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Thursday, April 16, 2020

चश्मे की कमानी


बागवानी का सब साजो-सामान तो आ गया है पर इंद्रदेव ज्यादा ही कृपालु हो रहे हैं आजकल, मौसम जब साफ होगा तभी क्यारियाँ बनेंगी. आज दोपहर एक सखी के यहाँ तीज की पूजा में गयी, प्रसाद बहुत स्वादिष्ट था. उसने बताया वे तीन परिवार भूटान की यात्रा पर जा रहे हैं. आज योग कक्षा में गुरूजी की पुस्तक से उनका सन्देश पढ़ा, “यदि तुम ध्यान नहीं कर सकते तो बेवकूफ हो जाओ “ सुनकर सभी साधिकाएँ हँसने लगीं. क्या इससे गुरूजी का तात्पर्य  है कि इस जगत में दो ही सुखी हैं, एक ध्यानी और दूसरा निपट गंवार. जो बुद्धिमान हैं उन्हें दुःख का अनुभव होगा ही. आज बहुत दिनों बाद छोटी बहन से बात हुई, उसने एक सुंदर गीत गाया व्हाट्सएप पर, सुबह नूना ने नृत्य किया, भीतर प्रसन्नता हो तो किसी न किसी तरह बाहर व्यक्त हो ही जाती है. भीतर स्थिरता का साम्राज्य दृढ हो रहा है, गुरु जी कहते हैं, मौन से ही उत्सव का जन्म होता है ! 

कल दिन भर कुछ नहीं लिखा. अभी सुबह के सवा आठ बजे हैं, जून से फोन पर बात हुई, वह टूर पर हैं. चश्मा टूट जाने की बात उन्हें बतायी। उन्होंने बिलकुल सही कहा, वह चश्मे को सावधानीपूर्वक नहीं रखती है. वह बहुत वस्तुओं का महत्व नहीं समझती है, उन्हें ‘टेकेन फॉर ग्रांटेड’ लेती है, पता नहीं हिंदी में इसे क्या कहेंगे. यह स्वभाव इतना ज्यादा बढ़ गया है कि वह सत्य को, परमात्मा को भी अपना सहज स्वभाव ही मानने लगी है. भीतर जाकर जिस मौन से मुलाकात होती है, आनंद व शांति का अनुभव होता है वह सत्वगुणजनित भी तो सकती है. परमात्मा तो अनंत है, वह इस छोटे से मन में कैसे समायेगा. जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति व तुरीय, इन चारों को देखने वाला जो आत्मा है, द्रष्टा है, उसमें टिकना है. वह इस समय हाथ से लिख रही है, आँख से देख रही है, यह जाग्रत अवस्था है. यदि लिखते-लिखते कोई भूत या भविष्य का कोई विचार आ जाये और वह उसी में खो जाये तो यह जाग्रत स्वप्न होगा. यदि यह कर्म भी न हो, चिंतन भी न हो तब जाग्रत सुषुप्ति भी घट सकती है और मन बिलकुल खाली हो तब चौथी अवस्था. स्वप्न में मन कैसे-कैसे दृश्य दिखाता है, कल रात्रि वह ध्यान करके सोई थी, एक स्वप्न में मछलियाँ व किसी के कटे हाथ देखे. एक दिन मछली का वीडियो देखा था, और उस दिन स्कूल में पढाते समय एक छात्रा के हाथ देखे जिसमें तीन उँगलियाँ जुड़ी थीं, शायद उसी का प्रभाव हो. सुबह टहलकर लौटी तो माली को बगीचे में सफाई करने को कहा, उसने फूलों वाले पेड़ की छंटाई कर दी, उसे डांटा. उस दिन एक सखी को जब अपने घर के भीतर और बाहर पेड़ कटने की बात से दुःख हो रहा था तो वह उसे समझा  रही थी कि चिंता न करे, पुनः डालियाँ हरी हो जाएँगी. ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’. कुछ देर पूर्व ही चश्मे की कमानी उसकी असावधानी से टूट गयी थी, वह पीड़ा शायद  क्रोध भरे शब्दों में व्यक्त हुई हो, ऊर्जा तो एक ही है उससे कोई भी काम लेना उनके हाथ में है. यदि वे जाग्रत हैं तब, स्वप्न में उन्हें अपनी ऊर्जा पर नियंत्रण नहीं रहता. सुषुप्ति में तो खुद का भी भान नहीं रहता. तुरीय में ऊर्जा अपने आप में ही विश्राम करती है. स्वयं को जानती है. 

कल रात सोने से पूर्व नाईट क्वीन फूल की तस्वीरें उतारी थीं, जिन्हें अभी फेसबुक पर पोस्ट किया. लोग इन तस्वीरों को देखकर प्रफ्फुलित हों इतना ही उद्देश्य है इन्हें प्रकाशित करने के पीछे. इसी तरह ब्लॉग्स पर पोस्ट लिखने के पीछे भी. लोगों को योग सिखाने के पीछे भी यही उद्देश्य है कि उनके जीवन में बदलाव आये, वे सकारात्मक बनें. अपनी भूलों को स्वीकारने की क्षमता उन्हें प्रभु दे तो वे भूलें उनके पथ का दीपक बन जाएँगी, वरना बार-बार वे उन्हीं भूलों को दोहराते रहेंगे. इसी लिए सन्त कहते हैं, भूलें तो करो पर नई-नई, पुरानी को ही न दोहराते रहो. कल शाम एओएल सेंटर गयी, अच्छा लगा, गणेश पूजा का उत्सव था, भजन गाये. दोपहर को घर पर उत्सव मनाया था. नैनी ने गणपति की मूर्ति का बहुत सुंदर श्रृंगार किया. बच्चे बहुत खुश थे, उन्हें प्रसन्न देखकर  उसे जो प्रसन्नता हुई, क्या उसके पीछे अहंकार था, नहीं, केवल परमात्मा का आनन्द था ! सुबह स्थानीय पूजा मण्डप में गयी, विशाल मूर्ति लगाई है वहाँ, बड़े-बड़े मोदक भी थे, सारा वातावरण उल्लासमय था, वहीं से उड़िया समाज की पूजा देखने गयी, पण्डित जी मन्त्र जाप कर रहे थे, जिन्हें सुनने वाला कोई नहीं था. कुछ देर बैठकर वह घर आ गयी. आज दस बजे बाजार जाना है, चश्मा बनवाने. आज हिंदी दिवस है. 

Wednesday, June 28, 2017

या देवी सर्वभूतेषु


परसों रात्रि एक स्वपन देखा जिसमें एक छोटा बच्चा जो चाय की दुकान पर काम करता है, झिड़कियां खा रहा है, लगा किसी जन्म में वह ही तो नहीं थी यह, इसीलिए उसे ऐसे बच्चों की तरफ सहज प्रेम झलकता प्रतीत होता है अपने भीतर. एक दिन और एक स्वप्न में एक लडकी को स्वयं अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारते देखा था. उन्होंने कितने जन्मों में न जाने कितनी गलतियाँ की हैं. हर गलती स्वयं को  कष्ट देना ही तो है. कल रात्रि का स्वप्न अद्भुत था, सुंदर रंग और आकृतियाँ तो दिखी हीं, एक श्वेत वसना देवी का आशीर्वाद भी मिला. देवी की आकृति हिली, उसका मुख खुला और हाथ से एक श्वेत ही दंड निकला, जिससे उससे निकलती ऊर्जा ने स्पर्श किया और भीतर कैसा तो अनुभव हुआ. कल वसंत पंचमी पर अपने घर को मिलाकर पांच स्थानों पर देवी सरस्वती के दर्शन किये. एक स्कूल में तो मूर्ति बहुत सुंदर थी और मृणाल ज्योति में मुस्कुराती हुई प्रतीत हुई, सम्भवतः इसी कारण वह स्वप्न देखा. दृष्टा ही दृश्य बन जाता है, इसका अनुभव अब दृढ़ होने लगा है. वे ही अपने सुख-दुःख के निर्माता हैं, यह ज्ञान मुक्त करने वाला है,. इसीलिए दृष्टा भाव को इतना महत्व दिया गया है.

वह आत्मा है, यह देह उसका घर है, मन व बुद्धि उसके साधन हैं, यह बात अब कितनी स्पष्ट दिखने लगी है. ऊर्जा का अहसास हर क्षण बना रहता है. कल शाम जून को भी इसका परिचय कराने का प्रयास किया, पर कोई जब तक अपने भीतर से ही न चाहे, बाहर से कोई भी किसी को कुछ बता नहीं सकता. सद्गुरू ऐसा कर सकते हैं पर उन्हीं के लिए जो इसके इच्छुक हैं. हरेक ही अवश्य एक न एक दिन अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेगा. आज बादल हैं आकाश पर, सुबह जब वे टहलने गये वातावरण इतना सुखद था कि चालीस मिनट जैसे चार मिनटों में बीत गये. सुबह आकाश सात्विक होता है, धरती भी रात्रि विश्राम के बाद शांत होती है और जीव प्रसन्नता से भरे. स्नान करके जब तुलसी व सूर्य भगवान को जल चढ़ाने गयी तो बादल थे, आकाश को निहारते समय वृक्षों व टहनियों के पीछे ऊर्जा की श्वेत आकृतियाँ भी दीख पड़ीं, बादलों के मध्य भी प्रकाश की झलक थी.

सद्गुरू कहते हैं, मूलतः सब पूर्ण हैं, सभी को अपने उसी स्वभाव को पाना है. अंतर की पूर्णता के क्षेत्र में अनुभव किया हर विचार सत्य हो जाता है. पूर्णता ही नित्य सत्संग है, जो भी उन्हें प्राप्त करना है, वह पूर्णता के विकास से मिल जाता है. जब अभावों के भूत सताने लगें, जब विचार अधूरे हों तब उसी की शरण में जाना है जो पूर्ण है. परमात्मा हर जगह है, हर समय है, वही सब रूपों में प्रकट हो रहा है. वास्तविक संपदा वैराग्य और भक्ति है.


Thursday, April 27, 2017

पीला गुड़हल


आज शाम को क्लब में मीटिंग है. खुद से परिचय जितना गाढ़ा होता जाता है, पता चलता है वे मालिक हैं पर नौकरों की भूमिका निभाते रहते हैं. मन व बुद्धि उनकी सुविधा के लिए ही तो हैं पर वे वही बन जाते हैं. जल जैसे स्वच्छता करने के लिए है, पर जल यदि गंदा हो तो सफाई नहीं कर पाता है, वैसे ही मन तो जगत में प्रेम, शांति व आनन्द बिखेरने के लिए हैं पर जो मन क्रोध बिखेरता है वह तो वतावरण को दूषित कर देता है. परमात्मा की निकटता का यही तो अर्थ है कि उनका मन परमात्मा के गुणों को ही प्रोजेक्ट करे न कि अहंकार के साथियों को जो दुःख, क्रोध, ईर्ष्या आदि हैं. इस समय दोपहर के दो बजे हैं. पिताजी सो रहे हैं, उनकी पीठ में दर्द है. आज सुबह अस्पताल गये थे सेंक लिया व ट्रेक्शन भी. आज बिजली नहीं है. हल्की हवा चल रही है. अब धूप तीखी हो गयी है. उसमें बैठा नहीं जाता. जरबेरा व गुलाब अपनी मस्ती में खिले हैं. कंचन में भी तीन-चार फूल आ गये हैं.

आज जून पिताजी को लेकर तिनसुकिया गये हैं, एकाध घंटे में वापस आएंगे. सुबह एक परिचिता का फोन आया, वह विदेश में रहने वाली अपनी विवाहिता पुत्री को लेकर दोपहर बाद आयेंगी. सुबह वह एक सखी के होनहार पुत्र से मिलने गयी, उसने दो परीक्षाओं में प्रथम स्थान प्राप्त किया है, उसे NASA की तरफ से बुलावा आया है. कल टीवी के कार्यक्रम वाह ! क्या बात है ! में एक कर्नल ने शानदार प्रस्तुति सुनी. लोगों के नामों को लेकर उसने एक लम्बी कविता बनाई और हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा दिया. जीवन कितने विभिन्न रंगों से मिलकर बना है.
आज वह पीले गुड़हल का एक पौधा लायी है. शाम को एक शादी में जाना है, नन्हे के बचपन का मित्र. जून के दफ्तर में एक कर्मचारी की माँ का देहांत हो गया था, उनके यहाँ भी जाना है. विरोधी तत्व कैसे जीवन में साथ-साथ चलते हैं. द्वन्द्वों के पार हुए बिना मुक्ति नहीं है. आज हिंदी में शमशेर बहादुर सिंह का लिखा पाठ पढ़ाया, थोडा क्लिष्ट है.

आज वेलेंटाईन डे है. जून कल उसके लिए एक ड्रेस तथा एक जूता लाये हैं, ढेर सारे फल भी, रसभरी, बेर, अनार, अमरूद और सेब...इस समय ग्यारह बजे हैं, पिताजी बाहर माली को कुछ काम बता रहे हैं. अब उनका स्वस्थ्य कुछ ठीक है. उनमें दृढ़ इच्छा शक्ति है, दया है, दूसरों का दुःख समझते हैं, कुछ भावुक हैं, हृदय प्रेम से भरा है, बात-बात पर आंसू निकल आते हैं और वह स्वयं कैसी होना चाहती  है, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चेतना, जो सदा परमात्मा का सान्निध्य चाहती है. निज स्वभाव से जो खुशबू फैलती है, वह शाश्वत है, जो पद, यश या धन के कारण प्रसिद्ध होता है तो कारण हट जाने पर वह स्वयं को दुर्बल मान सकता है, लेकिन स्वभाव में टिका व्यक्ति सदा ही प्रसन्न रहता है और उसके जीवन से ही ऐसी सुगंध निकलती है कि आस-पास का वातावरण सुवासित हो जाता है. कल उसे सरस्वती पूजा के लिए स्कूल जाना है. जून कर भेज देंगे, अब उन्हें  भी कार मिल गयी है. नन्हे ने ‘अनुगूँज’ शब्द का अर्थ दो-तीन पंक्तियों में अंग्रेजी भाषा में लिखकर भेजा है, बहुत अच्छा लिखा है, लेडिज क्लब की पत्रिका का यह नाम नूना ने चुना था. संपादिका को भेज दिया है. आजकल शाम को वह ‘योग वशिष्ठ’ पढ़ती है, शायद इसी का असर हो, पिताजी आस्था देखने लगे हैं.


उसे लगा मृणाल ज्योति में की सरस्वती पूजा उसके जीवन की पहली सच्ची पूजा थी, आज सुबह चढ़ाया प्रसाद भी शायद पहला प्रसाद था जो वास्तव में ईश्वर को अर्पित करके मिला था. दोपहर को बंगाली सखी के यहाँ गयी वहाँ भी पूजा का आयोजन किया गया था. उसका फूलों का बगीचा बहुत सुंदर है. उन्हें भी इस वर्ष बड़ा घर मिल जायेगा फिर वे भी ढेर सारे फूल उगायेंगे. दोपहर बाद रोज गार्डन गयी, अपने आप में डूबने का सबसे अच्छा तरीका है टहलना ! 

Tuesday, May 10, 2016

वाणी का वरदान


संत कहते हैं, पत्थर, वनस्पति, पशुओं की दुनिया को पार कर वे मानव बने हैं. मानव के पास मन है, वाणी है ! वाणी से ही मनुष्य की पहचान होती है. परमात्मा भी शब्द के माध्यम से प्रकट हुआ है. इस शब्द को जब कोई भीतर सुनता है तो मानो परमात्मा के द्वार पर ही पहुंच गया है. संगीतमयी वह धुन अनवरत भीतर गूँज रही है. बाहर का संगीत भी भीतर से ही उपजा है. भीतर अमृत के झरने बह रहे हैं. मनुष्य का जन्म इसी को सुनने के लिए हुआ है. मनुष्य परमात्मा से ही जन्मता है, उसमें ही जीता है व विलीन होता है, लेकिन वह जानता नहीं. वह सोचता है जैसे सांसारिक वस्तुएं बाहर से मिली हैं वैसे ही परमात्मा भी बाहर कहीं मिलेगा. हर मानव एक खजाना अपने भीतर छुपाये है. अभी वह सोया है, स्वप्न में भिखारी हो गया है ! अभी मन का एक हिस्सा जगा है नौ भाग सोया है. जागा हुआ एक भाग हार जाता है नौ भाग जीत जाते हैं. जप करके अपने मन को जगाया जा सकता है. मानव का मन विकसित हुआ है तभी विज्ञान इतना आगे बढ़ा है किन्तु उसका अचेतन मन अभी भी पाशविक वृत्तियों का शिकार बना है. भक्त अपने मन के भीतर परमात्मा को प्रकट करता है. अनगढ़ा मन भगवान नहीं है, जैसे-जैसे मन जगता जायेगा परमात्मा प्रकट होता जायेगा ! जैसे एक संगतराश अनगढ़ पत्थर में से एक सुंदर मूर्ति को गढ़ता है वैसे ही भक्त या साधक अपने मन में से एक प्रकाशपूर्ण ज्योतिस्वरूप परमात्मा को गढ़ता है. मन को मथ कर वह अमृत कुम्भ प्रकट करता है.

शरीर का सुख प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने करने पर निर्भर करता है पर मन की शांति बाहरी पदार्थों पर निर्भर नहीं कर सकती ! मन तो तभी आनंदित होता है जब वह स्वयं को परमात्मा के अनुकूल बना लेता है, अर्थात अपने स्वभाव में टिकता है. निज स्वभाव में रहना मानो धर्म को धारण करना है. मन ही जीवन का आधार है, मन के स्वास्थ्य पर ही तन का स्वास्थ्य टिका है. मन की पवित्रता पर ही आत्मा की सबलता निर्भर करती है. मन यदि शांत है तो कर्म भी पुण्यशाली होंगे, स्थिर है तो संबंध भी दृढ़ होंगे, समता में है तो उसकी शक्तियों का उपयोग जगत के लाभ के लिए होगा और परमात्मा को उसके माध्यम से प्रकट होने का अवसर मिलेगा. परमात्मा को उन हाथों की तलाश है जो उसका काम करें, उन पावों की तलाश है जो उसके पाँव बनें !


आज मौसम बहुत ठंडा है, परमात्मा का जहाँ वास हो वह स्थान बहुत मनोरम हो जाता है. टीवी पर राम कथा आ रही है, कई बार सुनी है पर हर बार नई लगती है. वह रसपूर्ण परमात्मा भी तो नित नूतन रस बरसाता है. वह अनंत है, अपार है ! जिस दिन कोई आँख उठाकर परमात्मा को देखता है तो अपने को ही देखना होता है. बुद्धि जब थक कर चुप हो जाती है तो भीतर की शांति प्रकट होती है. एकांत में उसके पास एक गहन शांति के अलावा कोई दूसरा नहीं होता, भीड़ में वह कभी इधर-उधर हो जाती है और जिस क्षण मन किसी कामना से भर जाता है या बुद्धि वाद-विवाद में उलझ जाती है तो शांति कहीं छिप जाती है. परमात्मा एकछत्र राज्य करता है, उसके सामने कोई अन्य नहीं रह सकता. ‘प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समायें’   

Wednesday, March 2, 2016

हिना का रंग


आज सुबह अजीब सा स्वप्न देखा. एक नवजात शिशु का जन्म, जन्म देने वाली माँ को वह जानती है और वह बच्चा जन्मते ही कितना लम्बा था. स्वप्नों की दुनिया कितनी निराली है. देर तक वह स्वप्न चला. जन्म का रहस्य पता चल जाता है एक  बार सद्गुरू ने कहा था. सुबह अभी सवा सात ही बजे थे कि बातूनी सखी का फोन आया, उसने कुछ दिन पहले भी कहा था, मिलने आएगी. उसका गला बैठा हुआ था, उसकी कहानी सुनी जब उसके घर गयी. वह अपने ही मन, अपने व्यवहार, अपनी ही आदतों व अपने ही स्वभाव के कारण इतना दुःख पा रही है, वह इस बात को समझ नहीं पा रही है. नूना ने उसे समझाया तो है पर जब तक वह अपने को परिवर्तित करने की बात स्वयं नहीं सोचेगी, तब तक उसको ख़ुशी मिलना मुश्किल है. मन के हाथों या कहें माया के हाथों, अज्ञान के हाथों, अहंकार के हाथों मानव पिसा जाता है, पर उसे होश नहीं आता. मन, माया, अहंकार, अज्ञान यही तो उस आवरण का नाम है जो उसके और परम के बीच है. आत्मा, ब्रह्म, प्रेम, ज्ञान यही तो उस आनन्द स्वरूप के नाम हैं, जो सदा हाजिर है. परमात्मा उसके भी साथ है. इस समय दोपहर के सवा तीन बजे हैं. उसका पुत्र गणित पढ़ने आता है, इस समय परीक्षा दे रहा है. परिवार के दुःख की छाया उसके चेहरे पर भी झलक रही है. जून परसों मुम्बई जा रहे हैं.

कल ध्यान में उसे पल भर में परमात्मा के आनन्द का अनुभव करने की कुंजी हाथ लग गयी.  एक क्षण के शतांश में वहाँ पहुंचा जा सकता है. वह परम हर पल निमन्त्रण देता है. वह अपना घर है. उनके जन्मों से आहत हुआ मन का अपना घर..वहाँ जाकर मन जैसे खिल जाता है, तृप्त हो जाता है, खो जाता है, समाधि इसी को कहते हैं क्या ? जगती आँखों की समाधि ! बैंगलोर आश्रम में गुरूजी एडवांस कोर्स करा रहे हैं, वह उनकी कृपा का अनुभव यहाँ रहकर कर रही है. भीतर झींगुर की सी ध्वनि इस वक्त भी सुनाई दे रही है, कहाँ से आती है यह ध्वनि, कोई नहीं जानता. उस सखी का फोन आया, आज दिल्ली से आने वाले किसी मेहमान के लिए भोजन बना रही है, कल जो दुःख से दबी जा रही थी. ईश्वर सबको शक्ति देता है, वह उन्हें एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ता. वे परमधाम न भी जा सकें वह तो उनके पास आ ही जाता है.
टीवी पर मुरारी बापू राम कथा कह रहे हैं. कितना रस है उनकी कथा में, शेरो-शायरी और पुराने फ़िल्मी गीतों का आध्यात्मिक अर्थ देते हैं.
‘पत्थर के सनम, पत्थर के खुदा ही पाए हैं
लोग शहरे मुहब्बत कहते हैं हम जान बचा के आये हैं’
‘इश्क का जहर पी लिया साकी
अब कौन मसीहा दवा करेगा’ !
‘चंद मासूमों का लहू है
लोग जिसे मुहब्बत की हिना कहते हैं’ !
इस बार उनकी कथा का विषय भगवान नागेश्वर हैं, अर्थात शिव. भगवान महादेव आदिदेव हैं. वही निराकार ब्रह्म हैं, अजन्मा हैं, उनके रूप की कल्पना कर ऋषियों ने जो छवि बनाई है उसका वर्णन हो रहा है. हजारों वर्षों से वह प्रतिमा लोगों के मनों में बसी है. उनका रंग, कुंद, इंद्र तथा शंख के समान श्वेत है, उनकी कृपा असीम है.


जून कल आ गये, वहीं से बड़ी ननद से मिलने भी गये, उसने ढेर सारा सामान भेजा है, कुछ जून ने खरीदा है, उनकी आलमारी का निचला हिस्सा भर गया है, फ्रिज भी भर गया है और तुर्रा यह कि उनका पाचन ठीक नहीं है. इतना गरिष्ठ भोजन खाकर कहीं उसका भी न हो जाये, इस बात का डर है. कल दोपहर बाद से समय कुछ अलग तरह से बीत रहा है. मौन रहने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. आज एक सखी का जन्मदिन है, शाम को वे जायेंगे. आज भी मौसम भीगा है, सुबह उठे तो मूसलाधार पानी बरस रहा था, अभी पुनः आरम्भ हो गयी है. कल डेंटिस्ट के पास गयी थी. उसने कहा, सुबह हो गयी है, सूरज बादलों के पीछे छिपा है. मौसम की उदासी देखकर मन भी जैसे उदास हो गया है. इस भाव के लिए कोई एक शब्द या कुछ शब्द लिखें. उसका मन भी सम्भवतः इस वक्त उदास है, नन्ही छात्रा उसकी एक भी बात नहीं सुन रही है. बच्चों को पढ़ाना इतना सरल भी नहीं है, वे उनके धैर्य की पूरी परीक्षा लेते हैं. 

Tuesday, November 24, 2015

फूलों के पेड़


आज सुबह उठने में देर हुई. कपड़े प्रेस करते समय प्रेस में आग की हल्की सी एक लपट निकली, दिखानी होगी. घर के बाहर फूलों के पेड़ लगवाने के लिए गड्ढे खुदवाये और गुरूजी को सुना. कह रहे थे साधक को आत्मग्लानि से सदा बचना चाहिए. अपने मुक्त स्वभाव में रहना चाहिए, न प्रभाव में न अभाव में बल्कि अपने मूल स्वभाव में. जो प्रेम, शांति, करुणा और भक्ति का स्थान है, जहाँ न राग है न द्वेष और वही वास्तव में वह है. कल शाम टहलते हुए वे नन्हे के मित्र से मिलने गये पर घर बंद था. एक सखी से फोन पर बात हुई, वे लोग हिमाचल की यात्रा पर हैं. कल एक सखी ने फोन किया सत्संग के बारे में, वह उत्साही है बस अपने मुख से अपना बखान करती है थोड़ा सा, उसकी सहयोगी है बच्चों के कार्यक्रम अंकुर में.

आज चिदाकाश के बारे में सुना, जिसे बुद्ध शून्य कहते हैं. वह प्रकाश भी नहीं है, रंग भी नहीं और ध्वनि भी नहीं, इसे देखने वाला शुद्ध चैतन्य है, जो आकाश की तरह अनंत है और मुक्त है. जो कुछ भी दिखाई पड़ता है या अनुभव में आता है वह सब क्षणिक है, नष्ट होने वाला है पर वह चेतना सदा एक सी है. मृत्यु के बाद भी सूक्ष्म शरीर में होकर उसका अनुभव किया जाता है बल्कि वही अनुभव करता है. मन के द्वारा वही सुख-दुःख भोगता है, जब तक कोई उसे मन से पृथक नहीं देख पाता. अधिक से अधिक साधक को उसी में टिकना है. आनन्द स्वरूप उस चेतना में साधक जितना-जितना रहना सीख जायेगा, मृत्यु के क्षण में उतना ही शांत रहेगा. आगे की यात्रा ठीक होगी. ध्यान में साधक उसी में टिकता है या टिकने का प्रयास करता है. वहाँ कुछ भी नहीं है, न मन, न बुद्धि, न कोई देखने वाला, न दृश्य, न कोई संवेदना, केवल शुद्ध चेतना !

आज गुरूजी ने बताया कि जब साधक से कोई भूल हो जाये तो उसे प्रायश्चित करना चाहिए. गुरु के साथ आत्मा का संबंध, हृदय का संबंध बनाना चाहिए, शरीर व मन दोनों से परे है गुरु ! माँ शारदा कीं कथा पढ़ी, अद्भुत कथा है. ईश्वर चारों ओर न जाने कितने रूपों में है, वे ही उसकी ओर नजर नहीं डालते !

उसे अब समझ में आने लगा है, बोलते समय वाणी के साथ भीतर की तरंगें भी प्रभावित करती हैं, वाणी यदि मधुर होगी तो तरंगें प्रेम लेकर वाणी से पहले ही पहुंच जाएँगी, और यदि भीतर कटुता है, खीझ है, क्रोध है, अहंकार है तो वाणी के पहले तरंगे वही लेकर जाएँगी. वाणी का असर नहीं होगा, बल्कि बात अभी कही भी नहीं गयी उसके प्रति नकारात्मक भाव पहले ही जग उठा होगा. भीतर का वातावरण शांत हो तभी तरंगे ऐसी होंगी और ऐसा तभी हो सकता है जब कोई उस जगह रहना सीखे जहाँ कोई विक्षेप नहीं, जहाँ एक सी सौम्यता है, जहाँ न अतीत का दुःख है न भविष्य का डर, जहाँ निरंतर वर्तमान की सुखद वायु बहती है, मन से परे आत्मा के उस आंगन में अपना निवास बनाना है जहाँ प्रेम आनन्द और शांति के सिवा कुछ है ही नहीं. जब जरूरत हो तब चित्त, बुद्धि, मन तथा अहंकार के क्षेत्र में जाएँ अपना काम करके तत्क्षण अपने घर में लौट आयें. तब विचार भी शुद्ध होंगे, बुद्धि भी पावन होगी तथा स्मृतियाँ सुखद बनेंगी और शुद्ध अहंकार होगा. वाणी तथा कर्मों की शुद्धता अपने आप आने लगेगी, ऐसे में वह शक्ति जो अभी व्यर्थ सोचने, बोलने में चली जाती है, बचेगी, ध्यान में लगेगी तथा लोकसंग्रह भी स्वत ही होने लगेगा.     




Tuesday, March 24, 2015

राखी का उत्सव


पांच शरीर हैं उनके, पाँचों के पार वह चिदाकाश है जहाँ पहुंचना है. ईश्वर की स्मृति सदा बनी रहे तभी वे अपने पद से नीचे नहीं गिरेंगे अन्यथा मन के पुराने संस्कार सदा मोहित करते रहेंगे. ईश्वर जो इस सृष्टि का रचेता है, जिसका सभी के प्रति सहज स्वाभाविक प्रेम है, जो आत्मा का हितैषी है, प्रेम वश जो सदा सन्मार्ग पर ले जाने की व्यवस्था करता है. वह उन्हें सुख-दुःख के द्वन्द्वों से अतीत देखना चाहता है. जब वे उसकी निकटता में रहते हैं, उसके सामीप्य का अनुभव करते हैं तभी आकाश की भांति पूर्ण मुक्त, स्वच्छ, अलिप्त रहेंगे, यही उनका सच्चा स्वभाव है. उसकी उपस्थिति का अहसास सुबह ध्यान में हुआ, हर रोज ही होता है और यही उसकी आंतरिक प्रसन्नता का कारण है. मन कितना शांत है आज ! कल उन्होंने राखियाँ बनायीं, वह सखी आयी थी. अभी कुछ काम शेष है.

आज सुबह वे पौने चार बजे उठे, नन्हा उसके पूर्व ही उठ चुका था. उन्होंने ‘क्रिया’ की, योगासन आदि किया. ब्रह्म मुहूर्त में साधना करने का सुयोग भी ईश्वर ने ही बनाया है, वह जो भी करता है उनकी भलाई के लिए ही करता है. वे जो भी करते हैं वह ईश्वर प्राप्ति हेतु ही तो. शरीर स्वस्थ रखने का प्रयास, मन स्वस्थ रखने का प्रयास, सभी तो आत्म साक्षात्कार हेतु ही न. भक्ति के अनुकूल जो भी कार्य हों वही उन्हें अपनाने हैं और जो प्रतिकूल हों उन्हें छोड़ देना होगा. अज गुरू माँ ने बताया, जिनकी आज्ञा चक्र तक की यात्रा पूरी हो जाती है, वह ‘आत्म साक्षात्कार’ की ओर कदम बढ़ा चुके हैं अर्थात निकट आ चुके हैं. आज शाम को क्लब में मीटिंग है, उसे कविता पाठ  करना है. कल ऑयल-किरण के लिए लेख लिखकर दे दिया है.  

जीते जी अगर परमात्म सुख का अनुभव करना हो तो औदार्य सुख का अनुभव करना चाहिए, उदार बनना चाहिए. जो उदार होता है, वह प्रेमी भी होता है, वह सामर्थ्य भी रखता है. आज बाबाजी अपने गुरू की स्मृति आ जाने से भावुक हो रहे हैं. गुरू की याद ऐसी ही होती है. वह भी कितनी भाग्यशाली है कि एक बार ही सही उसने निकट से सद्गुरु के दर्शन किये हैं. भौतिक दूरी अथवा निकटता का उनके लिए कोई महत्व नहीं. श्रद्धा से उन्हें याद करो तो तत्क्षण वे उपस्थित हो जाते हैं. ईश्वर के प्रति प्रेम वही हृदय में उत्पन्न करते हैं. ईश्वर के प्रति हृदय में सहज और स्वाभाविक प्रेम होना चाहिए पर वे अपनी सहजता तो स्वार्थ के कारण पहले ही खो चुके होते हैं, सहज स्वभाव हो तो भक्ति को उदय होते देर नहीं लगती. सहज स्वभाव ही उनका शुद्ध रूप है जटिल तो उनका मन उसे बना देता है. व्यर्थ की कल्पनाओं, विचारों और भावनाओं में डूब कर जो अपने आपको बड़ा ज्ञानी समझता है पर होता नहीं है, अरे, उसे तो यह भी नहीं पता कि कब क्या सोचना है, कब कौन सा विचार कहाँ से आने वाला है, वह अपने को ही नहीं जान पाता तो संसार की समस्याओं का निदान कैसे सोच सकता है, तो मन को ठीक करना होगा !


ज्ञान का अंत भक्ति है, भक्ति रसमय, आभामय, मकरंद मय बनाती है. प्रेम हो जाता है जब गुरू से, ईश्वर से तो प्रेम तारने वाला बन जाता है. देर-सबेर ईश्वर का साक्षात्कार हो जाता है. मोहनिद्रा से सदा के लिए जागृति हो जाती है. सद्गुरु की कृपा मिले बिना ज्ञान टिकता नहीं ! ...और आज सुबह क्रिया के दौरान व उसके बाद उसने गुरुवाणी सुनी, “लगा रह” उस दिन सुना था ‘अभिमानी मत बन’, अर्थात उसे अपने प्रयासों को त्यागना नहीं चाहिए बल्कि पूरे विश्वास के साथ उसमें लगा रहना होगा. कल शाम को यह अनुभव हुआ कि only now is eternal ! वर्तमान का साक्षात् अनुभव हुआ, हर क्षण जैसे शाश्वत हो गया था. वर्तमान में रहने के लिए सबसे अच्छा उपाय है कि वे क्षण-क्षण में जीना सीखें अन्यथा मन कब भूत या भविष्य के झकोरे में झूलना शुरू कर देता है पता ही नहीं चलता. कल दोपहर राखियाँ बन गयीं पचास से कुछ अधिक ही बन गयी हैं. अब २१ जुलाई को होने वाले उत्सव में इन्हें रखना है. सेवा के इस कार्य में कितना सुख मिला है यह सात्विक सुख है पर इससे भी उसे बंधना नहीं है. अब उसके सामने एक स्पष्ट लक्ष्य है और जिस रास्ते से उस पर जाना है वह रास्ता भी पूरी तरह स्पष्ट है. अब चलने की देर है. आत्म साक्षात्कार के उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सद्गुरु का आशीर्वाद भी उसके साथ है और कान्हा का प्रेम भी !         

Friday, May 2, 2014

मिलान कुंदेरा की किताब



दिल था कि संभल ही गया
जां थी कि मचल ही गयी
अक्तूबर महीने का प्रथम दिन, लॉन में हरसिंगार में फूल झरने शुरू हो गये हैं. शरद पूर्णिमा भी आने वाली है, जब चाँदनी रात में चावल की खीर बनाकर चाँद की किरणों से सेवित होने के लिए रखी जाती है. वर्षों पहले उसने वाराणसी में शरद पूर्णिमा की महत्ता पर एक प्रवचन सुना था, जिसकी स्मृति अभी तक बनी हुई है, उसमें रास का जिक्र था, राधा-कृष्ण के प्रेम का, गोपियों के मधुर भाव का. आज भी अवकाश है, उसने लंच में कढ़ी-चावल बनाये. कल शाम एक मित्र के यहाँ भोजन किया, वह भी एक सब्जी बनाकर ले गयी थी पर उसे किसी भी वस्तु में स्वाद नहीं आया.
आज दिन भर कुछ नहीं लिखा पर रात्रि भोजन के बाद बाहर वे टहलने गये तो जुगनुओं की झिलमिल ने मन मोह लिया, नन्हे ने पल भर के लिए एक जुगनू को मुट्ठी में बंद कर लिया और अंगुलियों की दरारों से झांकती रोशनी देखकर मुग्ध हो गया. उसे याद आया कभी-कभी कोई जुगनू खिड़की से उनके कमरे में आ जाता है, अँधेरे कमरे में उसकी उपस्थिति स्पष्ट हो जाती है.

बस थोड़ा सा तम हरते, टिमटिम यूँ चमका करते
बागों, खेतों, जंगल, रस्तों को जलकर उजला करते

अद्भुत काया, पंख सुनहरे, नन्हे-नन्हे दीप जलाये
सूने पथ पर साथी बनते, मीलों संग चलते-चलते

कोमल तन, छुअन कोमल, हाथों पर आ कर टिकते
हुई शाम तो दिया जलाकर, रजनी का स्वागत करते

आज उसने टीवी पर एक हास्य कवि सम्मेलन देखा-सुना, एक किताब पढ़ी Milan Kundera की, बहुत अच्छी लग रही है यह किताब. laughter का विश्लेषण लेखक ने बखूबी किया है. हँसी जो कभी-कभी आती ही जाती है, यूँही रूकती ही नहीं, महान लेखक वाकई महान होते हैं. सोचा हँसी पर खुद भी कुछ लिखे-

खन-खन करती और कभी रुनझुन पायल सी
हँसी बिखरती ज्यों नभ से वर्षा होती

अंतर से फूटे ज्यों झरना अधरों से बिखरे ज्यों नगमा
पड़ श्रवणों में मन को भी गुदगुद करती

गूँज किसी निर्दोष हँसी की बन स्मृति दिल में बसती
कभी भिगोती आँखें भी कभी नम करती  

आज भी धूप काफी तेज है, सफाई अभियान में आज वह स्टोर की सफाई करवा रही है, सुबह हल्का व्यायाम किया, पर इतना पसीना आया और श्वास भी फूलने लगी, शायद यह उसका वहम हो या अभी तक.. थक जाने की हद तक काम करने का मन अब नहीं होता. कल शाम एक सखी के यहाँ एक विज्ञापन देखा, पर इंटरव्यू उसी दिन है जिस दिन उन्हें दीवाली की खरीदारी के लिए तिनसुकिया जाना है, दिसम्बर में घूमने जाने के लिए टिकट भी उसी दिन रिजर्व करानी है. सखी ने लक्ष्मी पूजा के दिन हलवा(सूजी का) खिलाया, लगा कि प्रसाद ही खा रहे हैं. घर से ‘सगड़ा’ भी आया है, वे हर वर्ष भेजते हैं या स्वयं देते हैं, उन तीनों को हाथ पर बांधना है और फिर वापस भी भेजना है. उसे याद आया भैयादूज का टीका भी भेजना है.

Today she is alone at home since 7 in the morning. Jun has joined a training programme for three days in T &D so he is not coming for lunch. She got cleaned dining room and gallery then cooked lunch for Nanha and herself, took bath leisourly at 10.30 then read ‘bhagvad gita’ for half an hour, exercised and watched a music based prog on ptv, anchor was shanaz and guest was a modern lady singer of Pakistan. Song was about freedom, which is very essential thing for every person and for her it is a part of life, to spend some time of day with herself doing the things which she likes, so what is the use of 9-4 job for which she will have to give entire morning also at least eight hours of each day for some money, which she does not want. So ‘yes’ to tinsukiya and no to interview.

आज भी जून दोपहर को घर नहीं आये, कल शाम उन्हें घर आते-आते साढ़े पांच हो गये थे, उनकी ट्रेनिंग अच्छी रही, बहुत सी बातें उन्हें भी बतायीं. ध्यान कैसे करते हैं, मन की विभिन्न अवस्थाओं के बारे में भी, नींद, स्वप्न, तनाव सभी के बारे में. जून को इन सब विषयों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, सो उन्हें अच्छा लगा. कल रात सोने से पहले व सुबह उठकर भी उन्होंने ध्यान किया. जिन्दगी के एक नये पहलू की ओर उनका ध्यान जा रहा है. वह बेहद खुश लग रहे थे तनाव मुक्त, वाकई में संतुष्ट. उसे इसलिए भी अच्छा लगा कि उम्र के साथ-साथ जो गम्भीरता स्वभाव में आती है वह ध्यान से ही आ सकती है. आज उन्हें प्राणायाम सिखाया जायेगा. उसने सुबह सफाई का काम आगे बढ़ाया फिर पीटीवी देखा, एक फिल्म का थोड़ा सा भाग, फिल्म की नायिका इतनी घरेलू सी लगी. मोहसिन खां का इंटरव्यू भी, जो पहले क्रिकेटर थे फिर फिल्मों में चले गये. एक सखी का फोन आया, उसने व्रत रखा है आज करवाचौथ का, जून को उसने कहा तो हमेशा की तरह उन्होंने टाल दिया उसे भी कहाँ इन बचकानी बातों में रूचि है.