्रहमांड के खंडों से पार सचखंड में जाने की बातें..वही स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीर से परे जाने की बात. क्रन्तिकारी मुनि कहते हैं कि यह जगत एक भड़भूजे का भांड है जिसमें जब थोडा सा ढक्कन हटता है तो कोई चना उछल कर बाहर आ जाता है जैसे रामकृष्ण परमहंस जाल में फंसी  मछलियों का उदाहरण देते थे, शेष तो भूनते ही रहते हैं तीनों तापों से. आज उसका अंतर एक अनोखी शांति से ओत-प्रोत है, व्रत भी रखा है एकांत, मौन और हल्का भोजन शायद इसी का फल है यह भीतर की  शांति ! पिछले हफ्ते यहाँ जिस व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली थी उसकी पूरी कहानी अब समझ में आने लगी है, दोपहर को लिखेगी. लेडीज क्लब की अध्यक्षा पर कविता भी लिखनी है. उनका अंतर बच्चों के लिए प्रेम से भरा है, समाज सेवा का अवसर वे चूकती नहीं, उनके पति को कई उच्च सम्मान मिले हैं, जिसके पीछे यकीनन उनका भी हाथ है. ‘गैराज सेल’ का विचार भी उन्होंने महिला सभा में उन्हें दिया था पर उसने कभी अमल नहीं किया. दान में ही उसका विश्वास है.


दो दिनों से हल्का जुकाम उसे परेशान किये था. कल दोपहर को धूप में बैठकर ‘मोनालिसा’ के जीवन की कहानी पढ़ती रही, पन्द्रहवीं शताब्दी के इटली के इतिहास पर आधारित कोई पुस्तक पहली बार पढ़ी, ‘लियोनार्दे दा विंसी’ के बारे में भी पढ़ा. उसके बनाये चित्रों में ‘लास्ट सपर’ तथा ‘मोनालिसा’ विश्व प्रसिद्ध हैं. वह छोटे से जीवन में सभी कुछ एक साथ होना चाहता था, पेंटर, मूर्तिकार, वैज्ञानिक, इंजीनियर, डाक्टर तथा और भी जाने क्या-क्या. योरोप के लोग उस वक्त अंधविश्वासों में जकड़े थे. चर्च में कितना भ्रष्टाचार था. राजाओं की सनक को पूरा करने के लिए हजारों जानें यूँही चली जाती थीं, कितना घोर अँधेरा था. विज्ञान की उन्नति के साथ-साथ कितना बदलाव आया. उस समय वहाँ के लोग अमेरिका से परिचित नहीं थे. कला का विकास हो रहा था. ऊन तथा सिल्क की फैक्ट्रियां लगाई जा रही थीं. ‘दा विंसी’ की कितनी ही योजनायें असफल हुईं पर उसकी कलाकृतियाँ अमर हो गयी हैं, साथ ही मोनालिसा भी. आज शाम को सत्संग है, दोपहर को उसे एक कविता लिखनी है, रचना और रचनाकार दोनों ही इस ब्रह्मांड में पहले से ही होते हैं दोनों को मिलाने का एक क्षण होता है वह क्षण आज ही आएगा. कल परसों  सारा-सारा दिन वर्षा होती रही, आज थमी है, धूप की एक झलक दिखला कर आकाश फिर बादलों से भर गया है. किताबें एक नई दुनिया में ले जाती हैं, जैसे योग-वसिष्ठ पढ़ते समय शरीर का भान ही नहीं रहता तथा भगवद् गीता पढ़ते समय अपना मन स्पष्ट दिखाई देता है अपनी प्रकृति के साथ..     

Saturday, August 1, 2015

सत्तू की कढ़ी



आज वसंत पंचमी है. भीतर गीत गूँज रहा है. सद्गुरू के आने पर कैसे जीवन में बसंत छा जाता है, सुख-दुःख की शीतलता व गर्मी नहीं सताती, सद्विचारों के पुष्प खिल उठते हैं और प्रेम की मंद बयार बहने लगती है. साधक के भीतर सारा वर्ष बसंत ही बसंत छाया रहता है, कैसा अनोखा चमत्कार छिपा रहता है गुरू कृपा में..  पंछियों का कलरव जो बाहर गूँज रहा है वह भीतर भी गूँजने लगता है. मन ठहर जाता है, जैसे वसंत में दिन-रात बराबर होते हैं वैसे ही भीतर हानि-लाभ समान ही हो जाते हैं. आज ध्यान करने बैठी तो जब विधि को याद कर रही थी तो कोई भीतर से बोला, जब मैं तेरे सम्मुख हूँ तो तू विधि के माध्यम से मुझे खोजना क्यों चाहती है”, साध्य यदि सम्मुख हो और कोई साधन के पीछे पड़ा रहे तो मूर्खता ही कही जाएगी, तो ध्यान में जिस परमात्मा तक पहुंचना है, वह यदि आँख मूंदते ही सामने आये तो उसे परे हटाकर कोई विधि का पालन करने बैठ जाये फिर उसका पालन करते-करते तत्व तक पहुंचे तो उसे क्या कहा जायेगा ? परमात्म तत्व तो सहज प्राप्य है, वह तो हर जगह है, वह सर्वसमर्थ है, सर्वज्ञ है, तो उसे कोई जिस भाव से भजता है वह क्या इसे जानता नहीं, वह तो सब जानता है. भीतर जो चेतना है वह उसी का अंश है. सागर क्या जानता नहीं कि बूंद भी जल से ही बनी है. वह तो परम चेतन है, उसे महसूस करना ही काफी है. वह हमें अपने भीतर मिलता है, प्रकाश के रूप में और फिर मात्र बोध के रूप में, उसे पुकारें तो वह झट आता है क्योंकि वह उस पुकार उठने से पूर्व से ही जानता है. वह मन के भावों को जानता है, वह जन्मों का मीत है, वही तो है जो एक से अनेक होकर खेल रहा है !

आज उसे लग रहा है, भीतर एक विरोधाभास है. भावनाओं और कर्मों का मेल नहीं है. भावनाएं पवित्र हैं पर क्रियाएं अशुद्ध हैं. भीतर शांति है पर मन में हलचल है. जो कुछ भी ऊपर हो रहा है, वह उसे छू भी नही सकता. पर जो उसे नहीं छू सकता जरूरी तो नहीं कि वह किसी अन्य को भी न छुए. किसी को दुःख देकर तो उद्धार नहीं हो सकता. आज सुबह सद्गुरु को सुना, सीधे, सरल शब्दों में तथा सहज आनन्द के साथ वह सारे शब्दों के जवाब दे रहे थे. बच्चों जैसा सरल विश्वास और अपनापन, भोलापन और साथ ही अभूतपूर्व ज्ञान.. इन दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण है उनमें ! पिछले दो दिनों की तेज धूप के बाद आज धूप बादलों के पीछे छिप गयी है. नन्हे से कल बात हुई, वह बैंगलोर नहीं जा रहा है, पढ़ाई का बोझ ज्यादा है. इसी महीने परीक्षाएं भी हैं. आज उसने पहली बार बेसन की जगह सत्तू डालकर कढ़ी बनाई है, जून को अवश्य पसंद आएगी. कल सासूजी पड़ोस में ‘सरस्वती पूजा’ देखने गयीं, उनकी जान-पहचान यहाँ धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है. उन्हें भी मौन का अभ्यास होता जा रहा है. वह अति आवश्यक होने पर ही शब्दों का प्रयोग करती है. उसके भीतर क्या चल रहा है ध्यान इसी तरफ रहता है. बाहर की तरफ ध्यान ज्यादा जाता नहीं. इसी को अन्तर्मुखता कहते हैं.


उसकी भाषा मधुर नहीं है, कितनी ही बार उसे इस बात का अनुभव हुआ है पर वह स्वयं को सुधारने के लिए कुछ भी नहीं कर रही है. जैसे कोई गंदगी को देखे और बस देखता रहे, झाड़ू लाकर उसे साफ न करे. तब कैसे कमियां उसके भीतर से दूर होंगी और कैसे वह परमात्मा के ज्ञान की अधिकारिणी बनेगी, कैसे वह उस परम आनंद को प्राप्त करेगी जो संतों की धरोहर है. सद्गुरु पुकार- पुकार कर कहते हैं, ‘विनम्र बनो’ पर वह तो अपनी हेकड़ी में ही रहती है. सारी दुनिया का मालिक उसका अपना है इसका घमंड कम तो नहीं होगा, वह एक अख्खड़ मस्ती का अनुभव करती है, अपनी ही मस्ती व खुमारी में खोयी वह अपना ही अनिष्ट कर डालती है ! जीवन के इस नाटक में वह इतनी खो जाती है कि असलियत को ही भूल जाती है. आज जून को दिल्ली जाना है, दो दिनों के लिए.     

Friday, July 31, 2015

अनित्य- मृदुला गर्ग का उपन्यास


इस वर्ष उस यह नीले रंग की सुंदर डायरी मिली है. मन कई भावनाओं से भरा है. नये वर्ष के लिए कई संकल्प पिछले कई दिनों से उमड़ते-घुमड़ते रहे हैं. जीवन कितना अद्भुत है, कितना सुंदर तथा कितना भव्य ! कितना अनोखा है सृष्टि का यह चक्र ! मन कभी आश्चर्य से खिल जाता है कभी मुग्ध हो जाता है उस अनदेखे परमात्मा की याद आते ही उसके लिए श्रद्धा से भर जाता है. इसकी खुशबू को वे अपने भीतर समोते हैं, इसके रस को पीते हैं, इसकी नरमाई तथा गरमाई को महसूसते हैं. वे कितने भाग्यशाली हैं, भीतर एक संतोष का भाव जगता है. इस सुंदर प्रकृति को बिगाड़ने का उन्हें कोई अधिकार नहीं. जीवन की कद्र करनी है, जीवन को खत्म करने का उन्हें क्या अधिकार है ? नये वर्ष के प्रारम्भ में मन क्यों आतंक का शिकार हुए लोगों की तरफ जा रहा है. मानव के भीतर देवत्व भी है और पशुत्व भी. उसने संकल्प लिया कि अपने भीतर के जीवन को सुन्दरतम करेगी !  
इस समय दोपहर के तीन बजने वाले हैं, आशा पढ़ने आई है. उसने कुछ देर पूर्व सद्गुरु को पत्र लिखा, पिछले वर्ष फरवरी में उन्हें पत्र लिखने का जो क्रम आरम्भ किया था, उसमें आजकल व्यवधान पड़ने लगा है. समय कहाँ चला जाता है पता ही नहीं चलता. आजकल लगभग हर समय उसे अपने लिए कुछ करने की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती. देह को स्वस्थ रखने के लिए उसे समय पर भोजन, व्यायाम आदि देना तथा परमात्मा के प्रति कृतज्ञता जाहिर करने हेतु पूजा, शास्त्र अध्ययन, घर के आवश्यक कार्य के बाद जो भी समय बचता है वह भी पढ़ने-लिखने में ही जाता है. जिससे मन भी स्वस्थ रहे तथा बुद्धि को जंग न लगे.
आज वह बहुत खुश है. लगता है वह फरवरी में बंगलुरु जा सकती है. जून उसकी टिकट के लिए प्रयास कर रहे हैं. सुबह एक परिचिता का फोन आया, वह ट्रेन से जा रही हैं, वह चाहे तो उनके साथ जा सकती है. उसे लगा यह गुरू कृपा है, उसने प्रार्थना की कि जून मान जाएँ, उन्होंने फ़िलहाल तो मंजूरी दे दी है. भविष्य में क्या लिखा है कौन जानता है ? वह नन्हे से भी मिल सकती है एक दिन के लिए. आज क्लब में मीटिंग है, वह कुछ किताबें लेकर जाएगी. लॉन में प्रकृति के सान्निध्य में बैठकर मन कैसा हल्का हो गया है. एकात्मकता का अनुभव यहीं होता है. ऊर्जा जैसे मुक्तता का अनुभव करती है.
आज बापू की पुण्य तिथि है. पिछले चार दिनों से मन पुस्तक के पन्नों में खोया था, मृदुला गर्ग का लिखा उपन्यास ‘अनित्य’ कल खत्म किया. इस उपन्यास में गांधीजी का जिक्र कई जगह हुआ है. उनको आदर्श मानने वाले कितने ही व्यक्ति स्वयं को छला हुआ मानने लगे जब उन्होंने ‘सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ वापस ले लिया. कई उनके प्रयोगों के आलोचक भी थे. पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि साधारण मानव एक महामानव का मूल्यांकन कैसे कर सकता है, और ही मिट्टी के बने होते हैं वे लोग जो महान कहलाते हैं, साधारण लोगों से भिन्न होती है उनकी सोच और दृष्टि.

वसंत का आगमन हो चुका है. हवा में ठंडक कम है. अभी सुबह के दस भी नहीं बजे हैं धूप तेज हो गयी है. कल रात स्वप्न में वह सभी को बता रही थी कि मैं ‘आत्मा’ हूँ, यह बात कहने से प्रकट नहीं होगी, उसके आचरण से प्रकट होनी चाहिए. ध्यान की अवधि बढ़ानी चाहिए ऐसे प्रेरणा भीतर से उठी है.   

Wednesday, July 29, 2015

नदी किनारे पिकनिक



सत्संग में ही मुक्ति है, सत्संग अर्थात परमात्मा का संग..वही मुक्त करता है. सारा दुःख दो के कारण है, परमात्मा एक है..उसमें टिकने से ही तृप्ति मिल सकती है. जगत के सारे कार्य तब होते हैं, उन्हें करना नहीं होता. जीवन को ठीक से जीने के लिए, शरीर को स्वस्थ रखने के लिए भी उन्हें अपने भीतर की शक्ति को जगाना आवश्यक है, यह शक्ति बिना भीतर गये मिलती नहीं. उसने नये वर्ष के लिए कुछ निर्णय अपने आप के लिए लिए हैं. नये वर्ष में कोई भी व्यक्तिगत कविता नहीं लिखेगी, उसके गीत अब परमपिता परमात्मा तथा सद्गुरु के लिए ही होंगे. नये वर्ष में  वह अपनी  तीसरी पुस्तक को भी छपने के लिए भेजेगी. इस बार वाराणसी में छपवानी है, जिसे पिताजी को समर्पित करना है. अमावस तथा पूर्णिमा की जगह अबसे एकादशी का व्रत रखना है. नया वर्ष उसके लिए परमात्मा की निकटता का वर्ष तो होगा ही पर सेवा का वर्ष भी होगा. हरि कि सेवा तभी होगी जब उसके जगत कि सेवा कोई करता है. आत्मा के लिए कुछ भी नहीं करना है, वह स्वयं में पूर्ण है, कर्म तो संसार के लिए ही हैं, स्वार्थ पूर्ण कर्म ही तो बांधते हैं.


कल वे पिकनिक पर गये. धूप और पानी का यानि अनल और नीर का संग बहुत भला था. पानी में ठंडक थी, नीचे बालू थी, नदी गहरी नहीं थी. वे काफी दूर तक आगे बढ़ते ही गये. नदी किनारे आग  जलाकर भोजन भी बनाया. कोई फ़िक्र नहीं, कोई चिंता नहीं, वे बस थे..प्रकृति का अंग बनकर उसके साथ जीते हुए. कल फिर उन्हें पिकनिक पर जाना है, दो दिनों के लिए पुनः प्रकृति के साथ जीना है. जून का मन नहीं है, पर वे क्यों घबरा रहे है इसका कारण उन्हें स्वयं भी अस्पष्ट है. नन्हा पूर्णतया निश्चिंत है, वह अपने मित्र को भी साथ ले जाना चाहता है. आज नैनी को काम करने का विशेष उत्साह जगा है, वह लॉन की सफाई पूरे मन से कर रही है. वे सभी अपना-अपना निर्धारित काम दिल से करें तो काम अच्छा होगा ही. अभी-अभी उसने एक केक बनाया पर निकालते समय शीघ्रता कर दी जिससे वह टूट गया, यदि थोड़ी समझदारी से काम लिया होता तो पहले की तरह साबुत बनता. कल की थोड़ी सी थकान का अनुभव हो रहा था, सो वह सो गयी लेकिन उतनी ही देर में स्वप्नों की दुनिया शुरू हो गयी. गोहाटी में अकेले सफर कर रही है. कुछ थोड़े से पैसे पास में हैं. रास्तों का भी ज्ञान नहीं है. एक व्यक्ति कुछ पैसे मांगता है..न जाने कैसा है मन..कहाँ-कहाँ की सोचता रहता है, उधेड़बुन में लगा रहता है. जागृति ही उचित है. 

सत्यम..शिवम..सुन्दरम..


सद्गुरू से जुड़े रहना साधना में आगे बढ़ने के लिए प्रथम और अंतिम शर्त है. सद्गुरु दूर नहीं हैं, वह हृदय के बिल्कुल निकट हैं. हमारे स्वयं से भी निकट. उनसे मिलकर भी यदि जीवन में कुछ परिवर्तन नहीं हुआ तो व्यर्थ है वह जीवन. आज सुबह नींद देर से खुली, स्वप्न देखती रही कि आम खरीदे हैं पर उसमें रस नहीं है, एक छेद के जरिये सारा रस उसमें से पहले ही निचोड़ लिया गया है. अनार खरीदा है पर उसमें दाने नहीं हैं, ऊपर से छिलका सही-सलामत है. ऐसे ही तो वे ऐसे कार्य करते हैं जो ऊपर से भले दीखते हैं पर उनमें कोई सार नहीं होता. गुरू के साथ जुड़े रहो तो वह स्वप्नों में भटकने नहीं देता. उन्होंने कहा था कि स्वप्न से जैसे ही जगो तो उठकर बैठ जाओ, स्वस्थ हो जाओ, अपने आप में स्थित. आत्मा में स्थित. वहीं बोध मिलेगा, वहीं मुक्ति है, वही वास्तविकता है !

जैसा-जैसा शास्त्रों में लिखा है उसे वैसा-वैसा अनुभूत होता है. सत्य एक ही है वह जिसके भीतर प्रकट होगा, समान रूप से होगा. उसका मन आजकल कितना जीवंत रहता है. सदा तृप्ति और उछाह से भरा, पता नहीं भीतर क्या रिसता है और कौन उसका पान करता है, लेकिन एक निर्द्वंद्वता, निडरता तथा स्वतन्त्रता का अनुभव होता है, जैसे अब इस जहाँ में कुछ भी पाना नहीं है. आत्मा को क्या पाना है जो स्वयं ही सबका स्रोत है, जो नित्य है, अनंत है. आज दोपहर एक अंग्रेजी फिल्म देखी, जिसमें रोबोट मानवों पर हुकूमत करने लगते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि मानव अपना विनाश कर बैठेंगे, मानव ने जिन्हें बनाया वही मशीनें उस पर अधिकार करने लगी पर अंत में जीत मानव की हुई. मानव के भीतर दैवीय शक्ति है, प्रभु ने उसे बनाया है, वह भी अपने जैसा, ईश्वर का मित्र है वह.. यदि उसकी आज्ञा में रहे, पर अंततः जीत तो परमात्मा की ही होती है.

आज सुबह वह तीन घरों में गयी, एक के यहाँ किताब भेजी. दो ने मना कर दिया, एक ने लेकर कहा पैसे बाद में भिजवा देगी. एक और प्रति किसी परिचिता ने खरीदी, सेवा का यह यह काम करते हुए उसे बहुत ख़ुशी हो रही है, लोगों से बात करने का एक नया अनुभव. वह जो पहले लोगों से बात नहीं करती थी, मतलब की बात ही करती थी. अब अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर बात कर रही है. लोग तो सारे उसके अपने ही हैं. वे जो भी जवाब दें, उसे एक नया पाठ सीखने को मिल रहा है. इसी बहाने लोगों से उसकी जान-पहचान भी बढ़ रही है. मिलते-जुलते रहने से वक्त पर लोग काम आते हैं. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के लिए काम करते समय मन में ऐसा भाव भी है कि कुछ भी नहीं कर रही. जो कुछ भी हो रहा है वह अपने आप ही हो रहा है, किसी बड़े कार्य का छोटा सा हिस्सा ! एक परिचिता के पास गयी तो उसने अपना पूरा जीवन दर्शन सुना दिया. वे सभी ही तो ज्ञानी हैं, सदा एक-दूसरे को ज्ञान देते हुए. जून परसों आयेंगे, उनसे फोन पर बात हुई. वे ये जानते हुए भी कि वस्तुओं की वस्तविकता क्या है, उन्हें महत्वपूर्ण बनाते रहते हैं, क्योंकि वस्तुएं उनके जीवन में बाह्य ही सही रंग भरती हैं. जून उसके लिए और वस्तुएं ला रहे हैं. वे सभी सौन्दर्य के पुजारी हैं. उनका इष्ट देवता उनका प्रिय कान्हा भी तो सौन्दर्य का देवता है. सत्यं, शिवं, सुन्दरं की परिकल्पना कितनी अद्वितीय है, जो सत्य है, वही शिव है, जो शिव है  वही सुंदर है..पर जो सुंदर है वह शिव भी होगा इसमें संदेह हो सकता है...क्योंकि हर चमकती हुई चीज सोना नहीं होती.. .भारतीय संस्कृति पर निर्मल वर्मा का एक विस्तृत निबन्ध पढ़ा पर पूरा डूब कर नहीं, क्योंकि साथ-साथ माली के काम का निरिक्षण भी कर रही थी.  सुबह उठने से पूर्व फिर स्वप्न देखे, जो उस समय वास्तविक ही लग रहे थे. एक छोटी लड़की जो स्वप्न में मृत हो जाती है फिर जीवित और फिर एक जलती हुई देह का स्वप्न देखती है ..कितना अजीब था यह स्वप्न पर तब बिलकुल स्वाभाविक लग रहा था, उनका जीवन भी तो एक स्वप्न की तरह ही है, पल में बीत जाने वाला !


जून आज आ रहे हैं, फ्लाइट एक घंटा लेट है. अभी एक सखी से बात की, उसकी सासूजी परसों बाथरूम में गिर पड़ीं. बुढ़ापे की कमजोरी तथा भारी शरीर, कहीं जाने की जल्दी के कारण..तथा स्नानघर में में लोहे की बाल्टी थी, उन्हें थोड़ी चोट भी लग गयी है. उसने सोचा शाम को वे उन्हें देखने जायेंगे, यदि आज नहीं तो कल अवश्य ही. 

Tuesday, July 28, 2015

महामंत्र का जाप


नन्हा कल शाम को आ गया. सारी शाम वह अपने हॉस्टल की ढेर सारी बातें बताता रहा. इस समय सोया है क्योंकि देर रात तक जगता रहा. यह नई पीढ़ी ऐसी ही है. हर काम उलटे वक्त पर करती है. खैर...वह सुबह ध्यान नहीं कर पायी. आज पहली बार माला पर महामंत्र का जाप किया, माला जो नन्हा लाया है, उसी ने उसे पकड़ना सिखाया और एक सौ आठ बार जोर से बोलकर स्वयं सुनते हुए जप करने को कहा. पूरे पन्द्रह मिनट लगे, बीच-बीच में मन कहीं और भी गया. योग वशिष्ठ में लिखा है इस जगत का कारण मन ही है, मन ही दृश्य है और मन ही द्रष्टा भी. एक न रहे तो दूसरा भी नहीं रहेगा, तब स्वयं ही स्वयं में स्थित रहेगा. सारी परेशानियों का कारण मन ही है, मन ही न रहे तो कोई दुःख नहीं और यह मन वास्तव में है कुछ नहीं, एक परछाईं है. उसे खत्म करना है ज्ञान की तलवार के द्वारा, वरना यह भूत बनकर चिपक जाता है और वे इसके अनुसार चलते रहते हैं. नीरूमाँ ने कहा जब भी कोई दूसरे की गलती देखता है, उसमें भेद बुद्धि आ जाती है, वह भेद करता है जबकि यहाँ दो हैं ही नहीं, सब उसी एक का पसारा है. जो वे हैं वही अन्य हैं, सभी अपनी-अपनी जगह सही हैं. आज धूप खिली है वह भी स्वीकार्य है और कल बदली होगी वह भी स्वीकार्य होगी.
पिछले पांच दिन डायरी नहीं खोली, नन्हे के आने से व्यस्तता बढ़ जाएगी यह तो स्वाभाविक ही था. आज सुबह अलार्म बजा तो फौरन नहीं उठी. गुरूजी की बतायी विधि के अनुसार स्वयं से जुड़ने का प्रयास किया किन्तु स्वप्न देखने लगी. आजकल तमस की प्रधानता है अथवा रजस की तभी सत्व ज्यादा देर तक नहीं टिकता. आज क्रिया में अनुभव हुआ कि सद्गुरु का हाथ उसके सर पर है. उनकी कृपा से ही भीतर भक्ति के भाव उमड़ते हैं. जब कोई ईश्वर को याद करता है तो मानना चाहिए कि उसकी कृपा है, वरना वह उसे भूलता ही क्यों.

आज शाम को उसे कवि-सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाना है. उसके जीवन का प्रथम कवि-सम्मेलन. इसमें उसे बुलाया गया है और चूँकि वह कविता लिखती है, लिख सकती है इसलिए जा रही है. इसे अपना कर्त्तव्य कर्म मानकर, इससे किसी लाभ की आशा लेकर नहीं, लाभ यदि है भी तो इतना कि लोगों के मन को कुछ देर के लिए मुदित कर सके. देने की भावना ही मन में है लेने की बिलकुल भी नहीं, इसलिए कोई भी उद्ग्विनता नहीं है, मन शांत है, जैसे यह कोई सामान्य घटना हो. ईश्वर तथा सद्गुरु से प्रार्थना है कि उसके मन कि यह समता वहाँ भी ऐसी ही बनी रहे, उसकी कविता चाहे सराही जाये अथवा न सराही जाये, दोनों ही स्थितियों में. जून आज यहाँ नहीं हैं, उनका मन भी आजकल समता में रहना सीख रहा है. वह होते तो अच्छा होता ऐसा भाव भी मन में नहीं आता. इस जगत में जिस क्षण भी जो हो रहा है वही होना था, वही ठीक है ऐसा ही लगता है. कोई शिकायत नहीं, जब कोई कामना ही नहीं तो शिकायत का प्रश्न पैदा नहीं होता. रस की धारा प्रकट हुई है जिसने सभी कुछ ढक लिया है वही अब मुख्य है ईश्वर की अनुभूति की रस धार, वह निकट है, वह सुगंध बनकर भीतर समाया है, वह संगीत बनकर भीतर समाया है, वह प्रकाश बनकर और वही तरंग रूप में भीतर समाया है. वही अमृत बनकर भीतर रिस रहा है अनवरत !


गुरूमाँ गा रही हैं, ‘जोगी मस्ताना, दिल किया दीवाना..’उनकी आवाज दिल को गहरे में जाकर छू जाती है. सद्गुरु होते ही ऐसे हैं प्रेम  से पगे हुए, पूरे डूबे हुए अपने भीतर के अमृत में.. उन्होंने कितने सरल शब्दों में.. जैसे सद्गुरु बताते हैं, मन के बारे में बताया. अचेतन मन को ध्यान में सुझाव दिया जा सकता है, स्वभाव तभी बदलता है जब कोई भीतर जाकर बदलने का प्रयास करता है, भीतर के सच को जो एक बार पा लेता है वह कभी भी उससे विलग नहीं हो सकता, वह सूर्य की तरह निरंतर उसके जीवन में चमकता रहता है. उसके जीवन में भी ऐसा ही प्रकाश भरा है. अब उसे अपने लिए कुछ भी नहीं करना है, जो करना है वह दूसरे के द्वारा दूसरे के लिए ही करना है. यह  शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियां तथा संसार सभी तो अन्य हैं आत्मा को अपने लिए कुछ भी नहीं करना है. वह पूर्ण तृप्त है. कितना खाली हो जाता है एक क्षण में मन जब कोई आत्मा से जुड़ जाता है. पहले मन को खाली करके स्वयं में जाती थी अब पहले खुद में जाती है तो मन गायब हो जाता है ! 

Monday, July 27, 2015

ए सर्च इन सीक्रेट इंडिया


लगता है उसकी विद्यार्थिनी आज फिर भूल गयी है. पिछले शुक्रवार भी वह नहीं आई थी. उसे एक कविता लिखनी है ‘विश्व विकलांग दिवस’ के लिये समय मिल जायेगा. शाम को क्लब जाना है कोरस के अभ्यास के लिए. रात को एक सखी के यहाँ खाने पर जाना है, उसकी शादी की सालगिरह है. सुबह उठने से पूर्व कितने स्वप्न देखे. बर्फ गिर रही है, आकाश एक बड़ी सी फिल्म की स्क्रीन बन गया है, वहाँ लोग एक दूसरे पर बर्फ के गोले बनाकर डाल रहे हैं. सब कुछ इतना स्पष्ट था जैसे सामने घट रहा हो. रात को देर तक नींद नहीं आई, पर इससे उसे कोई परेशानी तो महसूस नहीं होती, शायद वह जगते हुए भी सोती रहती है अर्थात सोते हुए भी जगती है, शायद ध्यान करने से ऐसा होता है. आज नीरू माँ का कार्यक्रम देखा, ऑंखें भर आयीं. कितनी करुणा, कितना प्रेम है उनके भीतर. प्रश्न पूछने वाले तरह-तरह के प्रश्न पूछते हैं पर बिना जरा भी विचलित हुए सभी को जवाब देती हैं. जैन मुनि आचार्य महाप्राज्ञ ने बताया मस्तिष्क का एक प्रकोष्ठ विकसित हो जाय तो मानव का व्यवहार ही बदल जाता है. भीतर की सुप्त शक्ति जब तक जाग्रत नहीं होती वह अज्ञान से मुक्त नहीं हो पाता. उसे जाग्रत करने का पुरुषार्थ तो करना ही है, उसे भाग्य पर नहीं छोड़ा जा सकता. सद्गुरु के बताये मार्ग पर तो चलना ही पड़ेगा. कल पता चला बड़ी भाभी के बड़े भाईसाहब नहीं रहे, उन्हें फोन करना है. कल से नन्हे के इम्तहान हैं. वह कुछ पल नियमित जप करता है. उसे शांति का अनुभव होता है. जब मन शांत होता है तो आत्मा का सहज स्वभाव मुखर हो जाता है. मन को अपने सही स्थान पर रखना ही साधना है.

कल का कार्यक्रम ठीकठाक हो गया. आज शाम को सत्संग में जाना है, कल एक शादी में तथा परसों तीन दिसम्बर है, नेहरू मैदान जाना है. आचानक ही उनके शामें व्यस्त हो गयी हैं. सुबहें और दोपहर तो पहले से ही थीं. कल सद्गुरु को समर्पित उसकी पुस्तिका की उन्नीस प्रतियाँ निकल गयीं, अगले हफ्ते.. और इसी तरह अगले कुछ हफ्तों में और भी लोग इसे लेकर पढ़ेंगे. अभी-अभी वह धूप में गयी, दिसम्बर में भी धूप इतनी तेज है कि दस मिनट से अधिक उसमें नहीं बैठा जा सकता. इसी तरह संसार रूपी धूप में भी देर तक अब रहा नहीं जाता, आत्मा की छाँव में लौट-लौट कर आना होता है, तभी भीतर शीतलता छायी रहती है. ऐसी शीतलता जो अलौकिक है, दिव्य है, प्रेम से पूर्ण है !

पिछले दो दिन फिर नहीं लिखा, रात्रि के पौने आठ बजे हैं. मन में विचार आया कि दिन भर का लेखा-जोखा कर लिया जाये. सुबह उठते ही जैसे पहले अधरों पर प्रार्थना आ जाती थी, “दूर दुनिया की हर बुराई से बचाना मुझको, नेक जो राह हो उस राह पर चलाना मुझको” अब नहीं आती. रात्रि को आने वाले स्वप्न भी पहले से आध्यात्मिक नहीं रह गये हैं, लेकिन होते बहुत अद्भुत हैं. आज दोपहर को Paul Bruntun की पुस्तक A search in secret india पढ़ती रही. शिक्षक ने कहा, विलम्बित ठीक से नहीं हो रहा है, अभ्यास बढ़ाना होगा. शाम को कोपरेटिव जाकर नन्हे के लिए कुछ समान खरीदा, वह परसों आ रहा है, उसकी आलमारी भी पिछले दिनों ठीक कर दी थी.