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Tuesday, May 18, 2021

ओल्ड पाथ व्हाइट क्लाउड्स

नए वर्ष में पहली बार डायरी खोली है। मन में एक गहरी शांति है और कुछ भी लिखने जैसा नहीं लग रहा है। ‘कविता’ भी कई दिनों से नहीं लिखी। बुद्ध के बारे में दोपहर को पढ़ा, बहुत अच्छा लगा। ‘ओल्ड पाथ व्हाइट क्लाउड्स’ में गौतम बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं को कितनी खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है. इसमें बुद्धि के जीवन के अस्सी वर्षों को गांव के एक भैंस चराने वाले लड़के स्वस्ति, जो बाद में उनका शिष्य बन जाता है, के माध्यम से और आंशिक रूप से स्वयं बुद्ध के माध्यम से दर्शाया गया है. जीवन के कितने गहरे सत्यों का अनुभव बुद्ध ने किया था, बच्चे उनके प्रथम शिष्य थे। बच्चों को सत्य आसानी से अनुभव में आता है, क्योंकि उनके पास अहंकार की कोई बाधा नहीं होती, न ही वे हर बात को बुद्धि से तोलते हैं, वे सीधे आत्मा से ही अनुभव करते हैं। बुद्ध कहते हैं, जीवन में सभी कुछ परस्पर निर्भर है और नश्वर है; चीजें निरंतर बदल रही हैं। ध्यान की गहराई में जब तन, मन, भावना और विचार सब कुछ स्पष्ट दिखाई देते हैं तब उनके द्वारा प्रभावित होने का डर नहीं रहता। सत्य कभी बदलता नहीं और जगत एक सा रहता नहीं। इस बात को जब भीतर अनुभव कर लिया जाता है तो जीवन सरल हो जाता है। प्रेममय हो जाता है और सारा विषाद खो जाता है। वर्तमान में टिकना ही जागरण है, वर्तमान के क्षण में ही जीवन से मुलाकात हो सकती है। जैसे ही मन अतीत या भविष्य में जाता है, सत्य से नाता टूट जाता है। अतीत जा चुका वह मिथ्या है, भविष्य अभी आया नहीं, केवल यही क्षण सत्य है, इसमें पूरे होश के साथ जीना ही साधक का कर्तव्य है। ऊर्जा का संरक्षण तब ही संभव है।  


सम्यक वाणी साधक के लिए अति आवश्यक है, उतनी ही जितना सम्यक कर्म, सम्यक विचार और सम्यक ध्यान। भोजन भी साधक को समुचित मात्रा में लेना चाहिए, ऐसा भोजन जो सुपाच्य हो और हल्का हो। आज सुबह का ध्यान अत्यंत प्रभावशाली था, चीजें कितनी स्पष्ट दिखाई दे रही थीं। समझ जैसे  भीतर से स्वत: ही बह रही थी। मानव के भीतर कितनी समझ है और कितनी शांति, एक स्थिरता भरा अनंत आकाश है भीतर ! इसमें टिके रहना ही तो ध्यान है। 


आज भी ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखा। कल से प्रारंभ करना है। आर्ट ऑफ लिविंग के एप में गुरुजी की लिखी कई किताबें हैं, वीडियो भी हैं, एक पूरा खजाना है। कल वे आश्रम जाएंगे। गुरुजी एक सप्ताह के लिए आश्रम में रहेंगे। वे स्वयं सेवक का कोर्स भी करने वाले हैं। आज भी दोपहर बाद बुद्ध की पुस्तक पढ़ी, कितनी अच्छी किताब है यह, उल्हास नगर की यात्रा के दौरान मासी के यहाँ यह किताब देखी थी, फिर यहाँ आकर मँगवाई। उसे उनका कृतज्ञ होना चाहिए। बुद्ध कहते हैं सभी कुछ आपस में जुड़ा है और नश्वर है। चीजें जैसी हैं वैसी ही उन्हें देखना आ जाए तो कहीं कोई तनाव, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, नकारात्मकता नहीं टिक सकती। स्वयं में टिककर ही वे आत्मा की शांति और आनंद का अनुभव कर सकते हैं। जो मुक्ति का वरण करता है उसे संसार का आकर्षण नहीं लुभाता। वह तट पर बैठे व्यक्ति की भांति लहरों का आना जाना देखता रहता है और स्वयं में तृप्त रहता है. 


आज गुरूजी को देखा, सुना. वर्षों पहले उन्हें टीवी में नियम से सुनती थी. कैसा सौभाग्य है कि उनके आश्रम में उनको सुनने का अवसर मिल रहा है. वह सरल शब्दों में सभी प्रश्नों के कितने सुंदर उत्तर देते हैं. सत्य में प्रतिष्ठित व्यक्ति कैसा होता है और सिद्ध कौन होता है, आत्म अनुभव कैसा होता है, ऐसे और इसी तरह के प्रश्नों के उत्तर कितनी सहजता से वह दे रहे थे. हिंदी व अंग्रेजी दोनों ही भाषाओँ पर उनकी गहरी पकड़ है और परमात्मा से अभिन्न हैं वह ! आज बुद्ध की किताब आगे पढ़ी, मैत्री और करुणा का कितना सुंदर वर्णन किया है और प्रेम का भी, हृदय कितनी गहरी विश्रांति का अनुभव कर रहा है. संसार के हर जीव के प्रति प्रेम का भाव मन में उदित हो रहा है, सभी तो अपने ही हैं, एक ही हैं, शाम को एक पुरानी सखी का फोन आया, कितना आश्चर्य है कि दोपहर को उसका स्मरण हो आया था और अंतर में प्रेम था. जून के प्रति भी भीतर कितना स्नेह प्रकटा था, उनका स्वभाव बहुत अच्छा है, शाम से उनका व्यवहार भी कितना प्रेमिल लग रहा है. गुरूजी की बात अक्षरशः सत्य सिद्ध हो रही है कि सभी एक ही चेतना से बने हैं ! कल विवाह की सालगिरह है , उससे भी पूर्व से वे एक-दूसरे से परिचित हैं, यानि साथ पुराना है.  


भगवान बुद्ध ने बच्चों को भी ध्यान सिखाया था. उनकी शिक्षा और समझ कितनी लाभप्रद है और कितनी गहरी. वे जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझाते हैं, जीवन की नश्वरता और जगत के मिथ्या होने को भी, जैसे गुरूजी कहते हैं, अब तक का उनका जीवन एक स्वप्न से ज्यादा क्या है ? इतने वर्ष बीत गए कुछ वर्ष और हैं, यह देह एक दिन नष्ट हो जाएगी, उनके पहले कितने लोग चले गए, अब उनकी कोई खबर नहीं, वे भी एक दिन हवा हो जायेंगे तो क्यों न इसी क्षण स्वयं के कुछ न होने को स्वीकार कर लें. जीवन एक खेल से ज्यादा क्या है, कृष्ण की लीला या राम की लीला ... आज वे आश्रम गए थे. एच आर विभाग आज भी बन्द था, परसों भी देर हो जाने से कोई नहीं मिला था. कल जून के एक पुराने मित्र परिवार सहित आये, अपने साथ सुंदर सफेद बेला और लाल गुलाब के फूलों की मालाएं लेकर आये थे, एक-दूसरे को पहनने को कहा, तस्वीरें भी खींचीं. शाम को नन्हा व सोनू आये, गुलदाउदी के फूलों का एक गुलदस्ता, खजूर व मिठाई लाये.  लेखन कार्य अभी शुरू नहीं हुआ है, जो पुस्तक पढ़ रही है, उसके खत्म होने पर ही लिखना हो पायेगा. 

 

Wednesday, December 27, 2017

अकबर महान


सुबह अलार्म सुना फिर बंद कर दिया. सवा चार बजे नींद खुली. कोई भीतर से कह रहा था, आलसी, प्रमादी..पर बहुत प्रेम था उसकी वाणी में. शीघ्रता से उठ गयी. वर्षा हो रही थी सो बरामदे में ही प्रातः भ्रमण हुआ. आज दोपहर के भोजन में घर की सब्जी बाड़ी में उगा कुम्हड़ा बनाया, कोमल और स्वादिष्ट था. सुबह एक परिचिता से बात हुई, उसे कटहल पसंद है. माली से तोड़ने के लिए कहा, उसने कई सारे तोड़ दिए हैं. प्रकृति कितनी उदार है, वह भरपूर देती है. वह भी कटहल के कटलेट बना रही है आज शाम. नन्हे से पूछा, अगले महीने उसके जन्मदिन पर क्या वे उसके लिए लड्डू बनाकर भेजें, पर उसने मना कर दिया, वह आजकल हल्का भोजन कर रहा है, ज्यादातर सूप और सलाद.

सुबह बहुत जल्दी नींद खुल गयी. मन में कोई स्वप्न  चल रहा था पर देखने वाला भी जागृत था. वर्षा लगातार हो रही है. लॉन में पानी भर गया है. आज नये कम्प्यूटर पर लिखा, लेखन का काम ज्यादा आनंददायक हो गया है. यह भी तो परमात्मा की कृपा है, बस एक ही शै है जो उसकी मर्जी से नहीं होती, उसके मन की अनवरत यात्रा..शायद वह भी उसकी ही मर्जी से होती है, क्योंकि होता है तो सब कुछ उसकी मर्जी से ही होता है. यहाँ कोई दूसरा है ही नहीं, एक ही तो सत्ता है ! जड़ के पीछे भी वही है. कल से अमेरिका यात्रा का वर्णन लिखना है. ह्यूस्टन की वह यात्रा जो बारह वर्ष पहले की थी उन्होंने.
साढ़े तीन बजे हैं दोपहर के, इस समय थमी है वर्षा. आकाश पर बादल अब भी बने हैं. आज सम्भवतः वे सांध्य भ्रमण के लिए जा पाएंगे. सुबह-सुबह परमात्मा के स्वरूप के बारे में चर्चा सुनी. मन में कुछ और उजाला हुआ, दिन दिन बढ़त आनंद..कितना सही कहा है भक्ति के बारे में. परमात्मा को कितना भी जान लो, कुछ न कुछ जानने को शेष रहता है, हरि अनंत हरि कथा अनंता..आज एक छोटी सी कविता लिखी..रात्रि को हुए अनुभव के आधार पर. छोटी बहन ने बताया वे लोग अगस्त में यहाँ आयेंगे उसके पूर्व बैंगलोर आश्रम में एडवांस कोर्स करेंगे और मैसूर में भी एक स्वास्थ्य शिविर में भाग लेंगे. बड़ी भांजी को एक संस्था ‘द यूनिवर्स’ से ईमेल आते हैं, अध्यात्म के अनुभव के लिए प्रेरित करने हेतु. उसने एक मेल का अर्थ पूछा है, बताते समय उसे लगा, भगवद गीता के किसी श्लोक का भावार्थ बता रही है. सत्य एक ही है, किसी भी कोण से उसकी व्याख्या करें एक तक ही पहुँचाती है. आज नन्हे की गोवा यात्रा के कुछ पुराने चित्र फेसबुक पर प्रकाशित किये, जब वह अपने कालेज से वहाँ गया था. जून ने बताया, लेह में इस वक्त काफी ठंड है, उन्हें ऊनी अंतर्वस्त्र खरीदने होंगे.

रात्रि के पौने आठ बजने को हैं. टीवी पर समाचार आ रहे हैं, यानि जून देख रहे हैं, अंततः वे दोनों धारावाहिक के चंगुल से बाहर निकल ही आये हैं. आज दिन भर मौसम सूखा रहा, बहुत दिनों बाद धूप निकली. अभी कुछ देर पूर्व बाहर टहल कर आये, रात की रानी की गमक से सारा बगीचा सुवासित हो रहा था. हरी घास पर नंगे पैरों चलने से ठंडक भर गयी भीतर तक. ‘भारत एक खोज’ में अकबर पर आधारित अंक देखा. अकबर महान के पुत्र सलीम, मुराद और दान्याल उसकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते. युग-युग में यही कहानी दोहराई जाती है. चार दिन पहले ही नैनी कुछ एडवांस ले गयी थी, आज फिर आई, पर उसने मना कर दिया. बाद में सोचा, शायद उसके पति को काम नहीं मिला होगा, वर्षा जो हो रही थी. वे भी परमात्मा से मांगते हैं और वह किसी न किसी को निमित्त बनाकर उनकी इच्छा पूर्ण करता है. 

Tuesday, October 3, 2017

एस्पर्गस का पौधा


नये वर्ष के चौथे माह का आरम्भ हो गया है. परसों क्लब की कमेटी मीटिंग है, उसके अगले दिन स्कूल का वार्षिकोत्सव है और उसके भी अगले दिन उन्हें चार दिन की छोटी सी यात्रा पर निकलना है. वापस लौटने पर मृणाल ज्योति भी जाएगी. आज तेज वर्षा के कारण प्रातः भ्रमण का कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा. सुबह स्कल में ही थी बड़ी ननद का फोन आया, उन्होंने बिटिया का रिश्ता पूरी तरह से तोड़ देने के लिए हामी भर दी है, वह बेहद दुखी थी. मंझली भाभी से बात हुई, बड़ी भाभी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, शायद आज पुनः अस्पताल चली गयी होंगी. ‘भारत एक खोज’ के एपिसोड में आज महाभारत दिखाया जा रहा है. फेसबुक पर एक कवयित्री ने उसे एक काव्य श्रृंखला को आगे बढ़ाने के लिए नामित किया है, पर किसी कारण उससे नहीं पाया, उन्हें कल लिखना होगा. जून के दफ्तर में एक अधिकारी ने अपने नाती होने की ख़ुशी में मिठाई बांटी. उसने सोचा वह भी फोन पर उन्हें बधाई देगी. माली की पत्नी अपने पुत्र के जन्म प्रमाण पत्र के लिए फार्म भरवाने आई थी, कितना सुंदर नाम रखा है पुत्र का, ओम ज्योति. जो पौधे वे शिलांग से लाये थे, उनके साथ एक अस्पर्गस का पौधा अपने आप ही आ गया था, चीड़ के पौधे नहीं बचे पर यह बच गया, लम्बा होता जा रहा है. माली से कहकर उसमें एक लकड़ी लगवा दी है. क्लब की उपसचिव ने व्हाट्स एप ग्रुप बना दिया है कमेटी सदस्याओं का, पहले ही दिन ढेर सारे संदेश आये.

आज सुबह चार बजे से कुछ पहले ही उठी. उठने से पूर्व ही कोई कह रहा था, उसका सारा जीवन एक झूठ है, फिर एक चाय का कप भी दिखा. सुबह से ही मन पूछ रहा है, जीवन में क्या-क्या है जो असत्य है. वह जून से कहती है कि वह जब बाहर जाते हैं, प्रसाधन सामग्री, चाय आदि सामान न लायें, पर स्वयं उनका इस्तेमाल करती है. यही असत्य सबसे पहले नजर आया. अब से उनका इस्तेमाल नहीं करेगी, ऐसा तय किया है. उसके संकल्पों में बल नहीं है, कहीं यह इशारा उसकी तरफ तो नहीं था. उसके अनुभव क्या संतों की वाणी का प्रभाव मात्र हैं ? मात्र कल्पना हैं ? भीतर कई सवाल हैं. हो सकता है स्वप्न यह कह रहा हो, आत्मा के सिवाय सभी कुछ असत्य है. एक गीत है न, झूठी दुनिया झूठी माया..झूठा सब संसार..

नहीं देखा जा सकता आकाश को जमीन पर रेंगते हुए
बंद कमरों में बैठकर ताजी हवा से वंचित ही रहेंगी श्वासें
परमात्मा हुए बिना परमात्मा से नहीं होती मुलाकात
जज्बातों को समझे बिना खुद के, नहीं समझेगा कोई दूसरों के जज्बात
जीवन चलता रहे यह आस कितनी व्यर्थ है
जीवन को गहराई से नापे तभी कोई अर्थ है
आसमानी रंग क्यों भाता है सभी को
याद दिलाता है अपनी विशालता की
क्षीरसागर के समान श्वेत मेघों की आकृतियाँ
कथाएं कह जाती हैं निजता की !

कल कुछ नहीं लिखा. आज स्कूल गयी, लौटने में बारह बज गये, शायद सवा बारह. ड्राइवर पूरे धैर्य के साथ साढ़े नौ बजे से वहीं खड़ा रहा. बच्चों ने सूर्य नमस्कार ठीक से सीख लिया है. ध्वनि मिश्रण के लिए किसी को बुलाया था, उसी कार्य में देर हुई.          


Tuesday, March 28, 2017

जल, जंगल और जमीन


टीवी पर हिरोशिमा में बापू की कथा का प्रसारण हो रहा है. हवा की तरह हल्का, फूल की तरह महकता हुआ और पानी की तरह बहता हुआ मन कथा सुनकर ही होता है, लेकिन कथा के पूर्व ही कोई वक्ता बोल रहे हैं, जो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे. बोलने का भी एक आकर्षण होता है. सत्य का रथ, प्रेम के पथ पर, करुणा के मनोरथ के साथ चलता रहे यही तो बापू चाहते हैं. जून अहमदाबाद में हैं, सुबह उनका फोन आया था. नन्हा इतवार को तमिलनाडु गया था, फुफेरी बहन व जीजाजी से मिलने. बाइक पर यात्रा करना उसे मेडिटेशन जैसा लगता है, पूरे होश में रहना पड़ता है, नितांत अकेले अपने साथ ! साढ़े दस बजे हैं, आज वे भोजन देर से करेंगे, वह एक घंटा कम्प्यूटर पर बैठकर आज की पोस्ट लिखेगी.

जी-टीवी पर दिल्ली के रामलीला मैदान से बाबा रामदेव का काला धन लाने के लिए दिया गया भाषण प्रसारित हो रहा है. देश में कितना तेल, कितना कोयला आदि प्राकृतिक संपदा के रूप में पड़ा है, जल, जंगल, जमीन की जो लूट मची है, उस पर बोल रहे हैं. काला धन कितना है, इसका तो पता नहीं, पर लाखों करोड़ों में है. जनता को सजग करना ही उनका उद्देश्य है.

अज जून का जन्मदिन है, उसका मन भी खिला है. कल दिन भर एक अजीब सा भाव छाया था. छोटी बहन की सासुमाँ ने देह त्याग दी. रामदेव जी का आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर था. कल दोपहर भर टीवी पर वही देखती रही. आज बहुत दिनों बाद एक परिचिता का फोन आया, उनके पुत्र का विवाह किसी कारण से टूट गया है, उस अनुभव से उबर रही थीं, अब मन कुछ ठहरा है. क्लब की प्रेसिडेंट के बारे में उनसे कुछ बातें पूछीं. उनके लिए कविता लिखनी है. वह एक अच्छी अध्यक्षा साबित हुई हैं. मिलनसार हैं, अच्छी लीडर हैं, मैनेजर हैं और सुलभ हैं. सब कोई उनसे बात कर सकते हैं. अहंकार नहीं है. सामाजिक कार्यों के प्रति उत्साह है, समाज सेवा का जज्बा है. दादी, नानी बन चुकी हैं. सास की अच्छी बहू हैं, अच्छी माँ हैं, स्वास्थ्य व सौन्दर्य के प्रति सजग हैं, इस उम्र में भी युवा दिखती हैं. ऊँचा कद है, वस्त्र शालीन हैं और एक गरिमा है उनमें. इतना सब तो काफी है उनके बारे में लिखने के लिए. आज मौसम सुहाना है, कल दिन भर बेहद गर्मी थी. कल बंगाली सखी की बिटिया को अचानक देखकर बहुत ख़ुशी हुई, वह पहले से ज्यादा मुखर हो गयी है और थोड़ी मोटी भी. नौकरी करने लगी है.

बाबा रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण जी को जमानत मिल गयी है. उनके आन्दोलन से पूर्व ही उन्हें फर्जी डिग्री व फर्जी पासपोर्ट के कारण जेल में रखा गया था. बाबा पूरी निर्भयता की साथ प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति को शासन की कमियों की तरफ आकर्षित कर रहे हैं. देश के हालात इस समय नाजुक बने हुए हैं. सारे विश्व में ही मंदी के कारण परेशानी है फिर भी युद्द्धों पर व्यर्थ पैसे खर्च किये जा रहे हैं. इन्सान अपने स्वार्थ के कारण दुःख पा रहा है.   

तुम मेरे साथ होते हो, कोई दूसरा नहीं होता ! बापू की कथा आ रही है राजस्थान के नाथद्वारा से. विरह ही प्रेम है. किसी के जाने के बाद जो सन्नाटा हो जाता है, उसमें कितनी पीड़ा है, जो इस सन्नाटे को सहता है, वही प्रेम को अनुभव कर ही सकता है. एक शून्य प्रकट होता है जीवन में तभी प्रेम प्रकटता है. उनका कोई क्रियाकलाप ऐसा न हो जो प्रेमास्पद के प्रतिकूल हो. 

Saturday, March 25, 2017

नीला आकाश सफेद बादल


कल दिन भर व्यस्तता बनी रही. सुबह वे बाजार गये, जून उसके लिए कोलकाता से एक साड़ी और एक कुर्ती लाये हैं, वह उसे सजे-धजे देखना चाहते हैं. उनका प्रेम उसके लिए अपरिमित है. वे लोग दिसम्बर में बंगलुरू जा रहे हैं, तब यह वस्त्र काम आयेंगे. सद्गुरू के लिए भी वह इस बार एक सुंदर भेंट लेकर जाएगी, कोई बहुत ही सुंदर वस्त्र ! आज पिताजी का अख़बार नहीं आया है, टीवी भी नहीं चलाया है, बैठ-बैठे जाने क्या सोचते रहते हैं. उसका ध्यान पहले से बेहतर हुआ है. कल सुबह कितना विचित्र स्वप्न देखा था और कल रात को भी एक सुंदर मन्दिर देखा, विशाल मन्दिर है लेकिन मुख्य मूर्ति के नीचे लिखा है किसी अभिनेत्री का नाम लेकर कि वह फिर आ रही है. कल के स्वप्न में ऊंची छत पर रखा गोबर की खाद का एक ड्रम नीचे गिर जाता है और सड़क पर जाकर देखा तो वहाँ से गायब है, अर्थात कूड़ा-करकट दिमाग से विदा हो गया है, फिर जो शेष बचा उसका दर्शन हुआ. वह अपने घर के द्वार पर है, ध्यानस्थ, भीतर सारा आकाश और सुंदर बगीचा देख रही है. हरे-हरे पेड़ जो आकाश तक ऊंचे हैं. नीला व सफेद बादलों वाला आकाश है. वह उड़ सकती है, मन के सोचने मात्र से पल में जहाँ-तहाँ विचरण कर रही है, शायद ऐसे ही स्वर्ग का दर्शन ध्यान में ऋषियों ने किया होगा. स्वप्न ही तो था वह, टूट गया तो सब तिरोहित हो गया, लेकिन अपने आप में टिकने की कला तो स्वप्न नहीं है, वही तो सत्य है. मन भी तो चेतना में उठी लहर ही है पर पागल यह नहीं समझता कि क्रोध करेगा तो खुद पर ही करेगा, यहाँ कोई दूसरा है ही नहीं ! दूसरे को दूसरा समझना ही तो सबसे मूल हिंसा है.

सद्गुरू ने आज अष्टावक्र की कथा कही. ध्यान अच्छा रहा, अनंतता का अनुभव हुआ. अभी-अभी क्लब की एक सदस्या से बात की, जो पति के रिटायरमेंट के बाद जा रही हैं. उनका जन्म जोरहाट में हुआ, गणित, सांख्यिकी व अर्थशास्त्र में बीएससी की डिग्री ली. गोहाटी से एमएससी की सांख्यिकी में. एमबीए भी करना चाहा पर विवाह हो गया, फिर बेटी मुन्मा का जन्म हुआ, फिर बेटा भार्गव. टीचर का जॉब किया. बचपन से ही गणित में तेज हैं, पति को भी मदद करती हैं. नृत्य का भी शौक है. इन सब बातों को आधार बनाकर वह उनके लिए विदाई कविता लिखेगी, जो क्लब में पढ़ी जाएगी.

कल रात स्वप्न में दीदी व छोटी भांजी को देखा. कल क्लब में कविता सबको अच्छी लगी. एक महिला ने नृत्य किया व एक ने गायन भी. आज का दिन कुछ अलग लग रहा है, मन बेवजह अपने-आप में नहीं है. इसका अर्थ है, संस्कार सोये पड़े रहते हैं, मिटते नहीं हैं. अभी बहुत मार्ग तय करना है, भीतर नया संस्कार डालना है, जो घट रहा है उसका साक्षी मात्र रहना है. कोई भी विकार देह पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रहता है. जो कुछ भी शारीरिक कष्ट उसे हो रहा है वह इन्हीं विकारों के कारण है. मन को स्वच्छ करना होगा, अपने ही हाथों अपना नुकसान करना ठीक नहीं है. जीवन को विशाल दृष्टिकोण से देखना होगा, परिपक्वता लानी होगी. इन्सान वृद्ध होने को आये पर अपने संस्कारों से छुटकारा नहीं पाता. उसे इस सत्य को औरों के साथ भी घटता हुआ देखना होगा. सभी अपनी-अपनी सीमाओं में कैद हैं, उसी में दुःख है.

कीचड़ में कमल उगता है, आज यह कहावत अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई. ध्यान से पूर्व मन जैसे कीचड़ में सना था पर ध्यान के बाद फूल सा पावन हो गया है. परमात्मा उसके साथ हैं हर पल, यह भाव दृढ़तर हो गया है, न जाने किन अशुभ कर्मों का फल था वह सब जो अब बहुत पीछे छूट गया है. अब तो प्रकाश है, संगीत है और गीत हैं जो बाहर आने को बेचैन हैं. भीतर कितना सुंदर संसार है, अनंत प्रेम से भरा, वे बाहर ही ठोकरें खाते रहते हैं. जब-जब एकांत मिलता है, उसकी साधना बलवती होती है लेकिन व्यस्तता बढ़ने के बाद मन संसार में ही उलझ कर रह जाता है. इस बार ऐसा नहीं होने देगी. परमात्मा ने उसके जीवन की डोर अपने हाथों में थामी है, वह उसे कभी भी गिरने नहीं देंगे.




Sunday, November 6, 2016

आंधी-पानी और आंवले


नन्हा उठा और उससे पूछने लगा, क्या सुबह उसने उन्हें बहुत परेशान किया ? उसके जीवन में उनका क्या स्थान है, यह तो वही जानता है, पर उनके जीवन की वह आशा है, जब उसने बुद्धा की कहानी भेजी तब वे समझे थे कि वह भी सत्य की खोज में लगा है, सजगता इसके लिए पहली आवश्यकता है पर मादक द्रव्य तो चेतन मन को ही अचेत कर देता है, कुंद कर देता है, सोचने-समझने की शक्ति को ही नष्ट कर देता है. इस समय वह काम कर रहा है, अभी भोजन भी नहीं किया है, रात को जो फोटो खींचे उन्हें देखकर उसे लगता है, क्यों आतुर है आज की पीढ़ी इस जहर को अपने भीतर उतारने के लिए. बड़े शहरों का असर है, काम का तनाव है या पता नहीं क्या है. वे समझने में असमर्थ हैं, पर उनके पास एक सम्पत्ति है, विश्वास की सम्पत्ति, परमात्मा पर अखंड विश्वास. वह परमात्मा नन्हे के साथ भी है, वही उसे सन्मार्ग पर ले जाएगा !   

उस दिन जो स्वप्न देखा था वह आज की घटना की ओर इंगित कर रहा था. अब भी कितना स्पष्ट है, नन्हा दौड़ता हुआ आ रहा है, साथ ही एक भद्दा सा पशु बड़े आकार का, वह उसे कहती है बचो, बचो.. पर वे दोनों भिड़ जाते हैं, नन्हा भाग रहा है रेलिंग पर आ गया है, आगे कुआँ पीछे खाई वाली स्थिति है. नीचे पानी से भरा एक ड्रम है वह कूद जाता है. वह ऊपर से चिल्ला रही है, नन्हा, नन्हा..आखिरी आवाज तक जून भी आ जाते हैं, वे दोनों ऊपर से देखते हैं, नन्हा पानी में है. तभी नींद खुल जाती है. आज उसने कहा कि माता-पिता होने के नाते उन्होंने उसे कुछ नहीं बताया जीवन के बारे में. कैसे लोग अच्छे होते हैं, कैसे बुरे होते हैं. वह जिस संगति में है या कालेज में था..उसी का परिणाम है कि..बच्चों को माँ-पिता से शिकायतें होती ही हैं और आज के माहौल में, इस उम्र में यह सब करना भी स्वाभाविक है. आज वातावरण ही ऐसा दूषित हो गया है. लेकिन उन्हें उस पर भरोसा था, उसकी बुद्धिमता पर, उसके दिल पर, उसके विचारों पर, उसमें अवश्य ठेस लगी है, पर हर व्यक्ति अपना भाग्य अपने साथ लेकर आता है. गुण ही गुणों में बरत रहे हैं.

आज बैसाखी है. कल रात ही उसने ब्लॉग पर कल दोपहर लिखी छोटी सी कविता पोस्ट की थी. मौसम खुशगवार है, ठंडी हवा और गगन पर बादल..वह बाहर झूले पर बैठी है. रात को आंधी-पानी के कारण ढेरों आंवले जमीन पर गिर गये थे, जिन्हें पिताजी ने उठाकर इकट्ठा कर लिया है और अब अख़बार पढ़ रहे हैं. जून बाजार जाने के लिए तैयार हैं. नन्हा अपना काम कर रहा है, माँ अपनी कुर्सी रोज की तरह बैठी हैं. नैनी आज देर से आयी, अभी तक काम कर रही है. कल वह हायर सेकेंडरी स्कल गयी, मृणाल ज्योति के बच्चों ने वहाँ बीहू नृत्य प्रस्तुत किया. दो दिन बाद वे उनके यहाँ आयेंगे. नन्हे को उसने बताया कि उन सबके भीतर ऊर्जा का स्रोत है, जो कभी समाप्त नहीं होता जो..  


Wednesday, October 19, 2016

बीहू में हूसरी

आज जून अहमदाबाद जा रहे हैं. उसे सफाई के शेष कार्य पूरे करने हैं. आज सुना, काठवाडी़ गाँव में एक अद्भुत दुकान है, बिना दुकानदार की दुकान, ग्राहक अपने आप ही सामान लेते हैं तथा पैसे रखकर चले जाते हैं. सुबह जून से उसकी किसी बात पर बहस हो गयी, बाद में उसने सोचा तो लगा की अति उत्साह में आकर वह भला करने के बजे उल्टा ही काम कर बैठी. उसे अपनी वाणी के दोषों पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है. उसे लगता है जिस प्रकार वह स्वयं को शुद्ध, बुद्ध आत्मा मानती हैं, उसी प्रकार सभी पूर्ण शुद्ध तथा ज्ञानस्वरूप हैं, यह भी अकाट्य सत्य है तो जो भी विकार उसमें दीख रहे हैं, वे ऊपर-ऊपर ही हैं. जैसे गंगा जल की धारा में कभी कोई कचरा बहता चला जाये तो कभी फूल या दीपक..धरा तो शुद्ध ही रहती है. इस तरह तो किसी के दोष देखने ही नहीं चाहिए, आत्मा को ही देखना चाहिए, जैसे वह स्वयं को देखता है ! दूसरी बात कि यदि कोई स्वयं पूर्ण हो तभी उसे दूसरों को कुछ कहने का हक है. वह केवल गुरू ही हो सकता है. उसे अपने अंदर लाखों कमियां दीख पड़ती हैं तो फिर उसे कोई अधिकार ही नहीं है. उसने प्रार्थना की, कि जून अपने हृदय को उसके प्रति स्वच्छ करके सदा की तरह क्षमा कर दें. जैसे आज तक अनगिनत बार बिना कहे ही उसकी सभी गलतियों को माफ़ किया है. उसकी यात्रा शुभ हो.  


यदि कोई कार्य सेवा भाव से किया जाये तो ईश्वरीय सहायता अपने आप मिलने लगती है. जब लेडीज क्लब द्वारा मृणाल ज्योति जाने के लिए गाड़ी नहीं मिल पायी तो एक एक सखी ने भेज दी. बच्चे खुश हुए और वह क्लब की ओर से डोनेशन चेक भी दे पायी. बीहू के दिन घर में ‘हूसरी’ करने की बात भी कह पायी. कल कुछ अन्य लोगों से भी कहेगी. आज भी वर्षा हो रही है. हिन्दयुग्म पर उसकी कविता आई है. वर्षों पहले लिखी यह कविता उसके भीतर के बीज का प्रतीक है, जो अंततः सर्वोच्च मुक्ति के रूप में प्रकट होने को है. एक धार्मिक या कहे अध्यात्मिक व्यक्ति ही परिवर्तन कर सकता है. वह कोई आवरण नहीं चाहता, वह अंतिम सत्य को चाहता है, उससे कम कुछ नहीं. चाहना ही है तो उसे चाहो जो वास्तव में चाहने योग्य हो और मांगना भी हो तो उससे मांगो जो ख़ुशी से दे दे. तन पर लगे पहरों से ज्यादा कठिन है मन पर लगे पहरों को खोलना..और सच्ची क्रांति भी तभी घटती है जब मन के पहरे तोड़ दिए जाएँ और भीतर से एक ऐसी ज्वाला को प्रकट किया जाये जिसे दुनिया का कोई जल बुझा ही नहीं सकता..क्रांति फलित हुई है उसके भीतर ! भीतर जाने के उपाय और साधन बहुत हैं, समय भी है. भगवद् गीता पर लिखना शुरू किया है कल, आज उसे आगे बढ़ाना है ! जून से बात हुई आज वह दूसरी फील्ड में जायेंगे. 

Thursday, August 18, 2016

पौधों में चेतना


कल वह मृणाल ज्योति की प्रिंसिपल के साथ कम्पनी प्रमुख से मिलने गयी, कम्पनी स्कूल की कई तरह से सहायता करती है. उन्होंने इस संस्था को एक ट्रस्ट बनाने का सुझाव दिया. आज मौसम अच्छा है, धूप तेज नहीं है. कल जून टूर पर जा रहे हैं. हिन्दयुग्म को एक कविता भेजी. जीजाजी का जन्मदिन आ रहा है, उन्हें भी एक उनकी पसंद की कविता भेजे, ऐसा मन है. उसका मन कितनी दिशाओं में भाग रहा है पर उसको देखने वाली आत्मा स्थिर है, गुरूजी कहते हैं, आत्मारामी सदा रहने वाली मुस्कान को प्राप्त होता है, वह सत्य और सुन्दरता का उपासक होता है. वह चाहता है..जीवन एक उत्सव बने जिसमें सभी शामिल हों..  आज से माओवादियों ने अड़तालीस घंटों का बंद घोषित किया है.

जून का फोन आया है, उन्होंने नया कैमरा खरीदा है. नन्हे को लड्डू मिल गये, फोन पर उसने बताया. आज ब्लॉग पर ढेर सारी रचनाएँ पोस्ट कीं, कहानी, कविता, लेख सभी कुछ. आज नन्हे का जन्मदिन है. सुबह आठ बजे उसने फोन किया, उसे कविता भी मिली. इस बार ध्यान से पढ़ी ऐसा उसने कहा. आज माँ सुबह से कुछ अस्वस्थ हैं, उन्हें सम्भालना कठिन होता जा रहा है. वह अकेले रहने से घबराती हैं, काल्पनिक जीवों से उन्हें भय लगता है. सड़क पर चलते हुए लोग भी उन्हें ठीक नहीं लगते. दवा भी छिपा देती हैं, शायद दवाई खाते-खाते ऊब गयी हैं. नाश्ते के समय कहने लगीं, सब कुछ चार की संख्या में चाहिए, उनका मन उनके नियन्त्रण में नहीं है न ही उनकी वाणी, क्या यही है मानव जीवन के संघर्ष का अंत. पिताजी कभी-कभी झुंझला जाते हैं.

उसे गुरू पूर्णिमा के लिए कविता भी लिखनी है. अगले हफ्ते छोटी बहन अपनी दो बेटियों के साथ आ रही है. सोचकर मन में हर्ष का, उत्साह का भाव पनप रहा है. सभी के लिए वे आठ-नौ दिन मंगल मय हों, यही कामना है. पूरे घर में सफाई का काम भी शुरू किया है. थोड़ी देर बगीचे में काम किया, पौधे भी उसे पहचानने लगे होंगे, चेतना तो उनके भीतर भी वही है, सारी सृष्टि उस एक का पसारा है, यहाँ दो हैं ही नहीं और उस एक में वह भी है, कितना अनोखा है यह आत्मा का ज्ञान..क्या नैनी के पति में वह चेतना नहीं है, वह सुप्त है, घोर तमस में सोयी है उसकी चेतना, एक न एक दिन तो जागेगी..उसे उस दिन की प्रतीक्षा है. शांतला की कथा समाप्त होने को है. बहुत दिनों से उसे छोड़कर कुछ भी नहीं पढ़ा. आज जून आने वाले हैं.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                   


Wednesday, June 1, 2016

नई नवेली कार


जीवन में हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों या कहें अनंत पल खुशियों के आते हैं, बल्कि कहें कि जीवन सुख व आनन्द की एक अनवरत श्रृंखला है. अनगिनत जन्मों को जोड़कर देखें तो न जाने किस अतीत के काल से वे बने हुए हैं. परमात्मा की भांति वे भी अनादि हैं, उसकी भांति वे भी साक्षी हैं, कुछ न करते हुए भी सबका आनन्द लेने वाले, हर श्वास एक आनन्द की लहर की खबर देती है, जो स्वयं ही आनन्द हो उसे भी अपने आनन्द का स्वाद लेने के लिए देह में आना पड़ता है. परमात्मा को मायाविशिष्ट चेतना में आकर लीला का आनन्द लेना पड़ता है तो जीव को स्वप्नविशिष्ट चेतना में ! वे स्वप्न ही तो देख रहे हैं, एक लम्बा स्वप्न जिसमें उन्होंने एक नया रोल धरा है. शरीर, मन व बुद्धि का एक नया संयोग खड़ा किया है. स्वप्न से जागकर ही पता चलता है क उसमें प्रतीत होने वाले सुख-दुःख मिथ्या थे वैसे ही मृत्यु के क्षण में पता चलता है सब कुछ छूट रहा है, एक स्वप्न का अंत हो रहा है. उनका ध्यान यदि मृत्यु से पूर्व इस ओर चला जाये तो सदा के लिए मृत्यु का भय छूट जाये ! जीवन एक खेल ही लगने लगेगा तब !

आज सद्गुरु ने गणेश जन्म का एक नया अर्थ बताया. पर्व के दोष से उत्पन्न आनंद को ज्ञान के द्वारा पावन किया गया. पर्व पार्वती है, मैल दोष है, जिससे आनंद रूपी गणेश उत्पन्न हुआ है, हाथी का सिर ज्ञान है. गणेश को विघ्न हर्ता भी कहते हैं, हाथी के आगे कोई बाधा नहीं टिकती. गणेश का चूहा तर्क का प्रतीक है और बीज मन्त्र का भी. आज छोटे भाई का जन्मदिन है, वह नई कार ले रहा है, blushing red Iten, इत्तेफाक है कि बड़ी ननद भी काली कार ले रही है. आज भी वर्षा थमी नहीं है, पिछले कई हफ्तों से रोज ही बादल बरसते हैं.

सुंदर वचन सुने आज, ‘सत्य के सूर्य को अस्ताचल ले जाने के लिए संध्या रूपी माया आ जाती है ! कमल को जैसे तुषारापात समाप्त कर देता है वैसे ही सत्य को माया समाप्त कर देती है. ऐसी माया को दूर से ही त्याग देना चाहिए, यही जन्म-मृत्यु का कारण है’. अध्यात्म की साधना का मुख्य उद्देश्य संस्कारों से मुक्ति है. कल रात स्वप्न में एक विकार की ग्रन्थि को पूर्ण रूप से देखा तथा उससे मुक्ति का अनुभव भी किया. पिछले पचीस वर्षों मन न जाने कितनी बार स्वयं व्याकुल हुआ और अन्यों को भी किया. माया के चंगुल में फंसकर कषायों के मल में धंस कर न जाने कितना दुःख वे व्यर्थ ही उठाते रहते हैं. भीतर की ग्रंथियाँ कट रही हैं, मन पावन हो रहा है. परमात्मा को वे अपने भीतर प्रकट  होने से रोकते रहते हैं.अशुद्ध वृत्तियों का पर्दा उन्हें उससे दूर ही रखता है, जबकि वह सहज प्राप्य है.

अज दोपहर से बिजली नहीं है, मौसम अच्छा है सो पंखे के बिना भी ठीक लग रहा है. मृणाल ज्योति के लिए एक कविता लिखी है.शाम को प्रिंट करेगी  कल उन्हें वहाँ जाना है, सम्भव हुआ तो पढ़ भी सकती है. जून अभी तक आये नहीं हैं, उनका गला थोड़ा खराब है. कल वह नाहक ही क्रोधित हो रहे थे. मनुष्य अपने आप को नहीं जानता, इसलिए स्वयं को दुःख दिए जाता है. कृष्ण कहते हैं जो न आकांक्षा करता है न द्वेष करता है, वह मुक्त है.



Saturday, January 16, 2016

शिव सूत्र का अर्थ


आज सुबह गुरूजी को ‘शिवसूत्र’ पर बोलते सुना. इच्छा शक्ति कभी पूर्णता को प्राप्त नहीं होती और  इच्छा का अंत हुए बिना आनन्द की प्राप्ति नहीं होती, तो करना यह है कि इच्छा को नमस्कार करते हुए उसके पार चले जाया जाये. उससे युद्ध नहीं कर सकते. उसके बावजूद शिव तत्व को पाना है. सद्गुरु के बोल सुनकर लगता है जैसे वह उनके ही मन की बात बोल रहे हैं. जैन संत ने बताया नैतिकता का अर्थ है मानवीय एकता व संवेदनशीलता, सभी के साथ एकता का अनुभव होने से स्वतः ही उनके सुख-दुःख उन्हें प्रभावित करेंगे. उसका हृदय उन सभी की ओर जाता है जो अस्वस्थ हैं, दुखी हैं. वे यदि चाहें तो अपने को उबार सकते हैं, उन्हें कोई राह बताने वाला चाहिए. नैनी व पास के बच्चों को पढ़ाने में वह सफल नहीं हो पा रही है, वे उद्दंड होते जा रहे हैं. वे पल भर भी टिक कर नहीं बैठते, उनका दिमाग एक से दूसरी वस्तु पर बहुत तेजी से दौड़ता है. क्रोध दिखाना ही पड़ता है. उनकी माएँ भी ध्यान नहीं देती, उसे ही कोई उपाय सोचना होगा. जून ने फोटो फ्रेम में फोटो लगा दिए हैं, आश्रम के तथा अंकुर संस्कार केंद्र के बच्चों के. शाम को उनके यहाँ होने वाले सत्संग में दिखाएगी, बच्चे भी देखकर प्रसन्न होंगे. सभी प्रसन्न हों, यही तो उसका उद्देश्य है.

यह संसार एक दर्पण है, या कहें कि सांसारिक संबंध दर्पण हैं, जिनमें उन्हें अपना सच्चा स्वरूप दिखाई पड़ता है. जब वह लोगों से मिलती है तो अपनी सच्चाई को ज्यादा स्पष्टता से देख पाती है. उनके साथ व्यवहार करते समय मन कैसा स्वार्थी, लोभी और कभी-कभी ईर्ष्यालु भी बन जाता है, देह में नकारात्मक संवेदनाएं भी होती हैं, जबकि कुछ लोगों  के संपर्क में आने से ऐसा कुछ भी नहीं होता, तब भीतर का प्रेम प्रकट होता है. लेकिन पहले वर्ग के लोग उसके सच्चे हितैषी हैं, उनके द्वारा ही पता चलता है कि भीतर अभी कितना कचरा भरा है. कभी कभी वे अपनी सहजता व सरलता खो बैठते हैं और हर बार इसका कारण है उनका संकीर्ण मन, आत्मा में तब उनकी स्थिति नहीं होती. किसी ने गुरूजी से पूछा कि ऐसा क्यों होता है तो उन्होंने कहा खेल जानकर इसे दृश्य की तरह देखो, यह भी क्षण भंगुर है, पर यदि यही क्रम जीवन में बार-बार दोहराया जाता है तो चिंता की बात है, क्योंकि तब यह संस्कार बन जाता है और वे अनजाने ही ऐसा व्यवहार करने लगते हैं. संस्कार को तोड़ने के लिये सजगता सर्वोपरि है, जैसे ही भीतर कोई नकारात्मक भाव उठे, उसे वहीँ देखकर समाप्त कर देना होगा ताकि वह आगे अंकुरित ही न हो. कभी मन में अवांछित विचार भी आ जाये तो उससे छूटने का प्रयास विफल ही जाता है जब तक यह न मान लिया जाये मन एक धोखा ही तो है. वास्तव में भीतर ढूढने जाएँ तो मन कहीं है नहीं, ऐसा अनुभव होते ही शांति छा जाती है. तब लगता है सारी साधनाएं खेल है, वे हर वक्त वही हैं जो होना चाहते हैं, लेकिन उनका वह होना उनसे दूर इसलिए हो गया है क्योंकि उस अटूट शांति की धारा से विलग होकर वे स्वयं इस माया की दुनिया में विचरते हैं, भिन्न-भिन्न अनुभव प्राप्त करते हैं. एक स्वप्न से ज्यादा कहाँ है यह माया की रचाई दुनिया. मकर संक्रांति के बाद मौसम में हल्की गर्माहट आ गयी है. कल शाम को सत्संग ठीक तरह, एक घंटा भजन गाते-गाते कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता. संगीत आत्मा को स्पर्श करता है.

वर्षा के कारण मौसम ठंडा हो गया है, भीतर कमरे में भी ठंड का अनुभव हो रहा है. अभी-अभी ध्यान से उठी है. मन शांत है. अनहद की धुन निरंतर सुनाई पडती है आजकल, मधुर वंशी, कभी वीणा, कभी पंछियों का मधुर कलरव. मन विचार शून्य हो तभी सुनाई दे ऐसा भी नहीं, चौबीसों घंटे. गुरुमाँ कहती हैं वह ध्वनि भी सत्य नहीं है. जैसे बंद आँखों से दिखने वाला प्रकाश असत्य है और रात को देखे स्वप्न मिथ्या हैं. ये सब मन का ही चमत्कार हैं. मन आत्मा की शक्ति है लेकिन परमात्मा को जाना नहीं जा सकता क्योंकि वही तो जानने वाला है. इन दार्शनिक प्रश्नों में उलझना व्यर्थ ही है, क्योंकि निरा सिद्धांत किसी काम का नहीं, यदि वह प्रयोग में न आए. परमात्मा जीवन में झलके तभी उसकी सार्थकता है. परमात्मा अर्थात प्रेम, शांति, आनन्द और उत्साह..उनका जीवन उसकी साक्षी दे, वर्तन वैसा हो तभी कहा जायेगा कि उन्होंने धर्म को जाना है. भीतर जब निर्मलता होगी तभी धर्म का वास्तविक रूप वे जान पाएंगे.        

  

Thursday, October 8, 2015

राम का बोध


आज ‘योग वसिष्ठ’ को पढ़ना पूर्ण किया. इसके अनुसार आत्मा का अनुभव ज्ञान के द्वारा ही हो सकता है. ज्ञान जब तक परिपक्व नहीं होगा तब तक अन्य साधनों द्वारा किया गया अनुभव टिकेगा नहीं. यह सारा जगत ब्रह्म ही है अथवा तो आत्मसत्ता ही जगत का आभास देती है. आदि में इस जगत के होने का कारण नहीं था, केवल चिन्मय तत्व था, उसमें संवेदन हुआ और धीरे-धीरे यह जगत संकल्प रूप से प्रकट हुआ. संकल्प ही सत्य होकर प्रकट होते हैं यह सबका अनुभव है. यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है. जीव वास्तव में शुद्ध आत्मा है जड़ का संयोग होने से स्वयं को जड़ जगत की तरह मानने लगा. जब मन पूरी तरह से खाली हो जाता है तो आत्मा का अनुभव होता है. भीतर से आकाश की तरह निर्लिप्त रहते हुए इस जगत में सहज प्राप्त परिस्थितियों में अपना कार्य मात्र करना है, न कुछ पाना है, न देना है, न कहीं आना है न जाना है. आत्मा अपने आप में पूर्ण है, उसे यह जगत स्वयं से अलग नहीं लगता. अद्वैत ज्ञान का अद्भुत ग्रन्थ है ‘योग वसिष्ठ’. भगवान राम का मोह नष्ट हुआ और परमपद को प्राप्त हुए, राम उसे भी परमपद प्रदान करेंगे !

शुक्रवार की रात से उल्फा ने आतंक का जो दौर शुरू किया है, वह थमने में नहीं आ रहा है. मारने वाले भी घोर अज्ञानी हैं और दया के पात्र हैं. वे नहीं जानते कि कितना बड़ा पाप कर्म अपने लिए बाँध रहे हैं. जो मर गये वे अपने पीछे परिवार जनों को दुखी छोड़ गये. इस सृष्टि में हर क्षण कितना कुछ घटता रहता है. अन्याय भी, अत्याचार भी, जन्म भी, मरण भी. इन सबको देखने वाला परमात्मा सब जानता है वह मरने और मारने वाले दोनों के ह्रदयों में रहता है. माया के कारण ही जीव एक-दूसरे को मित्र-शत्रु मानते हैं, कर्म करते हैं तथा उनके फल भोगते हैं. यहाँ सभी कुछ व्यवस्थित है, प्रकृति में अन्याय नहीं होता. अन्याय होता हुआ लगता है पर वास्तव में सभी कुछ एक क्रम में हो रहा है. ईश्वर की निकटता का अनुभव जिसे होता हो वह सभी के भीतर ईश्वर को देखता है, वह दानव जो बच्चों को मारता है उसके भीतर भी और वह संत जो समाज को ऊपर उठाता है उसके भीतर भी एक ही सत्ता है. परमात्मा हर घड़ी उसके साथ है. नींद खुले उसके पूर्व हर सुबह आत्मा का चमत्कार उसे दीख पड़ता है, संध्या काल का चमत्कार !

आज सदगुरू ने मोक्ष तथा बोध के बारे में कहा. वे कठिन विषयों को कितना सरल बना देते हैं. मोक्ष तो हर कामना के बाद अनुभव में आता ही है तथा बोध आकाश की तरह हर जगह है. हर श्वास के साथ जैसे निश्वास है वैसे ही कर्म के पीछे उससे मुक्ति तो है ही, न हो तो जो सुख कर्म से मिल रहा है वह दुःख में बदल जायेगा. छोटे-छोटे कार्यों में जब मुक्ति का अनुभव कोई करता है तो एक दिन उस परम मुक्ति का भी अनुभव कर लेता है जिसे पाकर कुछ भी पाना शेष नहीं रहता. आत्मा ज्ञान स्वरूप है, वह चेतन सत्ता बोध स्वरूप है जो कण-कण में व्याप्त है. वही चेतन में है वही जड़ में है. जड़ व चेतन के संयोग से जीवन का वह रूप बनता है जो चारों ओर दिखाई देता है. जड़-चेतन के संयोग से तीसरा तत्व बनता है वही अहंकार है. वह यदि स्वयं को जड़ मानकर प्रकृति का अंश मानता है तो वह कर्त्ता तथा भोक्ता है तथा यदि वह स्वयं को चेतन स्वरूप मानता है तो निर्लिप्त रहता है. वह सदा मुक्त है. जड़ के साथ तादात्म्य होने से अहंकार में जड़ता आ जाती है तब क्रोध, मान, माया, लोभ, ईर्ष्या तथा मद आदि का असर होता है वैसे ही चेतन के साथ तादात्म्य करने से आनंद, शांति व प्रेम अपना स्वभाव हो जाते हैं तो भलाई इसी में है कि वे स्वयं को चेतन से जोड़ें.      



Monday, September 28, 2015

बापू की आत्मकथा


आज उसने सुना, जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न चेतना का विकास ही है, पदार्थ चेतना को प्रभावित करते हैं. शुद्ध हुई चेतना ही आत्मा के पथ पर ले जाती है. आत्मा मन, बुद्धि तथा संस्कार के माध्यम से जगत को ग्रहण करती है तथा इन्हीं के माध्यम से स्वयं का अनुभव करती है, यदि देह में रहते हुए आत्मा का अनुभव करना है तो इन्हें शुद्ध बनाना होगा. मन में शुभ संकल्प उठें तथा बुद्धि उन्हें साकार करने का निर्णय दे तभी शुभ संस्कार बनेंगे. वर्तमान में रहना, प्रतिक्रिया न करना, मैत्री भाव तथा मिताहार बुद्धि को शुद्ध करने के लिए आवश्यक हैं. उसका शरीर इस समय तप रहा है, बिना बुखार के. कुछ ही पलों में पसीना निकलेगा और तपन शांत हो जाएगी, आजकल ऐसा दिन में दो-तीन बार तो हो ही जाता है. उम्र के इस दौर में ऐसा होना स्वाभाविक है डाक्टर ने कहा है.

आज महीनों बाद मृणाल ज्योति गयी. माहौल थोडा शांत व हल्की उदासी से ओत-प्रोत लगा. बच्चे भी पहले की तरह हँसते हुए नहीं लगे. एक बच्चे ने कहा, फिर मिलेंगे. मन में करुणा जगी, कितने विवश लगे वे, उनकी आत्मा उन अधूरे शरीरों में कितनी तंग होती होगी, कौन जाने उनके भीतर कैसे  विचार उठते हैं? वे अपने को व्यक्त कहाँ कर पाते हैं ? उनकी एक टीचर ने शाम को फोन किया, वह कम वेतन के बारे में बात कर रही थी. स्कूल के अधिकारियों ने बताया कि वे तंग आ चुके हैं सरकार की योजनाओं का पूरा लाभ उन्हें नहीं मिल पाता है. सरकारी अधिकारी काम को आगे नहीं बढ़ाते. संसार में कितने दुःख हैं. आतंक का शिकार यह प्रदेश कितना पिछड़ा हुआ है. गाँधी जी ने सेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया, सेवा के माध्यम से वह अपने सत्य और अहिंसा के साधनों की परख करते थे. उसके जीवन में सेवा के अवसर अब थोड़े-बहुत आने लगे हैं पर वे बहुत कम हैं. जून उसकी पूरी मदद करते हैं. वह उसे ईश्वर से दूर ले जाने का प्रयत्न करते हुए ईश्वर के निकट ले जाते हैं. वह अभी इस बात को नहीं समझते कि ईश्वर से प्रेम करना मानवीय आवश्यकता है. उसे उनसे कोई वाद-विवाद नहीं करना चाहिए, उनकी समझ में तो यह पागलपन ही है. वह तो उन्हें शुद्धात्मा ही देखती है और इस सृष्टि के जर्रे-जर्रे की तरह उनसे भी असीम प्रेम करती है. ईश्वर हर क्षण उसके साथ हैं और ईश्वरीय प्रेम उसके भीतर-बाहर हर ओर फैला है. यह सारा जगत उसी का रूप है. मनसा-वाचा-कर्मणा वह किसी का अहित न करे, यही उसका प्रयास है. वह उसकी इच्छा की पूर्ति तत्काल करते हैं और सोचते हैं कि जगत के मोहजाल में उसे खींच लेंगे, पर उसकी वे सारी इच्छाएं परमात्मा के मार्ग पर ले जाने वाली ही हैं. वह भी तो पुण्य के भागी हो रहे हैं. उसका हृदय प्रेम से लबालब भरा है. इस प्रेम का कारण कोई नहीं, पात्र भी कोई नहीं. यह तो सहज ही है सारी समष्टि के लिए और उससे परे उस परम पिता परमात्मा के लिए, बल्कि वही तो प्रेम रूप में उसके भीतर विराजमान है !
पिछले कुछ दिनों से वह बापू की आत्मकथा पढ़ रही थी, अभी कुछ देर पूर्व ही समाप्त की. वे सत्य के अन्वेषक थे और उनका साधन एकमात्र अहिंसा था. अहिंसा के बल पर वे सत्य की खोज कर रहे थे. बुद्धि की शुद्धि के बिना कोई अहिंसा का पालन नहीं कर सकता और राग-द्वेष से मुक्त हुए बिना वह सम्भव नहीं. राग-द्वेष से मुक्त होने के लिए अहंकार का सर्वथा त्याग करना होगा, स्वयं को भुलाकर समष्टि के साथ एकता का अनुभव करना होगा. उसके बाएं कान में सुबह से तथा इस समय दायें कान में सोहम् की मधुर गुंजन सुनाई दे रही है, भीतर अखंड शांति का साम्राज्य है.

आज सुबह पिता जी आ गये, जून रात्रि को ढाई बजे ही उन्हें लेने चले गये थे. सासुमाँ बहुत खुश हैं, वे अपने साथ खाने-पीने का ढेर सारा सामान लाये हैं. दीपावली का त्योहार आने ही वाला है, तैयारी तो हफ्तों पूर्व ही आरम्भ हो जाती है. वे अपने भीतर भी दीवाली मनाते हैं और बाहर भी, भीतर की सफाई तथा शुद्धि भी करते हैं जैसे बाहर की. अमावस के अंधकार का प्रतीक है अज्ञान..जिसे आत्मज्ञान का दीपक जलाकर मिटाना है. मधुर भावों की मिठास से उर को मीठा करना है. उसके भीतर भी उजाला ही उजाला हो, चिदाकाश में दीप जले हों, अनहद का संगीत गूँजता हो तो ही सदगुरू की शिक्षा की अधिकारिणी वह कही जा सकती है. आज उन्हें सुना, नारद भक्ति सूत्र के आधार पर वह व्याख्या कर रहे थे, प्रेम का वर्णन नहीं कर सकते, वह भाव से परे है, भावुकता प्रेम नहीं है, भीतर की दृढ़ता ही प्रेम है, सत्यप्रियता ही प्रेम है और असीम शांति भी प्रेम का ही रूप है. भीतर ही भीतर जो मीठे झरने सा रिसता रहता है वह भी तो प्रेम है. प्रभु हर पल प्रेम लुटा रहे हैं. तारों का प्रकाश, चाँद, सूर्य की प्रभा, पवन का डोलना तथा फूलों की सुगंध सभी तो प्रेम का प्रदर्शन है. प्रकृति प्रेम करती है, घास का कोमल स्पर्श और वर्षा की बूंदों की छुअन सब कुछ तो प्रेम ही है. वृद्ध की आँखों में प्रेम ही झलकता है शिशु की मुस्कान में भी प्रेम ही बसता है. प्रेम उनका स्वभाव है और प्रेम से ही वे बने हैं. प्रेम ही ईश्वर है !   

Wednesday, July 29, 2015

सत्यम..शिवम..सुन्दरम..


सद्गुरू से जुड़े रहना साधना में आगे बढ़ने के लिए प्रथम और अंतिम शर्त है. सद्गुरु दूर नहीं हैं, वह हृदय के बिल्कुल निकट हैं. हमारे स्वयं से भी निकट. उनसे मिलकर भी यदि जीवन में कुछ परिवर्तन नहीं हुआ तो व्यर्थ है वह जीवन. आज सुबह नींद देर से खुली, स्वप्न देखती रही कि आम खरीदे हैं पर उसमें रस नहीं है, एक छेद के जरिये सारा रस उसमें से पहले ही निचोड़ लिया गया है. अनार खरीदा है पर उसमें दाने नहीं हैं, ऊपर से छिलका सही-सलामत है. ऐसे ही तो वे ऐसे कार्य करते हैं जो ऊपर से भले दीखते हैं पर उनमें कोई सार नहीं होता. गुरू के साथ जुड़े रहो तो वह स्वप्नों में भटकने नहीं देता. उन्होंने कहा था कि स्वप्न से जैसे ही जगो तो उठकर बैठ जाओ, स्वस्थ हो जाओ, अपने आप में स्थित. आत्मा में स्थित. वहीं बोध मिलेगा, वहीं मुक्ति है, वही वास्तविकता है !

जैसा-जैसा शास्त्रों में लिखा है उसे वैसा-वैसा अनुभूत होता है. सत्य एक ही है वह जिसके भीतर प्रकट होगा, समान रूप से होगा. उसका मन आजकल कितना जीवंत रहता है. सदा तृप्ति और उछाह से भरा, पता नहीं भीतर क्या रिसता है और कौन उसका पान करता है, लेकिन एक निर्द्वंद्वता, निडरता तथा स्वतन्त्रता का अनुभव होता है, जैसे अब इस जहाँ में कुछ भी पाना नहीं है. आत्मा को क्या पाना है जो स्वयं ही सबका स्रोत है, जो नित्य है, अनंत है. आज दोपहर एक अंग्रेजी फिल्म देखी, जिसमें रोबोट मानवों पर हुकूमत करने लगते हैं, क्योंकि वे समझते हैं कि मानव अपना विनाश कर बैठेंगे, मानव ने जिन्हें बनाया वही मशीनें उस पर अधिकार करने लगी पर अंत में जीत मानव की हुई. मानव के भीतर दैवीय शक्ति है, प्रभु ने उसे बनाया है, वह भी अपने जैसा, ईश्वर का मित्र है वह.. यदि उसकी आज्ञा में रहे, पर अंततः जीत तो परमात्मा की ही होती है.

आज सुबह वह तीन घरों में गयी, एक के यहाँ किताब भेजी. दो ने मना कर दिया, एक ने लेकर कहा पैसे बाद में भिजवा देगी. एक और प्रति किसी परिचिता ने खरीदी, सेवा का यह यह काम करते हुए उसे बहुत ख़ुशी हो रही है, लोगों से बात करने का एक नया अनुभव. वह जो पहले लोगों से बात नहीं करती थी, मतलब की बात ही करती थी. अब अपने स्वाभिमान को ताक पर रखकर बात कर रही है. लोग तो सारे उसके अपने ही हैं. वे जो भी जवाब दें, उसे एक नया पाठ सीखने को मिल रहा है. इसी बहाने लोगों से उसकी जान-पहचान भी बढ़ रही है. मिलते-जुलते रहने से वक्त पर लोग काम आते हैं. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के लिए काम करते समय मन में ऐसा भाव भी है कि कुछ भी नहीं कर रही. जो कुछ भी हो रहा है वह अपने आप ही हो रहा है, किसी बड़े कार्य का छोटा सा हिस्सा ! एक परिचिता के पास गयी तो उसने अपना पूरा जीवन दर्शन सुना दिया. वे सभी ही तो ज्ञानी हैं, सदा एक-दूसरे को ज्ञान देते हुए. जून परसों आयेंगे, उनसे फोन पर बात हुई. वे ये जानते हुए भी कि वस्तुओं की वस्तविकता क्या है, उन्हें महत्वपूर्ण बनाते रहते हैं, क्योंकि वस्तुएं उनके जीवन में बाह्य ही सही रंग भरती हैं. जून उसके लिए और वस्तुएं ला रहे हैं. वे सभी सौन्दर्य के पुजारी हैं. उनका इष्ट देवता उनका प्रिय कान्हा भी तो सौन्दर्य का देवता है. सत्यं, शिवं, सुन्दरं की परिकल्पना कितनी अद्वितीय है, जो सत्य है, वही शिव है, जो शिव है  वही सुंदर है..पर जो सुंदर है वह शिव भी होगा इसमें संदेह हो सकता है...क्योंकि हर चमकती हुई चीज सोना नहीं होती.. .भारतीय संस्कृति पर निर्मल वर्मा का एक विस्तृत निबन्ध पढ़ा पर पूरा डूब कर नहीं, क्योंकि साथ-साथ माली के काम का निरिक्षण भी कर रही थी.  सुबह उठने से पूर्व फिर स्वप्न देखे, जो उस समय वास्तविक ही लग रहे थे. एक छोटी लड़की जो स्वप्न में मृत हो जाती है फिर जीवित और फिर एक जलती हुई देह का स्वप्न देखती है ..कितना अजीब था यह स्वप्न पर तब बिलकुल स्वाभाविक लग रहा था, उनका जीवन भी तो एक स्वप्न की तरह ही है, पल में बीत जाने वाला !


जून आज आ रहे हैं, फ्लाइट एक घंटा लेट है. अभी एक सखी से बात की, उसकी सासूजी परसों बाथरूम में गिर पड़ीं. बुढ़ापे की कमजोरी तथा भारी शरीर, कहीं जाने की जल्दी के कारण..तथा स्नानघर में में लोहे की बाल्टी थी, उन्हें थोड़ी चोट भी लग गयी है. उसने सोचा शाम को वे उन्हें देखने जायेंगे, यदि आज नहीं तो कल अवश्य ही. 

Monday, July 20, 2015

जीवन की पहेली


आज जन्माष्टमी है, परमात्मा तो अजन्मा है फिर भी वह जन्म लेता है, मानवों को ज्ञान देने के लिए. कृष्ण अर्जुन के बहाने सभी को अपनी शरण में जाने का उपदेश देते हैं, जहाँ प्रेम है, शांति है आनन्द है. तब वे उसके बनाये इस सुंदर संसार को और अच्छा बनाने में सहयोग कर सकेंगे, कम से कम उसे विकृत तो नहीं करेंगे. यह जीवन एक रहस्य है और वह उसे खोलना चाहती है. कृष्ण उसे आकर्षित करते हैं ताकि वह इस खेल में शामिल हो सके. भीतर ही इसकी चाबी मिलने वाली है, भीतर जाकर जब कुछ भी नहीं मिलता तो विरह सताता है जिससे भीतर का पाप-ताप तो जल ही जाता है. मन समता में रहना सीखता है.

‘सद्गुरु’ को प्रेम करने का अर्थ है जो उन्हें प्रिय है वह भी वही करे. उन्हें ‘सेवा’ प्रिय है सो उसे भी सेवा की भावना को प्रश्रय देना होगा. अभी भी भीतर क्रोध बाकी है, किसी की कही अनावश्यक या मूर्खतापूर्ण बात उसे झुंझला जाती है. उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है उसकी भाषा, उसे मीठा बोलना नहीं आता. सत्य को सत्य कहने से कोई झिझक नहीं है पर सभी तो उस स्तर पर नहीं पहुंचे हैं कि  बात को उसी रूप में लें जिस रूप में कही गयी है. सच्ची बात उन्हें चुभ भी सकती है फिर कर्म बंधन में तो उसे ही बंधना पड़ेगा. सभी को आत्मा जानकर ही दोष दृष्टि से मुक्त हुआ जा सकता है. जिसे अपनी वाणी का दोष नजर नहीं आता वह विचारों का दोष कैसे देख पायेगा ?

मुहब्बत की दुनिया में होशमंदों का क्या काम
जब भी आया है पैगाम आया है दीवानों के नाम  

अक्ल के भटकों को राह दिखाते हुए
जिन्दगी काटी हमने दीवाना कहलाते हुए


जीवन एक पहेली है जो कभी तो लगता है कि अब बस सुलझने ही वाली है फिर अचानक इतनी उलझ जाती है कि...और यह दीवाना मन ही इस का कारण है. मन की क्रिया विधि को समझे बिना साधना पूरी नहीं हो सकती. उस दिन उस पंडित ने कहा था आपका मंगल ठीक नहीं है. सोचा हुआ कार्य पूरा नहीं होता तो उसने जोरदार शब्दों में इस पर आपत्ति की थी. पर अब लगता है उसकी बात में सत्य था. कितनी ही बार उस सच का अनुभव कर चुकी है उसके बाद से, उसके पूर्व भी होता होगा पर सजगता नहीं थी सो इसकी तरफ कभी ध्यान ही नहीं गया. कल बाजार में दो नंग-धडंग बच्चों को देखकर सोचा कि इन्हें एक-एक जोड़ी कपड़े दिलाये पर कहाँ पूरी हुई यह इच्छा. सत्संग में जाने से पूर्व सोचा था कि आज सभी को इसका सही अर्थ बताना है, एक औपचारिकता ही बनता जा रहा है साप्ताहिक सत्संग, पर वहाँ जाकर कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं होती या कहे कि मन ही नहीं होता. मन स्वप्न बहुत देखता है पर पूरा करने की क्षमता नहीं है. एक सखी जो अस्वस्थ रहती है उसे बहुत कुछ कहने का मन है पर वह अपने ही विचारों के प्रति इतनी श्रद्धा रखती है कि उसके विपरीत जा कुछ कहने का साहस नहीं कर पाती. लगता है ऐसा होना सम्भवतः इसलिए भी जरूरी है कि उसके अहंकार का नाश हो, जो कर्त्ता है उसे तो जाना ही होगा. उसने स्वयं को सद्गुरु के आश्रय में रख दिया है अब जो कुछ भी होता है अथवा नहीं होता सब उन्ही का प्रसाद है.