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Wednesday, May 13, 2026

श्री रुद्रम स्तोत्र

श्री रुद्रम स्तोत्र 




कुछ देर पहले वे रात्रि भ्रमण के लिए गये तो बायीं तरफ़ के पड़ोसी की नयी कार देख कर ठिठक गये, सिल्वर XUS 700, उनकी कार जैसी है। अभी तक बादल बरसे नहीं, शायद आधी रात तक बरसेंगे। आज मोदीजी ने शिक्षा मंत्रालय की ओर से आयोजित ‘स्मार्ट इंडिया हैकाथन’ के अंतिम दिन भाग लेने वाले पंद्रह हज़ार विद्यार्थियों को संबोधित किया।इस आयोजन में दो हज़ार से अधिक संस्थानों के एक लाख साठ हज़ार छात्रों ने भाग लिया है। आज सुबह वे घर से पंद्रह किमी दूर वैकुण्ठ हिल-इस्कॉन मंदिर देखने गये थे।तिरुमाला मंदिर की तरह बनाया यह राजाधिराज गोविन्दा का अति विशाल और सुंदर मंदिर एक पहाड़ी पर बना है। आज ‘अथर्वशीर्ष’ के अंतिम भाग को भी लिखा, यह अथर्ववेद का ही एक अंश है, जिसे गणेश उपनिषद भी कहते हैं। इसमें भगवान गणेश को ही ब्रह्मांड का कर्ता, धर्ता और हर्ता माना गया है।अद्भुत हैं वेद और उनमें की गयी प्रार्थनाएँ !


आज कोर्स से आने के बाद पहली बार मोबाइल पर राजनीतिक चर्चा सुनी, अच्छी नहीं लगी। गुरुजी को सुनना कितना अच्छा लगता है, वह आज भी उतनी ही शिद्दत से बोलते हैं, जितना सन् बयासी में बोलते थे। वह दिल से बोलते हैं, वह कितना मीठा बोलते हैं। उनकी बात सीधे दिल को छूती है। ‘रुद्रम’ पर उनका पहला प्रवचन सुना, बहुत ही प्रभावशाली है, अनोखा है। रुद्र की परिभाषा दी है, वह कौन हैं? कहाँ रहते हैं ? कल दूसरा व्याख्यान आएगा। ‘श्री रुद्रम स्तोत्र’ कृष्ण यजुर्वेद से लिया गया है, इसमें दुख-पाप के नाश और कल्याण के लिए भगवान शिव की स्तुति की गयी है। वह ‘अथर्वशीर्ष’ की तरह इस पर भी लेख लिख सकती है।कोर्स में सभी को सेवा करने के लिए कहा गया था, साहित्य की जितनी सेवा हो सके, वही उसका प्राप्य है। सुबह टहलते समय एक शिशु चमगादड़ देखा, काले रंग का। वे तस्वीर लेते, उससे पहले ही उड़ गया। 


आज दोपहर को आगे ‘रुद्रम’ सुना, अनोखा स्तोत्र है यह। रुद्र को इस जगत की सब वस्तुओं में, हर कोने में, हर बात में शामिल किया गया है। आर्ट ऑफ़ लिविंग की अध्यापिका का फ़ोन आया था, वरिष्ठ शिक्षक के यहाँ मीटिंग है, उसे न जा पाने का अफ़सोस हुआ पर बाद में पता चला, वह मीटिंग स्थगित हो गई थी।कुछ देर के लिए सोई तो एक खिचड़ी सपना देखा, पिछले दिनों घटी बातों का मिला-जुला एक सपना, जिस पर एक कहानी बन सकती है। कल पूरे पंद्रह दिनों के बाद बच्चे आने वाले हैं, मिलकर अच्छा लगेगा। जीवन में जैसे एक ठहराव आ गया है। गुरुजी की वाणी आश्वासन देती हुई प्रतीत होती है। बच्चे अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हैं, वे उनकी प्रतीक्षा या उनके फ़ोन की प्रतीक्षा ही कर सकते हैं। यही जीवन है, यहाँ ईश्वर के सिवाय तथा अपनी आत्मा के सिवाय कोई भी सहायक नहीं है। प्रसन्न रहकर सदा सबके कल्याण की कामना करना ही जीवन का सर्वाधिक अच्छा सदुपयोग है। 


आज का इतवार अच्छा रहा। सुबह बगीचे में दो घंटे बिताये। दोनों बच्चे तो आये ही साथ में दोनों के कज़िन भी। सब मिलकर स्वादिष्ट दक्षिण भारतीय नाश्ते के लिए नये खुले रेस्तराँ उडुपी गये। वापसी में निकट स्थित फ़ार्म हाउस की ज़मीन देखने। घर आकर आईपीओ गेम खेला, शेयर ख़रीदने व बेचने का खेल, रोचक है। दोपहर को भाप में चावल के आटे  और नारियल के पाउडर से पुड्डु बनाया, साथ में काले चने की सब्ज़ी, जिसे यहाँ ‘कदले काई’ कहते हैं। कुछ देर ‘सैंड मैन’ देखा, अनोखी कहानी है इसकी। शाम को सब लोग नया बन रहा क्लब हाउस देखने गये।कुछ बच्चे तरणताल में थे, कुछ कैरम खेल रहे थे।अंधेरा होने से पहले ही वे वापस चले गये। 


आज शेयर मार्केट के बारे में कुछ जानकारी हासिल ली, कल से और लेनी है। आज सुबह मूसलाधार वर्षा हुई, नदियों, झीलों आदि में पानी का स्तर बहुत बढ़ गया है। राम नगर में लोगों के घरों में पानी भर गया है। और हाईवे पर कारें पानी में बह रही हैं। प्रलय का ही दृश्य है। प्रकृति का विकराल रूप दिखायी दे रहा है। जीवन कितना अस्थिर है। पापाजी से बात हुई, उन्होंने कहा, शरीर का ध्यान रखना चाहिए, उनका स्वास्थ्य कभी-कभी ऊपर-नीचे होता है, जो स्वाभाविक भी है। उन्होंने बताया, छोटी बहन दो-तीन दिनों के लिए आ रही है। 


आज सुबह ‘गणेश चतुर्थी’ के उत्सव में शामिल होने वे नैनी के यहाँ गये और शाम को एक परिचित के यहाँ। मौसम अच्छा रहा, नाइट क्वीन का एक फूल कल की तरह आज रात भी नौ बजे खिलने वाला है। आज भी प्रांजल कामरा से शेयर मार्केट के बार में और जानकारी हासिल की, बीस दिन बाद पहला शेयर ख़रीदना है। आज एक पुरानी सखी का फ़ोन आया, वह आस्ट्रेलिया जाकर बेटे से मिलकर आयी है। 


एक और दिन बीत गया। कुछ नया सीखा, कुछ नया लिखा भी। आज ‘अष्टावक्र गीता’ भी आ गयी है।यह अद्वैत वेदान्त का अति महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जिसमें ऋषि अष्टावक्र तथा मिथिला के राजा जनक के मध्य आध्यात्मिक संवाद है।सुबह वे टहलने गये तो कई जगह स्ट्रीट लाइट नहीं थी।एक नई सड़क पकड़ी तो कुत्ते भौंकने लगे। थोड़ा पहले ही वे घर लौट आये।सोसाइटी में गणेश पूजा की सजावट आरंभ हो गयी है। मुख्य स्टेडियम के बाहर  बत्तियों से गणेश जी का चित्र बनाया गया है। जून ने आज काफ़ी लोगों से फ़ोन पर बात की। वह आजकल अपने सहज स्वभाव में हैं, प्रसन्न तथा सक्रिय !


आज श्रील प्रभुपाद की आत्मकथा सुनी, उससे पहले अदानी की। प्रभुपाद इस्कॉन के संस्थापक थे। एक व्यक्ति कितना कुछ कर सकता है। परमात्मा सभी के भीतर है, सभी की संभावनाएँ अपार हैं। गुरुजी कितना काम कर रहे हैं, वे उनके शिष्य होकर भी यदि स्वयं को कमजोर मानें तो इसमें उनका ही दोष है। दोपहर को अनुवाद कार्य किया। नूना ने नज़र उठाकर देखा, सिटआउट में लगी सोलर से जलने वाली मशाल दिख रही थी, उसका प्रकाश एक मोहक वातावरण उत्पन्न कर रहा था। दिन भर वर्षा नहीं हुई, पर सुबह टहलने गये तो कोहरा छाया हुआ था, सब कुछ रहस्यमयी सा लग रहा था।    


Tuesday, May 5, 2026

स्पंद कारिका


स्पंद कारिका 


आज समाचारों में सुना राष्ट्रपति पद के लिए भाजपा की उम्मीदवार श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी हैं। पहली आदिवासी महिला, जो इतने बड़े पद तक पहुँचेंगीं। वह झारखंड की राज्यपाल रहा चुकी हैं और उड़ीसा विधान सभा में कई बार मंत्री पद भी संभाल चुकी हैं।छोटी बहन ने वापस जाकर आर्ट ऑफ़ लिविंग का पहला बेसिक कोर्स करवाने के लिए काम करना अभी से शुरू कर दिया है। पहले वह सहायक शिक्षिका के रूप में कोर्स करवाएगी, फिर कोड मिल जाने के बाद स्वतंत्र रूप से। दोपहर को उन्होंने यू ट्यूब पर एक आध्यात्मिक फ़िल्म देखी, जो अनोखे जीवों व प्राणियों से परिचय करवाती है। देह में आत्मा की उपस्थिति को सिद्ध करने के लिए बहुत अच्छी दलीलें देती है।शाम को वे सब एपिक रॉक गये, कुछ देर वहाँ बैठे जहाँ एक झरना बह रहा था। वर्षा के मौसम में झरनों में एकाएक पानी बढ़ जाता है।कल नन्हा सभी को मैसूर ले जाने वाला है।जहाँ छोटी बहन दो दिन अपने जेठ-जेठानी के पास रहकर वापस आएगी। 


आज बहुत दिनों के बाद अपने पुराने समय पर डायरी उठायी है। परसों की रात मैसूर के निकट स्थित एक हरे-भरे फ़ार्म हाउस ‘कैरिस ब्रुक’ में बिताकर, कल दोपहर का लंच मैसूर में करने के बाद वे शाम तक घर लौट आये।पापाजी से बात हुई, उसकी एक कविता पढ़कर कह रहे थे, दुनिया में सभी अपने-अपने काम में लगे हैं, भक्त व कवि भी इसी तरह अपने काम में लगे हैं। परमात्मा अनंत रूपों में स्वयं को प्रकट कर रहा है। मन संदेह करता है पर आत्मा सदा एक रस साक्षी मौजूद है, वह प्रेम, शांति व करुणा का सागर है, वही सत्य है।आज भी छात्राएँ हिन्दी पढ़ने आयी थीं, जिनकी मातृ भाषा हिन्दी नहीं है, उन्हें कितनी परेशानी होती है बोलने में, जैसे उसे कन्नड़ बोलने में होती है। 


आज का दिन कुछ अलग बीता, सुबह सब सामान्य था, टहलने गई तो पैरों में भारीपन लगा, शरीर में स्फूर्ति नहीं थी। योगासन भी पूरे नहीं हो पाये। नाश्ते के बाद टाइप करने बैठी तो शरीर अलसा रहा था। भोजन बनाया तो किसी छोटी सी बात पर मन झुंझला गया, कटु तो नहीं एक-दो शब्द तेज आवाज़ में निकले, जैसे कोई भीतर से स्वयं ही निकाल रहा हो। दिन भर कुछ नहीं खाया, रात्रि के समय कुछ भूख का अहसास हुआ। कर्मों के फल के रूप में भी कर्म होते हैं, यह आज जैसे स्पष्ट हो रहा था।जून शांति से सब देख-सुन रहे थे, उन्होंने कुछ प्रतिवाद नहीं किया।


आज दोपहर बारह बजे वे केंगरी रेलवे स्टेशन जाकर छोटी बहन को ले आये।उसने साड़ियाँ, सूट व कुर्ते दिखाये, जो मैसूर से लायी है। शाम को उन्होंने मिलकर बड़ी स्क्रीन पर वे सारे फ़ोटोज  देखे, जो पिछले कई दिनों से खींच रहे थे।उसके बाद सोने से पहले साधना, भजन, भोजन और रात्रि भ्रमण।  


आज जुलाई का प्रथम दिन है। आर्ट ऑफ़ लिविंग की नयी-नयी बनी शिक्षिका मोबाइल पर हैप्पीनेस कोर्स का मैनुअल पढ़ रही है। जून भी मोबाइल पर कुछ देख रहे हैं। शाम को वे नापा के पीछे वाली सड़क पर टहलने गये, जगह-जगह निर्माण कार्य शुरू हो गया है। पहले की सी शांति भी नहीं थी और न ही सफ़ाई! जून ढेर सारे फल लाए थे, ड्रैगन फ़्रूट, लंगड़ा आम और जामुन बहुत मीठे थे। पापा जी ने बताया, छोटा भाई बहरीन से लौट आया है। सुबह वे आश्रम गये थे। हर्बल टी लेने के प्रकरण में जून से उसकी बहस हो गयी, पर जल्दी ही स्मरण आ गया, आश्चर्य हुआ कि अभी भी आग्रह शेष है भीतर ! मन की हज़ार परते हैं, जिन्हें शायद भगवान भी नहीं जानते ! 


आज सुबह टहलने गये तो हवा ठंडी थी और आकाश पर चंद्रमा अपनी आभा बिखेर रहा था।जुलाई का महीना बैंगलोर का सबसे ठंडा महीना कहा जाता है। इसी महीने की तेरह तारीख़ को गुरु पूर्णिमा है।गुरुजी ‘स्पन्द कारिका’ पर बोलने वाले हैं। सोसाइटी में गणेशोत्सव का उद्घाटन समारोह है। दो माह तक ये कार्यक्रम चलेंगे। छोटी बहन को कल वापस जाना है।सुबह उसने साइकिल चलाने का अभ्यास किया।वर्षों पूर्व सेना में काम करते समय उसने साइकिल चलायी थी। पिछले दो हफ़्ते उन्होंने साथ बिताये। अच्छा लगा। शाम को वे नन्हे के यहाँ गये। 


आज से नूना स्वामी रामानन्द जी द्वारा पर दिया गया प्रवचन सुनना शुरू किया है। कुछ-कुछ समझ में आ रहा है।गुरु पूर्णिमा से पहले कुछ भूमिका तो तैयार हो जानी चाहिये मन में।यह नौवीं शताब्दी के कश्मीर शैव दर्शन का एक ग्रंथ है,जो वासुगुप्त द्वारा रचित शिव सूत्रों पर आधारित है । स्पंद का अर्थ है भगवान शिव की शक्ति के दिव्य कंपन, जिससे इस सृष्टि का उदय और विलय होता है। 


इस महीने चार रिश्तेदारों के जन्मदिन पड़ते हैं, वह सभी के लिए कविता लिखेगी। आज ट्रांसक्रिप्शन का कार्य भी आया। पापाजी आज गर्मी या उम्र के कारण थोड़ा सा परेशान थे, जो स्वाभाविक है। मधुमालती में पहली बार फूल लगे देखे। सहजन का पेड़ तेज हवा में गिर गया था, नापा का माली आकर उसे सहारा देकर सीधा कर गया है, पता नहीं बचेगा यह नहीं।जड़ें मज़बूत होंगी तो शायद बच जाये। सुबह छोटी बहन का फ़ोन आया, वह घर पहुँच गई है।वहाँ उसे गर्मी का अहसास हो रहा है, एक महीना वह बैंगलुरु के सुहाने मौसम में रहकर जो गई है। 


कल नन्हे ने बूस्टर वैक्सीन लगवा ली। थोड़ा बहुत साइड इफ़ेक्ट भी हुआ। आज भी ‘स्पन्द  कारिका’ सुना, मन में जैसी भावना होती है, परिणाम भी वैसा ही आता है। आत्मा तो सागर की तरह है, वे अपने मन को चम्मच जितना रखेंगे तो उतना ही समायेगा। यदि विशाल बनाएँगे तो उतना अधिक मिलेगा। यदि क्षीर सागर के साथ एक रूप हो जाएँगे तो वही बन जाएँगे। मानव अपने अनंत स्वरूप को भुलाकर स्वयं को उपाधि से जोड़कर व्यर्थ ही सुखी-दुखी होते रहते हैं। आनंद उनका स्वभाव है  और सत्य उनका स्वरूप ! 


आज भी कल की तरह दिन भर वर्षा होती रही। आज ट्रांसक्रिप्शन का कार्य पूरा हो गया। गुरु पूर्णिमा पर लिए भी एक लेख का अनुवाद करना है। लेखन कार्य में कुछ कमी आई है, पर जीवन जो रंग दिखाए, स्वीकार है। जन्मदिन की दो कविताएँ टाइप कीं।आज पतंजलि योग सूत्र पढ़ते समय कितनी सरलता से स्पष्ट हुआ कि ‘योग’ चित्त वृत्ति का निरोध कैसे है ? और जब ऐसा होता है तब द्रष्टा अपने स्वरूप में कैसे ठहर जाता है। यदि ऐसा नहीं होता अर्थात वृत्ति बनी रहती है तो द्रष्टा उसी वृत्ति का आकार ग्रहण कर लेता है।जैसे ब्रह्मा कुमारी कहती है आत्मा जब सोचती है तब मन बन जाती है। अब मन्त्र जाप का महत्व भी ज्ञात हो रहा है। मन जब एक मन्त्र का आकार ले लेता है, तब दो जाप के मध्य में द्रष्टा का अनुभव होता है। इसीलिए ॐ को परमात्मा का नाम कहा गया है। सारे शब्द ॐ में समा जाते हैं। ॐ के बाद जो मौन है, वही आत्मा का स्वरूप है। उसमें टिक जाना ही योग है। भीतर जितने भी विचार चलते हैं, वे आत्मा से ही उपजे हैं, पर उससे दूर ले जाते हैं। जैसे लहर सागर से ही उपजी है, पर उससे ऊपर उठती है तो दूर चली जाती है। 


आज जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की नारा शहर में चुनावी भाषण देते समय मृत्यु हो गयी, उन पर एक व्यक्ति ने गोली चलायी थी। चीन में इस बात की ख़ुशी मनायी गई। गुरुजी ने भी ट्वीट किया, वह उनसे जुड़े हुए थे।  


Wednesday, September 4, 2024

शिव सूत्र


शिव सूत्र

कल उन्हें नन्हे के घर जाना है और वहाँ से उसके एक मित्र के यहाँ, उसका नया घर देखने; जहाँ गृहप्रवेश की पूजा का आयोजन किया गया है। नन्हा भी एक महीने के लिए किराए पर लिए घर में है, उनके ख़ुद के घर में रिनोवेशन का काम जो चल रहा है।किसी भी अन्य मूर्त या अमूर्त वस्तु की तरह एक घर को संभाल और संवार कर रखना इतना आसान तो नहीं है। इसके रख-रखाव का ध्यान रखना होता है ताकि लंबे समय तक यह सुंदर और सुरक्षित बना रहे। 


वे लोग कल दोपहर बारह बजे ‘सॉंग ऑफ़ साउथ’ पहुँचे, जो एक विशाल सोसाइटी है। वहाँ कई बड़े-बड़े लॉन तथा पार्किंग स्थल थे। उसमें बाहरवें टावर में सत्रहवीं मंज़िल पर मित्र का घर है। कुछ अन्य लोग तथा उसके भाई-भाभी व भतीजी पहले से ही वहाँ उपस्थित थे। सोसाइटी के क्लब हाउस में भोजन का इंतज़ाम किया गया था। पूजा सुबह ही हो चुकी थी। नन्हे ने बताया, कल रात एयरपोर्ट से भाई के परिवार को लाते समय मित्र की कार को एक प्राइवेट बस ने टक्कर लगायी, बाँयी तरफ़ का पिछला दरवाज़ा धँस गया, भाई वहाँ बैठे थे, पर सौभाग्य से उन्हें कोई चोट नहीं आयी।फ़ोन करके उसने नन्हे को बुलाया, वे सब उसकी कार में बैठ कर रात को एक बजे घर लौटे।


रात्रि के नौ बजे हैं। साढ़े नौ बजे गुरुजी की एबीसी टीम के साथ मीटिंग है।जिसमें सभी अनुवादकर्ताओं से चर्चा होगी और उन्हें दिशा निर्देश भी दिये जाएँगे।आज महिला दिवस के उपलक्ष्य में सोसाइटी में योग सत्र का आयोजन किया गया था। सुबह कई लोगों को महिला दिवस पर संदेश भेजे। पापाजी से बात हुई, उन्हें गुरुजी पर लिखी उसकी कहानी पसंद आयी। सुबह वे टहलने जाते हैं तो किसी न किसी सड़क पर सूखे पत्तों के ढेर पर सोया कुत्तों का परिवार भौंक कर अपनी नाराज़गी व्यक्त करता है, उनकी नींद में जैसे ख़लल पड़ गया हो। ‘देवों के देव’ में रावण का अहंकार टूटते देखा, जब शिव ने उससे कहा, भक्ति का अहंकार भक्त को डुबा देता है।रावण कितना बड़ा विद्वान था पर अपनी भक्ति और ज्ञान का गर्व उसे ले डूबा।


आज घर में पीछे आठ दिनों से चल रहा काम पूरा हो गया। सुबह साईं बाबा पर एक फ़िल्म देखनी आरंभ की थी, जो अभी उनके जन्म की कथा के साथ समाप्त होने वाली है। इस फ़िल्म में उनकी अद्भुत बाल लीलाएँ दिखायी गई हैं।यह भी दिखाया गया है कि देवत्व उन्हें जन्म से ही प्राप्त था, जिसे वह सहज ही प्रकट भी करते थे, जिसका जगत को सदा लाभ मिलता था और आज भी मिल रहा है। प्रेम और करुणा की मूर्ति थे, सेवा उनका सहज स्वभाव था। इतने वर्षों तक उनके बारे में कितनी अफ़वाहें भी प्रचलित हो गई हैं, कोई उन्हें जादूगर बताता है तो कोई फ्रॉड भी। सत्य क्या है, यह कौन जानता है। शायद सबका अपना-अपना सत्य है। आज दिन भर परमात्मा की कृपा का अहसास होता रहा, वही तो है सबका आधार ! संत कहते हैं, वह अपना आप ही तो है। वह तो सदा से ही था, अब उसकी प्रतीति अनायास ही रहने लगी है। 


आजकल एक विचित्र बात उसके साथ हो रही है।जो भी विचार मन में आता है, वह घट जाता है। उसके बिना कहे ही जून वैसा ही करने लगते हैं। उसकी छोटी-छोटी इच्छाएँ पूरी होती रहती हैं।इच्छा उसके लिए लाभप्रद है या नहीं इसका कोई भेद नहीं रहता। परमात्मा की शक्ति रहस्यमयी है। विचार ही वस्तु बन जाते है,  इसका  प्रत्यक्ष उदाहरण एक बार नहीं अनेक बार मिला है पिछले दिनों। आज दिन भर मन हल्का सा रहा है, मन के साथ तन में भी हल्कापन लग रहा है। नापा, उनकी सोसाइटी में शिवरात्रि की तैयारी चल रही है। मंदिर के रास्ते पर बिजली के बल्ब लगा दिये गये हैं, आगे एक तरफ़ तख़्त बिछाया  गया है, स्टेज जैसा, शायद बच्चे अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। आश्रम में गुरुजी द्वारा शिवसूत्र पर दो दिनों का व्याख्यान चल रहा है। अद्भुत है शिवसूत्र ! पहले उसने शिवसूत्र पर ओशो को व्याख्या भी सुनी थी।नन्हे के एक जूनियर साथी की यात्रा के दौरान हृदयाघात से मृत्यु हो गई, कुछ दिन पूर्व उसका तलाक़ हुआ था। लिवर व किडनी की भी समस्या थी। शायद अपने पापा से  उसका रिश्ता भी अच्छा न रहा हो, पिता ने उसकी माँ के न रहने पर दूसरा विवाह कर लिया था। कभी-कभी जीवन कितना विचित्र रूप लेकर आता है। एक परिचिता से पता चला, विवाह टूटने से वह अवसादग्रस्त था।उसके पिता बहुत दुखी हैं।  


आज शिवरात्रि है, वे कुछ देर पूर्व ही मंदिर से होकर आये हैं। बहुत भीड़ थी, बच्चे नृत्य के लिए तैयार थे। महिलाएँ श्लोक उच्चारण कर रही थीं। कुछ लोग खड़े थे। मंदिर में पुजारी पूजा कर रहा था। वे मास्क ले जाना भूल गये, सो जल्दी वापस लौट आये। कल सुबह एक मेडिकल कॉलेज में कोविशील्ड वैक्सीन लगवाने जाना है।साईं बाबा की किताब आगे पढ़ी, अनोखे व्यक्ति ?संत थे वे। संत व्यक्ति नहीं रह जाता, वह समष्टि से एक हो जाता है। उसके चमत्कारों से पुस्तक भरी पड़ी है।गुरु जी के पास रहने वाले भी कितने ही चमत्कारों का अनुभव करते हैं, उसने स्वयं भी अनेकों बार अनुभव किया है।आश्रम के सत्संगका टीवी पर प्रसारण देखा, आज चित्रा जी आयी हैं, जिनके सुमधुर भजन सुनकर मन मंत्रमुग्ध हो जाता है।  



Thursday, March 9, 2023

ब्रह्म कमल की भीनी गंध

आज ईवी के लिए चार्जिंग स्टेशन लग गया, टाटा मोटर्स ने लगाया है। सप्ताह के अंत तक गाड़ी के आने की सम्भावना है। नन्हे का मंगाया रंगों का डिब्बा आ गया, ब्रश, व ट्रे भी हैं, जिनसे वह खुद असेंबल किए जहाज़ पर रंग करने वाला है। उसे भी एक चित्र बनाने की प्रेरणा हो रही है। उसने उसके लिए नया मॉनिटर और एक पुराने कंप्यूटर का सेटअप कर दिया है, कल से वह उस पर ही लिखेगी।’मन की बात’ में मोदी जी ने और कई प्रेरणास्पद बातों के अलावा कहानी सुनाने की कला पर ज़ोर दिया और एक कहानी भी सुनायी। नन्हा व सोनू दही व बैगन की बनी एक विशेष सब्ज़ी लाए थे, उन्होंने काले चने व पूड्डू बनाये। एक नयी फ़िल्म देखी ‘एनोला होम्स’ अच्छी लगी, जो शरलक होम्स की बहन है और उसकी तरह जासूस भी। शाम को सद्गुरू को सुना जो जीवन के बारे में, अंतर्दृष्टि और चेतना के बारे में बता रहे थे। देवों के देव में महादेव व सती के विवाह का एपिसोड देखा। शिव को ज्ञात है कि भविष्य में क्या लिखा है, पर उसे रोका नहीं जा सकता। वह सती को यह अधिकार देते हैं कि वह अपने निर्णय स्वयं ले। उनके आपसी विवाद और  मनुहार की कथाएँ बहुत रोचक हैं। 


गैराज में रखे गमलों में श्वेत बड़ा सा नाइट क्वीन फूल खिल गया है, जिसे ब्रह्म कमल भी कहते हैं, सिर्फ़ रात को खिलता है और सुबह होने से पूर्व मुरझा जाता है। भीनी-भीनी गंध होती है। उसने कहीं पढ़ा था कि ब्रह्म कमल के फूल में ब्रह्मा और नारायण का वास है, और इसके कारण नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है व सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है। जहाँ यह होता है, वहाँ सुख, समृद्धि और सौभाग्य भी बना रहता है सुबह से कई बार वर्षा हुई। सुबह घर से चार कदम दूर थे कि बूँदे गिरने लगीं, जैसे उनके घर पहुँचने का इंतज़ार ही कर रही थीं। प्रकृति कई बार उनका साथ देती है । नन्हे को बुख़ार हो गया है, गंध आ रही है सो कोरोना नहीं है। फिर भी उसने टेस्ट कराने के लिए रक्त का सेंपल दिया है। जून कह रहे हैं वह दिन भर उसके बारे में ही सोचते रहे। शाम को फ़ोन पर बात की तो वह सामान्य लग रहा था। सोनू ने आधे दिन की छुट्टी ले ली है, वह उसका ध्यान रख रही है। उसने एक ब्लॉगर लेखिका की एक पुस्तक मँगवायी है,अटकन-चटकन, अच्छी लग रही है। 


अक्तूबर का महीना यानि पूजा का महीना शुरू हो गया है। मौसम काफ़ी गर्म था आज। शाम को पिताजी से बात हुई, वह कारवां पर पुराने हिंदी गाने सुन रहे हैं, कह रहे थे उन्होंने गांधी जी की पोती का साक्षात्कार भी सुना। उसने भी आज सुबह बापू और शास्त्री जी के विचारों और उनके दर्शन के बारे में सुना। एक कविता लिखी और एक छोटा सा आलेख भी। नन्हे का करोना टेस्ट नेगेटिव आया है, उसे सर्दी-जुकाम ही था। वह काफ़ी आराम महसूस कर रहा था, जैसे सिर से कोई भूत उतर गया हो। आज देवों के देव में सती ने आत्मदाह कर लिया, शिव अत्यंत दुखी हैं, वह अपना ईश्वरत्व भुला बैठे हैं। वह एकांत में चले गए हैं। नंदी ने पत्थर के बैल का रूप धर लिया है और वह उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। एक वही है जिसने उन्हें कभी नहीं छोड़ा। 


आज रविवार है, सुबह दो घंटे माली से पौधों की देखभाल करवाने में लगाए। नन्हा व सोनू आज नहीं आए, सोनू की तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही थी। कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या विश्व में साढ़े तीन करोड़ से अधिक हो गयी है। मृतकों की दस लाख से ज़्यादा। शाम को गुरु जी का कराया ध्यान बहुत प्रभावशाली था। हृदय क्षेत्र में ध्यान करने पर कैसी शून्यता का अनुभव होता है। शिव सूत्रों में भी ध्यान के कितने तरीक़े मिल जाते हैं। आजकल लाओत्से तथा बुद्ध पर लिखी एक पुस्तक भी पढ़ रही है। जीवन एक अनुभव का नाम है, और उनकी ज़िम्मेदारी है कि इस अनुभव  को लाजवाब बनाएँ। दीपक चोपड़ा की बातें जैसे दिमाग़ की खिड़की खोल देती हैं। आत्मा में ही सारा विश्व स्थित है। शरीर आत्मा की चेतन शक्ति से स्वस्थ रह सकता है। 


Sunday, October 16, 2016

बाबा रामदेव का आगमन



आज कई दिनों बाद लिख रही है. पिछले पांच दिन फिर डायरी नहीं खोली, आज पिताजी वापस चले गये. उनके बारे में कितनी बातें उन्हें ज्ञात हुईं. देश के विभाजन के समय उनकी उम्र मात्र पन्द्रह-सोलह साल की थी, हाई स्कूल में ही थे. पाकिस्तान से आकर वे लोग फाजिल्का में रहे. गुजारे के लिए पहले मूंगफली बेचीं, एक डाक्टर के पास कम्पाउडर का काम किया, फिर उन्हें तहसील में एक नौकरी मिली. उसके बाद ही डाकविभाग में काम मिला, साथ-साथ पढ़ाई भी करते रहे. कई बार प्रमोशन हुआ और उच्च पद से रिटायर हुए. उनका स्वभाव शांत है, सीखने की ललक अभी तक है. आत्मा की खोज है, आत्मनिर्भर हैं, मोह से परे हैं, संगीत का शौक है और भी न जाने कितने गुण हैं, उनके लिए वह एक कविता लिखेगी !  मौसम अच्छा है, धूप खिली है. कल बाबा रामदेव आये थे डीपीएस स्कूल के मैदान में उनका कार्यक्रम हुआ. वे गये थे. जोश से भरा उनका भाषण हजारों लोगों ने सुना. इस समय पिताजी बाहर बैठे हैं, माँ कमरे में हैं, दोनों चुपचाप हैं. वृद्धावस्था में कैसी शांति छा जाती है, सारी दौड़-धूप समाप्त हो जाती है, जीवन ठहर जाता है. उसका जीवन भी अपेक्षाकृत शांत हो गया है. ध्यान के बाद की शांति तो अनुपम है ही !

आत्मभाव में स्थित रहना, जितना सहज साधना करते समय होता है, उतना ही सहज मनोभाव में रहना, साधना न करने पर होता है. मन में उठती किसी वृत्ति के साथ जब वे एकाकार हो जाते हैं, साक्षी भाव में नहीं रह पाते. इसी को संसार कहते हैं. व्यर्थ ही ऊर्जा का व्यय होता है और आत्मा के पद से गिरकर वे नीचे फेंक दिए जाते हैं. असजग होकर जीने का, अहंकार में जीने का और द्वेष भाव में जीने का यही परिणाम होता है, आसक्ति का यही परिणाम है ! साधना आजीवन चलती रहने वाली प्रक्रिया है. कितने ही अनुभव हो जाएँ, निश्चिन्त नहीं हुआ जा सकता, मन के स्तर पर आना ही होता है. पुराने संस्कारों को यदि आलम्बन मिल जाये तो वे पुनः अपना सर उठा लेते हैं. भीतर अभिमान भी सूक्ष्म रूप से विद्यमान है ही. देहाभिमान भी है क्योंकि देह यदि सुंदर है तो मन भी प्रसन्न होता है और मन शांत हो तो देह पर उसकी झलक भी दिखाई पड़ जाती है. पिछले दिनों मन में जो उहापोह चल रही थी, उसका असर शरीर पर स्पष्ट दीख रहा है. सद्गुरू से इस बारे में कुछ पूछने जायें तो कहेंगे, जितना हो सके सहज रहो. वही तो नहीं होता, एकांत में जो सहजता स्वाभाविक रहती है, वही लोगों के सामने कुछ खो जाती है. जो भी है जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार लेने से सहजता को बचाया जा सकता है ! साक्षी भाव में रहकर अनुकूल व परिस्थितियों को देखते रहना ही उनके वश में है.

आज भी मौसम खुशगवार है, धूप खिली है. कल वे नन्हे के एक मित्र के भाई की शादी के रिसेप्शन में गये. नन्हे का फोन आया था, वह मोटरबाइक से कोजीकोट जाना चाहता है. उसे रोमांच पसंद है. शिवरात्रि आने वाली है. उसने पढ़ा, इस ब्रह्मांड का आकार एक उलटे अंड जैसा है, जिसका तला खुला है. लेकिन वह अनंत है. ब्रहमा व विष्णु भी जिसका पार नहीं पा सके. समपर्ण ही एक मात्र उपाय है जिससे कोई उनको जान सकता है, क्योंकि कुछ नहीं होते ही कोई सब कुछ हो जाता है ! खालीपन तो आकाश के खालीपन सा ही है और खालीपन मायापति है, सबकुछ शून्य से आया है और शून्य में ही समा जायेगा !


Sunday, April 24, 2016

नीलवर्णी शिव


सोलह दिनों की यात्रा के बाद परसों वे वापस लौट आये हैं. सुबह के दस बजे हैं, बच्चे पढ़ने आये हैं. मौसम सुहावना है, धूप खिली है, बगीचा साफ-सुथरा मिला. वापस आकर सभी परिवार जनों से बात भी हो गयी है. सभी परिपक्व हो रहे हैं उम्र के साथ-साथ, पर बड़ी भाभी अभी भी मन के जाल में कैद हैं, यहाँ उसकी एक सखी का भी वही हाल है. बड़ी बहन ने स्वयं को देह से अलग महसूस करना तो वर्षों पहले ही शुरू कर दिया था अब वह देह को बंधन मानने लगी हैं. देह से मुक्त होकर वह परमधाम में जाकर शांति का अनुभव करना चाहती हैं. देह की अपनी सीमाएं हैं पर देह के बिना आत्मा कुछ जान भी तो नहीं सकती. यदि आत्मा आनन्द है तो इस बात का ज्ञान उसे देह धारण करके ही होता है. ध्यान के द्वारा देह रहते भी यह सम्भव है. विदेह जनक को ऐसा ही अनुभव होता होगा. उसे हिंदी के लेख-कविताएँ एकत्र करने हैं, फोन किये हैं सम्भवतः इतवार तक कुछ बात बनेगी. सद्गुरु का एक सुंदर प्रवचन छोटी ननद से लायी है, बाबाजी का भी, ओशो के दो संगीतमय ध्यान के कैसेट भी. जून ने आज सुबह व्यायाम/ साधना आदि के बाद कहा, आज उन्हें कई हफ्तों के बाद अच्छा अनुभव हुआ. शाम को वे एक वृद्धा परिचिता को जन्मदिन की बधाई देने जायेंगे.

आज सुबह नींद देर से खुली, इतनी गहरी नींद थी कि अलार्म भी सुनाई नहीं दिया, दोनों में से किसी को भी नहीं. अभी तक यात्रा की थकान उतरी नहीं है. सुबह अभी पौने सात ही बजे थे, एक दक्षिण भारतीय सखी का फोन आया, उसकी माँ जो पिछले एक वर्ष से पुत्र के साथ विदेश में रह रही थी, देह सिधार गयी. भाई उनकी देह को भारत लाने का प्रयास कर रहा है. कल शाम को प्रेस गयी थी प्रूफ रीडिंग करने. ‘ध्यान’ पर लिखा लेख उसने तीसरी बार छपने को दिया है क्योंकि यह विषय है ही इतना महत्वपूर्ण !


आज सुबह अचानक वर्षा होने लगी है. बादल रात में एकत्र हुए होंगे. उस वक्त वे निद्रा में मग्न थे. कल रात कैसे अनोखे स्वप्न देखे. भगवान शंकर को देखा, नीला रंग, तन पर वही सब आभूषण जो चित्रों में दिखाई देते हैं. जादू, तिलिस्म तथा कंकाल को झपटते देखा. अजीब सा स्वप्न था पर उस वक्त कितना सहज लग रहा था. कल रात एओल का कार्यक्रम देखा था. गुरूजी को बहुत दिनों बाद देखा व सुना, फिर ‘कृष्णा’ देखा इसी का असर रहा होगा जो मन रहस्यों की दुनिया खो गया. यह जगत एक रहस्य ही तो है ! कल छोटी बहन से बात की, वह एक और मकान खरीद रही है, यानि तीसरा मकान और अपने काम से, जीवन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है. सच ही है लोग जीवन से कभी भी पूर्ण संतुष्ट कहाँ हो पाते हैं, वे जीवन का अर्थ समझे बिना ही जीवन जिए चले जाते हैं. ग्यारह बजने को हैं, जून कुछ देर में आने वाले होंगे उन्हें बाजार भी जाना था पर इस भीगे मौसम में शायद सम्भव नहीं हो सकेगा. उसका देवदिवाली पर लेख पूरा होने को है !

Tuesday, December 15, 2015

गणेश और शिव


आज उसे याद आ रहा है कि पहली बार जब सद्गुरू को देखा था तो देखते ही वह स्तब्ध हो गयी थी, उनके वर्तन ने, उनकी वाणी ने मन हर लिया, जिसके सामने हृदय झुक जाये वह सद्गुरु ही मंजिल तक ले जाता है. जो बुद्धि दूसरों में दोष देखती है वह नीचे गिराने वाली है, ज्ञान कभी भी नकारात्मक नहीं दिखाता, सदा सकारात्मक ही दिखाता है. उसके भीतर न जाने कितनी कमिया हैं, उन्हें यदि बुद्धि न देख सके तो वह बुद्धि पक्षपाती है, बुद्धि में राग-द्वेष हो, लोभ तथा ईर्ष्या हो तो ऐसी बुद्धि परदोष दिखाने लगती है. सद्गुरू कहते हैं आत्मा में रहकर ही कोई सारे दुखों से दूर हो सकता है. सतत् होश रखने की जरूरत है, उस समय तक रखने की जरूरत है जब तक जरा सा भी घास-पात भीतर न रह जाये, जब जरा सा भी घास-पात भीतर न रहे तो होश स्वभाव बन जाता है. यह होश मुक्त अवस्था में ला देता है. यही जीवन मुक्ति है.

इच्छा गति है, यह भविष्य में है, जब कोई इच्छा न रहे तभी कोई वर्तमान में आता है, स्मृति ही भूत है, समय केवल वर्तमान में है, वे कल्पना और स्मृति में रहकर वर्तमान को खोते रहते हैं, अपने आप को खो देते हैं. वर्तमान में आते ही वे साक्षी बन जाते हैं, शक्ति बच जाती है, और वे ऊपर की यात्रा कर सकते हैं, पानी नीचे बहता है और भाप ऊपर उठती है, भीतर भी जब ऊर्जा एकत्र हो जाती है, तो वह ऊपर की और जाने लगती है.

आज उसने सुना काल, स्वभाव, पुरुषार्थ, प्रारब्ध, नियति यह पांच संजोग मिलते हैं तब कोई कर्म होता है, और वे स्वयं को कर्ता मानकर सुखी-दुखी होते रहते हैं. कर्ता भाव से मुक्त होते ही चिंता का कोई कारण नहीं रहता. जीत भी यदि उसकी नहीं है तो अहंकार का कोई कारण नहीं बचता और हार भी यदि उसकी नहीं है तो दुःख भी नहीं, ईर्ष्या भी नहीं. उन्हें पकड़े रहने में दुखों को प्रयोजन भी क्या है, वे इतने मूल्यवान तो नहीं कि दुःख उनकी ओर आएं. यह जगत की व्यवस्था उनके लिए तो नहीं चल रही है, जो एक झूठे केंद्र को मानकर चलता है वह भीतर के सच्चे केंद्र को पाने से वंचित रह जाता है. अहंकार दूसरों के मत पत आधारित है. दूसरे का ध्यान मिले यही अहंकार का भोजन  है. यही अहंकार तो छोड़ना है.

ठीक ही कहते हैं एक माँ कई बच्चों को अकेले पाल सकती है पर कई बच्चे मिलकर एक माँ को सहारा नहीं दे सकते. जिस घर में माँ सुख से न रह पाती हो, उसे न रखा जाता हो, वह शांति का सागर कैसे बन सकता है. उसके अंतर में सासुमाँ के प्रति सम्मान है पर वाणी कठोर हो जाती है कभी-कभी, जो अवश्य उन्हें चुभती होगी. कल जून ने पिता से उनकी बात करके दोनों का दिल दुखाया. उन्हें क्या अधिकार है बड़ों का असम्मान करें. यही सोचना चाहिए कि भाग्यशाली हैं कि दोनों का हाथ सिर पर है.

आज सत्संग है, उसे सत्संग, ध्यान, साधना, स्वाध्याय के मर्म को जानना होगा. चिन्तन शक्ति व्यर्थ न हो, शक्ति का संचयन हो और फिर उस का सदुपयोग भी. बोलें तो ऐसा कि दूसरों को अप्रिय न लगे. सजगता के साथ-साथ सहजता भी आवश्यक है. जून आज गोहाटी गये हैं, परसों शाम को आयेंगे. आजकल वह अपने कम में बहुत रूचि ले रहे हैं. प्रसन्न रहते हैं तथा उत्साह से भरे. योग का चमत्कार है. उसकी साधना भी ठीक चल रही है, समय को व्यर्थ न गंवाए, यही महत्वपूर्ण है.  

अज सद्गुरू ने ‘गणेश पूजा’ का महत्व बतलाया. गणेश का जन्म पार्वती के शरीर की मैल से हुआ और शंकर जब लौटे तो उन्हें पहचान नहीं सके. पार्वती का अर्थ है जो पर्व, उत्सव अथवा जीवन के रंगमय रूप से उत्पन्न हुई है, एक अर्थ यह भी है जो पर्वत से उत्पन्न हुई है. उसमें जो भी मल, विक्षेप, आवरण है उसके द्वारा ही एक आकृति का निर्माण हुआ जो शिव तत्व, आत्मा को नहीं पहचान पाया. शिव ने उसे नष्ट करके हाथी का सिर अर्थात ज्ञान को आरोपित कर दिया. आत्मा के आने पर सारा मल दूर हो जाता है, ज्ञान उदार होता है इसलिए गणेश लम्बोदर हैं, उनके कान आँखों तक आ जाते हैं अर्थात वह देखी हुई और सुनी हुई बातों का मिलान करते हैं. उनकी सवारी चूहा है अर्थत एक छोटे से उपाय से महान आत्मा का ज्ञान गुरूजन करा देते हैं. एक छोटा सा मन्त्र साधक को भीतर के अनंत साम्राज्य से मिला देता है. उनके हाथ में पाश है अर्थात अंकुश आवश्यक है तथा पेट पर सर्प लिपटा है जो कहता है सदा सजग होकर रहो, उनके हाथ में मोदक है जो मस्ती का संदेश देता है, मस्ती भी सजगता भरी, ऐसे गणेश की उपासना उन्हें करनी है !


Sunday, October 25, 2015

शिव के सर्प


 चिंता करना घोर अज्ञान है तथा घोर अहंकार की निशानी है, आज यह वचन सुन कर उसे लगा तब तो जो भी परिस्थिति जीवन में आती है उसे स्वीकार करना ही ज्ञान है. भूत में जो घट गया है वह बदलने वाला नहीं, भविष्य अभी अज्ञात है, कोई इस ज्ञान में प्रतिपल रहे तो मुक्त ही है. आत्मज्ञान के बाद चिंता हमेशा के लिए दूर हो जाती है, भीतर इतना आनंद रहता है कि भीतर ही सारे समाधान मिलने लगते हैं. साधक को तो बस पुरुषार्थ करते हुए अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करना है, व्यर्थ के विवादों से स्वयं को बचाना है. हरेक की मांग है सच्चा सुख, तृष्णा है झूठे सुख की लालसा.. तृष्णा जब तक नहीं मिटती तब तक विकार खत्म नहीं होते, ब्रह्म का सुख तब तक नहीं मिलता. जिस समय कोई अपनी भूलों को स्वीकार नहीं करता बल्कि भूल का बचाव करता है तो भूल और भी दृढ़ होती है. प्रकाश की उपस्थति में ही जैसे कोई जगत का कार्य करता है, प्रज्ञा के प्रकाश में ही सही-गलत का भास होता है. वस्तु के त्याग को त्याग नहीं कहते बल्कि वस्तु के प्रति मूर्छा, मोह के त्याग को ही त्याग कहते हैं, इच्छा का त्याग नहीं इच्छा के प्रति ज्वर के त्याग को ही त्याग कहते हैं. बाहर का त्याग अहंकारी बनाता है, अहंकार से जो भी कोई करता है वह दुगने जोर से वापस आता है. बाह्य क्रिया कर्म के उदय से होती है, क्रिया करके कोई लक्ष्य को नहीं पा सकता.   
आज शिवरात्रि है, सद्गुरु को बोलते हुए सुना. शिव ही आत्मा है, शिव का नंदी मानो देह है, शिव मन्दिर में प्रवेश करना हो तो पहले नंदी का दर्शन होता है, जिसका मुँह शिव की तरफ है पर मध्य में कछुआ है अर्थात इन्द्रियों को अंतर्मुख करके ही कोई आत्मा तक पहुंच सकता है. मन्दिर का द्वार छोटा है सो झुक कर जाना होगा. शिव तत्व पाँचों भूतों में ओत-प्रोत है, जो तीनों अवस्थाओं में व्याप्त है, पर तीनों से परे भी है. जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति का व साक्षी है, उसी तत्व में स्थित होकर सद्गुरु उपदेश करते हैं. वह हृदय से बोलते हैं, उसी में मस्त रहते हैं. सौम्य भाव में रहते हैं. सभी को उस तत्व को अपने भीतर पाना है. उसने प्रार्थना की, शिवरात्रि का पावन दिन सभी के लिए शुभ हो, भीतर का संगीत सभी को सुनाई दे, भीतर का प्रकश सभी को दिखाई दे. कल रात्रि स्वप्न में उसने बड़े-बड़े सर्प देखे पर वे जरा भी डरे नहीं. पानी में, पत्थरों पर, चट्टानों पर वे आराम से लेटे थे, एक की सिर्फ पूँछ दिख रही थी. उन्हें रास्ते में कई अन्य बाधाएं भी आयीं पर वे उन्हें पार करते आगे बढ़ते रहे, सर्प तो शिव भी धारण करते हैं, उसे लगता है यह उन्हीं की कृपा थी, सद्गुरु की कृपा का अनुभव कल सत्संग में हुआ था ! आजकल उसके भीतर का आनन्द जैसे कई गुणा बढ़ गया है, कई बार सहज ही नृत्य होने लगता है और कई बार हास्य फूट पड़ता है, भीतर कुछ घट रहा है, जीवन एक उत्सव बन गया है. जीना अर्थात अंतहीन ख़ुशी..भीतर की ख़ुशी. इसका बाहर की स्थिति से कुछ भी लेना-देना नहीं है, इसका स्रोत भीतर है, छिपा हुआ जो अब प्रकट हो रहा है !

स्वप्नों की कड़ी में जब कोई स्वप्न नींद खोल दे, जाग्रत कर दे, वह नींद का अंतिम स्वप्न होता है, इसी प्रकार साधना जन्मों-जन्मों के स्वप्न का अंतिम स्वप्न है. जिसने साधना के पथ पर भी कदम नहीं बढ़ाया उसकी नींद अभी बहुत गहरी है. सद्गुरु जीवन को कितना सुखमय बना देते हैं, उनसे मिलने के बाद दृष्टि ही बदल जाती है. भाव शुद्ध हो जाते हैं, भावनाएं बदलने लगती हैं, सूक्ष्म मोह भी हटने लगता है भीतर न जाने कितनी गाठें हैं पर उसे लगता है वह मुक्त हो रही है. पिछले कई महीनों से उसकी लोभ की ग्रन्थि टूटती जा रही है. उसका हर व्यय किसी और के लिए होता है. अपने लिए जब कुछ चाहिए भी नहीं तो व्यय हो भी कैसे ? भीतर कैसा आनंद रहता है, मन नृत्य करता है और अधरों से कैसी हँसी फूटती है. उसे सब कुछ अच्छा..बहुत अच्छा लगता है, सभी अपने लगते हैं, सभी निर्दोष दीखते हैं. यह कैसा बदलाव आ गया है भीतर. चेतना का कोई भार नहीं होता, वह चेतना है यह भाव जैसे-जैसे दृढ़ हो रहा है, हल्कापन लगता है !