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Thursday, June 18, 2020

पावर ऑफ़ नाउ


आज ठंड अपेक्षाकृत अधिक है. सुबह वे उठे तो कोहरा बहुत घना था. प्रातः भ्रमण के लिए देर से निकले पर उतनी ठंड में भी एक व्यक्ति को सामान्य कमीज पहने दौड़ लगाते देखा. मानव की सर्दी-गर्मी सहने की क्षमता व्यक्ति सापेक्ष है. नेहरू मैदान में तेज बत्तियां जल रही थीं, दिन-रात वाले फुटबॉल मैच चल रहे हैं वहाँ तीन दिनों के लिये. एक युवा संस्था करवा रही है कम्पनी की सहायता से. आज भी किसी ‘बंद’ की बात थी पर कम्पनी खुली है. एनआरसी और सिटीजनशिप बिल को लेकर उत्तर-पूर्व में वातावरण काफी अस्थिर बना हुआ है. इस समय कमरे में धूप आ रही है और धूप की गर्माहट भली लग रही है. कल दोपहर मृणाल ज्योति गयी, उसकी संस्थापिका कह रही थीं भविष्य में उनके न रहने पर उनकी दिव्यांग पुत्री अकेली न रह जाये इसलिए वह कुछ वर्षों बाद अपने रिश्तेदारों के पास रहेंगी. माँ का दिल कितनी दूर की सोच रखता है. उनके बाद स्कूल कौन सम्भालेगा इसकी भी चिंता उन्हें होती होगी. कल शाम भजन से पूर्व गले में खराश हुई और ॐ का उच्चारण नहीं कर सकी, देह एक मशीन की तरह ही है, कहीं कुछ फंस गया और मशीन ठप ! एक छोटा सा खाकी रंग का कुत्ते का बच्चा बरामदे में आकर बैठा था कल, उसे कुछ खाने को दिया तो दूर तक छोड़ आने के बावजूद थोड़ी ही देर में वापस आ जाता था, उसका दिशा बोध कितना प्रबल रहा होगा. वे उसे घर में नहीं आने दे रहे थे, शायद रोग का भय था, उसे कोई टीका भी नहीं लगा होगा. परमात्मा ही उसकी रक्षा करते रहे हैं आजतक, आगे भी करेंगे. बाहर मैदान से बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही हैं, ये बिना थके शाम तक खेलते रह सकते हैं. 

टीवी पर प्रधानमंत्री का भाषण आ रहा है जो वह बीजेपी के राष्ट्रीय अधिवेशन में दे रहे हैं. महिला सशक्तिकरण की बात की, फिर किसानों की समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया. उनकी आवाज में बल है और भारत को आगे ले जाने का दृढ संकल्प भी. ‘पावर ऑफ़ नाउ’ वर्षों पहले पढ़ी थी, कल से दुबारा पढ़ रही है, पढ़ते-पढ़ते ही अनुभव घटने लगता है. वर्तमान में रहने का जो मन्त्र ज्ञानी देते आए हैं उसका सर्वोत्तम चित्रण इस पुस्तक में हुआ है. अगले सप्ताह वे अरुणाचल प्रदेश जा रहे हैं एक रात के लिए. शाम को क्लब में एक विज्ञान फिल्म दिखाई जाएगी, रजनीकान्त की हिंदी में डब की गयी फिल्म.  

उस दिन यानि वर्षों पूर्व सुबह साढ़े छह बजे पिताजी द्वारा आवाज लगाने पर नींद खुली तो एक स्वप्न टूट गया. स्वप्न, जो काफी देर से चल रहा था. स्वप्न जो सुंदर था... सुखद था. पता नहीं किस खेत में काम कर रहे थे वे लोग, साथ-साथ बातें भी. फिर घर आये. सबको पता चल गया. मिटटी से सने हाथ, हल चलाते हुए लगी होगी या .. कुछ याद नहीं. फिर स्वप्न में ही एक पत्र मिला और ‘मेरे संसार; ऋषियों की बातों से भरी किताब, श्लोकों और आख्यानों को उसमें देख वह चकित थी फिर दक्षिण भारत का भ्रमण  और सुंदर दृश्य... बस सब बातों की एक बात कि स्वप्न अच्छा था. कालेज में ‘फिलॉसफी ऑफ़ हार्डी’ पर एक सेमिनार था, मध्य में एक गजल की प्रस्तुति... मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता.. ऐसी ही कुछ. कल भारत बन्द का आयोजन है विपक्षी दलों द्वारा. बस में एक वृद्ध ने पेन्सिल खरीदी,  लिखने के लिए सिगरेट की डिब्बी का ढक्कन, उसने उसे एक कागज अपनी कापी का दिया, वह खुश हुआ होगा पर उसने ऐसा जाहिर नहीं किया. बस ड्राइवर ने बस गेट से काफी आगे रोकी, वह क्रोध में भी था.अब से वह सबसे आगे वाली सीट पर बैठेगी, या फिर खड़े होना भी ठीक है ताकि उसे पहले से बता सके. 

Monday, January 21, 2019

महाप्राज्ञ की सीख


वे घर लौट आये हैं, दो दिन सफाई व घर को व्यवस्थित करने में लग गये. आज भी ठंड ज्यादा है. मौसम बदली भरा है, सुबह कुछ देर के लिए धूप निकली थी पर इस समय शाम के चार बजे हैं, आकाश सलेटी-श्वेत बादलों से भर गया है. कल क्रिसमस था, घर पर ही बच्चों के साथ मनाया. कल मृणाल ज्योति जाना है. लिखने का कार्य अभी आरम्भ नहीं हो पाया है.

यह वर्ष समाप्त होने में तीन दिन ही शेष हैं. अभी-अभी बंगाली सखी से बात की. नये वर्ष की पूर्व संध्या पर या पहली जनवरी को नये वर्ष के लिए आमंत्रित किया. वह बहुत उत्साहित तो नहीं दिखी. भविष्य ही बतायेगा, क्या होता है. आज यहाँ कोहरा, शीत लहर और ठंड सभी अधिकता में हैं. बहुत दिनों बाद आचार्य महाप्राज्ञ को सुना, प्रेक्षा ध्यान व कायोत्सर्ग के बारे में भी सुना. किसी एक समय उसने कई दिनों तक यह ध्यान किया था. मंजिल तक पहुँची नहीं, पड़ाव को ही मंजिल मानकर जो वह बैठ गयी है उसका असर स्पष्ट दिखने लगा है, सचेत हो जाना होगा. संत ने कहा, ‘वाणी का प्रयोग भी सम्यक हो, मित भाषिता, मिष्ट भाषिता, सत्य भाषिता यदि वाणी में न हों तो दोष ही कहा जायेगा. बात को लंबा खींचना भी दोष है तथा वाणी में सार का न होना भी दोष है. मित भाषी व सार युक्त बोलने वाला सुखी रहता है’. उसने सोचा, ध्यान को पुनः नियमित करना होगा तथा शास्त्रों का पठन–पाठन भी, मन पर जरा भी विश्वास नहीं किया जा सकता, यदि साधक ऊपर नहीं जायेगा तो मन नीचे जाने के लिए तैयार ही बैठा है. कल सभी को नये वर्ष के कार्ड्स भेजे हैं, अभी भी कुछ कार्ड्स शेष हैं जो भेजे जा सकते हैं.

कुछ देर पूर्व बाहर धूप में विश्राम किया, लॉन में धूप बिखरी हुई है जो वे बंगलूरू के फ़्लैट में खोजते थे. आज शाम को एक मित्र परिवार चाय पर आएगा, दो बड़े, दो बच्चे. अभी शाम की तैयारी करनी है. जून के दफ्तर में वीडियो कान्फ्रेंस थी, लंच के लिए देर से आये दस-पन्द्रह मिनट के लिए, उसने डेढ़ घंटा प्रतीक्षा की पर भोजन अकेले ही करना पड़ा. जून ने कल गेहूँ की घास का चूर्ण मंगवाया और चिया सीड्स यानि तुलसी के बीज भी, वह अपने स्वास्थ्य का बहुत ध्यान रख रहे हैं. उनका एक चित्र जो ऑफिस में एक फोटोग्राफ़र ने खींचा है, उनकी स्वास्थ्य के प्रति निष्ठा को दर्शाता है. सुबह एक योग साधिका का फोन आया, उसकी सास का कल रात देहांत हो गया. चार महीने की लंबी बीमारी के बाद पिछले शुक्रवार को उन्होंने भोजन त्याग दिया था. कल ही परिवार ने उनकी आत्मा की मुक्ति के लिए प्रार्थना करवाई थी. वह दो-तीन बार उन्हें देखने अस्पताल गयी थी. उनका चेहरा शांत लगता था, पर कभी-कभी वह अनर्गल वार्तालाप करने लगती थीं. शायद उन्हें भी डेमेंशिया का रोग था.    

Wednesday, October 12, 2016

अ टाउन कॉल्ड मालगुडी

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तीन दिन देखते-देखते बीत गये, उत्सव के दिन. लिखने का समय ही नहीं मिला. आज सुबह से बदली छायी है. कल रात भर वर्षा होती रही, ठंड बढ़ गयी है. उसने दो स्वेटर पहने हैं. फिर भी ध्यान में कंपकंपी होने लगी थी. सुबह-सुबह बाबा रामदेव मात्र धोती पहने योग सिखाते हैं. जून शिवसागर गये हैं, शाम तक आ जायेंगे. सुबह पिताजी ने कहा, रात को तीन बजे उठने पर उन्हें ठंड लगी, उसे ऊनी टोपी बनाने को कहा है. उसने कहा, उठते ही कुछ पहन लेना चाहिए, आल्मारी में उनके लिए मफलर व ऊनी मोज़े भी रखे हैं, पर वे पहनना नहीं चाहते. उन्हें इस बात से ही ख़ुशी होगी कि उसने उनके लिए टोपी बनाई, पहनें या नहीं, इससे ज्यादा अंतर नहीं पड़ता. जून ने कहा, वे चाहते हैं कोई उन्हें याद दिलाये. इंसान अपनी भी जिम्मेदारी उठाना नहीं चाहता. उधर छोटी ननद उनके बिना अकेलापन महसूस कर रही है, वे लोग चाहते हैं घर के पास तबादला हो जाये. मानव को कितने प्रकार के भय सताते हैं. आज वर्षों पहले मंझले भाई द्वारा डायरी में लिखी कविता से प्रेरित होकर लिखी कविता ब्लॉग पर डाली. सुबह दृश्य और द्रष्टा के भेद का वर्णन सुना. सुख में छिपे दुःख को पहचानकर उससे मुक्ति पाने का उपाय समाधि है.

आज धूप निकली है अपने घर से, बल्कि कहें कि बादलों ने उसका रास्ता नहीं रोका है न कुहरे न न कुहासे ने. चारों तरफ कैसी रौनक हो गयी है, रंग निखर आते हैं धूप में, पिछले दो दिन सारा दृश्य एक ही रंग का प्रतीत होता था. जून के ऑफिस में एक विदेशी भूवैज्ञानिक आये हैं क्रिस्टोफर कॉनकार्ड, कल शाम वह एक मित्र परिवार के यहाँ उनसे मिली. वे लन्दन के एक गाँव में रहते हैं. पैंतीस वर्ष के थे तो अपनी पत्नी के साथ मिलकर तेल के क्षेत्र में अपनी कंसल्टेंसी की कम्पनी शुरू की, पत्नी प्रबंध करती है और वह पूरे विश्व में घूम-घूमकर अपना ज्ञान बांटते हैं. दो बच्चे हैं, बेटा और बेटी, बेटी के तीन बच्चे हैं, लिखती है, बेटा सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करता है. दोनों के बचपन की बातें बड़े चाव से बता रहे थे, बातें करने में कुशल हैं. उनके पूर्वज भारत में रहे, काम किया. पत्नी के दादा भी यहाँ रहे थे, हिंदी से परिचित हैं क्योंकि बचपन में सुनी थी. असम कई बार आ चुके हैं, आसपास के तेल क्षेत्र से परिचित हैं. बासठ वर्ष के हैं, इस उम्र में भी बच्चों का सा जोश है. बच्चों से प्यार भी है. जहाँ भी जाते हैं, वहाँ के स्कूलों में जाकर बच्चों से मिलते हैं और दान भी करते हैं. कुल मिलाकर सीधे, सरल व एक सहृदय कोमल दिल वाले इन्सान हैं. सेन्स ऑफ़ ह्यूमर भी बहुत है. उनके बारे में एक छोटी सी कविता वह लिखेगी. आज वे उनके साथ मृणाल ज्योति जा रहे हैं.

कल उसने एक छोटी सी कविता लिखी, श्री क्रिस्टोफर के लिए, मृणाल ज्योति का ट्रिप अच्छा रहा. शाम को उन्होंने कविता का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया. आज धूप बहुत तेज है, माँ-पिताजी बाहर धूप में ही बैठे हैं. सुबह सुना मानव को अपने बल का उपयोग संसार की सेवा के लिए करना है न कि अपने सुख के लिए !

आज नेताजी पर एक कविता लिखी. मौसम अब कम ठंडा है, बदली के बावजूद. कल पुनः आग जलायी और आग के चारों ओर बैठकर सर्दियों में मिलने वाली वस्तुएं गजक आदि खायीं, विदेशी मेहमान को बुलाया था. जो भारतीय भोजन आराम से खा लेते हैं. रात को और सुबह भी तमस भर गया था, ध्यान किया तो सत् पुनः प्रबल हो गया. साक्षी होकर इन तीन गुणों का खेल देखते ही बनता है. इस वक्त मन शांत है अर्थात सत् की प्रमुखता है. जून कल लाइब्रेरी से लायी पुस्तक पढ़ रहे हैं आर के नारायण की ‘अ टाउन कॉल्ड मालगुडी’ उसकी पढ़ाई आजकल नहीं हो पाती है. सुबह पाठ करने व नेट पर कवितायें पढ़ने के अलावा कुछ नहीं पढ़ पाती है.      


Tuesday, June 21, 2016

मार्क ट्वेन का अनुभव


आज सुबह क्रिया के दौरान कई शुभ संकल्प उठे. पता नहीं कहाँ से विचार आते हैं और कहाँ खो जाते हैं. ‘मृणाल ज्योति’ के भविष्य के बारे में एक लेख लिखने का संकल्प, वहाँ के लिए सिंगापुर से कुछ विशेष खरीद कर लाने का संकल्प. पड़ोसियों के लिए क्रिसमस का सुंदर उपहार भी लाना है. ईसामसीह पर एक कविता लिखे तो कितना अच्छा हो... इस समय और कुछ याद नहीं आ रहा है, लेकिन उस समय तो जैसे बाढ़ ही आ गयी थी. कहीं यह मन की चाल तो नहीं. वह बचे रहना चाहता है. इसलिए अच्छी-अच्छी बातें खोज निकालता है ठीक ध्यान से पूर्व ! चाचाजी को श्रद्धांजलि स्वरूप एक लेख लिखना आरम्भ किया है. चचेरे भाई से बात की वह बाहर था, पंडित जी से कल के उठाले के बारे में बात करने आया था. मन्दिर में एक कमरा है वहीं पर कार्यक्रम होगा, समाज ऐसे वक्त पर ही नजर आता है. उसने भाई के लिए सोचा, पिता के जाने के बाद शायद वह समर्थ हो सके, अपने भीतर की शक्तियों को जगा सके. परसों छोटा भाई चचेरे भाई के साथ हरिद्वार जायेगा उनकी अस्थियाँ लेकर.  

आज फिर वर्षा का मौसम बना हुआ है, ठंड बढ़ गयी है. जून अप्रैल में लेह जाने की बात भी कह रहे हैं, समय बतायेगा, क्या होता है ? दोपहर के डेढ़ बजे हैं. ओशो ने मार्क ट्वेन के जीवन की एक घटना का जिक्र किया. जब वह फ़्रांस गये तो उनका नाती उनके साथ था. मार्क ट्वेन को फ्रांसीसी भाषा नहीं आती थी. वह भाषण के दौरान अपने नाती को देखकर ताली बजाते व हँसते जिससे किसी को पता न चले कि उन्हें भाषा का ज्ञान नहीं है. बाद में उनके नाती ने कहा कि उन्होंने तो उसकी फजीहत करवा दी. जब उनकी तारीफ होती तो वह ताली बजाता तभी मार्क ट्वेन भी ताली बजाते. वे भी बहुत सारे काम देखा-देखी करते हैं और उस परमात्मा की फजीहत करवाते हैं. यह बात और है कि परमात्मा की कोई फजीहत हो ही नहीं सकती !

आज नेट गायब है. उसने सोचा इस समय घर पर सभी व्यस्त होंगे, आज चाचाजी का उठाला है. जीवन अवश्य था उनके भीतर पर पिछले कुछ समय से वे सही अर्थों में जीवित नहीं कहे जा सकते थे. समाज से कटे हुए, अस्वच्छ वातावरण में, वही वस्त्र पहने दिनों गुजारने वाले, लेकिन दूसरी ओर जो रोज नहाते हैं, सबसे मिलते-जुलते हैं लेकिन भीतर क्रोध से भरे हैं, विषाद से ग्रस्त हैं, उन्हें भी तो जीवन से वंचित कहा जा सकता है. जीवित तो वही है जो भीतर जागा हुआ है, आनन्द में है और जो सभी के भीतर एक ही चेतना का दर्शन करता है. वह सबको वे जैसे हैं देख सकता है !


फिर एक अन्तराल, ठंड वैसी ही है जैसी कि दिसम्बर के इस महीने में होनी चाहिए ! अभी-अभी एक सखी से बात की अब से वह उसके साथ मृणाल ज्योति का काम करेगी. इस हफ्ते वे बच्चों को ध्यान करायेंगे. बच्चे ध्यान में जल्दी उतर सकते हैं, ऐसा संत कहते हैं. आज उसने पढ़ा, यह ब्रह्मांड गोलीय है, उसका न आदि है न अंत. आकाश से परे है चेतना.. ध्यान के बिना उस तत्व को जाना नहीं जा सकता. आज लेडीज क्लब की एक सदस्या के लिए उसने एक विदाई कविता लिखी. कल पिताजी को चाचाजी पर लिखा आलेख भेजा. उसे लगता है अब गद्य लिखने में उसे कम प्रयास लगता है. पद्य लिखना अब छूटता ही जा रहा है. कितना काम पड़ा है करने को पर बहुत सा समय इधर-उधर के कामों में चला जाता है. बहुत सारे संकल्प भीतर उठते हैं, कोई जगा हुआ उन्हें निरंतर देखा करता है, वही आत्मा है ! 

Sunday, January 24, 2016

कविता का अहसास


आज सद्गुरु ने कहा, इन्द्रियगत ज्ञान सीमित है, वह विस्मय से नहीं भरता, स्वरूपगत ज्ञान अनंत है, जो आनन्द की झलक दिखाता है. अपने अज्ञान को स्वीकारने से ऐसा ज्ञान मिलता है. ज्ञेय सदा ज्ञान से छोटा है, दृश्य से हटकर द्रष्टा में आना योग का प्रथम चरण है. विस्मय से परे वह तत्व है जहाँ स्तब्धता है, मौन है, आनन्द है तथा प्रेम है. अपने आप में मस्त रहने की कला वहीं सीखी जाती है. जिस क्षण कोई साधक द्रष्टा के भाव से नीचे गिरता है, राग-द्वेष से वशीभूत हो जाता है. जून चार-पांच दिनों के लिए एक कांफ्रेंस में भाग लेने आज मुम्बई गये हैं. अगले चार दिन भगवद् ध्यान में बीतेंगे, जैसे आजकल बीत रहे हैं. परमात्मा से कोई प्रेम करे तो वह स्वयं ही उसका ख्याल रखने लगता है. वह खुद को भूलने नहीं देता. उसे तो अब सोचते हुए भी अजीब लगता है कि कभी ऐसा भी था जब उसका मन उससे दूर था. तब कितना खाली रहा होगा जीवन. अब तो हर पल एक नया संदेश लेकर आता है. आज भी ठंड काफी है, इनर व दो स्वेटर पहने हैं उसने. अभी कुछ देर पहले ही वह सांध्य भ्रमण से लौटी है. अब कुछ देर कम्प्यूटर पर काम करना है. कल ‘मृणाल ज्योति’ विशेष बच्चों के स्कूल  जाना है. उन्हें फोटो भी दिखाने हैं तथा नये वर्ष का उपहार देना है. एक सखी ने कल कहा, उसकी छोटी बहन को ‘अहसास’ शीर्षक पर एक कहानी या कविता चाहिए, उसने एक कविता लिखने का प्रयास किया है, इसी नाम से एक कहानी वर्षों पूर्व लिखी थी.

कल रात ठंड के कारण नींद खुल गयी. सुबह उठने में देरी हुई. कल शाम ही वह सखी बिना फोन किये आ गयी, अब कविता ऐसे थोड़ी ही लिखी जाती है. मृणाल ज्योति स्कूल के विशेष बच्चे उसे देखकर खुश हुए, वे उसे पहचानने लगे हैं. फोटो देखकर भी वे आनन्दित हुए. एक अध्यापिका ने उसे आते रहने को कहा, वह होली पर फिर जाएगी. इस समय दोपहर के सवा दो बजने वाले हैं, एक छात्रा पढ़ने आयेगी. नेहरु मैदान में फुटबाल प्रतियोगिता का उद्घाटन समारोह है, एक सखी ने उसमें आने को कहा था, पर सम्भव नहीं है. उसकी नन्ही बिटिया का वीडियो देखा, सहज ही उसके लिए एक कविता लिखी, वह उनके जीवन में सुखद परिवर्तन लेकर आयी है. फिर भी यदि वे संतुष्ट नहीं है तो भगवान भी कुछ नहीं कर सकता. खुश रहना या न रहना मन पर ही निर्भर है और मन बुद्धि पर और बुद्धि विवेक पर, विवेक सत्संग पर और सत्संग गुरु पर, गुरू भगवान की कृपा से मिलते हैं तो अंततः भगवान ही कारण हुए पर भगवान ने तो उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता दी है. वे यदि ठान लें तो खुश रहने से कौन रोक सकता है ? यह ठानना ही तो विवेक है न ? आज बापू की पुण्यतिथि है. शहीद दिवस, कुष्ठ निवारण दिवस तथा अन्य भी कई तरह के दिवस इस दिन मनाये जाते हैं. गांधीजी सत्य के मार्ग के राही थे, तभी तो राजनीति के शुष्क वातावरण में मुस्का सकते थे.


आज गुरूजी ने समाधि के विषय में कल से आगे बताया. कई तरह की समाधि होती है. समाधि में अपने होने का भान रहता है. ‘मैं हूँ’ से ‘यह है’ अर्थात आनन्द है इसका भान रहता है. असम्प्रत्याग समाधि में अपना ज्ञान नहीं रहता. वह अभ्यास के द्वारा मिलती है. भाव समाधि, लय समाधि तथा अन्य भी कुछ समाधियों का अनुभव साधक करते हैं. अंत में तो समाधि का लोभ भी छोड़ना पड़ता है, जैसे साबुन मैल छुड़ाने के लिए लगाया फिर साबुन को भी हटाना होता है. टीवी पर मुरारी बापू अपने चिर-परिचित अंदाज में कथा सुना रहे हैं, एक कविता को वह भजन की तरह गा रहे हैं. आज ध्यान में सुंदर दृश्य दिखे. चाँदी के चमकते आभूषण तथा ताम्बे या कांसे की मूर्तियाँ, भीतर कितनी बड़ी दुनिया है, ध्यान में जिसकी झलक मिलती है. अभी तो उसने पहला कदम रखा है इस मार्ग पर, अभी बहुत चलना है. जीवन तभी तो जीवन कहलाने योग्य है जब तक उसमें कुछ नया-नया मिलता रहे, नये फूल खिलते रहें, एक प्रतीक्षा बनी रहे भीतर. प्रतीक्षा में कितना आनन्द है, कुछ बेहतर घटने वाला है, कुछ ऐसा मिलने वाला है जो आज तक नहीं मिला, जो अमूल्य है. परमात्मा की राह पर चले कोई तो हर क्षण उपहार मिलते जाते हैं और हर अगला उपहार पहले से बेहतर होता है.     

Monday, December 28, 2015

जाता हुआ वर्ष


वे कल घर लौट आये, अभी यात्रा की थकान पूरी तरह नहीं गयी है. घर भी पूरी तरह पुनः व्यवस्थित नहीं हुआ है. पेट में कैसी खलबली मची है. तरह-तरह के भोजन, जगह-जगह का पानी पीकर कुछ तो असर पड़ना ही था. मौसम भी एकदम से बदल गया है, वहाँ गर्मी थी यहाँ ठंड जोरों पर है. आज सुबह बहन व परिवार के अन्य सभी सदस्यों पर कविताएँ लिखीं, छोटी-छोटी तुकबन्दियाँ ! दोपहर को एक आलेख शुरू किया है, अभी दोएक दिन लगेंगे, मन में कितनी ही बातें हैं. कल रात स्वप्न में यूएइ ही देखती रही, खबूस खायी. जो मन पर अंकित है, वही तो पन्नों पर अंकित हो रहा है. यहाँ बगीचे में गुलदाउदी खिली है. शेष फूलों की पौध अभी लगनी है. वर्ष का यह अंतिम महीना है.

आज सुबह पांच बजे उठे, ठंड काफी थी पर ऐसी ठंड में भी उनकी नैनी बिना स्वेटर पहने ही रहती है, पता नहीं वह किस मिट्टी की बनी है. उसने ठंड पर विजय पा ली है, यहाँ वह है दो स्वेटर पहने है, तिस पर भी धूप में बैठी है. बरामदे में धूप आ रही है. भोजन बन गया है, सुबह के सभी आवश्यक कार्य भी हो चुके हैं. नैनी की बेटी पढ़ने आती है पर आज अभी तक नहीं आई, उसकी माँ को पढ़ाई का महत्व पता नहीं है, स्वयं अनपढ़ है सो क्या जाने कि पढ़ना-लिखना इन्सान के लिए कितना आवश्यक है. नन्हा परसों आ रहा है, वे उसे लेने जायेंगे. कल शाम वे एक मित्र परिवार के यहाँ गये, जन्मदिन की बधाई देने, वापसी में वह अपना पर्स वहीं भूल आई, दुबारा जाकर लाना पड़ा, मन कितना बेहोशी में जीता है. मन तो जड़ है ही, वे सजग नहीं रह पाते, मशीनवत काम करते हैं. मन कहीं और होता है, हाथ कुछ और कर रहे होते हैं. असजगता ही बंधन है वही दुःख में डालती है.


साल का अंतिम दिन ! कल मैराथन में भाग लिया, जैसी उम्मीद थी, प्रथम आई. रास्ते में एक बार लड़खड़ा गयी पर जैसे किसी ने सम्भाल लिया, कुछ विशेष चोट भी नहीं लगी, न ही उसके कारण कोई आगे निकल पाया. दिन भर खूब आराम किया. थोड़ी थकन अभी भी है तन में, पर मन तो जैसे है ही नहीं, प्रेम का अनुभव उसे गलाये जा रहा है. प्रेम इन्सान को कितना महान बना देता है. एक क्षुद्र, अनपढ़ गाँव का भोला व्यक्ति भी यदि अपने भीतर प्रेम का अनुभव करता है तो वह संसार का सबसे धनी व्यक्ति होगा. वह सद्गुरू के प्रति, परमात्मा के प्रति और उसकी इस अनमोल सृष्टि के प्रति असीम प्रेम का अनुभव करती है, भीतर जो संगीत गूंजता है, वह उसे भुलाने नहीं देता जो सार्थक है, जो शाश्वत है और जो सत्य है, इस अस्तित्त्व से प्रेम करना जिसे आ जाता है, अस्तित्त्व भी उससे प्रेम करता है. इस वर्ष उसकी चेतना और मुखर हुई है, विकसित हुई है. अब इस बात का डर नहीं है कि कहीं पथ से विचलित न हो जाए, क्योंकि अब भीतर कुछ जग गया है कुछ पनप गया है जो अब खुद जगायेगा. अब मन पहले से जल्दी ठहर जाता है. इस वर्ष कवितायें भी कुछ अधिक लिखी गयीं, ऐसे कवितायें जो कुछ लोगों को ख़ुशी दे गयीं. सभी के भीतर उसी परमात्मा को देखने का अभ्यास भी बढ़ा है और भीतर शांति का झरना भी निरंतर बहता है. जाता हुआ साल ढेर सारी यादें देकर जा रहा है, पर अब वर्तमान में रहने की इतनी आदत हो गयी है कि इस वक्त कुछ भी याद नहीं आ रहा !

Thursday, May 21, 2015

रीठा-आंवला-शिकाकाई


अभी कुछ देर पूर्व ध्यान करते समय उसे कृष्ण की झलक दिखी, कुछ क्षण के लिए ही मन के विचार थमे और एक मंजुल मूर्ति के दर्शन हुए पर वह कितना कम समय के लिए था, जैसे बादलों में बिजली चमके और छिप जाये ! आज सुबह सवेरे जून ने फोन किया, वे परसों यहाँ आयेंगे. आज भी बढ़ी हुई ठंड के कारण नन्हा अपने कमरे में ब्लोअर चला कर बैठा है और उसने जून का ऊनी हाउस कोट भी पहन रखा है. उसने भी हीटर जलाया है पर नैनी इतनी ठंड में बिना शिकायत किये ठंडे पानी से सारा काम करती है, उसने ठंड पर विजय पा ली है. उसके मुँह का जायका कुछ ठीक नहीं लग रहा, अभी मेडिकल गाइड पढ़कर देखेगी. जून की भेजी मिठाई बहुत स्वादिष्ट है शायद उसका असर हो अथवा तो लाल मिर्च पाउडर जो उस दिन नन्हा कोपरेटिव से लाया है. आज उसने रीता-आंवला-शिकाकाई से बाल धोए. जनवरी भी आधा बीत गया, नया वर्ष आया और तेज रफ्तार से चल रहा है. अगले महीने नन्हे की परीक्षाएं हैं फिर नई कक्षा और बोर्ड की तैयारी. सुबह ‘क्रिया’ की तो तन कितना हल्का लगने लगा था. सद्गुरु के प्रति मन कृतज्ञता के भावों से भर जाता है. कृष्ण की गीता पढ़ी, ज्ञान, भक्ति, कर्म योग की कितनी अद्भुत व्याख्या की है. जो मार्ग भाये उसी पर चलकर उस तक पहुंचा जा सकता है. निष्काम भाव से, ज्ञान को हृदय में धारण करते हुए भक्तिमय कर्म करना ही उसका ध्येय है. उसका जो भी कर्म हो, सभी कुछ अर्थमय हो, सत्य पर आधारित हो और निस्वार्थ भाव से किया गया हो, उसमें लोकमंगल की भावना छिपी हो अथवा तो व नित्यकर्म हो, शरीर का धर्म हो.

आज बाबाजी ने बड़े मजे की बात सुनायी. “सौ की कर दो साठ, आधा कर दो काट, दस देंगे, दस छुडायेंगे, दस को जोड़ेंगे हाथ !” अर्थात यदि सौ विकार हैं तो चालीस आसानी से दूर किये जा सकते हैं, फिर साठ के आधे दूर करने में थोडा सा श्रम और लगेगा, बचे तीस, दस परमात्मा को अर्पण कर देंगे,  उन्हें दे देंगे, दस को अधिक श्रम से दूर करेंगे और दस के सामने हाथ जोड़ देंगे. उसे लगता है, भावना यदि पवित्र होगी तो छोटा सा कार्य भी भक्ति में बदल जायेगा. हृदय में एक ही अवस्था रह सकती है, जब सुख है तो दुःख रहेगा ही नहीं ! कृष्ण की मंद-मंद मुस्कान को सदा याद रखते हुए मन को मधुर भाव से पूरित करना होगा. उसकी कृपा हो और अपना प्रयास तो मंजिल मिलने में देर नहीं लगती. जब कोई कृतघ्न होकर उसे भुला बैठता है तभी अंतर में विषाद का प्रवेश होता है. जहाँ उसका नाम है वहाँ दुःख टिकेगा कैसे, जब खाली होता है मन तो वह धीरे से आता है, उसकी झलक ही आनंद से पूर्ण करती है, वह अनुभव कैसा होगा जब...क्या इस जन्म में उसे वह अनुभव होगा जब पूर्ण साक्षात्कार होगा ! सद्गुरु और कृष्ण की कृपा रही तो अवश्य ही मिलेगा !

एयरपोर्ट से जून का फोन आया, कोहरा घना है शायद फ्लाईट देर से उड़ेगी. जून आज दस दिनों के बाद घर आ रहे हैं, मन बहुत उत्साहित है. इतने दिनों व रातों को उन्हें समय पर भोजन व नींद आदि का न मिल पाना स्वाभाविक ही है. सर्दी की वजह से परेशानी भी हुई होगी पर यात्रा का अपना एक अलग रोमांच है और परिवर्तन भी तो मन पसंद करता है, फिर भी घर आकर उन्हें सुकून मिलेगा. यहाँ आज धूप के दर्शन सुबह ही हो गये थे. परसों से उसने ‘लियो टालस्टाय’ की एक पुस्तक पढ़नी शुरू की है. सुबह भगवद्गीता का पाठ सुना, चित्त को राग-द्वेष ही मैला करते हैं, जो सभी जगह उसी को देखता है, उसका चित्त निर्मल रहेगा. मन में कोई दौड़ बाकि न रहे, विचारों का अनवरत चलता प्रवाह रुक जाये अथवा तो साक्षी भाव से उसे देखना सीखे, उससे जुड़े नहीं, मकड़ी की तरह अपने ही बनाये जल में स्वयं न फंसे..जल में कमल की भांति उपर रहे..मुक्त..निस्सीम और ज्ञान में स्थित !


लोहड़ी के गीत


दस बजे हैं सुबह के, अभी कुछ देर पूर्व ही ‘क्रिया’ की. सुबह अलार्म सुना तो था, पर ठंड के कारण और रात को सोने में देर हो जाती है, इस वजह से अथवा तो प्रमाद के कारण फौरन बिस्तर नहीं छोड़ा, फिर नन्हे को स्कूल भेजने के कार्य में व्यस्त हो गयी. नैनी, स्वीपर के जाने के बाद ही बैठी, महाभारत व भगवद् गीता का पाठ करने के बाद. सुबह जून से बात की. वह परसों पिताजी से मिलने जा रहे हैं. आज यहाँ ठंड बहुत ज्यादा है, कोहरा और बादल दोनों ही हैं, अभी तक धूप नहीं निकली है. सुबह सत्संग भी नहीं सुना, कुछ देर स्वयं का ही भागवद पाठ सुना. कृष्ण की कथा का अमृत है भागवद्, जिसे पढ़कर उसके हृदय में कृष्ण के लिए अथाह प्रेम उमड़ा था. वह इतनी प्यारी बातें कहते हैं अपने ग्वाल-बाल मित्रों से, गोपियों से, सखा उद्धव से और मित्र अर्जुन से कि बरबस उन पर प्यार आता है. वह सभी को निस्वार्थ प्रेम करते हैं, बिना किसी प्रतिदान की आशा के, एकान्तिक प्रेम और जो उन्हें प्रेम करता है उसे वह अभयदान देते हैं, वह उनके निकट आकर निर्भय हो जाता है. ध्यान में उसे उनके क्षणिक दर्शन होते हैं, क्योंकि उसका ध्यान टिकता नहीं है.. पर ऐसा होगा एक दिन अवश्य कि साक्षात वह उसे मिलेंगे. वह उसकी हर बात जानते हैं. उसकी सारी छोटी-बड़ी इच्छाएं उनपर उजागर हैं. उसकी सारी कमियों के वह साक्षी हैं. उसका प्रमाद व लापरवाही भी उनसे छुपी नहीं है और उसका प्रेम भी..वह तो प्रकट होने को आतुर हैं, वे ही ऐसे अभागे हैं कि मन को इतर विषयों से मुक्त नहीं कर पाते, मन में संसार प्रवेश किया रहे तो उसे बिठाये कहाँ ? मन की ही चलती है ज्यादातर, वे जो वास्तव में हैं पीछे ही कहीं छिपे रह जाते हैं. जैसे कोई अपने ही घर में सबसे कोने में दुबका रहे और घर पर पड़ोसी कब्जा कर लें, वही हालत उनकी है. दुनिया भर की फिक्रें वे करते हैं बिना किसी जरूरत के पर जो वास्तव में उन्हें करना चाहिए उसके लिए समय नहीं निकाल पाते. आत्मा में रहकर ही विशुद्ध प्रेम का अनुभव होता है. आज नन्हे की किताब में तीन कार्ड देखे जो उसके क्लास की लडकियों ने दिए थे, यह भी एक तरह का प्रेम है !

आज लोहड़ी है, स्नान करते समय बचपन में लोहड़ी पर गाए जाने वाले गीत याद आ रहे थे. एक सखी ने फोन करके मुबारकबाद दी. जून को अभी-अभी फोन किया, वह घर पहुंच गये हैं, चाय पी रहे थे. उन्होंने मिठाई भिजवाई है, अभी उस दिन उनका भिजवाया गया सामान ऐसे ही पड़ा है, उनके बिना खाने का नन्हा और उसका दोनों का ही मन नहीं करता. आज नन्हे का स्कूल बंद है, देर से उठे वे. नौ बजे थे, वह ‘क्रिया’ कर रही थी कि एक परिचिता मिलने आयीं, नन्हे ने कह दिया, माँ नहा रही हैं, यह भी एक तरह का मानसिक स्नान ही तो है. जैसे दिन भर में देह व वस्त्रों पर धूल जम जाती है, वैसे ही मन पर भी विकारों की मैल चढ़ जाती है, जिसे हर सुबह वे क्रिया के माध्यम से स्वच्छ करते हैं. स्वाध्याय के माध्यम से भी उसे सुंदर बनाते हैं जैसे वह मन पर लगाने वाले क्रीम, लोशन आदि है.

ठंड आज भी बहुत है, नन्हा ऐसी ठंड में साइकिल से कोचिंग के लिए गया है. वह यहाँ हीटर के पास बैठी है. जून अभी घर पर हैं, सुबह उनसे बात हुई. उन्होंने पिता और भाई की तरफ से उसके लिए कोट खरीदा है, नन्हे के लिए भी स्वेटर खरीदे हैं. पहले ही वह सामान भिजवा चुके हैं. वे कितना भी सोचें कि अब उन्हें और कुछ नहीं चाहिए, पर जब भी नया कुछ मिलता है तो उसे लेते समय झिझकते नहीं और कर्मों के बोझ सिर पर चढाये ही जाते हैं. दुनिया ऐसे ही चलती है और ऐसे ही वे बार-बार जन्म लेते रिश्ते बनाते व निभाते चले आते हैं. ज्ञान होता भी है तो थोड़े से सुख के लिए उसे अपनी सुविधानुसार मोड़ लेते हैं. जीवन ऐसे ही चलता चला जाता है. आज ध्यान करते-करते और गीता पाठ करते समय भी कृष्ण की बातें जैसे मन को भीतर तक छूना चाहती थीं पर मन तो फोन पर की बातों में उलझा था, मन टिकता नहीं एक जगह, जब वे उसे प्रलोभन का शिकार होने देते हैं. आज सद्गुरु ने बताया, जीवन जितना परमार्थ के लिए होगा, सामर्थ्य उतना ही बढ़ेगा, स्वकेंद्रित होकर वे अपनी ही हानि करते हैं, स्व का विस्तार करना होगा. गहराई से देखें तो वे सभी एक ही तत्व से बने हैं, एक ही तत्व की तरफ जा रहे हैं. सभी को एक उसी की तलाश है...

Wednesday, November 20, 2013

द लॉन मोअर मैन


आज सात तारीख है, उसने सोचा,  जून के आने पर उसे ‘विश’ करना है. सात तारीख आने पर कुछ याद दिला देती है. चाहे किसी भी माह की हो. आज यूँ भी बड़े दिनों बाद धूप निकली है, पर ठंडी हवा भी बह रही है. कल शाम तापमान १० डिग्री था, ढेर सारे वस्त्र पहन कर वे टहलने गये, उसका काम आज जल्दी हो गया है, सोचा वह किताब पढ़ेगी जो कल लाइब्रेरी के चिल्ड्रेन सेक्शन से लायी है, “Little Woman”, नन्हे को सुनाने के लिए अच्छी रहेगी. कल फिर उसने सोने में सवा दस बजा दिए, वह दीर्घ सूत्री है, किसी काम को जल्दी से समाप्त नहीं करता, आराम-आराम से करता है, शायद अपने चाचा पर गया है, जिसे वह ठीक से पहचानता भी नहीं. कल मंझले भाई का पत्र बहुत दिनों बाद आया, लिखता है ‘’ग्रह दशा कुछ ठीक नहीं चल रही है, इन्सान को अपने अच्छे-बुरे कर्मों का फल यहीं भोगना पड़ता है’’.

चलो उठ खड़े हों, झाड़ें सिलवटों को
मन के कैनवास को फैला लें क्षितिज तक
प्यार के रंगों से फिर कोई खूबसूरत सोच रंग डालें
बांटे आपस में हर शै जो अपनी हो
चलो आँखें बंद करें, गहरे उतर जाएँ
जानें पर्त दर पर्त अंतर्मन को
आत्मशक्तियाँ जागृत होकर एक हो जाएँ
अपना छोटे से छोटा सुख भी साझा हो जाये
चलो कह दें, सुना दें मन की हर उलझन
समझ लें, गिन लें दिल की हर धडकन
अपना सब कुछ सौंप कर निश्चिंत हो जाएँ
विश्वास का अमृत पियें
चलो करीब आयें, जश्न मनाएं
मैं और तुम से ‘हम’ होने की याद में
कोई गीत गुनगुनाएं
खुली आँखों से सपने देखें
मौसम की मस्ती में डूबे उतरायें !

परसों सुबह नन्हा घर पर था, दुसरे शनिवार को उसका स्कूल बंद रहता है. शाम को उसने चाट बनाई महीनों अथवा वर्षों बाद. वर्षा हो रही थी, सो टहलने भी नहीं जा सके, घर पर ही कैसेट लगाकर थिरकन कम व्यायाम किया. अच्छा लगता है गाने की या सिर्फ संगीत की लय पर शरीर को ढीला छोड़ देना. कल सुबह कड़कती ठंड में इतवार के सारे कार्य किये, शाम को क्लब में फ्लावर शो था, वे देखने गये. फिर एक मित्र के यहाँ, उसकी सखी ने बहुत स्वादिष्ट समोसे खिलाये, घर पर  ही बनाये थे, उनके बेटे का रोना भी बदस्तूर हुआ, वह अपने हाथ से सिले सूट के बारे में बताने का लोभ संवरण नहीं कर पाई, कभी-कभी ऐसी बचकानी हरकतें कर ही बैठती है. पर कल एक और अच्छी बात हुई भारत का जिम्बाब्वे को हरा कर फाइनल में पहुंच जाना. हफ्तों बाद कल ‘मालाबार हिल’ भी देखा. सबा ने शिवम को कैसे अपने दिल की बात कही होगी और अब उसके भाई का क्रोध, सुमन लेकिन अच्छी लग रही थी. आज सुबह धूप निकली है, वह यहीं गुलाब के पौधों के पास बैठी है, पड़ोसिन से बात हुई, वह तिनसुकिया से सिल्क की दो साड़ियाँ लायी है, खुश है, लेकिन साड़ियों से मिलने वाली ख़ुशी कितनी क्षणिक होती है न. सुबह गोयनका जी ने बताया, हमारे मन की ऊपरी पर्त भले ही स्वच्छ, साफ दिखाई दे भीतर राग-द्वेष , लोभ, क्रोध का विशाल साम्राज्य है, परत दर परत उसे उघाड़ते जाना है और साफ करते जाना है.

‘The Lawnmower man’ यही नाम था, कल शाम क्लब में दिखाई गयी फिल्म का, जो रोमांचक थी, अद्भुत थी और कुछ कुछ डरावनी भी. एक सीधा-सादा आदमी अपने दिमाग की छुपी ताकत को पाकर कैसे शक्तिशाली बन जाता है. कम्प्यूटर की शक्ति का कमाल, विभिन्न रंगों से अनोखे आकार बनते हैं पर्दे पर, एक के बाद एक सुंदर चित्र बनते हैं. इंसानी कल्पना की उड़ान की कोई सीमा नहीं, हर बार ऐसा कुछ देखने पर बेहोशी की अवस्था में हुआ उसका अनुभव याद आ जाता है. नीले रंग, अजीब सी आवाजें और कोई लक्ष्य पूरा करने की चाह...मानव मस्तिष्क में क्या-क्या रहस्य हैं, अभी भी मानव जान नहीं पाए हैं. नन्हे को कल स्कूल में कबड्डी खेलते वक्त चोट लग गयी, कहता है अब कभी जूते उतार कर कबड्डी नहीं खेलेगा. अभी-अभी उसने खिड़की से झांक कर देखा, बादलों को परे कर सूरज निकल आया है जिसमें फ्लाक्स और गुलाब के फूलों पर गिरी बूंदें चमक रही हैं.





Sunday, November 17, 2013

नेता जी की जन्म शताब्दी


रात्रि के आठ बजने वाले हैं, आज सुबह से ही व्यस्तता ने घेरा हुआ है, इस वक्त थोड़ा सा रुक कर सुस्ताने का मन हो रहा है. सुबह से ग्यारह बजे तक रोजमर्रा के कामों में व्यस्त रही. आज जून की पसंद की भरवां टमाटर की सब्जी बनाई थी. दोपहर को कुछ देर ‘संडे’ पत्रिका पढ़ी, फिर गुलाबी कपड़े के तीन रुमाल काटे और नन्हे के आने के बाद कल की पिकनिक के लिए पनीर  मसाला बनाने की शुरुआत की. जिसमें डेढ़ घंटा लगा. शाम को टहलने गये और वह गैस से कुकर  उतर कर रखना भूल गयी आग बहुत धीमी थी फिर भी लौकी-वड़ी की सब्जी पानी सूखने से बुरी तरह जल गयी. जून ने अपना स्पेशल बूंदी का रायता बनाया है और चखने के लिए पनीर मसाला तो है ही.

पिकनिक से वापस आकर रात के खाने की तैयारी करके और नहा धोकर आराम से बैठने के बाद अच्छा लग रहा है, नन्हा अपना बचा हुआ होमवर्क पूरा कर रहा है. विशेष थकान भी नहीं है, सुबह ७.२० पर वे घर से चले थे, कुल मिलाकर पिकनिक अच्छी रही, कुछ फोटो भी खींचे. नदी का पानी ठंडा था और उसमें देर तक बैठे रहने से ठंडक का अहसास भीतर तक हो रहा था, किनारे पर बिछी थी स्वच्छ रेत.. सभी खुश थे.

Today something is somewhere wrong ! Jun is losing his temper on small things. She does’nt know why, but she is feeling it and… आज सुबह वे वक्त पर उठे थे पर उनके दफ्तर जाने से पूर्व उसने पत्रिकाओं के बारे में कुछ कहा था, शायद उसी बात का असर हो. शाम को खेल में भी उनका मन नहीं था, खैर, कभी-कभी ऐसा सबके साथ होता है. नन्हे के कल से टेस्ट हैं, वह पढ़ रहा है.

दो-तीन दिनों तक तेज धूप निकलने के बाद आज मौसम फिर सर्द है, बादल हैं, एक दो बार सूरज उनकी ओट से झाँका भी तो धूप में गर्माहट नहीं थी. अभी-अभी नैनी का छोटा बेटा अंग्रेजी पढकर गया है, उसे अल्फाबेट आ गया है और कुछ शब्द लिखने भी आ गये हैं, लेकिन उसके पास क्लास १ की कोई पुस्तक नहीं है जिससे सिलसिलेवार पढ़ाई की जा सके, आज उसे छोटे-छोटे   वाक्य लिखने को दिए हैं. दोपहर खाने पर आये तो जून का मन ठीक था, वह खुश थे, सम्भवतः कल उन्हें फील्ड भी जाना पड़े. नन्हे के आज दो टेस्ट हैं, उसकी टीचर के कहने पर तेल लगाना भी सीख गया है. आजकल रामायण में हनुमान जी द्वारा सीता का पता लगा कर आने की कथा चल रही है, कल से ‘युद्ध कांड’ आरम्भ होगा, और रामायण समाप्त होने पर वह फिर से ‘भगवद् गीता’ पढ़ेगी जो जीने की कला सिखाने में पूर्णतया सक्षम है.

जून आज ‘हाफजान’ गये हैं, शाम को आएंगे, बहुत दिनों बाद उसे लंच अकेले ही खाना है, सो जब पेट में चूहे कूदने लगेंगे तभी खाएगी, जो भायेगा वही और जितना भायेगा उतना. कल शाम को वे एक मित्र परिवार के यहाँ गये, वहन एक और परिवार मिला, MR थोड़े शर्मीले स्वभाव के लगे बड़े भाई की तरह बच्चों से तुतलाकर बात करने वाले, MRS काफी एक्टिव थीं, डेढ़ साल की बच्ची की माँ को शायद ऐसा ही होना पड़ता है. नन्हे ने सब बच्चों को टाफी दीं, जो कई दिनों से इकट्ठी कर रहा था. शाम को बैडमिंटन भी खेला, अब उसकी रूचि इसमें बढ़ गयी है.


पिछले दो दिन जून और नन्हे दोनों की छुट्टी थी, परसों नेता जी के जन्मदिवस की, उनकी जन्म शताब्दी मनाई जा रही है इस बरस. उसने सोचा तो लगा नेता जी के विषय में वे कितना कम जानते हैं. उस दिन उन्होंने स्टोर की सफाई की और ‘माचिस’ देखी. उसे बहुत अच्छी नहीं लगी यह फिल्म. शाम को नन्हा एक मित्र के जन्मदिन में गया और वे अपने मित्र के यहाँ. कल दिन भर बूंदा-बांदी होती रही, मौसम बेहद ठंडा था, लंच में डोसा बनाया उसने. पड़ोसिन ने अपने बगीचे से ब्रोकोली भेजी, जो शाम को बनाई. जून ने अपनी पसंद की दो मिठाइयाँ बनायीं, गुलाब जामुन और बेसन के लड्डू. लेकिन उसे मिठाई खाना ज्यादा पसंद नहीं है पर जून चाहते हैं, उनकी तरह वह भी मिठाई बहुत शौक से खाए, कभी-कभी उसे लगता है वह भूल ही गये हैं इन्सान जीने के लिए खाता है न कि खाने के लिए जीता है. बरसों से चलती आ रही, शायद आगे भी चलती रहेगी, उनकी नोक-झोंक का विषय अक्सर भोजन ही होता है. आज भी मौसम बेहद ठंडा है, सुबह-सुबह छोटी बहन को फोन किया, उसकी विवाह की सालगिरह है आज. नन्हा बहुत सोचने के बाद आखिर स्कूल चला गया है, बहादुर लड़का है, इतने दिन मना करने के बाद आज आखिर टोपी और दस्ताने भी पहने. 

Wednesday, October 9, 2013

गर्मागर्म पकौड़े


आज दिन बदली भरा है, सो हल्की ठंडक महसूस हो रही है आज काम जल्दी समाप्त करके उसे टोपी बनानी है. शाम को एक सखी के घर जाना है, उसका जन्मदिन है, उसके हाथ में हरी मिर्च छूने से जलन हो रही है, किसी पत्रिका में इसके मिटाने का उपाय पढ़ा था पर याद नहीं है, वक्त पर याद न आये ऐसे पढने से क्या लाभ, वह पत्रिकाएँ पढकर बहुत जल्दी ही भूल जाती है. लेडीज क्लब की मीटिंग में एक सरप्राइज गेम था, पर न तो वह विज्ञापन ही पहचान सकी न कलाकारों के चित्र, किसी ने कहा आप इतनी पत्रिकाएँ पढ़ती हैं, ठीक ही कहा, उसे ज्यादा पहचान होनी चाहिए, पर वह विज्ञापन न तो देखती है न पढ़ती है. टीवी पर ‘झूठी’ फिल्म आ रही है, माँ-पिता बहुत शौक से देख रहे हैं. कल शाम असमिया सखी बहुत दिनों बाद आयी, उसने पकौड़े बनाये, और लगा कि उसमें तेल बहुत लगता है, इतना तेल स्वास्थ्य के लिए शायद ठीक नहीं है, अच्छा है कि वह साल में एक या दो बार ही बनाती है. कल दोपहर ‘बुनियाद’ देखा, अच्छी लगती है लाजो जी की बातें और हवेलीराम का उसे ‘लाजो जी’ कहना. नन्हे का आज हाफ डे है, २६ से उसकी परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं शायद इसीलिए. नैनी बगीचे से मूला का साग तोड़ कर लायी है, इस वक्त काट रही है.

  
ठंड एकाएक पिछले दो दिनों से बढ़ गयी है, कल सारे स्वेटर, स्कार्फ आदि निकाल दिए, आज धूप दिखाने के लिए रखे हैं. जून आज सुबह माँ-पिता को गोहाटी तक छोड़कर वापस आ गये, उस दिन जब वे जा रहे थे उसकी आँखें भर आई थीं. उनका रहना उसे अच्छा भी लगा और कुछ बंधन सा भी था. फिर इतवार और कल का दिन नन्हे को पढ़ाते व पढ़ते बीते. इस बार उसे पढ़ाने में मेहनत कम लग रही है, जैसे-जैसे बड़ा हो रहा है उसे याद करने की अथवा रटने की जरूरत कम होती जा रही है.

पिछले दो दिन फिर मौन, कल सुबह आशा पारेख और धर्मेन्द्र के अभिनय में उलझी रही और परसों एक पुराने मित्र के लिए लंच बनाने में, पता नहीं क्यों उनसे मिलकर वह जिसे कहते हैं न दिल से ख़ुशी होना, वह नहीं हुई, जून भी उतना खुलकर नहीं मिले जैसे अन्य मित्रों से मिलते हैं. वह अपने दिल्ली वासी होने के या विदेश भ्रमण करने के गरूर में खोये से लगे खैर.. नन्हे से कहकर उनके बेटे के लिए कार्ड अवश्य बनाना है. कल रात जून से और भी कार्ड बनाने की बात कही थी, नया साल आने वाला है और उन्हें कई जगह कार्ड भेजने हैं. आज धूप नहीं निकली है सूरज बादलों के पीछे छिपा है, सर्दियों में धूप की कीमत कितनी बढ़ जाती है. जून आजकल खुश रहते हैं, कुछ दिनों की नियमित दिनचर्या से मिली आजादी को अच्छी तरह enjoy करते हुए ! कल पूरे एक महीने बाद उसने पत्रों के जवाब दिए, फोन और पत्र दूरियों को कम कर देते हैं.

अपने–अपने घरों में कैद
खुद से बतियाते
अपने इर्दगिर्द ब्रह्मांड रचने वाले लोग
क्या जानें कि नदी क्यों बहती है
दूर बीहड़ रास्तों से आ
ठंडे पानी को अपने अंक में समेटे
तटों को भिगोती, धरा को ठंडक
पहुंचाती चली जाती है
क्यों सूरज बालू को सतरंगी बनाता
नदी की गोद से उछल कर शाम हुए उसी में सो जाता है
आकाश झांकता निज प्रतिबिम्ब
संवारते नदी के शीशे में वृक्ष भी अपना अक्स
सदियों से सर्द हुआ मन
धूप की गर्माहट पाकर पिघल कर
बहने लगता है नदी की धरा के साथ
बर्फ की चादर से ढका धरा का कोना
जैसे सुगबुगा कर खोल दे अपनी आँखें
नन्हे नन्हे पौधों की शक्ल में
मन की बंजर धरती पर भी गुनगुनी धूप
की गर्माहट पाकर गीतों के पौधों उग आयें
हल्की सी सर्द हवा का झोंका घास को लहराता हुआ सा
जब निकल जाये
तो गीतों के पंछी मन के आंगन से उड़कर
नदी के साथ समुन्दर तक चले जाँए..
धूप की चादर उतार, शाम की ओढ़नी नदी ओढ़े जब
सिमट आयें अपने-अपने बिछौनों में
अगली सुबह का इंतजार करते कुछ स्वप्न 

Saturday, August 10, 2013

अंगूठे का दर्द


आज वर्षा के कारण ठंड बढ़ गयी है कल शाम वे एक मित्र की शादी की सालगिरह की पार्टी में गये. उसने वही ड्रेस पहनी थी जो जून लाये थे, सभी ने तारीफ की. खाना अच्छा था, गृहणी ने घर सलीके से सजाया था, शांत स्वभाव की है, और धीरे-धीरे बोलती है, क्या जीवन की इन छोटी-छोटी खुशियों को महसूस करना गलत हो सकता है, कभी-कभी ऐसा भी होता है. जब कोई इन छोटी-छोटी बातों को याद करता है, क्या ये पल उसने व्यर्थ गंवाए ऐसा कहना या मानना ठीक है? ईश्वर ने यह सुंदर संसार और महसूस करने वाला मन दिया है, किसी को पीड़ित न करते हुए बिना किसी राग-द्वेष के सुखी रहना और हो सके तो दूसरों को सुखी करना क्या इतना पर्याप्त नहीं है ? संसार में रहकर उसमें लिप्त हुए बिना सांसारिक कर्त्तव्यों का पालन करते जाना और जो मार्ग में आये उसे अपने हित में साधते जाना..नैतिकता के मूल्यों को समझ कर उन्हें धारण करना और सुख-दुःख दोनों में समभाव बनाये रखना यही पूजा इस जन्म में उसके लिए पर्याप्त है. आध्यात्मिकता का अर्थ अच्छाई पर विश्वास, नैतिकता पर पूर्ण श्रद्धा और संयमित जीवन चर्या ही है.

वही कल का वक्त है, पर मौसम कल जैसा नहीं है, धूप निकल आई है. रातभर की मूसलाधार वर्षा के कारण बढ़ गयी ठंड से राहत दिलाती फरवरी की धूप भली लग रही है. ‘जागरण’ आजकल नहीं देख पा रही है, आजकल प्रवचन की जगह उसमें कोई साक्षात्कार दिखाया जा रहा है. कल उसका टेबल टेनिस का मैच है, उसे यकीन है कोई पुरस्कार तो जीतेगी. अभी कुछ देर पहले एक १८-२० साल का लड़का सफेद धोती पहन कर आया श्राद्ध के लिए पैसे मांग रहा होगा, वह उसकी ड्रेस देखकर ही समझ गयी थी, भीख मांगने का यह बहुत बेहूदा तरीका है.

आज भी पीटीवी पर ‘आधा चाँद’ देखा सुना, पर आज की शायरा में वह बात नहीं थी, सामान्य सी शायरी थी, पर उन्हें अपने पर यकीन था और जिसे खुद पर यकीन होता है वह शायर चाहे अच्छा न हो इन्सान जरुर अच्छा हो सकता है. वह जापानी सिखा चुकी हैं और आज भी सर्विस करती हैं, फिर भी इतना वक्त निकल लेती हैं की मुशायरों में शिरकत कर सकें और इधर वह है कि अपने इस छोटे से घर को ही दुनिया मानकर खुश रहती है. शायद इस जन्म में यही उसकी दुनिया है अपने चंद टूटे-फूटे अश्यार के साथ.

कल मैच में उसने एक मैच जीता पर दो हारे, रात भर इसी के सपने आते रहे. कई चीजों का असर जानबूझ कर न लिया जाये तो भी गहरा पड़ता है, सुबह उठते ही जागरण में ‘श्री सिंघल’ के विचार सुने, क्वांटम थ्योरी के अनुसार शरीर और आत्मा के संबंध को समझाया फिर प्रकृति और पुरुष अर्थात ईश्वर के सम्बन्ध को. प्रकृति में कुछ भी कारण रहित नहीं होता पर ईश्वर के विधान में कारण खोजना व्यर्थ है. इसी तरह सुख, शांति, प्रेम और इसी तरह की भावनाएं देने से बढ़ती हैं तथा दुःख, अपमान और इसी तरह की भावनाएं लेने से. प्रश्नकर्ता ने उनसे पूछा था, सदा सुख का अनुभव हो तथा दुःख से मुक्ति, ऐसा क्या सम्भव है ? सांसारिक वस्तुओं का संग्रह करने से वे बढ़ती हैं पर आत्मिक वस्तुओं को बांटने से वे बढ़ती हैं, इस विरोधाभास को समझ कर उसे  ग्रहण कर लेने पर दुःख की प्रतीति नहीं होगी और सुख का अभाव नहीं होगा. आज गीता के चौदहवें अध्याय में सत्व, रज और तम गुणों के बारे में पढ़ा, कल शाम को तम गुण का असर ज्यादा हो गया था जो जून के मन को अपनी बेवजह की तकरार से चोट पहुंचाई, वह किस तरह चुप हो गये थे जैसे कोई फूल मुरझा गया हो पर आज वह जरुर खुश होंगे क्योंकि उनकी पसंद के भोजन ने उनके दिल को पहले सा भर दिया होगा. वह उसके दिल की बातें खूब समझते हैं बस कहने का अंदाज अलग है, उसे भी तो इतने सालों में समझ जाना चाहिए कि ही इज मैन ऑफ़ एक्शन नोट वर्ड्स, उसने मन ही मन उनसे क्षमा मांगी. आज उसने छह पत्र लिखे और होली के लिए सफाई भी शुरू की. नन्हा स्कूल से आ गया है और उसके toenail में बहुत दर्द है फिर भी फोन करके अपने मित्र को बैडमिन्टन खेलने के लिए बुलाया है.


Tuesday, July 30, 2013

शंख और सीपियाँ


सुबह उठते ही दादा वासवानी का प्रवचन सुना. कितनी अच्छी बातें कहीं उन्होंने, ‘’हर रात्रि विश्राम से पहले तथा सुबह शैया त्यागने से पूर्व शांति पाठ करना चाहिए, सबके लिए भेजी गयी शुभकामना लौट कर हमारे ही पास आती है. हर घंटे पर कुछ क्षणों के लिए स्मरण करें’’. आज इस मौसम की सबसे ज्यादा ठंड है, सुबह से ही वर्षा हो रही है, मद्रास में तो धूप होगी और गर्मी भी. सफाई का काम लगभग समाप्त हो गया है, कल अंतिम काम फ्रिज की सफाई करेगी. रजाई के कवर उसने अकेले ही चढ़ाये और सिल भी दिए, जून होते तो चार-पांच बार याद दिलाते तब वह सिलती.

आज लोहरी है, पिछले साल उन्होंने पारंपरिक विधि से लोहरी मनायी थी. आज नन्हे का अवकाश है वे असमिया सखी के यहाँ गये चार घंटे वहाँ बिताये. वहाँ उसने गाजर का हलवा बनाया, उसकी सखी का इस बात में पूरा विश्वास है कि जब खाना है तो बनायें भी वे क्यूं न, यहाँ तक की काली गाजरें भी उसी से छिलवायीं, सुबह ही उसने हाथ अच्छी तरह साफ़ किये थे, जो वापस आकर फिर से किये, उसकी सखी बहुत प्रेक्टिकल है, उसना सोचा. शायद आज जून का फोन आए, या न भी आये क्योंकि कल वे आ रहे हैं, उनके साथ उसका प्रेम है और उसके साथ उनका विश्वास.

लेकिन आज वे नहीं आ सके, दोपहर को उनके बॉस ने फोन पर  बताया, फ्लाईट छूट जाने के कारण वे गोहाटी जा रहे हैं. और कल आएंगे. सुनते ही उसे रुलाई सी आने को हुई, नन्हे को बताया तो वह भी उदास हो गया, उसकी सखी को पता चला तो वे उन्हें अपने घर ले गये, कुछ देर उनो खेला, फिर उपमा खिलाई, उसकी सखी उपमा बहुत अच्छी बनती है. वापस आकर नन्हे को आग जलाने का शौक हुआ, नैनी के लडके ने लकड़ियाँ इकट्ठी कर दीं और उन्होंने लोहरी के दूसरे दिन लोहरी मनायी.

आज भी छुट्टी थी नन्हे की, पर वह सुबह उस वक्त जग रही थी जब साढ़े पांच बजे जून का फोन आया, वह आ गये हैं और कार का इंतजार कर रहे हैं, एक मित्र उन्हें लेने गये थे. उनके फोन के बाद पन्द्रह मिनट में उसने इतने सारे काम कर लिए. वह बेहद खुश थी. उन्होंने चाय पी और फिर आधे एक घंटे बाद उन्होंने अपने साथ लाये उपहार दिखाने शुरू किये, सुंदर से कई शंख व सीपियों से बनी ‘की रिंग्स’ और स्वीट होम लिखी एक बड़ी सी कौड़ी. नन्हे के लिए ग्लोब, स्केल, वीडियो गेम और उसके लिए दो साड़ियाँ, जिनमें से एक का रंग समुद्री या आकाशी नीला है जिसमें सुनहरा काम किया हुआ है तथा दूसरी सूती है, दोनों मद्रास की सबसे बड़ी दुकानों से खरीदी हुई, नेल्ली और कुमार सिल्क ! पर जून ने अपने लिए कुछ भी नहीं लिया. नन्हा भी थोड़ी देर में उठ गया, वीडियो गेम में व्यस्त हो गया. इतवार को उसका ड्राइंग टेस्ट ठीक रहा था और पढ़ाई के मूड में वह जरा भी नहीं था. जून कुछ देर के लिए सो गये और उन्होंने इतने दिनों बाद साथ-साथ लंच लिया. शाम को दो मित्र परिवार मिलने आये, अगले दिन भी बीहू का अवकाश था, सो तय हुआ कि एक जगह सब इकट्ठे होकर ‘बीहू भोज’ करेंगे, उसे गोभी मुसल्लम तथा आलू का रायता बनाना है.

आज सुबह उठकर जून ने कहा, इतने दिनों बाद वे अच्छी तरह सोये, और उसे भी कल दोपहर इतने दिनों बाद गहरी नींद आई ऐसे मदहोश कर देने वाली नींद जिसमें आँखें खुलने का नाम ही नहीं लेतीं, जून के घर आने से वे तीनों खुश हैं वरना शामें खाली-खाली लगती थीं और खास तौर पर बेहद ठंडे मौसम में हीटर के सामने अकेले बैठे रहने पर ठंड कम ही नहीं होती. यूँ ठंड का मौसम उसे पसंद है, चेहरे को स्पर्श करती शीतल हवा बहुत भली लगती है, अंदर तक ठंडक पहुंच जाती है वह कहते हैं न कलेजे को ठंडक पहुंच गयी. मिजाज भी जल्दी गर्म नहीं होता और यूँ भी डायरी के इस पन्ने के नीचे लिखी बात सच है.

Winter wind is not so unkind as man’s ingratitude.