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Monday, March 27, 2017

चाँद और सूरज


परमात्मा के खेल निराले हैं. वह कितना-कितना चाहता है कि वे उसके पथ पर चलें. वह उन्हें कई मार्गों से शुद्ध करता है, कभी सुख देकर कभी दुःख देकर. इतने वर्षों से जो संस्कार उसके भीतर था, जिसके कारण उसका तन अस्वस्थ हुआ, मन अस्वस्थ हुआ, वह संस्कार अंततः कल रात्रि उसे मिटता हुआ प्रतीत हुआ है. अहंकार की जो काली छाया उसके और परमात्मा के मध्य अभी तक पड़ी हुई थी; आज वह गिर गयी लगती है, वह छाया ही थी. अहंकार लगता है ठोस पर कुछ होता नहीं है, परमात्मा लगता है सूक्ष्म पर होता है ठोस..वह उनका सच्चा हितैषी है, सुहृद है, वह उनका सद्गुरू है. मन अब रंच मात्र भी नकारात्मकता स्वीकार नहीं कर पाता. जीवन कितने-कितने रंग दिखाता है, जब शुभ नहीं टिका तब अशुभ कैसे टिकेगा.

यह सृष्टि एक गीत है
आकाश गंगाएँ छंद है जिसकी
झिलमिलाते तारे अलंकार
और चाँद-सूरज दो अंतरे
मुक्ति आधार है जिसकी
नये शब्द खोजने होंगे
नई इबारत लिखनी होगी
उसका गुणगान करने के लिए
जो पुरातन है
जब नहीं थी सृष्टि
जो उससे भी पूर्व था..

भीतर कैसा ठहराव छा गया है. जैसे कोई ज्वर उतर गया हो. अब कोई दौड़ नहीं है. न कुछ पाना है, न ही करना है, जीवन जो देगा उसे स्वीकारना है. भीतर कोई जाग गया है. सदा एकरस सत्ता है, जो पूर्ण तृप्त है. सारे संस्कार नष्ट हो गये लगते हैं. अब कोई कोना खुद से छिपा नहीं रह गया है भीतर का. मन को उसकी गहराई तक जाकर खंगाल लिया है, सारे कोने साफ कर लिए हैं, कहीं कोई दुराव नहीं है, अब नहीं कुछ सिद्ध करना है. जून कल बाहर जा रहे हैं, पांच दिन बाद लौटेंगे. अभी कुछ देर पहले ही पुरानी डायरी के कुछ अंश लिखे, उसका यह संस्कार तब भी कितना दृढ था, पर अंततः अब इससे मुक्ति हुई लगती है. उसकी साधना शायद इसी के लिए थी. परमात्मा उन्हें कितना आनंद कितनी शांति देना चाहता है. वे अज्ञानवश अपने व उसके बीच दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं. उनका सारा नकार अपनी ही जड़ों पर चोट करने जैसा है. एक ही सत्ता से सारा जगत बना है. अन्य पर किया क्रोध स्वयं पर ही लौटता है. लौटता भी है और स्वयं से ही होकर जाता भी है. हर हाल में अपना ही नुकसान होता है. इसी तरह दूसरे को दी ख़ुशी भी खुद से होकर गुजरती है और लौट कर भी खुद तक ही आती है. जब तक मन को खुद की खबर नहीं थी तब तक वह बाहर ही ख़ुशी खोजता था, अब भीतर ही सब कुछ मिल गया है, कहीं जाने की जरूरत ही नहीं है. असजगता के कारण वे अपने जीवन का बहुत सा कीमती समय नष्ट कर देते हैं.

एक शिशु जैसा छोड़ दिया है
स्वयं को निसर्ग के हाथों
अब खो गये हैं सारे लक्ष्य, सारा ज्ञान
खाली है मन, शून्य उतर आया है भीतर
और बाहर परमात्मा हर तरफ बाहें फैलाएं..
न कुछ करना है
न जानना है
न पाना है
बस एक निर्दोष फूल सा खिले रहना है
अस्तित्त्व के चरणों में !

   

Friday, March 24, 2017

पंछी और कलियाँ


नन्हे की मित्र के लिए उसने कविता लिखी थी, उसका जवाब आया है, उसने दिल को छूने वाला जवाब लिखा है. कल दिन भर वह ठीक रही पर रात बेचैनी से भरी थी. आश्चर्य होता है खुद पर, कहाँ सोचा था कभी कि डायरी के पन्नों पर अपनी हेल्थ रिपोर्ट लिखेगी एक दिन, लेकिन इसकी नींव रख दी गयी थी वर्षों पहले, जन्मते ही सम्भवतः..उनके सारे रोग नए नहीं होते, उनका आयोजन पहले ही शुरू हो चुका होता है.

आज नन्हे का जन्मदिन है, उसे फोन किया तो नहीं उठाया, शायद रात को जगता रहा हो, सुबह ही सोया हो. उसके लिए बधाई के फोन आये. मोरारीबापू साऊथ अफ्रीका पहुंचा गये हैं, उनकी कथा आ रही है टीवी पर. जून आज कोलकाता गये हैं. दिसम्बर में वे बंगलूरू आश्रम जायेंगे, इस बात को सोचने से ही कैसी पुलक उठती है. आज तन और मन दोनों हल्के हैं. सारे रोगों का कारण प्रज्ञापराध है. उनका तन कितना बहुमूल्य है, इसे स्वच्छ व स्वस्थ रखना कितना आवश्यक है. यह ज्यादा कुछ मांग भी नहीं करता, लगातार काम करता रहता है. ‘कम खाओ और गम खाओ’, यह नियम अपनाना होगा यदि भविष्य में भी स्वस्थ रहना है. आज ध्यान में अच्छा अनुभव हुआ, जून जब घर पर रहते हैं उसका ध्यान गहरा नहीं हो पाता. अब उनके आने पर भी सजग रहना होगा ! परसों वे आ जायेंगे.

कुछ देर में उसे एक परिचिता के साथ मृणाल ज्योति जाना है. जब कहीं जाना हो तो प्रतीक्षाकाल में कार के हॉर्न की आवाजें ज्यादा ही सुनाई देने लगती हैं, वैसे जिनकी ओर ध्यान भी नहीं जाता. ‘लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन’ कितना जबर्दस्त है. आज ही उसने चाहा कि माली ग्यारह बजे से पहले आये, सो आ गया है. इस तरह तो उनका भाग्य उनके ही हाथों में है. वे जो चाहते हैं, वैसा ही सोचना आरम्भ कर दें तो प्रकृति उसका इंतजाम करने लगती है. आज सद्गुरू ने अपने जीवन के कुछ प्रसंग बताये. इक्कीस वर्ष की अवस्था तक वे दुनिया के सारे सुख-आराम देख चुके थे, विदेशों में घूम चुके थे. एक विश्व प्रसिद्ध संस्था के उत्तराधिकारी बन सकते थे, पर वे लौट आये और सेवा का मार्ग चुना. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ की स्थापना की. अद्भुत है उनकी कहानी. ऐसे लोग दुनिया में विरले होते हैं, जो करोड़ों लोगों तक पहुंच पाते हैं, सभी उनसे प्रेम करते हैं.


जून आज आ रहे हैं. उनकी पसंद की ड्रेस पहनी है. प्रेम क्या होता है, इसका पता ईश्वर से प्रेम करने के बाद ही चलता है. इसीलिए संत-महात्मा युगों-युगों से उन्हें प्रभु की ओर चलने का मार्ग बताते आये हैं. परमात्मा उनके प्रेम का प्रतिदान अनंत गुणा देता है. एक बूंद जो सागर से बिछुड़ी थी, कितनी छोटी  थी और जब पुनः सागर में जा मिली तो अनंत गुणा जल उसे मिल गया. उनकी चेतना इस देह में कितनी नन्ही सी लगती है, एक चिंगारी हो जैसे या सूर्य की एक किरण और जब वह चिंगारी किसी तरह पुनः आग में गिर जाये तो...या सूर्य की किरण पुनः सूर्य में पहुंच जाये तो..कितना प्रकाश न भर जायेगा उसके भीतर; लेकिन एक बात यह भी है कि सूर्य स्वयं जाकर कलियों को खिला नहीं सकता, वह अपने हाथ बना लेता है किरणों को, जो आहिस्ता से सहलाती हैं और किरणें खिल जाती हैं; ऐसे ही अनंत परमात्मा स्वयं आकर सोए हुओं को कैसे जगायेगा, मानव उसका तेज सह ही नहीं पायेगा, वह संतों को अपना हाथ बना लेता है जो आहिस्ता से आकर जगाते हैं. कलियों के लिए किरणें संत से कम नहीं..पंछियों के लिए भी...ऊपर से तुर्रा यह कि फूल के भीतर जो भोजन बनता है वह भी सूर्य के बिना सम्भव नहीं. सूर्य उसके भीतर सदा ही है, पर वह जानता नहीं, मानव के भीतर भी परमात्मा के कारण ही चेतना है, पर वह जानता नहीं, वास्तव में स्वयं को ही जगाने आता है वह क्योंकि उसे स्वयं का अनुभव करना हो तो मन का आश्रय लेना होगा, उसके पास तो मन है नहीं..तो भक्त का मन भगवान ले लेता है और बदले में स्वयं को दे देता है, अदला-बदली हो जाती है और प्रेम का यह खेल गुपचुप चलता ही रहता है !      

Tuesday, January 7, 2014

गुलजार की कविताएँ


आज सुबह से तन थका-थका लग रहा है, साथ ही मन भी, शायद नींद न पूरी होने से ऐसा हुआ है, पिछले तीन दिनों से सुबह साढ़े चार बजे उठ जाती है, नींद उससे थोड़ा पहले ही टूट जाती है. मौसम आज अपेक्षाकृत गर्म है, जबकि सुबह वर्षा हुई थी. कल शाम क्लब में एक सीनियर मेम्बर ने उससे हिंदी में कुछ लिखने व बोलने का काम दिया नृत्य-नाटिका के लिए, पर शायद उन्हें उसका बोलने का तरीका नहीं भाया, खैर...कोरस की तयारी ठीक चल रही है, मीटिंग का दिन आने में चार दिन शेष हैं, फिर वह नन्हे की पढ़ाई पर ध्यान दे पायेगी. कल दोपहर मुखड़े का अभ्यास किया, सोमवार को जाने से पहले अन्तरा करेगी. कल सुबह एक सखी से बात हुई तो उसे सुझाव देने बैठ गयी बागवानी के लिए, जो उसे शायद ही अच्छा लगा हो, भविष्य में ध्यान रखेगी. क्लब से लौटने में कल देर हो गयी थी, आकर नूडल्स बनाये पहली बार डिनर में, नन्हा और जून दोनों को पसंद आये. कल ptv में ‘यह आजाद मुल्क’ एक धारावाहिक का अंश देखा, दिल को झकझोर कर रख देने वाला एक मंजर था उसमें. सारे पात्र गहरे तक उतर जाते हैं उसके...काफी तीखा व्यंग्य भी था.

आज भी क्लब गयी थी, गाने का अभ्यास नहीं हुआ पर नृत्य कलाकारों के लिए चाय का प्रबंध उसे देखना था. कल भी आना है, परसों जन्माष्टमी है, वे लोग मन्दिर जायेंगे और एक मित्र के यहाँ भी, जहां वे घर पर मन्दिर सजाते हैं. उसने फोन करके जून को क्लब आने के लिए कहा, पर निकलने में थोड़ी सी देर हो गयी, सो वह उदास थे और उन्हें देखकर वह भी.

आज ही वह दिन है, जो उनके लिए महत्वपूर्ण है, अर्थात उनकी नई कमेटी के लिए, दस बजे उसे क्लब जाना है, दोपहर को शाम के लिए ढेर सारे सैंडविचेज बनाने हैं और शाम को तो जाना ही है. कल रात देर तक नींद नहीं आई, आज के लिए बातें सोचता रहा मन, सुबह अलार्म न बजने पर भी उसी मन ने उठा दिया. आज ठीक से पढ़ा सकी, विद्या निवास मिश्र का निबन्ध ‘मेरा गाँव मेरा घर’ बहुत अच्छा है. सुबह से ही सेक्रेटरी के तीन-चार फोन आ चुके हैं, वह उससे ज्यादा ही नर्वस हैं, वह इस वक्त अंश मात्र भी नर्वस नहीं है, जे कृष्णामूर्ति की पुस्तक, जो सौभाग्य से दोबारा मिल गयी है, में कई अच्छे सुझाव पढ़े, व्यक्ति को निरिक्षण करने, सुनने और समझने की कला सीखनी चाहिए और मन को हमेशा पूर्वाग्रहों से मुक्त रखना चाहिए.

आज की सुबह सामान्य दिनों की तरह ही गुजर रही है. सुबह उठी तो बादल थे, अँधेरा भी था, सूरज अभी भी बादलों के पीछे आराम कर रहा होगा. गुलजार की कविताएँ पढ़ीं, उनमें एक दर्द है और एक पहचान भी लगती है उनसे, शायद हर कवि मन एक सा धडकता है. अभी कुछ देर पूर्व उसी बातूनी सखी का फोन आया, छोटा बेटा अस्वस्थ है, वह खुद भी ठीक नहीं है, नौकरी करना क्या इतना आसान है, घर-परिवार अपना सुख-आराम सब कुछ भुलाना पड़ता है. नैनी के बेटे ने साइकिल ठीक करने के लिए सहायता मांगी है, कल दोपहर को बैक डोर पड़ोसिन आई थी, उसे यह पता भी करना था कि वह नैनी को कितने पैसे देती है, उसने अहसास दिलाया कि वह ज्यादा दे रही है. ईश्वर ने इतनी सामर्थ्य दी है तभी यह सम्भव है. कल शाम दस दिनों के बाद घर पर रहना भला लग रहा था. जून कल खेलने भी जा पाए.