Showing posts with label सूर्य. Show all posts
Showing posts with label सूर्य. Show all posts

Monday, February 25, 2019

नया नियम



मिजोरम के लोगों के रहन-सहन तथा रीतिरिवाजों के बारे में कई रोचक जानकारियां मिली हैं. ये लोग सुबह जल्दी उठते हैं, चार बजे से भी पहले तथा सुबह छह बजे ही दिन का भोजन कर लेते हैं. इसके बाद काम पर निकल जाते हैं तथा दोपहर को भोजन नहीं करते. शाम का भोजन छह बजे ही कर लेते हैं, इसलिए यहाँ बाजार जल्दी बंद हो जाते हैं. कुछ देर पहले हम बाजार गये लेकिन ज्यादातर दुकानें बंद हो चुकी थीं. यहाँ भोजन में ज्यादातर चावल, मांस तथा उबली हुई सब्जियां ही खायी जाती हैं. मसाले भी नहीं के बराबर. यहाँ बहुविवाह प्रथा प्रचलित है तथा स्त्री या पुरुष दोनों को इसका समान अधिकार है. महिलाएं यहाँ सभी प्रकार के काम करती हैं, बचपन से ही उनके साथ कोई भेद भाव नहीं किया जाता. उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का पूरा अवसर मिलता है. तलाक लेना यहाँ बहुत आसान है. किसी भी तरह का विवाद लोग आपसी बातचीत से सुलझा लेते हैं. पुलिस तथा अदालत तक मामला पहुंचने की नौबत नहीं आती. सडकों पर ड्राइवर एक दूसरे को रास्ता देते हैं तथा अपने वाहन को पीछे ले जाने में जरा भी नहीं हिचकते.

लुंगलेई में उनकी पहली सुबह है. पंछियों की आवाजों ने जगा दिया, कमरे की खिड़की से परदा हटाया तो सामने पर्वतमालाएं थीं और आकाश पर गुलाबी बादल. जैसे सामने कोई चित्रकार अदृश्य हाथों से अपनी कला का प्रदर्शन कर रहा हो. सामने वाले पहाड़ हरे वृक्षों से लदे थे, उसके पीछे काले पर्वत जिनके वृक्षों की आकृतियाँ खो गयी थीं पर आकार फिर भी नजर आ रहे थे. तीसरी श्रेणी, जहाँ ऊँची-नीची सी वृक्षों की चोटियाँ मात्र दिख रही थीं, और उसके पीछे स्वप्निल से पहाड़ जो धुंध और सलेटी कोहरे में लिपटे थे. एक के पीछे एक तीन-चार पर्वत श्रेणियां और ऊपर गहरा नीला आकाश और उस पर सुनहरे चमकते बादल, जो गगन के राजा के आने का संदेश दे रहे थे. तभी चर्च से घंटियों का स्वर आने लगा और पूरा वातावरण एक आध्यात्मिक रंग में सराबोर कर गया. कुछ देर बाद वे प्रातः भ्रमण के लिए निकले, हवा ठंडी थी, बाहर का तापमान आठ डिग्री था. निकट ही बादलों को पर्वतों की श्रंखलाओं पर सिमटते हुए देखा, एक अद्भुत दृश्य था.

अब शाम के पांच बजे हैं. वे आज बाजार से जल्दी जाकर लौट आये हैं. सुबह जून जब अपने काम के सिलसिले में चले गये तो उसने कुछ देर कमरे में रखी बाइबिल पढ़ी, नया नियम नाम से छोटी सी हिंदी में लिखी पुस्तक, जो कई स्थलों पर बहुत रोचक और उत्साहवर्धक लगी, परमात्मा का राज्य उनके भीतर है, वे इस बात को भुला देते हैं और व्यर्थ ही परेशान होते हैं. कल उन्हें वापस आइजोल जाना है और परसों कोलकाता, तथा उसके अगले दिन असम.

Wednesday, December 5, 2018

आकाश में लाल गेंद



छह दर्शनों में एक हैं सांख्य दर्शन. योग तथा सांख्य का एक जोड़ा है, न्याय और वैशेषिक का एक युग्म है और पूर्व तथा उत्तर मीमांसा एक साथ रखे जाते हैं. सांख्य दर्शन मोक्ष का दर्शन है. महर्षि कपिल इसके रचियता हैं. सांख्य का अर्थ है सम+आख्य, ठीक से अपने विचारों को रखना ही सांख्य है. इसे सम्यक ख्यान या विवेक ख्याति भी कहते हैं. आज सुबह भी योग-प्राणायाम करते समय आचार्य सत्यजित को सुना. इस समय साढ़े ग्यारह बजे हैं, सुबह का काम समाप्त हो गया है, नैनी सफाई करके गयी और रसोइया भोजन बनाकर चला गया है. नन्हा दफ्तर चला गया है.

आज वे दुबारा अस्पताल गये, डाक्टर ने कहा, प्लास्टर दुबारा लगाना होगा. दस दिन बाद फिर बुलाया है. सुबह नींद देर से खुली, कल रात नन्हे को देर से आना था, मन में कहीं पीछे विचार चल रहा था कि अभी तक आया या नहीं, सो गहरी नींद नहीं आ रही थी. सुबह छत पर सूर्योदय देखने गये, बहुत सुंदर दृश्य था. रक्तिम शोख रंग का सूर्य एक लाल गेंद की तरह लग रहा था. वापस आकर प्राणायाम किया, नाश्ते में वेजरोल बनाये. लंच में इडली, सांबर व चटनी. अभी-अभी असम में नैनी से बात की, वहाँ सब ठीक है.

नव प्रातः नव दिवस उगा
शुभ रूप धरे नव गगन सजा

मौसम सुहाना है. आज सुबह भी उगते हुए बाल सूर्य की तस्वीरें उतारीं और फेसबुक पर पोस्ट कीं. छत पर हवा ठंडी थी और स्वच्छ भी, सोचा, कल से प्राणायाम वहीं करेगी. मीनाक्षी मन्दिर के बाहर बैठी मालिन से बेला के फूलों की माला खरीदी, तो लाल गुलाब के फूल उसने अपने आप ही दे दिए. कल सेक्रेटरी का फोन आया, उसे हिंदी का आलेख भेजा, उसे PPT के लिए तस्वीरें भेजने को कहा. उम्मीद तो है कि अगले महीने के दूसरे सप्ताह में वे घर पहुंच जायेंगे. उसके तत्काल बाद ही क्लब का वार्षिक कार्यक्रम है, वह शामिल हो पायेगी. भविष्य ही बतायेगा क्या होने वाला है.

उसने गुरूजी को एक पत्र लिखा, उन बीसियों पत्रों की तरह जो कभी प्रेषित नहीं किये गये, क्योंकि लिखते ही भीतर शांति के रूप में उनका जवाब उसे सदा ही मिलता रहा है. उसके पास बहुत समय है पर इस समय को व अपने भीतर की ऊर्जा को सार्थक रूप देने की सामर्थ्य नहीं है. भीतर एक मौन है, जिसमें से कुछ भी नहीं छलकता. यह मौन इतना पवित्र है और इतना अचल कि अति प्रयास करके भी इसे तोड़ा नहीं जा सकता. यह वहीमौन है जिसकी चाहना उसने की थी. भीतर कोई कामना नहीं है, कोई दुःख नहीं, कोई उद्वेग नहीं और शायद साहित्य रचने के लिए यही सब चाहिए. इसीलिए अब न तो कविता बनती है न ही कविता रचने के लिए भीतर प्रेरणा ही उदित होती है. उसे अपने समय का और कोई उपयोग आता भी तो नहीं. उसने गुरूजी से राह दिखाने को कहा.

बिछड़ गयी है कविता या

छोड़ दिया है शब्दों का खजाना
नदी के उस तट पर
मंझदार ही मंझदार है अब
दूसरा तट कहीं नजर नहीं आता
एक अंतहीन फैलाव है और सन्नाटा
किन्तु डूबना होगा सागर की अतल गहराई में
जहाँ मोती-माणिक भी हैं और शैवाल भी
अभी ऊर्जा शेष है जिसे ढालना है सौन्दर्य और भावना में
वक्त के इस विराम को वरदान में बदलना है
जीवन की इस सौगात को
यूँही नहीं लुटाना है
अभी हाथों में कलम है
और दिल में शुभ भावना है 




Saturday, April 22, 2017

जीवन और मृत्यु

दिसम्बर का तीसरा सप्ताह और वर्षा होने के आसार...ठंड बढ़ाने का पूरा सरंजाम प्रकृति ने कर दिया है. आज सविता देव नहीं दिख रहे हैं, सूर्य विकास की प्रेरणा देता है, अपनी ओर बुलाता है. परमात्मा भी उन्हें अपनी ओर खींचता है, प्रेरणा देता है. वह उन्हें खुद सा बनाना चाहता है पर प्रयास उन्हें करना होगा. हाथ उठाना होगा, वह तो हाथ थामने को तैयार ही है. बादलों के कारण टीवी पर प्रसारण भी अटक रहा है. क्रिसमस और देव दीवाली पर उसे कविता व आलेख लिखने हैं. सभी को आभार के छोटे छोटे संदेश लिखने हैं जिनसे यात्रा वे मिले हैं. नये वर्ष के लिए नई कविता भी..जालोनी क्लब की पत्रिका के लिए भी, पर जाते-जाते यह वर्ष कैसी दुखद घटना से सारे देश को हिला गया है. सुबह उठकर समाचारों में जब उस वीभत्स घटना के बारे में सुना तो मन कैसा भारी हो गया था. कुछ शब्द अपने आप ही निकल पड़े.

नारी की पूजा करने वाला
यह देश..
आज शर्मसार है !
जैसे चढ़ाया गया हो
किसी को
क्रूस पर
व्यर्थ न जाये
उसका भी बलिदान
मांग रही है इंसाफ
जिसके लहू की एक-एक बूंद

कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. नन्हा नृत्य कर रहा है. दोनों पैरों को बहुत तेजी से तरंगित कर रहा है और अंत में नटराज की सुंदर मुद्रा में खड़ा हो जाता है, मंत्रमुग्ध करने वाला अद्भुत रूप था उसका..और भी कई स्वप्न देखे पर यही याद है. दीदी ने एक शुभ समाचार दिया, छोटी भांजी की पुनः मंगनी हो गयी और अब वह आस्ट्रेलिया में रहेगी अपने मंगेतर के साथ, जो स्वयं भी तलाकशुदा है. दोनों के जीवन में पुनः प्रेम का फूल खिलेगा.

दामिनी की अंततः मृत्यु हो गयी. सोलह दिसम्बर की रात से वह मौत से लड़ रही थी, जिन्दगी हार गयी, मौत जीत गयी, शायद उसका बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक रास्ता बना जाये. सरकार को जागना ही होगा आये दिन होने वाली ये घटनाएँ अब अनदेखी नहीं की जा सकतीं. महिलाओं को आतंक के वातावरण में जीने के लिए अब विवश नहीं किया जा सकता, उन्हें वस्तु की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. नारी के व्यक्तित्त्व को पनपने का मौका मिलेगा तो वह भी सबल बनेगी. अख़बार में महिलाओं के उत्पीड़न के समाचार पढ़कर मन कितना बेचैन हो जाता है.

कैसे कहें नये वर्ष की शुभकामनायें
जबकि सामने बिछी है जाते हुए वर्ष की
खून से लथपथ देह
पिछले वर्ष भी तो यही कहा था
पर नहीं रुका आतंक नहीं थमा मौत का तूफान
लील गया निर्दोष स्कूली बच्चों को
कभी राजधानी की सड़कों पर
अस्मत मासूमों की
इतना बेरहम हो गया है इन्सान
लाठियों, जुलूसों और विद्रोह की भाषा
बोलनी पड़ती है अपनों के खिलाफ..

नहीं तो कैसे मांगे इंसाफ और किससे ..?

Sunday, October 9, 2016

जाप साहिब का पाठ


सूर्य की किरणें इस डायरी को छू रही हैं और उसके भीतर भी भर रही हैं ऊष्मा, ताप और सृजन करने की क्षमता ! इस क्षण और आज सुबह से हर क्षण अपनी अनंत क्षमता का अहसास उसे अनुप्राणित किये हुए है, उनके भीतर अपार सम्भावनाएं हैं. उनमें से हरेक ब्रह्म का अधिकारी है, तृप्त है, आनन्द से भरा है और अपने भीतर का प्रेम व शांति इस जगत के लिए बाँट सकता है. दोनों हाथों से उलीचे तो भी खत्म न हो इतना वह अपने भीतर भरे है ! आज वर्षों पूर्व लिखी एक कविता हिन्दयुग्म में भेजी. सुबह उठी तो एक स्वप्न चल रहा था, जागते ही तिरोहित हो गया. ऐसे ही तो जीवन में आने वाली हर परिस्थिति एक स्वप्न ही है, जागकर देखें तो एक खेल ही लगता है सब कुछ. परसों मृणाल ज्योति में बीहू का उत्सव है, जून और उसे बुलाया है. सूर्य धीरे-धीरे अस्ताचल को जा रहा है, शाम के सत्संग की तयारी उसने कर ली है. एक फोन की उसे प्रतीक्षा थी, नहीं आया, एक बच्ची का फोन, हिंदी का कक्षा कार्य करने में उसे सहायता चाहिए थी. परसों एक संबंधी का जन्मदिन है, फेसबुक ने याद दिलाया, उसने एक कविता लिखी. आज उसने गुरु माँ द्वारा ‘गुरू गोविन्द सिंह जी’ के प्रकाशपर्व पर जाप साहिब का पहला भाग सुना. उन्होंने कहा ‘मानव मन यदि समाधि का अनुभव कर ले तो भी उसके भीतर अदृश्य इच्छाएं रहती हैं, जो समाज के हित में लगने के लिए प्रेरित करती हैं. सारी कामनाओं का त्याग कर ऋषि जंगल में जाता है पर पूर्ण सत्य का साक्षात्कार कर पुनः समाज में लौटता है. समाज को कुछ देने के लिए, ऊर्जा तो उसके भीतर पहले की तरह ही है बल्कि कहीं ज्यादा’. उससे भी परमात्मा कुछ कराए इसके लिए वह तैयार है. उसकी शक्ति व्यर्थ न जाये, उसकी श्वासें इस जगत के लिए हों. उसने सद्गुरु से प्रार्थना की, जो सदा ही उसकी प्रार्थना का उत्तर देते आये थे, उसके पास जो कुछ भी, उस पर सबका अधिकार हो..प्रकृति जिस तरह लुटाती है, संत जिस तरह लुटाता है, उसके अंतर का प्रेम भी सहज ही प्रवाहित होता रहे !    

आज सुबह समाधि के लिए मन को पंच क्लेशों से मुक्त करने की बात सुनी. अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष व अभिनिवेष ये पांच क्लेश उनके मन को पंचवृत्तियों में भटकाते रहते हैं. पंच वृत्तियाँ (अनुमान, आगम, प्रत्यक्ष), स्वप्न, निद्रा, निरुद्द्ध और एकाग्र ! इस क्षण उसका मन समाहित है, फोन आ गया सो ध्यान से उठना पड़ा. कल लोहड़ी है. तैयारियां हो रही हैं. उत्सव उनके एकरस जीवन में नया रंग भरते हैं. शाम को वे आग जलाएंगे और स्वयं तथा मेहमानों के लिए खिचड़ी, आलू, खट्टी-मीठी चटनी बनायेंगे. जून ढेर सारा सामान जो अहमदाबाद से लाये थे, वह भी रहेगा तथा गाजर का हलवा. वही लेकर वह मृणाल ज्योति भी जाएगी. दीदी, तथा छोटी बहन भी अपने-अपने घरों में यह उत्सव मना रहे हैं. मकर संक्रांति पर लिखी कविता भी उसने सभी को भेजी.

आज कितने सुंदर शब्द सुने –
केसर, कस्तूरी, पुष्प और स्वर्ण सभी को भाते हैं, वैसे ही संतों की ज्योति भी सभी को भाती है.
घी और रेशमी वस्त्र सभी को भाते हैं, भक्त भी सभी को प्रिय होते हैं.
मन प्याला है और परमात्मा के नाम का रस उसमें भरा है.
मृत देह की चषक बनी ज्यों मृत मन का बनता प्याला !

तन में रंग लगा माया का, प्रेम का रंग चढ़े फिर क्योंकर ?
चेतनता आरूढ़ जीव पर, जीव चढ़ा अहंकार पर.
अहंकार है बुद्धि ऊपर, बुद्धि मन पर रही विराजे.
मन चलता है प्राण रथों पर, प्राण इंद्रियरूपी रथ पर.
इन्द्रियां देह पर करें सवारी, देह भूतों से बनी हुई है.

कभी गगन में चमके दिनकर, कभी घोर अँधेरा छाता.
कभी धुआं, कोहरा धुंधलका, कभी चमकती बिजली पल-पल.
रिमझिम बादल बरसा करते, कभी बर्फ के पत्थर पड़ते.
तरह-तरह के शब्द गरजते किन्तु नभ ज्यों का त्यों रहता.
बाढ़ की विभिषका आये, भूचाल भूमि थर्राए.
कितनी उथल-पुथल हो जाये पर वह निर्विकार सदा सम.

ऐसे ही उस परम सत्ता में कुछ भी अंतर आ नहीं सकता.


Thursday, October 1, 2015

ऊर्जा की लहर


भारत-दक्षिण अफ्रीका का मैच हो रहा है, भारतीय टीम पिट रही है. उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि उसे शक्ति प्रदान करें, वह खेलें तो सही भले ही जीत न पायें. आज वे रोज गार्डन गये, सुंदर गुलाब खिले थे, उनके बगीचे में भी खिले हैं. छोटे भाई का फोन आया परिवार में सब सामान्य है.

आज नवम्बर का अंतिम दिन है. पिछले दिनों नियमित नहीं लिख पायी. लिखे, ऐसा विचार भी नहीं आया. जिस लक्ष्य के लिए लिखना आरम्भ किया था ऐसा लगता है कि कुछ हद तक उसे पा लिया  है, तभी शिथिलता आ गयी थी, लेकिन अपने आपको वे जानकार भी कहाँ जान पाते हैं, वे वास्तव में जो हैं उसे हर क्षण स्मृति में नहीं रख पाते. जब एक क्षण के लिए भी उसकी विस्मृति नहीं होगी तभी वे समझेंगे कि लक्ष्य पा लिया है, तब तक सचेत रहना होगा, निरंतर सजग रहना होगा. इस समय दोपहर के एक बजे हैं, उसका पेट भरा-भरा सा लग रहा है और दांत में हल्का सा दर्द है, देह की हर छोटी-बड़ी संवेदना की तरफ तो ध्यान जाता है पर मन में उठने वाला विकार तब पकड़ में आता है जब देह में कुछ अनुभव होता है. कोई गलत काम होने पर शरीर जैसे जलने लगता है. ऐसा सदा ही होता आया होगा, पर पहले वह अचेत थी. उसने विचार किया कि इस क्षण किसी को कुछ देना शेष तो नहीं रह गया है. तीन दिसम्बर को विश्व विकलांग दिवस है, जाना है तथा आज शाम को सत्संग में जाना है. कल जून ने कहा कि वह उसके बालों को काला रंग कर देंगे, उसके सौन्दर्य की चिंता उससे अधिक उन्हें है. कल शाम भी पिछले दो-तीन दिनों की तरह टीवी पर गुरूजी का कोल्लम से आ रहा सत्संग देखा, वह कन्नड़ में बोल रहे थे या मलयालम में समझ में नहीं आया. जनवरी में वे एडवांस कोर्स करने जायेंगे, फरवरी में शायद कुम्भ मेला देखने जाएँ.

मनोरंजन पर आत्म रंजन का, भोग पर योग का, राग पर विराग का तथा अज्ञान पर ज्ञान का अंकुश लगना चाहिए. अभी कुछ देर पूर्व ही लगा कि अंकुश कुछ ढीला पड़ा, एक क्षण के लिए, किन्तु उतनी ही देर जितनी देर एक लहर पानी में उठे और गिरे ! इस वक्त दोपहर के साढ़े तीन होने को हैं. वह कल सुबह की तैयारी कर रही है. कल सुबह बच्चों को पार्क में बुलाकर उन्हें कुछ सिखाना है, उनसे कुछ सीखना है, प्राणायाम करते हुए बच्चे बहुत अच्छे लगते हैं, वे सहज ही सब सीख जाते हैं. कल वह उन्हें एक कहानी भी सुनाने वाली है. आज सुबह शुद्धात्मा देखने का एक अवसर मिला और भीतर कैसा सुकून ..वे आत्मा के स्तर पर आपस में जुड़े ही हैं, इस बात को जब एक बार अनुभव के स्तर पर जान लेते हैं तो सदा के लिए शांति की एक कुंजी हाथ लग जाती है. आज सुबह ध्यान में ऊर्जा का अनुभव हुआ, कल एक वृद्धा का अजीब सा चेहरा दिखा था, कुछ झलक सी थी. उनके अवचेतन में न जाने कितने जन्मों के संस्कार दबे पड़े हैं, जो हर वक्त विचारों के रूप में मन में चक्कर लगाते हैं. विचार जिनकी गिरफ्त से बचना ही साधना है. वे जब किसी न किसी उद्देश्य पूर्ण कार्य में लगे रहते हैं तो भीतर एक ऊर्जा स्वयं ही निर्मित होती रहती है और जब जीवन में कोई ध्येय नहीं होता तो वह ऊर्जा जैसे मंद पड़ जाती है, उसकी आंच कमजोर हो जाती है. लिखने से उसके भीतर एक ऊर्जा का जन्म होता है. ‘लिखना’ बस लिखने के लिए लिखना हो तो !

आज इस क्षण वह बिलकुल अपने सामने है, कहीं कोई दुराव नहीं, जैसी वह है बिलकुल वैसी. इस क्षण उसके भीतर कोई कामना शेष नहीं है, सो भीतर शांति है, कुछ पाना भी नहीं है तो कुछ खोने का भी डर नहीं है. जीवन जैसा है वैसा ही स्वीकार रही है. तन स्वस्थ है, मन समाहित है, हृदय सारी सृष्टि के लिए शुभकामना से भरा है. जीवन एक लय में आगे बढ़ रहा है. इस जगत में जो श्रेष्ठ है वह भीतर पहले से ही है. वह सहज प्राप्य है तो वे और क्या अभिलाषा करें. इस संसार में जो सर्वश्रेष्ठ है वह है प्रेम और वह प्रेम उसके भीतर उदित हुआ है, आत्मा के लिए, परमात्मा के लिए, सद्गुरु के लिए, ज्ञान के लिए तथा सारे जहाँ के लिए. जब प्रेम होता है तो वह सबके लिए होता है, वह कोई भेद नहीं देखता, वह महत्वाकांक्षी भी नहीं होता, वह मृदुल जल के प्रवाह की तरह विनीत होता है, सभी को तृप्त करता है. वह सूर्य की किरणों की तरह सबको प्रकाशित करता है. इस जीवन में उसे जो सहयात्री मिले हैं सभी के लिए ढेरों शुभकामनायें हैं. सभी अपनी-अपनी तरह से अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने में रत हैं. परसों नन्हा आ रहा है उसकी दिनचर्या कुछ बदल जाएगी, घर में कुछ दिन चहल-पहल होगी और कुछ नई बातें होंगी. इसी तरह साल दर साल गुजरते जायंगे और एक दिन मृत्यु उनके सामने खड़ी होगी, वे उसकी आँखों में आँखें डाल कर पूछेंगे, कहो, कहाँ ले जाने आई हो ? इस जीवन को तो पूरा-पूरा जी लिया और किस रूप को दिखाने आई हो ? मृत्यु की बाँह पकड़ कर वे नई यात्रा पर निशंक होकर चल देंगे. जिसको कुछ देना-पावना नहीं मृत्यु तो उसके लिए खेल है !      




Thursday, January 15, 2015

बदली में सूरज


हृदय में आध्यात्मिक क्रांति का उदय हो इसके लिए जीवन में साधना, सेवा, सत्संग व स्वाध्याय, चारों का होना अति आवश्यक है. उसके जीवन में तीन बातें तो हैं पर चौथे अंग ‘सेवा’ का कोई स्थान नहीं है. उसे घर में रहकर ही सेवा का पालन करना चाहिए. ज्यादा सचेत रहकर अपने कर्त्तव्य का पालन करना होगा. गोविन्द तभी उसका अभिन्न मित्र होगा. कृष्ण उसे एक पल के लिए भी स्वयं को भूलने नहीं देंगे. कृष्ण अपना वरद  हस्त उसके ऊपर सदा ही रखे हुए हैं, उसे ही उनकी कृपा को ग्रहण करने का सामर्थ्य अपने भीतर जगाना है. वर्तमान में रहने की कला सीखनी हो तो ‘मन्त्र जाप’ से बढ़कर कोई उपाय नहीं. इस तरह श्वास भी नियमित रहती है. ऋषि-मुनियों ने कितने सुंदर उपाय बताये हैं, यदि वे उन पर चलें तो ईश्वर उसी क्षण उन्हें प्राप्त हो सकते हैं, बल्कि वे तो कहते हैं  ईश्वर पहले से ही प्राप्त हैं, उन्हें सचेत होना है उसकी उपस्थिति के प्रति, उसके सान्निध्य में कोई विषाद नहीं रहता. सारी आवश्यकताएं अपने-आप पूर्ण होने लगती हैं. मन के भीतर सुमिरन चलता रहे तो अद्भुत शांति का प्रादुर्भाव होता है, अधर मुस्काते हैं, ऑंखें उसके रूप को देखती हैं. उसकी कविताओं में जो कामनाएं उसने व्यक्त की थीं, वे सारी की सारी सद्गुरु को भेजकर कृष्ण ने पूरी कर दी हैं. अब उसका कर्तव्य यही है कि इस मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़े, क्योंकि यही ऐसा मार्ग है जहाँ आकर सारे मार्ग मिलते हैं. जो परम सत्य तक उन्हें ले जायेगा, जहाँ जाना और जाने के लिए परिश्रम करना मानव मात्र का कर्त्तव्य है, जहाँ जाने के लिए पाथेय है हृदय में असीम प्रेम, इतना प्रेम जो पोर-पोर से छलकता हो, जो उच्चता के प्रतीक उस ईश्वर के लिए हो !

जब वे धर्म के नियमों का पालन करते हैं तब प्रकृति उनका साथ देती है जब उसके प्रतिकूल चलते हैं तब प्रकृति विपरीत हो जाती है. धर्म क्या है इसका ज्ञान शास्त्र, सत्संग तथा अंतर में स्थित परमात्मा के चिन्तन से मिलता है. यह बिलकुल स्पष्ट है उतना ही जितना हथेली पर रखा आंवले का फल ! कृष्ण गीता में उसी धर्म की चर्चा करते हैं. परमेश्वर असीम हैं, उनका अनुग्रह अनंत है, दया अनंत है, उनकी स्मृति में जितना समय गुजरे वही सार्थक है. जब जीवन का हर क्षण उसके प्रति कृतज्ञता में बीते तो उसकी कृपा का अनुभव भी हर समय होगा, और धीरे-धीरे मन ख़ाली होता जायेगा, खाली मन में ही भक्ति का प्रकाश उदित हो सकता है. ईश्वर ही अपना ज्ञान दे सकते हैं तो पहले उसकी निकटता का अनुभव करना होगा, उसके शरणागत होना होगा. भजन, साधना से मन इतर से खाली होता है और उसकी ओर खिंचता है. एक वही है जो अनंत हृदय को भर सकता है, मन भी निस्सीम है. संसार की नश्वर वस्तुएं उसे तृप्त नहीं कर सकतीं, वह असीम से ही भरा जा सकता है ! आज सुबह उन्हें उठने में देर हुई, नन्हा आज स्कूल नहीं गया, सूर्य देवता बादलों के पीछे छिपे हैं, पूरे भारत में सर्दियां अपनी चरम सीमा पर हैं. यहाँ उत्तर भारत की अपेक्षा मौसम सुहावना है. अज जून उसका लेख व कविताएँ छपने के लिए दे देंगे. नया वर्ष आने में दो हफ्ते भी शेष नहीं, उन्हें एक बार पुनः घर की विशेष सफाई करनी है, नये वर्ष के स्वागत में इतना तो उनका कर्त्तव्य बनता ही है.






Tuesday, March 11, 2014

कागजी अखरोट


टीवी पर काश्मीर से सम्बन्धित एक धारावाहिक ने बाँध लिया है, काश्मीर में जब यूरोपियन और अमेरिकी पर्यटकों को बंधक बनाया गया था, उसी घटना का कथात्मक चित्रण किया गया है, लोगों की परेशानी, आर्मी व पुलिस की कार्यवाही, पत्रकारों और टीवी चैनल की नई कहानी पाने की इच्छा, सभी का वर्णन अच्छा है. अपह्रत व्यापारी की पत्नी का दुःख, ड्यूटी पर जाते हुए पुलिस अधिकारी की पत्नी का उससे कागजी अखरोट और केसर लाने की फरमाइश करना. असमिया समाचारों ने बचा लिया वरना उसका सारा कार्य वहीं का वहीं रह जाता और टीवी के सामने से हटने का मन नहीं करता. कल शाम वे टहल कर लौटे तो दो मित्र परिवार मिलने आये, तब महसूस हुआ, आजकल घर की साज-सज्जा पर उसका ध्यान थोड़ा कम है, अब जून के बाहर जाने के बाद पूरी सफाई करेगी. सुबह-सुबह बड़े भाई से बात हुई, माँ-पापा अभी तक डॉक्टर के पास नहीं गये हैं, ईश्वर की मर्जी मानकर वे अपनी अपनी समस्या को ख़ुशी ख़ुशी सह रहे हैं. इन्सान का मन कितने भुलावों की रचना कर लेता है. स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए आसपास कितनी ही दीवारों की रचना कर लेता है. शायद वृद्धावस्था में वह भी ऐसी ही हठी हो जाये. आज सुबह Frankenstein दुबारा पढ़नी शुरू की, बहुत रोचक पुस्तक है.
कल शाम नन्हा थका हुआ लग रहा था, आज सुबह उठा तो उसे उसका बदन गर्म लगा पर शायद यह उसका वहम हो क्योंकि वह ठीक महसूस कर रहा था. आज से उसे एक घंटा खेलने के लिए जाने को कहा है, पिछले चार-पांच दिनों से मित्रों से बिलकुल दूर हो गया है. आज  मौसम गर्म है, पंखा सुहावना लग रहा है. उसने भरवां आलू-बैगन बनाये हैं, जो माँ ने बचपन की एक गर्मी की शुरुआती शाम को बनाये थे. जब गर्मियां शुरू होती थीं तो उनकी रसोई बाहर आ जाती थी. वे भी क्या दिन थे ! कल शाम जून और वह दूर तक घूमने गये, अगले आठ दिन उसे अकेले ही टहलना होगा शाम को अपने ही घर में.  सुबह उसने सोचा जून के तैयार होने तक घर पर फोन कर लेगी, पर पता नहीं ध्यान कहाँ था, शायद अपने को गर्व के पर्दे के पीछे छिपा लिया था, लोकल फोन पर एसटीडी नम्बर मिला रही थी. सारा घमंड पानी-पानी हो गया जब जून ने उसे ऐसा करने से रोका. हर पल स्वयं पर नजर रखनी बेहद जरूरी है नहीं तो उसे भटकने में देर नहीं लगती. कल रात उनके बेडरूम के रोशनदान में एक साथ सैकड़ों काले चींटे आ गये, जून ने पहले एक चींटे को मारा  तो नूना ने उसे मना किया पर कुछ ही देर में उन्हें उन सभी को मारना या बेहोश करना पड़ा. अभी भी इक्का-दुक्का कमरे में घूम रहे हैं, उनके लिये तो कयामत का दिन कल ही था.
अभी आठ ही बजे हैं पर सूरज आकाश में ऊंचा चढ़ आया है. आज सुबह जून ने उसे कालिमा में उगता हुआ लाल सूरज दिखाया, अनुपम था वह दृश्य ! उसे लगा जैसे नेहरू की काली अचकन पर  लाल गुलाब सा उषा का सूर्य और गाँधी के मौनव्रत सी शांत सुबह ! वे दोनों चले गये, उसने घर संभाला और भगवद् गीता का एक अध्याय पढ़ा, कुछ देर ध्यान किया और अब लिखने बैठी है. ध्यान करने बैठी थी तो मन में उपन्यास के पात्र घूमने लगे, कभी भोजन में क्या बनाना है आदि पर इस समय मन एकदम खाली है. जून शाम को दिल्ली पहुंचकर फोन करेंगे. नन्हा खेलने गया है, उसे गणित पढ़ाते समय बहुत अच्छा लगा, जल्दी समझ जाता है, उसने मन ही मन अपने अध्यापकों को धन्यवाद किया जिन्होंने उसे पढ़ाया था. अरुंधती राय की वह किताब आज समाप्त हो गयी, उसकी भाषा कितनी अलग है, आज वह उसे लाइब्रेरी में जाकर वापस कर देगी ताकि कोई और पढ़ सके. जून जाते-जाते भी उनके लिए सब्जियां और काजू देकर गये, कितना ध्यान है उन्हें परिवार का और कितना स्नेह !  





Wednesday, December 4, 2013

सेवेन समर्स- मुल्क राज आनन्द


पल में बदली पल में सूरज
पल-पल मौसम रूप बदलता
हवा उड़ा ले जाती बादल
आंचल ज्यों माथे से सरकता

सूर्य रश्मियाँ प्राण फूँकती
मेघा नमी पवन को देता  
हवा बिखेरे मादक सौरभ
धरती भर देती मोहकता

खिड़की से झांकता बसंत
महक उठे हैं दिग दिगंत
ज्यों करवट ली कलियों ने
फूलों ने ली अंगडाई
कोंपल कोंपल में हरीतिमा
नव पल्लव धर मुस्काई

कल महीनों बाद मन में कविता उगी, बसंत के आगमन से कोई दिल अछूता रह भी कैसे सकता है, गेट पर खड़ा वह श्वेत फूलों से भरा वृक्ष इतना सुंदर दखता है. हवा में आम के बौर की खट्टी-मीठी खुशबू, सब कुछ इतना मोहक हो जाता है इस मौसम में और इसी मौसम में तो आता है रंगों का त्योहार होली ! वे इस बार होली पर जयपुर में होंगे. आज नन्हा समय पर तैयार हो गया था, उसका भी काम हो गया है, अभी दस ही बजे हैं, एक बार सोचा किसी सखी से फोन पर बात कर ले, पर अगले ही पल रुक गयी, क्या बात करेगी, सिवाय हाल-चाल पूछने के, यूँ मौसम पर भी बात हो सकती है और कुछ अन्य भी, पर उसे लगता है दिन भर में वे गम्भीर बातें मुश्किल से पांच प्रतिशत ही करते होंगे, ज्यादातर इधर-उधर की बातें ही तो करते हैं, तो क्यों न फोन पर एक सार्थक, थोड़ा गम्भीर किस्म का वार्तालाप किया जय, लेकिन विषय क्या हो? आज पड़ोसिन से थोड़ी देर बागवानी पर बात की, फूलों और पौधों पर, उसने सोचा अगले हफ्ते उनकी यात्रा से पहले के अंतिम पत्र लिखेगी, बहुत महीनों से बल्कि वर्षों से छोटी बुआ का कोई पत्र नहीं आया है, वापस आकर उन्हें भी लिखेगी. मौसम आज भी भीगा-भीगा है, आकाश पर सलेटी रंग के बादल एकसार फैले हैं, सूरज का कोई अता-पता नहीं है.

मुल्कराज आनन्द की बचपन की यादें रोचक हैं, seven summers कल से पढ़ना शुरू किया है, कई ऐसे शब्द हैं जिनके अर्थ उसे नहीं पता, लेकिन डिक्शनरी खोल कर पढ़ने से वह आनन्द कहाँ जो बिना रुके पढ़े जाने में है. अपने बचपन की कई यादें मन में कौंध गयीं. बस्ती में बड़ी बहन की सहेली शैला के साथ गुड़ की चाय बनाना, नल में उसके दायें हाथ की अंगुली कटना, मकान मालिक के लड़के का अपनी सांवली बहन की गुड़िया पेड़ पर टांग देना, उनके यहाँ भोजन करने जाना, उस दाल-चावल की खुशबू आज तक उसे नहीं भूली. मकान मालिक के लडके की खिलौनों से सजी आलमारी, पेड़ के नीचे चारपाई पर लेट कर आंवले खाना और मकान मालकिन की बेटियों, गौरी व मुन्नी की मोटी-मोटी चोटियाँ, बड़ा सा बगीचा, मंझले भाई का पांच रूपये का नोट लेकर चना मुरमुरा खरीदने आना, उसे नंगा बाबा कहकर चिढ़ाया जाना और तेज वर्षा में छोटे भाई का बादलों से आना, रोने पर भूत और हौआ से डराया जाना. घोड़े के मुख वाले भिखारी का भीख मांगने आना, ऐसी न जाने कितनी और छोटी-छोटी यादें होंगी जो मन के किसी कोने में पिछले इतने बरसों से दबी पड़ी होंगी. शाहजहाँपुर की यादें और स्कूल की यादें, उसे भी इन यादों को कहानी की शक्ल में ढालने का काम करना चाहिए. बचपन की उस रात को बिल्लियों की आवाजें, भूत के पैरों की छम छम, अमराई में लोगों को उलटे पैरों वाली डायन का दिखना, कितनी अजीब और रोचक यादें हैं न !     






Thursday, May 10, 2012

बेल्जियम फिश


अप्रैल की अंतिम सुबह कितनी ठंडी है. वर्षा बदस्तूर जारी है. रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण ‘सर्वोत्तम’ में उन्होंने साथ-साथ एक लेख पढ़ा, ‘बॉब ग्रीन’ का लिखा हुआ- मेरी बेटी का पहला साल, लेखक ने अपने अनुभवों का कितना मोहक व सजीव चित्रण किया है कि पढ़ते-पढ़ते वे भी अपने भविष्य के सपनों में खो गए. एक किताब ‘The Voyage out’ जो पिछले चार-पांच दिनों से वह पढ़ रही थी, समाप्त हो गई, नायिका rechel का दुखद अंत हुआ, शायद वह विवाह और बच्चों के लिये नहीं बनी थी, वह कुछ और ढूँढ रही थी. नायक के प्रति वह सहानुभूति नहीं जगा पायी. टीवी पर उन्होंने ‘सत्यजित रे’ द्वारा निर्देशित एक नाटक देखा सुखांत, जो बहुत अच्छा था
आज मई दिवस है. एक हफ्ते की वर्षा के बाद आज सूर्य भगवान ने दर्शन दिए हैं. सुबह आँखें खोलीं तो धूप जैसे उनमें भरती जा रही थी. पूरा कमरा रोशनी से खिला हुआ था. पर दो घंटे बाद ही कितना अँधेरा हो गया, बादल घिर आये, यहाँ का मौसम पल-पल मिजाज बदलता है. टीवी पहले से बेहतर हुआ लगता है, चित्र हार देखा और आशा भोंसले का साक्षात्कार भी, जो उन्हें बहुत अच्छा लगा. आज शाम क्लब में पेट्रोलियम मिनिस्टर का सम्बोधन है जून वहाँ जायेगा और नूना अपनी मित्र के पास, वह भी उसी की तरह पहली बार माँ बनने वाली है. उनके सुख और परेशानियाँ एक सी हैं. उसी ने कार्ड्स का एक नया खेल सिखाया था “बेल्जियम फिश”. 
अब वह सुबह जल्दी उठकर टहलती है या शाम को धुंधलका होने के बाद. दिन में बाहर निकलना उसे अच्छा नहीं लगता, कुछ लोग देखने लगते हैं. वजन बहुत बढ़ गया है, सभी कपड़े टाइट हो गए हैं. उन दोनों को दो महीने बाद की उस घटना का इंतजार है जो उनके जीने के ढंग को काफी हद तक प्रभावित कर सकती है. उनके नन्हें मेहमान का आना.
उस दिन इतनी मेहनत से बूस्टर लगाया था, पर उसमें कुछ खराबी आ गयी है अब फिर घंटो की मेहनत और कुछ लोगों के सहयोग से उसे उतारना होगा. कल उन्होंने दोनों घरों पर पत्र लिखे जो पोस्ट करने के लिये जून को देना वह भूल गयी है. आजकल वह अकेले ही लाइब्रेरी जाता है उसके लिये एक साथ चार किताबें लाया है. इतवार होने के कारण कल दोपहर का खाना उसने ही बनाया सिंधी पुलाव व भरवां भिन्डी की सब्जी. शाम को जब वह घर पर नहीं था नूना ने उसका एक पुराना पत्र पढ़ा, कितनी यादें सजीव हो गयीं. वे एक दूसरे का पर्याय बन गए है, एक-दूसरे के बिना अस्तित्त्व की कल्पना करना भी असह्य है, वह चाहती है कि जून और आगे बढ़े, परिश्रमी, और हिम्मती बने, अपने कार्य में कुशलतम बने और पढ़े, सारी जिंदगी उसके सामने पड़ी है, और यही उम्र है जब कितना भी उड़ेंलते जाओ मन से उत्साह कम नहीं होता.

   

Tuesday, May 31, 2011

साथ-साथ


पिछले तीन दिन तक उसने डायरी नहीं लिखी, शनिवार और इतवार को तो वे हर पल साथ होते है ऐसे किसी काम के लिये वक्त निकाल पाना मुश्किल है जिसे दोनों एक साथ न कर सकते हों. शनिवार को वे दूर तक घूमने गये, बहुत अच्छा लगा पर यदि वह अपने परिवार जनों के साथ होती तो कुछ दूर तक कच्ची सड़क पर भी जरूर जाती. कितने दिन हो गए हैं मुक्त भाव से खुली हवा में घूमे हुए, वह शामें जब वह बड़े से मैदान में अस्त होते हुए सूर्य व बादलों के बदलते हुए रंगों को देखा करती थी. पूजा की छुट्टियों में जब वे घर जायेंगे तब शायद वह कुछ देर के लिये वहाँ जा सके. परसों उससे एक कप टूट गया और वह जो पहले से ही उदास थी और उदास हो गयी, पर ऐसे वक्त उसने नूना को संभाला, उसको सचमुच कई बार सम्भालना पड़ता है, कई बार तो समझ ही नहीं आता वह इतना धैर्य कहाँ से लाता है.

जब नूना एक पुस्तक पढ़ रही थी कि लिखने का ख्याल आया, यह पुस्तक एक आत्मकथा है world within world . कुछ देर पूर्व वह आया था, सिर्फ यह बताने कि आज  घर आने में थोड़ी देर हो जायेगी, यद्यपि कहा यही कि वह उसे हॉस्पिटल ले जाने भी आया था. उसे चिंता थी कि देर हो जाने पर नूना को प्रतीक्षा करनी पड़ेगी. पिछले इतवार उसने पहली बार टेबिल टेनिस खेला और इस शहर में पहली हिंदी फिल्म साथ-साथ देखी. कल की शाम उसने रुबिक क्यूब को बनाने के प्रयत्न में बितायी. वे मित्रों की तरह रहते हैं पर अब वह सोचती है, उन्हें सिर्फ अपने बारे में सोचना छोड़ कर औरों के बारे में और बातों के बारे में भी सोचना चाहिए.
 क्रमशः