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Tuesday, October 3, 2017

एस्पर्गस का पौधा


नये वर्ष के चौथे माह का आरम्भ हो गया है. परसों क्लब की कमेटी मीटिंग है, उसके अगले दिन स्कूल का वार्षिकोत्सव है और उसके भी अगले दिन उन्हें चार दिन की छोटी सी यात्रा पर निकलना है. वापस लौटने पर मृणाल ज्योति भी जाएगी. आज तेज वर्षा के कारण प्रातः भ्रमण का कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा. सुबह स्कल में ही थी बड़ी ननद का फोन आया, उन्होंने बिटिया का रिश्ता पूरी तरह से तोड़ देने के लिए हामी भर दी है, वह बेहद दुखी थी. मंझली भाभी से बात हुई, बड़ी भाभी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, शायद आज पुनः अस्पताल चली गयी होंगी. ‘भारत एक खोज’ के एपिसोड में आज महाभारत दिखाया जा रहा है. फेसबुक पर एक कवयित्री ने उसे एक काव्य श्रृंखला को आगे बढ़ाने के लिए नामित किया है, पर किसी कारण उससे नहीं पाया, उन्हें कल लिखना होगा. जून के दफ्तर में एक अधिकारी ने अपने नाती होने की ख़ुशी में मिठाई बांटी. उसने सोचा वह भी फोन पर उन्हें बधाई देगी. माली की पत्नी अपने पुत्र के जन्म प्रमाण पत्र के लिए फार्म भरवाने आई थी, कितना सुंदर नाम रखा है पुत्र का, ओम ज्योति. जो पौधे वे शिलांग से लाये थे, उनके साथ एक अस्पर्गस का पौधा अपने आप ही आ गया था, चीड़ के पौधे नहीं बचे पर यह बच गया, लम्बा होता जा रहा है. माली से कहकर उसमें एक लकड़ी लगवा दी है. क्लब की उपसचिव ने व्हाट्स एप ग्रुप बना दिया है कमेटी सदस्याओं का, पहले ही दिन ढेर सारे संदेश आये.

आज सुबह चार बजे से कुछ पहले ही उठी. उठने से पूर्व ही कोई कह रहा था, उसका सारा जीवन एक झूठ है, फिर एक चाय का कप भी दिखा. सुबह से ही मन पूछ रहा है, जीवन में क्या-क्या है जो असत्य है. वह जून से कहती है कि वह जब बाहर जाते हैं, प्रसाधन सामग्री, चाय आदि सामान न लायें, पर स्वयं उनका इस्तेमाल करती है. यही असत्य सबसे पहले नजर आया. अब से उनका इस्तेमाल नहीं करेगी, ऐसा तय किया है. उसके संकल्पों में बल नहीं है, कहीं यह इशारा उसकी तरफ तो नहीं था. उसके अनुभव क्या संतों की वाणी का प्रभाव मात्र हैं ? मात्र कल्पना हैं ? भीतर कई सवाल हैं. हो सकता है स्वप्न यह कह रहा हो, आत्मा के सिवाय सभी कुछ असत्य है. एक गीत है न, झूठी दुनिया झूठी माया..झूठा सब संसार..

नहीं देखा जा सकता आकाश को जमीन पर रेंगते हुए
बंद कमरों में बैठकर ताजी हवा से वंचित ही रहेंगी श्वासें
परमात्मा हुए बिना परमात्मा से नहीं होती मुलाकात
जज्बातों को समझे बिना खुद के, नहीं समझेगा कोई दूसरों के जज्बात
जीवन चलता रहे यह आस कितनी व्यर्थ है
जीवन को गहराई से नापे तभी कोई अर्थ है
आसमानी रंग क्यों भाता है सभी को
याद दिलाता है अपनी विशालता की
क्षीरसागर के समान श्वेत मेघों की आकृतियाँ
कथाएं कह जाती हैं निजता की !

कल कुछ नहीं लिखा. आज स्कूल गयी, लौटने में बारह बज गये, शायद सवा बारह. ड्राइवर पूरे धैर्य के साथ साढ़े नौ बजे से वहीं खड़ा रहा. बच्चों ने सूर्य नमस्कार ठीक से सीख लिया है. ध्वनि मिश्रण के लिए किसी को बुलाया था, उसी कार्य में देर हुई.          


Friday, December 30, 2016

जीव और ब्रह्म -आदि शन्कराचार्य


कल शाम और आज पुनः बाबा को सुना. वे नई ऊर्जा से भर गये हैं. अपने अभियान को चलाये रखने का उन्होंने व्रत दोहराया और जोशीले भाषण से अपने विरोधियों के सवालों का जवाब दिया. आज वर्षा की झड़ी लगी है, वे प्रातःभ्रमण के लिए भी नहीं जा सके. कल नन्हे ने कहा उसे कविता अच्छी लगी, एकाध बात समझ में नहीं आयी. आज से नैनी काम पर आ गयी है, अभी पिताजी ने उसके बारे में कुछ कहा, उन्हें घर-गृहस्थी के मामलों में अपनी राय देने में बहुत आनंद आता है, तो नूना ने उन्हें तुरंत जिस तरह तेजी से जवाब दिया, उसे खुद पर आश्चर्य हुआ, उसने सोचा भी नहीं था, उसके अचेतन से ही यह कृत्य हुआ, उसने किया भी नहीं. इसी तरह हर कोई जो भी व्यवहार कर रहा है, वह संस्कारों के वशीभूत होकर ही कर रहा है. एक अर्थ में कर्ता वह है ही नहीं, यह केवल मानने की बात नहीं है, ऐसा ही है. यदि वह सचेत होकर, कुछ बनाकर उन्हें जवाब देती तो कर्ता होने का दावा कर सकती थी, न ही वे पुण्यकर्मों के कर्ता हैं न पाप कर्मों के, स्वभाव के अनुसार कृत्य होते हैं. स्वभाव वश यदि कोई असत्य भाषण कर देता है तो भी उसका फल उसे मिलेगा ही, उस दंड को भोगते समय भी उसे साक्षी बना रहना होगा.

आज सुबह बाबा के गुरूजी द्वारा शन्कराचार्य के वेदांत सिद्धांत को प्रस्तुत किया गया. उनके अनुसार ब्रह्म अनादि व अनंत है. अविद्या व अज्ञान अनादि तो हैं पर सांत हैं. ब्रह्म जब अविद्या अर्थात माया में बंधता है तो ईश्वर कहाता है जिसकी शक्ति व ज्ञान अनंत है पर वही ब्रह्म जब अज्ञान से बंधता है तब जीव कहाता है. ईश्वर सृष्टि रचना, पालना व प्रलय का कारण है. जीव कर्मों को करता है व उनके फलों को भोगता है. जीव अपने शुद्ध स्वरूप में ब्रह्म के समान ही है. आज का ध्यान भी अच्छा था. वास्तव में देखा जाये तो इस जगत में न कुछ अच्छा है न बुरा, दृष्टिकोण पर ही निर्भर करता है. गुरूजी भी कहते हैं विपरीत मूल्य एक दूसरे के पूरक हैं. एक ही चेतन तत्व से यह जगत बना है. जब तक द्वंद्व रहेगा, समाधान हो ही नहीं हो सकता. भीतर एकत्व तभी होगा जब कोई बाहर बांटना छोड़ देगा. वे जो बाहर वस्तुओं, व्यक्तियों और परिस्थितियों पर ठप्पा लगते हैं, बांटते हैं तो भीतर दरार पड़ने ही वाली है.


आज का ध्यान अनोखा था. विचारों को महसूस करना था, वे कहाँ से आते हैं ? क्या वे उनके हैं ? आत्मा के अनंत सागर से विचार आते हैं और जिन्हें वे अपना मानते हैं दरअसल वे सब उधार के होते हैं. उनके विचार जैसा कुछ भी नहीं है इस जगत में. केवल मौन ही उनका है. उनके संकल्प वातावरण की, शिक्षा की, उन पुस्तकों की देन होते हैं और जो कुछ उनके बावजूद भीतर से आता है वह संस्कारों के कारण हो सकता है. ‘वे’ हैं ही नहीं तो उनका कुछ भी हो कैसे सकता है. ‘वे हैं’ यह भी एक विचार ही है. ध्यान के बाद कैसी मुक्ति का अहसास हो रहा है. विचारों से ही तो वे राग-द्वेष में बंधते हैं, अहंकार के शिकार होते हैं. दुःख उन्हें पकड़ता है. विचार न हों तो एक गहरा मौन और सन्नाटा भीतर छाया रहता है !        

Friday, June 6, 2014

मेरे अपने- मीनाकुमारी की यादगार फिल्म


उसने स्वयं से कहा, अगर उसे ईश्वर पर अटूट विश्वास है तो जीवन में आने वाली मुसीबतों से घबराना नहीं, शरीर व मन के साथ तो ऊंच-नीच लगा ही रहेगा किन्तु आत्मा के सच्चे अविनाशी रूप को कोई बीमारी, कोई विपदा नहीं मिटा सकती और वास्तव में वह वही है, सो घबराने या थकहार कर बैठ जाने के बजाय उसे अपनी बिखरी हुई शक्तियों को समेटना होगा और जो कुछ जीवन में आये उसे बिना किसी दुविधा के स्वीकारना होगा.

Today is her birthday. Younger brother rang her and she talked to him. Bhabhi, father, didi also called. Jijaji has resigned from his uae job and will live with his family now. Elder brother also wished. She called younger sister. They all love her and care for her. In the evening few friends came. Nanha made one birth day card for her in computer and jun gave the loveliest card. He was so caring and loving last some days. He understands her worries and weaknesses.

Life is like a river, somewhere full of energy and velocity, broad and pure, somewhere narrow and still. These days river of her life is not flowing its full speed, one friend says it is age and her over activity, but she thinks it is the disease. Jun says low blood pressure or low hemoglobin is not a disease. God only knows what is root cause of her problem. Whatever comes in way is will of god so accept it wholeheartedly. On Wednesday when she first experienced the pain she could not accept it that it is happening to her and then came other symptoms.she realized the reason of her fatigue and tiredness, the slow walking and dullness. She was weak but did not have courage  to accept this.

कल जून का आरम्भ हो गया, आज दीदी का जन्मदिन है वे उन्हें इ-मेल से शुभकामनायें भेज रहे हैं. पिछले बुधवार को उसे स्वास्थ्य सम्बन्धी जो दिक्कत शुरू हुई थी अब पूरे एक हफ्ते बाद समाप्त हुई सी लगती है. अगल हफ्ते से नन्हे का स्कूल बंद हो रहा है, तब उसके दिन अच्छे व्यतीत होंगे उसके साथ पढ़ते-पढ़ाते, कम्प्यूटर पर काम करते व टीवी देखते. कल दोपहर बाद मीनाकुमारी की एक बहुत अच्छी फिल्म देखी, ‘मेरे अपने’.

जीवन का लक्ष्य है, एकमात्र लक्ष्य है सत्य की प्राप्ति, किन्तु वे, कहना चाहिए ‘वह’ कितनी आसानी से असत्य का सहारा ले लेती है, इसका मकसद दूसरों को दुःख या चोट पहुंचना नहीं  बल्कि चोट से बचाना ही होता है, फिर भी असत्य तो असत्य ही है. आज ३ जून की सुबह एक बार फिर वह अपने आप से वादा करती है कि किसी भी रूप में ( चाहे शहद या औषधि के रूप में ही ) असत्य का प्रयोग नहीं करेगी. आज बगीचे से आम व खीरे तोड़े, अभी घर में सजे फूलों को भी बदलना है, घर में बगीचा होना कितना लाभकारी और शुभ होता है. यहाँ से जाने के बाद भी वे अपने घर में पौधे अवश्य लगायेंगे. आजकल जी टीवी पर भागवद कथा सुनाई जा रही है, व अगली बनारस यात्रा में ‘भागवद पुराण’ लेकर आएगी, इसमें कई सुंदर कथाये हैं और ज्ञान के आख्यान हैं. ईश्वर भक्ति व प्रेम के कारण ही भारत इतना विशाल व विविधताओं के होते हुए भी एक सूत्र में बंधा है. यहाँ हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में यह मानता है कि जीवन क्षण भंगुर है और सुख-दुःख का कारण मानव की भोक्ता बनने की प्रवृत्ति है. असल में सब माया जाल है सच्ची शांति पाने के लिए मानव को द्रष्टा बनना होता है. जैसे स्टेज पर कोई नाटक चल रहा हो और दर्शक मूक द्रष्टा व श्रोता बनकर देखा करते हैं वैसे ही स्वयं भी उसी नाटक का पात्र होते हुए भी मानव को सारे जीवन को एक नाटक की तरह लेना चाहिए. अपने रोल को बखूबी निभाने की कला भर सीखनी चाहिए उसमें डूबकर स्वयं को व्यथित व हर्षित नहीं करना चाहिए.