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Tuesday, September 15, 2020

पीली चमेली

 

आज सुबह वे निकट की सोसायटी में टहलने गए, शायद अंतिम बार, अगली बार यहाँ आने पर उनका ठिकाना नए घर में होगा. नाश्ते के बाद ही यहाँ आ गए. बैठक में बैठे-बैठे ही बाहर की हलचल पता चलती रही है. इक्का-दुक्का कारें ही जाती हैं, क्योंकि उनका घर मुख्य सड़क पर है. दायीं ओर एक गोदाम है जो कुछ वर्षों बाद तोड़ दिया जायेगा. क्लब हॉउस में काम चल रहा है, शायद कुछ वर्ष लगें. आजकल जीवन की नदी एक सपाट, समतल भूमि पर बहती प्रतीत हो रही है. शहर से दूर इस शांत इलाके में रहना, जो आश्रम के नजदीक है, भला लग रहा है. अब  शाम के पौने चार बजे हैं, रात्रि वे यहीं बिताने वाले हैं. मौसम सुहावना हो गया है. आकाश में बादल गरज रहे हैं, यानि वर्षा किसी भी क्षण हो सकती है. आज भी दिन भर कोई न कोई आता ही रहा. दोपहर के भोजन के पश्चात आधा घन्टा विश्राम करने गए पर लेटते ही घण्टी बजी. नन्हे ने तेल की बॉटल रखने के लिए सफेद पत्थर की एक ट्रे मंगवाई थी.  किचन के श्वेत स्लैब पर रखी हुई अच्छी लग रही है. जून फोन पर उस अधिकारी से बात कर रहे हैं जो दफ्तर में उनका काम देख रहे हैं. कविता के ग्रुप में इस बार का शब्द है ‘गति’, पिछले कई दिनों से कोई कविता नहीं लिखी है. 


आज गृह प्रवेश की पूजा है और दोपहर को प्रीति भोज. पहली बार नए घर में सोने पर नींद तो आयी, पर स्वप्न भी आते रहे. कल दिन भर अकारण ही मन दुविधा में था, शायद कोई कर्म उदित हुआ है. सासु माँ का स्मरण हो आया, जाने-अनजाने उन्हें उनके कारण कभी जो भी दुःख हुआ होगा, उसका भी स्मरण हो आया. सुबह साढ़े तीन बजे एक स्वप्न देखकर एक बार नींद खुली,  किसी उत्सव का दृश्य देखा, कुक परांठे बना रहा है, बुआजी कहती हैं, उन्हें सौंफ का पराठाँ खाना है. दीदी व माँ भी हैं जो सभी मेहमानों की देखभाल कर रही हैं. मन दिन में भी स्वप्न रचता है और रात्रि में भी. करवट बदल कर पुनः सो गयी. एक घन्टे बाद उठकर देखा, आकाश गुलाबी था, कमरे से बाहर निकलते ही सूर्योदय की तस्वीर उतारी. बाद में निकट गांव में स्थित मन्दिर तक टहलने गए. फूलों की मालाएं खरीदीं. घर के द्वार पर सुगन्धित फूल लगाए, सारा घर बेल की सुवास से भर गया है. मौसम अभी तक तो ठीक है, दिन में तेज गर्मी होने वाली है. नन्हा और सोनू अभी तक नहीं आये हैं. उन्होंने इस घर की साज-सज्जा में बहुत श्रम किया है. पूरे घर में आटोमेशन से बिजली व पंखे चलते हैं. संगीत भी ओके गूगल कहकर बजा सकते हैं, जगह-जगह स्पीकर लगा दिए हैं. कहीं भी काम करते रहें तो संगीत या कुछ भी सुन सकते हैं. कुछ देर पूर्व क्लब की भूतपूर्व प्रेजिडेंट का स्मरण हुआ, तत्क्षण उनका फोन भी आ गया. उन्हें भी घर की तस्वीरें भेजी हैं. अपने घर मन रहने का अनुभव कैसा होता है, अब कुछ-कुछ अहसास हो रहा है. आज से एक्ज़िट पोल शुरू हो गए हैं, बीजेपी जीत रही है. 


उसने अतीत के झरोखे से झाँका, उस दिन डायरी के पन्ने की सूक्ति थी - झूठ इंसान को जलील कर देता है - महात्मा गाँधी . पढ़कर लगा, उसके उस झूठ के क्या परिणाम होंगे, कौन से झूठ के, यह नहीं लिखा, बचपन से उस दिन तक एक ही झूठ तो नहीं बोला होगा. छोटे थे वे लोग तो गाते थे, ‘झूठ बोलना पाप् है, नदी किनारे सांप है’.  फूल लायी थी  उस दिन चमेली के पीले सुवासित फूल, जिनकी माला बनाकर वह गले में पहन लेती थी, भीनी-भीनी सी खुशबू देर तक साथ रहती थी. बाहर से रेडियो की आवाज आ रही थी, दरवाजा ठीक से बन्द किया तो कम हो गयी. कल ‘विचार बिंदु’ में बापू के विचार सुने. कितने अच्छे थे बापू और वह ? उन्होंने कहा था, हँसी मन की गिरह खोल देती है, अपने ही नहीं दूसरों के मन की भी. हँसी उसकी सहेली है, यह उसने कहा था. पर उस वक्त उसे क्या हो जाता है, काश उस वक्त वह आइना देख पाती, पत्थर भी उससे सजीव लगता होगा. और फिर उसे याद आयी वह बात जो बरसों से भूली हुई थी, यानि परसों उसका इम्तहान है ! 


सोच एक दायरे में घूमती है बस और वह चक्कर लगाने लगती है गोल गोल ... न उधर न इधर कहीं कोई उत्थान नहीं, कभी कोई बात चुभ जाये या कोई बात न भी हो आँसूं पता नहीं कहाँ से आते हैं, आते चले जाते हैं ! फिर उसने सोचा,  पिताजी का बिछौना लगा दे. 


Wednesday, April 17, 2019

पीले फूलों की माला



साढ़े तीन बजने को हैं, दोपहर बारह बजे से ही लगातार वर्षा हो रही है. हर तरफ पानी ही पानी हो गया है लॉन में. बाढ़ से असम के कई जिले पहले ही कितने पीड़ित हैं, ऊपर से वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही है. प्रकृति की यह विनाश लीला इस सृष्टि चक्र का ही एक भाग है, मानव विवश है इसके आगे. आज एक वीडियो खोला तो एक वायरस का शिकार हो गयी. उसकी तरफ से कई मित्रों को अपने आप संदेश जाने लगे हैं. नन्हे को कहा है, वही कुछ सहायता कर सकता है. मैसेंजर से हट जाना ही ठीक रहेगा भविष्य में अथवा तो फेसबुक से ही. कल लाइब्रेरी से दो किताबें लायी. प्रणव मुखर्जी की एक ‘द ड्रामेटिक डिकेड’ और दूसरी अमेजन के बारे में हैं.

नन्हे ने सहायता की और उसकी तरफ से संदेश जाने बंद हो गये हैं. आज तरणताल में दोनों हाथों का प्रयोग करके तैरना सीखा. धीरे-धीरे ही सही कुछ बात बन रही है. सुबह उठी तो मन टिका था. आज तिनसुकिया जाना है, पूजा के उपहार खरीदने हैं. नैनी व माली के परिवारों के लिए. शिक्षक दिवस के उपहार भी खरीदने हैं. शाम को एक सखी के यहाँ चाय पर जाना है. क्लब की एक सदस्या ने फोन किया, उसे प्रेस जाने के लिए गाड़ी चाहिए. कल शाम वह बहुत परेशान थी. प्रेसिडेंट ने उसे फोन पर कुछ ऐसा कह दिया था जो उसे रास नहीं आया. कुछ देर बात करने के बाद वह खुश हो गयी, सारे दुःख उनके मन की कल्पना से ही बनते हैं और बढ़ते हैं. आज वैदिक टीवी देखा, सुना, कितना उपयोगी है यह साधकों के लिए. सुबह गुरूजी के साथ ‘सत्यं परम धीमही’ ध्यान किया. बड़ी भांजी से बात की, वह आजकल फेसबुक पर उदासी भरी पोस्टस् डालती है.

आज गणेश पूजा है, उन्होंने सुबह घर में गणपति की मूर्तियाँ सजायीं. लड्डू का प्रसाद बनाया. जून और उसने आरती की. नैनी ने पीले फूलों की माला बनाई. गणपति के प्रतीक की व्याख्या सुनी. उनके बड़े सिर, विशाल उदर और कानों, लंबी सूंड और उनकी सवारी, सभी के बारे में गुरूजी ने कितने सरल शब्दों में समझाया. पूजा का अर्थ है पूर्णता से उत्पन्न भाव, शुभता के प्रतीक गणपति उनके मनों को शुद्धता से भरें यही प्रार्थना उन्हें करनी है.

ग्यारह बजने को हैं. टीवी पर प्रधानमन्त्री के ‘मन की बात’ आने वाली है. आज धूप बहुत तेज है. प्रातः भ्रमण के समय ही सूरज की चमक आँखों को चुंधिया रही थीं. पीएम का सम्बोधन आरम्भ हुआ तो वे सुनने बैठ गये, अच्छा लगता है उनकी प्रेरणादायक बातें सुनना. राष्ट्रीय खेल दिवस के बारे में उन्होंने बताया और खेलों के महत्व के बारे में भी. नेवी में काम करने वाली छह महिलाओं का जिक्र किया जो तरिणी पर एक वर्ष के लिए विश्व भ्रमण पर जाने वाली हैं. शिक्षक दिवस पर भी वह एक अभियान चलाना चाहते हैं, जिसमें शिक्षा बदलाव के लिए हो और सीखना जीने के लिए हो. ‘जन धन योजना’ के कारण बैंकों में हुई बचत का जिक्र भी किया. जैन समाज के पर्व ‘पर्यूषण’ का महत्व बताया, जो क्षमा, मैत्री और अहिंसा का प्रतीक है. गणेश चतुर्थी का पर्व एकता, समता और शुचिता का पर्व है. ओणम प्रेम, सौहार्द, उमंग और आशा का संदेश देता है. सामाजिक समरसता का भी उल्लेख किया, जमैतुला हिन्द के कार्य कर्ताओं ने गुजरात के मन्दिरों और मस्जिदों की सफाई की. जाने कितने लोगों को कुछ करने की प्रेरणा देता है उनके संदेश.




Wednesday, February 7, 2018

फूलों की माला


पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा. शनिवार और इतवार को काम कुछ ज्यादा रहता है. कल सोमवार को फिर नैनी का स्वास्थ्य ठीक नहीं था. माली की पत्नी को भी अस्पताल जाना है, आज उसका आपरेशन हो सकता है, नूना ने ही बहुत समझा-बुझा कर भेजा है. वह भी समझ गयी है, दो बच्चों से परिवार पूर्ण हो गया है, अब तीसरे की कोई आवश्यकता नहीं है. कल रात्रि भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे नहीं रहे. हर कोई उनसे प्रेम करता था. उनके जीवन की तरह उनकी मृत्यु भी शानदार रही. शिलांग में व्याख्यान देते हुए ही उनका अंतिम समय आया. वह भी ऐसी ही मृत्यु चाहती है और ऐसी ही मृत्यु उसे मिलेगी ऐसा विश्वास भी है. अब्दुल कलाम जी के अंतिम क्षणों के बारे में उनके असिस्टेंट ने बेहद मार्मिक शब्दों में जो कहा है, उसे पढ़कर आँखें नम हो गयीं. सचमुच वे भारत रत्न थे. कल रात को पुनः अजीब सा स्वप्न देखा, उनके मन की गहराई में क्या-क्या छिपा है, कुछ पता नहीं चलता. शायद किसी कर्म का भुगतान भी स्वप्न द्वारा होता होगा, शायद नहीं, ऐसा ही है. उनके हर छोटे-बड़े कर्म का फल तो मिलने ही वाला है, सो कुछ कर्मों का फल वे सूक्ष्म देह में पा लेते हैं, कुछ का स्थूल में. कुछ देर पहले बड़ी ननद का फोन आया, वह नन्हे के विवाह के बारे में उत्सुक है. एक रिश्ते की बात कर रही थी. आज धूप बहुत तेज है, तापमान ३६ डिग्री है. एसी रूम में बैठकर कुछ राहत मिल रही है.

शाम के चार बजने वाले हैं. आज भी धूप कल की सी तेज है. दोपहर को एसी में कुछ जल गया, वे गेस्ट रूम में शिफ्ट हो गये, फिर मकैनिक को बुलाया. आज भी नैनी काम पर नहीं आई. उसने पानी का बड़ा पतीला उठा लिया, रीढ़ की हड्डी में कुछ महसूस हो रहा है. उठाते वक्त एक ख्याल आया था कि भार ज्यादा है पर जोश में ध्यान नहीं दिया. सुबह नैनी से पूछा, अस्पताल गयी या नहीं, तो उसने कहा वह इस बच्चे को जन्म देना चाहती है. कल रात ही उसने बीमारी का असली कारण बताया था, पता चला कि जिस भय से मुक्त करने के लिए वह उसे अस्पताल भेज रही थी वह तो पहले ही सत्य सिद्ध हो चुका है. दो बेटियों के बाद उसे पुत्र की चाह है. अभी छोटी बेटी दो वर्ष की भी नहीं हुई है. देवरानी अगले हफ्ते ही सन्तान को जन्म देने वाली है. पता नहीं ये लोग किस मिट्टी की बनी हैं. उसने एक परिचिता को फोन किया जिसके पति डाक्टर हैं. उसने कहा अस्पताल में महला समिति का एक ग्रुप है जो ग्रामीण व अबोध महिलाओं को परिवार नियोजन की जानकारी देता है. बातों-बातों में उसने एक बंगाली कलाकार रॉबिन बार के बारे में बताया, जो दोनों हाथों से एक साथ चित्र बनाता है, जरूरत पड़ने पर पैर से भी. जब वह परिचिता उससे मिली तो मात्र उसके हस्ताक्षर से उसने कृष्ण का चित्र बना दिया. जैसे कला की कोई सीमा नहीं है कलाकार की भी नहीं. छोटी बहन कल नन्हे के यहाँ पहुँच गयी. आज शाम वह आश्रम जा रही है. परसों उसका जन्मदिन है. गुरूजी तो विदेश में हैं पर आश्रम में उनकी उपस्थिति का अहसास फिर भी होता होगा. गुरू से एक बार जुड़ना होता है फिर मुक्त भी होना होता है. जैसे बच्चा माँ की ऊँगली पकड़कर चलता है फिर समर्थ होने पर छोड़ भी देता है वैसे ही शिष्य भी एक दिन उसकी छाया में चलता है फिर जब वह जानता है कि गुरू, आत्मा व परमात्मा में कोई भेद नहीं है तो वह स्वयं को उससे पृथक नहीं मानता. फिर पीछे चलने की बात ही नहीं रहती. भीतर का गुरू तब जाग जाता है जो हर कदम पर चेताता रहता है. शाम उसे भी एक मित्र परिवार के यहाँ जाना है, पर गर्मी इतनी है कि जाने का मन नहीं होता. वे लोग भी गर्मी से परेशान होंगे.

कल शाम आजादी की पहली लड़ाई का चित्रण देखा ‘भारत एक खोज’ में.  वे भाग्यशाली हैं कि आजाद भारत में साँस ले रहे हैं. आज गुरू पूर्णिमा है, शाम को आर्ट ऑफ़ लिविंग के सेंटर जाना है. अभी-अभी बगिया से पुष्प तोड़कर उसने गुरूजी के लिए माला बनाई है. रात को एक सखी के पतिदेव की सेवानिवृत्त होने पर विदाई पार्टी में भी जाना है. आज से चार वर्ष बाद लगभग इसी समय उन्हें भी यहाँ से विदाई मिलेगी. समय तो पंख लगाकर उड़ता जाता है. एक अन्य सखी से बात हुई, उसका पुत्र घर आया हुआ है, उसे त्वचा का कोई रोग हो गया है. जून के एक सहकर्मी को एंजियोग्राफी करानी है, उस के बारे में भी पूछ रही थी, किन्तु उसे इस बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं है. नेट पर पढ़ा, कुछ समझ में तो आया कि रक्त में कोई कैप्सूल डालकर हृदय की धमनियों व शिराओं की जाँच एक्स रे के द्वारा की जाती है. कैमरे जैसा कोई यंत्र होता होगा. उसने ईश्वर से उनके स्वास्थ्य की कामना की. वे किसी भी क्षण उतना ही स्वस्थ होते हैं जितना स्वयं को महसूस करते हैं. आज जून को यात्रा के लिए सामान भी सहेजना है, कल वह पांच-छह दिनों के लिए यात्रा पर जा रहे हैं. उसे अपने समय का सदुपयोग करना होगा. आज सुबह आवाज में हल्की सी तेज आयी तो झट ज्ञान हो गया, फिर सफाई कर्मचारी को पैंट्री में पोछा लगाने पर टोका तो मन की असहनशीलता का तत्क्षण भान हो गया. कभी किसी क्षण जब लगता है कि कुछ सार्थक नहीं घट रहा है तब कोई कहता है, स्वयं में टिकना ही सार्थक है. घास उग रही है, झरना बह रहा है, पंछी गा रहे हैं, यदि ये सब सार्थक हैं तो उनका होना भी सार्थक है. यदि सार्थक से तात्पर्य है कि वे ऐसा कुछ करें जिससे जगत का कल्याण हो तो मानसिक सेवा भी की जा सकती है. कोई गीत रचा जा सकता है, ऐसा गीत जो पाठकों को को प्रेरणा से भर दे. नाचा जा सकता है. बगीचा संवारा जा सकता है और नहीं तो घर का कोई कोना सजाया जा सकता है ताकि जो भी आये उसे ख़ुशी मिले. भीतर का भाव शुद्ध हो तो हर काम पूजा ही है !    


Tuesday, July 28, 2015

महामंत्र का जाप


नन्हा कल शाम को आ गया. सारी शाम वह अपने हॉस्टल की ढेर सारी बातें बताता रहा. इस समय सोया है क्योंकि देर रात तक जगता रहा. यह नई पीढ़ी ऐसी ही है. हर काम उलटे वक्त पर करती है. खैर...वह सुबह ध्यान नहीं कर पायी. आज पहली बार माला पर महामंत्र का जाप किया, माला जो नन्हा लाया है, उसी ने उसे पकड़ना सिखाया और एक सौ आठ बार जोर से बोलकर स्वयं सुनते हुए जप करने को कहा. पूरे पन्द्रह मिनट लगे, बीच-बीच में मन कहीं और भी गया. योग वशिष्ठ में लिखा है इस जगत का कारण मन ही है, मन ही दृश्य है और मन ही द्रष्टा भी. एक न रहे तो दूसरा भी नहीं रहेगा, तब स्वयं ही स्वयं में स्थित रहेगा. सारी परेशानियों का कारण मन ही है, मन ही न रहे तो कोई दुःख नहीं और यह मन वास्तव में है कुछ नहीं, एक परछाईं है. उसे खत्म करना है ज्ञान की तलवार के द्वारा, वरना यह भूत बनकर चिपक जाता है और वे इसके अनुसार चलते रहते हैं. नीरूमाँ ने कहा जब भी कोई दूसरे की गलती देखता है, उसमें भेद बुद्धि आ जाती है, वह भेद करता है जबकि यहाँ दो हैं ही नहीं, सब उसी एक का पसारा है. जो वे हैं वही अन्य हैं, सभी अपनी-अपनी जगह सही हैं. आज धूप खिली है वह भी स्वीकार्य है और कल बदली होगी वह भी स्वीकार्य होगी.
पिछले पांच दिन डायरी नहीं खोली, नन्हे के आने से व्यस्तता बढ़ जाएगी यह तो स्वाभाविक ही था. आज सुबह अलार्म बजा तो फौरन नहीं उठी. गुरूजी की बतायी विधि के अनुसार स्वयं से जुड़ने का प्रयास किया किन्तु स्वप्न देखने लगी. आजकल तमस की प्रधानता है अथवा रजस की तभी सत्व ज्यादा देर तक नहीं टिकता. आज क्रिया में अनुभव हुआ कि सद्गुरु का हाथ उसके सर पर है. उनकी कृपा से ही भीतर भक्ति के भाव उमड़ते हैं. जब कोई ईश्वर को याद करता है तो मानना चाहिए कि उसकी कृपा है, वरना वह उसे भूलता ही क्यों.

आज शाम को उसे कवि-सम्मेलन में भाग लेने के लिए जाना है. उसके जीवन का प्रथम कवि-सम्मेलन. इसमें उसे बुलाया गया है और चूँकि वह कविता लिखती है, लिख सकती है इसलिए जा रही है. इसे अपना कर्त्तव्य कर्म मानकर, इससे किसी लाभ की आशा लेकर नहीं, लाभ यदि है भी तो इतना कि लोगों के मन को कुछ देर के लिए मुदित कर सके. देने की भावना ही मन में है लेने की बिलकुल भी नहीं, इसलिए कोई भी उद्ग्विनता नहीं है, मन शांत है, जैसे यह कोई सामान्य घटना हो. ईश्वर तथा सद्गुरु से प्रार्थना है कि उसके मन कि यह समता वहाँ भी ऐसी ही बनी रहे, उसकी कविता चाहे सराही जाये अथवा न सराही जाये, दोनों ही स्थितियों में. जून आज यहाँ नहीं हैं, उनका मन भी आजकल समता में रहना सीख रहा है. वह होते तो अच्छा होता ऐसा भाव भी मन में नहीं आता. इस जगत में जिस क्षण भी जो हो रहा है वही होना था, वही ठीक है ऐसा ही लगता है. कोई शिकायत नहीं, जब कोई कामना ही नहीं तो शिकायत का प्रश्न पैदा नहीं होता. रस की धारा प्रकट हुई है जिसने सभी कुछ ढक लिया है वही अब मुख्य है ईश्वर की अनुभूति की रस धार, वह निकट है, वह सुगंध बनकर भीतर समाया है, वह संगीत बनकर भीतर समाया है, वह प्रकाश बनकर और वही तरंग रूप में भीतर समाया है. वही अमृत बनकर भीतर रिस रहा है अनवरत !


गुरूमाँ गा रही हैं, ‘जोगी मस्ताना, दिल किया दीवाना..’उनकी आवाज दिल को गहरे में जाकर छू जाती है. सद्गुरु होते ही ऐसे हैं प्रेम  से पगे हुए, पूरे डूबे हुए अपने भीतर के अमृत में.. उन्होंने कितने सरल शब्दों में.. जैसे सद्गुरु बताते हैं, मन के बारे में बताया. अचेतन मन को ध्यान में सुझाव दिया जा सकता है, स्वभाव तभी बदलता है जब कोई भीतर जाकर बदलने का प्रयास करता है, भीतर के सच को जो एक बार पा लेता है वह कभी भी उससे विलग नहीं हो सकता, वह सूर्य की तरह निरंतर उसके जीवन में चमकता रहता है. उसके जीवन में भी ऐसा ही प्रकाश भरा है. अब उसे अपने लिए कुछ भी नहीं करना है, जो करना है वह दूसरे के द्वारा दूसरे के लिए ही करना है. यह  शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियां तथा संसार सभी तो अन्य हैं आत्मा को अपने लिए कुछ भी नहीं करना है. वह पूर्ण तृप्त है. कितना खाली हो जाता है एक क्षण में मन जब कोई आत्मा से जुड़ जाता है. पहले मन को खाली करके स्वयं में जाती थी अब पहले खुद में जाती है तो मन गायब हो जाता है !