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Thursday, May 24, 2018

देव दत्त पटनायक की माय गीता



ग्यारह बजे हैं सुबह के. जून नये घर में हैं. काम शुरू हो गया है. मिस्त्री, प्लम्बर, बढ़ई सभी आ गये हैं. अभी कुछ देर पहले बड़ी भतीजी के लिए एक कविता लिखी. बंगाली सखी के लिए भी लिखनी है, उसके विवाह की वर्षगांठ आने वाली है. अभी-अभी बड़ी ननद का फोन आया, नये घर की बधाई दी है. एक सखी ने अपनी भतीजी के विवाह का कार्ड भेजा है.

परसों उन्हें वापस जाना है. दो दिन में घर काफी साफ हो जायेगा. जून आज भी वहीं गये हैं. नन्हा व उसके मित्र दफ्तर चले गये हैं. नन्हा कल रात देर से आया, फिर भी देर से सोया और अब उठकर चला गया है. उसकी दिनचर्या में कोई तारतम्य नहीं है, पर उसका काम ही ऐसा है. मानव मन व तन की सहनशक्ति अपार है. उसे परमात्मा ही शक्ति से भरता है. हर कोई अपने कर्मों के अनुसार ही पाता है तथा जीवन निर्वाह करता है. वहाँ असम में योग कक्षा सुचारुरूप से चल रही है. अब भविष्य में कभी भी उसे कहीं जाना हुआ तो मन में यह खेद नहीं रहेग कि साधिकाओं को कोई परेशानी होगी. यहाँ जो शिवकुमारी नाम की मेड आती है उसे अपने निर्धारित काम के अलावा कुछ भी करने की इच्छा नहीं होती. इसी तरह लोग अपने को सीमित कर लेते हैं. असीम परमात्मा ही सीमित जीव बनकर देह में कैद हो गया है. मुक्तता का अनुभव इसी मानव देह में हो सकता है, पर मानव इतनी गहरी नींद सोया है कि उसे इस सत्य की कोई खबर ही नहीं लग पाती.

कल वे घर लौट आये हैं. इस समय दोपहर के तीन बजने वाले हैं. मौसम बादलों भरा है. कल रात भर वर्षा हुई. बगीचा फूलों से भर गया है. डहेलिया, सिल्विया, एन्थ्रेनियम, कैलेंडुला, और भी जाने कितने फूल..एक हफ्ते में काफी परिवर्तन आ गया है मौसम में, अब बसंत पूरे निखार पर है, कंचन के विशाल वृक्षों में भी गुलाबी और श्वेत फूल दिख रहे हैं. सुबह स्कूल गयी थी, बच्चों को योग की कुछ क्रियाएं करवायीं. छोटी बहन से स्काइप पर बात हुई. बड़े भाई को घर में पूजा करवानी है, समय कितनी तेजी से बीत जाता है. भाभी को गये दस महीने हो गये हैं. पिताजी से भी बात हुई, वे अकेले हैं, भाभी मायके गयी हैं, उनकी माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है. भाई कल शाम को घर आ रहा है. उसने इस बार देवदत्त पटनायक की पुस्तक, ‘माइ गीता’ खरीदी एअरपोर्ट से. जून ने कहा, फ्लिपकार्ट से यह पुस्तक आधे दाम में मिल रही है. पर फ्लाइट में पढ़ने का जो आनंद है, वह नहीं मिलता, फिर भी आगे से ध्यान रखना है. किताबें उसकी सबसे बड़ी मित्र हैं, ज्ञान की देवी सरस्वती इनमें ही तो बसती है !

Wednesday, June 28, 2017

या देवी सर्वभूतेषु


परसों रात्रि एक स्वपन देखा जिसमें एक छोटा बच्चा जो चाय की दुकान पर काम करता है, झिड़कियां खा रहा है, लगा किसी जन्म में वह ही तो नहीं थी यह, इसीलिए उसे ऐसे बच्चों की तरफ सहज प्रेम झलकता प्रतीत होता है अपने भीतर. एक दिन और एक स्वप्न में एक लडकी को स्वयं अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मारते देखा था. उन्होंने कितने जन्मों में न जाने कितनी गलतियाँ की हैं. हर गलती स्वयं को  कष्ट देना ही तो है. कल रात्रि का स्वप्न अद्भुत था, सुंदर रंग और आकृतियाँ तो दिखी हीं, एक श्वेत वसना देवी का आशीर्वाद भी मिला. देवी की आकृति हिली, उसका मुख खुला और हाथ से एक श्वेत ही दंड निकला, जिससे उससे निकलती ऊर्जा ने स्पर्श किया और भीतर कैसा तो अनुभव हुआ. कल वसंत पंचमी पर अपने घर को मिलाकर पांच स्थानों पर देवी सरस्वती के दर्शन किये. एक स्कूल में तो मूर्ति बहुत सुंदर थी और मृणाल ज्योति में मुस्कुराती हुई प्रतीत हुई, सम्भवतः इसी कारण वह स्वप्न देखा. दृष्टा ही दृश्य बन जाता है, इसका अनुभव अब दृढ़ होने लगा है. वे ही अपने सुख-दुःख के निर्माता हैं, यह ज्ञान मुक्त करने वाला है,. इसीलिए दृष्टा भाव को इतना महत्व दिया गया है.

वह आत्मा है, यह देह उसका घर है, मन व बुद्धि उसके साधन हैं, यह बात अब कितनी स्पष्ट दिखने लगी है. ऊर्जा का अहसास हर क्षण बना रहता है. कल शाम जून को भी इसका परिचय कराने का प्रयास किया, पर कोई जब तक अपने भीतर से ही न चाहे, बाहर से कोई भी किसी को कुछ बता नहीं सकता. सद्गुरू ऐसा कर सकते हैं पर उन्हीं के लिए जो इसके इच्छुक हैं. हरेक ही अवश्य एक न एक दिन अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेगा. आज बादल हैं आकाश पर, सुबह जब वे टहलने गये वातावरण इतना सुखद था कि चालीस मिनट जैसे चार मिनटों में बीत गये. सुबह आकाश सात्विक होता है, धरती भी रात्रि विश्राम के बाद शांत होती है और जीव प्रसन्नता से भरे. स्नान करके जब तुलसी व सूर्य भगवान को जल चढ़ाने गयी तो बादल थे, आकाश को निहारते समय वृक्षों व टहनियों के पीछे ऊर्जा की श्वेत आकृतियाँ भी दीख पड़ीं, बादलों के मध्य भी प्रकाश की झलक थी.

सद्गुरू कहते हैं, मूलतः सब पूर्ण हैं, सभी को अपने उसी स्वभाव को पाना है. अंतर की पूर्णता के क्षेत्र में अनुभव किया हर विचार सत्य हो जाता है. पूर्णता ही नित्य सत्संग है, जो भी उन्हें प्राप्त करना है, वह पूर्णता के विकास से मिल जाता है. जब अभावों के भूत सताने लगें, जब विचार अधूरे हों तब उसी की शरण में जाना है जो पूर्ण है. परमात्मा हर जगह है, हर समय है, वही सब रूपों में प्रकट हो रहा है. वास्तविक संपदा वैराग्य और भक्ति है.


Friday, May 19, 2017

वर्षा और धूप


कल भांजी की शादी भी हो गयी. आज से उसका नया जीवन आरम्भ हो रहा है. कल रात एक अद्भुत स्वप्न देखा, वह ‘सत्यनारायण’ की कथा करने वाली है, पिताजी, माँ भी हैं, उन्हीं का घर है, कोई नया स्थान है, नया घर है. अभी ड्राइंग रूम में मेज पर प्रसाद का सामान ढककर रखा है, नीचे फर्श पर झाड़ू लगाकर वे चादर आदि बिछाते हैं, तभी लोग आने शुरू हो जाते हैं, वे सोफे पर ही बैठ जाते हैं और पहले ही प्रसाद खाना शुरू कर देते हैं. फिर स्वप्न आगे बढ़ता है तो लोग बैठ गये हैं, वह पढ़ना शुरू करती है. कथा की पुस्तक की जगह एक कॉपी है जिसमें कुछ श्लोक है, उनका अर्थ भी लिखा है, शरुआत एक कहानी से करना चाहती है पर लोग कहते हैं, नहीं , यह तो कथा नहीं है. वह आगे पढ़ती है, जो लिखा है वह अस्पष्ट सा है, कुछ बोलती है पर लोग संतुष्ट नहीं होते, तभी हाथ में एक सांप आ जाता है, लम्बा, चमकदार सांप, जिसका तन वह सहलाती है और उसके सिर पर हाथ फेरती है. वह डंक निकालता है, कोई पूछता है, यह काटता नहीं तो वह कहती है इसमें जहर नहीं है. तभी लोग उठने लगते हैं, हॉल लगभग खाली हो गया है, पर उसके भीतर न कोई लज्जा है, न ग्लानि, न पीड़ा, सहज आनन्द है भीतर, तभी अलार्म बजता है और नींद खुल जाती है. शिवशंकर ने गले में सर्प धारण किया है, वही सर्प उसके हाथों में कैसा पालतू बना हुआ था. यह स्वप्न इशारा करता है उसी विकार की ओर जिससे वह मुक्त होना चाहती है. परमात्मा हर क्षण उसके साथ है. कल छोटे भाई ने जिस आनंद की बात कही उसी में आज मन डूबता-उतराता है, किसी अदृश्य की झलक पायी है शायद..वह कितना महान है, उस जैसे जीव पर भी उसकी कृपा बरसती है. जिसे कुछ भी नहीं पता. आज सुबह से वर्षा हो रही है. उसकी कृपा ही इन बून्दों  के रूप में बरस रही है. जीवन एक अनमोल उपहार प्रतीत होता है परमात्मा का, जिसका होना ही उसके होने का प्रमाण है ! वही तो है !

आज गुरूजी का जन्मदिन है, सुबह उठी तो वर्षा हो रही थी जिस कारण टीवी पर कोई प्रसारण नहीं आ पा रहा था. सीडी लगाकर अमृत वचन सुने. आज नैनी की बिटिया का भी जन्मदिन है और छोटी भांजी का भी. दोनों को शुभकामनायें दीं. वर्षा अब थम गयी है, हल्की धूप भी नजर आ रही है. अभी कुछ देर बाद अस्पताल जाना है, कल नर्सिंग डे था, टाफीस् रखी हैं पर्स में, सम्भव हुआ तो सिस्टर्स को देगी. घर से पिताजी का फोन आया, नन्हे से बात करना चाहते थे, बिजली का बिल जमा करने जा रहे थे. अपने को स्वस्थ रखने में वह सफल हुए हैं. छोटी ननद का फोन आया, बड़ी का स्वास्थ्य परसों बिगड़ गया था, वह बेटी के विवाह में बहुत थक गयी है. जहाँ वे ठहरे हैं, विवाहस्थल वहाँ से काफी दूर है. उसकी कल की रात भी स्वप्न लेकर आई, अस्तित्त्व उसे सचेत करने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहता और वह हमेशा चूक जाती है. कल रात जून जल्दी सो गये, आजकल वह पिताजी की देखभाल बहुत प्रेम से कर रहे हैं, उनके दिमाग में एक ही बात है. पिताजी का स्वास्थ्य पहले से बेहतर है, ऐसा उन्होंने बताया. जिजीविषा ही है जो मानव को बड़े रोगों से लड़ने में सहायता देती है, हो सकता है उनके भीतर की इच्छा शक्ति इस रोग से उन्हें मुक्त कर दे और वे एक बार नये घर भी जा सकें और यात्रा पर भी. ईश्वर की कृपा अनंत है..कल रात उसे दो बार अनुभव हुआ जैसे मुँह से श्वास छोड़ रही है, जैसे पिताजी अक्सर करते हैं. सभी ऐसा करते होंगे नींद में. वे खुद को सोते हुए कहाँ देख पाते हैं, वे दूसरों के निर्णायक बहुत जल्दी बन जाते हैं. उनके वश में कुछ भी तो नहीं है, परमात्मा की बनाई इस सृष्टि में सब कुछ अपने आप घटित हो रहा है. उन्हें उसकी स्मृति से कभी मुंह नहीं मोड़ना चाहिए. मन को शून्य में समाहित करना होगा, सत्य ही उनका एकमात्र आश्रय हो..उससे कभी च्युत न हों वे..

Friday, October 23, 2015

जादू की छड़ी


सद्गुरु कहते हैं, शरीर नौका है, जीव नाविक है, संसार एक सागर है. शरीर को ज्यादा सुख-सुविधा देना उसमें छेद करना है. जीवन यदि छेद युक्त हुआ तो दुःख आने ही वाले हैं, साधना छोटे-मोटे छिद्रों को दूर करती है. स्वाध्याय, सेवा, साधना, सत्संग – ये चारों अगर साधक के जीवन में हों तो सहनशीलता बढती है, समता आती है, सहजता, सरलता आने लगती है. इस जगत में सभी कर्मों के अधीन हैं, उन्हें जो भी मिलता है वह कर्मों के कारण है. कर्मों से छूटना ही साधक का लक्ष्य है. आत्मा में स्थित होकर किया गया कर्म बांधता नहीं. आत्मा पूर्ण है उसे कुछ करने को शेष नहीं है, वह जिस देह में है उसे रखने के लिए जो कुछ आवश्यक है वह तब अपने आप होने लगता है, जब आत्मा स्वयं को जान लेती है. जब तक देह है उससे कर्म भी होंगे, वे कर्म लोकहित में हों, सहज हों, मन, बुद्धि में कोई दोष नहीं आये, इतना ध्यान रखना है. अपने अगले जन्म की तैयारी भी साधक को इस जन्म में करनी है. प्रारब्ध कर्मों का फल अवश्य मिलता है पर क्योंकि साधक कर्त्ता भाव में नहीं रहता वह भोक्ता भी नहीं होता, कर्म उस पर बिना असर डाले समाप्त हो जाते हैं, बाहर चाहे जैसी परिस्थिति हो, भीतर आनन्द ही रहता है.

इस जगत में लोग कितने दुखी हैं. उस दिन छोटी बहन से फोन पर बात हुई, वह कुछ परेशान थी. इधर एक परिचित आंटी अपनी बहू से खुश नहीं हैं. कल जिनसे मिली वे अंकल-आंटी अपने रोगों से व बुढ़ापे से परेशान हैं. इस संसार में हर कोई किसी न किसी बात को लेकर चिंतित है. काश उसके पास कोई जादू की छड़ी होती तो सबके दुःख दूर कर देती, सबके लिए भीतर प्रेम उमड़ता है और ढेर सारी शुभकामनायें ! सभी के भीतर तो वही आत्मा है, सभी प्रभु के हैं, यह सारा जगत उसका रचा खेल है, इसमें कोई भी दोषी नहीं है, उसने जैसा रचा वैसा ही तो खेल चल रहा है. सद्गुरु के भीतर भी ऐसा ही हुआ होगा, इससे कई गुना ज्यादा प्रेम जो बचपन से ही उन्होंने ज्ञान, प्रेम व आनन्द बांटने का प्रण कर लिया था. वह छोटी बहन को पत्र लिख सकती है शेष सभी को अपनी बातों से कुछ दे सकती है. आज सुबह ध्यान नहीं कर पायी, कारण था मनोराज..न जाने कहा-कहाँ के विचार आ रहे थे. तमस बढ़ गया है. सद्गुरु कहते हैं ज्ञान से, ध्यान से या प्राणायाम से तमस दूर होता है. तमस शरीर में होता है, रजस मन में तथा सत आत्मा का गुण है. परमात्मा की कृपा उस पर है तभी तो साधना के लिए उत्तम संयोग अपने आप प्राप्त हो गये हैं. अब यही तो एकमात्र इच्छा रह गयी है कि ईश्वर के लिए ही उसकी हर श्वास हो, हर कार्य उसकी पूजा हो, हर कदम उसकी प्रदक्षिणा हो, वह उसके लिए ही गाए, उसके लिए ही सब कुछ करे. उसे कुछ भी नहीं चाहिए, वह तो पूर्ण है..पर उसे प्रेम तो अवश्य ही चाहिए और उसके सारे कृत्यों के पीछे तो वही है !

जब कोई अपनी भावनाओं को कोमल और मृदु बना लेता है तो वह सच्चे अर्थों में जीवन का आनन्द ले सकता है. हरेक के पास आत्मबल का अकूत खजाना है, आत्मा से सम्पन्न हुई बुद्धि है, और मन है जिसमें प्रभु का वास है. धैर्य रूपी रत्न और शौर्य रूपी गहने से सुसज्जित हृदय है तो यह जगत उनके व्यवहार से और सुंदर बन सकता है. जब अपने भीतर ‘उसका’ दर्शन किसी को होता है तो सबके भीतर भी वही दिखाई देता है, सारी सृष्टि उसी का रूप नजर आती है. उसकी दृष्टि में कोई भेद नहीं रहता, हानि-लाभ की बात तब रहती ही नहीं, सर्वोच्च लाभ तब वह पहले ही पा चुका होता है.  



Wednesday, July 8, 2015

प्रकृति के रंग-ढंग


उसके भीतर एक अजीब सी व्यथा ने जन्म लिया है, यह विरह की पीड़ा है या नहीं, नहीं जानती पर अब उसके सब्र का बाँध टूटता जा रहा है. सद्गुरु कहते हैं दुःख का कारण भीतर ही है पर यह दुःख बिलकुल अलग तरह का है, यह किसी कामना से नहीं उपजा है, यह एक कसक है जो अपने होने की, अपनी अस्मिता की वजह से उपजी है. कौन है वह ? यह जगत क्यों है ? यह गोरख धंधा क्या है ? यह जगत इतना निष्ठुर क्यों है ? अन्याय, अपराध, दुःख, पीड़ा, अत्याचार की बढ़ती हुई घटनाओं को देखकर कोई कब तक उदासीन रहने का भ्रम पाल सकता है ? कब तक कोई अपने भीतर से मिलने वाले आनंद को देखकर, पाकर जगत से आँखें मूंदे रह सकता है, कभी तो सत्य का उद्घाटन होना चाहिए, कभीं तो कोई यह राज खोले, यह संसार जो हर पल बदल रहा है, उसे देखने वाला कोई तो है वह जो अबदल है, कौन है वह ? क्या चाहता है ? क्यों है वह, प्रकृति इतनी सुंदर है कि मन मोह लेती है लेकिन वही प्रकृति कभी क्रूर भी हो जाती है माँ काली की तरह. उसके मन में उठने वाले इन सवालों का जवाब कौन देगा ? कहीं यह पीड़ा अहंकार जनित तो नहीं. दुःख का मूल कारण अहंकार है, पर किस बात का अहंकार. यहाँ तो कुछ है ही नहीं, अपना आप भी नहीं तो कैसा अहंकार और कौन करेगा अहंकार ? ये सारे प्रश्न कौन उठा रहा है ? क्या वही तो अहंकार नहीं कर रहा, प्रश्न कौन उठाता है, मन, बुद्धि या अहंकार ? इनसे परे जो आत्मा है वह कब मिलेगी ? जब ये तीनों शांत हो जायेंगे !

आज छोटी बहन का पत्र मिला, पिछले महीने जब दिल्ली से शारजाह जा रही थी तो वे उसे छोड़ने गये थे, तभी का लिखा पत्र आज मिला है. उसने पिछले कई महीनों से कोई पत्र नहीं लिखा, विरक्ति सी हो गई है. वे कुछ भी कर लें, कह लें, इस जगत कि जो रीत है वह उसी के अनुसार चलता जाता है. वे ही अपनी खुशफहमी का शिकार होते रहते हैं कि फलां को हम कुछ प्रभावित कर सकते हैं. यह जगत ऐसा ही है, न कोई राग रहे न द्वेष रहे, क्योंकि यह है तो उसी परमात्मा की रचना, जिसे वे प्रेम करने का दम भरते हैं, वास्तव में प्रेम करते हैं या नहीं यह भी वे नहीं जानते, लेकिन उसे नाता जोड़ने की आवश्यकता तो हर क्षण अनुभव करते ही हैं. वे अपने मन से दुखी हैं, क्योंकि मन संसार के पीछे भागता है, ठोकर खाता है, गिरता है फिर पछताता है पर अपनी आदत से बाज नहीं आता, यह कैसा विरोधाभास है. ईश्वर से उनका सहज संबंध है, जीव ईश्वर का अंश है, जीव सहित यह सारी सृष्टि उसी प्रभु की शक्ति से ही प्रकट हुई है फिर उन्हें उससे दूर कौन करता है, माया ही मन के रूप में आकर उनके बीच परदा बन कर छायी है, अब और सहन नहीं होता, इस माया को जाना होगा. भीतर की यह छटपटाहट अब सहन नहीं होती, भीतर की तलाश अब हर क्षण बढ़ती जा रही है, वह जो झलक दिखाकर ही रह जाता है उसे अब प्रकट होना ही होगा !

आज सुबह ध्यान में बार-बार कुछ अनुभव किया, जैसे ही कोई विचार आता था, एक झटका सा लगता था और वह पुनः सचेत हो जाती थी, सब कुछ कितना अद्भुत था. मन से परे प्रकाश का साम्राज्य है, प्रेम तथा शांति भी वहीं है. कल रात को भी वह मात्र अस्तित्त्व को अनुभव कर रही थी, बल्कि अनुभव ही शेष था, क्या था वह, कौन जानता है, शब्दों से परे का अनुभव शब्दों में कैसे कहा जायेगा. अब लगता है समाधान हो रहा है, मन को कोई आधार मिल गया है.



Friday, April 24, 2015

मोमबत्ती का प्रकाश


जीव चेतन स्वरूप हैं पर जड़ की ओर उनका झुकाव है. जब वे अपनी चेतना को परम चेतना की ओर लगाते हैं तो सारे कार्य कर्मयोग बन जाते हैं, अन्यथा कर्म भी जड़वत प्रतीत होंगे. इस क्षण उसका हृदय पूर्णतया संतुष्ट है, कुछ भी पाने की न तो आकांक्षा है और न ही कुछ खो जाने की चिंता है. उसे न किसी से भय है न ही किसी को उससे भय मिले ऐसी कामना है. सभी की मित्रता उसे मिले और इस सृष्टि के सभी स्थावर-जंगम प्राणी उसकी मित्रता पायें ! जहाँ कहीं भी शुभ हो उसकी दृष्टि उसे ही देखे, अन्यों के दोषों पर नजर न जाये. अगर जाये भी तो हृदय में कटुता का उदय न हो, उन्हें उनके सम्पूर्ण गुणों व दोषों सहित वह अपना ले. कभी भी ऐसा न हो कि अपने लक्ष्य से विचलित हो जाये ! इस समय शाम के छह बजने को हैं, नन्हा कोचिंग गया है. जून पिताजी को लेकर सुबह ही डिब्रूगढ़ गये थे, सात बजे तक आएंगे. मौसम बादलों भरा है. कल शाम को जो आंधी आई थी, उसके बाद से वर्षा लगातार ही हो रही है. कल बिजली चली गयी थी और रात्रि भोजन मोमबत्ती के प्रकाश में किया. अभी कुछ देर पूर्व ही बिजली आई है. बड़े भाई का फोन आया अभी कुछ देर पहले.

टीवी पर ‘जागरण’ आ रहा है, गुरूमाँ कह रही हैं, पानी जैसे तापमान के बदलने पर अपनी अवस्था बदलता रहता है वैसे ही मन बदलता रहता है. लेकिन इन सबको देखने वाला निर्विकार आत्मा है जो अचल है. उसे लगता है जब कोई अध्यात्म के मार्ग पर चल पड़ता है तो हानि-लाभ की चिंता से मुक्त हो जाता है. कर्म सहज होते हैं. कोई कामना पूर्ति उनका लक्ष्य नहीं होती. अंतर में समता जगती है. प्रेम की भावना का उदय होता है, प्रेम ही जीवन को रसमय करता है. आज वर्षा थमी है. कल शाम उसने लिखना शुरू किया था कि जून आ गये, डाक्टर ने कहा है आपरेशन करना पड़ेगा.

आज उसे लग रहा है, उनकी कथनी और करनी में कितना अंतर होता है. किसी निकट के सम्बन्धी ने उनसे मदद मांगी और उन्होंने खुले दिल से फौरन मदद करने की बजाय सोच-विचार शुरू किया. मन जो सदा संदेह करता है, कैसे-कैसे तर्क देने लगा. मन के लोभ का कोई अंत नहीं है. उसने जून को सही सलाह नहीं दी या उनकी स्वयं की भी यही इच्छा रही होगी और उसे समर्थन मिल गया. वे धर्म की सिर्फ ऊपरी सतह तक ही पहुंचे हैं, अभी मन विशाल नहीं हुआ है. गुरू से प्रेम करने वाले भी यदि मन छोटा रखें तो इसका अर्थ है कि प्रेम अभी हुआ ही नहीं, स्वार्थ से ऊपर अभी उठे ही नहीं, अविश्वास दिल से निकला ही नहीं, अविश्वास भी अपने ही जन के प्रति..अभी बहुत दूर जाना है ! स्वय को यदि कष्ट होता हो तो भी यदि कोई कुछ मांगता है तो मुँह से ‘ना’ न निकले, ईश्वर ऐसा हृदय उन्हें दे. ईश्वर की प्रसन्नता भी इसी में है कि उसके भक्त उसके मार्ग पर चलें. ईश्वर उन्हें हर क्षण कुछ न कुछ प्रदान करता है, अनवरत उसकी कृपा का प्रसाद उन्हें मिलता है ..तो वे क्यों कृपण बनें ! भक्त तो विश्वास की ज्योति की लौ के सहारे-सहारे अंदर-बाहर दोनों ही जगह उजाला पाता है.

आज सुबह ध्यान में एक अनोखी अनुभूति हुई, सही होगा यह कहना कि ईश्वर ने अपनी उपस्थिति का अहसास कराया ! मन कृतज्ञता से भर उठा था...और उस क्षण की स्मृति चित्त में अंकित हो गयी है. मौसम भी आज सुहावना है. विश्वास गहरा हो तो कोई निश्चिन्त होकर जीवन बिताता है, एक-एक क्षण का आनंद लेता है. भक्ति के कितने ही कीर्तिमान संतों व भक्तों ने बनाये हैं और कुछ हो सकने की सम्भावना उनके भीतर भी है. उसके लिए कुछ होने का अर्थ है..उसका होना ! ईश्वर की सुखद स्मृति में मन को सदा लगाये रखना..इन्द्रियों, मन व वाणी पर नियन्त्रण ही उसे इस पथ पर आगे ले जायेगा ! देह रूपी यंत्र को स्वस्थ रखना उनका कर्त्तव्य है जिससे आत्मा स्वयं को प्रकाशित कर सके. आत्मा को साधन रूपी मन तथा तन मिले हैं, जिन्हें सजग रहकर  स्वस्थ रखना है यह करने का मार्ग भी आत्मा ही सिखाता है.