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Wednesday, August 6, 2014

बरसात में


मन की आसक्ति को, प्रेम को, चाह को अगर दिशा मिल जाये, भावनाओं को, विचारों को केंद्र मिल जाये तो जीने की कला अपने आप ही आ जाती है. यदि चाह नश्वर की हो तो सुख भी नश्वर ही तो मिलेगा. मन में अनंत की चाह हो तभी अनंत की ओर कदम बढ़ेंगे”. आज फिर अमृत वाणी सुनने को मिली, सन्त ईश्वर प्राप्ति को कितना सहज बना देते हैं. इसीलिए ही शास्त्रों में गुरू की महिमा गायी गई है. कल जून और उसने साथ-साथ राजकपूर की पुरानी फिल्म ‘बरसात’ देखी, जिसमें प्रेम की शुद्धता, विशालता व अपार शक्ति का चित्रण है. प्रेम यदि हृदय में हो तो घृणा का कोई स्थान नहीं, प्रेम क्षमा सिखाता है. सच्चा प्रेम इस जगत में दुर्लभ है. जब कभी भी उसके अंतर में प्रेम की भावना प्रबल होती है सब कुछ कितना सुंदर लगता है. नन्हा भी आज कई दिनों के बाद स्कूल गया है.

‘जीवन का संघर्ष द्वन्द्वात्मक है, किन्तु सत्य सदा एक सा है. ईश्वर से विमुख को संसार का वैभव सदा एक सा नहीं मिल सकता पर भक्त को सदा अनन्य आनंद की प्राप्ति होती रहती है. नश्वर का मात्र उपयोग करना है शाश्वत से प्रेम करना है’. आज पुनः जागरण में ये विचार सुनने को मिले जो उसे भा गये और तभी से यह प्रयत्न है भी जारी है कि सद्चिन्तन चलता रहे. कुछ देर पूर्व उन परिचिता ने अपनी नैनी के द्वारा ससुराल से माँ-पिता द्वारा भेजी वस्तुएं उन्हें भेजीं. काजू, बादाम, अनार, चाकलेट, नमकीन तथा आंवले का मुरब्बा, इन सबके साथ उनका स्नेह तथा आशीर्वाद भी मिला.

ग्यारह बजने को हैं, जून अभी थोड़ी देर में आ जायेंगे. बादल बरस कर अभी-अभी थमे हैं. सुबह काले बादल अचानक ही छा गये और तेज हवा भी चलने लगी. असमिया सखी ने फोन पर कहा वर्षा होने वाली है तब उसका ध्यान उस ओर गया वरना तो अपने कार्यों में व्यस्त थी और आजकल उसका प्रिय कार्य है ईश्वर के बारे में सोचना. सुबह बाबाजी ने भावपूर्ण वचनों में धीर-गम्भीर बातें बतायीं. उन्होंने कहा जब भी कोई परेशान हो तो समझ ले ईश्वर का साथ उसने छोड़ दिया है. अपने मन को दो बातों से बचा पाने में वह असमर्थ है, वे हैं राग और द्वेष, यही दोनों संस्कार बनाती हैं. मन पर बहरी प्रभाव ऐसा होना चाहिए जैसे पानी पर लकीर, पर वे बनाते हैं लोहे पर लकीर, यदि धरा अथवा रेत पर लकीर हो तो भी सुधरने के आसार हैं. मन को चट्टान सा दृढ बनाना है और समुद्र सा गहरा, आकाश सा अनंत और पवन सा गतिमान.  नन्हा क्लब में स्वीमिंग गाला देखने गया है. जून सो रहे हैं. इतवार की शाम के साढ़े तीन हुए हैं. कल दोपहर से ही स्वयं को ईश्वर से विमुख पाया फिर तामसिक वृत्ति का प्रभाव लगता है. अर्जुन ने जब कृष्ण से कहा था कि मन बड़ा चंचल है इसे साधना बहुत कठिन है तो ऐसे ही प्रयासों के बारे में कहा होगा. कभी-कभी लगता है उसकी इच्छा के विरुद्ध कोई कुछ कराए, कहलवाए जा रहा है. ऐसे वक्त में प्रकृति भी विपरीत लगती है. कल लाइब्रेरी से Tibetan book of dead and living फिर से लायी है. जून की तबियत कुछ नासाज है.

She read today’s line in diary – It takes a long time to bring excellence to maturity. Then wrote, it does not take long time to bring excellence to maturity but a very very long time to…. She moves forward and then after some days or weeks finds herself on the same position. Goyenka ji is right when he says that only conscious mind changes but innermost feelings are same, they remain hidden for some time due to intellect or some practice but suddenly one day outer cover  is thrown away and inside is in as mess and chaos as it was before, nothing has changed. She is very sad to see this, to experience once again defeat from her own self.
 







Tuesday, August 27, 2013

तीसरी कसम


Today is her birthday, oh God ! how long she has lived on this beautiful earth ! so many years and so many memories of those years, some good and ofcourse some  not  so  good. It is 9 a m  and  she has got  birthday wishes from her friend and didi. When she gotup in the morning  jun  gave her  a nice greeting card and a chocklate with lots of love. He is so loving and caring always but sometimes she can’t see this, perhaps she remains aloof or may be she takes it as naturally as their being together. Last night in a dream she saw father also wishing her good. When there are so many people how can be she lonely ever. Nanha wished her also but he is too lazy to make a card. Today weather is excellent and they will have some mouth watering dishses in dinner.

आज सुबह जागरण भी देखा और सुना, आचार्य ने मैं औए मेरा के बंधन से मुक्त होने की बात कही. तृष्णा के त्याग की और आसक्ति से मुक्ति की भी. बातें सुनने में तो बहुत अच्छी लगती हैं पर सदियों से मन मैं, मेरा के समीकरण में लिप्त है. उससे निकल पाना दुष्कर लगता है. जन्मदिन के दिन ऐसी दुर्बलता क्या ठीक है ? बल्कि उसे तो प्रण लेना चाहिए कि अनावश्यक तृष्णाओं के जाल से दूर रहकर अनासक्त भाव से जो मार्ग में आए उसे साधित करते हुए अपना जीवन व्यतीत करे अर्थात अपने कर्त्तव्यों का पालन करे, व्यर्थ की चिंताओं और प्रपंचों में न पड़े. मन को विकारों से धीरे-धीरे दूर करते हुए वर्तमान में जीना सीखे.

कल रात्रि वे देर से सोये, जन्मदिन का विशेष डिनर (मलाई कोफ्ते भी थे) खाते-खाते ही दस बज गये, फिर छोटी बहन और उसके पति से बात की. छोटी बहन ने बताया वह ‘ए आर ओ’ बन गयी है, शायद इसका अर्थ असिस्टेंट रीजनल ऑफिसर होता हो या कुछ और मेडिकल लाइन से सम्बन्धित. सोते-सोते ग्यारह बज गये, नतीजा सुबह नींद देर से खुली और अभी तक रात के भारी खाने का असर बाकी है, हर ख़ुशी की कीमत चुकानी पडती है. कल छोटे भाई का फोन भी आया. बड़े भाई के यहाँ उसने स्वयं ही किया पर घंटी बजती रही किसी ने उठाया नहीं, शायद गर्मी और बिजली न रहने के कारण वे लोग बाहर निकल गयर होंगे. बड़े शहरों में रहने के कुछ फायदों के साथ नुकसान भी हैं. नन्हा इस समय story book पढ़ रहा है जबकि उसका बहुत सा गृहकार्य शेष है. मौसम आज मेहरबान है, कुछ देर पहले एक फोन आया, एक महिला ने अपनी बारहवीं में पढ़ रही बेटी को गणित पढ़ाने के लिए कहा है.

जून का प्रथम दिन..यानि गर्मी के एक और महीने की शुरुआत. उसने काश्मीर फ़ाइल का एक अंक देखा, अछ अलग, वहन शांति पूर्ण चुनाव हो गये हैं और मतदान का प्रतिशत भी अच्छा रहा है. आज टीवी पर ‘तीसरी कसम’ फिल्म दिखायी जाएगी, राजकपूर की पुरानी फिल्म जिसके गाने बहुत अच्छे हैं. आज फिर वर्षा हो रही है, नन्हे के जाते ही शुरू हो गयी, वह न छाता लेकर गया है न बरसाती ही, जुकाम से पहले ही परेशान है, अभी कुछ देर पहले फोन पर बताया कि दोस्त के यहाँ से छाता लेकर जा रहा है, उसकी आवाज फोन पर बहुत मीठी लगती है. कल वे दिगबोई और फिर तिनसुकिया गये, ट्रिप अच्छा रहा पर शाम को लौटकर थकान महसूस हो रही थी. उसके साथ ऐसा ही होता है, कार से उतरते वक्त तक थकन का नामोनिशान भी नहीं होता पर कपड़े बदलते-बदलते ही पता चलता है कि दिन भर कितना चले.


आज ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ है, एक वक्त था जब पर्यावरण शब्द का अर्थ खोजने के लिए शब्दकोश खोलना पड़ता था, आज बच्चे-बच्चे को इसका अर्थ ज्ञात है. जब पहली बार यह शब्द सुना था अर्थ जानकर एक कविता लिखी थी, काले, धूसर पहाड़ों की, जो पेड़ कटने से अपनी हरियाली खो चुके हैं, किसी ‘डाल्यु के दड्गया’ के लिए यानि पेड़ों का दोस्त. उसके सामने आज एक पीला होता हुआ पौधा है, जो कभी एकदम हरा था, आज उसे बचाने का प्रयास कर रही है, शायद फिर से उसमें नई पत्तियां आने लगें. उनका पुराना मनी प्लांट भी सूख रहा है उसका भी नवीकरण करना है यानि पीली पत्तियों और सूखी टहनियों को तोडकर हरे भरे पत्तों को रखना है. 

Monday, August 13, 2012

राजकपूर की तीसरी कसम



कल व परसों दोनों दिन नन्हा जल्दी उठ गया सुबह उनके साथ ही, आज अभी तक सोया है सो उसने डायरी उठाई है, स्नान-ध्यान तो हो गया पर लगता है कल की तरह आज भी नैनी नहीं आयेगी, कल दोपहर वह जब कपड़े व बर्तन धोकर लेटी तो कैसा अजीब सा सुख महसूस हो रहा था, मेहनत करने का सुख. कल सुबह उस उड़िया लड़की की दोनों बहनें व उसकी माँ उनके घर आयीं थीं काफ़ी देर बैठी रहीं, सो सुबह वह ज्यादा कार्य नहीं कर पायी. उन्हें मकई पिसवानी थी व उसकी असमिया मित्र को जीरा व चटनी. शाम को उसकी एक पंजाबी परिचिता मिलने आयी वह तीन-चार महीनों के लए घर जा रही है. उसका बीएड का फार्म अभी तक आया नहीं है. पिछले तीन दिनों से मौसम बेहद गर्म है.
नैनी आज भी नहीं आयी और अब उसके आने की आशा भी नहीं है, वह स्वयं काम कर तो लेती है फिर क्या जरूरत है नौकरानी रखने की. साथ ही व्यायाम भी हो जाता है. इस समय सवा नौ बजे हैं, नन्हा पड़ोस में खेलने गया है. ट्रांजिस्टर पर गाना आ रहा है - भीगा भीगा है समां...कभी वक्त था जब कि इस तरह के गीत सुनकर ख्यालों में जून घूम जाता था पर अब ऐसा नहीं होता. उसने सोचा वह आज से उसका ज्यादा ध्यान रखेगी, प्यार तो मन में होता ही है पर उसका प्रदर्शन नहीं होता, जो उतना ही जरूरी है. कल महान अभिनेता राजकपूर का देहांत हो गया एक महीना कष्ट झेलने के बाद. रात को उनकी फिल्म दिखायी गयी थी, तीसरी कसम, पर यहाँ बिजली ही नहीं थी, पता नहीं कब आयी वे तो सो गए थे.
कल नन्हे के मित्र का जन्मदिन था, बड़ी पार्टी थी, उनके यहाँ एक छोटी लड़की है जो छोटे-मोटे काम कर देती है व बच्चे पर नजर रखती है, वह शायद उसे असमिया सिखा देगी, उसने सोचा. कल जाकर उसे छोटी बहन व देवर के भेजे जन्मदिन के बधाई कार्ड मिले डाक विभाग की मेहरबानी से. बहुत खुशी हुई. इसी तरह उसका फार्म भी कहीं अटका होगा, भर कर भेजने की अंतिम तिथि भी नजदीक आती जा रही है. पता नहीं क्या होगा, इंसान जो कुछ सोचता है वह पूरा तो नहीं हो जाता.फिर बात वहीं आकर अटक जाती है कि जो ईश्वर को मंजूर होगा वही होगा. नन्हा अभी तक सो रहा है उसने सोचा उसके उठने से पहले ही भोजन बना लेगी.