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Tuesday, February 12, 2019

काले और हरे अंगूर



सुबह के साढ़े नौ बजे हैं. दिल्ली आये दूसरा दिन है. कल दोपहर साढ़े ग्यारह वे घर से निकले, फ्लाईट समय पर थी. जून रास्ते में ही उतर गये यानि गोहाटी में. वह शाम को दिल्ली पहुंची, बड़े भाई लेने आये थे. कार पार्क जोन में वह मिले, उन्हें उसकी वजह से कार छोड़कर आना पड़ा, थोड़ी सी परेशानी हुई पर जल्दी ही वे घर पहुंच गये. रात्रि भोजन मंझली भाभी के यहाँ किया, वापस आते-आते देर हो गयी थी. भतीजी ने अपने विवाह की तस्वीरें दिखाईं एक वीडियो भी. भाई सोसाइटी के दफ्तर में काम करते हैं, उन्होंने बताया लोगों के बिल बनाने के लिए उन्होंने एक तकनीक बनाई है, जिसमें वर्ड में बनाये फॉर्म में एक्सेल से डाटा अपने आप ट्रान्सफर हो जाता है. हो सकता है यह विधि मृणाल ज्योति में वे काम में ला सकें. रात को सांख्य शास्त्र सुना और सुबह ओशो को. ज्ञान के बिना मन तूफान में डोलती नैया की तरह डांवाडोल ही रहता है. ज्ञान जैसे एक लंगर का काम करता है जिसके सहारे नाव स्थिर हो जाती है. सुबह वे दूर तक घूमने भी गये, तापमान १०-१२ डिग्री रहा होगा, लेकिन अनेक लोग पार्कों में निकले हुए थे. वापस आकर चाय पी, भीगे हुए बादाम, खजूर और बिस्किट के साथ. कुछ देर धूप में बैठकर इधर-उधर की बातें कीं तत्पश्चात नहाधोकर नाश्ता. भाई द्वारा बनाया अंकुरित मूंग व मोठ का नाश्ता, फिर वह सब्जी लेने नीचे चले गये. सफाई करने व खाना बनाने दो सहायिकाएं अपना काम कर रही थीं. सामने बालकनी में धूप आ रही थी, उसने सोचा कुछ देर धूप में बैठने का आनंद लिया जा सकता है.

धूप तेज है, ऊपर छत पर धूप में बैठकर उन्होंने फलों का आनंद लिया. घर में गमले में उगा अमरूद, पपीता, काले व हरे अंगूर तथा केला. सभी फल मीठे व रसीले. आज सुबह वह दिल्ली से पिताजी से मिलने आ गयी है. ट्रेन समय पर थी, छोटा भाई डिब्बे में ही आ गया था. सामान लेकर प्लेटफार्म से सीढ़ी चढकर वे बाहर निकले. अकेले आने पर भाइयों का सहयोग मिलता है निस्वार्थ और स्नेह भरा. स्टेशन से घर आते समय भाई ने मिठाई व फल खरीदे.

रात्रि के दस बजे हैं. भाई-भाभी एक विवाह समारोह में शामिल होने गये हैं, पिताजी अपने कमरे में सोने चले गये हैं. घर में शांति है आज, कल रात पिताजी का ट्रांजिस्टर भी चल रहा था और नीचे तेज आवाज में टीवी. शाम को पुरानी तस्वीरें देखीं, उससे पूर्व नाद-ब्रह्म ध्यान किया. दोपहर को चचेरा भाई आया था, अकेला रहता है और अपना ध्यान जरा भी नहीं रखता. पैरों-हाथों पर मैल जमा था, उसे गर्म पानी व साबुन दिया. पिताजी ने कहा, सेवा का मौका दिया है उसने, करनी चाहिए. उसे हर बार यानि हर महीने आने के लिए कहा. सुबह पिताजी के साथ टहलने गयी बॉस थोड़ी सी दूर. उनमें जरा भी आलस्य नहीं है. हर समय काम करने को तत्पर हैं, चलने में दिक्कत होती है पर खुद के लिए बॉर्नविटा लेने खुद जाते हैं. कल भी उनके साथ टहलने जायेगी. उसके बाद छोटी भाभी के साथ बाजार गयी. दो छोटी लडकियों के लिए उपहार खरीदने थे. भाभी के माँ-पिता के विवाह की स्वर्ण जयंती पर लिखी कविता का प्रिंट लिया. जून ने इसमें दूर से ही सहायता की. दोपहर को ओशो की पुस्तक पढ़ी. छोटा भाई ओशो के प्रवचन सुनता है और बैठे-बैठे कहीं खो जाता है, वह भाव समाधि में रहता है, सदा होश्पूर्ण विश्राम की स्थिति में !  

Thursday, June 14, 2018

रिश्तों का इन्द्रधनुष



साढ़े दस बजे हैं सुबह के, कुछ देर पहले ही वह बड़े भाई के साथ एक पार्क में टहल कर आई है. दिल्ली की हर कालोनी में पार्कों की सुंदर व्यवस्था है, बढ़ते हुए प्रदूषण से राहत पाने का एकमात्र सरल उपाय. ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ के पैंतीस वर्ष पूरे होने पर दिल्ली में होने वाले कार्यक्रम में सम्मिलित होने वह कल ही असम से एक सप्ताह के लिए यहाँ आई है. वे घर में प्रवेश कर ही रहे थे कि जून का फोन भी आया, वह ठीक हैं, आए दिन के टूर के कारण अब उन्हें भी अकेले रहने की आदत हो गयी है, स्वयं पर निर्भर हो गये हैं. यहाँ घर में काफी अस्त-व्यस्तता है, लगभग एक वर्ष पूर्व भाभी के चले जाने के बाद यह स्वाभाविक भी है, उनकी छाप घर के हर कोने में है, सामने ही उनकी मुस्कुराती हुई तस्वीर रखी है लगता है अभी बोल पड़ेंगी. सोच रही है सफाई का काम कहाँ से शुरू करे, या महरी के आने के बाद ही उचित रहेगा. भाई नित्य की साधना कर रहे हैं. कल रात छोटी भाभी ने डिनर के लिए बुला लिया था, वहाँ से लौटे तो कुछ देर ठंडी हवा में टहलते रहे. भाई सोने चले गये, पर उसे देर रात तक नींद नहीं आ रही थी, ‘शिवरात्रि’ को जागरण करना चाहिए यह लिखा ही है शास्त्रों में. सो देर तक ध्यान करती रही. अभी उत्सव में तीन दिन शेष हैं, परिवार के अन्य जनों से मिलने आज दोपहर को ‘घर’ के लिए निकलना है.

सुबह पांच बजे ही नींद खुल गयी. चालीस मिनट तक खुली हवा में भ्रमण किया, प्राणायाम भी, तन व मन दोनों हल्के हो गये हैं. सदा की तरह पिताजी ने सुबह ही रेडियो पर ‘विविध भारती’ लगा दिया है. कल शाम सात बजे वे यहाँ पहुँच गये थे. पिताजी, छोटी भाभी व उनके माता-पिता सभी ने स्वागत किया. ‘एओएल’ के कार्यक्रम के बारे में बातचीत हुई. आज कोर्ट में सुनवाई है. पर्यावरण को इस कार्यक्रम से खतरा है, इस बात के आधार पर जन याचिका दायर की गयी है. शाम को छोटा भाई भी आ गया, उसने पिताजी को ‘किन्डल’ दिया, भाई ने उसमें कई किताबें डाउनलोडन कर दी हैं. कल देहरादून जाना है, जहाँ दीदी व बड़ी बुआ जी रहती हैं. आज कुछ उपहार लेने बाजार जाना है.

आज सुबह भी जल्दी उठे वे. पौने आठ बजे वे घर से चल दिए. चौक तक जाने के लिए सीधी सड़क मिलेट्री की भर्ती की कारण बंद थी सो काफी घूम कर जाना पड़ा. गन्तव्य तक पहुंचने में ढाई घंटे लग गये. बुआजी के पैर का कुछ महीने पहले आपरेशन हुआ था, वॉकर के सहारे चल रही थीं. उन्होंने सुंदर वस्त्र पहने थे तथा एक शांत व सुंदर वृद्धा लग रही थीं. उनका पोता व पोती, दोनों बच्चे भी बहुत सुंदर व स्मार्ट लग रहे थे. गली भी साफ-सुथरी थी. देश में चली विकास की लहर का असर हो सकता है. वहाँ से फिर वे दीदी के यहाँ गये. छोटी व बड़ी भांजियाँ उनके दोनों पुत्र व पुत्री, बड़ी की सास तथा पति, दीदी व जीजाजी सभी ने स्वागत किया. उनके बगीचे से तोड़ा गन्ना व खट्टे-मीठे लुकाठ खाए तथा ढेर सारा पुदीना व कच्चे पपीते लेकर वे लौट आये. रास्ते में ममेरे, चचेरे व फुफेरे भाई-बहनों से फोन पर बात की. इस समय रात्रि के पौने दस बजे हैं. भाई पापाजी को ध्यान के सूत्र समझा रहे हैं. आज से कुछ वर्ष पहले वह इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि उन दोनों में आत्मीयता इतनी बढ़ सकती है. उसे अच्छा लग रहा है यह देखकर कि भाई बहुत शांत हो गये हैं तथा ध्यान करने लगे हैं. दीदी भी हर घटना के पीछे सकारात्मकता ही देखती हैं. कुल मिलाकर आज की यात्रा अच्छी रही, उसे स्वयं थोड़ा कम बोलना चाहिए, अभी भी वाणी पर संयम नहीं है. कल सुबह वापस दिल्ली जाना है.

Thursday, October 12, 2017

जीवन के बाद


आज वह अकेले ही भाई के घर जा रही है. पिछले दिनों कई यात्रायें कीं, सो यात्रा का कोई भय नहीं है. शाम को सात बजे तक भाई के घर पहुँच जाएगी. बड़ी बहन भी नौ बजे तक आ जाएँगी, ऐसा उन्होंने लिखा है व्हाट्सएप पर. अभी कुछ देर पहले मंझली भाभी ने बताया, उनकी बिटिया एयरपोर्ट पर लेने आएगी. भाई को और बहुत से काम देखने होंगे, कल उठाला है, काफी लोग आयेंगे. पंडितजी ने भी सामान की एक लिस्ट पकड़ा दी होगी. आज सुबह अलार्म सुनते ही नींद खुल गयी, पर पांच-दस मिनट उनींदा बना रहा. महसूस हुआ जैसे भाभी बातें कर रही हैं. उन्होंने कहा, वह बहुत खुश हैं और उनके लिए आंसू बहाने की जरा भी आवश्यकता नहीं है. उन्हें प्रेम से याद करना है, दुःख से नहीं (देह से मुक्त आत्मा कितना सुख अनुभव करती है इसका भी पता चला), उठी तो मन शांत था बल्कि प्रसन्न भी. कल कैसा बुझा-बुझा सा था मन दिन भर ही, जून ने ही नाश्ता व खाना बनाया. शाम का टिफिन व रात के लिए सब्जियों को भी छौंक लगा दिया. वह बहुत ही ध्यान रखते हैं. उसकी भावनाओं का बहुत ही सम्मान करते हैं. भाभी जी के जाने का दुःख उन्हें भी कम नहीं हुआ है. कल शाम को उनकी तस्वीरें निकाल कर एक कोलाज बनाया, उसने एक कविता भी लिखी थी श्रद्धांजलि स्वरूप. इतवार को वह लौटेगी. ये छह दिन जून के बिना बिताने होंगे. मोह-माया के बन्धनों से पार जो होना है ! उसने सोचा पिताजी से बात कर लेनी चाहिए. वह अपनी नाजुक सेहत के कारण नहीं आ पा रहे हैं. उन्हें वृद्धावस्था के कारण क्या तकलीफें हैं, किसी से कहते तो नहीं पर उसके कारण कहीं आ जा नहीं सकते.

सुबह के आठ बजे हैं. कल वह समय पर पहुंच गयी थी, घर का वातावरण भारी था, पर उसके कहने पर सभी ने अपने हृदय की बात कही और कुछ ही देर में भाई सहित सबके मन हल्के हो गये. सुबह कुछ मेहमान आये, फिर सब भाई मिलकर फूल चुनने गये. सफाई वाला आया तो उसे रात का बचा खाना दे दिया गया. सफाई के बाद घर ठीक लग रहा है. सुबह उसकी नींद पांच बजे खुल गयी थी. रात को साढ़े ग्यारह बजे तक नींद नहीं आ रही थी. भतीजी एक बार कमरे में आई तो उसने ट्यूब लाइट जलाई, शायद खराब है, उसने स्विच खुला छोड़ दिया होगा. भाभी जी से संवाद पुनः आरम्भ हो गया. वे हर प्रश्न का उत्तर दे रही थीं. फिर भी उसने पूछा, आप इस बात का सबूत दें कि आप यही हैं, तत्क्ष्ण बत्ती जली-बुझी फिर जल गयी. उसका मन हर्ष से भर गया. उनकी शुभकामनायें उन तक पहुंच रही हैं.


आज सुबह नींद अपने आप ही पांच बजे से कुछ पहले खुली. इस समय साढ़े आठ बजे हैं. भतीजी सो रही है, भांजी नहा रही है. मंझली भाभी ने खाना बनाने के लिए एक नौकरानी का इंतजाम कर दिया है. कल दोपहर सभी लोग नीचे हॉल में चले गये थे, फिर एक घंटा शोक सभा हुई. काफी लोग आये थे, हॉल भर गया था. दुःख की खबर सुनकर किसी से भी आये बिना रहा नहीं जाता. सभी लोग उन्हीं बातों को बार-बार दोहरा रहे हैं, जिन्हें याद करके कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है, पर उनके मन में और कुछ है ही नहीं. अतीत ही तो मन है और भावी की आशंका ही तो मन है. जब तक मन है तब तक चैन नहीं मिल सकता पर मानव इस बात को समझने में बहुत समय लगा देता है, कई जन्म भी शायद. अभी कुछ देर में वे नीचे टहलने जायेंगे. जून घर पर अकेले हैं पर वे ठीक हैं. नन्हा आने वाला था, पर अभी तक उसका कोई संदेश नहीं आया है. कुछ काम न हो तो ध्यान ही करना चाहिए, वही ठीक रहेगा, उसने सोचा.

Saturday, July 19, 2014

हिमाचल की वादियाँ



कल शाम दीदी चली गयीं, माँ की अस्वस्थता के कारण वे नहीं गये, आज सुबह उसने फोन पर उन्हें माँ के स्वास्थ्य के बारे में बताया, छोटी बहन भी यहाँ आने के लिए तैयार है पर पिता ने उसी की असुविधा को देखते हुए मना कर दिया. इस समय भाई के साथ जून भी माँ को डाक्टर के पास ले गये हैं. बच्चे यहीं पढ़ाई में लगे हैं, पिता उन्हें फल व खाखरा आदि खिला रहे हैं. आज कई दिनों बाद उसने पिता के हारमोनियम पर रियाज किया, सुबह ‘ओशो’ की एक पुस्तक में से चंद लाइनें पढ़ीं, सभी धर्मगुरू सभी धर्म एक सी बातें कहते हैं. कल रात वह काफी देर तक सो नहीं सकी, उसके बिस्तर से माँ का बिस्तर दिख रहा था वह हर पांच-दस लेटने के बाद उठ जाती थीं, उठ कर बैठतीं फिर बैठ-बैठे ही सोने लगतीं, उन्हें देखकर लगा कि उनकी तबियत काफी खराब है पर दिन में जाहिर नहीं होने देती हैं, उनकी हिम्मत देखकर रश्क होता है.

दो ही दिन हुए हैं पर लग रहा है बहुत दिनों के बाद लिख रही है. उस दिन सुबह वे हिमाचल प्रदेश के सुंदर शहर सोलन जाने के लिए रवाना हुए तो माँ का स्वास्थ्य पहले जैसा ही था. छोटी बहन वहाँ प्रतीक्षा कर रही थी सो वे चल पड़े, रास्ता आराम से कट गया. तीन बजे वे गंतव्य स्थल पर पहुंच गये. सोलन एक खुबसूरत पहाड़ी जगह है, बहन उन्हें लेने आई थी, उसने बताया, भाई का फोन आया था, माँ को अस्पताल ले जाना पड़ा है. कल ही वह भी उनके साथ घर जाएगी, वह उन्हें घर के पास की पहाड़ी पर ले गयी, दो घंटे वे पहाड़ों पर घूमते रहे, वापस आकर खाना बनाया और सुबह की वापसी की तैयारी करके सो गये.

उनके पूर्व कार्यक्रम के अनुसार आज उनका यात्रा का दिन था, पर इन्सान जो सोचता है वही तो नहीं होता. उन्हें यहाँ आये आज आठवां दिन है. कल मामी जी भी माँ को देखने आयीं, आज वापस चली गयीं. माँ अब काफी ठीक हैं पर पूरी तरह से नहीं, उन्हें अभी बहुत देखभाल की जरूरत है. जून छोटी बहन के साथ अस्पताल गये हैं, जो डाक्टर है सो उसका यहाँ होना लाभदायक है. जून और वह एक बार भी साथ-साथ नहीं गये, शायद यह इस कारण हो कि वह यहाँ आकर अपने पुराने दिनों में लौट आयी है. अपनी उम्र का भी अहसास नहीं होता. नन्हा दीदी के यहाँ गया हुआ है, उसे लेने उन्हें जाना है. शायद आज या कल. मौसम यहाँ बेहद गर्म हो गया है और बिजली चली जाने पर घुटन हो जाती है. रात को वे सोये तो छोटी बहन और उसकी बेटियां भी उनके कमरे में थीं, देर रात तक बातें कीं फिर भांजी सोये-सोये कोई स्वप्न देखने लगी या गर्मी से परेशान होकर रोने लगी. बहन को उसने कहा उसे थोड़ा स्वालम्बी बनाये पर उसने कई और बातें कहीं, जिससे यही सिद्ध हुआ कि वह वैसे ही खुश है, उसे बच्चों के रोने या जिद करने पर खीझ नहीं होती, न झुंझलाहट. वह हिम्मती तो है ही और किसी को judge करने या सलाह देने की भूल करने की सजा तो भुगतनी ही पडती है.

आज उसका जन्मदिन है, किन्तु हर वर्ष जैसी उमंग जो इस दिन स्वतः ही होती थी आज नहीं है, पिछले वर्ष वह असम में थी, सुबह-सुबह सभी ने फोन से मुबारकबाद दी थी, आज यहाँ घर पर है, छोटी बहन, भाभी, पिता और जून बधाई दे चुके हैं, ससुराल से भी फोन आ चुका है. असम में भी उसकी सखियों ने याद किया होगा. कितने दिनों से बाबाजी को सुना नहीं, यहाँ सुबह ही बिजली चली जाती है. माँ कल घर वापस आ गयी हैं, अभी कुछ दिन मंझले भाई के यहाँ रहेंगी. आज बड़े भैया-भाभी वापस जा रहे हैं. पिछले दिनों सभी ने मिलजुल कर माँ-पिता को सहयोग दिया, सभी भाई-बहन एक सूत्र में बंधे हैं. चौबीस घंटों के लिए दीदी के घर भी गयी, उनका घर बहुत बड़ा है, सामान भी तरह-तरह के हैं. दीदी को भी क्रॉस वर्ड भरने का शौक है, अभी भी बच्चों की तरह उत्साह से भर जाती हैं छोटी-छोटी बातों पर, उम्र का कोई असर उनके मन पर नहीं हुआ है. छोटी बहन भी वैसी ही है, उसको डाक्टरी ज्ञान, लेकिन बहुत है, पिछले दस-बारह वर्षों का अनुभव ! जून से उसकी बातचीत बहुत सीमित ही हो पाती है, कल वे मार्केट गये, घरके लिए व स्वयं के लिए कई छोटे-मोटे सामान खरीदे. अभी एक हफ्ता उन्हें यहाँ और रहना है.



Tuesday, February 12, 2013

तंदूरी नाइट



   भाई ने घर पहुंच कर खत भेजा है, उनके साथ बिताए दिन अब तस्वीरों में कैद हैं, जो कुछ दिन बाद ही बन कर आयेंगी. कल से बीहू का अवकाश है, शाम को क्लब में बीहू का कार्यक्रम देखने भी वे जायेंगे. सर्वोत्तम में एक लेख आया है, क्या आपके “पति भी चुप्पे हैं”, रोचक लेख है, क्या दुनिया भर की पत्नियों की एक जैसी समस्याएं हैं, जून ने भी पढ़ा है यह लेख, वैसे वह इतने चुप्पे भी नहीं हैं, पर बातचीत शुरू कभी नहीं करते, बल्कि बचना चाहते हैं, उन्हें उकसाना पड़ता है. लिखना-पढ़ना पिछले दिनों छूट सा गया था, उसने पिजा बनाने की एक रेसिपी जरूर लिखी एक पत्रिका से, और उन्होंने बनाया भी है पिजा, खमीर की गंध कुछ ज्यादा आ रही थी, वैसे अच्छा लगा.

पिछले चार दिन फिर अवकाश...बीहू का भी और उसके लिखने का भी. कल दो मित्र परिवार आए थे, दोपहर बाद वे गए. इस समय दोपहर के पौने एक बजे हैं, वह बाहर लॉन में बैठी है, पंछियों की मिली-जुली आवाजें हैं, किसी ने किसी कुत्ते को लाठी से मार दिया है शायद, उसके चिल्लाने की आवाजें आ रही है, और तभी एक आवाज आई,  हॉकर की, हर माल एक दाम पर, उसने एक साबुनदानी खरीदी, एक स्पून स्टैंड और तीन छोटे-छोटे फूलदान..यानि पांच वस्तुएँ सब समान दाम की. सामान रखने घर में गयी तो भीतर मसालों की गंध भरी हुई थी, शायद पीछे वाले घर से आ रही थी. बाहर आई तो उसकी छात्रा पढ़ने आ गयी थी, धूप में ही बैठे वे, मगर उसकी ओर पीठ करके, वरना आँखों को चुभती है. अभी तक उसने चादर पर फूल पेंट करना शुरू नहीं किया है, जबकि छोटी पेंटर भाभी को गए नौ दिन हो गए हैं, वह सिखा कर गयी थी. नन्हा यदि आज भारत की बैटिंग देखता तो तो बेहद खुश होता, कामले और तेंदुलकर ने बहुत अच्छा खेला, दूसरी इनिंग शुरू हो गयी होगी पर अंदर जाने का उसका मन नहीं है.

इस साल उसे जो डायरी मिली है, वह इतनी बड़ी है कि लिखने में असुविधा होती है, लेकिन यह असुविधा उसे अच्छी लगती है, जैसे प्रिय के दोष भी गुण लगते हैं. सुबह ही है अभी, उसने गुलाब के तीन गमलों की निराई की, वे बनारस से लाए थे ये तीन गुलाब. आज धूप फिर आराम करने चली गयी है और अपनी जगह बादलों को भेज दिया है. रात को ‘तंदूरी नाइट’ देखकर सोयी थी, स्वप्न में दक्षिण अफ्रीका में घूम रही थी, नैरोबी के रेलवे स्टेशन पर. कुछ अंग्रेजों से मिलती है, एक लड़की भी है उनमें और सपने में वह उन पंजाबी दीदी के बेटे की मित्र है. सुबह तक यह स्वप्न सजीव था. नन्हा स्कूल गया है, कल कह रहा था, नहीं जायेगा, क्योंकि स्कूल में लड़ाई बहुत होती है. जुलाई में उसका टेस्ट है पिलानी में, अगर वहाँ दाखिला हो जाये, लेकिन क्या गारंटी है कि वहाँ लड़ाई नहीं होगी और खर्चा भी तो बहुत है, अभी मकान का भी कुछ निर्णय नहीं हो पाया है. कल उसने एक फूल पेंट किया था सफेद चादर पर गुलाबी फूल.

कल रात पहली बार विनोद दुआ का कार्यक्रम ‘परख’ देखा, अच्छा लगा. शाम को वे दो मित्रों के यहाँ गए, एक ने ब्रेड का एक नया नाश्ता खिला दिया और दूसरे ने कचौड़ी, घर आकर वे बिना कुछ खाए ही सो गए. आज नन्हा घर पर ही है, पढ़ाई कर रहा है, बीच-बीच में कुछ पूछ लेता है, अभी लक्ष्मी आई थी, कह रही थी, आलू की क्यारी में चूहे घुस गए हैं, आलू खा रहे हैं, वह आलू निकलना चाहती थी. पता नहीं इस साल इतने सारे चूहे बैग में कैसे हो गए हैं, दवा का असर भी विशेष नहीं हुआ.

आज मन बुझा-बुझा सा है, मन में डर है कि कहीं...थोड़े से दिन ज्यादा हो जाने पर ऐसा मानसिक तनाव उसे हो जाता है, क्या ऐसा औरों के साथ भी होता होगा, जून और नन्हा उसे परेशान देखकर खुद भी उलझन में पड़ जाते हैं. उसने स्वयं से कहा, निराशावादी नहीं होना चाहिए, जो भी होगा ठीक ही होगा. कल शाम वे फिर एक मित्र के यहाँ गए, ताकि कुछ देर मन भूल जाये, शायद वह व्यर्थ ही भयभीत है, जो होना है वह होगा ही, क्योंकि जब बात अपने हाथ में न हो तो उसे वक्त के हाथों में ही छोड़ देना चाहिए.


Tuesday, May 29, 2012

काली घटाएं ठंडी हवाएं


वर्षा आज भी हो रही थी, सुबह जब वे उठे और इस समय भी शीतल मधुर बयार बह रही है. बादलों की मनोहर घटा छाई है. कल रात उसे फिर से नींद नहीं आ रही थी, किसी करवट चैन नहीं आ रहा था, सीधा भी नहीं लेटा जा रहा था. पता नहीं कितने बजे होंगे, जून भी जग गया था, सुबह एक स्वप्न देख रही थी, उसे ही देखा, सोते-जागते उठते-बैठते एक यही ख्याल तो है जो मन पर छाया रहता है, कि कब आयेगा वह, कौन सा दिन, कौन सा पल होगा कितनी लंबी प्रतीक्षा है यह. आज वह हिंदी लाइब्रेरी की सब किताबें वापस ले गया है, कुछ नई किताबें लाने के लिये. गीता के सभी अध्याय पूरे पढ़ लिये हैं अब कल से दुबारा आरम्भ से पढ़ेगी. छत्तीस दिन में पूरी होगी या चालीस दिन में. सासु माँ कभी-कभी सुनती हैं सामने बैठकर.

कल माँ का पत्र आया, मंझले भाई का और चचेरे भाई का भी. दो-तीन दिन वर्षा अपना रूप दिखा कर विश्रामगृह में चली गयी है. बहुत दिनों बाद आज कुछ अधिक कपड़े धोए, महरी काम पर नहीं आयी, बीमार है या..किन्तु विशेष परेशानी नहीं हुई, यूँ कहें जरा भी परेशानी नहीं हुई, अब वह इस स्थिति में रच-बस गयी है, नौ महीने कोई कम तो नहीं होते, कितनी-कितनी अनुभूतियाँ हुई हैं इन महीनों में, अब तो एक माह से भी कम समय रह गया है. कल शाम से जून कुछ परेशान सा था, आमतौर पर वह हमेशा खुश रहता है, खीझता नहीं किसी बात पर, कभी-कभी ऐसा होने पर उसे बहुत अजीब लगता है, पर वह जानती है उसका दोष नहीं है, घटना विशेष ने उसके मन को प्रभावित किया होता है, पर आज सुबह वह खुश-खुश विदा हुआ है, शायद जोराजान फील्ड जायेगा.