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Friday, March 2, 2018

दिगबोई का सौन्दर्य



परसों वे पूजा देखने दिगबोई गये थे, दो रात्रियाँ वहाँ बिताने के बाद आज दोपहर ढाई बजे के करीब  घर लौट आये हैं. इस बार की यात्रा में दिगबोई को करीब से देखने का अवसर मिला है. हॉर्न बिल गेस्टहाउस में एक पुस्तकालय था. जहाँ हिंदी की किताबें रखी थीं. हिंदी के पहले कवि ‘सरहपा’ पर एक किताब थी, थोड़ी सी पढ़ी. उसमें जीवन को सहज भाव से जीने की प्रेरणा दी गयी है. गुरूजी भी कहते हैं, सहज रहो. वे व्यर्थ ही असहज हो जाते हैं और जीवन से दूर चले जाते हैं. प्रकृति और यह विशाल ब्रहमांड प्रतिपल गतिमय हैं. हर क्षण यहाँ कुछ न कुछ घट रहा है और यह इतना विराट है कि छोटी सी बुद्द्धि में समा नहीं सकता, तो इस बुद्द्धि को किनारे रखकर सहज होकर इस सबके साथ स्वयं को जोड़ना ही साधना है. सारी प्रकृति के साथ एकत्व महसूस करना ही तो उनका लक्ष्य है. अहंकार उन्हें असहज बना देता है. दिगबोई में पूजा देखने का अनुभव बहुत अच्छा रहा. आनंद पारा और शांति पारा के पंडाल बहुत सुंदर थे. मिशन व काली बाड़ी की पूजा भी कम नहीं थी. एक मन्दिर में भी भव्य पूजा थी, इसके अलावा एक छोटा सा पंडाल और देखा जिसकी तस्वीर भी उतारी. कार में बैठ-बैठे तो  न जाने कितनी सारी पूजाएँ देखने का मौका मिला. दुर्गा, लक्ष्मी, व सरस्वती की भव्य प्रतिमाएं तथा गणेश व कार्तिकेय की सुंदर प्रतिमाएं सभी मन को एक अनोखे लोक में ले जाती हैं, कितने सारे लोगों के श्रम और कल्पना का परिणाम होता है कोई भी पूजा मंडप ! दुर्गा देवी की आँखों में करुणा की एक धारा बहती हुई प्रतीत होती है, लक्ष्मी व सरस्वती की मूर्तियों से आनंद की. आज सुबह वे दिगबोई का पक्षी विहार देखने भी गये जो तेल क्षेत्र में स्थित है. यहाँ एशिया का प्रथम तेल कूप भी है. १९०१ में ही यहाँ पहली रिफाइनरी ने काम करना आरम्भ कर दिया था. आसाम तेल कम्पनी ब्रिटिश की बनाई हुई थी, आजादी के बाद भी कई वर्षों तक काम करती रही. यह एक साफ-सुथरा व्यवस्थित शहर है और यहाँ की विशेषता है छोटी-छोटी पहाड़ियों पर बने असम टाइप सुंदर बंगले !  कल सुबह वे प्रातः भ्रमण के लिए दिगबोई के गोल्फ मैदान में गये, जो तीन तरफ से दिहिंग फारेस्ट रिजर्व से घिरा हुआ है. यह असम का पहला अठारह होल का गोल्फ कोर्स है और अपर असम का सर्वोत्तम, इसके चौथी तरफ अरुणाचल के पर्वत नजर आते हैं. इस समय रात्रि के साढ़े सात बजे हैं. कुछ देर पहले माली द्वारा बगीचे से ढेर सारे घोंघे (स्नेल) उठवाये और उन्हें सड़क के उस पार छोड़ आने को कहा, लॉन में इतनी हरी घास होने के बावजूद वे नये नन्हे पौधों को खा जाते हैं.  

आज बहुत दिनों बाद सुबह धौति क्रिया की. तन हल्का लग रहा है. सुवचन सुने. जून कल देहली गये थे, परसों लौटेंगे. ‘यूनिवर्स’ संस्था से भेजे मेल में संदेश आया है कि परमात्मा उन्हें  हर पल देख रहे है. उनके ही भावों के अनुरूप उनके भविष्य का निर्माण पल-पल होता रहता है. जैसे गोयनका जी कहते थे, हर अगला क्षण पिछले क्षण की सन्तान है. तो अगर वे इस क्षण परमात्मा के साथ है, अगले क्षण भी होंगे और उसके अगले क्षण भी. फिर एक श्रंखला ही बन जाएगी और उनके भीतर जो भी चाह उठेगी, वह सात्विक ही होगी, क्योंकि साथ जो सत् का होगा. संत कहते हैं, मानव देह परमात्मा का मन्दिर है. इसी में ही परमात्मा का अनुभव सम्भव है. मन मनुष्य निर्मित है, समाज का दिया हुआ है, कृत्रिम है, अशांति का अनुभव मन ही करता है. मृत्यु यदि अभीप्सित है तो मन की ही है. देह नैसर्गिक है, प्रकृति से मिली है, प्राण जो इस देह को चला रहे हैं, परमात्मा से जोड़े ही हुए हैं. देह, जल आदि पंच तत्वों से बनी है, तभी तो जल और वायु का स्पर्श उसे पुलक से भर देता है. कण-कण में परमात्मा की चेतना है, उसी चेतना को उन्हें अपने भीतर जगाना है. मन ही इसमें बाधा बना हुआ है. मन, प्राण और वचन यदि सौम्यता में स्थित  हों तो चेतना प्रखर हो उठती है और देह से प्रकट होने लगती है.

Wednesday, July 26, 2017

अनानास की मिठास


उस दिन दिगबोई में भाई और उसके परिवार के साथ जब वे सब दिगबोई पीक पर थे एक तितली उसके माथे पर आकर बैठ गयी थी. उस समय तो महज एक सुखद आश्चर्य मात्र लगा था, पर बाद में सोचा तो लगा, वह कोई संदेश देकर गयी थी, उस अनाम का संदेश....कि वह सदा उसके साथ है, वही तो है. वह स्वयं अब नहीं रह गयी है. कभी-कभी अचरज भी होता है, अपना आप अजनबी लगता है, सारे विचार जो एक वक्त में बड़े कीमती लगते थे अब व्यर्थ ही लगते हैं. एक मौन पसरा रहता है भीतर जो अपना लगता है. शब्द भी नहीं गूँजते भीतर ! तभी तो कोई कविता भी नहीं लिखी कई दिनों से !

कल शाम आज की सेल की तैयारी में बीती. क्लब की तरफ से वर्ष में दो-तीन बार यह सेल लगती है. बड़े से हॉल में मेजें लगवाना फिर उनपर सफेद मेजपोश और विक्रेताओं के बैठने के लिए कुछ कुर्सियां, वस्त्र लटकाने के लिए लोहे के स्टैंड अदि रखवाना, कुछ अन्य महिलाओं के साथ सारा काम खत्म करते-करते आठ बज गये थे. आज सुबह स्कूल जाना था, दोपहर को क्लब गयी. कुछ खरीदारी भी की. पता चला उसका नाप बढ़ गया है, उम्र बढ़ने के साथ-साथ वे भोजन तो कम करते नहीं, व्यायाम कम कर देते हैं. घर का काम भी कितना कम रह गया है. जून कल दोपहर आ जायेंगे, जब वह बच्चों की संडे क्लास ले रही होगी. अब वह नहीं कहते कि उनके घर आने पर उसे घर में ही रहना चाहिए, वह आत्मनिर्भर बनते जा रहे हैं. नन्हा आज व्यस्त होगा, तीस घंटों के लिए एक प्रतियोगिता होने जा रही है, उसे आज सुबह वहाँ जाना था. आज बगीचे से एक अनानास तोड़ा, जिसे पक्षियों ने चख लिया था, मीठा है बहुत. घर में बगीचा हो तो कितना अच्छा है न..बड़ी भतीजी ने लिखा है, स्वर्ग की तरह है उनका घर, सचमुच ..स्वर्ग ही तो है, जहाँ देवता रहते हैं !


कल यात्रा पर निकलना है, अभी तक पूरी पैकिंग नहीं की है. जून आज बहुत व्यस्त हैं, उनकी नयी प्रयोगशाला का उद्घाटन होना है. सीएमडी आने वाले थे, अब तक तो हो गया होगा. शाम के पांच बजे हैं, लगातार होती वर्षा के कारण मौसम ठंडा हो गया है. वह पिछले एक घंटे से साहित्य अमृत पढ़ रही थी. ज्यादा बोलने वाली सखी का फोन आया, वह कलाकार है. पानी के रंगों से सुंदर चित्र बना रही है और फेसबुक पर पोस्ट कर रही है. अच्छा है, उसके जीवन को एक ठहराव मिलेगा इससे और ढेर सारा सुकून भी. कल वह ब्लॉग पर विदाई संदेश लिखेगी, वापस आकर ही होगा लेखन कार्य. इस दीवाली पर उन्हें काफी लोगों को बुलाना भी है. जीवन का यह कितना सुंदर मोड़ है, बैंगलोर में हो सकता है गुरू दर्शन भी हो जाये. सद्गुरू से एकत्व की अनुभूति हर क्षण होती है. अब कुछ करे या न करे भीतर एक से रंग(मौसम)रहते हैं. एक अटूट मौन और शांति..एक सहजता और एक अखंडता..एक असीमता भी..

Saturday, July 22, 2017

दिगबोई गोल्फ फ़ील्ड


सुबह जून ऑफिस गये तो वर्षा हो रही थी, उसने एक घंटा ‘वर्षा ध्यान’ करते हुए बिताया, मन को अपने घर में कितना सुकून मिलता है. सुकून यानि एक ऐसा रस जो कभी घटता-बढ़ता नहीं. गणेश पूजा का उत्सव कल यहाँ सम्पन्न हो गया, अब दुर्गा पूजा के उत्सव की तैयारी है. दो दिन बाद मृणाल ज्योति जाना है, अपने स्कूल भी, इस बार शिक्षक दिवस मनाना है. उसके लिए एक कविता लिखनी होगी. उसने मन ही मन वे सभी बातें भी दोहरायीं जो वह भूमिका में बता सकती है. महान शिक्षाविद् डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में सन बासठ से यह दिवस मनाया जा रहा है. यह दिन शिक्षकों के उस अथक परिश्रम की याद दिलाता है जो वे विद्यार्थियों के हित के लिए अनवरत करते हैं. इस दिन विद्यार्थी अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं. समाज को उन शिक्षकों का ऋणी होना चाहिए जो बच्चों के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलाकर उन्हें जीवन में निरंतर विकास के योग्य बनाते हैं. बच्चों को शिक्षित करना, संस्कारित करना, जीवन का निर्माण करना शिक्षक का ही कार्य है. कल से उसने गणित पढ़ाना शुरू किया है, अच्छा लग रहा है, धीरे-धीरे सब याद आ रहा है. जीवन कितना-कितना लुटाता है. उनकी ही झोली छोटी होती है जो समेट नहीं पाते वे.

आज सुबह सुना साधक को शास्त्र इसलिए पढ़ने चाहिए कि वे उन्हें उनकी स्थिति से अवगत कराते रहें. वर्षों पहले पहली बार ‘योग वशिष्ठ’ पढ़ी थी. आज से पुनः पढ़ना आरम्भ कर रही है. परमात्मा अनंत है, उसको जानना तो असम्भव है. उसकी एक झलक मात्र ही मिल जाती है कभी-कभी, वह भी उसकी कृपा से ! अगले हफ्ते मेहमान आ रहे हैं, वे लोग आयें तो उन्हें किसी असुविधा का सामना न करना पड़े उन्हें इसका ध्यान रखना होगा. नैनी के घर से झगड़ने की आवाजें आ रही हैं, नशा करके घर के आदमी लड़ने की सिवा कर ही क्या सकते हैं, नर्क इसी को कहते हैं.

पिछले दिनों कई अद्भुत स्वप्न देखे. कल स्वयं को देखा जब बहुत छोटी थी. एक-एक करके सारे संस्कार मिट रहे हैं. उनका दर्शन ही उनसे मुक्त कर सकता है. अभी भाई का फोन आया, वे लोग ट्रेन में बैठ चुके हैं, यात्रा का आरम्भ हो चुका है. कल वह यहाँ होगा परिवार के साथ, यह बात ही कितना सुकून देती है. कल के बाद पांच दिन एक सुखद स्वप्न की तरह बीत जायेंगे.

आज पूरे पांच दिन बाद कुछ लिख रही है. जिस दिन वे आये शाम को उन्हें लेकर आस-पास का इलाका दिखने ले गयी, फिर अगले दिन सुबह ही सैर करने वे रोज गार्डन गये, अभी कुछ ही पल हुए थे कि वर्ष शुरू हो गयी, घर आकर भी वे सभी देर तक भीगते रहे और गाते रहे, बचपन की स्मृतियाँ सजीव हो उठीं. उसके बाद वह उन्हें क्लब तथा को ओपरेटिव स्टोर ले गयी. शाम को जून ने आयल क्लेक्टिंग स्टेशन दिखाया. बाद में चाय बागानों में घूमने गये, सभी ने खूब तस्वीरें खिंचायीं. तीसरे दिन सब दिगबोई गये, जहाँ संग्रहालय, दिगबोई पीक, गोल्फ फील्ड तथा शताब्दी पार्क देखा. गोल्फ फील्ड में छोटी-छोटी पहाड़ियों से ढलानों पर लुढकते हुए नीचे आने के वीडियो बनाये जो वर्षों बाद देखने पर भी मन को हर्षित करेंगे. चौथे दिन वे सभी अरुणाचल प्रदेश गये, पांचवे दिन आगे की यात्रा के लिए वे सभी गोहाटी चले गये. परसों विश्वकर्मा पूजा है.   


Tuesday, March 11, 2014

नये स्कूल में पहला दिन


आज का इतवार कुछ अलग है, जून सुबह नौ बजे ही नाश्ता करके निकल गये, दो बजे लौटे. नन्हा यहीं पडोस में किसी के यहाँ पिकनिक पर गया है. मौसम आज गर्म है, कुछ देर पूर्व कुछ बूँदें पड़ीं फिर थम गयीं. कल दोपहर भर और सुबह भी नन्हा टेनिस खेलता रहा, धूप से चेहरा लाल हो गया पर जोश कम नहीं था. वह DPS जाने के लिए तैयार हो गया है, अब कुल मिलाकर बीस बच्चे हो गये हैं जो यह से जायेंगे.

कल फिर उड़ीसा और बंगाल के तटवर्ती इलाकों में तूफान आया सो यहाँ भी बदली फिर छाई है, उन्हें थोड़ी देर बाद दिगबोई के लिए निकलना है, नन्हे की फ़ीस जमा करनी है, ड्रेस व किताबें खरीदनी हैं. कल से वह स्कूल जाएगा. सुबह उसे उठाया तो अपने खराब मूड में था, शायद नींद से उठाने पर बच्चों का ऐसा ही मूड रहता हो, शायद उन्हें सपनों से जगाया जाना नागवार गुजरता हो. वह सुबह-सवेरे ही उस पर झुंझला गयी, कुछ देर वह उदास रहा फिर सामान्य हो गया. कल से उसे और भी जल्दी उठाना होगा, देखें क्या होता है, कहीं उनकी सुबहें करुण दृश्यों से न भर जाएँ ! कल शाम उसने नन्हे को संज्ञा के भेद, उदाहरण आदि पढाये, जाने से पूर्व सर्वनाम भी पढ़ाना है. उसने देखा है, अक्सर उसके जबड़े एक दूसरे पर दबाव डालते हैं. तनाव ग्रस्त होने पर ऐसा होना स्वाभाविक है, पर सामान्य अवस्था में भी ध्यान न देने पर ऐसा हो जाता है. शायद नींद में भी ऐसा होता होगा. नींद में तरह-तरह के विचार एक के बाद एक मन में आते हैं. जिनका आपस में कोई तारतम्य नहीं होता न ही कोई अर्थ निकलता है. ध्यान किये हफ्तों बीत गये हैं. नन्हे के DPS जाने पर सुबह वक्त मिल सकेगा.
आज नन्हा पहली बार अपने नये स्कूल में नई कक्षा में बैठा होगा, सुबह वह पांच बजे उठी, सवा  पांच बजे उसे उठाया और साढ़े छह बजे तक ही जून और वह दोनों तैयार थे. आज उसका रिजल्ट भी निकलने वाला है. पड़ोस का बच्चा ले आएगा. उसकी कुछ किताबें नहीं मिली हैं, स्वेटर भी बाजार बंद होने के कारण नहीं मिला. कल शाम वह पुराना गृह कार्य करता रहा. रात वे जल्दी सो गये ताकि सुबह तरोताजा होकर जल्दी उठ सकें. नन्हे का स्कूल का अनुभव ही बतायेगा कि उनका उसे दिगबोई भेजने का निर्णय सही है या गलत. आज जून को अपना पेपर प्रस्तुत करना है. इतवार को उन्हें बाहर जाना है. आज कृष्णामूर्ति की पुस्तक में पढ़ा कि जीवन में क्रम स्वयंमेव आना चाहिए प्राकृतिक रूप से, ऊपर से थोपी हुई कोई भी वस्तु स्वाभाविक नहीं होती और न ही उसका असर होता है. प्रत्येक मानव यदि अपने स्वाभाविक रूप में रहे तो द्वंद्व पैदा ही न हो.

कल नन्हे का रिजल्ट आया और जैसी कि उन्हें उम्मीद थी वह अपने सेक्शन में प्रथम आया है. वैसे वह इससे भी अच्छा कर सकता है, कल उसका पहला दिन अच्छा रहा, शाम को आया तो खुश था, कल से कई लोगों ने बधाई दी है, कुछ लोग पूछते हैं कि नन्हे को DPS में दाखिला कैसे मिला आदि. उनकी ख्वाहिश थी कि उसे अच्छे स्कूल में पढ़ायें सो ईश्वर ने पूरी कर दी है. आज बहुत दिनों बाद उसने पीटीवी पर एक ड्रामा देखा, दिल को छू जाते हैं भोले भाले किरदार, अपने बेहद अपने लगते हैं. आज सुबह उसने ‘रामकुमार भ्रमर’ की एक कविता रजनी बाला पढ़ाई, उस छात्रा को अपनी लिखी एक कविता भी दिखाई. पिछले पूरे हफ्ते वह DHC के लिए नहीं पढ़ सकी. अर्थात हिंदी लेखन के कोर्स के लिए.