Monday, August 11, 2014

हाथ में प्लास्टर



हर रात नींद में जाते वक्त सभी संसार का त्याग करते हैं, सोये हुए व्यक्ति और मृत व्यक्ति में क्या अंतर है ? आज बाबा जी ने पूछा. रोज वह सुनती है कि संसार में सब कुछ अनिशचित है, परिवर्तनशील है, एक पल का भी भरोसा नहीं, कल इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया. नन्हा स्कूल से आया तो उसके दाहिने हाथ में दर्द था, बस स्टॉप पर एक लड़का उसके हाथ पर बैठ गया था, उन्हें उसके स्कूल जाना था सो दवा लगाकर वे चले गये. वापस लौटे तो उसके हाथ में सूजन थी और दर्द भी बहुत था. डाक्टर को फोन किया तो उसने आज सुबह एक्सरे करने की बात कही, एक्सरे में हल्का सा फ्रैक्चर है. सोमवार से उसकी छमाही परीक्षाएं हैं, दर्द में है फिर भी पढ़ रहा है. उसकी सहने की शक्ति नूना से कहीं अधिक है. कल सुबह वह परेशान थी तो सारा रूटीन गड़बड़ा गया था, आज सुबह नन्हे के साथ ही बीती. पिछले दो दिन दोपहर की पढ़ाई सिलाई के कारण नहीं कर पायी थी, पिछले दो दिनों की कविताएँ भी शेष हैं.

नन्हा हाथ के दर्द के बावजूद शांत भाव से पढ़ाई में व्यस्त है. पता नहीं सोमवार तक उसका हाथ ठीक हो भी जायेगा या नहीं, ईश्वर को जो मंजूर होगा वही होगा. वे अपनी अल्प बुद्धि का प्रयोग कहाँ तक करें. आज धूप बहुत तेज है, सुबह ही उनकी नैनी ने किचन खाली कर दिया था कि पुताई करने वाले मजदूर आएंगे. कल शाम को एक मित्र परिवार आया, नन्हे को शुभकामना कार्ड और चाकलेट दी उसे भी अच्छा लगा. उसका संगीत अभ्यास में पूरा मन नहीं लग पा रहा था, शायद गर्मी व उमस की वजह से अथवा ‘राग सोहनी’ के छोटा ख्याल की तानें बहुत कठिन हैं.

जो कुछ वह पढ़ती है, सुनती है उसका लाभ मन को सही-सही देखने के रूप में दीख रहा है. जब मन के विपरीत कोई कुछ कहता है तब कैसा विचलित हो जाता है, नसें तन जाती हैं और दुखद संवेगों का chain reaction शुरू हो जाता है. जैसे ही मन ने द्वेष जताया कि उसके विपरीत एक प्रतिक्रिया हुई और फिर उस के विरुद्ध एक और...अगर सजग नहीं रही तो कुछ ही देर में एक नया संस्कार जड़ पकड़ लेगा यदि सजग होकर देखा तो सब कुछ अपने आप विलीन होता जाता है. मन यदि गतिशील हो तो पानी की तरह है ठोस मन पर लकीर गहरी होगी ही. सभी को अपनी बात कहने का हक है, किसी को पसंद हो या न हो, उदार मन से सभी को स्वीकार करना और सुनना सीखना होगा. जून और नन्हा अस्पताल गये हैं, आज नन्हे को परमानेंट प्लास्टर लगाना पद सकता है, उसका दर्द अभी तक कम नहीं हुआ है. उसने बहादुरी से इस चोट का सामना किया है, किसी भी समय उन्होंने उसे उदास नहीं देखा.


पिछले तीन दिन कुछ नहीं लिखा. आजकल नन्हे के घर रहने के कारण समय कैसे बीत जाता है पता नहीं चलता. कल उसे चोट लगे पूरे आठ दिन हो गये. वे पहले की तरह सुबह जल्दी उठते हैं. जून आज ongc से आए अपने मेहमानों के साथ व्यस्त होंगे. कल शाम नन्हे ने पहली बार कहा कि वह अपने हाथ में लगे प्लास्टर के कारण परेशान हो गया है, सो उसने उसे व्यस्त रखने के लिए कुकिंग में साथ देने के लिए कहा. आज उन्होंने ‘अरबी दम’ बनायी. नन्हे को सारा सामान इक्कठा करने को कहा जो वह पहले भी किया करता था. अभी २-३ हफ्ते उसे और प्लास्टर के साथ रहना होगा. धीरे-धीरे आदत पड़ जाएगी ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि एक हाथ से (वह भी बांया) काम करने पर असुविधा का सामना हर क्षण करना पड़ता है. नन्हा लेकिन अपने सारे काम कर लेता है सिवाय ब्रश पर पेस्ट लगाने के. उन्होंने घर पर किसी को कुछ नहीं बताया है, वे सभी लोग घबरा जायेंगे. एक बार तो फ्रैक्चर हुआ है, सुनकर ही कैसा भय लगता है, पर उन तीनो में से कोई भी भयभीत नहीं है. वे अपनी सामान्य जिन्दगी जी रहे हैं. नन्हा पढ़ाई, टीवी, व कम्प्यूटर में व्यस्त रहता है, शर्लक होम्स के किस्से उसे बहुत अच्छे लग रहे हैं. आज सुबह बड़ी ननद का फोन आया, बाकी कहीं से कोई पत्र या फोन नहीं आया है कई दिनों से. उसका भी अभी कहीं कोई पत्र भेजने का इरादा नहीं है. नन्हे का प्लास्टर खुलने के बाद ही लिखेगी. बाबाजी से रोज सुबह मिलना होता है. उस दिन रात को उसने उन्हें पुकारा था और स्वप्न में आकर उन्होंने जवाब भी दिया था. ध्यान करने का समय सुबह नहीं मिल पाता. नन्हे के स्कूल जाने के बाद ही सम्भवतः सम्भव होगा. शाम को अलबत्ता समय मिल सकता है या निकाला जा सकता है.  

Saturday, August 9, 2014

किचन में रंग-रोगन


इतने दिनों से सन्त वाणी सुनकर उसे इतना तो निश्चय हो गया है कि उन्हें अपने जीवन को आध्यात्मिक बनाना है. बाबाजी ने बताया, अध्यात्म का अर्थ है अपने भीतर उतरना, भीतर का संयोजन, नियोजन व शोधन, आत्म विश्लेषण ! मन को उच्च आदर्शों, उत्थान, और मूल्यों के प्रति समर्पित करना, अंतकरण को पवित्र करना और अपने मूल स्वरूप को पहचानना. ऊपरी मन बहुरूपिया है कभी उत्थान की ओर जाता है कभी पतन की ओर ले जाता है. कभी संयमी हो जाता है कभी विलासी, यह मन मात्र ही चरित्र का गठन नहीं कर सकता, इससे परे एक ऐसा मन भी है जिसे आत्मा कह सकते हैं, जो निर्विकार है, जहाँ उतार-चढ़ाव नहीं हैं. वहीं तक पहुंचना, अभ्यास व वैराग्य के द्वारा वहाँ तक पहुंचना ही अध्यात्म है. इसके लिए जरूरी है उनकी आस्था का केंद्र उच्च हो, मन में श्रद्धा हो. मन इच्छाओं से मुक्त हो, ऐसा मन निर्मल आकाश की तरह है - स्वच्छ, असीम, अनंत ! जीवन यदि प्रेम, भावना, करुणा से युक्त हो तो मन आत्मा में ही रहता है.

आज उसने फिर सुना, प्रेम एक व्यापक तत्व है, समन्दर की तरह विशाल और आकाश की तरह निस्सीम ! मोह संकीर्ण धारा की तरह है, मोह बंधन में डालता है जबकि प्रेम मुक्त करता है. रात से ही वर्षा की झड़ी लगी थी, जून और नन्हा जब गये तो वर्षा हो ही रही थी, अब थमी है, आकाश जो बादलों से ढक गया था फिर स्पष्ट दिखाई दे रहा है, नीला आकाश जो उसके मन का स्वभाव है, स्वच्छ, निर्मल विशाल और मुक्त ! उन्हें अपने मन के उसी स्वभाव में रहना सीखना है, विचारों के बादल उसे आच्छादित कर भी लें तो भी उन्हें उसकी स्मृति को बनाये रखना है प्रतिपल, प्रतिक्षण ! उसका मन जो चारों दिशाओं में बिखरा-बिखरा सा रहता है उसे एकत्रित करना है एक रूप देना है, यानि प्रतिक्षण जागरूक रहना है. यह संसार जैसा उसे दिखाई देता है वास्तव में वैसा है नहीं, प्रतिक्षण बदलते इस संसार को साक्षी भाव से देखते जाना है. दीदी ने बहुत पहले लिखा था, प्रतिक्रिया ही दुःख का कारण है, देर-सबेर सत्य अपने आप ही सम्मुख आ जाता है, सत्य की स्थापना नहीं करनी पडती, वह तो स्वयंभू है.

Sunday , it is quarter to eight in the evening. Today they got up at six in the morning, did all Sunday jobs, went for a walk in the afternoon. Watched tera jadu chal gya on tv, talked to parents and one friend, who came back today from Bombay. Now they are watching ‘Rishtey’ on Zee tv. Nanha is studying in his room, jun is here with her. Rishtey is very very touchy and warm  serial, really they feel it in their heart.


धर्म उसका है जो उस पर चलता है. जो खुद के प्रति ईमानदार है. जो नये-नये कर्म बंधन नहीं बांधता, ह्रदय में जो गांठे पड़ गयी हैं उन्हें खोलता चलता है. जो स्वयं के लिए सुख-सुविधापूर्ण जीवन की अभिलाषा नहीं रखता बल्कि जैसा समय और परिस्थितियां हों स्वयं को उनके अनुसार ढाल लेता है. धर्म तो भीतर की वस्तु है, अंतर्मन की, भीतर क्या-क्या चल रहा है, क्या वे अपने सहज स्वाभाविक रूप में सदा रह पाते हैं या अपने आप से नजरें चुराते हैं, यदि वे स्वयं की नजरों में धार्मिक हैं तभी दुनिया की नजरों में धार्मिक बने रहने का उन्हें अधिकार है.


उन्हें ऊपर की ओर उठना है, नीचे गिरना तो सहज है, पतन के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता, पुरुषार्थ तो उसी में है जब मन आत्मा में स्थित रहे. आज उन्हें दिगबोई जाना है, नन्हे के स्कूल में पैरेंट-टीचर मीटिंग है. अगले सोमवार से उसकी परीक्षाएं आरम्भ हो रही हैं. तैयारी ठीक चल रही है, अब हर वक्त उसे उसके साथ नहीं बैठना होता, स्वयं ही याद करता है, स्वयं को ही सुनाता है. उसे उसकी पढ़ाई से कोई शिकायत नहीं है, जून और वह दोनों संतुष्ट हैं कि उनका पुत्र बुद्धिमान है. कल दोपहर को पहली बार उसे कुछ असहज सा महसूस हुआ शरीर में, कल रात ठीक से सो नहीं पायी. आज सुबह से ही फिर अस्वस्थ महसूस कर रही है. आज ही किचन में रंग-रोगन होने की भी बात थी पर रात से लगातार होती वर्षा के कारण शायद वे लोग आज न आयें, यही बेहतर होगा. कल शाम वे एक मित्र-दंपत्ति से मिलने गये. अगले महीने वे फिर अगले इलाज के लिए जा रहे हैं. ईश्वर चाहेंगे तो उसकी सखी की दिली इच्छा कि वह माँ बने जल्दी ही पूरी होगी.

Friday, August 8, 2014

कान्हा का जन्मदिन


“एहिक विद्या, योगविद्या और आत्मिक विद्या ये तीन प्रकार की विद्याएँ होती हैं. जिनमें से पहली विद्या आजीविका के लिए है, दूसरी मानसिक उन्नति के लिए, तीसरी पर ध्यान कम ही दिया जाता है. इसी का परिणाम है की छात्र जीवन समाप्त होते ही अधिक से अधिक आमदनी वाली नौकरी की तलाश शुरू हो जाती है”. आज बाबा जी बच्चों को सम्बोधित कर रहे थे. आज अपेक्षाकृत उसका सात्विक भाव जागृत है, कल की उहापोह से मुक्ति मिल गयी है, जैसे पौधा जल के बिना मुरझा जाता है वैसे ही इन्सान प्रेम के बिना सूख जाता है, धन-दौलत से भी ज्यादा जरूरी है प्रेम, अहैतुक एकान्तिक प्रेम ! ऐसा प्रेम जो दुराव नहीं करता, क्षमा करना जानता है और जो जीवन को जीवन बनाता है. जून आजकल व्यस्त हैं, कल शाम देर से घर आये बाद में वे एक मित्र के यहाँ गये, उनका घर भी एक अजीब सा मंजर लिए होता है, पर वे वहाँ बिना किसी लागलपेट के, बिना किसी संकोच के बातें करते हैं, हंसते हैं, पुरानी मित्रता है ऐसे ही असमिया सखी के यहाँ जाने पर होता है. आज सुबह छोटे भाई को जन्मदिन की शुभकामनायें दीं, माँ ने दवा लेना अपने आप बंद कर दिया था सो अस्वस्थ हो गयीं थीं, अब ठीक रही हैं पर उनसे बहुत कम देर बात हो पाई, पिता भी घूमने गये थे. उसने सोचा कल सुबह फिर फोन करेगी. कल जन्माष्टमी है उसने व्रत रखने का निश्चय किया है, कल का दिन कृष्ण को अर्पण, कृष्ण जो कितने नामों और रूपों में जग में आते रहे हैं. जिनकी वंशी की मोहक धुन ने सारे ब्रज को ही नहीं सारे विश्व को मोह लिया था, मोह लिया है और मोहती रहेगी. जो अर्जुन के सारथी भी हैं और गुरु भी, वही उसके जीवन के सारथी बन गये हैं.

आज जन्माष्टमी है. जून को आज अवकाश के दिन भी दफ्तर जाना पड़ा है. नन्हा घर पर ही है उसे उसका छोटा सा मन्दिर जिसे आज फूलों से सजाया है अच्छा लगा, वैसे तो कृष्ण उसके मन में हैं उसने उन्हें मानसिक पुष्पों को अर्पण किया है. गीता में सत्व, रज और तम से भी ऊपर उठने का पाठ पढ़ा, स्थितप्रज्ञ होने के वचन को दोहराया. सुख-दुःख, मान-अपमान, हानि-लाभ, ग्रीष्म-शीत आदि में सम भाव बनाये रखना है यह भी पुनः पढ़ा.

ईश्वरीय प्रसाद के रूप में वर्षा आज भी बरस रही है, बाहर शीतलता है और भीतर भी. कल दिन भर मन पर सद्विचारों का प्रभाव रहा पर रात को सोते समय कुछ ही पलों में मन कहाँ पहुंच गया. मन की शक्ति अपार है, आवश्यकता है इसका सदुपयोग करने की. काश जितनी तेजी से विचार पनपते हैं उतनी ही शीघ्रता से वे कहीं अंकित भी होते जाते, हजारों मन कागज खप जाता एक मन के विचारों को अंकित करने के लिए. कल रात छोटी ननद का फोन आया, वह नया मकान खरीद रही है, दशहरे में सम्भवतः गृहप्रवेश करेंगे. वे लोग इसी वर्ष उनके पास जायेंगे. उसके घर में माँ पिछले दिनों फिर अस्वस्थ हो गयी थीं. आजकल माँ-पिता दोनों मृत्यु के विषय में अवश्य सोचते होंगे, Tibetan book..पढकर वह भी सोचने लगी है. मरना जीने की शर्त है, उन सभी को एक न एक दिन तो मरना ही है, फिर क्यों न पहले से ही इसके लिए स्वयं को तैयार करें. यह बात जितनी अटपटी लगती है उतनी है नहीं, इन्सान हमेशा तो जिए चला नहीं जा सकता, कहीं न कहीं तो फुल स्टॉप लगाना ही होगा, किसी के जीवन में यह प्रक्रिया सहज भाव से होती है तथा किसी को बहुत दर्द व पीड़ा सहनी होती है. उसकी तो ईश्वर से प्रार्थना है कि मृत्यु लम्बी अस्वस्थता के बाद न हो, उतनी ही प्रिय हो जितना जीवन है. मृत्यु वैसे जीवन का अंत नहीं है पर यदि हो भी तब भी इसमें दुखी होने की क्या बात है, वे हों या न हों यह दुनिया तो वैसी ही रहेगी !
 



Wednesday, August 6, 2014

बरसात में


मन की आसक्ति को, प्रेम को, चाह को अगर दिशा मिल जाये, भावनाओं को, विचारों को केंद्र मिल जाये तो जीने की कला अपने आप ही आ जाती है. यदि चाह नश्वर की हो तो सुख भी नश्वर ही तो मिलेगा. मन में अनंत की चाह हो तभी अनंत की ओर कदम बढ़ेंगे”. आज फिर अमृत वाणी सुनने को मिली, सन्त ईश्वर प्राप्ति को कितना सहज बना देते हैं. इसीलिए ही शास्त्रों में गुरू की महिमा गायी गई है. कल जून और उसने साथ-साथ राजकपूर की पुरानी फिल्म ‘बरसात’ देखी, जिसमें प्रेम की शुद्धता, विशालता व अपार शक्ति का चित्रण है. प्रेम यदि हृदय में हो तो घृणा का कोई स्थान नहीं, प्रेम क्षमा सिखाता है. सच्चा प्रेम इस जगत में दुर्लभ है. जब कभी भी उसके अंतर में प्रेम की भावना प्रबल होती है सब कुछ कितना सुंदर लगता है. नन्हा भी आज कई दिनों के बाद स्कूल गया है.

‘जीवन का संघर्ष द्वन्द्वात्मक है, किन्तु सत्य सदा एक सा है. ईश्वर से विमुख को संसार का वैभव सदा एक सा नहीं मिल सकता पर भक्त को सदा अनन्य आनंद की प्राप्ति होती रहती है. नश्वर का मात्र उपयोग करना है शाश्वत से प्रेम करना है’. आज पुनः जागरण में ये विचार सुनने को मिले जो उसे भा गये और तभी से यह प्रयत्न है भी जारी है कि सद्चिन्तन चलता रहे. कुछ देर पूर्व उन परिचिता ने अपनी नैनी के द्वारा ससुराल से माँ-पिता द्वारा भेजी वस्तुएं उन्हें भेजीं. काजू, बादाम, अनार, चाकलेट, नमकीन तथा आंवले का मुरब्बा, इन सबके साथ उनका स्नेह तथा आशीर्वाद भी मिला.

ग्यारह बजने को हैं, जून अभी थोड़ी देर में आ जायेंगे. बादल बरस कर अभी-अभी थमे हैं. सुबह काले बादल अचानक ही छा गये और तेज हवा भी चलने लगी. असमिया सखी ने फोन पर कहा वर्षा होने वाली है तब उसका ध्यान उस ओर गया वरना तो अपने कार्यों में व्यस्त थी और आजकल उसका प्रिय कार्य है ईश्वर के बारे में सोचना. सुबह बाबाजी ने भावपूर्ण वचनों में धीर-गम्भीर बातें बतायीं. उन्होंने कहा जब भी कोई परेशान हो तो समझ ले ईश्वर का साथ उसने छोड़ दिया है. अपने मन को दो बातों से बचा पाने में वह असमर्थ है, वे हैं राग और द्वेष, यही दोनों संस्कार बनाती हैं. मन पर बहरी प्रभाव ऐसा होना चाहिए जैसे पानी पर लकीर, पर वे बनाते हैं लोहे पर लकीर, यदि धरा अथवा रेत पर लकीर हो तो भी सुधरने के आसार हैं. मन को चट्टान सा दृढ बनाना है और समुद्र सा गहरा, आकाश सा अनंत और पवन सा गतिमान.  नन्हा क्लब में स्वीमिंग गाला देखने गया है. जून सो रहे हैं. इतवार की शाम के साढ़े तीन हुए हैं. कल दोपहर से ही स्वयं को ईश्वर से विमुख पाया फिर तामसिक वृत्ति का प्रभाव लगता है. अर्जुन ने जब कृष्ण से कहा था कि मन बड़ा चंचल है इसे साधना बहुत कठिन है तो ऐसे ही प्रयासों के बारे में कहा होगा. कभी-कभी लगता है उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई कुछ कराए, कहलवाए जा रहा है. ऐसे वक्त में प्रकृति भी विपरीत लगती है. कल लाइब्रेरी से Tibetan book of dead and living फिर से लायी है. जून की तबियत कुछ नासाज है.

She read today’s line in diary – It takes a long time to bring excellence to maturity. Then wrote, it does not take long time to bring excellence to maturity but a very very long time to…. She moves forward and then after some days or weeks finds herself on the same position. Goyenka ji is right when he says that only conscious mind changes but innermost feelings are same, they remain hidden for some time due to intellect or some practice but suddenly one day outer cover  is thrown away and inside is in as mess and chaos as it was before, nothing has changed. She is very sad to see this, to experience once again defeat from her own self.
 







लालकिले की शान


आज नन्हा स्कूल नहीं गया, कल शाम से उसे ज्वर है, जून अभी कुछ देर पूर्व ही दवा देकर गये हैं. उन्हें एलोपैथी से ज्यादा होमियोपैथी पर भरोसा है. नन्हे ने गर्म पानी से नहा भी लिया है. बचपन में जब उसे ज्वर होता था उसे कहीं जाने नहीं देता था पर अब वह बड़ा हो रहा है, समझ रहा है यह ज्वर तो चला ही जायेगा. कल स्कूल में होने वाली क्विज प्रतियोगिता में भाग ले पायेगा या नहीं इसकी उसे जरूर चिंता है. कल रात से ही वर्षा लगातार हो रही है, असम में कई स्थानों पर बाढ़ पहले से ही आई हुई है. कुछ दिन पहले ही हिमाचल प्रदेश में भी अचानक  बाढ़ आ गयी. कल काश्मीर के श्रीनगर में दो बम विस्फोट हुए, मरने वालों में हिंदुस्तान टाइम्स के फोटोग्राफर प्रदीप भाटिया भी थे. हिजबुल ने विस्फोट का जिम्मा लिया है. कश्मीर को भारत से अलग कर देने की पाकिस्तान की कोशिशें भद्दा रूप लेती जा रही हैं, हजारों की हत्या हो चुकी हा, कितने घायल पड़े हैं, कितने परिवार अनाथ हुए हैं और कितना धन सेना पर खर्च हो रहा है, आखिर इस सब का अंत क्या होगा और कब होगा. आज सुबह जागरण में सुना, साधक की पहली जरूरत है अभिमान मुक्त होना. अभिमानी व्यक्ति छिद्रान्वेषी होता है, वह स्वयं को जानकार व दूसरों को अपने से कम समझता है. ईश्वर की खोज में जाना है तो पहले अहम् का त्याग करना होगा, पूर्ण समर्पण करना होगा.

आज भी नन्हा घर पर है, सुबह के साढ़े आठ हुए हैं, अगस्त की एक भीगी सुबह, चिड़ियों की मिली-जुली आवाजें आ रही हैं, सुबह से वह ज्यादातर नन्हे के साथ व्यस्त रही, उसका ज्वर काफी कम हो गया है. कल दोपहर बढ़ गया था. जून और उसकी देखभाल, दवा और परहेज, गरारे आदि सभी का असर हो रहा है. उसने जून के सामने निश्चय किया है कि वे अपनी बातचीत में किसी पर भी कभी व्यक्तिगत आक्षेप नहीं करेंगे, उन्हें कोई हक नहीं है और ऐसा करके वे अपनी ही नजरों में गिर जाते है और उन्हें पता तक नहीं चलता, न ही कभी समूह में इसमें साथ देंगे. चन्दन तस्कर वीरप्पन ने राजकुमार की रिहाई के लिए नई मांगें रख दी हैं.

शाम के सात बजे हैं. अभी कुछ देर पूर्व ही वे सांध्य भ्रमण करके आये हैं, शाम को कुछ देर तेज वर्षा हुई, सडकों पर पानी भरा था पर हवा में शीतलता और ताजगी थी. तन-मन दोनों तरोताजा हो गये. नन्हे का बुखार अभी तक नहीं उतरा है पर वह दोपहर को कुछ देर सोने के अलावा बिस्तर पर रहना ही नहीं चाहता.

Today is jun’s birthday. He was looking so fresh and good today in the morning. Nanha is doing his home work, is feeling well. He has a made a card also for papa. It is half past ten and she has to go to kitchen, could not write earlier because she was writing a poem for jun in that birthday card which she made on computer. Today in the morning father called to wish jun. today she has made jun’s favorite dishes.

कल उन्होंने ‘स्वतन्त्रता दिवस’ मनाया. कल के आयोजन की तयारी वे पहले ही कर चुके थे. सभी कुछ यथासोच हो गया. मौसम ने भी साथ दिया. सुबह ही भैया-भाभी को फोन किया फिर दीदी का फोन आया, सभी के समाचार मिले. परसों शाम राष्ट्रपति जी का व कल सुबह प्रधानमन्त्री जी का भषण लालकिले से सुना. मन आश्वस्त हुआ, देश की बागडोर अनुभवी हाथों में है, वे असुरक्षित नहीं हैं. पन्द्रह अगस्त को जिस मन से वर्षों पूर्व मनाते रहे थे वही जज्बा आज भी कायम है. नन्हे व जून ने मिलकर झंडा व भारत का नक्शा कम्प्यूटर पर बनाया, प्रिंट लिया और वे उनके बैठक की शोभा बढ़ा रहे हैं. सुबह घर से फोन आया, जो सखी परिचय पत्र लेकर मिलने गयी थीं, उनके लिए माँ-पिता का संदेश व कुछ सामान ला रही हैं.  

 





Monday, August 4, 2014

कौन बनेगा करोड़पति


कल रात फिर कई स्वप्न देखे पर अब कोई याद नहीं है. सुबह वे उठे तो रोज से देर हो गयी थी. बादल आज भी बने हैं, हल्की बूंदा-बांदी हुई और मौसम कल से बेहतर हो गया है. आज उसका राजसी भाव जाग्रत है तभी मौसम का ख्याल आ रहा है. सात्विक भाव अधिक दिन टिकता नहीं, कारण कई हो सकते हैं एक टीवी भी हो सकता है. “जिन्दगी के बोझ को हंसकर उठाना चाहिए, राह की दुश्वारियों पे मुस्कुराना चाहिए”. सदाचारी बलवान होता है. आज बाबा जी के प्रवचन में स्कूल के बच्चे बैठे हैं. दस बजकर बीस मिनट हो गये हैं, यानि उसके पास केवल दस मिनट हैं लिखने के लिए, फिर किचन में जाना है. आज सुबह-सुबह माली का बेटा आया गया, लॉन में घास काट दी है और कल ही नैनी के बेटे ने हेज काट दी है, पर अभी भी बहुत काम शेष है. धीरे-धीरे सब हो जायेगा, और बगीचा पहले के समान सुंदर हो जायेगा. कल रात वे ‘कौन बनेगा करोड़पति’ देखकर सोये थे. रात को स्वप्न सम्भवतः इसी संबंध में रहे होंगे. अमिताभ बच्चन ने अपनी आवाज और मुस्कुराहट से सारे हिंदुस्तान का दिल जीत लिया है. कल दो पत्र मिले, एक फुफेरी बहन का और दूसरा छोटे भाई का. जून के लिए जन्मदिन का सुंदर कार्ड भी भाई ने भेजा है. नन्हे का टेस्ट ठीक रहा, कल उसने परीक्षा फार्म भी जमा कर दिया.

उसने सुना, मन का माधुर्य बनाये रखना, सदा प्रसन्न रहना ईश्वर की सर्वोच्च उपासना है. चिन्तन बुद्धि को सबल करता है पर चिंता बुद्धि को कुंठित करती है, और उसने गलत चिंता से समय तो व्यर्थ किया ही अपनी मानसिक शांति भंग की, ऊर्जा व्यर्थ की, तभी तो आज दोपहर के एक बजे वह डायरी लिख रही है. इस वक्त तक आज की कविता लिख चुकी होती है, पर आज सुबह से ही मन अस्थिर है, एक जगह नहीं लग रहा है. कल रात नींद भी ठीक से आई. सुबह एक स्वप्न देखा, शायद उसके ही किसी पूर्व जन्म का, वह राजकुमारी है पर घमंडी राजकुमारी और एक सैनिक उसका गलत हुक्म मानने से इंकार कर देता है. आज फिर सुबह से वर्षा हो रही है, सो गर्मी भी कम है. एक सखी से कुछ देर इधर-उधर की बातें करती रही, गलत-सलत और सही भी. संगीत अध्यापिका से भी दो मिनट बात की उन्होंने बुलाया है पर जाने का मन नहीं है. कैसी तो खुमारी अभी भी छायी है, जून के जाने के बाद भी सोती रही पन्द्रह-बीस मिनट. यह सब तामसिक प्रवृत्ति के लक्षण हैं. कल शाम भी उन्होंने रोज की तरह ढेर सारे अमरूद तोड़े, बांटे भी. समाज के किसी काम तो आ रहे हैं उस व्यक्ति के लगाये पेड़ के अमरूद जो उनसे पहले इस घर में रहता होगा. कल अरुंधती राय की एक किताब में पढ़ा कि बड़ी-बड़ी योजनायें चाहे वह डैम हों या अन्य कुछ, लाभ से ज्यादा हानि पहुंचाती हैं. नर्मदा बचाव आन्दोलन से प्रभावित होकर वह वहाँ गयीं, अध्ययन किया और इतने आंकड़ों के साथ किताब छपवायी, उनकी मेहनत अनुपम है.

आज गीता में ईश्वर की विभूतियों का वर्णन पढ़ा. ईश्वर की कल्पना कितनी मधुर है यदि वास्तव में उसका साक्षात्कार हो तो कैसा अद्भुत दृश्य होगा. कबीर ने कहा है जब वह ईश्वर को खोजने गये तो खुद ही खो गये, पर उसके लिए खुद को एक क्षण के लिए भी खोना सम्भव नहीं लगता. आजकल ध्यान भी नहीं कर पाती, मन जाने कहाँ-कहाँ भटकाता है व खुद भी भटकता है. कभी टीवी पर देखे किसी धारावाहिक का दृश्य तो कभी कुछ और, अपेक्षाकृत आज मन शांत है, कल दिनभर बहुत अस्त-व्यस्त सा रहा. संयम, एकाग्रता और अनुशासन इन तीनों में से कोई भी कम हो तो ऐसा होना स्वाभाविक है. सुबह-सुबह जीजाजी को उनके जन्मदिन की बधाई दी, पर उनका जन्मदिन कल है. माँ व भाभी से बात की, अभी तक उन्हें उसका पत्र व राखियाँ नहीं मिली हैं, डाक विभाग अब पहले सा चुस्त व ईमानदार नहीं रहा. जून ने इस पेन में नई जान डाल दी है, वह हमेशा की तरह घर का उसका व नन्हे का बहुत ख्याल रखते हैं. उसे सारी चिताओं से मुक्त कर दिया है. अभी कुछ देर पूर्व प्रार्थना करते समय वह यही कह रही थी कि न तो उसे अपनी जीविका की चिंता है न घर चलाने की, न ही परिवार में कोई परेशानी है, न ही कोई अस्वस्थ है, वह सभी की और ईश्वर की कृतज्ञ है कि उसे सारे सुख दिए हैं. वक्त है उसके पास की ईश्वर चिन्तन कर सके, समझ है, बुद्धि भी ठीक-ठाक सी दी है, स्वयं को सुधारने की इच्छा भी है, पर तब भी मीलों चल चुकने के बाद कभी-कभी लगता है वह जहाँ से चली थी वहीं खड़ी है. मन रह-रह कर सांसारिक आकर्षणों में फंसता है. कभी न कभी चाहे निर्दोष ही क्यों न हो मुंह से असत्य भाषण होता है, प्रमाद छाता है, ऐसे में कोई गुरू होता जो साथ-साथ रहता, सहेजता, वह गुरू तो उसे स्वयं ही बनना होगा.

 


सपने में शार्क


जून ने एक अधिकारी के साथ घटी दुर्घटना के बारे में बताया. डिब्रूगढ़ से ही एक चोर उनके साथ लग गया. नशीली फ्रूटी पिला कर बेहोश किया, सब कुछ ले लिया और रास्ते में खुद उतर गया. शिवसागर में बस का कन्डक्टर उन्हें पुलिस स्टेशन ले गया, जहाँ दो दिन बाद उन्हें होश आया पर उस समय वह भूल चुके थे कि उनके साथ क्या हुआ था. यह दुनिया चोरों को भी जन्म देती है और लुटेरों को भी पर साथ ही पुलिस व रक्षकों को भी.

कल रात उसने अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी दो पंडितों द्वारा पढ़ी गयी देखी, स्वप्न में ही मृत्यु पूर्व की अवस्था का अनुभव किया, पहले पहल तो घुटन थी पर बाद में विवेक जाग्रत हुआ और मृत्यु पूर्व जितना समय मिला था सदुपयोग करने की प्रेरणा हुई, अन्य किसी पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. कई बार यह स्वप्न भी देखा कि सुबह हो गयी है अब जगना चाहिए. प्रतीक रूप से ये स्वप्न उसे अज्ञान की नींद से जगाने के लिए थे. एक महिला पत्रकार को भी देखा जिसने नूना के बारे में सुना था, उसे उसने सुबह के नाश्ते के लिए बुलाया है कि पता चलता है मात्र अट्ठाईस वर्ष की उम्र में उसकी मृत्यु तय है.

कल रात फिर उसने अजीब स्वप्न देखा, सुबह उठी तो याद था पर लिखने का समय नहीं मिला अब शाम के पांच बजे जरा भी याद नहीं आ रहा है. आज गर्मी काफी है, पिछले कई दिनों के बाद मौसम में बदलाव आया है. कल शाम भाई का फोन आया, वे सांध्य भ्रमण के लिए गये थे, नन्हे ने बात की. राखियाँ उन्हें मिल गयी हैं. बाद में वे एक मित्र के यहाँ गये पर वहाँ की बातचीत में किसी अन्य की चर्चा हुई जो वहाँ उपस्थित नहीं थे, उसे अच्छा नहीं लगा. साधना का प्रथम सोपान है आत्म निरीक्षण.

तीसरी रात फिर एक स्वप्न जिसमें उनके सामने एक ट्रक का एक्सीडेंट होता है, वह उनके ऊपर से गुजर गया वे बच गये पर सामने की दीवार से टकरा गया. ड्राइवर व कन्डक्टर घायल हो गये, खून व चीखें...यह शायद कल शाम क्लब में देखी फिल्म का नतीजा था. फिल्म शार्क मछलियों के मस्तिष्क से निकाले गये द्रव से बनने वाली एक दवाई की रिसर्च पर आधारित थी, जिसमें शार्क प्रयोग के दौरान खुद पर हुए अत्याचार का बदला लेती है और एक-एक करके कई व्यक्तियों की जान लेती है. आज सुबह उठे तो उमस बहुत थी, इस वक्त भी गर्मी से ज्यादा घुटन है, बादल बने हैं पर हवा स्थिर है. जैसे स्थिर पानी गन्दला हो जाता है गतिशील पानी स्वयं को साफ बनाये रहता है वैसे ही हवा के साथ भी है, चलती हुई हवा शीतलता प्रदान करती है. आज उसके पास सिलाई का कुछ काम है सो बाकी कार्यों में से थोड़ा-थोड़ा वक्त बचाया है. सुबह टीवी पर सुना मन में आसक्ति की जड़ें जितनी गहरी होती हैं, ‘मैं’, ‘मेरा’ का भाव उतना प्रबल और यही बांधता है, बुद्धि के स्तर पर तो ये बातें बहुत समझ में आती हैं. कल दोपहर प्रमाद वश देर तक सोयी सो कल की कविता का खाली पन्ना चिढ़ा रहा है. आज नन्हे का science टेस्ट है, कल दिन भर वह तैयारी करता रहा है. कल ‘रिश्ते’ में मरते हुए प्राणी का अजीब चित्रण देखा, मृत्यु के समय कैसी अद्भुत शांति....!