Showing posts with label अस्तित्त्व. Show all posts
Showing posts with label अस्तित्त्व. Show all posts

Friday, October 2, 2020

वृक्षारोपण

 

रात्रि के नौ बजने को हैं. जून होते तो कहते, अब दिन को विदा करो, लेट्स कॉल इट आ डे. वह पोर्ट ब्लेयर में हैं, रॉस आईलैंड देख लिया, सेलुलर जेल भी. कल कोलकाता आ जायेंगे और परसों घर. शाम को वह पुस्तकालय गयी और दो किताबें लायी, एक मध्यकालीन इतिहास पर और दूसरी जीन(डीएनए) पर. दोनों का कुछ अंश पढ़ा. वापसी में गुलाबी फूलों वाले पेड़ की तस्वीर खींची. जिसके यहाँ चम्पा का पेड़ है उस सखी के यहाँ भी गयी, उसने बताया, यहाँ जो सफाई करने आता है, उसे भूलने की बीमारी है, उसे अपना नाम भी याद नहीं है. चीजें रखकर भूल जाता है, एक ही काम को दोबारा करने लगता है, पर वे लोग उसकी शिकायत करने को तैयार नहीं हैं, करुणावश ही सम्भवतः। सखी ने बताया उसके ससुर जी को भी यही बीमारी थी और पिता को भी है. जीवन में कब क्या होगा, कौन जानता है ? सुबह मृणाल ज्योति के लिए कुछ सामान ख़रीदा और एक शिक्षिका को देने गयी, कई महीनों से जिसका गला खराब चल रहा था, आज कुछ ठीक था. उसकी बिटिया का जन्मदिन आने वाला है, उसकी तैयारी में व्यस्त थी, बेहद ऊर्जावान,  रचनात्मक कार्यों में लगी रहती है. घर लौटी तो नैनी अपने बेटे को डांट रही थी, पता चला उसके बेटे ने गेट पर लगाने वाला ताला गैरेज पाइप में डाल दिया है जिसे निकालने का कोई उपाय नहीं है.


जब वे अपने मन के अंधकार में भटकते हैं तो स्वयं की अनुभूति रूपी प्रकाश की किरण आते ही सारा अंधकार खो जाता है. आज सुबह टहलने गयी तो गुलमोहर, अमलतास और अज़ार के फूलों से लड़े वृक्ष पुनः देखे. हजारों फूल जाने कहाँ से आते हैं अपने मौसम में अपने आप ही, कोई अज्ञात ऊर्जा जैसे उनके रूप में प्रकट हो रही हो. दोपहर को बच्चे आये थे आज, पर्यावरण दिवस पर उन्होंने सुंदर चित्र भी बनाये. अंडमान की सुंदरता को निहार कर जून कोलकाता आ गए हैं. माली ने बगीचे में कई जगह फूलों की पौध लगाई, लॉन में मशीन से घास भी एक समान की. क्लब की वर्तमान प्रेसिडेंट से बात की उसने बताया भूतपूर्व प्रेसिडेंट अभी तक उसे फोन करके क्लब की बातों के बारे में पूछती रहती हैं. उसे लगा जीवन कल्पनाओं के जाल में व्यर्थ ही उलझ रहता है. जब तक उनका मन दर्पण तुल्य हो, वे कोई प्रतिक्रिया न करें , ऐसा मन यदि नहीं है तो वे व्यर्थ ही जगत में फंस जाते हैं. 


जून वापस आ गए हैं, विभाग में उनकी पदोन्नति हो गयी है. सभी की बधाइयाँ और फोन आ रहे हैं. शाम को वह क्लब की दो सदस्याओं के साथ वृक्ष लगाने के लिए उचित स्थान देखने गयी. एक जगह एक ऐसा पार्क मिला जिसे बनाना तो आरम्भ किया गया था पर बीच में ही छोड़ दिया गया. वहीं रहने वाले एक व्यक्ति ने बताया, ठेकेदार बीच में ही भाग गया था.  विश्व पर्यावरण दिवस पर क्लब की तरफ से वृक्षारोपण कार्यक्रम के अंतर्गत कल सुबह नौ बजे जाकर गड्ढे खुदवाने हैं और शाम को पेड़ लगाने हैं. दोपहर को मृणाल ज्योति के काम से एक बैंक जाना था, गर्मी बहुत थी और लोगों की भीड़ लगी थी. सुबह एक अनोखा अनुभव हुआ, एक कविता लिखी उसी भाव दशा में ! 


पर्यावरण दिवस पर सुबह से शाम तक वह व्यस्त रही. तीन माली लगाकर पार्क का गेट व सामने का थोड़ा सा भाग उन्होंने साफ करवाया. दस-पन्द्रह गड्ढे खुदवाये. जब तक यह काम चलता रहा क्लब की एक सदस्या के साथ विभिन्न विषयों पर सार्थक वार्तालाप हुआ वह समाज के लिए कुछ करना चाहती है. शाम को उसमें  फूलों और शरीफे के वृक्षों की पौध लगाई. पार्क के अंदर बोगेन्विलिया के  कुछ पौधे भी लगाए. उसके पूर्व वे बच्चों के स्कूल में भी वृक्षारोपण कर के आये थे, पीले व नारंगी रंग के गुड़हल के पौधे वहां लगाए. कुछ वर्षों में जब ये पौधे वृक्ष बन जायेंगे तो वातावरण को प्रफ्फुलित करेंगे. शाम को घर लौटी तो योग कक्षा चल रही थी, अब साधिकाएं इतनी सक्षम हो गयी हैं कि अपने आप ही सभी अभ्यास कर लेती हैं. जून ने रात के भोजन की तैयारी भी कर दी थी. 


वर्षों पूर्व डायरी में उस दिन के पन्ने पर ऊपर लिखी सूक्ति कन्फ्यूशियस की थी - ‘चिंतन के बिना अध्ययन मेहनत खोना है’. उसे लगा इसका अर्थ हुआ अब तक का उसका जो भी अध्ययन है वह व्यर्थ है, अर्थात उसका कालेज का अध्ययन यानि गणित, क्योंकि वह केवल परीक्षा देने के लिए पढ़ती है। उसके बाद कोई उपयोग उसके सम्मुख नहीं रह जाता कि उसका चिंतन भी करे. कैसा विरोधाभास है, यही विरोधाभास तो हर पल उसके जीवन में दिखाई पड़ता है और अब तो उसे इससे स्नेह भी हो गया है. यह भी एक तरह का विरोधाभास ही हुआ. एक पत्र पाकर उसे लगा जैसे कोई भार उतर गया हो. उसका खोया चैन उसे वापस मिल गया. जैसे अस्तित्त्व उसे एक नए रूप में मिला हो, पहले से ज्यादा प्रसन्न, ज्यादा उत्साह से भरा और उसके प्रति अनूठी भावनाएं लिए ! वह जो निष्क्रिय हो गयी थी फिर भर गयी हो प्राण से, स्पंदन से, जीवन से ! उसकी चिर ऋणी वह उसे ही चाहती है. उस अनन्त आभामय सुबह के स्वर्णिम काल का अभिनन्दन करते हुए  उसने कृतज्ञता पूर्वक प्रणाम किया.   


Wednesday, March 27, 2019

नीरज की कविता




सुबह चार बजे वे उठे. वर्षा होकर थम चुकी थी सो प्रातः भ्रमण में कोई बाधा नहीं पड़ी. सड़कें धुलकर स्वच्छ हो गयी थीं और वृक्ष नींद से जैसे जग रहे थे. लौटकर प्राणायाम करते समय आयुर्वेद पर कुछ विचार सुने. मानव की हितायु होनी चाहिए, मात्र सुखायु नहीं, अहितायु तथा दुखायु तो कदापि नहीं. परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण हो तभी यह घटित होती है. जब वे अपनी अल्प बुद्धि से अपने जीवन को चलाते हैं तो दुःख के भागी होते हैं. जब प्रकृति के नियमों के अनुसार चलाते हैं तो जीवन धारा सहज रूप से बहती है. अस्तित्त्व के साथ एक होकर जीने का अनुभव कितना अलग होता है हर दिन. आज पहली बार किसी ने भीतर से कहा, वह विदेह है, आज से पूर्व न जाने कितनी बार ये शब्द दोहराएंगे होंगे, पर इनका वास्तविक अर्थ आज घटा लगता है. असम्प्रज्ञात समाधि भी एक दिन तो घटेगी ही ! आज नरेंद्र मोदी एप पर आज की सरकार को रेटिंग दी, अच्छा लगा, इस तरह सरकार और जनता के मध्य एक संवाद चलता है. सरकार के इरादे नेक हैं, यह तो उसकी चाल-ढाल से प्रतीत होता है. दो दिन पहले किसी उल्फा उग्रवादी ने तेल की पाइप में बम लगाया, खुद भी मारा गया, हजारों लीटर तेल व्यर्थ बह गया, आदमी की मूर्खता की कोई सीमा नहीं है.

आज क्लब में कविता पाठ प्रतियोगिता है. ‘गोपाल दास नीरज’ की कविता, ‘जब याद किसी की आती है’, उसने ही चुनकर दी थी. उसने भी याद कर ली है, प्रतियोगिता में भाग नहीं लेगी पर अवसर मिला तो सुना सकती है. मौसम अच्छा है. बांग्लादेश में आये ‘मोरा’ तूफान का असर उत्तर-पूर्व पर पड़ना ही था, वैसे उतना ज्यादा भी नहीं पड़ा है. परसों सुबह मंझले भाई से बात हुई, फिर भाभी से भी. भतीजी के साथ जो भी घटा, वह उन्होंने बताया, अब अलग होने के सिवा कोई रास्ता नहीं है. वह दो हफ्ते पूर्व घर वापस आ गयी है. परसों व कल भी दिन भर मस्तिष्क में वही बात याद आती रही. कल शाम को छोटी बहन से बात हुई. जीवन को उनके ही कर्म सुंदर या असुन्दर बनाते हैं. वे ही अनजाने में अपने दुर्भाग्य के निर्माता होते हैं, पर जानते नहीं कि इस दुश्चक्र से बाहर कैसे निकलें. कल जन्मदिन अच्छा रहा, फेसबुक तथा व्हाट्सएप पर ढेरों शुभकामनायें मिलीं. काव्यालय की संचालिका का मेल आया, वह उसकी एक कविता प्रकाशित करना चाहती हैं. दीदी अगले हफ्ते विदेश से वापस आ रही हैं, वहाँ ठंड बढ़ गयी है. परसों उनका जन्मदिन है, केक की जगह वह तरबूज काटती हैं जन्मदिन पर. छोटे भाई ने जून से कहा है, चाची जी के मकान के लिए कुछ मदद आजकल में भेज दें.

जून का प्रथम दिन ! रिमझिम झड़ी लगी है. आज पहली बार उसने रसगुल्ले की सब्जी बनायी. मृणाल ज्योति की पानी की समस्या के बारे में जानने के लिए जून भी आज उसके साथ जाने वाले हैं. उनसे जितना बन सके, समाज की सहायता करनी है. सद्गुरू सेवा पर इतना जोर क्यों देते हैं, अब समझ में आने लगा है. भीतर की शुद्धि तभी हो सकती है जब उनका मन सेवाभाव से युक्त हो. आज दिन भर पढ़ने का समय नहीं निकल पायी. ढेर सारी किताबें हैं आजकल पढ़ने के लिए, लाइब्रेरी की किताबें, उसके जन्मदिन पर नन्हे की भेजी किताबें. उसे नई पुस्तकों को सही प्रकार से रखने के लिए एक उचित स्थान की भी आवश्यकता है. जून आजकल ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ देखते हैं.

आज बहुत दिनों बाद कम्प्यूटर पर कुछ लिखने का मन नहीं हुआ, किताब पढ़ती रही. पानी लगातार बरस रहा है. कल रात स्वप्न में देखा, वह एक छत पर जाती है. लाल और हरे फूलों वाली ड्रेस पहनी है. एक सखी मिलती है, कहती है, वही सुबह वाले वस्त्र पहने हैं, तो वह कहती है, नहीं, सुबह तो श्वेत कुरते पर गुलाबी फूल थे, फिर वह और ऊपर जाती है. बड़ा सा प्लेटफार्म है. उस पर ध्यान करने बैठती है, पर वह चारों तरफ टकराता है बरी-बारी से, फिर नींद खुल जाती है. पिछले दिनों नियमित ध्यान में नहीं बैठी शायद इसीलिए यह स्वप्न आया हो. इस समय मन शांत है, भीतर एक तृप्ति का अहसास भी है. कुछ पाने की लालसा ही मन को अशांत करती है. आज मंझले भाई-भाभी पिताजी से मिलने घर गये हैं, ईश्वर उन्हें भी सद्बुद्धि व शांति प्रदान करे.

Wednesday, February 28, 2018

योग का योगदान



अक्तूबर आरम्भ हुए चार दिन हो गये, आज पहली बार डायरी खोली है. योग की दो कक्षाएं हो चुकी हैं. तीसरी सम्भवतः परसों सुबह होगी. कल शाम शायद क्लब में पार्टी है, सो हॉल नहीं मिलेगा, ऐसा संयोजिका ने कहा, इस ‘शायद’ का अर्थ वही जानती है. गुरूजी कहते हैं, इस दुनिया में हर तरह के लोग होते हैं, सच्चे, कच्चे व..ज्ञानी सभी को साक्षी भाव से देखता है, व मस्त रहता है. सामाजिक क्षेत्र में कदम रखने पर इन सबका सामना तो करना ही होगा. बच्चों को योग सिखाना कितना सहज है, कितने मासूम होते हैं वे ! आज सुबह स्कूल में सिखाते वक्त तितली के रूप में अस्तित्त्व फिर आया, वह तो यूँ भी हर क्षण, हर पल साथ ही है. उसके ही नहीं, सबके साथ, वे सजग रहें तो उसका अनुभव सहज ही होता है. असजग होते ही भीतर स्वप्न चलने लगता है, ऊर्जा व्यर्थ चली जाती है. कुछ भी हाथ नहीं आता. वह परमात्मा अकारण ही दयालु है. प्रेम उसका स्वभाव है, शांति उसका वस्त्र है, ज्ञान और शक्ति के रूप में वह परिपूर्ण है. सुख और पवित्रता उसके भीतर रचे-बसे हैं. वह पतितपावन है. उसमें रहकर वे भी पवित्र हो जाते हैं. जीवन कितना अनमोल है यदि उसका साथ हो, अन्यथा एक बोझ..ईश्वर उन सभी को सद्बुद्धि दे जो उससे विमुख हैं और दुखपूर्ण हैं..ग्यारह बजने को हैं, कुछ देर में जून आने वाले हैं, उनका जीवन भी समृद्धि की ओर जा रहा है. उन्हें तरक्की मिली है. कुछ ही  दिनों में एसी कार भी मिल जाएगी.

कल दिन भर व्यस्तता रही. शाम को क्लब गयी. आज भी दो मीटिंग्स हैं. पहली मृणाल ज्योति में विश्व विकलांग दिवस के लिए और दूसरी महिला क्लब की. आज सुबह योग कक्षा में दो महिलाएं ही  उपस्थित थीं. कल व परसों उन्हें घर पर आने को ही कहा है. मन कैसी शांति का अनुभव कर रहा है, किसी को कुछ देने के बाद मन कैसा तृप्त हो जाता है. परमात्मा ही बंटता है जैसे..ऊर्जा ही तो बंटती है. आज योगनिद्रा का अभ्यास कराया, यकीनन उन्हें अच्छा लगा होगा. कुछ देर पहले असमिया सखी से बात की, आवाज से लगा वह काफी परेशान है. स्वास्थ्य ठीक न रहे तो व्यक्ति का जीवन एक भार बन जाता है, लेकिन उन्हें अपने जीवन को सुंदर बनाने का प्रयत्न प्रतिपल करना है. ईश्वर का अनुग्रह तो बरस ही रहा है.  
कल की दोनों मीटिंग्स अच्छी रहीं और अच्छा रहा आज का योग अभ्यास भी. आज चार लोग आये थे. सुबह उठी तो गला कुछ खराब लग रहा था. कल शाम को तली हुई कुछ वस्तुएं खायीं, फिर वापस आकर ठंडा पानी पिया, शायद इसी कारण. उपाय आरम्भ कर दिये हैं. तीर टोपी ही लेकर जायेगा, गर्दन नहीं. आज एकादशी है, भोजन भी हल्का रहेगा. कल क्लब में ‘सेल’ है, सुबह नौ बजे ही उन्हें जाना है. आज संध्या भी तैयारी हेतु जाना होगा. विश्व विकलांग दिवस पर एक लेख लिखना है, जो एक बुलेटिन में छपेगा, जिसका भार उसे सौंपा गया है. बुलेटिन में अन्य लेखों के लिए आग्रह पत्र भी लिखकर भेजने हैं. जब कोई किसी काम को करने में सक्षम  होता है, तभी अस्तित्त्व उसे उस काम के लिए चुनता है.

कल का आयोजन भी हो गया. उसने भी काफी कुछ खरीदारी की. अब दिसम्बर में उन्हें पुनः एक सेल आयोजित करनी है. आज सप्ताहांत है, सुबह घर की साप्ताहिक विशेष सफाई भी हुई और तन की भी, मन की तो हर क्षण  होती है, जब चाहा अमनी भाव में चले गये, वही उसकी सफाई है. अब परमात्मा और संसार दो नहीं रह गये हैं, एक ही है सब. जून विशेष साप्ताहिक खरीदारी करने बाजार गये हैं. नैनी की छोटी बिटिया का जन्मदिन है, उसके लिए उपहार भी लायेंगे. मृणाल ज्योति की मीटिंग कल होगी, इतवार को वह व्यस्त रहती है, एक व्यस्तता और सही. जिसे स्वयं के लिए कुछ नहीं चाहिए उसका सारा समय संसार के लिए या भगवान के लिए. एक सखी के परिवार के किसी सदस्य ने एक बंगाली लघु फिल्म बनाई है, अच्छी लगी. बताया गया है, परिवार में संस्कार कैसे एक पीढ़ी से दूसरी में जाते हैं. उसके भीतर जो ऊर्जा थी वही नन्हे को मिली है, साहसी है वह भी और उसे भी अपनी ऊर्जा को सकारात्मक बनाना होगा, समय ही सिखाएगा उसे ! महिला क्लब की प्रेसीडेंट का विदाई दिन भी नजदीक आ रहा है, उनसे मिलकर कुछ जानकारी लेनी है. वह एक बेबाक, खरी-खरी सुना देने वाली महिला हैं. रोबदार बुलंद आवाज है उनकी, अपने रुतबे का लाभ उठाती हैं और मस्त रहती हैं !



Friday, December 15, 2017

अतीत का गौरव


दोपहर के तीन बजने को हैं. आज सुबह उठी थी पौने चार बजे, पर जून कल शाम थके थे, सोचा उन्हें थोड़ी देर सोने दे, पाँच मिनट में उठती है, पर नींद खुली पूरे एक घंटे बाद. दो स्वप्न देखे, एक में तो घर में चोर आ जाते हैं. ड्रेसिंग टेबल का शीशा तथा दो चादरें गायब हैं, फिर कुछ लोग भी दीखते हैं, एक चोर भी है उनमें. खुद का ही सपना है सो चोर के मुँह से ऐसे वाक्य निकलते हैं कि उनके द्वारा उसकी चोरी पकड़ ली जाये. एक स्वप्न में गुरू माँ के आश्रम में गयी है. वहाँ कुछ महिलायें हैं, फिर एक दुर्घटना देखी. एक कार उलट जाती है साईकिल से टकरा कर. अपना ही सपना था सो किसी को चोट नहीं आती. जब सपना खुद ही बनाया है तो सकारात्मक ही होना चाहिए. इसी बात से सिद्ध होता है कि God loves fun. उनकी आत्मा, जहाँ से ये स्वप्न आते हैं, कितनी हास्य पसंद है. वह उन्हें जगाना भी चाहती है, झकझोर भी देती है पर डराती भी नहीं. वे कितनी गहरी नींद में हैं कि उस वक्त जान नहीं पाते, यह तो स्वप्न ही है. अभी दोपहर को भी एक स्वप्न देखा. यह भी उठाने के लिए ही था. ओशो कहते हैं योगी स्वप्न नहीं देखता, वह विचारों से भी मुक्त है. व्यर्थ का चिन्तन न हो तो न ही व्यर्थ के स्वप्न आएंगे, न ही व्यर्थ की ऊर्जा समाप्त होगी. रात्रि सोने तक छह घंटे उसके पास हैं, इस समय का सदुपयोग हो सके ऐसा प्रयत्न करना होगा. दो घंटे पढ़ने-लिखने में, एक भोजन बनाने-ग्रहण करने में, एक व्यायाम-टहलने में तथा एक टीवी व ‘भारत एक खोज’ देखने में. सभी कुछ करते हुए मन सदा ही उस ‘एक’ से जुड़ा रहे, इसका भी ध्यान रखना है.

शाम के छह बजे हैं, लग रहा है भीतर से कोई देख रहा है प्रतिपल. कितनी शांति है उसके पास और कितना विश्वास.. एक आश्रय स्थल सा अथवा माँ की गोद सा, लगता है मन घर आ गया है. मन पाए विश्राम जहाँ, वही तो है वह स्थल, उसे अस्तित्त्व कहें या परमात्मा, वह दोनों ही है, वह सभी कुछ है. सभी कुछ उसी से जो प्रकट है. आज सुबह समय से उठे वे, टहलने गये, वर्षा रात भर होकर थम चुकी थी, फिर स्नान आदि करके नाश्ता. जून ने दोपहर को विशेष व्यंजन बनाया. बड़े भाई से बात हुई, वह काफी खुश हैं, छोटा उनके साथ रह रहा है. उनके जीवन में एक परिवर्तन आया है. मंझले भाई-भाभी दुबई गये हैं. पिताजी व दोनों ननदों से भी बात हुई. दोपहर को बच्चों की संडे कक्षा, अभी सांध्य भ्रमण करके वे लौटे हैं.

आज शाम को क्लब में ‘पीकू’ है, वे जायेंगे देखने. सुबह की साधना में एक अद्भुत अनुभव हुआ. वह ‘एक’ उससे मिलने आया था. कल सुबह स्कूल गयी, गर्मी थी पर बच्चों ने ख़ुशी-ख़ुशी योगासन किये. उसके बाद उन्हीं शोकग्रस्त परिचिता के यहाँ गयी, उसके भाई से भी मिली और जेठानी से भी. उसका पुत्र भी था और बाद में उसने कहा, आते रहिये. उसके वृद्ध पिता से बात हुई. वह तीस साल पहले रिटायर हुए थे. जीवन के प्रति कितना उत्साह है उनमें अब भी. अटल जी को जानते थे, असम के पहले गवर्नर को भी. आजादी से पहले की बातें कर रहे थे. सुचेता कृपलानी और अरुणा आसफ अली की बातें. आर एस एस को मानते हैं. चेहरे पर एक चमक है और अतीत का बखान बहुत चाव से करते हैं. शिलांग में काम किया फिर वहीं बस गये. शिलांग के सिन्धी जनों से भी परिचय है और पार्टीशन की बातें भी करते हैं. अपने दामाद को याद करते समय सामान्य रहे, स्वीकार कर लिया है उसकी मृत्यु को जैसे सहजता से. एक दिन फिर जाएगी वहाँ. कल चोल वंश के राजा राज राजेश्वर की कहानी देखी ‘भारत एक खोज’ में. कैसा विचित्र युग रहा होगा तब, जब मन्दिरों का निर्माण राजाओं का एक महत्वपूर्ण कार्य था.


Thursday, September 28, 2017

भारत एक खोज


जीवन कितना अनोखा है, तितलियों और पुष्पों के रंगों सा अनोखा, आकाश के विस्तार सा और सागर की गहराई सा..इसका हर पल एक नये विश्वास से भरा है. आज की सुबह एक नया संदेश लेकर आई लगती है. कल रात्रि भगवद् गीता का अठारहवां अध्याय पढ़ा. अनोखी पुस्तक है गीता अर्थात ग्रन्थ है, भगवान की वाणी है और इस युग में भी आज के समय में भी भगवान की वाणी मौजूद है सद्गुरू के रूप में. आज नैनी को एक काम न करने पर याद दिलाया तो आवाज में हल्का सा रोष था, जो बाद में स्वयं को ही चुभने लगा. आत्मा जो हिमशिखरों सी शुद्ध है, गंगाजल से भी पावन है, जरा सा धुआं भी नहीं सह सकती, और वे अज्ञानवश उस पर कितने कुठाराघात करते रहते हैं. कुम्हला जाती होगी आत्मा, पर अब और नहीं, भीतर-बाहर की पूर्ण शुद्धि करनी है. धी, स्मृति और धृति को मजबूत करना है. परमात्मा की कृपा हर क्षण उसके ऊपर है, आज भी स्कूल में एक तितलीनुमा कीट उड़ते-उड़ते उसके पास आया, मानो अस्तित्त्व उसे आश्वस्त करना चाहता है. उसका प्रेम अहैतुक है. उसे उसका मान रखना चाहिए. जीवन सत्य की साक्षी दे, उसका हर पल परम की खुशबू से ओत-प्रोत रहे, जीवन की सार्थकता इसी में है. शाम को नियमित ध्यान करना होगा, समय का सदुपयोग यदि सेवा में नहीं हो पा रहा है तो ध्यान में ही होना चाहिए. अभी भी भीतर कई संस्कार हैं जिन्हें ध्यान में दूर होना है.

कल से उन्होंने ‘भारत एक खोज’ के अंक देखने आरम्भ किये हैं. जून के एक सहकर्मी ने इसके सभी एपिसोड दिए हैं. वर्षों पहले देखी यह श्रृंखला बहुत अच्छी लगी थी उस समय. आज दोपहर छोटी भांजी से स्काईप पर बात की, विपासना के बारे में उसे बात करके अच्छा लगा. शाम को जून के एक सहकर्मी व उनकी पत्नी आए, उन्हें भोजन के लिए कहा, पर वे देर से खाते हैं, दोनों सब्जियां टिफिन में पैक कर उन्हें दीं, साथ ही केन का बना वह बैग भी जो शिलांग से उनके लिए खरीदा था. नन्हे का फोन आया, वह काफी उत्साहित है. उसके यहाँ हैकाथन चल रहा है, एक सौ बीस लोग हैं जो रात भर जागकर कोई नयी प्रोग्रामिंग करेंगे.

सुबह के सात्विक वातवरण में परमात्मा की निकटता का अहसास कितना स्पष्ट होता है, यूँ तो वह हर वक्त ही निकट है. आज स्कूल गयी तो बादल छाये थे, पर बरसे दोपहर को जाकर. शाम को गुलाब वाटिका के निकट भ्रमण पथ पर टहलने गये तो हवा में फूलों की सुवास छायी थी. दीदी से बात हुई, वे लोग आस्ट्रेलिया से अगले महीने भारत लौटेंगे. व्हाट्सएप पर रुमाली रोटी बनाने का एक वीडियो देखा, कमाल का हुनर है.

पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. शनिवार को दिन भर मेघ बरसते रहे और इतवार को तेज धूप निकली. जैसे बाहर का मौसम बदलता है वैसे ही भीतर का मौसम भी बदला करता है, वे न जाने कितनी बार गर्म होते हैं न और कितनी बार ठंडे. उनका दिल समता में नहीं रह पाता. आज सुबह उठी तो चार बजे थे, कोई समझा रहा था, ‘अहम् को गलाओ’. जून कितना ध्यान रखते हैं, दफ्तर से फोन करके दवा लेने के लिए याद दिलाया और उसने उन्हें उलाहना दिया. अहंकार ही तो है यह, फिर दो बर्र दिखाई दिए. उसे कुछ जताने के लिए अस्तित्त्व जैसे उनका रूप धर कर आया था. कितना जीवंत है वह, हर घड़ी, हर पल वह है, यहीं है, साथ है उनके. आज सुबह स्कूल से लौटते समय छोटी बहन व छोटे भाई से बात की. बड़ी भाभी अस्पताल से घर आ रही हैं, दो दिन रहकर वापस जाएँगी. उसके अगले दिन उनका आपरेशन होगा. कल जून से उसने कहा, उन्हें जाना चाहिए. वह भी तैयार हैं. सम्भवतः अगले सप्ताह वे जायेंगे. 

Tuesday, June 13, 2017

समाजवाद का स्वप्न


आज सुबह ठीक चार बजने में एक मिनट पर घंटी की आवाज सुनाई दी, सिर्फ एक बार कॉल बेल बजी हो जैसे, आँख खुल गयी, जानती थी, ‘वही’ जगाने आया है, इस समय और कौन आ सकता है, सीधे समय देखा, जानते हुए कि समय होगा ३:५९, तत्काल अलार्म बजा. अस्तित्त्व कितने तरीकों से उन्हें सन्मार्ग पर ले जाने आता है. वह उनके कितना निकट है, कितना अपना. फिर भी वे उसे सदा ही चूक जाते हैं. पहले वह सोचती थी, कृष्ण जब छोटे थे, इतने चमत्कार करते थे, फिर भी यशोदा उनके लिए इतनी भयभीत क्यों रहती थी, पर अब समझ में आता है. उसके साथ न जाने कितने चमत्कार घट चुके हैं पर कुछ दिनों के बाद सब भुला दिये जाते हैं. इस समय दोपहर का वक्त है, एक विद्यार्थी पढ़ने आया है, उसे लिखने का कुछ कार्य दिया है. नैनी की बच्चियां भी आकर नीचे बैठ गयी हैं, पर कब तक चुपचाप बैठेंगी. बच्चे एक जगह स्थिर होकर कुछ मिनट भी नहीं बैठ सकते, उनमें ऊर्जा जो होती है. दोपहर का भोजन करके जब कुछ पल विश्राम करने गयी तो भीतर तरंगे ही तरंगे महसूस हुईं, कितनी जल्दी-जल्दी कुछ उदय होता था फिर अस्त होता था.

कल गणेश पूजा थी, वे तिनसुकिया गये थे, पूजा के लिए सामान खरीदा, अर्थात पूजा में देने के लिए उपहार आदि.. इसी माह के अंत में उन्हें यात्रा पर निकलना है. कल से वह समाज विज्ञान की वह पुस्तक पढ़ रही है जो बरसों पहले कालेज में खरीदी थी, जब मन कम्यूनिस्ट विचार धारा की ओर झुका होता है. मानव समाज का निर्माण किन तत्वों के आधार पर होता है और क्या उसे सुंदर बनता है, इन सबका वर्णन है इसमें. समाजवाद का स्वप्न जिन्होंने देखा था, उन्होंने सब कुछ बाहर से सुधारना चाहा था, पर जब तक मानव का मन नहीं बदलेगा, तब तक सारे सुधार ऊपर से थोपे हुए होंगे और वे देर तक चलेंगे नहीं.


दस बजने को हैं. कल रात दस बजे सोयी, सुबह चार बजे उठी तो लगा जैसे अभी-अभी तो सोयी थी. कोई आनंदित करने वाला स्वप्न चल रहा था, जिसमें अच्छे-अच्छे व्यंजन थे. फिर एक घंटा साधना, किसी उपस्थिति का अनुभव हुआ, शब्द से निशब्द की ओर, निशब्द से आनंद की ओर जाने का नाम ही ध्यान है. बाहर निकली तो बादल बरसने को तैयार थे, लॉन में वर्षा में भीगते हुए ही स्नान किया. आज के ध्यान में भीतर से यह प्रेरणा भी हुई कि उसकी मृत्यु छिहत्तरवर्ष की अवस्था में होगी. यहाँ से जाने के बाद बंगलूरू आश्रम से उसका संबंध रहेगा अंतिम समय तक. उसने स्वप्न में स्वयं को वहाँ काम करते हुए भी देखा.

परमात्मा से उसकी मैत्री दृढ हो गयी है, अब सारी आंख-मिचौली भी खत्म हो गयी है. उससे मिलने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता. वे दोनों एक ही देश के निवासी हैं, यह तय हो गया है. वैसे भी वही स्वयं को उससे प्रकट होने के लिए कुछ कर रहा था, वह जो थी पहले उससे इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती, खैर ! देर आयद दुरस्त आयद ! आज के दिन यह शुभ घड़ी आई है, एक यात्रा जो सत्रह वर्ष पूर्व शुरू हुई थी, आज पूर्णता की ओर अग्रसर है. आज वह क्लब की कुछ सदस्याओं के साथ एक गाँव में गयी, निःशुल्क मेडिकल कैम्प लगाया था, उसने बच्चों को योग सिखाया, कितनी अच्छी तरह कर रहे थे वे बच्चे. बाद में बीहू नृत्य भी किया. उन बच्चों में भी उसे उसी के दर्शन हो रहे थे. जून बैंगलोर गये हैं, उनमें भी वही है, उसके सिवा कुछ है ही नहीं ! नन्हे ने कल किसी प्रतियोगिता में भाग लिया था, रात भर सोया नहीं, अगले दिन भी कम के कारण एक मिनट के लिए भी नहीं लेटा, शायद इसी लिए कल रात एक स्वप्न में देखा, नन्हा छोटा सा है, शिशु से थोड़ा बड़ा, गोरा-चिट्टा, हल्के से वस्त्र पहने वह दौड़ रहा है, और तेज दौड़ता है, फिर गिर जाता है, घुटने छिल जाते हैं.

Thursday, February 25, 2016

संस्कारों के बीज


फिर एक अन्तराल ! नये वर्ष का चौथा महीना बीतने को है, कितने ही पल हाथ से गुजरते जा रहे हैं, कुछ खट्टे कुछ मीठे, वह साक्षी है उन सभी की. सभी के प्रति सम्मान का भाव सदा मन में रहता है पर कभी-कभी वाणी कठोर हो जाती है, पूर्व के संस्कार कभी-कभी प्रकट हो जाते हैं. उनकी भावनाएं चाहे शुद्ध हों पर कर्म जब तक उनकी साक्षी नहीं देते तब तक वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते. आज सुबह इतने वर्षों में पहली बार स्वीपर को भी उसके क्रोध का प्रसाद मिला. चाहे उनके क्रोध करने का कारण कितना भी सही क्यों न हो पर क्रोध सदा करने वाले को तथा जिस पर किया गया हो उसे, दोनों को जलाता है, क्योंकि क्रोध में वे द्वैत का शिकार होते हैं. क्रोध क्षणिक पागलपन ही है, वही बात जो वे क्रोध में कह रहे हैं, शांत भाव से भी तो कह सकते हैं. क्रोध के बाद सिवाय पछतावे के कुछ भी हाथ नहीं आता. उसके भीतर अभी भी कितनी नकारात्मक भावनाएं भरी हैं. इतने वर्षों का ध्यान भी उन्हें मिटा नहीं पाया, बीज रूप में वे संस्कार पड़े हैं जो मौका मिलते ही पनप उठते हैं, लेकिन गुरू का ज्ञान तत्क्षण हाजिर हो जाता है और भीतर प्रतिक्रमण होने लगता है, पुनः हृदय पूर्ववत शांत हो जाता है. लेकिन जहाँ वे शब्द गये हैं वहाँ तो पीड़ा पहुँच ही चुकी है, दूसरे की गलती होने पर भी उसे पीड़ा पहुँचाने का उन्हें कोई हक नहीं बनता, उसमें उनकी ही हार है, स्वयं के लिए ही उन्हें शांत रहना सीखना होगा.


सुबह पांच बजने से पूर्व उठी, सद्विचारों को सुना. क्रिया आदि की. भीतर झाँका तो पाया सम्मान पाने की, अपने लिखे लेख पर कुछ प्रतिक्रिया सुनने की आकांक्षा भीतर बनी हुई है. उसका लिखने किसी अन्य के लिए महत्वपूर्ण क्यों हो ? किसी को क्या पड़ी है कि पहले तो वह पढ़े फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी दे. यदि वह लिखती है तो इसलिए कि उसे उसमें सुख मिलता है, बस वही उसका प्राप्य होना चाहिए. ईश्वर ने उसे यश का भागी बनाकर अहंकार से भरने के लिए तो इस संसार में नहीं भेजा है. उसके जीवन का उद्देश्य परम सत्य को पाना ही तो है, उसमें बाधक हैं यश, सुख-सुविधाएँ, अति व्यस्तता. उसका जीवन तो कितना साधारण है, यहाँ एकांत है, समय है, साधना का उपयुक्त वातावरण है. ऐसा सहज, सरल, स्वाभाविक जीवन पाकर और क्या चाहिए. आत्मस्वरूप में स्थिति बनी रहे, बोध बना रहे, किसी को उसके कारण रंचमात्र भी पीड़ा न हो, उसके मन को भी कभी कोई दुःख स्पर्श न करे. सहज हों उसके सभी कार्य, उसके सभी संबंध भी सहज हों तभी तो भीतर सत्य प्रकट होगा. उसके लिए अनुकूल वातावरण भीतर बनाना है, कोई चाह नहीं, कोई कामना नहीं, कोई आकांक्षा नहीं, बस एक प्रतीक्षा ! कब आएगा वह, और एक अटल विश्वास कि वह परम भीतर प्रकटेगा अवश्य ! वह अस्तित्त्व, वह चिन्मय तत्व जो भीतर कभी नाद तो कभी प्रकाश रूप में दिखाई देता है, वह स्पष्ट हो उठेगा, पर उसके पूर्व धो डालना होगा सारा कलुष, धो डालनी होगी सारी आतुरता, सारा द्वेष, सारी असंवेदनशीलता, भरना होगा प्रेम से भीतर का वातायन !

Monday, December 21, 2015

कहत कबीर



कबीर के जीवन में भक्ति की पराकाष्ठा है, वह अपने गुरू से, साहेब से बहुत प्रेम करते हैं. उनके जीवन में ज्ञान की पराकाष्ठा है, वह कर्म योगी भी हैं, जीवन भर चदरिया बुनने का काम करते हैं. कबीर का सारा जीवन इस त्रिवेणी को जन-जन तक पहुँचने में लगा और उसके सद्गुरू जी तो ध्यान, ज्ञान, प्रेम, सेवा, भक्ति, कर्म, कीर्तन और न जाने कितने-कितने पथों का संगम कर रहे हैं. अद्भुत है उनका जीवन. स्टेज पर फूलों की बरसात करते हुए जब वह नृत्य करते से चलते हैं, मस्ती में झूमते भजन गाते हैं, आत्मविभोर होकर स्वयं पर फूलों की वर्षा करते हैं. समाधिस्थ होकर शंकर की मुद्रा बना लेते हैं तो हजारों-हजार व्यक्ति उनके भीतर के इस प्रेम को छूकर मुग्ध हो जाते हैं.

गुलाब में नई कलियाँ आई हैं, पर उसके पूर्व उसे कटना पड़ा, सिर दिए बिना फूल कहाँ खिलते हैं, भीतर भक्ति के फूल खिलाने हों या बाहर कर्म के, भीतर ज्ञान के फूल खिलाने हों या बाहर सेवा के. उन्हें अपने अहंकार को मिटाना ही होगा, तभी जीवन में संगम उतरेगा, तीर्थ का पदार्पण होगा, अंतर्मन शांत होगा, आत्मा की खबर लायेगा, दौड़-दौड़ कर फिर बाहर सुनाएगा. कैसी अनोखी शांति से उसका मन आजकल ओतप्रोत रहता है, कुछ रिसता रहता है चुपचाप, उसे कहने का लिखने का भी मन नहीं होता, वह निस्तब्धता इतनी भली लगती है कि उसे तोड़ने की इच्छा नहीं होती. कई-कई दिन हो जाते हैं डायरी खोले. कविता भी कई दिनों से नहीं लिखी. भीतर सन्नाटा है, पर कहीं आनन्द को पीने का चाव उसे अकर्मण्य तो नहीं बना देगा. लिखना-पढ़ना भी यदि छूट जाये तो जीवन में क्या बचेगा. परसों उन्हें यात्रा पर निकलना है, तब तो समय पंख लगाकर उड़ेगा. ज्ञान की पिपासा भीतर बनी रहे, पर ज्ञान की परिणति तो मौन में ही है. वह मौन भीतर उतरा है. सद्गुरु की कृपा से. अब कुछ पाना शेष नहीं पर देने की तो अभी बारी आई है. यह सेवा का मौसम उतरा है भीतर. आज एक सखी ने अपनी सासुमाँ को उससे फोन पर शिकायत करते सुन लिया और बहुत क्रोध में आ गयी, पर नूना की शांति उसे छू गयी और उस वक्त वह शांत भी हो गयी ! ईश्वर उसे ज्ञान के पथ पर लाये !

वे ईश्वर का ध्यान तभी तो कर सकते हैं जब उसे जान लें, पहचान तो सद्गुरु ही कराते हैं और एक बार उसकी पहचान हो जाये तो वह ध्यान से उतरता नहीं है. और तब लगता है कि जिन्हें दो मान रहे थे वे दो थे ही नहीं एक ही सत्ता थी. कहीं कोई भेद नहीं. तब लगता है, जो भी सहज प्राप्य हो, हितकर हो वही धारण करने योग्य है. तब सारे संशय भीतर से दूर हो जाते हैं, अंतर्मन खाली हो जाता है. कोई आग्रह नहीं, जैसे छोटा बच्चा होता है सहज प्रेरणाओं पर जीता हुआ, अस्तित्त्व तब माँ हो जाता है, ब्रह्मांड पिता होता है, सारे वृक्ष, पर्वत, आकाश तब सखा हो जाते हैं और सारे लोग भी एक अनाम बंधन में बंधे अपने लगते हैं.