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Saturday, April 18, 2026

शेक्सपियर के नाटक

शेक्सपियर के नाटक

रुस ने यूक्रेन के ख़िलाफ़ लड़ाई छेड़ दी है।संभवत: दुनिया विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही है।जून सोसाइटी के लिए काम करने वाली वर्तमान एजेंसी की जगह दूसरी लाना चाहते हैं, विरोध होगा, पर वह सुनने के लिए तैयार हैं। आज सुबह सात बजे वह कमेटी के कुछ सदस्यों के साथ  किसी अन्य सोसाइटी में नयी एजेंसी का काम देखने गये थे, बारह बजे लौटे। नूना ने पौधों को बचाये रखने वाली एक पुस्तक पढ़नी शुरू की है, जो असम की रहने वाली तृष्णा बोरा ने लिखी है। पापाजी से बात हुई, उन्हें ‘बाल्मीकि रामायण’ का काव्य रूपांतरण पढ़ने को कहा है। पता नहीं क्यों, ऐसा लग रहा है, कि यह सब कल लिखा था, पर डायरी का यह पन्ना ख़ाली है, शायद सपने में लिखा हो ! ज़िंदगी कितनी रहस्यमयी है ! छोटे भाई का फ़ोन आया, वह लेह में है। दीदी-जीजा जी अपना चंडीगढ़ वाला घर बेचना चाहते हैं।


सुबह उठने से पूर्व गुरुजी को सपने में देखा, वह उनके घर में ही हैं शायद, एक कुर्सी पर उन्हें बैठने के लिए कहती है, फिर पानी के लिए पूछती है। वह कहते हैं,  हाँ, पानी पियेंगे, गिलास में पानी भरकर ट्रे में रखा है, पर लगता है, गुरुजी हैं तो साथ में कुछ और भी तो हो, ख़ाली पानी कैसे देगी। तभी कुछ और लोग भी आ जाते हैं माला आदि लेकर, जून भी खड़े हैं। जब तक वह ट्रे लेकर जाती है, जून कहते हैं, वहाँ नो एंट्री है, स्वप्न टूट जाता है। सुबह के स्वप्न जगाने के लिए आते हैं। गुरुजी को अभी-अभी सुना, वह कितने शांत और सहज लग रहे थे। जून आज भी कई घंटे बाहर रहे, उनकी मीटिंग्स लंबी होती जा रही हैं। पापाजी ने रामायण पढ़ी, उन्हें अच्छी लगी। उन्होंने बताया, चचेरी बहन का कॉलेज में पढ़ने वाला बेटा सामाजिक कार्य करता है, देहरादून के विधायक से उसने अपने रेस्तराँ का उद्घाटन कराया, काफ़ी आगे जाएगा, बहुत होशियार है। उसे दादाजी का ध्यान हो आया, वह भी राजनीति में बहुत सक्रिय रहते थे, सम्भवत: उनका कुछ असर आया होगा।  


आज जून ने मतदान पहचान पत्र के लिए आवेदन पत्र भर दिया है, बनने में तीन-चार महीने लगेंगे। कल पहली बार वे एग्री मॉल गये।जहाँ हज़ारों की संख्या में पौधे और फूल थे। उससे पूर्व ‘पाकशाला’ में दोपहर के भोजन के बाद नन्हे के एक मित्र के घर जाना हुआ, वह भी पौधों के विशाल मॉल में साथ गया।उन्होंने कुछ विशेष पौधे भी लिए जो वर्षों तक उनके बगीचे की शोभा बनेंगे। शाम को शिवरात्रि के लिए गुरुजी द्वारा पूर्व में दिये गये एक  प्रवचन का हिन्दी अनुवाद किया। 


कल शिवरात्रि थी। पहली बार नूना ने आधी रात तक जागकर टीवी के बड़े से स्क्रीन पर शिव के भजन सुने और साथ ही नृत्य भी किया। बहुत अनोखा अनुभव था। आश्रम में हज़ारों की संख्या में लोग आये हैं, गुरुजी की कृपा दृष्टि पाने के लिए आतुर लोग, भजन की धुनों पर नाचते लोग ! ईशा फ़ाउंडेशन में भी हर वर्ष की तरह भव्य कार्यक्रम हुआ। पहले एक अफ़्रीकी गायक आया, फिर हिमाचल का हंसराज रघुवंशी, जिसने शिव भजन गाकर समां ही बाँध दिया।सुबह समय से नींद खुल गई, कुछ देर स्वामी सुखबोधानन्द जी द्वारा करवाया त्राटक ध्यान किया। बहुत ही प्रभावशाली ध्यान है यह।भगवद् गीता के अध्याय दो का अध्ययन भी चल रहा है। श्लोक संख्या ४,५,६ पर उनकी व्याख्या सुनी। वैसे वह कहते हैं, वह एक्सप्लेन नहीं करते, रेस्पोंड करते हैं।अर्जुन ने जब कहा कि युद्ध करने की बजाय वह भिक्षा माँगकर गुजारा करना सही समझेगा, तब वह संन्यास की तरफ़ इशारा कर रहा था। जिसका लक्ष्य मोक्ष है, इसलिए वह ज्ञान पाने का अधिकारी भी बन गया।उन्होंने कृष्ण की मुस्कान का अर्थ भी बताया। smile के पाँच वर्णों के भाव हैं - एस-स्प्रिचुअल, एम-मनी, आई-इंटेलिजेंस, एल-लोंगेविटी और इ-इमोशनल कोशेंट।जीवन की किसी भी परिस्थिति का सामना ‘स्माइल’ से करना चाहिए। आध्यात्मिक धन पास में हो तो बुद्धि, आयु और भावनात्मक स्थिरता बढ़ती है।     


छत पर सूर्योदय दर्शन करते हुए सूर्य नमस्कार करने का अपना ही आनंद है। दोपहर को ऑनलाइन कन्नड़ा क्लास हुई, एक अन्य महिला भी शामिल हुई।शाम को नन्हा आया था, उनकी एक परिचिता ने अपना कुछ सामान उनके स्टोर रूम में रखवाया है। कोरोना की वजह से कितने ही लोग अपने घर जा रहे हैं। शेक्सपियर की ‘हैमलेट’ पढ़ी आज, जूलियस सीज़र और ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम पहले पढ़ी थी, कमाल के लेखक हैं शेक्सपियर! एक से एक प्लॉट्स हैं, भूत, प्रेत, परियाँ सभी हैं उनमें। 


आज बायीं नासिका से एक गंध आ रही है। संभवत: इसका संबंध पाचन क्रिया से है। सुबह चार बजे से पूर्व नींद खुल गई, मन में ईश्वर स्मरण के बजाए, कल दिन में हुई किसी घटना पर विचार चल रहा था। यूक्रेन में तबाही बढ़ती जा रही है, पर युद्ध समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा। भारत ने अभी तक किसी भी पक्ष की तरफ़ होने की बात नहीं कही है।दोपहर को वे एक स्थानीय मित्र के यहाँ गये, उनकी बेटी डॉक्टर है, एमडी में दाख़िला ले रही है। 


आज का इतवार विशेष रहा, नन्हा और सोनू कल शाम को ही आ गये थे। सुबह सोसाइटी के बहु उद्देश्यीय मैदान में असोसिएशन की तरफ़ से बच्चों के लिए खेलकूद का आयोजन किया गया था। ढेर सारे बच्चे आये, बाद में पुरस्कार भी दिये गये। सभी को आनंद आया।साढ़े दस बजे कुछ महिलाओं के साथ नूना पंचायत के दफ़्तर पहुँच गई थी। अध्य्क्षा लगभग सवा ग्यारह बजे आयीं। सब मिलकर निकट के एक गाँव में गये, उसके पहले दो झीलें भी देखीं। गाँव में बच्चों व महिलाओं से मिले। एक महिला ने सभी को पीने के लिए शरबत दिया, जो गाँव वालों के अतिथि सत्कार का एक सुंदर उदाहरण था। 


आज सोसाइटी की कमेटी ने नयी एजेंसी नियुक्त करने की बात सबको बता दी है। अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है, अर्थात लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं। आज जून यहाँ पहली बार गन्ने का रस लाये। यूक्रेन से हज़ारों विद्यार्थी वापस आ गये हैं, पर अभी भी कई शेष रह गये हैं। पुतिन ने कुछ शहरों में युद्ध विराम कर दिया है। 


आज ‘विश्व महिला दिवस’ है, पूरी दुनिया में कई तरह से मनाया गया, नापा में अस्थायी क्लब में महिलाओं के लिए एक प्रसिद्ध अस्पताल की तरफ़ से निःशुल्क मेडिकल कैंप लगाया गया। नाश्ते के बाद नूना यहाँ आ गई थी, डॉक्टर्स की टीम पहले ही वहाँ आ चुकी थी। उसने चेकअप कराया। दस दिनों का दवा का एक कोर्स दिया है, इसके बाद पूरे शरीर की जाँच के लिए अस्पताल जाना है। कल जून वहाँ आने वाली सभी महिलाओं के लिए चॉकलेट्स मँगवाने वाले थे, पर स्टोर में खत्म हो गयीं, ओरियन बिस्किट्स मँगवाये। शाम को प्रधानमंत्री ने महिला संतों को वर्चुअली संबोधित किया, वे सब कच्छके धोरदो में एकत्रित हुई थीं। महिला संतों के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा, कच्छ में महिलाओं ने कठोर प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया है।


Tuesday, April 12, 2022

सपनों की दुनिया

आज देश के नाम प्रधानमंत्री का सम्बोधन था, कहा, चौथा लॉक डाउन होगा पर नए नियमों के साथ। उन्होंने देश को आत्म निर्भर बनाने की बात भी कही। सुबह उठी तो भीतर मौन था, एक शांति भरा मौन ! गुरूजी के लिए दोपहर को एक कविता लिखी, कल उनका जन्मदिन है, एओएल के हिंदी विभाग में काम करने वाले एक साधक ने उसे सजा दिया है। उसे भविष्य में अन्य कविताएँ भी भेजेगी। चाहे तो फ़ेसबुक पर एक पेज बना सकती है, जहाँ उनके लिए लिखी कविताएँ पोस्ट कर सके। जून छोटी भांजी के लिए लिखी कविता को सुंदर बना रहे हैं, जो अपना जन्मदिन गुरूजी के जन्मदिन के साथ साझा करती है। आज महाभारत में दुर्योधन भी मारा गया। अश्वत्थामा की मणि छिन गयी और उसे उसी पीड़ा के साथ अमर रहने का शाप मिल गया, इतना कठोर दंड ! 


शाम को टहलने गए तो मास्क लगाया था, जून को कठिनाई होती है; पर अभी कोरोना का डर गया नहीं है, न ही कोई दवा आयी है इसके इलाज के लिए। आज काव्यालय के संस्थापक कवि का मेल आया, उनकी एक पुस्तक आयी है, उनकी कविताओं को पढ़कर वह कुछ पंक्तियाँ उन्हें नियमित भेज रही है, उन्हें अच्छा लगा। वाक़ई उनकी हर कविता में एक नया अन्दाज़ है। आज शाम से पूर्व उन्होंने आधा घंटा योग व पुस्तकालय कक्ष में बैठकर पढ़ने के लिए और रात्रि में सोने से पूर्व कुछ समय बालकनी में  बैठने के लिए निकाला है , ताकि उनके घर का हर कोना आबाद रहे। कहीं सुना था कि घर के वे कोने जहाँ कोई नहीं जाता, नकारात्मक ऊर्जा से भर जाते हैं। आज सुबह नींद खुली उससे पूर्व एक स्वप्न में मृणाल ज्योति में खुद को पाया, उसका फ़ोन कहीं छूट गया है, जून से कहा फ़ोन करें, तब विचार आया यह स्वप्न है और नींद खुल गयी। दो दिन पहले एक विचित्र स्वप्न देखा था, जिसमें बहुत सारे हाथी हैं, जीवित भी और चारों तरफ़ आलमारी में उनके छोटे-बड़े चित्र भी। एक हाथी उसे कुचलने के लिए बढ़ता है पर ज़रा भी भय नहीं लग रहा, वह उसके पैरों के नीचे है पर कोई दर्द नहीं हो रहा फिर एक बच्चे के साथ उड़ जाती है, उड़ते समय देह में नहीं है पर साथ में जो बच्चा है उसका गोरा चेहरा और काले बाल स्पष्ट दिखे।


सुबह उपनिषद गंगा में ‘सत्यकाम’ की कहानी देखी, शाम को विष्णु पुराण में ‘ध्रुव’ की। दोपहर को जून ने ‘रजनीगंधा; लगायी यू ट्यूब पर, अमोल पालेकर की फ़िल्म। शिव सूत्र सुना, पढ़ा भी। शाम से मन की समता हटी नहीं है, पहले जून की थोड़ी सी नाराज़गी से मन कैसा व्याकुल हो जाता था, अब वह पुरानी बात हो गयी है। हर कोई अपने सुख-दुःख का निर्माता है, यदि वे नहीं चाहते कि दुखी हों तो संसार की कोई भी बात उन्हें दुखी नहीं कर सकती और यदि उन्होंने तय ही कर लिया है कि उन्हें दुखी रहना है तो छोटी से बात को भी कारण बना सकते हैं। मई आधा बीत गया है, कोरोना संकट कम नहीं हो रहा है। 


रात्रि के साढ़े आठ बजे हैं, वह सिट आउट में बैठकर लिख रही है। हवा बंद है, कुछ देर पूर्व हल्की बूँदा-बाँदी हुई पर गर्मी कम नहीं हुई। कुछ देर पूर्व रात्रि भोजन के बाद वह टहलने गये तो एक घर से गुरूजी की आवाज़ में निर्देशित ध्यान की आवाज़ आ रही थी; कदम वहीं थम गए। एक घर से बाँसुरी की आवाज़ रोज़ आती है, कोई रात को अभ्यास करता है । सभी लोग घर में हैं तो ध्यान, संगीत आदि में समय बिता रहे हैं; इतना तो शुभ हुआ है लॉक डाउन के कारण। कल रात उसने जून से कहा, उसकी बातों को गंभीरता से न लें, आगे आने वाले सोलह वर्षों में ( उसे लगता है इतना ही जीवन शेष है) उसकी किसी भी बात को उन्हें सत्य मानने की ज़रूरत नहीं है, क्यंकि सत्य क्या है यह जिसको पता चल जाता है उसके लिए शेष सब असत्य हो जाता है। ‘ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’ उक्ति तब हक़ीक़त नज़र आती है।  


Friday, September 19, 2014

बादल और सूरज


कल रात फिर माँ को सपने में देखा. वे सभी थे. पिता, सभी भाई-बहन. वह काम कर रही थी, जैसे कि सशरीर हों, वास्तव में वह नहीं थीं, फिर वह पलंग पर बैठ जाती हैं और पानी मांगती हैं. वे उन्हें पानी नहीं दे पाते क्योंकि उनका भौतिक अस्तित्त्व नहीं है. मंझला भाई बोतल से उन्हीं के सामने पानी पी रहा है और वह गिड़गिड़ाती हैं, फिर दुःख और क्रोध से कहती हैं कि उन्हें पानी न देकर क्या वे सब जीवित रह पाएंगे? कैसा अजीब सा स्वप्न था, पर स्वप्न का अर्थ ही है अजीब...इसके बाद ही वह जग गयी और यही सोचती रही कि उसके ही मन ने इसे गढ़ा होगा, वास्तव में ऐसा नहीं होगा कि माँ को अंतिम समय में पानी की जरूरत रही हो और वह उन्हें न मिला हो. पर अब इन बातों का कोई अर्थ नहीं है, जाने वाले एक बार जाकर वापस नहीं आते. कल जून ने “बस इतना सा सरमाया” की spiral binding भी करवा दी. नन्हे ने उस दिन कवर पेज भी कम्प्यूटर पर प्रिंट कर दिया था. माँ की कृतज्ञ है कि न होने पर भी उन्होंने उसे इतना बल दिया. कल शाम वे उड़िया मित्र के यहाँ गये. सखी की तबियत ठीक नहीं थी पर उसने अच्छी आवभगत की अब वापसी पर घर आने का निमन्त्रण भी दे दिया है. आज सुबह से सूरज निकला है अभी पैकिंग का कुछ काम शेष है. जून के आने से पहले समाप्त हो जाने से अच्छा है वरना वह बहुत जल्दी परेशान हो जाते हैं.

आज सुबह पिता से बात की, ठंड वहाँ कम हो गयी है सो ज्यादा गर्म कपड़े ले जाने की आवश्यकता नहीं है. इस समय फिर आकाश बादलों से ढका है, धूप निकलती है तो सब कितना स्पष्ट दिखाई देता है ऐसे ही जब मन पर अज्ञान के बादल छाये हों तो कुछ भी स्पष्ट नहीं सोच पाता. ज्ञान की एक किरण ही कितना प्रकाश भर देती है. सुबह बंगाली सखी ने उसकी कविताओं की तारीफ की उसने अपने पति से उनके बारे में सुना था. कल दो और मित्र परिवारों ने भी पांडुलिपि देखी. एक रचियता के लिए सबसे सुखद पल वे होते हैं जब कोई उसकी रचना को पढ़े व समझे.    

मार्च का मध्य आ गया है. फरवरी के अंतिम सप्ताह में वे यात्रा पर निकले थे. उस दिन के बाद आज पहली बार डायरी खोली है. वे तीन दिन पहले वापस आ गये थे, आने के बाद सफाई आदि के कार्य से निबट कर पुनः पुस्तक के काम में जुट गयी है. अभी भी आठ-दस दिनों का काम शेष है. नन्हा सुबह सोकर उठा तो पेट दर्द की शिकायत कर रहा था, उसे सम्भवतः अपच हो गया है. सुबह एक सखी से बात हुई उसने कहा, वह कहानियाँ भी लिखे, एक बार पहले भी उसने यह बात कही थी. उसकी अगली पुस्तक कहानियों की हो सकती है, विचार बुरा नहीं है. अज सुबह छोटी बहन से बात की, वह थोड़ी चुपचुप लगी, परिवार से दूर होने के कारण या वे उससे मिलने नहीं गये शायद इस बात का मलाल हो या उसका वहम् भी हो सकता है. आज नन्हे को नई किताबें लेने स्कूल जाना है जून उसे दोपहर को ले जायेंगे.




Tuesday, April 29, 2014

लोक कथाओं का संसार


Health is wealth इस बात का सही मूल्यांकन एक फ्लू का मरीज ही कर सकता है, जब जिन्दगी एक बिस्तर तक ही सीमित रह गयी हो. मुँह का स्वाद इतना कड़वा हो चुका हो कि चाय, दूध, कॉफ़ी और सूप का अंतर ही पता न चले. सुबह कब हुई, दोपहर कब शाम में ढल गयी, जगती-सोती आँखों को इसकी खबर ही न हो. लोगों से मिलना-जिलना दुश्वार हो जाये. कभी यह डर कि उतरा हुआ चेहरा देखकर आईने से ही बैर न हो जाये. आज पांचवा दिन है उसके बुखार का, मुख का स्वाद इस वक्त बेहद कड़वा है, कसैलेपन की हद तक कड़वा. छाती में जैसे कुछ अटका हुआ है. दोपहर को लगा था जैसे इस कैद से छुटकारा मिलने ही वाला है, भगवान करे यह सच ही हो. Indian Folk Tales पिछले दो-तीन दिनों से पढ़ रही है, बड़ी मजेदार कहानियाँ हैं, कोई-कोई तो इतनी अच्छी कि बस.. जून आज सुबह भी कल की तरह जल्दी आ गये थे, उसे दाल का पानी दिया, खाना बनाया और सुबह-सुबह नन्हे को स्कूल भेजा. दुनिया वैसे की वैसे चल रही है बस कमी है तो उसकी शक्ति की जो बुखार ने छीन ली है. कल शाम दीदी का फोन आया वह ठीक से बात कर सकी बिना यह जाहिर किये कि वह अस्वस्थ है. ऐसा क्यों  है, आखिर वह किसी को बताने से क्यों डरती है, क्या इसके पीछे वह उस रात को माँ-पापा के बीच हुई बात है जो उसने सुनी थी. इस तरह की होने के कारण उसे सहना भी पड़ता है अकेले-अकेले, नहीं, जून और नन्हे के साथ !

आज वह ठीक है, कल शाम को बुखार उतर गया था, जून ने जब देखकर बताया कि थर्मामीटर का पारा ९८.६ पर रुका है तो पहले उसे विश्वास ही नहीं हुआ था पर उस वक्त से अब तक फिर नहीं चढ़ा है. स्वाद अभी भी कड़वा है और कमजोरी भी, पर पहले की तुलना में तो यह कुछ भी नहीं. अभी कुछ देर पहले दो सखियों के फोन आये, दोनों को जन्मदिन की पार्टी में पता चला. आज नन्हा घर पर ही था, सुबह खाना बनाने में उसका बड़ा हाथ था. दोपहर को उसके लिए खीरे पर नमक, काली मिर्च, अमचूर और नींबू का रस डालकर लाया कि “अब आपके मुंह का स्वाद बिलकुल ठीक हो जायेगा.” शाम को जून के साथ ‘रिश्ते’ में एक अच्छी कहानी देखी जिसमें हीरो रेस्तरां में सामने बैठी लडकी को देखकर कल्पनाओं में खो जाता है और उसी सपने में उससे शादी भी कर लेता है. जून ने आज मक्खन में आलू-पनीर की सब्जी बनाई है, वह उसे काजू, बिस्किट, दूध खिला-पिला कर जल्दी से ठीक कर देना चाहते हैं. परसों नन्हे के स्कूल का वार्षिक दिवस है, वे दिगबोई जायेंगे. आज उसने एक अंग्रेजी उपन्यास पढ़ना शुरू किया जो वर्षों पहले पढ़ा था. सुबह से एक भी folk tale नहीं पढ़ी.

पिछले दो दिन पूरी तरह आराम किया फिर भी अभी खांसी ठीक नहीं हुई है, सो आज भी घर पर ही रहेगी, संगीत क्लास अगले हफ्ते से ही शुरू होगी. साढ़े आठ बजने को हैं, जून हिदायत देकर गये हैं कि वह ज्यादा काम न करे, वह चाहते हैं कि पूरी तरह स्वस्थ हो जाये तभी अपनी सामान्य दिनचर्या अपनाये.

कल शाम वह बहुत दिनों बाद टहलने गयी, मौसम में हल्की ठंडक थी, शेफाली के फूलों की हल्की गंध भी थी. लोगों के झुंड पूजा देखने जा रहे थे. आज भी पूजा की छुट्टी है. नन्हे का स्कूल शनिवार को खुलेगा, जून का दफ्तर भी, यानि अगले तीन दिन उनके पास हैं अपनी मनमर्जी के मुताबिक बिताने के लिए. कुकर में काले चने उबालने के लिए रखे हैं, गैस कम करने के बावजूद कुकर की सीटी है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही, कभी-कभी सामान्य सी लगने वाली बात भी कितना irritate कर जाती है. अभी कपड़े धोने हैं और सब्जी बनानी है. जब भी वह काले चने की सब्जी बनाती है तो ननद व सासु माँ के बनाने का ढंग याद आ जाता है. ढेर सारे प्याज, पिसे हुए अलग और कटे हुए अलग, जीरा भी पिसा होने के साथ-साथ साबुत भी, ढेर सारा धनिया पाउडर, और उबने के बाद चनों को मसाले में भूनना. उसका तरीका बिलकुल आसान है. कल सुबह ससुराल से फोन आया था, उनके पत्र उन्हें मिल रहे होंगे पर जवाब फोन से ही देते हैं. छोटी बहन के फोन का भी उसे इंतजार था. आज सुबह उठी तो मन में कोई उत्साह नहीं था, एक नये दिन का स्वागत करे ऐसा कुछ भी नहीं था, बल्कि यह भावना थी कि एक और पहाड़ सा दिन, फिर धीरे-धीरे दिनचर्या शुरू की तो रूचि जगने लगी और यह बात भी याद आई कि इतना व्यस्त रहना चाहिए कि यह सब सोचने का वक्त ही न मिले, पर मन तो हर वक्त अपने साथ रहता है जो यह याद दिलाता रहता है.




Monday, February 17, 2014

पंजाबी ढाबा


अभी नई डायरी नहीं मिली है, पिछले साल की डायरी के एक खाली पन्ने में लिख रही है. सुबह से कुछ समय एक-दो फोन करने में और कुछ इधर-उधर का काम करते-करते ही ग्यारह बज गये. नैनी और उसके बेटे की सहायता से सामने के बरामदे के गमलों की साफ-सफाई भी करवाई. नन्हे की स्कूल बस नहीं आई, वह स्कूल नहीं जा पाया. बहुत देर से पढ़ाई कर रहा है, ऐसा वह इम्तहान के दिनों में ही करता है. आज क्लब में देर से जाना है, पिछले चार-पाच दिनों से रोज ही वे क्लब जा रहे हैं, आज ‘पंजाबी ढाबा’ है. कल सुबह भी उसे क्लब जाना है डेकोरेशन के सिलसिले में मदद करने, परसों अंतिम दिन है. उस दिन बहुत लोग आएंगे, साल भर लोगों को इस दिन का इंतजार रहता है. पर्दे सिलने का काम कल दोपहर शुरू कर दिया था, जो कल पूरा हो जायेगा.  

जून आज नीले रंग की नई डायरी ले आये हैं, हर पन्ने पर एक सुंदर वाक्य भी लिखा है. आज भी उसका काफी समय क्लब में गुजरा, एक सीनियर मेम्बर के साथ फूलों की सज्जा करने में और कुछ उनकी मिनट-मिनट पर बदलने वाले ideas सुनने में, वह परफेक्शन चाहती हैं और बाकी के लोग उनके साथ चल नहीं पाते, लेकिन कुल मिलाकर परिणाम अच्छा रहा सभी ने तारीफ की, वापसी में उन्होंने उसे घर भी छोड़ा. दोपहर को जब आई तो जून का चेहरा उतरा हुआ था, नन्हे को भी स्कूल से आकर उसका घर में न रहना अखरा और उसने कह दिया, आजकल आपका ज्यादा वक्त क्लब में ही गुजरता है. कल शाम अचानक पंजाबी दीदी के पतिदेव आ गये, उनका वही पुराना तरीका है बातें करने का, पर वह अपने साथ कोलकाता की छेने व खोये की मिठाई लाये हैं. उन्हें परसों रात्रि भोजन पर बुलाया है, उसे अपनी पाक कला को संवारने का मौका मिलने वाला है.

आज धूप उजली थी और हवा हल्की सी. वे दोपहर को ड़ेढ़ बजे क्लब गये और चार बजे लौटे, शाम को पुनः गये, पत्रिका मिली, सुंदर चित्रों से सजी वार्षिक पत्रिका. नन्हा गृहकार्य कर रहा है जून सोने की तैयारी कर रहे हैं, वह उस skit के बारे में सोच रही है जो वह हसबैंड नाईट के कार्यक्रम के लिए लिख रही है. पात्रों का चरित्र अभी तक निर्धारित नहीं हो पाया है. विभिन्न भाषा-भाषी महिलाये हैं, तो उनकी कुछ चारित्रिक विशेषताएं भी होनी चाहिए. नन्हे को सुनकर हँसी आई इसका अर्थ है कि हास्य मौजूद है नाटिका में.

आज सुबह स्वप्न में माँ-पापा व छोटे भाई को देखा, माँ आधुनिका लग रही थीं और दो छोटे-छोटे बच्चों को खिला रही थीं शायद नन्हे और उसकी ममेरी बहन को. एक छोटी सी बिल्ली को भी देखा. सुबह जल्दी उठना था सो सपना टूट गया. हिंदी व्याकरण इतना विस्तार से तो उसने पहले कभी नहीं पढ़ा, पढ़ाते-पढ़ाते स्वयं भी काफी सीख रही है. कुछ देर पूर्व वह पड़ोस में किसी काम से गयी थी, लौटते समय पूसी उछलती-कूदती सी उसके पीछे लग गयी. घर आकर भी उसके पैरों से लिपट कर कुछ मांग रही है. इस नन्हे और मूक प्राणी को वह कैसे समझाये कि मानवों की कठोर दुनिया में उसके प्यार का कोई मोल नहीं है.

जून ने बताया, राजधानी अब डिब्रूगढ़ तक आती है, उन्हें सम्भवतः माँ-पापा को लेने गोहाटी न जाना पड़े, छोटे भाई को टिकट बढ़ाने के लिए कह दिया है. एक महीना वे उनके साथ रहेंगे. आज उनके विवाह की सालगिरह है. बहुत सारे फोन आ चुके हैं, माँ ने कहा, यात्रा में कष्ट तो होगा फिर भी वे आएंगे, सचमुच इतने सारे एक्सीडेंट की खबरें सुनकर तो यात्रा एक यातना ही लगती है, फिर उसी ईश्वर की ओर दृष्टि उठती है, वही रक्षा करेगा. सुबह ड्राइंग रूम की सफाई की, दोपहर को डाइनिंग रूम की, शाम को मित्रों के साथ विशेष चाय पी, जून ने सुबह सवेरे एक कार्ड दिया बेहद खूबसूरत और डेयरी मिल्क चाकलेट भी ढेर सारे प्यार के साथ. सुबह सभी कमेटी मेम्बर्स को फोन किये कल शाम को उनके यहाँ मीटिंग है.

 


Tuesday, October 15, 2013

स्वप्नों का संसार



आज सुबह वह उठी तो रात देखे सपनों की बातें दिमाग में स्पष्ट थीं, अजीबोगरीब सपने, सोने से पहले टीवी सीरियल देखकर सोयी थी, जिसमें murder, kidnapping, war सभी कुछ था, इसी वजह से और उनकी यात्रा के प्रति आशंका लिए मन रात भर कल्पनाएँ बुनता रहा. एक नृत्यांगना भी देखी जो अख़बारों में English column भी लिखती है और भी कई बेसिर पैर की बातें... कल शाम क्लब में उसने जून से कहा, वह उसके बैडमिंटन खेल को प्रोत्साहित नहीं करते हैं, तो उन्होंने पता नहीं इसका क्या अर्थ लिया, उसे लगा, इन्सान अपने अलावा और किसी से भी अपने मन की बात नहीं कह सकता. बाद में एक बालिका से टीटी में हार गयी, खैर.. उसका अफ़सोस नहीं हुआ बल्कि आनन्द आया. लाइब्रेरियन ने पिछले हफ्ते ली एक साप्ताहिक पत्रिका north-east वापस करने के लिए कहा था, रद्दी में चली गयी है शायद, उसके बदले में कोई और पत्रिका देने से शायद काम चल जाये. सुबह-सुबह नन्हे को भी उपदेश सुनने पड़े...उसे लगता है कि उनका कोई असर होने वाला नहीं है सो चुप रहना ही बेहतर है, वह अपनी प्रक्रति के अनुसार एक ढर्रे में ढलता जा रहा है जिसे बदलना सम्भव तो है पर मुश्किल भी है.

इस वक्त उसका मन एक ऐसे दुःख को अनुभव कर रहा है जिसका अहसास पहले कभी नहीं हुआ, यदि हुआ होगा तो बरसों पहले जब किसी सखी ने स्कूल या कालेज में उसका दिल तोडा होगा. आज ऑंखें भरी हैं और दिल भारी, एक सखी के कुछ शब्द कानों में अब भी ताजा हैं, एक मित्रता की मौत कैसे होती है यह तो पता नहीं पर कहीं गहरे कुछ चटक जरुर गया है.

डायरी उठाई तो एक दर्द भरी कविता अंगड़ाई ले रही थी. सच ही है दुःख मानव को सृजनशील बनाता है. कल रात भी सपने देखती रही और एक पहेली का हल जो पहले नहीं मिल रहा था, काफी देर बाद मिल ही गया. सपने में ही पायी वह ख़ुशी अब भी याद है, कैसा सुकून मिला था, पर सपने आखिर सपने ही होते हैं. पहले-पहल जब आँख खुली तो शायद उसी स्वप्न की वजह से मन हल्का लगा कि शायद सब कुछ भुला दिया है पर कहाँ, जरा सा होश आया नहीं कि वही दंश भरे शब्द कानो को बेंध कर दिल को चीरते चले गये, शायद वह overreact कर रही है. उसे इस वाकये को इतनी अहमियत नहीं देनी चाहिए, पर उसका मन, उसका पागल मन किस कदर जुड़ा था, उसे ऐसी ठेस लगने पर प्रतिक्रिया स्वाभाविक नहीं क्या ? समय धीरे-धीरे सारे घाव भर देता है पर एक मित्र का दिया घाव ऐसा गहरा होता है कि समय के पास भी उसकी कोई दवा नहीं होती.. क्यों नहीं होती होगी अगर कोई लेना चाहे और न मिले ऐसा तो हो ही नहीं सकता, अचानक उसके मन के भावों में जोश भरने का श्रेय एक अन्य परिचिता को है, जो क्लब की पत्रिका के लिए कुछ लिखने का वायदा कर चुकी हैं, पहले भी वादे तो बहुतों ने किये पर निभाएं ऐसे लोग कम ही होते हैं. कल शाम जून ने जब उसका चेहरा देखा तो समझ गये, कुछ हुआ है. उस वक्त की उनकी परेशानी और उसके दुःख को अपना दुःख समझने की वह कोशिश ...उस पल वे दोनों कितना करीब आ गये थे, एक ही सोच में बंधे हुए, सुख की चरम सीमा में भी शायद इन्सान ऐसे ही बंध जाते हैं. ख़ुशी की याद आ रही है.. उसने सोचा, लक्षण तो अच्छे हैं, लगता है जल्दी ही इस सदमे से उबर जाएगी. पर पिकनिक के लिए जिस जोश और मूड की जरूरत होती है वह कहीं मर गया है.


Tuesday, June 11, 2013

बगीचे के आम



‘आषाढ़ का प्रथम दिवस’ अर्थात जुलाई माह का शुभारम्भ, शुभ इसलिए की सुबह से ही वर्षा हो रही है, नन्हा सुबह साइकिल लेकर निकला ही था कि बूंदाबांदी शुरू हो गयी. सुबह-सुबह  टेनिस खेलने जाने से उसका मूड कितना ताजा रहता था, लेकिन एक तो अब स्कूल खुल जाने से दूसरे क्लब में बच्चों को अकेले जाने से मना कर दिया गया है. आज उसकी पहली बस छूट गयी, वह थोड़ा नाराज हो गया, ‘बाय’ कहे बिना ही चला गया, आज से तीन बजे आयेगा. ट्रांजिस्टर पर ‘फूलों की छाँव में’.. ‘प्यार के गाँव में’.. एक घर बनाने की कल्पना करने वाला एक गीत आ रहा है, ऐसा घर सिर्फ सपनों में मिल सकता है, यूँ अगर कोई चाहे तो उस सुख को जो ऐसा घर मिलने पर मिलेगा अपने  घर में महसूस कर सकता है. तलाश तो कर सकता है. कल सर्वोत्तम के दो-तीन पुराने अंक निकाले, अच्छा लगा कि पढ़ने के लिए इतना कुछ है घर में. कल रात को यश चोपड़ा की ‘इत्तफाक’ फिल्म देखनी शुरू की, पर कुछ देर ही देख पाए, ज्यादा अच्छी नहीं लगी. कास्टिंग में चित्रकला दिखाई जा रही थी उसमें.

कुछ मिनट पहले उसने पुरानी पड़ोसिन से बात की, वह अच्छी वक्ता है, उसे वकील होना चाहिए, बोलती कुछ ज्यादा है पर शब्दों का खजाना है उसके पास. मित्रता निभाना दुनिया में सबसे कठिन काम है शायद, हमें सामने तो उनकी तारीफ करनी होती है और बाद में आलोचना भी स्वतः ही होती है. नन्हा स्कूल गया है, शनिवार को उसने उसे स्कूल न जाने के लिए कहा था, पर आज सुबह जब तैयार होने के लिए कहा तो वह कन्फ्यूज्ड हो गया, उसे नन्हे को दुविधा में नहीं डालना चाहिए, सीधे-सादे शब्दों में सारी बात कहनी चाहिए. बड़े लोगों को तो मसलों को उलझाने में मजा आता है मगर बच्चों को इन दांवपेंच से दूर ही रखना चाहिए.

इस क्षण मन की शांत सरिता में जैसे किसी ने कंकर मार दिया है. लहरों का शोर विचारों का बिखराव दर्शाता है. मन पर कब किस बात का क्या असर होगा कहना कठिन है, जो मन पर नियन्त्रण रखने में समर्थ है वह  स्थित प्रज्ञ है. आज हल्की-हल्की सी धूप निकली है. कल शाम माली ने गुलदाउदी के लिए गमलों को तैयार कर दिया. कल शाम उसकी असमिया सखी ने पूछा, क्या बंगाली सखी का पत्र आया है, कल शाम उसके यहाँ आम खाने और ढेर सारी इधर-उधर की बातें करके बेहद अच्छा लगा उसे आभार जताने के लिए फोन करना चाहती थी पर शायद उनका फोन खराब है. इतना लिखने के बाद कलम रुक गयी, विचारों की गाड़ी को ब्रेक लग गया है, सच तो यह है कि मन शांत है पहले की तरह. यह डायरी भी एक मित्र की तरह होती है, एक ऐसे मित्र की तरह जिससे सब कुछ कहा जा सके पर वह कोई शिकायत नहीं करता. जो मन को शांत कर देता है, अपने कोमल हाथों के स्पर्श से. जिसके साथ जीना आसान हो जाता है और  कड़वाहटें मीठे बोलों में घुल जाती हैं.




   


Tuesday, April 10, 2012

नव जीवन


दिसम्बर का आरम्भ हो गया है. पिछले कई दिनों से उसने डायरी नहीं लिखी. कितनी ही बातें हो गयी है इस मध्य. पिछले हफ्ते वह अस्वस्थ रही कारण वही, अब ठीक है, डाक्टर की बताई दवाएं ले रही है. इसी माह उन्हें घर जाना है. वे दोनों बहुत खुश हैं. जुलाई के प्रथम दस दिनों में से कोई भी दिन हो सकता है जब वह मेहमान उनके सम्मुख होगा जीता जागता, उनके सपनों का केन्द्र, जो अब उनके भीतर है. अभी उन्होंने किसी को नहीं बताया है पर एक न एक दिन तो पता चल ही जायेगा. जून को अपने बॉस को बताना पड़ा था क्योंकि वह उसे बाहर भेज रहे थे. पिछ्ले दिनों वह कितनी अस्वस्थ थी, जून उसे छोड़ कर नहीं जाना चाहता था. वह भी चाहती है कि अब उन्हें हर पल एक साथ ही रहना चाहिए, ताकि वे हर परिवर्तन को साथ-साथ महसूस कर सकें.