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Tuesday, February 12, 2019

काले और हरे अंगूर



सुबह के साढ़े नौ बजे हैं. दिल्ली आये दूसरा दिन है. कल दोपहर साढ़े ग्यारह वे घर से निकले, फ्लाईट समय पर थी. जून रास्ते में ही उतर गये यानि गोहाटी में. वह शाम को दिल्ली पहुंची, बड़े भाई लेने आये थे. कार पार्क जोन में वह मिले, उन्हें उसकी वजह से कार छोड़कर आना पड़ा, थोड़ी सी परेशानी हुई पर जल्दी ही वे घर पहुंच गये. रात्रि भोजन मंझली भाभी के यहाँ किया, वापस आते-आते देर हो गयी थी. भतीजी ने अपने विवाह की तस्वीरें दिखाईं एक वीडियो भी. भाई सोसाइटी के दफ्तर में काम करते हैं, उन्होंने बताया लोगों के बिल बनाने के लिए उन्होंने एक तकनीक बनाई है, जिसमें वर्ड में बनाये फॉर्म में एक्सेल से डाटा अपने आप ट्रान्सफर हो जाता है. हो सकता है यह विधि मृणाल ज्योति में वे काम में ला सकें. रात को सांख्य शास्त्र सुना और सुबह ओशो को. ज्ञान के बिना मन तूफान में डोलती नैया की तरह डांवाडोल ही रहता है. ज्ञान जैसे एक लंगर का काम करता है जिसके सहारे नाव स्थिर हो जाती है. सुबह वे दूर तक घूमने भी गये, तापमान १०-१२ डिग्री रहा होगा, लेकिन अनेक लोग पार्कों में निकले हुए थे. वापस आकर चाय पी, भीगे हुए बादाम, खजूर और बिस्किट के साथ. कुछ देर धूप में बैठकर इधर-उधर की बातें कीं तत्पश्चात नहाधोकर नाश्ता. भाई द्वारा बनाया अंकुरित मूंग व मोठ का नाश्ता, फिर वह सब्जी लेने नीचे चले गये. सफाई करने व खाना बनाने दो सहायिकाएं अपना काम कर रही थीं. सामने बालकनी में धूप आ रही थी, उसने सोचा कुछ देर धूप में बैठने का आनंद लिया जा सकता है.

धूप तेज है, ऊपर छत पर धूप में बैठकर उन्होंने फलों का आनंद लिया. घर में गमले में उगा अमरूद, पपीता, काले व हरे अंगूर तथा केला. सभी फल मीठे व रसीले. आज सुबह वह दिल्ली से पिताजी से मिलने आ गयी है. ट्रेन समय पर थी, छोटा भाई डिब्बे में ही आ गया था. सामान लेकर प्लेटफार्म से सीढ़ी चढकर वे बाहर निकले. अकेले आने पर भाइयों का सहयोग मिलता है निस्वार्थ और स्नेह भरा. स्टेशन से घर आते समय भाई ने मिठाई व फल खरीदे.

रात्रि के दस बजे हैं. भाई-भाभी एक विवाह समारोह में शामिल होने गये हैं, पिताजी अपने कमरे में सोने चले गये हैं. घर में शांति है आज, कल रात पिताजी का ट्रांजिस्टर भी चल रहा था और नीचे तेज आवाज में टीवी. शाम को पुरानी तस्वीरें देखीं, उससे पूर्व नाद-ब्रह्म ध्यान किया. दोपहर को चचेरा भाई आया था, अकेला रहता है और अपना ध्यान जरा भी नहीं रखता. पैरों-हाथों पर मैल जमा था, उसे गर्म पानी व साबुन दिया. पिताजी ने कहा, सेवा का मौका दिया है उसने, करनी चाहिए. उसे हर बार यानि हर महीने आने के लिए कहा. सुबह पिताजी के साथ टहलने गयी बॉस थोड़ी सी दूर. उनमें जरा भी आलस्य नहीं है. हर समय काम करने को तत्पर हैं, चलने में दिक्कत होती है पर खुद के लिए बॉर्नविटा लेने खुद जाते हैं. कल भी उनके साथ टहलने जायेगी. उसके बाद छोटी भाभी के साथ बाजार गयी. दो छोटी लडकियों के लिए उपहार खरीदने थे. भाभी के माँ-पिता के विवाह की स्वर्ण जयंती पर लिखी कविता का प्रिंट लिया. जून ने इसमें दूर से ही सहायता की. दोपहर को ओशो की पुस्तक पढ़ी. छोटा भाई ओशो के प्रवचन सुनता है और बैठे-बैठे कहीं खो जाता है, वह भाव समाधि में रहता है, सदा होश्पूर्ण विश्राम की स्थिति में !  

Thursday, March 30, 2017

नीली आँखें


आकाश में सुबह से बदली बनी है. जून अभी तक घर नहीं आए हैं. हवा बह रही है. वह बाहर झूले पर बैठी है. आज शाम वे कई हफ्तों बाद ध्यान-कक्ष में ही सत्संग करने वाले हैं, तैयारी हो गयी है. प्रसद रूप भोजन भी बन गया है. आज नेट नहीं चला, सो कोई पोस्ट नहीं डाल पायी. नई कविता भी नहीं लिखी है, अन्य कवियों की कविताएँ पढ़ रही है, सभी के भीतर कितने सुंदर भाव उठते हैं, सभी तो एक ही चेतना का अंश हैं. अब अपना-पराया कुछ भी महसूस नहीं होता. खुद लिखे, ऐसा भी मन नहीं होता. जो हो रहा है, वही हो..जो परमात्मा चाहे वही हो !

बापू कहते हैं, सूधे मन से, सूधे वचन से तथा सूधी करतूती से उर में प्रेम का जन्म होता है. प्रेम में कोई नियम नहीं होता. “हरि देखा सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रकट होए मैं जाना” हृदय में यदि प्रेम प्रकट हो तो ही परमात्मा प्रकट होता है, पर वे उसको पहचान नहीं पाते. भीतर इतने अशुभ संस्कार रहते हैं कि वे उसे महत्व ही नहीं देते. प्रेम जब निरंतर बढ़ता ही रहे तो ही वह परमात्मा उनके अनुकूल होगा अर्थात वह उसे पहचान पाते हैं. प्रेम को निरंतर बढ़ना ही चाहिए, नित-नित बढ़े वही प्रेम है ! अकबर ने अपने नवरत्नों से एक बार पूछा था, अल्लाह की जाति क्या है, रंग क्या है, अंग कैसा है, जवाब मिला इश्क अल्लाह की जाति है, इश्क अल्लाह का रंग और वह इश्क से ही बना है ! उनकी कथा आ रही है, “सब सोच विमोचन चित्रकूट, कलि हरण करण कल्याण कूट”. कल रात एक अनोखा स्वप्न देखा. छोटी बहन का परिवार है, जून और वह है. एक उपकरण बनाया है दोनों के पतियों ने, वे उसे दोनों ओर से पकड़े बैठे हैं और वह फोटो खींच रही है. तभी अचानक जून का चेहरा गोरा हो जाता है, नीली आँखें, उसकी इस बात पर कि यह तो फ्रेंच है, छोटी बहन के पतिदेव कह उठते हैं मैं जर्मन हूँ, उसका भी चेहरा बदल जाता है. जरूर किसी पूर्व जन्म का स्वप्न होगा.

बायीं आँख में उपर की पलक के पास हल्का दर्द है, जून ने फोन किया वे उसे डाक्टर के पास ले जाने आयेंगे अभी कुछ देर में. आज धूप तेज है, मौसम हर रोज अपना मिजाज बदलता है. अगले महीने वे उसे गोवा ले जायेंगे, वे एक हफ्ता वहाँ रहेंगे. अब लगता है भीतर परम विश्राम मिला है. तन की अवस्था कैसी भी हो मन सदा एकरस बना रहता है. परमात्मा जैसे अपनी याद खुद दिलाता रहता है. जून को पिछले चार-पांच दिनों से सर्दी लगी है. एक दिन उनके भी जीवन में ध्यान आये, ऐसी ही प्रार्थना उसकी प्रभु से है, नन्हे को भी ऐसा ही विश्राम प्राप्त हो. जीवन का परम लक्ष्य यही है, एक ऐसी अनवरत शांति और आनंद का स्रोत उनके भीतर है, जो उनका अपना है, उस तक उनकी पहुंच हो.

अगस्त का अंतिम दिन ! मौसम सुहाना है, वर्षा के कारण सभी कुछ स्वच्छ और आकाश में पूर्णिमा का चाँद बहुत बड़ा सा ! अभी कुछ देर पहले वे लॉन में टहलकर वापस कमरे में आये हैं. जून की तबियत बेहतर है. नन्हा आजकल बहुत व्यस्त चल रहा है. कल बड़े भांजे को भी हॉस्टल शिफ्ट करना है, उसके घर में ही ठहरा है. नूना का मन शांत है, अब अपने घर का पता मिल गया है, एक पल लगता है उसमें जाने में ! 

Friday, June 3, 2016

आत्मा नर्तकः


आज सुबह गुरुकृपा का बादल बरसा. कैसा अनोखा अनुभव था, सारे संदेह मिट गये. आत्मा की कैसी स्पष्ट अनुभूति ! मन, बुद्धि, चित्त व अहंकार से परे अपने सही स्वरूप की प्रतीति हुई, ऐसा लगा जैसे एक पर्दा हट गया हो. कृतज्ञता के अश्रु झलक आये, फिर झरनों की सी खिलखिलाहट भी भीतर भर गयी. शरीर पृथक है, प्राण पृथक है, वे साक्षी स्वरूप आत्मा हैं, चैतन्य शक्ति हैं जो शांति स्वरूप है, आनन्द व सुख स्वरूप है, पावन है, दिव्य है, सारे अवगुणों की सीमा जहाँ समाप्त हो जाती है, सारा अज्ञान मिट जाता है, वहाँ उस प्रकाश पूर्ण सत्ता का आरम्भ होता है. सदियों से जन्मों से मन जिस अंधकार में भटक रहा था वह जैसे नूर मिलते ही छंट गया है, अब कोई भ्रम नहीं रहा, कोई कामना नहीं रही, कोई वासना नहीं रही, अब शेष है तो केवल एक चिर स्थायी शांति जो आनंद से भरी है, अनोखी है यह अवस्था ! सारा अतीत जैसे किसी और के साथ घटा था, वह कोई और था, इसे ही सद्गुरू मृत्यु कहते हैं, वह जो व्यक्ति पहले था उसकी मृत्यु हो गयी यह जो व्यक्ति अब है यह बिलकुल ही नया है, समय से पूर्व कुछ नहीं होता. पकते-पकते मन झर गया है, अब इस देह से जो भी होना है, वह परमात्मा के द्वारा ही होना है, क्योंकि वह तो अब है ही नहीं ! जन्म जन्मांतरों के गुनाह योग अग्नि में जल जाते हैं, भीतर गहराई में जो ज्ञान छिपा है तभी बाहर आता है जब गुनाहों की, विकारों की परतें जल जाती हैं, तब वे पहली बार विश्राम को उपलब्ध होते हैं !  

आज पुनः क्रिया के बाद अनोखा अनुभव हुआ, परमात्मा के साथ अपनी एकता का अनुभव ! बचपन से किये गये सारे दुष्कृत्य एक-एक कर याद आए और माया के प्रभाव में किये वे सारे कर्म एक साथ ही जल गये. मन हल्का हो गया है कोई अतीत रहा ही नहीं, जो कुछ भी उनसे अज्ञान दशा में होता है, ज्ञान मिलते ही उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता, तभी संत कहते हैं कि इस संसार में अन्याय जैसा कुछ भी नहीं, सभी न्याय है. पिछले जन्मों के भी कई अनुभव पिछले कुछ महीनों में हुए. अस्तित्त्व हर क्षण उन पर नजर रखे है, वह चाहता है कि जीव उसके साथ एक हो जाये. भीतर एक पुलक भर गयी है. गीत और नृत्य सहज ही होने लगते हैं. सभी के भीतर यही आनंद छिपा है, सभी एक न एक दिन इसी आनंद को अनुभव करेंगे. अभी वे स्वयं को मन, इन्द्रियों के घाट पर पाते हैं, उड़ने का तरीका नहीं जानते. चिदाकाश में उड़े बगैर ही वे इस दुनिया से चले जाते हैं. मन्दिर मस्जिद भी लोग जाते हैं तो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए !

चेतना नित नूतन है. पल-पल बदल रही है. जो घड़ी अभी आई है वह न पहले कभी थी न आगे कभी आएगी, फिर भी वह अनादि है. कितना सुंदर है यह ज्ञान ! परमात्मा सर्वव्यापक है, वह सर्वकालिक है, सर्वदेशीय है, इस क्षण भी वह उन्हें घेरे हुए हैं, कैसी पुलक उठ रही है !


सद्गुरु के प्रति अहोभाव से मन भर गया है. जिनको न कुछ पाने को शेष रह गया ही न कुछ करने को, वही संत जन अहैतुकी कृपा या सेवा कर सकते है. वे जो कुछ करते हैं वह आनंद के लिए,  जिसे वह मिल गया हो अब उसके लिए कुछ पाना शेष नहीं रहता ! प्रतिपल उनका मन आनन्द की खोज में लगा रहता है, ऐसा आनंद जो अनंत राशि का हो तथा जो कभी न छिने न. जिन्हें वह मिल गया उन्हें कुछ करने को शेष रहता नहीं, लेकिन फिर भी वह करते हैं, क्योंकि वह अन्यों को आनंद देना चाहते हैं ! वे केवल कृपा करते हैं, अकारण हितैषी होते हैं, सुहृद होते हैं !

Wednesday, February 6, 2013

जगजीत सिंह की गजल



नन्हा आज स्कूल नहीं गया, कितना उदास था, चुपचाप आँखों से आंसू गिर रहे थे, इतने छोटे बच्चे को इस तरह चुपचाप रोते नहीं देखा उसने कभी, उसको टेस्ट की चिंता थी, जो शायद आज होता भी नहीं, सुबह से दो-तीन बार टायलेट गया तो उसे चिंता हो गयी, स्कूल नहीं भेजा, सेंट्रल स्कूल में टायलेट गंदे हैं, पानी भी नहीं रहता, यह सब नन्हे ने ही तो बताया था, अभी तक तो ठीक है वह, खेल रहा है, स्कूल उसके लिए बहुत आवश्यक है, उसका दिल स्कूल में रहता है. फिर भी बच्चा आखिर बच्चा है, जितनी जल्दी उदास होता है उतनी ही जल्दी भूल भी जाता है. कल छोटे भाई का पत्र मिला, अब वह खुश है ऐसा उसके पत्र से लगा तो है. कल रात उसे नींद नहीं आ रही थी, पिछले कई दिनों से घर में काम चल रहा है, घर दिन भर पूरा खुला रहता है, रात को नन्हे को सुलाने के लिए जल्दी-जल्दी काम निपटा कर वे सोने आ जाते हैं, कभी कभी ज्यादा थकन भी विश्राम में बाधा बनती है.

सितम्बर का एक दिन बीत गया है कल और पिछले तीन-चार दिनों से डायरी नहीं खोली, जून का दफ्तर बंद था, और नन्हे का स्कूल भी, वे डिब्रूगढ़ गए थे. जगजीत सिंह की गजल आ रही है-
“खत लिखते कभी और कभी खत को जलाकर तनहाई को रंगीन बना क्यों नहीं लेते
तुम जग रहे हो मुझे अच्छा नहीं लगता चुपके से मेरी नींद चुरा क्यों नहीं लेते”

जो कुछ वह सोचा करती है अक्सर कोई काम करते समय या रात को जब नींद नहीं आ रही होती है वह सब लिखते समय याद क्यों नहीं आता है. एक उड़ता-उड़ता सा विचार मन में रहता है कि उसे एक स्कूल खोलना है गरीब बच्चों के लिए, उन्हें पढाना है, लेकिन यह विचार मात्र ही है, कैसे होगा यह इसके बारे में सोचा ही नहीं, जून को कहने से उनकी प्रतिक्रिया अनुकूल तो नहीं होगी, कहेंगे, समय कहाँ है ? जगह कहाँ है? और न जाने कितने सवाल जिनका उत्तर वह नहीं दे पायेगी.

क्यों नहीं दर्द फूट पड़ता
अगर कोई दर्द सचमुच है कहीं
नम कर दे आँखों को अंदर ही अंदर
क्यों नहीं कोई खुशी छलक उठती
अगर कोई खुशी सचमुच है
रोशन कर दे जो भीतर बाहर
क्यों नहीं कोई गीत उग आता
अगर कोई गीत सचमुच है
रसमय कर दे जो अंतर
क्यों नहीं कोई स्वप्न सजता
अगर कोई स्वप्न सचमुच है
एक कर दे जो बिछुड़े हुओं को

शब्दों की कमी क्यों खटकती है
थी पहले विचारों की, क्यों है ऐसा कि
जब यह है तो वह नहीं...वह है तो..

उसने कल एक कहानी पढ़ी, दो मित्रों की कहानी..जिनमें शत्रुता हो जाती है, शत्रु बनने के लिए पहले मित्र बनना ही पड़ता है, गलतफहमियों की दीवार अपनों के बीच ही तो खड़ी हो सकती है, अनजानों के मध्य तो नहीं...जितनी जल्दी यह गिर जाये उतना ही अच्छा ये बात दोनों ही चाहते हैं, क्योंकि शत्रुता ओढ़ी हुई है, चुभती है, भीतर मित्रता का सरवर बह ही रहा है, उसकी याद अभी ताजा है. पहले की दोस्ती याद आती है, एक को चोट लगती थी तो दर्द दूसरे को होता था, अब एक दूसरे की तरफ से उदासीन हो गए हैं, लेकिन यह उदासीनता कब तक टिकेगी...जब प्रेम नहीं टिका जो दैवीय गुण है तो शत्रुता कब तक टिकेगी..कहानी का अंत सुखद था. गलतफहमियां गिर जाती हैं और फिर दोनों एक हो जाते हैं एक बार फिर झगड़ने के लिए शक्ति जुटाने के लिए...शायद यही जीवन है.




Friday, September 14, 2012

इतवार की सुबह



ग्यारह बजने में बीस मिनट, सुबह छह बजे उठने के बाद अब एक मिनट हुआ, बैठी है, डायरी लिखने का बहाना है, पैर कुछ विश्राम चाहते हैं और मन भी एक जगह रुक कर कुछ सोचना चाहता है. आज शायद जून का पत्र आये. कल दोपहर और फिर शाम को कितने घंटे व्यर्थ किये, स्वेटर का गला बनाने में, पर अभी तक नहीं बना है, उसे तो पूरा करना ही है, उसके बाद जो गणित की किताबें ली हैं, उन्हें देखना है. सोनू दादाजी के साथ आटा लेने गया है.

सुबह के साढ़े सात बजे हैं, नन्हा सोया है. सो उसे वक्त है कि दिन की शुरुआत करते हुए कुछ सोच सके. नीचे कमरे में एक तो गर्मी थी, दूसरे पडोस में टीवी की आवाज व्यवधान उत्पन्न कर रही थी, सो यहाँ उपर आ गयी है. यहाँ ठंडी हवा (धूल भरी ) आती है, यहाँ उनका बालकनी कम बाथरूम है, इस घर में इतनी समस्याएं हैं पर माँ-पिता ने कभी सोचा ही नहीं कि इसे बदला जाये. जिंदगी के चालीस साल इसी घर में गुजार दिए. माँ की तबियत ठीक नहीं है, उसे तो लगता है उनके तन की अस्वस्थता मन की ही छाया है, पर कौन समझा सकता है उन्हें. जब तक वे खुद न चाहें, वः कुछ करना ही नहीं चाहतीं, उदासीन हो गयी हैं सबसे, पर ऐसे कब तक जिया जा सकता है. वास्तविकता की दुनिया में जितनी जल्दी लौट आयें उतना ही अच्छा है. कल जून का पत्र आया वह उदास है कि उसे उनके पत्र नहीं मिल रहे हैं, पता नहीं क्यों. सुबह का एक कप दूध अभी पिया उसने, उसे समझ नहीं आता कि सुबह से बिना कुछ लिए यहाँ लोग दस-ग्यारह बजे तक कैसे रह लेते हैं. वह पुस्तक पढ़ने बैठ गयी जो प्रवेश परीक्षा के लिए लायी थी.

फिर वही कल का सा समय है, लेकिन वह नीचे कमरे में है, कपड़े प्रेस करने के लिए चादर बिछा रही थी की ननद ने बताया, पिताजी ने ऊपर कपड़े प्रेस करने को कहा है, नीचे जो बिजली खर्च होती है, उसका बिल आता है जबकि ऊपर की बिजली फ्री है, उसे समझ नहीं आता. रात अजीब-अजीब स्वप्न देखती रही, पता नहीं इनमें कोई सार भी है या उसके मन का पागलपन है. कल सभी भाई-बहनों को पत्र लिखे.

सुबह साढ़े पांच बजे ही उठ गयी थी, छत पर टहलने गयी, सूर्योदय के समय बहुत अच्छा लग रहा था. हर जगह की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं, और कुछ खामियां जैसे हर व्यक्ति की. आज इतवार है, सुबह का मीठा दूध पीते समय उसे याद आया, जून इतवार सुबह की चाय पी रहे होंगे. कैसे बीतते होंगे उनके दिन-रात, उसकी याद तो आती होगी. नन्हे ने नीचे से आवाज दी और वह उसे लेकर ऊपर आ गयी है, कह रहा है और सोयेगा और लेट गया है, देखें कितनी देर लेटता है.