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Friday, February 10, 2023

बिजली की कार


सुबह अभी अंधेरा ही था जब वे प्रातः भ्रमण से लौट आए। योग साधना के बाद दीपक चोपड़ा का ‘चेतना’ के बारे में एक बहुत अच्छा वीडियो सुना।मुख्य विषय था कि यह जगत किस पदार्थ से बना है और चेतना क्या है ? कह रहे थे, उनके पाँच वर्ष के पोते ने उन्हें एक बार यूनिवर्स के बारे में बताया था कि वह दूसरे आयाम से बना है। आगे जे कृष्णामूर्ति का ज़िक्र किया और आइंस्टीन व टैगोर के मध्य हुए एक वार्तालाप का ज़िक्र भी किया, जब १९३० में वे दोनों मिले थे; जिसमें टैगोर कहते हैं, मनुष्य का व्यक्तित्व अनंत ब्रह्मांड को समाहित करता है। ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है जो मानव व्यक्तित्व द्वारा समाहित नहीं किया जा सकता है, और यह साबित करता है कि ब्रह्मांड का सत्य मानव का सत्य है। नाश्ता करते समय महादेव का अगला अंक देखा, कथा अत्यंत रोचक होती जा रही है। सती ने उन्हें स्वीकार कर लिया है पर महादेव ने अभी तक सती को नहीं स्वीकारा है. 

कल रात ओशो की किताब पढ़ी थी, सुबह तक उसकी सुवास शेष थी, जो एक कविता की शक्ल में प्रकट हुई.  ‘माँ’ पर  लिखी एक कविता भी आज पोस्ट की। मंझली भांजी का जन्मदिन है, कुछ पंक्तियाँ उसके लिए भी लिखीं. किसान आंदोलन पर दो वीडियो देखे, एक पक्ष में दूसरा विपक्ष में. हरियाणा व पंजाब की सरकारों को मंडी से बहुत आमदनी होती है, इसलिए वे इस बिल का विरोध कर रहे हैं, अन्य कोई राज्य यह विरोध नहीं कर रहा है. आज ‘कोना’कार वाले टेस्ट ड्राइव के लिए आये थे, सब ठीक था पर दो-तीन जगह हंप पर गाडी नीचे से टकराई. यह गाड़ी कोरिया की है, अभी वे तय नहीं कर पाए हैं कि कौन सी कार खरीदें. आज नंन्हा एक नया बोर्ड गेम लाया, ‘युद्धभूमि’, बहुत सरल है, बच्चों का कोई खेल हो जैसे. वह कई पार्ट्स जोड़कर  एक प्लेन बना रहा है, उस पर पेंट करने के लिए रंग और ब्रश मंगवाए हैं. दोपहर को वह ममेरी बहन का सामान लेकर आया, उसे स्टोर में रखवा दिया है. कोरोना के कारण कई बच्चे घर से काम करने के कारण अपने-अपने घरों को वापस जा रहे हैं. अब सम्भवतः वह अगले वर्ष के प्रारम्भ में लौटेगी. चार बजे वह बाइक से वापस गया तो रास्ते में बारिश आ गयी. कार होती तो भीगने से बच गया होता. 

रात्रि भ्रमण के लिए निकले तो देखा खेल के मैदान में बड़ा सा स्क्रीन लगाकर आई पी एल मैच दिखाया जा रहा था. कुछ लोग कृत्रिम घास पर नीचे बैठे थे, कुछ खड़े थे. उनके वृद्ध पड़ोसी भी बहुत रूचि से हर मैच देखते हैं, चाहे वह दिन या रात में किसी भी वक्त हो, क्रिकेट, फुटबॉल या टेनिस किसी का भी हो. आज सुबह से सिर में हल्का दर्द था, पर उसके कारण न तो दिनचर्या में कोई खलल पड़ा, न ही दवा लेनी पड़ी. देह से पृथकता का अनुभव होना शायद इसे ही कहते हैं. नन्हे ने उसकी सुविधा के लिए कम्प्यूटर के लिए नया मॉनिटर भेजा है. माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस सॉफ्टवेयर भी खरीद लिया है. पिता जी को कविताओं की इ- बुक ‘शब्द’ भेजी,  कहने लगे, संसार में भी थोड़ा  ध्यान लगाए. कोविड के कारण पार्लियामेंट का सेशन आठ दिन पहले ही समाप्त हो गया है. किसानों का आंदोलन जारी है. उनके सुधार के बिल तो पास हो गए हैं. श्रमिकों के लिए भी कई कानूनों में सुधार किया गया है. 

सुबह वेदांत पर चर्चा सुनी, स्वामी सर्वप्रियानंद कितनी अच्छी तरह माया, जीव व ब्रह्म के बारे में बता रहे थे. ब्रह्म ही माया के कारण जगत प्रतीत होता है; जैसे आकाश वास्तव में शून्य है पर नीला प्रतीत होता है. ध्यान की गहराई में जब ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय तीनों एक हो जाते हैं. तब जो अनुभूति होती है, वह ब्रह्म है. जब जानने वाला तो हो पर जानने को कुछ न हो, तब जो जानना होगा, वह ब्रह्म है. जो कुछ जाना जा सकता है और जो कुछ जाना नहीं जा सकता, उन दोनों के पार है वह ! आज सुबह टाटा मोटर्स का आदमी आकर चेक ले गया ई वी के लिए. पिताजी को बताया तो उन्होंने कहा भविष्य में बिजली की गाड़ियाँ ही चलेंगी, उन्होंने भविष्य को देखकर कार का चुनाव करने के लिए नन्हे व जून को  बधाई दी. 

Friday, July 3, 2020

भीगी काली सड़कें



आज सुबह भी वर्षा हो रही थी, वे छाता लेकर टहलने गए और घर के आसपास ही रहे. वर्षा और अँधेरे के कारण सड़क एकदम चमकदार व काली दिख रही थी. पांच बजे ही खम्भों पर लगी बत्तियां बुझा दी जाती हैं. सुबह का भ्रमण दिन को एक सुंदर आभा से भर जाता है. एक परिचित का फोन आया, वह मृणाल ज्योति के बच्चों के लिए एक गीत लिख रही है, अगले सप्ताह सिखाएगी. आज दोपहर वह गयी थी वहाँ, आते आते शाम हो गयी; पहले हिंदी कक्षा, फिर मीटिंग और अंत में वहाँ भी प्रेसीडेंट व उनके पतिदेव की विदाई का कार्यक्रम. सभी कुछ ठीकठाक हो गया. वापस आकर रात के लिए भोजन बनाया और फिर क्लब में मीटिंग थी, वर्किंग प्रेजिडेंट को कार्यभार सौंपा गया. वापस आयी तो जून ने कहा, कल तो कहीं नहीं जाना है ? पिछले तीन दिन से शाम को कुछ न कुछ कार्यक्रम था. कल शाम भी एक पार्टी है थैंक्सगिविंग पार्टी पर वह नहीं जाएगी. 

अभी-अभी स्कूल से आयी है, बोलने व सुनने में असमर्थ इन बच्चों को भाषा ज्ञान देना अपने आप में एक नवीन अनुभव है. उन्हें अक्षर ज्ञान हो गया है पर शब्दों का निर्माण कैसे होता है और उनका अर्थ क्या है , यही समझाना है. जब वे एक शब्द गढ़ लेते हैं तो बहुत खुश होते हैं. आज सुबह ब्लॉग पर लिखने बैठी तो स्वयं ही भीतर से विचार आते गए, परमात्मा की कृपा असीम है, वह अनंत है और उसका सान्निध्य भी अनंत है, वे ही हैं जो उससे पीठ कर लेते हैं. 

समय हो गया है, जून अभी तक लंच के लिए नहीं आये हैं, फ्राइडे मीटिंग में अक्सर देर हो जाती है. आज भी बदली छायी है, फरवरी में एक बार फिर ठंड लौट आयी है. कल रात देर तक नींद नहीं आयी, आयी भी तो कोई स्वप्न चल रहा था. सुबह उठकर भगवान को प्रणाम करने गयी तो मुख पर सहज प्रसन्नता नहीं थी, दोनों हाथों ने चेहरे को ढक लिया, यह सब जैसे घट रहा था और कोई इसे देख रहा था. पानी पीते समय बाबा रामदेव का एक वाक्य सुना और सहजता लौट आयी, वह अपने शुद्ध स्वरूप में टिकने की बात कह रहे थे. आज महीनों बाद कॉन्ट्रैक्टर उस कागज पर हस्ताक्षर करवाने आया जिस पर लिखा था घर में रंग-रोगन हुआ था. इतने दिनों तक क्या उसका पेमेंट नहीं हुआ होगा, इसीलिए ये लोग भी मजदूरों को दिहाड़ी देने में देर करते हैं. आज ध्यान में उसकी चेतना ने गुरूजी की आवाज में संदेश  दिया, जिसे अपने ही मन का खेल जानकर उसने हँसी में उड़ा दिया. मन की ताकत का अंदाज कोई नहीं लगा सकता. इस मन के पार जाकर टिके रहना वीरों का काम है. यदि चाहे तो एक दिन मन के पार जाकर उसमें टिके  रहना उसके लिए भी सहज होगा ... चाहे तो इसी क्षण भी !  

आज जून का लंच दफ्तर में है, एक कर्मचारी की विदाई पार्टी है. कुछ देर पूर्व मोदी जी को सुना. उनके बारे में पाकिस्तानी मीडिया पर भी कुछ बातें सुनीं. उनके आत्मविश्वास और देशप्रेम के जज्बे को सभी सलाम करते हैं, कभी उन्हें कट्टरवादी माना जाता था पर वे ‘सबका साथ-सबका विकास’ चाहते हैं उनका कोई और हेतु नहीं है. वह हृदय से भारत की सेवा करना चाहते हैं, क्योंकि उन्होंने जीवन का मर्म समझ लिया है. हर ज्ञानी अपने जीवन को लोकसंग्रह में लगाना चाहता है क्योंकि इसके सिवा वह कुछ और कर भी तो नहीं सकता. गुलाब खिलेगा तो सुगन्ध फैलाएगा, आत्मा जगेगी तो प्रेम फैलाएगी ! 

उस पुरानी डायरी में समय पर पत्र न आने पर उदासी भरा एक प्रलाप पढ़ा, और किसी कवि की कुछ पंक्तियाँ भी, आज उसे हँसी आ रही है, कितना ड्रामा करता रहा होगा  मन उन दिनों...हर पन्ने पर ऊपर एक सूक्ति छपी थी, उस दिन की सूक्ति थी - निष्क्रियता मनुष्य के लिए अभिशाप है - गाँधी जी. उसने लिखा  

निष्क्रिय तो उसकी कलम हो गयी है 
मन भी तो ! 
कुंद पड़ गयी मन की धार 
संवेदनाएं चूक गयीं हृदय की 
मृत हुए स्वप्न टूट गए मोती 
बिखरे पानी पानी आंसूं 
नियति यही कि मृत्यु बने अब 
जीवन अपना अपना जीवन ! 

हम भला बुरा सब भूल चुके, नतमस्तक हो मुँह मोड़ चले 
अभिशाप उठाकर होठों पर, वरदान दृगों से छोड़ चले 
अब अपना और पराया  क्या ? आबाद रहें रुकने वाले 
हम स्वयं बंधे थे और स्वयं हम अपने बन्धन छोड़ चले 

Friday, December 6, 2019

आडवाणी जी की किताब





दोपहर के तीन बजने वाले  हैं. आज मौसम गर्म है, इस मौसम का पहला गर्म दिन ! माया के अधीन होकर ही आज दीदी से फोन करते वक्त पूछ लिया कि  कविता पढ़ी या नहीं, जीजाजी ने अपने स्वभाव के अनुरूप कह दिया, वह अपनी तारीफ सुनने के लिए कविता लिखती है क्या  ? कोई प्रशंसा करे तो भीतर जिसे ख़ुशी होती है अहंकार ही तो है वह, और यही कर्म का बन्धन है. फोन पर या आमने-सामने भी, किसी से बात करते समय बहुत सजग रहना होगा, अलबत्ता तो बात उतनी ही करनी चाहिए जितनी जरूरी हो. सुबह लॉन में घास पर नंगे पैरों चली, अच्छा लगा. माली को बुलाकर कुछ काम बताये पर उसने गेट के बाहर झाड़ू लगाने के सिवाय कुछ भी नहीं किया, शायद उसे काम पर जाना था.  इसी हफ्ते उन्हें यात्रा पर निकलना है. स्कूल से आकर नन्हे व सोनू से बात की. सोनू ने रोजे का महत्व बताया. यह उपवास राजा और रंक को एक धरातल पर ले आता है. अनुशासन सिखाता है, संकल्प शक्ति को बढ़ाता है. पूरे तीस दिन उसे यह करना है, यदि किसी दिन छूट जाये तो अगले वर्ष से पहले पूरा कर लेना है. दोपहर को भोजन में उसने आलू परांठा खाया, जून के न रहने पर पूरा भोजन बनना तो बन्द हो जाता है, अक्सर वह तहरी बनाती है. आज भी पंचदशी पर व्याख्यान सुना, बहुत विस्तार से इसमें तत्वज्ञान समझाया गया है.

ग्यारह बजने वाले हैं, जून आज आने वाले हैं. स्पीकिंग ट्री के एक लेख में स्वयं के विषय में एक जानकारी मिली. कल फोन पर भी ध्यान दिलाया गया था कि सम्मान पाने की आकांक्षा यदि भीतर अभी तक है तो हृदय फूलों के साथ काँटों से भी युक्त है. अपनी चिंता पहले सताये और दूसरा बाद में रहे तो साधना फलित नहीं हुई. वर्षों पहले वाणी के दोष से पीड़ित थी तो स्वयं को समझ कितनी बार सुधारा था, अब ऐसे ही भावों को अंतिम बिंदु तक शुद्ध करना है, कर्म तभी शुद्ध होंगे. जब पूरा का पूरा परमात्मा गुरूजी ने पकड़ा दिया है तो कैसा भय और कैसी सुरक्षा .. अब तो अंतिम पड़ाव नजदीक है. सत्य वही है जो सदा एक सा है, बदलने वाला मन और बदलना वाला तन तो सत्य नहीं हो सकता, पर ये दोनों उसी के विस्तार हैं, एक चेतना ही विभिन्न नाम-रूपों में अभिव्यक्त हो रही है, उस एक पर दृष्टि हो तो सभी एक ही विस्तार प्रतीत होंगे. उस एक का अनुभव विचार से भी किया जा सकता है और समाधि में भी. उस पर टिके रहना ही एक कला है, चेतना निरन्तर गतिमय है, चैतन्य अटल है. चैतन्य में स्थित होकर इस जगत को देखना है. उनका लाभ उसी में है और यदि इसके लिए अन्य हानियाँ भी उठानी पड़ें तो कोई बात नहीं.

परसों भूटान की यात्रा पर निकलना है. आज उसके विषय में कुछ लेख पढ़े. आडवाणी जी की पुस्तक आगे पढ़ी. आजादी के समय लाखों लोग मारे गए और लाखों बेघर हुए. विश्व के इतिहास में ऐसी दर्दनाक घटना शायद ही कभी घटी हो. राम और बुद्ध के देश में गाँधी जी के अहिंसा के सन्देश के बावजूद इतना रक्तपात, सोचकर भी भय भी लगता है. बचपन में उसे एक स्वप्न बार-बार आता था कि एक कोने में घेर कर किसी व्यक्ति को भीड़ मार रही है. सँकरी गलियाँ और और सटे हुए मकानों से गुजर कर भागना भी कितनी ही बार देखा होगा. अब तो गुरूकृपा से जीवन ही एक स्वप्न लगता है, भीतर एक ऐसा ठिकाना मिल गया है, जहाँ कुछ भी नहीं घटता, जो बस है.. जो ज्ञाता है और द्रष्टा ! आज सुबह साक्षी भाव काफी देर तक बना रहा. इन्द्रियों को अपना काम करते हुए देखा, मन भी अपना करता है और बुद्धि भी. आहार के अनुसार तीनों गुण भी घटते-बढ़ते हैं, फिर देह में हल्का व भारीपन लगता है.

Sunday, February 10, 2019

वसंत पंचमी



पिछले चार दिन डायरी नहीं खोली. अद्भुत थे ये चार दिन ! शनिवार को नन्हा अपने मित्रों के साथ आया. इतवार की सुबह सभी पिकनिक पर गये, शाम को भावी वधू के माता-पिता भी आ गये. सोमवार को सभी कोर्ट गये. शाम को घर पर छोटा सा आयोजन किया. सभी कुछ भली प्रकार हो गया. मंगलवार को सब वापस चले गये. कल बुध को सरस्वती पूजा थी, दोनों स्कूलों में होने वाली पूजा में शामिल हुई. इसके बाद दो वर्ष ही और हैं जब वह यहाँ वसंत पंचमी के उत्सव में शामिल हो सकती है. बंगाल और असम के अतिरिक्त भारत के अन्य भागों में पूजा के पंडाल लगाने की प्रथा नहीं है. आज भतीजी का विवाह है और भांजी का जन्मदिन भी ! उसके लिए कविता लिखी. अगले हफ्ते यात्रा पर निकलना है. उसने मन ही मन उपहारों की सूची बनाई, बड़े व छोटे भाई के लिए डायरी व पेन, भतीजी के लिए साड़ी, छोटी भाभी के लिए स्टोल, बड़ी बुआ व चाची जी के लिए शाल, बच्चों के लिए चाकलेट्स, किताबें व पेन, चचेरी बहन के लिए सलवार सूट. अभी कोऑपरेटिव जाना है, एक सखी की बिटिया का कल जन्मदिन है, उसके लिए भी उपहार लेना है.

शाम के सात बजे हैं. अभी कुछ देर पूर्व योग कक्षा समाप्त हुई. जून ‘रईस’ देखने गये थे, पर थोड़ी ही देर में लौट आये. दोपहर बाद उस सखी के घर गयी जिसकी बिटिया का दसवां जन्मदिन है, घर में सजावट चल रही थी. सुबह मृणाल ज्योति में बच्चों को योग कराया, उसके बाद तन-मन बेहद हल्का लग रहा था. कल सुबह एक पल में मन के विचलन को देखा फिर परिवर्तन किया, जादू जैसा लगा. कल रात्रि पल में जीने का सूत्र नींद में भी याद आ रहा था. चेतना कितनी शक्तिशाली है कि एक क्षण में इतने बड़े ब्रह्मांड को एक साथ महसूस कर सकती है. हर क्षण अपने भीतर एक अनंत को छिपाए है. भीतर अनंत शांति है. आजकल साधना का समय घट गया है, पर मन में स्थायी शांति का वास है, जो हर समय एक रस ही लगता है. भतीजी का विवाह व रिसेप्शन कल दोनों हो गये. तस्वीरें देखीं. मार्च में कुछ दिनों के लिये वह विदेश जाएगी.

रात्रि के आठ बजे हैं. मौसम अब ठंडा नहीं रह गया है. कमरे में बिना स्वेटर पहने रहा जा सकता है. टीवी पर उत्तर प्रदेश के चुनावों के समाचार आ रहे हैं. शामली में रेत के अवैधानिक खनन के समाचार बताये जा रहे हैं. आज जया एकादशी है. जून दोपहर को डिब्रूगढ़ गये थे, नन्हे के विवाह का सर्टिफिकेट मिल गया है. समधियों को फोन किया. जून अगले हफ्ते गोहाटी में उनसे मिलने वाले हैं. दोपहर को ब्लॉग पर एक पोस्ट प्रकाशित की, आजकल लेखन बहुत कम हो गया है. यात्रा के दौरान छूट ही जायेगा. परसों वे पड़ोसी के यहाँ गये थे, उनकी बिटिया का विवाह होने वाला है, उनके न रहने पर वे मेहमानों को उनके घर में ठहरा सकते हैं, ऐसा प्रस्ताव भी दिया. कल वह उन्हें बुलाकर मेहमानों का कमरा दिखा देगी, जिससे उन्हें बाद में आसानी हो. परसों उसे यात्रा पर निकलना है. पैकिंग हो गयी है.  


Wednesday, July 11, 2018

किन्डल पर रामायण



कल रात्रि चेतना सघन थी, जो भी विचार आता था, मूर्त रूप होकर दिखने लगता था. कल दोपहर भी कितने अद्भुत दृश्य दिखे. छत की दीवार से लटकते हल्के बैंगनी रंग के फूलों की झालरें..तथा तेज हवा में उड़ते पत्ते, वृक्षों की डालियाँ, धूल तथा हवा का शोर भी कितना स्पष्ट था. अद्भुत है उनके भीतर का संसार ! सुबह उठी तो मन उत्साह से भरा हुआ था. वे टहलने गये, फिर स्कूल गयी, बच्चों ने ध्यान किया, उससे पूर्व ॐ की ध्वनि सुनाई दी तो वे सहज ही शांत हो गये. घर लौटी तो नैनी घर में काम कर रही थी, पर पीछे का दरवाजा पूरा खुला था, उसने नैनी को फटकारा, पर भीतर तब भी सन्नाटा था. ब्लॉग पर पोस्ट डालने के बाद कुछ देर किन्डल पर पढ़ने का विचार आया, पिताजी बाल्मीकि रामायण की बहुत तारीफ कर रहे थे. छोटी बहन भाई के घर पहुंच गयी है. वे उसे पुरानी तस्वीरें दिखा रहे हैं, जो वह व्हाट्सएप पर डाल रही है. अभी कुछ देर पहले घर के सामने के हैलीपैड पर एक हेलिकॉप्टर उतरा, फिर उड़ गया, उसका शोर इतना अधिक था कि घरों से लोग निकल कर देखने आ गये. ‘पवन हंस’ नाम है शायद इसका. जून के दफ्तर में एक टेंडर के कारण काफी हलचल है. बात दिल्ली तक जा पहुँची है, आज उन्हें मंत्री के पीए का फोन आया था, जाने क्या हल निकलता है. व्यक्ति के अहंकार के कारण ही ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं. पहली बार ऐसा हुआ है कि उनका वास्ता मंत्रालय से पड़ा है. उच्च अधिकारी भी दबाव में हैं.

मार्च का अंतिम दिन ! सुबह सामान्य थी, रात्रि को हुई वर्षा के कारण हल्की ठंडक थी, पर बादलों के पीछे से सूरज झांक रहा था. जून कल रात किसी सोच में मग्न थे पर सुबह सहज थे. वह अपने दफ्तर में चल रहे एक केस के कारण पिछले दो माह से व्यस्त हैं. सब कुछ को किसी खास कोण से देखा जाये तो सही जान पड़ता है. हर मानव को प्रकृति आगे बढ़ने का अवसर देती है. यदि जीवन में संघर्ष न हो तो विकास भी नहीं होगा, हाँ, विकास तभी सही होगा जब तथाकथित संघर्ष के पार कोई जाना सीख ले. आज भाई के घर पूजा हो गयी होगी और वे आगे यात्रा पर निकल गये होंगे. आज भी ब्लॉग पर दो पोस्ट प्रकाशित कीं, उसकी एक नई फेसबुक मित्र इन रचनाओं में काफी रूचि ले रही हैं. उसे ब्लॉग की पोस्ट फेसबुक पर भी पोस्ट करनी चाहिए ऐसा भांजे ने कहा था.

जून आज कुछ परेशान लगे. जो स्वाभाविक है, उन्हें अनजान व्यक्तियों से फोन पर व्यर्थ के आक्षेप सुनने पड़ रहे हैं. पर वह जरा भी क्रोधित नहीं होते, क्रोध से कोई हल नहीं होने वाला, यह वह जानते हैं. यदि किसी के पास धन हो क्या वह भूखा रहेगा, वस्त्र हों तो क्या वह ठंड में काँपेगा, फिर मानव क्यों अशांत रहे जब उसके भीतर शांति का अपार स्रोत है. आत्मा के रूप में उसे आनंदका स्रोत मिला है और वह दुखी है..आश्चर्य ही हो सकता है यह देखकर. जब भी कोई दुखी होता है, अपनी क्षमता का अनादर ही कर रहा होता है. किन्तु वे अपने कार्य के प्रति समर्पित थे, अब उसमें कुछ तो बदलाव आएगा ही, जीवन हर पल नया है, कब कौन सा मोड़ सामने आएगा, कौन जानता है. नन्हे से बात की, वह भी किसी केस का सामना कर रहा है. किसी मरीज का डाटा लीक हो गया. रात को एक-दो बजे तक घर पहुंच रहा था. आज सुबह वह उठी तो कितने अद्भुत दृश्य दिखे, वाणी भी दिखी, लिखी हुई ! रात की कोख से सुबह का जन्म होता है, नींद के आगोश से जागरण का !  

Thursday, January 25, 2018

गुरुद्वारे में कड़ाह प्रसाद


आज लेह में उनका अंतिम दिन है. कल रात भी स्वप्न में कितने ही दृश्य दिखे, लद्दाख में देखे स्थानों के भी और अन्य भी. स्वप्न अलग थे पर जगते हुए इन दृश्यों को देखना एक अलग अनुभव है. चेतना जैसे ज्यादा मुखर हो गयी है. प्रकाश भी बहुत तीव्र है यहाँ. तेज धूप निकलती है जो ग्लेशियर्स को पिघला रही है. नहरों-नालों में जल का तेज बहाव शुरू हो गया है, जो खेतों को सींचने में काम आयेगा. यहाँ मुख्यतः वर्ष के तीन-चार महीने ही खेती की जाती है. कल शाम वे लेह पैलेस तथा शांति स्तूप देखने गये. लेह महल बहुत पुराना है, यह नौ मंजिला इमारत सत्रहवीं शतब्दी में राजा सेंग्गे नामग्याल द्वारा बनवायी गयी थी, अब इसे राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया गया है. इसे बनाने में मुख्यतः लकड़ी का प्रयोग हुआ है. 
शांति स्तूप जापान के सहयोग से एक पहाड़ी पर बना एक अनोखा स्मारक है जिसमें नीचे बुद्ध मन्दिर है तथा ऊपर भगवान बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति, तथा निर्वाण के दृश्यों को मूर्तिकला के माध्यम से दर्शाया गया है. यह १९८५ में पूरा हुआ और दलाई लामा के हाथों इसका उद्घाटन हुआ.
आज की यात्रा का मुख्य आकर्षण था मेगनेटिक हिललिकिर  अलची के गोम्पा तथा पत्थर साहेब गुरुद्वारे में दोपहर का लंगर. सुबह नौ बजे नाश्ता करके वे दोरजी की इनोवा में निकले तथा सिंधु व झंस्कर नदी के संगम स्थल पर पहुंचे. दोनों नदियों के जल का रंग भिन्न था यह स्पष्ट दीख रहा था. गर्मी के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और पर्वतों की ढलानों से मिट्टी के साथ पानी तेज गति से बह रहा है, सो मटमैला होने के बावजूद दो रंगों का था. वहाँ रिवर-राफ्टिंग के लिए भी साजो-सामान रखा था. 
मैग्नेटिक हिल पहुंचने पर कार अपने आप ऊंचाई पर चढ़ने लगी, ऐसा प्रतीत हुआ. लिकिर गोम्पा में भावी बुद्ध की विशाल स्वर्ण प्रतिमा है जिसे जापान की सहायता से बनाया गया है. मन्दिर में अद्भुत चित्रकला के माध्यम से भगवान बुद्ध के जीवन के मुख्य पड़ावों जन्म, ज्ञान प्राप्ति, दानवों पर विजय तथा निर्वाण को दर्शाया गया है. उन दस अर्हतों के भी चित्र वहाँ थे जिन्होंने बुद्द्ध की शिक्षाओं को संकलित किया था. 
लेह के पश्चिम में ७० किमी दूर स्थित अल्ची एक हजार वर्ष पुरानी मॉनेस्ट्री है, जहाँ मुख्य द्वार तक पहुंचने का मार्ग घुमावदार, शांत व शीतल है, संकरे मार्ग में दोनों और दुकाने लगी थीं. कई विदेशी यात्री वहाँ दिखे जो इतिहास में काफी रूचि दिखा रहे थे. 
पत्थर साहब गुरुद्वारा भी बहुत भव्य है जो सेना द्वारा संचालित किया जाता है. इसका महत्व इस बात से बढ़ जाता है कि गुरु नानक देव अपनी तिब्बत यात्रा के दौरान यहाँ ठहरे थे. कहा जाता है कि एक दानव के उनके ध्यान को भंग करने के लिए एक चट्टान उनकी तरफ फेंकी पर उन्हें कोई नुकसान पहुंचाए बिना पत्थर की वह चट्टान वहाँ रुक गयी, जिसे आज तक पूजा जाता है. वहाँ उन्होंने कड़ाह प्रसाद तथा भोजन का प्रसाद ग्रहण किया. लेह शहर में स्थित एक स्थल दातुन साहब के बारे में भी एक पुस्तक में पढ़ा था, जहाँ गुरु नानक ने सोलहवीं शताब्दी में एक वृक्ष लगाया था.

इस समय संध्या होने में अभी कुछ समय है. तेज हवा के कारण पेड़ों की टहनियाँ आपस में व टिन के शेड से टकरा रही हैं, जिसके कारण आवाज पैदा हो रही है. धूप सात बजे तक कम होगी तब वे सांध्य भ्रमण के लिए जायेंगे तथा बाद में आज उतारे फोटो देखेंगे. सामान की पैकिंग लगभग हो चुकी है. कल सुबह आठ बजे की उड़ान से उन्हें दिल्ली जाना है और परसों इस वक्त असम में अपने घर में होंगे.                                                                  

Friday, November 10, 2017

मृत्यु और जीवन

मृत्यु और जीवन - २ 

 जीवन का अनुभव ही क्या नहीं है मौत का अनुभव
चेतना सरक जाती है जब भीतर
देह को छोड़कर..
भीतर एक अंकुर है कोमल जीवन का..
जिस पर आवरण है देह का
देह मरेगी पर जीवन बचेगा
देह जिसका आवरण है
उससे मिलन करना होगा
जड़ें दिखाई नहीं पड़तीं
वृक्ष दिखाई पड़ता है
अंकुर दिखाई नहीं पड़ता
बीज दिखाई देता है
भीतर है जो अव्यक्त
वही अभिव्यक्त होता है बाहर
अभिव्यक्ति को ही जो समझते हैं जीवन
वे डरे हैं हर पल मौत से
कंपते हैं प्राण उनके
परिचित हैं जो भीतर उस अव्यक्त से
तैयार रहते हैं हर पल उस मौत के लिए
जो केवल देह को ही घटती है !

मृत्यु और जीवन – ३  

विलीन हो जाता है तब मृत्यु का भय
जब मिलता है भीतर अमृत का कोष
तब बाहर भी घटता है संतोष
देह जाएगी एक दिन तय है
तब उसे किस बात का भय है
वह जानता है मृत्यु का राज
जैसे कोई दिए की बाती उढ़का दे  
सिमट आये प्रकाश और फिर समाप्त हो जाये
उर्जा वापस लौट गयी जिस क्षण
देह से टूट जाता है नाता उसका
जो देख ले जीते जी सिमटने को ऊर्जा के
वह जानता है नहीं मरा हूँ मैं
तैयार हूँ एक नई यात्रा के लिए
जानते हुए भीतर जाना होगा
शांत होकर भीतर सिकुड़ना होगा
देह से अलग खुद को देखना होगा
जैसे प्रकाश है बल्ब में वैसे ही
जीवन है देह में
देह से अलग स्वयं को देखना ही
ध्यान है !

Thursday, November 9, 2017

जीनिया की पौध


आज सुबह भी प्रतिदिन की तरह थी. शीतल, शांत और बाद में वर्षा भी होने लगी. नर्सरी गयी थी, जीनिया की पौध नहीं मिली, शाम को फिर जाना है चार बजे. दोपहर को फिर भूचाल आया. नेपाल, भारत, अफगानिस्तान, चीन सभी जगह. गोहाटी और दिल्ली-देहरादून में भी पता चला, उन्हें यहाँ पर कोई अहसास नहीं हुआ. वे सोये थे उस वक्त. उसके पेट में हल्का सा दर्द था, बहुत दिनों से कुछ नया लिखा भी नहीं, बहुत सी भावनाएं ही शायद जमा हो गयी हों. नन्हे से सुबह बात हुई, वह एक नये संबंध में बंध रहा है. लडकी के पिता अन्य धर्म के हैं, जून को इस पर एतराज है, पर यह कोई मसला नहीं है. आजकल बच्चों के लिए रिश्ते बनाना और तोड़ना एक सामान्य सी बात है. नन्हे से बात हुई, उसने कहा, अगले महीने वह घर आएगा. जून भी परसों कह रहे थे, उससे मिलकर उसके भविष्य के बारे में बात करनी है, आखिर चेतना तो एक ही है, इधर की चाह उधर पहुँच ही जाती है, विचार सूक्ष्म होते हैं, अति शीघ्र यात्रा कर लेते हैं. सुबह जून से उनके नये प्रोजेक्ट के बारे में बात हुई. जो वे गोहाटी में करने वाले हैं, प्लास्टिक से तेल बनाने का प्रोजेक्ट. उसे भी कोई सार्थक कार्य हाथ में लेना चाहिए. अपने समय व ऊर्जा का सही उपयोग करने के लिए. लगता है, रजोगुण बढ़ रहा है. अभी बाल्मीकि रामायण का कितना काम शेष है और पढ़ने का काम तो है ही. पढ़ने से ही नया लिखने का सूत्र मिलेगा. भीतर जाकर मन को टटोलना होगा. पर भीतर तो मौन है, शांत और आनंद से भरा मौन..उसे ही लुटाना है किसी न किसी रूप में. उस शांति से ही सृजन करना है. अगले महीने दीदी का जन्मदिन है और उनकी नतिनी का भी, उनके लिए भी कुछ लिखना है.

कल सुबह जब नर्सरी से जीनिया की पौध व एक पौधा लेते हुए वापस आई तो जून का फोन आया. कम्पनी के एक अधिकारी का कैम्प में रहते हुए नींद में ही देहांत हो गया है. सुनकर कैसा सा तो लगा, दोपहर को उनके घर गयी, व्यथित महिला बहुत रो रही थी, दो घंटे रुककर लौटी तो ‘मृत्यु और जीवन’ लिखा.

मृत्यु और जीवन - १

मौत एक पल में छीन लेती है कितना कुछ
माथे का सिंदूर हाथों की चूड़ियाँ
मन का चैन और अधरों की हँसी
पत्नी होने का सौभाग्य ही नहीं छीनती मौत
एक स्त्री से उसके कितने छोटे-छोटे सुख भी
पिता का आश्रय ही नहीं उठता सिर से
पुत्र की निश्चिंतता, उसका भरोसा भी
अश्रु बहते हैं निरंतर ऑंखें सूज जाती हैं
रुदन थमता नहीं विधवा का
रह-रह कर याद आती है कोई बात
और कचोट उठती है सीने में
रोते-रोते चौंक जाती है
कह उठती है, मुझे साथ ले चलो
पर कोई जवाब नहीं आता
कभी नहीं आया,
उस पार गया कोई भी लौट कर नहीं आया
क्या है मृत्यु ?
जो छीन लेती है जीवन का रस अपनों का
भर जाती है ऐसी उदासी
जो कभी खत्म होगी इसका विश्वास नहीं होता
मर सकता है कोई भी.. कभी भी.. किसी भी क्षण
तो क्यों न सामना करें इस प्रश्न का
क्यों न रहें तैयार हर पल.. सामना करने मौत का...
मौत जो जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई है
जिसकी नींव पर ही जीवन की भीत टिकाई है
जीवन के पीछे ही छुपी है मौत
करती रहती है इंतजार उस पल का
जब शांत हो जायेगा सांसों का खेल
और झपट लेगी वह हलचल जीवन की
मुर्दा हो जायेगा यह शरीर
पर भीतर जो जान थी उसे
छू भी नहीं पायेगी मौत
कौन जानता है उसका होना
वही जो उतरा है भीतर जीते जी
जिसने चखा है मृत्यु का स्वाद जीते जी
जिसने पहचान की है घर के मालिक से !  


Friday, September 15, 2017

फूलों पर श्वेत तितली


रात्रि के आठ बजे हैं, अभी-अभी वे बाहर टहल कर आये हैं. गेट के दोनों ओर लगे श्वेत और गुलाबी कंचन के वृक्ष फूलों से भर गये हैं. ठंडी बयार बह रही थी. सुबह का भ्रमण भी सुखद था. मार्च का प्रथम दिन है आज, धूप में अब तेजी आ गयी है. दोपहर को बच्चों को अभ्यास कराया, ध्यान करते हुए वे कितने शांत लग रहे थे, कुछ पल पहले शोर मचाते हुए जो दौड़ रहे थे, कुछ ही पलों में स्थिरता को अनुभव करने लगे थे. उड़िया सखी आयी तो उसे शील, समाधि, प्रज्ञा के बारे में बताया. आठ मार्च को महिला दिवस के अवसर पर गुरूजी ने कुछ विशेष कार्यक्रम करने को कहा है. वह आस-पास की महिलाओं को बुलाकर कुछ बताएगी. आज प्रधान मंत्री को NASCOM के रजत जयंती कार्यक्रम में बोलते सुना, अच्छा लगा. कश्मीर में बीजेपी और पीडीपी की संयुक्त सरकार बन रही है, यह भी एक बड़ी सफलता है.

एक शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चेतना इस देह में रहकर इन्द्रियों द्वारा इस प्रकृति का अनुभव प्राप्त करती है. मन के द्वारा मनन करती है, बुद्धि के द्वारा निर्णय लेती है तथा अहंकार के द्वारा क्रिया करती हुई प्रतीत होती है. जबकि उसका स्वभाव मात्र जानने का है, वह ज्ञाता व द्रष्टा मात्र है. देह स्वभाव के अनुसार कार्य करती है, मन स्वभाव के कारण कभी भूत कभी भविष्य में जाता है. बुद्धि स्वभाव के अनुसार घटनाओं को परखती है, वह आत्मा इन सबको देखती है, वह शुद्ध चेतना भीतर है जो प्रतिपल इन सबको देखती है, तथा वह अपने में पूर्ण है और प्रतिक्षण संतुष्ट है. मन द्वारा कार्य किये जाने पर तथा बार-बार उसे दोहराए जाने पर जो संस्कार अंतर्मन पर पड़ गये हैं, उन्हें भी उभरने पर वह साक्षी भाव से देखती है. आँखों के द्वारा इस सुंदर सृष्टि को निहारना, स्वयं के भीतर ही अद्भुत नाद को सुनना उसे भाता है. स्वयं के अनंत स्वरूप में गहरे उतरते चले जाना और कोई बाधा, कोई अवरोध न पाना भी ! परमात्मा का विभिन्न रूपों में प्रकट होना भी ! आज स्कूल में छोटे बच्चों की योग कक्षा लेते समय एक तितली आयी और एक बच्चे के सिर पर  मंडराने लगी, बड़े बच्चों की कक्षा में एक तितली घायल अवस्था में पड़ी दिखी. पिछली बार उसके मन में पुराने किसी संस्कार के जगने पर हिंसा का विचार आया था. परमात्मा के मार्ग विचित्र हैं. वह रहस्यमय तो है ही, प्रकट होकर भी वह अप्रकट है ! आज एक परिचिता के साथ मृणाल ज्योति भी गयी, जिसके दिव्यांग भाई की वर्षों पहले मृत्यु हो गयी थी, उसके जन्मदिन पर दिव्यांग बच्चों के लिए खाने-पीने का कुछ सामान ले गयी थी वह. जून आज सुबह से ही व्यस्त हैं, ओएनजीसी से कुछ लोग आये हैं.

रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं. तेज वर्षा हो रही है. बादल सुबह भी थे जब वह पैदल चलकर बुजुर्ग आंटी से मिलने गयी. वह बिस्तर पर बैठकर किताब पढ़ रही थीं, खुश हुईं देखकर. अपनी सेविका की बहुत शिकायत कर रही थीं, जैसे कि अक्सर कुछ वृद्ध व्यक्ति शिकायत करना अपना स्वभाव ही बना लेते हैं. अगले हफ्ते वे गुरूपूजा रखवा रहे हैं. कितनी कृपा है गुरू की उन पर. जीवन का सही अर्थ उन्होंने ही बताया है. धरा पर यदि कोई जागा हुआ न हो तो इसकी रौनक कोई देख ही न पाए उस तरह जिस तरह ये वास्तव में हैं ! जो दिखाई नहीं देता वह उससे ज्यादा सुंदर है जो दिखाई देता है...परमात्मा सदा ही किसी न किसी रूप में धरा पर मौजूद रहता है. वैसे तो वही है हर रूप में..पर इस बात को समझने के लिए जो सूक्ष्म दृष्टि चाहिए वह तो गुरू ही देता है ! आज शाम उन्हें गुलाब जामुन बनाने हैं, कल होली है, वे न भी खेलें तो कोई अतिथि घर आये, उसके स्वागत के लिए कुछ मीठा तो होना ही चाहिए. मौसम आज भी अच्छा है. ठंडी सी सुहावनी हवा बह रही है, एक श्वेत तितली फूलों पर मंडरा रही है, उड़ती हुई तितली कितनी मोहक लगती है ! बड़ी भाभी का स्वास्थ्य अब ठीक हो रहा है, कमजोरी बहुत है ऐसा बड़े भाई ने बताया. उसने मन ही मन प्रार्थना की, ईश्वर उन्हें शीघ्र स्वस्थ करे ! कल शाम को आठ महिलाओं को विपासना के बारे में बताया, शील, समाधि व प्रज्ञा के बारे में भी बताया. उन्हें अच्छा लगा, अगले महीने फिर आने को कहा है. कल पुस्तकालय से तीन किताबें लायी. वी. एस. नायपाल की आत्मकथा, डा. मनमोहन सिंह पर एक पुस्तक तथा आर के नारायण की पुराणों से संबंधित एक पुस्तक. तीनों पुस्तकें यकीनन अच्छी होंगी. परमात्मा रह-रह कर किसी न किसी इशारे से अपनी याद दिला देता है ! यदि कुछ देर तक उसका स्मरण न आये तो...    

Monday, August 21, 2017

चेत्तना की ज्योति


शाम के साथ बजने वाले हैं. आज दिन भर धूप के दर्शन नहीं हुए. इस समय तापमान छह डिग्री है. सुबह उठकर कुछ देर प्राणायाम किया फिर बाहर टहलने भी गयी, चारों और श्वेत कोहरा था जो चेहरे पर शीतलता की छाप छोड़ जाता था. उसके बाद किचन में पहले नाश्ता फिर भोजन बनाने-खाने-खिलाने में व्यस्त. महरी दो दिन से नहीं आ रही है. छोटी भाभी बहुत मिलनसार है और सारा काम आराम से निपटा लेती है. दीदी परिवार सहित कल आयीं थीं, सबसे मिलकर अच्छा लगा. बड़ी भांजी से फोन पर बात हुई, चचेरा भाई मिलने आया था, वह कुछ ज्यादा बोलने लगा है, अकेले रहने के कारण उसका मन अब शायद पहले सा मजबूत नहीं रह गया है, फिर भी शारीरिक रूप से पहले से स्वस्थ लगा. पिताजी आज सुबह कह रहे थे, यात्रा पर जाने से पूर्व उनका दिल घबराता है, दो दिन बाद उन्हें जाना है.

कल चचेरी बहन अपने दो बच्चों के साथ आयी थी, बच्चों ने नन्हे के साथ अच्छा समय बिताया. आज सुबह नौ बजे घर से चले और ढाई बजे दिल्ली पहुंच गये. बड़ी गाड़ी थी, स्विफ्ट डिजायर, यात्रा आरामदेह थी सिवाय दिल्ली में भारी ट्रैफिक का सामना करने के. मंझले भाई-भाभी का नया घर बहुत सुंदर है. शाम को भाभी की माँ से मिलने गये, जो अस्थमा की मरीज हैं. उसके बाद आर्मी रेस्टोरेंट में रात्रि भोजन के लिए. सूप, सिजलर, पनीर टिक्का, तंदूरी रोटी दाल और एक सब्जी. पिछले दिनों छोटी भाभी ने भी काफी व्यंजन बनाये थे. कश्मीरी चटनी, अप्पा, मलाई मेथी मटर तथा खजूर के लड्डू, हल्दी वाला दूध. कल शाम शायद बड़ी भतीजी मिलने आये. दोपहर को बड़ी भाभी के यहाँ जाना है. जून टनोर में हैं, जो जैसलमेर से भी आगे हैं.

आज ठंड कल से भी ज्यादा है. खिड़की से बाहर सिवाय कोहरे की सफेद चादर के कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा. सुबह छह बजे ही उठ गयी, साढ़े आठ बजे तक तैयार थी. पिताजी भी नहा-धोकर नाश्ता करके बांसुरी बजा रहे हैं, चैन की बांसुरी ! नन्हा कल अपने मित्र के यहाँ रहा, अपने मित्रों के साथ कल रात आग जलाकर उसने उत्सव मनाया. आज उसे वापस जाना है. रात्रि के दस बजने को हैं. ठंड बदस्तूर है. दोपहर को बड़ी भाभी ने सरसों का साग व मक्की की रोटी खिलाई. शाम का भोजन भी वहीं किया और आधा घन्टा पहले ही वे लौटे हैं. परसों इस वक्त वे अपने घर में होंगे, समय कैसे बीत रहा है, पता ही नहीं चल रहा.

वे घर लौट आये हैं. सुबह साढ़े पांच बजे उठे और गोभी के पराठों का नाश्ता करके, निकल पड़े, भाई ने चाय बनाई, जैसे मंझला भाई अपने घर पर बनाता है, जैसे जून यहाँ हार्लिक्स बनाते हैं. बड़े भाई को आटा गूंथते हुए भी देखा, अच्छा लगा, वे पहले से ज्यादा शांत और स्थिर लगे. मंझला भाई भी पहले से ज्यादा स्वस्थ लग रहा था. भाभी लेकिन कुछ ज्यादा ही मोटी हो रही हैं. दोनों की बेटियां बहुत लाड़-प्यार में पली हैं. एअरपोर्ट पर दो किताबें खरीदीं, दो दीदी ने दी हैं, एक पिताजी से पढ़ने के लिए ली है, ‘शिवोहम’, वहाँ पढ़ रही थी, पूरी नहीं पढ़ पायी. बहुत अच्छी किताब है. चेतना का दीपक जलता है देह की उपस्थिति में ही, प्राणवायु ही उस दीपक को प्रज्ज्वलित करती है, देह दीपक है, चेतना ज्योति है, चेतना स्वयं को ज्योति स्वरूप जान ले तो सारा भय नष्ट हो जाता है. पिताजी का गला दिल्ली की ठंड में खराब हो गया है, पर उन्हें वहाँ अच्छा लग रहा है. ठंड से बचने के लिए भाभी ने उन्हें गर्म शाल दी, भाई ने ट्रैक सूट और हर समय वे उनके ध्यान रखते हैं. भाभी की माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, वह अस्पताल में हैं, उनसे भी बात हुई. घर आकर अच्छा लग रहा है. परमात्मा उसे किसी उद्देश्य के लिए वहाँ ले गया था. नन्हे ने अपने दिल की बात बताकर स्वयं को हल्का किया, उसका दिल टूटा है पर वह हिम्मती है. भीतर की पीड़ा को व्यक्त नहीं होने देता, स्वयं पर हावी भी नहीं होने देता. परमात्मा ही उसके जीवन का मार्ग तय करने में उसे मदद करेंगे. कल शाम को क्लब में मीटिंग है. अगले हफ्ते प्रेस जाना है. पहली तारीख को एक सखी को भोजन पर बुलाना है. जून ने हरे चने के चावलों बनाये हैं रात्रि भोजन में.


Thursday, May 25, 2017

अंत और आरम्भ


सुबह-सवेरे खबर मिली, बड़ी भांजी के यहाँ बिटिया का जन्म हुआ है. नार्मल नहीं हुआ यही एक बात अच्छी नहीं है. दीदी अभी वहाँ नहीं गयी हैं, दो दिन उनके बाद बेटे-बहू आ रहे हैं, पर उसे लगता है उन्हें जाना चाहिए, खैर..आज एक परिचिता का फोन भी आया, वह अपनी बेटी को आस्ट्रेलिया छोड़कर आई हैं. वहाँ सभी काम खुद करने होते हैं, अभी विवाह को एक ही वर्ष हुआ है. दो महीने के बच्चे को छोड़कर वह आ गयी हैं, इस भरोसे कि बिटिया की सास पहुंच जाएँगी, पर स्वास्थ्य संबंधी कुछ परेशानी के चलते वह अभी जा नहीं पाएंगी.

कल मामीजी की आर्मी डाक्टर नतिनी अपने पांच वर्ष के पुत्र के साथ आ रही है, पिछले दो वर्ष से यहीं असम के किसी स्थान में पोस्टेड थी, जब जाने का समय निकट आया तो उसने सोचा एक बार मिलकर ही जाये. बड़ी ननद का फोन आया, अगले हफ्ते वे आ रही हैं. जो भी होगा अच्छा ही होगा, जागे हुए के लिए सब शुभ है, हर घड़ी, हर पल शुभ के सिवाय कुछ है ही नहीं. पिताजी की तबियत पूर्ववत् बनी हुई हैं, आज वे नींद में कुछ बोल रहे थे. पहले कहा, ‘नहीं लगा’, फिर कहा, ‘अच्छा हुआ’. आज भी बगीचे में कुछ काम करवाया, इतने बड़े बगीचे में कुछ न कुछ काम निकलता ही रहता है.

मेहमान सुबह-सवेरे पहुंच गयी, वे अभी उठे ही थे. उसका पुत्र बहत ऊर्जावान है, जैसे कि आजकल पांच वर्ष के बच्चे होते हैं. स्वयं भी बहुत बातें करती है. पति से तलाक का केस चल रहा है, कितने आराम से सारी बातें बता रही थी, जैसे किसी और के बारे में हों. जीवन में कितना कुछ घट जाता है जिस पर किसी का बस नहीं होता. वे अस्पताल भी गये पर पिताजी ने आँखें नहीं खोलीं. कल रात एक बहुत अजीब सा स्वप्न देखा, एक नवजात शिशु कन्या को देखा जो उसकी हमशक्ल थी, वह उसकी बेटी थी, वह ही थी या उसकी आत्मा थी. उसका सुंदर चेहरा और काले केश चेहरे के भाव, आँखों का रंग सब कुछ कितना स्पष्ट था स्वप्न में. उसे उसने जन्माया था पर कितने अलग ढंग से, वह श्वेत आवरण से ढकी थी जैसे कोई प्लास्टर लगा हो. ढकी थी कई वस्त्रों से, फिर उसे अनावृत किया. अद्भुत स्वप्न था वह. परमात्मा हर क्षण उसके साथ है, उसकी कृपा ही भीतर उजाला बनकर छा रही है.    

तीन दिनों का अन्तराल.. जिस दिन वे आए थे, उसके अगले दिन मेहमानों को लेकर रोज गार्डन गयी, शाम को पार्क व काली बाड़ी भी. उसी रात को पिताजी की साँस उखड़ने लगी, जो सुबह से ही तेज चल रही थी. एक जीवन का अंत करीब आ गया था, एक नये जीवन की शुरूआत होने वाली थी. रात को बारह बजे जून अस्पताल से लौटे. अगले दिन सुबह साढ़े नौ बजे अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया. दोपहर दो बजे लौटे. शाम तक लोग आते रहे, कल सुबह भी कुछ लोग आये, कल शाम को भी. आज छत पर काम करने वाले मजदूर आ गये हैं. नैनी किचन में काम कर रही है, सफाई कर्मचारी अपना कम कर रहा है, जीवन पहले सा चल रहा है पर एक चेतना अपना रूप बदल चुकी है, एक लहर सागर में समा गयी है एक नई लहर बनकर थिरकने के लिए. जून ने सभी कार्ड्स लिखे, वे लेकर ड्राइवर देने गया है. परसों क्रिया है. मंझला भाई आ रहा है, दोनों ननदें भी कल आ रही हैं. उसके मस्तिष्क में कई उदार कल्पनाएँ आ रही हैं, एक बच्चों का स्कूल खोलने की, एक बड़ों की क्लास लेने की, एक सत्संग करने की, एक मृणाल ज्योति के लिए एक स्कालर शिप देने की, जिसमें कुशाग्र विद्यार्थी को चुना जायेगा. पिताजी के नाम से होगी यह स्कालर शिप. लेडीज क्लब में एक नया प्रोजेक्ट भी खोलना है, योग और ध्यान का, जिसका नाम होगा आह्लाद ! जिसमें वे सप्ताह में एक दिन योग कक्षा चलाएंगे.


Friday, April 7, 2017

केसरिया बदलियाँ


परमात्मा हर पल उनके मन का द्वार खटखटाता है, वे कभी खोलते ही नहीं, वह तो स्वयं प्रकट होने को आतुर है. वह प्रतिपल बरस रहा है, उसे देखने की नजर भीतर पैदा करनी है. चेतना का आरोहण करना है, भीतर जो अनंत ऊर्जा है उसे एक आकार देना है. जो स्वयं के प्रतिकूल हो वह कभी किसी दूसरे के साथ भूलकर भी न करें, क्योंकि दूसरों को दिया दुःख अंततः अपने को ही दिया जाता है, चेतना एक ही है.  उन्हें अपने ‘होने’ की सत्ता को सार्थक करना है, अपने होने के प्रयोजन को सिद्ध करना है. वे अपनी पूर्ण क्षमता को विकसित कर सकें, जो बीज में सुप्त है, वह फूल बन कर खिले. जीवन का अर्थ क्या है, इसे जानें. वे किस निमित्त हैं, वे किसका माध्यम हैं, किसके यंत्र हैं, किसके खिलौने हैं, इस विशाल आयोजन में उनका भी योगदान हो, उनके पास जो भी है, देह, मन, बुद्धि सभी उसके काम आ जाये, वे उसके सहचर बन जाएँ. सन्नाटे में भी जो उनके साथ रहता है, अँधेरी स्याह रात्रि में, निस्तब्धता में भी जो उनके निकटतम है, उसके हाथ में स्वयं को सौंप कर निश्चिन्त हो जाना है. आज सुबह चार बजे उठी, अकेले ही टहलने गयी, बाहर बगीचे में ध्यान किया, सूर्य की रौशनी में आकश और पेड़ किस अद्भुत तरीके से चमचमा रहे थे !

परमात्मा स्वयं को कितने रूपों में प्रकट कर रहा है, मानव देख नहीं पाता, आश्चर्य है, सुंदर वृक्ष, हरी घास, चहकते पंछी, उगता हुआ सूर्य, प्रातःकालीन शीतल सुगन्धित पवन सभी कुछ उसी की याद दिलाते हैं. उनके भीतर का आकाश अनंत शांति व निस्तब्धता भी उसी की याद दिलाते हैं. सारा जगत एक अलौकिक शांति से भर गया लगता है. इस जगत की हर शै उसी की लीला में सहभागी है. वे मानव ही स्वयं को पृथक मानकर उससे अलग हो जाते हैं !

आज से नया माली काम पर आ रहा है, अमर सिंह, जो सारे पंजाबी लोगों को एक ही मानता है, जैसे उन्हें सारे जापानी एक जैसे लगते हैं. सुबह सूर्य का लाल गोला दिखा पर बीस मिनट बाद ही दृश्य बदल गया, कोहरा आ गया, सूरज श्वेत हो गया था. अभी तक धूप नहीं निकली है, परमात्मा उसे रात को जगाने आता है, पर नींद और स्वप्न की दुनिया में मन कैसे खो जाता है. आज शाम को क्लब की मीटिंग है. बाएं तरफ की पड़ोसिन को-ओर्डीनेटर है, उसे फोन करके न आ पाने के लिए कहेगी.

जिसे ऐसी प्रसन्नता चाहिए जो अपह्रत न हो सके, खंडित न हो सके, बाधित न हो सके, उसे अपना अंतःकरण अस्तित्त्व के प्रति खोल ही देना होगा. ऐसी समाधि जिसे चाहिए जो सहज हो. समता, स्थिरता, संतुलित रहना ये सभी तो सहजता से मिलते हैं. समाधान साथ-साथ चलता रहे तो अंतःकरण मोद से भरा रहता है. जो संकल्प को छोड़ना जानता है, वही उसे सिद्ध भी करता है, जो त्यागना सीख गया, वह सब पाना सीख गया. कितने सुंदर शब्द उसने सुने आज सुबह..आज तीसरा दिन था, सूर्य देवता को अपना रूप बदलते हुए देखा. परसों चमचमाता हुआ बाल सूर्य देखा, कल कोहरे के पीछे श्वेत सूर्य और आज बादलों के पीछे छुपा सूर्य. अभी तक धूप में तेजी नहीं आई है !

एक नन्हे से बीज में जीवित रहने की प्रबल इच्छा होती है, कितनी बाधाएं पार करके वह अंकुरित होता है, पनपता है, वह मिटने को तैयार है तभी वह ‘होता’ है. आज सुबह चार बजे से पहले उठी. सूर्य देवता ने आज नया रूप धरा था. सलेटी बादलों में सुनहरी व केसरिया किरणों का जाल झांक रहा था. प्रकृति का रूप कितना मोहक है, उसके पीछे छिपे उस अव्यक्त चेतन के ही तो कारण, इस सुन्दरता को निहारने वाला भी तो वही चेतन है, वही इस अपार सौन्दर्य को जन्म देने वाला है और वही इसका चितेरा भी ! कल शाम मृणाल ज्योति से फोन आया, आज एक मीटिंग में जाना है. ॐ की ध्वनि आ रही है, पता नहीं कहाँ से अक्सर यह ध्वनि उसे सुनाई देती है, गम्भीर स्वरों में कोई ॐ कहता है !   



Friday, March 31, 2017

गोकुल और नवनीत


सितम्बर शुरू हो गया, बादल पूरे अगस्त बरसते रहे, देखे, इस महीने क्या होता है. बादलों का मौसम कृष्ण की याद दिला देता है, उनका जन्म भी ऐसे ही मौसम में हुआ था और उनका रंग भी शायद इसीलिए..सुबह कृष्ण लीला का स्मरण करते ही आँखों में भी बादल घिर आये..अद्भुत हैं कृष्ण !  जैसे उसे कह रहे हों, मैं हूँ न ! वह अपने मन को गोकुल बना सकती है तो कृष्ण उसमें बसने को सदा तत्पर हैं. वह अर्जुन की तरह यदि उनकी शरण में जा सकती है तो उन्होंने उसकी कुशल-क्षेम का वचन दे ही दिया है, वह अपने को सुपात्र बना लेती है तो कृष्ण उसमें रहे नवनीत को ग्रहण करने ही वाले हैं. शुद्ध, सात्विक भोजन खाने से मन व तन दोनों हल्के रहते हैं, इसका अनुभव हो रहा है. कल इतवार शाम को बंगाली सखी की माँ आएँगी उनके यहाँ. उसने सोचा है उनकी पसंद की कुछ वस्तुएं बनाएगी, वह इतनी उम्र में भी कितना ध्यान रखती हैं अपने वस्त्रों व मेकअप का, खूब बातें करती हैं और छोटी लड़कियों की तरह चहकती हैं, यही उनकी सेहत का राज है.

सुबह उठे वे तो ठंडी हवा बह रही थी, उसके बाद वर्षा शुरू हुई जो रुकने का नाम नहीं ले रही है. कपड़े धोकर नैनी बाहर ही छोड़ गयी थी, वह उठी उन्हें फ़ैलाने के लिए पर पिताजी ने पहले ही फैला दिए थे, उन्हें अपने लायक किसी न किसी काम की  तलाश रहती है, कोई भी मौका नहीं चूकते. आज वे बोले, शरबत की जगह चाय पियेंगे, मौसम ठंडा हो गया है.

शिक्षक दिवस है आज ! दो छात्रायें उसके लिए पेन तथा कार्ड लायी है और एक की माँ ने भी एक उपहार भिजवाया है. वह खुद मृणाल ज्योति गयी थी. टीचर्स को उपहार दिए, मिठाई खिलाई. जून आज दिल्ली गये हैं, तीन दिन बाद लौटेंगे. उसे कुछ काम तो करने हैं, कुछ लिखना है और साक्षी बने रहना है हर कृत्य में. कर्ता भाव से कुछ भी नहीं करना है. पिताजी को फोन करना है, भीतर कैसी अनोखी शांति है. स्वचेतना खो जाने पर केवल चैतन्य मात्र रह जाने पर ही ऐसी शांति का अनुभव होता है !

अभी कुछ देर पूर्व जून का फोन आया था, उसके जूते का नम्बर पूछ रहे थे, वह इतनी दूर रहकर भी उसका इतना ध्यान रखते हैं. आज दीदी से बात हुई, वे लोग नार्वे में मन्दिर गये थे, भारतीय जहाँ भी रहते हैं, मन्दिर का निर्माण कर ही लेते हैं. एक वरिष्ठ ब्लॉगर महोदया जी का मेल आया था कल, ‘नारी विमर्श’ पर कुछ लिखने को कहा था अपनी समझ से. कभी-कभी भीतर कुछ लिखने का मन होता है, पर उस वक्त कागज-कलम साथ नहीं होते, वक्त गुजर जाता है. जब कागज-कलम लेकर बैठे तो कुछ भी नहीं लिखा जाता है. कल रात एक सुंदर पंक्ति जहन में आई थी. बहुत बार दोहराई कि याद रहेगी पर अब उसका निशान भी शेष नहीं है. मन के आकाश में उड़ते हुए बादल सी कोई लाइन आयी और खो गयी..वे व्यर्थ ही अपना होने का दावा करते हैं विचारों को ! कल शाम आलोचना में कुछ पढ़ा, आज नेट पर और फिर एक लम्बी कविता जैसी कुछ लिख दी. उन्होंने जवाब भी दिया, शानदार ! शायद उदंती में छपने के लिए भेजें. वर्षा जारी है !