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Friday, June 26, 2020

बापू के सपनों का भारत



टीवी पर गणतन्त्र दिवस की पूर्व सन्ध्या पर राष्ट्रपति का भाषण प्रसारित हो रहा है. वह कह रहे हैं देश इस समय गरीबी को मूलतः कम करने अथवा खत्म  करने प्रयासों में अंतिम पायदान पर पहुँच गया है. विकास के नए-नए कार्य हो रहे हैं. जवान व किसान दोनों सशक्त हो रहे हैं . आम आदमी में भी अपने जीवन को ऊपर उठाने की लालसा जगी है. सरकारी सुविधाएँ नीचे तक जा रही हैं. बेटियों को आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं. विकास के अवसर सभी को मिले क्योंकि देश के संसाधन पर सबका अधिकार है. गांधीजी के सपनों का भारत धीरे-धीरे साकार होता जा रहा है. तकनीक और नई सोच के बल पर देशवासी एक साथ आगे बढ़ें इसके लिए अपने लक्ष्यों और उपलब्धियों को रेखांकित करना होगा. पारस्परिक सहयोग और साझेदारी के द्वारा ही समाज आगे बढ़ सकता है. विचारों का आदान-प्रदान हो, समाज में समरसता हो. भरत की संस्कृति में, परंपरा में लोकसेवा का बहुत महत्व है. अच्छी नीयत के साथ किये गये प्रयास को सराहना मिलनी ही चाहिए. भारत की सेना विश्व में शांति के लिए एक प्रमुख स्थान रखती है. आपदा में भारतीय जवान करुणा व संवेदना का प्रदर्शन करते हैं. राष्ट्रपति का भाषण बहुत ही सारगर्भित है. यह अवसर है भारतीयता को मनाने का. इस वर्ष गाँधीजी की डेढ़सौवीं जयंती है, संविधान दिवस भी आने वाला है. इसी वर्ष चुनाव भी होने हैं जिनमें इक्कीसवीं सदी में जन्मे मतदाता भी वोट दे सकेंगे. यह सदी भारत की सदी है. 

दो दिनों का अंतराल. इस समय शाम के साढ़े छह बजे हैं. शाम को उन्हें कम्पनी के एक अधिकारी की बेटी के विवाह की पार्टी में जाना है. जून और उसका वजन बढ़ता जा रहा है, अब दोनों समय टहलने जाना होगा, कुछ खान-पान में परिवर्तन करके तथा कुछ ज्यादा व्यायाम करके उसे सीमित करना है. मौसम अब उतना ठंडा नहीं रहा. शाल लेने से काम चल जायेगा. आज माँ की अठाहरवीं पुण्यतिथि है, सभी उन्हें याद कर रहे हैं. छोटी बहन से बात हुई, उसकी गाड़ी भी साइड से लग गयी, जैसे उसकी लगी थी. जून ने पैकिंग कर ली है, दो दिनों के लिए बाहर जा रहे हैं. नन्हे ने कहा, अस्सी प्रतिशत काम हो गया है इंटीरियर का उनके नए घर में, सम्भवतः मार्च तक पूरा हो जायेगा. कल क्लब में महिला मीटिंग है, चार सदस्याओं का विदाई समारोह है, उसने सभी के लिए कविताएं लिखी हैं. 

उस तीन दशकों से भी पुरानी डायरी में पढ़ा, आज उस मैदान में दोनों बाहें सामने की ओर झूलते तेजी से दौड़ नहीं सकती. सुबह से एक हल्की खुमारी छायी है मन पर. उसके तर्कों में रंचमात्र भी बल नहीं है, वह उससे जो कुछ कह रही थी उस पर स्वयं भी विश्वास नहीं, लगता है उसके पास मस्तिष्क नहीं, वह सोच नहीं सकती, विचार नहीं कर सकती. वह सदा कल्पना ही किया करती है. उसके शब्द, उसके विचार खोखले हैं यदि कल्पना उनके साथ न हो. वह किस तरह इस कमी को पूरा कर सकती है. अभी तो उसके सम्मुख बस एक ही लक्ष्य है परीक्षा देना, सिवाय इसके कि उसकी परीक्षाएं कुछ दिनों में होनी हैं, अन्य बातें उसे भूल जानी चाहिये. ठंड लग रही है, उसने सोचा खिड़कियां बन्द कर दे या रहने ही दे, फिर रहने ही दिया. कल वसन्त पंचमी है और बापू की पुण्यतिथि भी. पिछले वर्ष जब उनकी कुछेक पुस्तकें पढ़ी थीं, बापू के आदर्श वाक्य उसे हर पल संभालते थे. अब कहाँ याद आते हैं, जबकि उनकी तस्वीर हर वक्त उसकी दृष्टि के सम्मुख रहती है. अब वह आसन, प्राणायाम और व्यायाम भी नहीं कर रही है. कल अवश्य करेगी. ठंडी हवा चुभ रही है स्वेटर को छेदती नीचे त्वचा तक. ब्लो ब्लो दाओ विंटर विंड यह तो उसने जंगल में कहा था और वह कमरे में भी नहीं बैठ सकती. तापमान 15 डिग्री से कम ही होगा, सेल्सियस और सेंटीग्रेट एक ही होता है न ! 

Monday, July 8, 2019

मानव श्रृंखला



कल गणतन्त्र दिवस का अवकाश था, लिखने का भी अवकाश हो गया. सुबह समय से उठे वे, आठ बजे नेहरू मैदान में ध्वजारोहण के लिए गये. दस बजे के बाद लौटे, विभिन्न स्थानीय स्कूलों के बच्चों द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम भी प्रस्तुत किया गया. वापस आकर घर में झंडा लगाया, सर्वेंट लाइन से बच्चे व उनकी माएं, कुछ के पिता भी आ गये थे. सबको लड्डू बांटे, जो ड्राइवर पहले ही आर्डर करके ले आता है. उसके बाद टीवी पर परेड देखी. दोपहर का भोजन उच्च अधिकारी के यहाँ था, जहाँ हर वर्ष की तरह काफी लोग आये थे. दोपहर बाद उस सखी के यहाँ गये जिनकी माँ अकेले रह रही हैं. देशभक्ति के गीत सुनते-सुनते गौरव का भाव दिन भर भीतर सहज ही बना रहा. रात्रि को वर्षा और गर्जन-तर्जन के कारण एक बार नींद खुल गयी, फिर आई तो स्वप्नों की दुनिया में ले गयी. चाचीजी को देखा, छोटी ननद व ननदोई को, फिर सोनू को भी. सूक्ष्म शरीर कितनी देहें धर लेता है स्वप्नों में. आज इस समय धूप खिली है. दोपहर बाद तिनसुकिया जाना है. नन्हा व सोनू दीदी के यहाँ गये हैं, उनसे बात हुई, वे कल समय पर पहुँच गये थे. लखनऊ में भी उन्हें कुछ समय मिल गया, इमामबाड़ा आदि देखा. मौसेरे भाई की कार ठीक कराकर उसी में वह नाना जी से मिलने जा रहे हैं. वापस आकर बुआ दादी से मिलेगा. उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है. वृद्धावस्था का असर ही होगा, जीवन जब लक्ष्यहीन नजर आता है, मनुष्य विवश हो जाता है. जून आज देर से आने वाले हैं. उन्हें डेंटिस्ट के पास जाना है.

आज माह का अंतिम रविवार है यानि 'मन की बात' वाला इतवार. नये वर्ष की पहली 'मन की बात'. मोदी जी महिलाओं के योगदान की सराहना कर रहे हैं. दहेज व बाल विवाह जैसी कुरीतियों को दूर करने के लिए तेरह हजार किमी लम्बी मानव श्रंखला का जिक्र भी उन्होंने किया, आत्म सुधार करने का प्रयास करना भारतीय समाज की विशेषता रही है. जन औषधि का जिक्र किया जिससे आम  आदमी का खर्च कम हो रहा है. वह कह रहे हैं और यह सराहनीय कदम है कि पद्म भूषण आदि पुरस्कार के लिए व्यक्ति अब सामान्य लोगों के मध्य से चुने जाते हैं. अब दोपहर के साढ़े बारह बज चुके हैं. बगीचे में काम चल रहा है. जून ने इतवार का विशेष लंच बना दिया है. बादलों को धकेलकर धूप खिल गयी है और मोदी जी के भाषण के बाद जनता की सराहना के शब्द भी सुनाये जा चुके हैं. उनके जैसा नेता हजारों वर्षों में कभी-कभार ही पैदा होता है. भारत ही नहीं पूरे विश्व के नेतृत्व की क्षमता है उनमें. परमात्मा की शक्ति से जुड़कर ही वह यह महती कार्य कर पा रहे हैं. उसने आज सुबह से कोई विशेष कार्य नहीं किया है, गुरूजी को सुना, ध्यान-साधना की, परमात्मा को सुमिरन किया, ये सारे सामान्य कार्य ही हैं जिन्हें करना उतना ही जरूरी है जितना श्वास लेना. फोन पर बातचीत की, संदेशों का आदान-प्रदान किया. अभी दोपहर को बच्चों को कुछ समय देना है. शाम को अध्ययन करना है. जून कल देहली जा रहे हैं, उन्हें पैकिंग में मदद करनी है और मन को साक्षी भाव में रखना है.

शाम हो गयी है. अगले दो दिन उसे अकेले रहना है. कुछ देर पहले योग कक्षा समाप्त हुई. उससे पहले 'बीटिंग रिट्रीट' देखा, परेड की वापसी की यह सुंदर प्रथा हर वर्ष गणतन्त्र दिवस के दो दिन बाद मनाई जाती है. सुबह स्कूल गयी थी, इस वर्ष बच्चों को पहली बार योग कराया. सुबह वे टहलने गये तो तापमान १२ डिग्री था, अब इतनी ठंड में आराम से वे भ्रमण के लिए जाते हैं, कुछ वर्ष पूर्व ऐसा नहीं कर पाते थे. ढेर सारे वस्त्र पहनने पड़ते थे, योग से सहन शक्ति का विकास होता है. उसे आज तीन वर्ष पूर्व आज के दिन एक सखी द्वारा पनीर की सब्जी भिजवाये जाने की बात याद आ रही है, उस समय उनके संबंध अच्छे थे, फिर समय ने करवट ली और अब वह ही कभी-कभार फोन पर हाल-चाल ले लेती है, उन्होंने दूरियां बना ली हैं. लेकिन मन अब इन बातों को उतना ही सामान्य मानता है, जितना तब मानता था जब सब कुछ ठीक था. जीवन इसी धूप-छाँव का ही तो नाम है.



Friday, August 25, 2017

नामफाके की पिकनिक


आज सुबह पौने सात बजे ही वे पिकनिक के लिए निकल पड़े थे, ‘नामफाके’ नामक स्थान पर जो यहाँ से बीस किमी दूर है, लगभग पचास लोग इक्कठे हुए. बहुत आनंद मनाया, पानी में उतरे, खेल खेले, अच्छा नाश्ता व भोजन किया, फिर कुछ लोगों द्वारा किया गया बीहू नृत्य देखा. कुल मिलाकर पिकनिक अच्छी रही. शाम को साढ़े तीन बजे घर लौटे, यानि कुल साढ़े छह घंटे वहाँ बिताये और शेष यात्रा में, तैयारी में जो समय गया वह अलग है. जून ने कल दोपहर को खीर बना दी थी, और शाम को तैयारी करके उसने सुबह सबके लिए उपमा बनायी, सभी को पसंद आयी. पिकनिक के मुक्त वातावरण में तन व मन दोनों ही हल्के हो जाते हैं.  

इस वर्ष की कम्पनी की डायरी का रंग अच्छा है. आज ही मिली है हरी-भरी यह डायरी. कल की पिकनिक की तारीफ आज भी हुई, फोटो भी अच्छे आये हैं. बड़ी भांजी के विवाह की वर्षगांठ है, दस वर्ष हो गये उसके विवाह को. नन्हा आज वापस बंगलुरू जा रहा है, इस समय शायद फ्लाईट में होगा. जून कल दिल्ली जा रहे हैं. सुबह सद्गुरू को सुना, अब उनकी बात उसे सीधे वहाँ तक ले जाती है, जहाँ वे उन्हें ले जाना चाहते हैं. जीवन एक यात्रा ही तो है सभी कहीं न कहीं जा रहे हैं,

रात्रि के सवा नौ बजे हैं. दूर कहीं से गाने की आवाजें आ रही हैं, उसकी आँखों में नींद का नाम भी नहीं है. आज सुबह गुरू पूजा और रूद्र पूजा में सम्मिलित होने का अवसर मिला. मौसम अब ज्यादा ठंडा नहीं रह गया है, परसों वसंत पंचमी है अर्थात वसंत भी आरम्भ हो चुका है. आज दोपहर वह बुजुर्ग आंटी से मिलने गयी, उसे देखकर वह सदा की तरह प्रसन्न हुईं, उसे भी उनसे मिलकर अच्छा लगता है. इस उम्र में भी उन्हें अपने वस्त्रों का बहुत ध्यान रहता है, साफ-सुथरे मैचिंग वस्त्र पहनती हैं, बंगाली उपन्यास पढ़ती हैं. शाम को बगीचे में टहलते हुए ओशो की किताब पढ़ी, सारे सदगुरुओं का स्वाद एक सा होता है. अभी कुछ देर पहले उसने कितने ही पन्ने कविताओं से भर डाले हैं..कृपा हुई है ऐसी कि इसकी कोई मिसाल नहीं दी जा सकती. जो कलम दो शब्द नहीं लिख रही थी पिछले कई दिनों से, आज मुखर हो गयी है. बसंत का मौसम जैसे भीतर उतर आया है. परमात्मा की कृपा अनंत है, वह नजर नहीं आता पर अपनी मौजूदगी जाहिर कर देता है. वह यहीं है आसपास ही ! 

जून आज वापस आ गये हैं, ढेर सारा सामान लाये हैं, अमरूद, रसभरी और बेर भी.. और शायद भारी सामान उठाने के कारण ही उनकी कमर का दर्द भी. कल रविवार है, विश्राम उन्हें स्वस्थ कर देगा. आज उनकी लायी विशेष सब्जी बनानी है, शलजम तथा भिस. बगीचे से भी ढेर सारी सब्जियां तोड़ीं. टीवी पर शशि पांडे की बातचीत सुनी, उनकी कोई किताब उसने पढ़ी तो नहीं है, मौका मिलने पर पढ़ेगी.

आज बच्चों को उसने ‘सरस्वती पूजा’ और ‘गणतन्त्र दिवस’ पर प्रश्नोत्तरी करवाई. आज छोटी बहन के विवाह की वर्षगांठ है और छोटी भांजी की बिटिया का जन्मदिन..और बराक ओबामा भारत आये हैं. सुबह से टीवी पर उन्हीं से जुड़े कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं. मोदीजी और ओबामा की मित्रता काफी गहरी होती जा रही है. भारत विकास की बुलंदियों को छुएगा. सजग नागरिक होने के नाते उन्हें भी इसके लिए कुछ करना होगा. फ़िलहाल तो कल सुबह ‘गणतन्त्र दिवस’ की परेड देखने जाना है. वापस आकर टीवी पर भी परेड देखनी है. ओबामा के आने से इस बार परेड कुछ विशेष लग रही है. शाम को एक मित्र परिवार को बुलाया है, वह दक्षिण भारतीय व्यंजन बनाएगी.



Wednesday, October 12, 2016

लाल चौक पर तिरंगा

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कल गणतन्त्र दिवस है. बीजेपी काश्मीर में लाल चौक पर तिरंगा फहराना चाहती है. उत्तरपूर्व के कई उग्रवादी संगठनों ने इसे न मनाने का फैसला किया है. उनकी अपनी समझ है. अलगाववादी गुट हजारों वर्षों के इतिहास को झुठला कैसे सकते हैं, वे ही जानें. जून ने सुबह उसका नाम डेंटिस्ट के पास लिखवा दिया था और गाड़ी भी भेज दी थी. वह बहुत ध्यान रखते हैं उसका. कल वे पहले नेहरु मैदान में फिर टीवी पर परेड देखेंगे, घर पर भी तिरंगा फहराएंगे. सुबह रामदेवजी का जोशीला भाषण सुना. देश जाग रहा है, परिवर्तन की लहर सब ओर दिखाई दे रही है, देश के लिए एक भावना लोगों के मनों में घर कर रही है. 

लॉन में हरी घास पर धरा का कोमल स्पर्श पाकर ( मकर आसन में ) लिखना एक नितांत सुंदर अनुभव है, जब कुनकुनी धूप बरस रही हो. स्वर्गिक, अलौकिक अनुभव कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. फूलों की कतारें हैं, हरियाली है और है सन्नाटा जिसे चीरता है पंछियों का कलरव! आज सुबह भी सुंदर वचन सुने, ब्रह्म मुहूर्त में आत्मा के विषय में सुनना भी प्रभु की अनंत कृपा का फल है. उन्हें कल एक फिल्म देखने जाना है, नन्हे के एक मित्र की कंपनी ने मॉल तथा उसमें स्थित पिक्चर हॉल का रिव्यू करने का काम उन्हें सौंपा है, टिकट के पैसे वे देंगे. कल उसने स्वर्गीय फुफेरे भाई की भेजी कविता ब्लॉग पर डाली. कल वह बहुत याद आ रहा था. बचपन में वह बहुत गोरा था, पारदर्शी त्वचा और नाजुक भी बहुत था. खांसता रहता था, सब उसे बुड्ढा कहते था. बड़ा हुआ तो किशोरावस्था भी देर से आयी, इलाज करने के बाद, लम्बा बहुत हो गया और दुबला भी..उसने मन ही मन प्रार्थना की जहाँ भी वह होगा उसे शुभकामनायें पहुंच ही जाएँगी.

आज सुबह ध्यान में सागर और लहर का संबंध स्पष्ट हुआ. वे एक अनायास उठी हुई लहर से ज्यादा कुछ भी नहीं, इस अनंत ब्रहमांड के सामने एक धूल के कण से भी छोटे हैं, पर जब वे उस सागर के साथ अपनी एकता का अनुभव कर लेते हैं, तब अहंकार उन्हें दुःख नहीं देता, जैसे बंधन उनका ही बनाया हुआ है, मुक्ति भी उन्हें ही खोजनी है. जानने के बाद ही पता चलता है कि वे कुछ भी नहीं जानते. मिलने के बाद ही पता चलता है कि अभी कितने दूर हैं. वर्तमान में रहें तो कोई बात ही नहीं करने के लिए, ज्ञान में रहें तो कुछ कहने के लिए बचता ही नहीं, ध्यान में रहें तो जगत के लिए कहने लायक क्या शेष रह जाता है. सेवा के सिवा करने को भी क्या है ! 

फरवरी का पहला दिन ! इसी महीने पिताजी यहाँ आ रहे हैं, जून देहली जा रहे हैं, उन्हीं के साथ आयेंगे. आज ब्लॉग पर हास्य कविताएँ पोस्ट कीं. कुछ लोगों की कविताएँ उसे समझ नहीं आतीं, जटिल मन की जटिल कविताएँ ! ध्यान में मन सरल हो जाता है, सहज जैसे प्रकृति के शांत रूप, लेकिन प्रकृति कभी विकराल रूप भी धर लेती है. आज एक सखी की बिटिया का जन्मदिन है, उसने कविता लिखी, बड़ी भांजी, छोटा भांजा, भाभी-भैया व एक सखी के लिए भी, इसी महीने सभी का खास दिन है. जून आफिस से प्रिंट करके लायेंगे. उसके सिर में हल्का सा भारीपन है, दोपहर से लिखने में लगी है, शायद इसीलिए..अभी फूलों का गुलदस्ता बनाना है, जून भी आने वाले होंगे. 




Tuesday, January 27, 2015

भुनी हुई शकरकंदी


वे कल्याण के पथ पर चलने वाले बनें, शुभ संकल्प उनके मनों में उठें” “परमात्मा उनकी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर ले जाने की प्रेरणा बनें”, “सारथि बन कर बुद्धि को हांकने वाले बनें” हजारों वर्ष पूर्व वैदिक ऋषियों ने यह प्रार्थना की थी जो आज भी प्रेरणा देती है. सद्विचार और सद्वाक्य उन हीरे-मोतियों की तरह हैं जिनसे मन का श्रंगार करना है. अशुद्ध विचारों को न तो प्रश्रय देना है न पोषण करना है क्योंकि एक बार अतिथि की तरह आया अशुभ संकल्प धीरे-धीरे किरायेदार और फिर मालिक बन बैठता है. मन यदि मधुसूदन का मनन करे तो वहाँ शुभ संकल्प ही उठेंगे तो सर्वप्रथम मन को उस मनमोहन का दीवाना बनाना है. वह जल्दी किसी को मिलता नहीं और जब एक बार मिल जाये तो बिछड़ता भी नहीं. कल शाम भागवद् में कृष्ण द्वारा उद्धव को दिए गए उपदेश पढ़े, उसकी बातें अनोखी हैं. किस-किस तरह से कथाओं के माध्यम से वह समझाता है कि सांसारिक संबंध क्षणिक हैं, वे अपने प्रतिदिन के जीवन में अनेकों बार इसे देखते, जानते तथा समझते हैं, पर फिर भूल जाते हैं और फिर पूरी तरह से संसार में डूबते चले जाते हैं. उनके हृदयों में नित्य सद्गुरु का प्रवचन चलता रहे तभी मार्ग प्रशस्त होगा. कबीर हों या नानक सभी ने इस बात को समझाया है और आज भी सद्गुरु उन्हें समझा रहे हैं. ईश्वर उनके अंतः करण में प्रकट होना चाहते हैं, वे स्वयं ही अपने हृदय का मार्ग अवरुद्ध कर लेते हैं. भक्ति का रस हृदय में प्रकट हो जाये तो संसार के सारे रस फीके लगने लगते हैं, क्योंकि शाश्वत के साथ सनातन संबंध है, अनेक जन्मों के बाद भी वह संबंध टूटता नहीं है, वह उनकी प्रतीक्षा कर रहा है और उसने उस कान्हा को अपना मीत बनाया है. प्रकृति उसी चैतन्य की अध्यक्षता में काम करती है, वही इस जग का आधार है !

कृष्ण ने कहा है, “उद्धव ! जो लोग समस्त भौतिक इच्छाएं त्याग कर अपनी चेतना मुझमें स्थिर करते हैं वे मेरे साथ उस सुख में हिस्सा बंटाते हैं जो इन्द्रिय तृप्ति में सलंग्न मनुष्यों के द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता”. भागवद् में इस तरह के अनेकों श्लोक हैं जिन्हें पढ़कर मन भावविभोर हो जाता है. कृष्ण कितने उपाय बताते हैं और उन्हें सांत्वना देते हैं वह अपने भक्त के पूर्ण कुशल-क्षेम की जिम्मेदारी ले लेते हैं ! और वह स्वयं अपना अनुभव देते हैं, उन्हें पाना कितना सहज है और एक बार मिलने के बाद कभी बिछड़ते नहीं, इस जन्म में ही नहीं मृत्यु के बाद भी और जन्म जन्मान्तर तक ! गुरूमाँ कहती हैं देर साधक की ओर से है उसकी ओर से नहीं, कृष्ण को कोई प्रेम करे तो वह स्वयं ही उसके चक्कर काटने लगता है ! द्रौपदी कृष्ण को अपना सखा मानती थी सो उसकी पुकार पर वह सदा आते हैं, पर उसके लिए पहले कृष्ण का भक्त बनना होगा. संसारी बनकर कोई उसे पा नहीं सकता. संसारी के हृदय में हजारों कामनाएं और इच्छाएं होती हैं, यदि उसमें कहीं एक इच्छा यह भी हो कि ईश्वर उसे मिलें तो वह इन इच्छाओं की भीड़ में दबकर रह जाएगी पर भक्त के मन में कोई इच्छा नहीं होती, वह सिर्फ भक्ति के लिए भक्ति करता है, प्रेम के लिए प्रेम करता है. उसके जीवन में विशुद्ध आनंद  है, निर्भयता है, आत्मविश्वास है, मुक्ति है ! दिन-प्रतिदिन के जीवन में ऐसे अनेक क्षण आते हैं जब आत्मा पर मैल का धब्बा लगता है, भक्ति तत्क्षण उस धब्बे को धो देने की प्रेरणा देती है. मोह रूपी इस जंगल में वे रास्ता खो देते हैं तो ईश्वर ही उन्हें मार्ग बनाते हैं, कल रात भी स्वप्न में कृष्ण की स्मृति बनी रही !


पिछले दो दिन कुछ नहीं लिखा. शनिवार को गणतन्त्र दिवस था, सुबह संगीत सीखा, फिर वे परेड देखने में व्यस्त हो गये. जो सदा की तरह भव्य थी. कल इतवार था सो नहीं लिख सकी. आज पूर्णिमा है, जून ने सुबह शकरकंदी भून कर दी. कल एक साधू को भिक्षा नहीं दे पायी, इसका बहुत अफ़सोस हुआ. शाम को छोटी बहन व भाभी, भैया के फोन आये, सभी ने माँ को प्रथम पुण्यतिथि पर याद किया वह ही सुबह से भूली रही. गुरूजी की बात याद आगयी कि जो सबसे ज्यादा जुड़ा होता है वही सबसे ज्यादा विरक्त होता है या आजकल उसका मन कृष्ण के रंग में इतना रंग गया है कि उसे सांसारिक मोह-माया नहीं व्यापते. पर कृष्ण ने यह भी कहा था कि  स्व को इतना विस्तृत करना है कि उसमें सभी समा जाएँ ! स्व का विस्तार भी बेतुका नहीं होना चाहिये, संतुलित होना चाहिए. एक तालमेल होना चाहिए तो जीवन मधुर हो जाता है, प्रेम की धारा प्रवाहित होने लगती है. 

Friday, July 4, 2014

बाइकर्स के कारनामे



आज फिर कुछ दिनों के बाद मौका मिला है खुद से बातें करने का. नया वर्ष शुरू हुआ और देखते ही देखते साल का पहला महीना समाप्त होने को है. उन लोगों ने गणतन्त्र दिवस को एक उत्सव की तरह मनाया, टीवी पर परेड देखकर, छोटे-बड़े कलाकारों को राजपथ पर रंग-बिरंगी पोशाकों में नाचते हुए देख कर और विभिन्न राज्यों की मनभावन झांकियां देखकर मन-प्राण उल्लास से भर जाते हैं. नन्हे का प्रिय दृश्य है जेट की उड़ान और मोटर बाइकर्स के कारनामे. विवेकानन्द आश्रम उनके द्वारा रचित साहित्य ‘राज योग’ और ‘ज्ञान योग’ को पढ़ने पर मन में उन्नत विचारों का अभ्युदय होता है. जीवन के महत् उद्देश्य को पा लेने के प्रयास को बल मिलता है. अंततः तो उनके जीवन का उद्देश्य अंतिम सत्य की प्राप्ति है, मन को एकाग्र करते हुए जो जो अनुभव होते जाते हैं, वे प्रेरणा देते हैं.

इतवार की शाम ! कल की तरह आज वर्षा नहीं हो रही है, मौसम ठंडा तो पर सुहाना भी है. सुबह उनकी नींद थोड़ी देर सही खुली, फिर इतवार की सुबह के आवश्यक कार्य, घर की साप्ताहिक विशेष सफाई, कार की धुलाई, मालिश आदि के बाद विशेष स्नान और विशेष नाश्ता, इतवार का दिन बीच में आकर जैसे सब कुछ नया कर जाता है. दोपहर को कुछ देर हिंदी फिल्म मेला देखी, ज्यादा अच्छी नहीं लगी. अभी रियाज के बाद इरादा है कहीं बाहर जाने का. आज से क्लब में हिंदी किताबें भी मिलनी थीं, पर सुबह लाइब्रेरी जाने का समय नहीं होता, शाम को सप्ताह के बाकी दिन खुलती है. जून इस समय दफ्तर का कुछ काम कर रहे हैं, नन्हा पढ़ाई में व्यस्त है और उसे समय मिल सकता है ध्यान के लिए, पांच फरवरी से स्कूल में भी ‘ध्यान’ जरूरी होगा.

जब बात करने को कोई न हो तो डायरी से बढ़कर कोई नहीं, यह उसकी हर बार सुनती है, समझती भी होगी. आज महीने का, नये वर्ष के पहले महीने का अंतिम दिन है. सुबह उठे तो बादल नहीं थे, दिन भर धूप खिली रही पर ठंड बहुत थी. हेड मिस्ट्रेस ने PF के बारे में कहा और यह स्वीकार किया कि स्कूल पैसे कमाने की मशीन बनता जा रहा है शिक्षा संस्था वालों के लिए, खैर, उसे इस विषय में ज्यादा जानकारी भी नहीं है और स्कूल में न इन सब बातों के लिए वक्त बचता है. जून आजकल अस्वस्थ चल रहे हैं, हर समय परेशान रहते हैं और उन्हें खुद भी नहीं पता कि उनकी परेशानी की वजह क्या है. उससे बात करना भी उन्हें नागवार गुजरता है, उसे यह देख-सुनकर अच्छा नहीं लगता पर वह यह समझ पाने में असमर्थ है कि उन्हें किस बात का दुःख है ? नन्हे के फाइनल एग्जाम इसी महीने यानि फरवरी में हैं, वह वहाँ व्यस्त है, घर एकदम चुपचुप सा लगता है जैसे यहाँ कोई रहता ही न हो. आज सुबह उसने माँ-पिता से बात की वह उसके पत्र की प्रतीक्षा करते रहे, और पता नहीं कहाँ उसके दो पत्र रास्ते में ही गुम हो गये.




Sunday, August 4, 2013

कितने आदमी थे ?


आज सरस्वती पूजा है, नन्हे का स्कूल बंद है, कल शाम जब वह स्कूल से लौटा तो उसका एक जूता जो पहले से क्रैक था ज्यादा फट गया था, उसने अपनी सखी से कहा है वे लोग उन्हें भी बाजार ले जायेंगे. कल शाम जून का फोन आया, वे खुश थे, अपने मित्र के यहाँ से किया था फोन , जरुर उन्हें भी उसकी आवाज ख़ुशी भरी लगी होगी, कभी-कभी उसे स्वयं पर आश्चर्य होता है कब वह धीरे से मोह से बाहर निकल कर स्वयं पर आश्रित होना सीख गयी, उसे स्वयं ही पता नहीं चला. जून का साथ अब मात्र उसके आश्रय के लिए नहीं चाहिए बल्कि इसलिए कि उसका साथ जिन्दगी को और कई अर्थ देता है, और उसे सामान्य देखकर नन्हा भी पहले की तरह पापा को याद नहीं करता है, पहले अक्सर उदास हो जाया करता था. कल उसे हिंदी प्रतियोगिताओं में मिले पुरस्कार, हाथ में मिले और हिंदी पढ़ाने के लिए मानदेय भी. जून के एक मित्र आकर दे गये.

४७वां गणतन्त्र दिवस ! सुबह टीवी पर परेड देखी, दोपहर को वे साइकिल से एक मित्र के यहाँ गये, चार बजे लौटे. उनके साथ टीवी पर शोले फिल्म देखी, उसने सोचा शायद जून ने भी देखी हो. पहले उसे लग रहा था शायद इस बार वह इस फिल्म को इतना पसंद नहीं करेगी पर नहीं, हर बार देखने पर भी उतनी ही अच्छी लगती है., फिर छब्बीस जनवरी का मूड और उसकी सखी ने खाना भी बहुत अच्छा बनाया था, टमाटर आलू की सब्जी, पूरी, मटर-पुलाव और बेक्ड मिक्स्ड वेज ! नन्हे ने भी शौक से देखी, उसे एक सीन न देख पाने का अफ़सोस था, कितने आदमी थे ? उस वक्त वे घर के रास्ते में थे.  घर आकर उसने बाकी की फिल्म देखी. और अब रात हो गयी है, कल नन्हे के दो टेस्ट हैं, जिनकी तैयारी वह कर चुका है, समाचारों में जयपुर और मणिपुर में हुए बम विस्फोटों के बारे में सुना, जैसे किसी ने फूले हुए गुब्बारे में पिन चुभा दिया हो. सुबह परेड देखते वक्त और देश भक्ति के तराने सुनते वक्त धमाकों और विस्फोटों की बात कैसे भुला दी, सच्चाई यह भी है और सच्चाई वह भी थी.

आज यहाँ धूप में बैठे हुए उसे सन्नाटे से उपजी अनोखी शांति का अनुभव हो रहा है, ‘इंडिया२४ऑवर’ में सुना था, जब मन शांत हो तो जिसका चित्रण करें या देखें उसमें सच्चाई होती है, जब वस्तुओं के देखने का अर्थ मात्र उन्हें देखना नहीं बल्कि महसूस करना हो. आजकल एक बूढ़ा व्यक्ति उनके यहाँ आकर पेड़ से आंवले ले जाता है, परसों वह बोरी भर के आंवले ले गया था और आज फिर आ गया, उसने कहा पहले थोड़ा सा काम करो बगीचे में तब आंवले ले जाओ. वह मान गया है. आज सुबह उसने ‘जागरण’ में सुना, ‘सुख लेने की वस्तु नहीं है देने की है. और दुःख भोगने की वस्तु नहीं बल्कि विवेक का उपयोग करते हुए पार निकलने की चीज है’. उसने सोचा जून इस समय बस में होंगे. घर तथा उनके बारे में सोचते हुए..




Wednesday, December 19, 2012

कैरम का खेल



जून आज सुबह जल्दी चले गए, देर रात तक लौटेंगे, सो दोपहर वह और नन्हा उन्हीं दूर की रिश्तेदार के यहाँ गए, बहुत सी बातें हुईं, अच्छा लगा वहाँ, नन्हा तो पूरा वक्त खेलता ही रहा. वहाँ एक और परिचिता मिल गयीं, जो वापसी में अपने घर ले गयीं, जिसमें उन्होंने अभी-अभी शिफ्ट किया है. घर लौटते-लौटते चार बज गए थे, उसे थोड़ी थकान हो रही थी पर नन्हा, गजब का स्टेमिना होता है बच्चों में, इतना खेलने के बाद भी शाम को खेलने के लिए तैयार हो गया. खेल कर आया तो होमवर्क करने बैठ गया, तभी उसकी एक बंगाली मित्र आ गयी मिलने, यानि पूरा दिन ही व्यस्तता में बीत गया. अकेलेपन का अहसास ही नहीं हुआ, पर वह नहीं हैं यह बात तो याद आती ही है हर बात में...वह इतना ख्याल रखते हैं उन दोनों का कि...कल ‘बंद’ है गणतंत्र दिवस के कारण, यहाँ छब्बीस जनवरी हो या पन्द्रह अगस्त यही होता है. टीवी पर ही देख पाएंगे झंडा आरोहण वे लोग.

रिपब्लिक डे ! आज एक अनूठे उत्साह से मन ओत-प्रोत है. जून और उसने साथ-साथ परेड देखी, यूँ उन्हें इतना शौक नहीं है टीवी देखने का, सारे काम निपटाते रहे, ताकि वह आराम से परेड देख सके. सुबह की चाय, गाजर का हलवा, और दोपहर का पुलाव भी बनाया, उसने बस तैयारी भर की. दोपहर को धूप में अलसाये भी. पिछले दिनों वह सोच रही थी कि अब उन्हें एक-दूसरे की कमी पहले की सी नहीं खलती, पर मूड की बात होती है और यह कोई ऐसी बात नहीं है जिसके लिए कोई हार्ड और फास्ट नियम बनाएँ जा सकें, कभी-कभी मन अपने आप ही व्याकुल हो जाता है और अक्सर ऐसा नहीं होता, यह भी सच है. विवाह के छह वर्ष भी तो गुजर गए हैं लेकिन साथ रहना कितना भला लगता है यह बात और है कि कभी-कभी रात को नींद नहीं आती...आजादी याद आती है...उसे लगा यह क्या लिखती जा रही है...कल वह चले जायेंगे और फिर अकेले रहना होगा. आज की फिल्म महानंदा ठीक सी ही थी पर देखी हुई थी, सो वे कैरम खेलने लगे. सोनू ने कल उनके किसी बात पर झगड़ने पर कैसे मासूमियत से कहा, अब मुझ पर असर पड़ेगा ! पूछा, किस बात का असर...तो बोला, आपके बोलने का, उसने कभी सुना होगा माँ-बाप की लड़ाई का असर बच्चों पर पड़ता है..कितना भावुक है वह और कितना प्यारा भी...परसों उसका टेस्ट है, तैयारी तो ठीक है..देखें क्या करता है.

इतवार है आज, जून दोपहर को ही चले गए, नन्हा सो रहा है और वह कुछ सोच रही है. परसों बालकवि बैरागी की कविता- सड़कों पर आ गए अंगारे.. बहुत अच्छी लगी थी. दिक्कत यह है कि कविता की लाइनें उसे याद नहीं हैं पर भाव अच्छी तरह से याद हैं, गोविन्द व्यास भी अच्छे रहे, और शरद जोशी थोड़ा कम जितनी उनसे उम्मीद थी..पर विचार बहुत अनूठे थे उनके भी. अनजान कवयित्री बस यूँ ही सी थी एक शेर को छोड़कर बाकी तुकबंदी थी. गाँधी जी के सपनों का जहान भी ठीक था पर उसे लाएगा कौन ? इन कवियों की बातें लोग (उस  जैसे) रात को सुनते हैं और सुबह भूल जाते हैं, दिल को अच्छी लगती हैं, भाव जगाती हैं, सहलाती हैं, प्रश्न करती हैं, बस यही तो काम है कविताओं का..उसने कविता लिखना क्यों छोड़ दिया ? क्या अब वह नहीं लिख सकती..या पहले भी जो लिखा करती थी वह तुकबंदी ही थी..वह लिखे किस पर...हर रोज बढ़ते अपने मोटापे पर...चाह कर भी व्यायाम न करने की अपनी दुर्बलता पर..यूँ ही व्यर्थ होते समय पर पर या बढ़ती हुई उम्र पर, सोनू के नन्हें सवालों पर या...इस खालीपन पर...अपने मन की उर्जा को यूँ ही से कार्यों में खर्च करने पर...अपने नेह की गर्मी को बातों की गरमी में बदलने पर ...खैर इस तरह तो लिस्ट बहुत लम्बी हो सकती है.
कल शाम को चिक्की बनाने की कोशिश की, थोड़ी सी बनाई और जब खायी तो..शायद उसके बाद पानी भी पिया होगा या फिर किसी और वजह से ही उसका गला खराब हो गया है, सुबह सोकर उठी तो आवाज जैसे फंस रही थी. जून का फोन आया, वह कल आने वाले हैं, बताया तो शाम को ही वह आने को तैयार थे पर उसने मना कर दिया, थोड़ी सी खराश ही तो है, ठीक हो जायेगी.
आज सुबह उठी तो सबसे पहले बोलना चाहा, एक शब्द भी नहीं सुनाई दिया कानों को, उसकी आवाज तो बिलकुल ही बंद हो गयी लगती है, जून अगर कल ही आ जाते तो अच्छा रहता लेकिन वह शाम को आएंगे, उसकी समझ में नहीं आ रहा है की क्या करे, सिर में भी दर्द है, नन्हा कह रहा है डिस्प्रिन लेने के लिए.

जून कल शाम आ गए थे पर काफी इंतजार कराया, सिर दर्द बढता गया और फिर जो अक्सर ऐसी में होता है खाया-पिया बाहर, गला बंद, लेकिन जून ने आते ही इलाज शुरू कर दिया. दिन भर के थके होने के बावजूद. कार की सर्विसिंग कराते हुए आए थे, काफी वक्त लग गया और फिर उसकी चिंता भी थी. एक प्रशिक्षित नर्स की तरह उसकी देखभाल करते रहे. आज सुबह वे अस्पताल गए पांच तरह की दवाएं दी हैं डॉक्टर ने. फेरिनजाईटिस शायद यही नाम है उसकी बीमारी का.

The happy and sad years  यह उपन्यास वह तीन-चार दिनों से पढ़ रही है पर अब पढ़ा नहीं जा रहा आँखों में दर्द होने लगा है, उसकी नायिका अजीब जीवट की लड़की है, ऐसे लोग कम ही होते हैं दुनिया में. Susannah Curtis का यह नॉवल उन्होंने कोलकाता में फुटपाथ से खरीदा था मात्र दस रूपये में. जिस हरे पेन से वह लिख रही थी वह ठीक से नहीं लिख रहा था और यह काला पेन भी उससे बेहतर तो नहीं है उसकी डायरी लाल, हरे, नीले, काले रंगों से भरती जा रही है.


Saturday, October 27, 2012

छब्बीस जनवरी



सुधा मैडम से उसने कह तो दिया कि पता पास होने से ट्यूटर घर पहुंच जायेंगे पर..कितनी मुश्किल हुई होगी उन्हें घर ढूँढने में, शायद मिला भी न हो, आज आयेंगी तो पता चलेगा या फिर पाल मैडम से..वह भी क्या सोचेंगी न..कल रात भर परेशान रहा मन, वही कालेज के सपने...सिन्हा मैडम आयी हैं हमारे घर पर, वही जो बात बात पर इतनी परेशान हो जाती हैं. उन्हें चाय देने में इतनी देर लग रही है, पहले गुड़ की चाय बनाती हूँ और फिर प्लेट भी साफ नहीं है और टूट गयी है..किसी बात को लेकर मन कैसे बेचैन हो जाता है, हम बेबस हो जाते हैं उसके सामने, सोचने की कोशिश करती हूँ कि कुछ और सोचूं पर सिर के दोनों और की शिराएँ..जैसे लगता है कुछ दबा रहा है सिर को. भविष्य में कभी ऐसा काम नहीं करेंगे...कि किसी टीचर से वादा कर दिया हम आपका यह काम कर देंगे. उसने खुद से कहा इतना परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, ईश्वर सहायता करेंगे और सब ठीक होगा...और सब ठीक हो गया, ट्यूटर मैडम के घर गया था और बात लगभगतय हो गयी. कल मैडम ने गणित का लेसन प्लान दुबारा लिखने को कहा. नन्हे को आज उसने बहुत दिन बाद डांटा ठीक से भोजन न करने के कारण.
जून का पत्र आया है, जल्दी-जल्दी लिखने पर भी इंतजार करना ही पड़ता है उन दोनों को, बड़ी ननद का भी, और छोटी बहन का भी, सो जवाब देने को तीन पत्र हो गए हैं, जब भी समय मिला, लिखेगी. कल एक नई जगह जाना है पढ़ाने ठीक से उसे रास्ता भी पता नहीं है, पर पहुंच ही जायेगी. अभी चार्ट बनाने का काम शेष है, माह के अंत में परीक्षा होते ही सारी व्यस्तता खत्म हो जायेगी. नन्हे को हेयरकट के लिए ले गयी थी, दस रूपये लिए, उसे ज्यादा लगे, अगली बार जायेगी तो पूछेगी. आज टीचर ने इंटरनल असेसमेंट किया कक्षा का..देखें क्या परिणाम आता है, कुछ भी हो उसे पता नहीं क्यों अब उतनी उत्सुकता नहीं है जैसे पहले हुआ करती थी.
जून के तीन पत्र आये हैं स्नेह से भरे हुए..छोटे भाई का पत्र भी आया है. कालेज गयी थी पहले पढ़ाने फिर अपने, काम थोड़ा सा था पर समय काफी लग गया, चुम्बक मिल गया जो उसे विज्ञान की कक्षा के लिए चाहिए था.
छब्बीस जनवरी इस बार कितनी चुपचाप आयी और जाने भी वाली है, सुबह बिजली न होने के कारण परेड भी नहीं देख सकी. फिर नन्हे को लेकर कालेज गयी वहाँ झंडा आरोहण देखकर कुछ अच्छा लगा..इस समय चित्रहार आ रहा है पर आवाज इतनी तेज है कि.. जैसे लाउडस्पीकर बज रहा हो, एक भी गीत गणतन्त्र दिवस से जुड़ा हुआ नहीं है. जैसे ऊटपटाँग गाने हैं वैसे ही दृश्य.


Tuesday, July 10, 2012

कहाँ से आये शक्कर पारे


पिछले तीन दिन वह व्यस्त रही, जून का दफ्तर बंद था, परसों शनिवार था फिर इतवार और सोमवार को गणतन्त्र दिवस. शनि की शाम वे किन्हीं परिचित के यहाँ गए, बहुत सुंदर लगा उनका घर, सजा-सजाया घर था, एक-दो माह बाद वह भी अपने घर के लिये कुछ कलात्मक वस्तुएं खरीदेगी उसने सोचा. इस समय वही पहले की सी शाम है, नन्हा सोया है और जून घूमते हुए लाइब्रेरी गया है. उसी दिन उन्होंने आलू चिप्स बनाये थे, अब तो पूरी तरह सूख गए हैं. सोनू उठकर नीचे कालीन पर बैठ गया है, ठंड कुछ बढ़ गयी सी लगती है, उसको मोज़े पहनाने हैं, टोपी वह पसंद नहीं करता. मुँह से कैसी-कैसी आवाजें निकलता है, बहुत तरह की आवाजें, बच्चे जाने किस मस्ती में रहते हैं. जून ने आज उसे चार बेर लाकर दिए, पहले खट्टे फिर कसैले लगते हैं.

संध्या के सवा पांच बजे हैं, जून रोज की तरह टहलने गए हैं और नन्हा भी किसी स्वप्नलोक में विचरण कर रहा होगा. वह लिखने बैठी है दिन भर की कुछ घटनाएँ. सुबह सामान्य थी, उनके किचन गार्डन में गाजर की फसल बहुत अच्छी हुई है इस बार, पड़ोसन को देने गयी, वह कुकिंग प्रतियोगिता में भाग लेने वाली थी पर देर से पहुंचने के कारण भाग नहीं ले पायी. दोपहर को जून के जाने के बाद उसने कुछ देर स्वेटर बनाया नन्हें के साथ खेला, फिर वह अपना भोजन करके सो गया तो किचन साफ किया, फिर कुछ देर को सो गयी. दोनों उठे तो सवा दो बजे थे, तैयार होकर बाहर घूमने निकले, सोचा टैटिंग का कोई नया डिजाइन लेगी अपनी मित्र से, पर धागा खत्म हो गया था. असमिया मित्र के यहाँ गयी जिसका बेटा नन्हें से मात्र एक माह बड़ा है. वापस आयी तो देखा एक पैकेट पड़ा है, सोचा कोई सब्जी रख गया होगा शायद उनका ही माली. पर आये हैं शक्करपारे और नमकीन, पता नहीं कौन रख गया है. जून और वह अपने सभी परिचितों के नाम गिन चुके हैं. किसी के भी इस तरह का पैकेट रख जाने की सम्भावना नहीं दिखती. 
क्रमशः