Thursday, July 23, 2015

आंवले का वृक्ष


आज कई दिनों बाद डायरी खोली है. यह तो निश्चित है कि जो पन्ने खाली रह गये हैं, वे भी भर ही जायेंगे, ‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’... प्रभु के बारे में यदि लिखना हो तो शब्द अपने आप भीतर से झरते आते हैं. वह प्रभु, परमेश्वर, ईश्वर, ब्रह्म, कृष्ण, राम, शंकर या पारब्रह्म किसी भी नाम से उसे पुकारो वह जितना-जितना समझ में आता जाता है उतना ही उतना रहस्यमय भी होता जाता है. वही भीतर है वही बाहर है. टीवी पर राम कथा आ रही है. ईश्वर का रस जिसे भीतर से मिलने लगता है, उसके लिए यह जगत अपनी सत्ता ईश्वर रूप में रखता है. संत कह रहे हैं कि ‘तुलसी’ प्रभु को प्रिय है. तुलसी तथा निंब इन दोनों का औषधि रूप में भी महत्व होता है. बगीचे में आंवले के वृक्ष के नीचे एक क्यारी बनवाई है, उसमें फूल लगाने हैं. आज शेष फूलों के बीज भी डालने हैं. कल बालों में मेहँदी लगाई थी एक महीने बाद, अब लगता है दो हफ्तों के अन्तराल पर ही लगानी होगी.

पिछले दो दिन फिर कुछ नहीं लिखा, इसे प्रमाद भी कह सकते हैं और अति व्यस्तता भी. उपन्यास पढ़ने को एक साधक की दृष्टि में प्रमाद ही कहा जायेगा. john की जिंदगी के बारे में पढ़कर इतना ज्ञान हुआ कि यह जीवन क्षणिक है, इतना ज्ञान तो शास्त्रों के अध्ययन से भी होता है. मन को जहाँ साधक खत्म करता जाता है वहाँ उसकी आत्मा मुखर होती जाती है पर उसने आत्मा को दबाकर मन को सुख देने के लिए ही उपन्यास में इतना समय लगाया, खैर जो हो चुका है वह हो चुका. कल सत्संग भी ठीक-ठाक हो गया. उन्होंने aol के लिए कुछ योगदान भी दिया, इतने बड़े यज्ञ में उनकी छोटी सी आहूति. कल चने व सूजी का हलवा खाया सो आज पेट में कुछ हलचल है. आज सुबह से वक्त का पूरा उपयोग किया है, लेकिन सारे कार्य तो शरीर के स्वास्थ्य और मन की शुद्धि के लिए ही हुए. सेवा का तो कोई कार्य नहीं हुआ, अभी दिन शेष है, जो भी सम्मुख आएगा, सहर्ष उसे ग्रहण करना है. आज बड़ी ननद की छोटी बेटी का जन्मदिन है, उसे फोन करना सुबह वे भूल गये. परमेश्वर को सुबह याद किया उठते ही तो पवनपुत्र हनुमान का स्मरण हो आया. उनकी कृपा से सुबह-सुबह समुद्र तट पर बैठे श्रीराम के दर्शन हुए. कैसी अद्भुत घटना है यह, उनके भीतर ही सभी कुछ है, उस दिन नदी, पानी, रस्ते सब इतने स्पष्ट दिख रहे थे !


आज सुबह चार बजे से पूर्व ही उठ गयी थी. मन था कि विचारों से मुक्त ही नहीं हो रहा था. नींद में भी उसे पता चलता रहता है कि मन खाली है या विचार चल रहे हैं. कुछ देर ध्यान का प्रयास किया पर कोई बेचैनी थी भीतर. जब तक मन सारी चेष्टाएँ त्याग नहीं देता तब तक निर्विचार नहीं हो सकता. हर चेष्टा एक न एक विचार को जन्म देती है. उन्हें तो सब छोड़कर मात्र साक्षी भाव में जीना है. एक बार यदि साक्षी भाव में आ गये तो सारी चेष्टाएँ होती भी रहें बाधक नहीं होंगी, बाधा तभी आती है जब मन स्वयं सभी कुछ करना चाहता है. ‘कीत्या न होई, थाप्या न जाई आपे आप सुरंजन सोई’ ईश्वर तो सदा ही है, उसे बस अनुभव ही करना है, कहीं से लाना नहीं है. वह करने से नहीं, न करने से प्रकट होता है. बाद में क्रिया के बाद मन खाली हो गया. क्रिया के दौरान भी कई बार भटका, पर बोध रहा. संगीत अभ्यास के समय मन एक पुलक से भरा हुआ था जैसे न जाने कौन सी निधि इसे मिल गयी हो. भीतर कितने खजाने भरे पड़े हैं, वे चाहें तो तत्क्षण उन्हें पा सकते हैं. मन व्यर्थ की कल्पनाओं में खोया रहता है और जो निधि सहज ही पा सकता है जन्मभर उससे वंचित ही रह जाता है. सद्गुरु का आना ऐसी घटना है जो जीवन को बदल कर रख देती है, वे सुख स्वरूप परमात्मा को पहचानने लगते हैं !         

2 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को शनिवार, २५ जुलाई, २०१५ की बुलेटिन - "लम्हे इंतज़ार के" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद। जय हो - मंगलमय हो - हर हर महादेव।

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  2. बहुत बहुत आभार !

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