Monday, September 1, 2014

योग वशिष्ठ - महारामायण


कल शाम से ठंड एकाएक बढ़ गयी है, अभी तक कोहरे ने सूरज को ढक रखा है. ऐसी शीतलता पहाड़ों पर लोग रोज ही महसूस करते होंगे. कल दुबारा डायरी नहीं खोल सकी. दोपहर को चार पत्र लिखे, शाम को वे टहलने गये, क्लब जाने का उत्साह नहीं हुआ. अभी-अभी पड़ोसिन का फोन आया, उसे लगा था सम्भवतः अस्वस्थता के कारण वे क्लब नहीं जा रहे हैं, फिर उस बातूनी सखी का फोन आया, उसे अपने बेटे के लिए एक ऐसी ट्यूटर चाहिए जो होमवर्क करा सके. दोपहर को वह कुछ समय निकाल सकती है और क्लास वन के बच्चे का साथ यकीनन अच्छा रहेगा, सो उसने हाँ कर दी है. जून को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं होगी. कल वह जा रहे हैं, उन्हें इतवार को किये जाने वाले कार्य आज ही कर लेने हैं जिसमें बालों में मेंहदी लगाना भी शामिल है. कल रात उसने जून से पूछा कि विवाह की वर्षगाँठ मनाने का उनकी नजर में क्या औचित्य है, उन दोनों के सोचने का ढंग एक ही निकला. उसे भी हर दिन उतना ही खास लगता है जितना वह दिन !

कल शाम अंततः वे क्लब गये और वहाँ का माहौल बेहद खुशनुमा लगा. हर तरफ फूलों की बहार ही बहार थी. सामने के बरामदे को बेहद कलात्मक ढंग से सजाया गया था. पीछे स्टेज था तथा शामियाना लगाया गया था. आग तपने के लिए भी इंतजाम था. लोग आकर्षक पोशाकों में थे.

सुबह जून से बात हुई, कल शाम गन्तव्य पर पहुंच कर भी उन्होंने समाचार दे दिया था. कल रात कई बार उसकी नींद खुली, स्वप्न भी देखे जो परेशानी को बढ़ाने वाले थे. उनके जाने पर पहली रात ! सुबह सवा छह बजे उठी, नैनी कल बिना कहे दिन भर नहीं आयी, इस समय काम कर रही है, उसने अपनी गलती मान ली और उसकी फटकार का कोई विरोध नहीं किया जैसा कि वह पहले करती है. इधर कुछ दिनों से उसमें बदलाव आया है. कल क्लब गये थे वे, नीली साड़ी सुंदर लग रही थी, जून होते तो फोटो खींचते. नन्हा लिख रहा है, सुबह उसे नॉवेल पढने पर कुछ दिनों के लिए रोक लगाने को कहा तो बुरा मान गया. ‘नसीहत’ पचाना आसन काम नहीं है. आज ‘योग वशिष्ठ’ की कथा प्रारम्भ हुई है, कहानी में कहानी कहने की संस्कृत साहित्य में अनोखी प्रथा है. आज गोयनका जी भी आये थे, विपासना के बारे में आरम्भिक व्याख्यान दिया. मन को ऊपरी सतह पर शांत कर लेना तो सहज है पर भीतर का पता तो वक्त पड़ने पर ही चलता है. उस दिन ट्रेन में यात्रियों की भीड़ देखकर वे विचलित हो गये थे. आज सभी के फोन आये सभी ने एनिवर्सरी की मुबारकबाद दी.

आज सुबह सवा छह बजे चिड़ियों की चहचहाहट सुनकर नींद खुली. उठते ही जून के होटल का नम्बर लगाया, वे भी उठ चुके थे. रात को दस बजे सो गयी थी, पर कुछ देर बाद बड़ी भाभी का फोन आया, वे परसों शुभकामना देना भूल गयी थीं, भाई से भी बात हुई. जून दिल्ली में उनसे मिलने जायेंगे. कल एक परिवार को लंच पर बुलाया था, वे लोग सुबह ही तिनसुकिया मेल से आये थे. एक और सखी तभी घर की चाबी देने आई, वे मुम्बई जाने के लिए एयरपोर्ट जा रहे थे. उन्हें इतनी जल्दी थी कि एक मिनट भी नहीं बैठे. जून की समय की पाबंदी की आदत के कारण वे लोग यात्रा पर निकलने से आधा घंटा पहले ही पूरी तरह से तैयार होकर बैठ जाते हैं.





रॉबिन कुक की किताब - टॉक्सिन


 नये वर्ष का दूसरा दिन, सारा दिन घर की सफाई में बीता. शाम को वे टहलने गये, जबकि जून को हल्का जुकाम है, दफ्तर में काम भी ज्यादा था, इसी हफ्ते उन्हें टूर पर भी जाना है. वे कल ही घर से वापस आये हैं, पर यह सुंदर ब्राउन डायरी उसे जून ने आज लाकर दी है. नन्हा पढ़ाई में व्यस्त है, बीच-बीच में पत्रिकाएँ पढ़ने लगता है. आज सुबह फोन से अन्य सभी से बात हुई. दीदी का फोन शायद कल आये. छोटी बहन बेहद उदास थी, उसे बेटियों की बहुत याद आ रही थी, जो उसकी फील्ड ड्यूटी के कारण पिछले कुछ दिनों से दादी के पास हैं. माँ, पिता और बच्चे तीनों अलग-अलग शहरों में रहने को विवश हैं, परिस्थितियाँ कुछ ऐसी हैं कि वे साथ नहीं रह सकते. माँ की तबियत फिर ज्यादा खराब हो गयी थी, वे दवा लेना बंद कर देती हैं फिर तकलीफ उठाती हैं. वृद्धावस्था इन्सान को लाचार बना देती है. पड़ोसिन को उसका लाया हल्के धानी रंग का चिकन का सूट पसंद आया, जो उसने मंगाया था. कल बंगाली सखी ने उनके दोपहर के खाने का और उड़िया सखी ने रात के खाने का इंतजाम किया था, थकान भी बहुत थी, सो अच्छा लगा. एक अन्य सखी से फोन पर बात हुई. इस बार उसने कुछ आध्यात्मिक पुस्तकें भी खरीदीं. एक पुस्तक ‘रेकी’ पर भी ली जो ट्रेन में ही पढ़ ली थी, प्रयोग में लाने हेतु कई बातें हैं, ध्यान की विधि भी है. परसों रात वे ट्रेन में थे जब पिछला साल गुजरा और नये वर्ष ने पदार्पण किया. पर इस बार कुछ विशेष नहीं लगा. अब पहले की तरह ख़ुशी के मौके तलाशने का मन नहीं होता, हर पल, हर दिन एक सा लगता है. यह रोजमर्रा की जिन्दगी, यह दिन-रात, महीने-वर्ष का बीतना तो चलता ही रहता है. असली चीज तो इसके पीछे है. परमेश्वर से उनका नाता.. जो सदा एक सा है !

‘मानव के पास विचार, भाव और विवेक का बल है लेकिन वह उसका उपयोग नहीं करता. अपने बाहरी  व्यक्तित्व को संवारने का यत्न तो करता है पर मानसिक, बौद्धिक व आत्म व्यक्तित्व को निखारने का प्रयास नहीं करता, सो आडम्बर और पाखंडपूर्ण जीवन जीता है’. उसे लगा, सचमुच भीतर से वे जितन सत्य के निकट होंगे, यथार्थ का सामना करेंगे, वास्तविकता को पहचानेंगे, उतना ही आंतरिक व्यक्तित्व व्यक्त होगा. अपने आदर्शों को मूर्त रूप देना होगा तथा उसे जीवन में उतारना होगा.

जनवरी की ठंड का अहसास आज पहली बार हुआ जब दोपहर होने से पहले हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गयी पर बाद में धूप निकल आई. सुबह वे पांच बजे उठे, रोजमर्रा के कामों को करते-करते सुबह गुजरी. सफाई का कुछ काम भी जारी रहा, कुछ अब भी शेष है. दोपहर को साड़ी में पीको किया, फाल लगाई. इतवार को क्लब मीट में पहनने के लिए नई पोशाक तैयार है. कल शाम उद्घाटन था, वे नहीं गये, आज भी शायद ही जाएँ. शाम को ठंड में ठिठुरते हुए अलाव के पास लोगों की भीड़ देखने जाने का मन अब नहीं होता. आज सुबह बहन से बात हुई, वह दोनों बच्चों और सास के साथ हिमाचल आ गयी है. उन्होंने उससे कहा है उसकी छोटी बिटिया को वे अपने साथ रख सकते हैं जब तक उसकी सर्विस का अनुबंध काल खत्म नहीं होता, पर उसे नहीं लगता यह सम्भव होगा. वे तीनों बहुत निर्भर हैं एक-दूसरे पर सो अलग-अलग रहना उनके लिए सजा न बन जाये. नन्हा फिजिक्स के गृहकार्य में लगा हुआ है. इस यात्रा में उसने रॉबिन कुक की किताब toxin उपहार मिले पैसों से खरीदी. बनारस में काफी घूमा और पतंगें उडायीं. सास-ससुर का स्वास्थ्य भी ठीक ही लगा. अगले एकाध महीने में वे लोग नये मकान में चले जायेंगे, जीवन में परिवर्तन होगा जो अच्छा ही है. इस छोटी सी यात्रा ने उनके मनों में भी नया जोश व उत्साह भर दिया है. यहाँ तक की नैनी भी काम मन लगाकर कर रही है. आज सम्भवतः वे कुछ देर बगीचे में भी टहल सकें, यदि जून समय पर घर आ जाएँ. उन्हें कल अपग्रेडेशन का लेटर मिला है, इतवार को उन्हें दिल्ली जाना है.

सुबह उठे तो ठंड बहुत थी, फिर समाचारों में सुना, पूरे उत्तर भारत में शीत लहर का प्रकोप है. शिमला में हिमपात हुआ है. बहन का ख्याल हो आया, पर इस समय धूप निकल आयी है. पंछियों की आवाजें रह रहकर आ रही हैं जो धूप का स्वागत करती प्रतीत होती हैं. आज ‘जागरण’ में उच्च विचार सुने जो प्रेरणादायक होने के साथ-साथ दर्पण का कार्य भी कर रहे थे. उसे भी लगा, वे छद्मवेश बनाये रखते हैं. उनकी कथनी व करनी के बीच की खाई निरंतर गहरी होती जाती है. मानव होने के नाते उनके कुछ कर्तव्य हैं कुछ उत्तरदायित्व हैं जो वे सुविधा होने पर पूरा करते हैं, कभी असुविधा का बहाना बना टालते रहते हैं. इस समय उसके मन में कई विचार एक साथ आ रहे हैं सो गड्ड-मड्ड हो रहे हैं, सर्वप्रथम अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होते हुए उसे एक्सरसाइज कर लेनी चाहिए तब तक मन भी व्यवस्थित हो चुका होगा.   




Sunday, August 31, 2014

डाक विभाग की हड़ताल


‘कर्म कामना प्रधान न हो बल्कि भावना प्रधान हो तो कर्म बंधन नहीं होता’. आज सुबह जल्दी उठी तो उपरोक्त वचन सुनने का सौभाग्य मिला. पिछले कुछ दिनों से ‘जागरण’ ठीक से सुन नहीं पायी, घर-गृहस्थी के कार्यों में व्यस्त रही. कुछ दिन तो स्वेटर बिनने में ही गुजरे, जल्दी पूरा करना था. कल सुबह मन अस्त-व्यस्त हो गया जिसका कारण नैनी की कठोर भाषा थी, वह अपने बेटे को बुरी तरह से डांट रही थी. इतने वर्षों उनके घर काम करने के बाद भी वह मीठा बोलना नहीं सीख पायी है, आदत को बदलना असम्भव कार्य है.  

बाबाजी कहते हैं “जिसे भवसागर से तरना है, उसे छोड़ खुदी, खुद मरना है”, भवसागर से तरने की कीमत बहुत ज्यादा है. हर क्षण सचेत रहकर प्रेय और श्रेय का ध्यान रखकर चुनना होता है. मन यदि कामना से मुक्त नहीं कर सकते तो भक्ति का ढोंग रचने से कोई लाभ नहीं होगा. एक ओर तो वह संसार के सारे सुख चाहती है और दूसरी ओर ईश्वर का प्रेम भी पाना चाहती है. परमात्मा से प्रेम का संबंध इतनी आसानी से नहीं बनता और जब बन जाता है तो उसे तोड़ना भी उतना ही मुश्किल है. मन का स्वाभाविक संबंध संसार से है आत्मा का स्वाभाविक संबंध परमात्मा से है. यदि अपने भीतर के सच्चे स्वरूप की स्मृति हो तो सुख की चाह में संसार की गुलामी नहीं करनी पड़ेगी.

आज नन्हे को स्कूल में वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेना है, उसने अभ्यास भी किया है. अगले हफ्ते उन्हें घर जाना है लेकिन दो दिन ‘असम बंद’ और एक दिन ‘पश्चिम बंगाल बंद’ के कारण उनकी यात्रा लंबी खिंच सकती है. पिछले दिनों यहाँ का माहौल भी तनावग्रस्त था, कई स्थानों पर हिंदी भाषी लोगों की नृशंस हत्या हुई. संसद में कल एक हफ्ते बाद कार्य शुरू हुआ. डाक विभाग की हड़ताल को भी एक हफ्ता हो चुका है. अयोध्या में राम मन्दिर बने इस पर बयान देकर वाजपेयी जी ने खुद के लिए परेशानी मोल ले ली है. अमेरिका के नये राष्ट्रपति जार्ज बुश होंगे अंततः यह निर्णय ले लिए गया है.

‘ईश्वर से मानव का संबंध सनातन है, वे उसी के अंश हैं, उसका प्रेम ही उनके हृदयों में छलकता है. अज्ञानवश वे इस बात को भूल जाते हैं और स्वार्थपूर्ण संबंधों में प्रेम पाने का प्रयास करते हैं, तभी दुःख को प्राप्त होते हैं’. उपरोक्त वचन सुबह सुने और लिख लिए, सचमुच संबंध जब तक स्वार्थहीन नहीं होंगे तब तक बंधन बना ही रहेगा. स्वार्थ की भावना कामना की पूर्ति हेतु है, कामना अभाव की पूर्ति के लिए है और अभाव का कारण अज्ञान है, अभाव मानव का स्वभाव नहीं है क्यों कि वह वास्तव में पूर्ण है, अपूर्णता ऊपर से ओढ़ी हुई है और चाहे कितनी भी कामना पूर्ति क्यों न हो जाये यह अपूर्णता इन संबंधों से, वस्तुओं से भरने वाली नहीं क्यों कि पूर्ण तो मात्र ईश्वर है वही इसे भर सकता है. इसी तरह, वे मुक्त होना चाहते हैं जबकि मुक्त तो वे हैं ही, बंधंन खुद के बनाये हुए हैं, प्रतीत मात्र होते हैं. जब किसी कामना पूर्ति की अपेक्षा नहीं रहेगी चाह नहीं रहेगी तो मुक्तता स्वयं ही अनुभव में आ जाएगी. उसे लिखते-लिखते ही मुक्तता की अनुभूति हुई.


आज उन्हें बनारस जाना है. कल रात्रि स्वप्न में सभी संबंधियों को देखती रही. मंझले भाई को देखा, उसे बुखार है, फोन किया तो पता चला वास्तव में उसे ज्वर है. कुछ बातें समझ से परे होती हैं.  

Saturday, August 30, 2014

टेलीविजन - इडियट बॉक्स


पवित्र संग की आध्यात्मिक तरंगे हृदय को प्रभावित करती हैं और साधक को लोकातीत परमसुख का आकर्षण होता है”. आज बाबाजी ने संग की महत्ता को बताया. संग का बड़ा रंग लगता है. उसने चिन्तन किया यदि कामनाएं सीमित हों तो मन सुखी रहता है. ईश्वर का वरदान स्वरूप यह जीवन उन्हें समय की धारा के साथ-साथ बढ़ने के लिए मिला है. मन पर नियन्त्रण एक मर्यादा को जन्म देता है. सामान्य सुखों के पीछे अपने हृदय के अलौकिक सुख को जो तज दे, वह दुखों को आमन्त्रण दे रहा है. अंतर्दृष्टि रखते हुए इस जीवन रूपी चादर को स्वच्छ रखा जा सकता है, बुद्धि स्थिर होने से ही सही निर्णय की शक्ति प्राप्त होती है.

आज बाबाजी ने बड़ी मजेदार बात कही, कुल डेढ़ पाप होता है और कुल डेढ़ ही पुण्य होता है. एक पाप देह को ‘मैं’ मानकर उसमें आसक्त रहना और आधा सारे अन्य पापों को मिलाकर होगा. इसी तरह एक पुण्य आत्मा को ‘मैं’ मानने से व शेष आधा अन्य सभी अच्छे कर्मों को मिलाकर होगा. उस दिन मीटिंग अच्छी रही. उसका कविता पाठ सबसे पहले हुआ, कुछ लोगों ने तारीफ भी की. एक सखी का pearl set पहन कर अच्छा लगा, ड्रेस कोड के हिसाब से उसे वह पहनना था.  वक्त पड़ने पर उसने सहायता की, इसी का नाम तो मित्रता है. आज धूप तेज है, सूरज की तरफ पीठ करके बैठने पर भी चेहरे पर तपन महसूस हो रही है. सो अंदर जाना ही ठीक है. बगीचे में फूल ही फूल दिखाई दे रहे हैं, क्रिसेंथमम व गुलाब के फूल तथा जीनिय के, जो बड़े शोख रंगों में हैं.

आज बाबाजी का प्रवचन सुनकर मन भावविभोर हो उठा. कितनी गूढ़ बातें वह कितनी सहजता से कह जाते हैं. ईश्वर के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं. न जाने कितने उदाहरण, कितने उपाय बताते हैं. हर कोई अपने स्वभाव व रूचि के अनुसार तरीका पसंद करे और चल दे उस सच्चे मार्ग पर, जिससे अपना भी कल्याण है और लोक कल्याण भी . वह कहते हैं किसी भी बाहरी आकृति या रूप की नकल कोई न करे. अच्छा बनने का प्रयास भी नहीं बल्कि वह जो है, उसे सहज होकर जाने. यह जानना ही उसे सच्चा ज्ञान देगा. किसी को कुछ बनने की, किसी के जैसे होने की लालसा को प्रश्रय नहीं देना है, बल्कि अपने भीतर छुपी उस अनंत शक्ति का बोध पाना है, अपने अंतर के ईश्वर को भजना है. मन्दिरों और तीर्थों के भगवान किसी का कुछ भी भला नहीं करेंगे यदि मन में उसके दर्शन नहीं किये. कबीरदास ने ठीक ही कहा है – माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख मांहि, मनवा तो चहूँ दिसी फिरै....इस चहूँ दिसी फिरने वाले मानस को राह दिखानी है. राह जो उस परम सत्य तक ले जाती है. मनसा, वाचा, कर्मणा उसे ही समर्पित होना है. मन व्यर्थ का चिन्तन न करे, वाणी का दुरूपयोग न हो, कर्म ईश्वर को अर्पण हों तो जीवन स्वयंमेव तीर्थ बन जायेगा !

TV viewing is harmful for children, in fact it should be excess TV viewing is harmful for children. Nanha has to speak on this topic tomorrow. So she thought to brush up her mind also to get some points.Violence is increasing in  today’s youngsters even toddlers these days. Mothers are complaining the aggressiveness and restlessness among kids who are exposed to all kinds of programmes on TV.Children are more demanding these days, they get attracted to all the beautiful things, dresses and other products on TV and they want same things, they do not understand the difference between reality and virtual.They are exposed to harmful radiations, in cities houses are small so they watch TV from a short distance which affects their eyes also.They are distracted, while preparing for test and exams, if their favourite programme is being telecast ed they rush to watch it. They waste their valuable time, which can make or mar their future.They disobey their parents, who want to limit their TV hours. Children do not play outdoor games, they are less social than their parents when they were young. They live in fantasy which keeps them away from real life realities. They are exposed to all kind of adult program which can leave harmful impression on their young mind.  They mostly watch film based programmes or cartoon shows, both give only light entertainment but no education. She thought if Nanha asks her help she can give now.



Friday, August 29, 2014

गेंदे की क्यारी


कल शाम वह नैनी पर झुंझलाई और आज सुबह स्वीपर पर, दोनों अपने काम को टालने का प्रयत्न कर रहे थे. कभी-कभी ऊपर से क्रोध करना जरूरी हो जाता है, पर क्या वास्तव में सिर्फ ऊपर से ही क्रोध कर रही थी? इसका एक प्रमाण तो यह है कि अगले ही पल मन शांत था जबकि पहले देर तक असर रहता था. पूसी ने अपने बच्चों को बाहर खुले में ही रख छोड़ा है, जून का विचार है कि उन्हें प्राकृतिक रूप से पलने-बढ़ने दिया जाये, उसका भी यही विचार है, उस दिन उनके लिए दफ्ती के डिब्बे का घर बनाते-बनाते स्वयं को रोक लिया. आज भी धूप निकली है पर हवा बह रही है वह बाहर लॉन में ही बैठी है. दूर से किसी वाहन की आवाज आ रही है. कभी संगीत की और पंछियों की आवाजें भी ध्यान से सुनने पर आती हैं. कल शाम की पार्टी में पता चला कि ग्रेटर नोएडा में अपना घर बनाने के लिए जो सोसायटी बनाई गयी है उसमें ज्यादातर लोग रहने के लिए नहीं बल्कि इन्वेस्टमेंट के लिए पैसा लगा रहे हैं. जून भी कल की मीटिंग से ज्यादा खुश नहीं थे. पहली किश्त भरने के लिए उन्होंने पहले मकान के किराये के जमा हुए पैसे मंगाए हैं. सबकी बातें सुनकर तो उसे लगा कि एक बार और उन्हें भी सोच लेना चाहिए. रोज के कामों के आलावा आज उसे नन्हे का स्वेटर बनाना है, सुभाष चन्द्र बोस व शंकरदेव पर किताबें भी पढनी हैं. पत्रिकाएँ और अख़बार तो हैं ही. कविताओं वाली डायरी खोलनी है. बगीचे में भी कुछ समय देना है. कुल मिलाकर आज का दिन व्यस्त रहने वाला है.  

आज उसने जो सुना, उसका सार था, “साधना करने के लिए सम्पूर्ण समर्पण चाहिए, श्रद्धा, भावना और विश्वास चाहिये, पुलक चाहिए, मन को पूरी तरह अहंकार से मुक्त करना होगा. भीतर डूबना आना चाहिए. ध्यानस्थ होना पड़ता है. अपने चित्त की सौम्यता को नष्ट नहीं होने देना चाहिए. मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा के भाव रखते हुए अपने चित्त को प्रसन्न रखना होगा. समय की धारा के साथ पुराने कर्मों का लेन-देन चलता रहता है. नये कर्मों का बंधन न बने यही प्रयास करना चाहिए.

कल वह गाने की प्रैक्टिस में नहीं जा सकी, आज साढ़े पांच बजे जाना है. परसों मीटिंग है. वह बाहर है गेंदे की क्यारी के पास, अभी एकाध फूल ही खिले हैं इसमें. आज सुबह माँ से फोन पर बात की. कल चचेरी बहन की शादी अच्छी तरह सम्पन्न हो गयी. उसके मामा के परिवार ने काफी कुछ दिया. इधर उनकी तरफ से सभी का सहयोग रहा. यहाँ बाहर बैठकर चेहरे पर जो शीतल हवा छूकर जाती है, भली लगती है, उसका अहसास अंदर घर में नहीं हो सकता, पर तरह-तरह की आवाजें आती रहती हैं सो गम्भीर कार्य नहीं हो पाते. आज सुबह वह जल्दी उठी थी सो सभी कार्य समय से सम्पन्न हो चुके हैं. आजकल जून के प्रति उसका व्यवहार थोड़ा कम स्नेहपूर्ण रहता है. छोटी-छोटी बातों से चिढ़कर वह जवाब दे देती है. सहनशीलता खोती जा रही है या फिर अपनापन बढ़ता जा  रहा है. अब संगीत का समय है सो अंदर जाना चाहिए.

जीवन में ज्ञान और ध्यान हो तभी मुक्ति सम्भव है ! कल सुबह उसके दायें हाथ की अंगूठे के पास वाली अंगुली में जोड़ पर एक कांटा लग गया, बात छोटी सी है पर उसके मन ने उस हल्के दर्द को भी बड़ा मानकर देखा. नन्हे के हाथ का दर्द इससे कहीं ज्यादा रहा होगा लेकिन उसने संयम से सहा. इस वक्त सुबह के साढ़े सात बजे हैं वह टीवी पर  बाबाजी के आने की प्रतीक्षा में है.

“अपने मन. बुद्धि, विचार को देखने वाला इनसे अलग है, यदि इनसे जुडकर रहेंगे तो सही निर्णय नहीं कर पाएंगे. देह, मन बुद्धि के साथ जुड़कर कोई ‘स्वयं’ को खो देता है. इसका कारण तमो व रजो गुण है. यदि सात्विक गुण की प्रधानता हो तो धीरे-धीरे इन से मुक्त होना आयेगा. तमो गुण की प्रधानता का अर्थ है आलस्य व स्वार्थ और रजो गुण की प्रधानता का अर्थ है अपने मान-सम्मान की वृद्धि का सदा प्रयास करते रहना. देह की आवश्यकता सांसारिक वस्तुएं हैं, पर ‘स्वयं’ की आवश्यकता परमात्मा का स्वभाव है. ‘स्वयं’ को खोजना ही वास्तविक विज्ञान है. अंत में उन्होंने कहा एहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दिन भर प्रयास चलता रहता है पर स्वयं की आवश्यकता को नजर अंदाज कर दिया जाता है.

  



Wednesday, August 27, 2014

कालिया नाग पर नृत्य


आज चाचा नेहरू का जन्मदिवस है “बाल दिवस ! बाबाजी कह रहे हैं, “शरीर स्वस्थ रहे, मन में शांति रहे, हृदय में आनंद रहे, क्योंकि स्वास्थ्य, शांति और आनंद स्वाभाविक हैं, इनके विपरीत अस्वाभाविक हैं. इनको पाने की इच्छा शेष सभी तुच्छ इच्छाओं को निगल जाती है और अंततः वह इच्छा भी स्वयं ही शांत हो जाती है, हृदय शुद्ध हो जाता है और अपने सहज रूप को पा लेता है. आदि भौतिक कर्म से आदि दैविक फल मिले ऐसा प्रयास करना चाहिए क्योंकि वह कर्म स्वार्थ पर नहीं टिका होगा”. आज उसने क्लब की पत्रिका के लिए हिदी की रचनाओं हेतु दो-तीन महिलाओं को फोन किये, उसे भी दो रचनाएँ तैयार रखनी हैं.

आज दोपहर वह असमिया सखी के यहाँ जा रही है, उसे बुनाई में उसकी आवश्यकता है. कल शाम को क्लब की मीटिंग में होने वाले कार्यक्रम के लिए गीत का चुनाव हुआ, ‘तीसरी कसम’ के एक गीत को चुना है, सिखाने वाली हैं एक बंगाली महिला, कल वह पहली बार उनसे मिली, अच्छा स्वभाव है उनका. कल जून ने seven spiritual laws for success भी प्रिंट कर दिए. परसों शाम उन्होंने ही टाइप किये थे. आज सुबह उसने दो बातों के लिए उन्हें टोका, पर गलत बात के लिए टोका न जाये तो.... क्या किया जाये ? परसों नन्हे के स्कूल में वार्षिक उत्सव मनाया जा रहा है.

“अंतः करण की यमुना में सहस्र फन वाला कालिया नाग रहता है, आत्मा रूपी कृष्ण यदि जप और पूजन का नृत्य उसके फनों पर करता रहे तो सदियों की पुरानी आदत शीघ्र नहीं जाएगी, फन टूटेंगे फिर बनेंगे पर अंततः विजय आत्मा की ही होगी”. हमारे मानस में इच्छाओं, कामनाओं, और वासनाओं के अनगिनत सर्प फन उठाये बैठे हैं जिन्हें अपने वश में करना है. आज बाबाजी ने कृष्ण की कथा का सुंदर अर्थ बताया. चित्त जैसा देखता है वैसा होता है, सन्त को देखते ही ईश्वर का स्मरण होना स्वाभाविक है. आज नन्हे को नहाने के लिए जबरदस्ती बाथरूम में भेजा तो वह पूरे चालीस मिनट बाद निकला. इस सारे वक्त वह नहा तो नहीं रहा होगा बल्कि मुँह फुलाकर बैठा रहा होगा.

“रक्तबीज की तरह मन में विकारों के बीज गिरते हैं तो नये विकार उत्पन्न होते हैं, चंडी माँ की तरह रक्तबीज को खप्पर में एकत्र करते हैं तो विकार बढ़ते नहीं. मानस की उपजाऊ धरती न मिले तो बीज नष्ट हो जाते हैं”. बुद्धि के स्तर पर गोयनका जी की कही यह बात उसे समझ में आने लगी है पर व्यवहार के समय इसे अपना नहीं पाती. होशा जगा रहे तो ही यह सम्भव है. अनुभूति वाला ज्ञान जगने लगे तभी यह सम्भव है. आज सुबह दीदी का फोन आया, उन्हें भी गोयनका जी के प्रवचन के बारे में बताया.

दोपहर के एक बजे हैं, आज मसूर की छिलके वाली दाल बनाई थी जो बहुत गरिष्ठ होती है सो आज एक अलसता सी मन पर छाई है. धूप निकल आई है, पिछले दिनों वर्षा के कारण मौसम बेहद ठंडा रहा. कल फोन से सभी के समाचार मिले, वे एक-एक कर सभी को कार्ड भेज रहे हैं जो नन्हे ने बनाये हैं. कल उसे स्कूल से पुरस्कार में पांच किताबें  मिलीं, सभी उपयोगी हैं. आज शाम को उसे एक सखी के जन्मदिन की पार्टी में जाना है. उससे पूर्व जून को क्लब में होने वाली मीटिंग में जाना है जो ग्रेटर नोएडा में बनने वाले फ्लैट्स  के सिलसिले में है. उन्होंने भी एक फ़्लैट बुक किया है. वर्षों बाद जब वे रिटायर होकर यहाँ से जायेंगे तो उनके रहने के लिए एक घर सुरक्षित स्थान पर होगा जहाँ अपने जीवन के शेष दिन शांति से गुजार सकेंगे. नन्हा तब पढ़ाई पूर्ण कर नौकरी कर रहा होगा, उसका परिवार भी होगा. अगले दो दशकों में उनका जीवन कुछ और ही होगा. समय की धारा यूँ ही बहती चली जाएगी. पूसी के दो छोटे-छोटे बच्चों को आज देखा, बाहर भीगी जमीन पर गर्म पानी के बर्नर के पास एक के ऊपर एक सिमटे पड़े थे.  


  

Tuesday, August 26, 2014

नानक नाम जहाज है


पिछले दो दिन फिर डायरी नहीं खोल पायी, आज भी यह बेमौसम बरसात की तरह सुबह के दस बजे ( जो समय संगीत के लिए सुरक्षित है) इसलिए खोली है कि स्वीपर आज बहुत देर से आया है. नैनी डिब्रूगढ़ गयी है, सुबह किचन का सारा कार्य स्वयं किया. वह नई पीली साड़ी पहन कर जब जा रही थी, अच्छी लग रही थी, खुश भी थी सो उसने भी ख़ुशी-ख़ुशी सभी काम किये. आज माली से आंवले भी तुड़वाये हैं, इस मौसम में पहली बार. सुबह गोयनका जी का प्रवचन सुना. ‘श्रद्धा पहली सीढ़ी है आत्मज्ञान के मार्ग की. पूर्णत सचेत मन ही धर्म को धारण कर सकता है. धर्म वह जो सार्वजनीन हो, प्रतिपल सजग रहने का संकल्प जगाता हो’. उसे लगा, जीवन पर्यन्त जो बेहोशी की अवस्था में जीये चले जाते हैं, न तो गहराई से स्वयं को जानने का प्रयास करते है न ही किसी अन्य को सुनना या समझना चाहते हैं, उथला-उथला सा ही जीवन जीते हैं, जिसमें संवेदना नहीं होती. क्यों न हर पल एक अनुभूति का पल बन जाये, जो क्षण जिस कार्य के लिए हो अपना आप उसे अर्पित कर दें. तब वह काम भी सफल होगा और उनकी ऊर्जा जो इधर-उधर व्यर्थ होती है, केन्द्रित हो पायेगी.

आज कितने सुंदर शब्द उसके कान में पड़े, ‘चलो सखि यह मन संत बनाएं’ ! और उसके भीतर विचारधारा बहने लगी. यदि यह मन, जो सारे क्रिया-कलापों का केंद्र बिंदु है सन्त बन जाये तो वे अपने स्वरूप को प्राप्त कर सकते हैं. ऐसा मन जो आलोचना नहीं करता, अपेक्षा नहीं रखता, पूर्वाग्रहों से मुक्त है. मन जो गतिमान है रमता जोगी है, जो जल की अविरल धारा की तरह बहता जाता है तट को भिगोता हुआ पर तट से बंधता नहीं. जो प्राणीमात्र के प्रति प्रेम से ओत-प्रोत है, जो विशाल है, संकुचित और संकीर्ण नहीं, जो मान नहीं चाहता. ऐसा मन ही समता में रह सकता है. सुख और शांति का आधार तो समता ही है न !

बाबाजी ने कितना सुंदर संदेश आज दिया, “धीरे-धीरे परम पथ पर बढ़ते जाना है. नेत्रों की ज्योति कम हो उसके पूर्व ही देखने की वासना न रहे, सुनने की क्षमता नष्ट हो जाये इससे पूर्व ही सुनने की इच्छा पर नियन्त्रण करना आ जाये. श्वासें साथ छोड़ने लगें इससे पूर्व ही जीवन का मोह न रहे. स्मृति और कल्पना के आधार पर होने वाले भय, शोक और मोह से मुक्त हुआ मन आत्मा में रहना सीख जाय. जिसे तृष्णा जलाती है वह कंगाल है, जिसे कुछ पाना शेष नहीं रह जाता वह अमीर है”.

आज गुरुनानक जयंती है, सुबह-सुबह पिता को जन्मदिन की बधाई दी. दादी कहती थीं टुबड़ी के दिन उनका जन्म हुआ था, अंग्रेजी तिथि उन्हें याद नहीं थी. वे हिमाचल में थे, छोटी बहन की बेटियों की देखभाल कर रहे थे, उसे पांच दिनों के लिए फील्ड ड्यटी पर जाना था. पता चला अगले कुछ दिनों में छोटे व मंझले दोनों भाइयों का तबादला घर के आस-पास ही हो जायेगा. उसने वर्षों पहले बचपन में नानक के जीवन पर एक पंजाबी फिल्म देखी थी, जिसके कुछ दृश्य आज भी उसे याद हैं. कल नन्हा दिन भर नये साल के शुभकामना कार्ड्स बनाने में व्यस्त रहा जिन्हें आज जून लिफाफों में डाल रहे हैं, उसे सिर्फ दो-चार खत लिखने हैं. नन्हे का स्कूल खुला है पर जून का दफ्तर आज बंद है. इस महीने क्लब की मीटिंग है वह अपनी नई कवितायें पढ़ेगी.