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Wednesday, April 9, 2014

नामघर का पुजारी


कल शाम जब जून ऑफिस से आए तो अभी तीन ही बजे थे, नन्हा भी उसी वक्त आ गया, उन्होंने रोज की तरह चार बजे तक नाश्ता खत्म किया. जून को डेंटिस्ट के पास जाना था और नन्हे को कम्प्यूटर क्लास, उसे किचन में काम था. सभी कुछ ठीक था फिर शाम पौने छह बजे वह क्लब गयी, लौटी तो उसकी आँखों में दर्द था, नन्हा आया तो उसका चेहरा उतरा हुआ था. कार न होने के कारण उसे साइकिल से जाना पड़ा था, थकान से या अन्य किसी कारण से वह ठीक महसूस नहीं कर रहा था. सुनकर नूना का दर्द और बढ़ गया और बिना डिनर खाए वे तीनों ही जल्दी सो गये. सुबह वह तो ठीक थी पर नन्हे को हल्का बुखार था.

आज इतवार को ‘नामघर’ से कुछ लोग चंदा मांगने आये, उन्होंने लाल गमछा ओढ़ा हुआ था, हाथ में कुछ पारंपरिक वाद्य यंत्र भी थे, श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे. जून ने उनमें से एक का नमस्कार सुनते ही कहा, ‘हम चंदा नहीं देते’. पर वापस आकर उन्हें लगा चार-पांच व्यक्ति घर-घर जाकर इस तरह क्यों मांग रहे हैं, जबकि कोई उन्हें कुछ देने को तैयार नहीं है. वह पहले कभी इतना सोचते नहीं थे. आज सुबह उठकर उन्होंने सारे घर का जाला भी साफ किया वैक्यूम क्लीनर की सहायता से. सुबह दोनों घरों पर बात की, माँ से बात करके उसे लगा वह कुछ उदास हैं, ननद से बात करके महसूस किया, उसमें काफी आत्मविश्वास है.

सुबह नन्हा उठा तो डल था, शनिवार को स्कूल नहीं गया था, पर आज उसका टेस्ट है, कल जिसकी तैयारी भी की थी. उसे लगा वह थोड़ी तकलीफ सह सकता है. ईश्वर उसे शक्ति देगा और वह स्वस्थ होकर घर आएगा, लिखते हुए उसने सोचा, जून भी नन्हे के बारे में ही चिंतित होंगे, सुबह वह उसे स्कूल भेजने के पक्ष में नहीं थे पर उसने कई तरह से उन्हें समझाया, फिर बाद में महसूस भी किया वह कोई बच्चे तो नहीं, पर क्या कई बार बड़ों को भी सलाह की जरूरत नहीं पड़ जाती.

कल वे नन्हे को होमोयोपथिक डाक्टर के पास ले गये. उसे AC चलाकर सोने के लिए मना किया है. कल ‘गणेश पूजा’ के कारण जून के दफ्तर में छुट्टी थी. एक पुराने मित्र को लंच पर बुलाया था, इतवार की शाम वे अचानक मिलने आ गये थे, जून जब उन्हें छोड़ने गये तो ‘हल्दीराम की सोनपापड़ी’ का एक डिब्बा उन्होंने दिया. जो फ्रिज में रखने के बाद कैसे चिपक सी गयी है. रात्रि को उसे पहले तो गर्मी के कारण नींद नहीं आई फिर परेशान करने वाले स्वप्न देखती रही, नन्हे के स्वास्थ्य को लेकर हुई चिंता के कारण आये सपने. मेडिकल गाइड में ‘ब्रोंकाइटिस’ के बारे में कल काफी कुछ पढ़ा था, वही सत्य होकर रात को भयानक लग रहा था. सुबह के सारे कार्य करते और दो लेख पढ़ने के बाद जिनमें से एक डेल कार्नेगी का था और दूसरा जे कृष्णामूर्ति का, मन कुछ संयत हुआ है. दोनों के विचार प्रेरणा देते हैं, जीवन को बहुत करीब से देखने की, सही मायनों में जीने की और मानसिक आवश्यकता को भी पूर्ण करते हैं अर्थात कुछ सोचने को विवश करते हैं. नन्हा कल से बेहतर है. आज दोपहर को उनके बाएं तरफ की पड़ोसिन आएगी, उससे सिन्धी कढ़ाई का टांका सीखने, जो उसे भी पुनः याद करना पड़ेगा. अभी तो उसे कपड़े धोने हैं, BPL वाशिंग मशीन के सौजन्य से. कल शाम बच्चों ने एक प्रश्नावली दी working mothers vs house wives, जो उसकी जगह नन्हा ही भर देगा.

कल समाचारों में सुना, मिलावटी सरसों का तेल खाने से कुछ लोगों की मृत्यु हो गयी और कितने ही अस्पताल में हैं. उसे आश्चर्य हुआ, अल्प लाभ के लिए कुछ व्यापारी कितना नीचे गिर जाते हैं. कल शाम जून के एक मित्र आये उनके कम्प्यूटर पर कुछ cd चलाकर देखने जो उनके यहाँ नहीं चल पा रहे हैं, उसे बुनते देखकर कहा, सर्दियों की तैयारी शुरू हो गयी. मोज़े जो उसने पिछले हफ्ते शुरू किये थे अभी तक नहीं बन पाए हैं, घर में बच्चा अस्वस्थ हो तो सारा ध्यान उधर ही रहता है फिर आजकल वे टीवी बहुत कम देखते हैं, पिछले साल टीवी देखते उसने बुनने का काफी काम किया था. जून ने उसके नाम से दो ड्राफ्ट भेजे हैं फिक्स्ड डिपाजिट के लिए, वह उसे पिछले पन्द्रह वर्षों में की गयी हर छोटी-बड़ी बचत के बारे में बताना भी चाहते हैं.





Wednesday, March 20, 2013

डॉक्टर्स की कहानी



नए वर्ष का प्रथम दिवस, नये साल के पहले दिन कई अच्छी बातें हुईं, वे पाइप के पुल पर घूमने गए, बूढी दिहिंग नदी के किनारे दूर-दूर तक रेत फैली थी, नन्हे ने रेत का छोटा सा घर बनाया. कल रात देर तक टीवी पर कार्यक्रम देखने के कारण सुबह नींद देर से खुली, गार्डन में मेरीगोल्ड, फ्लौक्स, एक अनाम फूल, तथा शाकवाटिका में धनिये, पपीते तथा मटर के बीज लगाये. 
  जीवन का कटु सत्य भी बार-बार सामने आता रहा, जिससे भी अपेक्षा रखो यहाँ निराशा ही मिलती है और मन आहत होता है. यह पीड़ा ही शायद उसकी नियति है या वह अपेक्षा ही ज्यादा रखती है. यदि किसी से उसके किये गए वायदे को निभाने की अपेक्षा रखना अधिक है या विवाह की सालगिरह आने पर अपने लिए ज्यादा आत्मीय सम्बोधन की अपेक्षा रखना. उचित यही होगा कि वह किसी से भी कोई अपेक्षा कभी न रखे. कहीं इसका कारण यह तो नहीं कि वह “Great Expectations” पढ़ रही है आजकल ! उसके थोड़ा सा उदास होने पर नन्हा परेशान हो जाता है और जून झुंझला जाते हैं, और उसे महसूस होता है कि उसकी खुशी ही उनकी पहली चाहत है. रविवार की दोपहर को जून के बनाये गाजर के हलवे की सभी ने तारीफ की. शाम को वे दोनों जब घूमने गए तो इस मौसम की पहली शीतलहर चेहरे पर महसूस की, इस साल यहाँ ठंड काफी कम है.

  कल जून देहरादून जाने वाले हैं, दोपहर तक यह ख्याल मन को बेचैन नहीं कर रहा था, पर अब धीरे-धीरे उदासी की हल्की परत मन पर छाने लगी है. जून इतना ख्याल रखते हैं उसका व नन्हे का. उनकी हर छोटी से छोटी बात में वह शामिल हैं. आज दोपहर को ‘पिप’ की कहानी आगे पढ़ी, और नन्हे के टूटे हुए पैराशूट को ठीक किया. उसकी छात्रा ने कार्ड के लिए धन्यवाद दिया और नन्हे को उसके मित्र ने एक कार्ड दिया. ऐसी छोटी-छोटी घटनाएँ फिर से विश्वास दिलाती रहती हैं कि जीवन इतना कठोर नहीं कि उदास हुआ जाये. दोनों छोटे भाइयों के कार्ड भी मिले, पत्रों के लिखने का दिन था, पर हर हफ्ते फोन पर बात हो जाती है जून की, पत्रों की अहमियत कम हो गयी है.

नीले से फिर हुआ सलेटी, काला होता अम्बर
नृत्य अनोखा करते पत्ते हवा बहे जब सर सर,
टप टप बूंदें बरस पडीं लो तेज हुआ वर्षा स्वर
बिजली चमकी मेघ गरजते, समां बंधा कितना सुंदर !

 आज जून को गये पहला दिन है, उसके लिए स्वेटर बना रही है.  टीवी के सामने काफी देर बैठे रही, शाम को टहलने गयी नन्हे के साथ. सो दिन कैसे बीत गया पता ही नहीं चला. माली आया था पानी का नल खोल तो दिया पर उससे बंद ही नहीं हुआ, कल उसे ठीक करवाना है.  शाम को ‘सरस्वती पूजा’ का चंदा मांगने एक दल आया था, जिन्हें शिक्षा से कोई मतलब नहीं ऐसे लोग पूजा के नाम पर मौज करते हैं, जून होते तो मना करते, पर उसने दे दिया. नन्हा कह रहा है कल वह स्कूल नहीं जायेगा, छुट्टियों के बाद पहले दिन पढ़ाई नहीं होती है. उसने लकड़ी के बक्से से सारी चम्पक निकालीं, इस वक्त उनमें से एक पढ़ रहा है. दिन भर वह कुछ भी करती रही पर जून का ख्याल हमेशा साये की तरह लगा रहा.

 एक दिन और बीत गया, उसकी बंगाली सखी का फोन आया उसके बगीचे से गुलाब के पौधे चोरी हो गए, सुनकर व सोचकर उसे बहुत दुःख हुआ, वह कितनी उदास रही होगी. आज सुबह नन्हा उसे गुलदस्ते के लिए फूल तोड़ने से मना कर रहा था वह रूठ ही गया इस बात पर कि फूलों को दर्द होगा. पड़ोस का बच्चा भी स्कूल नहीं गया, वह अपनी माँ के साथ सुबह आया था. दोनों खेलते रहे. शाम को उसे लेकर टहलने गयी, झूला पार्क दिखाया नन्हे ने. कुछ देर बैडमिंटन खेला. “डॉक्टर्स” किताब के कुछ पृष्ठ पढ़े. कुछ देर पहले सोच रही थी, अब जब भी समय मिलेगा लिखेगी, एकांत खोजते-खोजते कभी एकांत नहीं मिलता और जब मिलता है तो कविता नहीं बनती, रचना और जीवन जब एक हो जायेंगे, तब हर वक्त मन कुछ रच जाने के काबिल रहेगा. किसी खास वक्त का मुहताज नहीं रहेगा.