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Wednesday, January 31, 2018

पुनर्नवा- बाज पक्षी


कल शाम जून आ गये. सुबह जब वे उठे वर्षा हो रही थी. छाता लेकर प्रातः भ्रमण के लिए गये. आज पुराने अखबार व वर्षों से सहेज कर रखीं पत्रिकाएँ रद्दी वाले को दे दीं. जीवन आगे बढ़ता जाता है, वे पुरानी वस्तुओं को व्यर्थ ही सहेजकर बैठे रहते हैं. कल एक पुरानी परिचिता का फोन आया, वह दो माह बाद दादी बनने वाली हैं. जून के सहकर्मी की पत्नी से भी बात हुई. वे बच्चे का आगमन शल्य क्रिया द्वारा चाहते हैं. आजकल सामान्य प्रसव को भी लोग छोड़ते जा रहे हैं, भारत में कुछ ज्यादा ही. परसों पुस्तकालय से रसेल की यूरोपीय दर्शन पर लिखी पुस्तक लायी थी, कठिन है, फिर भी प्रयास तो करना है. आज ब्लॉग पर यात्रा विवरण प्रकाशित किया.

आज मौसम धूप भरा है. गर्मी बढ़ गयी है. उसे चाय की जगह अब शरबत पीना शुरू करना होगा. दोपहर को भीतर किसी ने कहा, मन के कहे में जो चलेगा उसे परिणाम तो भुगतना होगा. शब्द कठोर थे. फेसबुक पर रश्मिप्रभा ने भी लिखा, जानते हुए कि आग में हाथ डालने से जलेगा, फिर भी लोग डालते हैं. होश जगाना है, प्रतिपल होश जगाये रखना है. ऊर्जा जो इतनी कीमती है, बेहोशी में यूँ ही बही जाती है. सुबह उठकर सबसे पहला काम यही करना है, रात को सोने से पूर्व भी होश जगाना है और दिन भर भी इस बात का ध्यान रखना है. भीतर का मौन जितना प्रगाढ़ होगा, होश बढ़ेगा. होश जितना बढ़ेगा, मौन गहरा होगा. सुबह उठी तो स्वप्न जैसा कुछ चल रहा था, व्यर्थ का मनोराज्य..जो कभी-कभी जाग्रत में भी चलने लगता है. आज जून को आने में देर हो रही है. बाहर से कुछ लोग आये हैं, सम्भवतः उन्हीं के साथ व्यस्त होंगे. उसने मोबाइल पर सद्गुरू का एक संदेश सुनना आरम्भ किया, कितना सुंदर ज्ञान है और कितनी आसानी से उपलब्ध है. सुबह माली से कहकर ग्रीन हॉउस पर पारदर्शी पोलीथिन लगवा कर पौधों को वर्षा के जल से बचाने का प्रबंध किया. धूप तो मिलती रहेगी. ऐसे ही उन्हें मन को व्यर्थ के चिन्तन से बचना है, सार्थक तो जारी रहेगा ही.

कल ईद का अवकाश था. सुबह विशेष अल्पाहार बनाया. जून शाम को मेहमान कक्ष के लिए नये पर्दे लाये. इस वर्ष क्लब की कमेटी में उसका नाम भी है, वह मीटिंग में गयी. भोजन गरिष्ठ था, सो रात को स्वप्न देखे. एक स्वप्न में उसका पर्स खो जाता है, सारा सामान उसके हाथ में है पर खाली पर्स कहीं रख दिया है. एक स्वप्न में रेत और कोयले के चूरे से भरे गढ्ढे, बड़ी विशाल मशीनें, और काम करते हुए लोग दिखे. अजीब गोरखधन्धा है उनका अवचेतन मन. सुबह टहलने गयी तो कितने शुभ विचार मन में आ रहे थे. मृणाल ज्योति की सहायता किस प्रकार करे, इसके विचार. उनके लिए वे एक कमरा बनवा दें, एजीएम में चाय का प्रबंध कर दें. एक बच्चे की फ़ीस ही दे दें. हर महीने खाद्य सामग्री दें. जून को कहा, उन्होंने भी दान की महत्ता को समझा और बाजार से ढेर सा सामान ले आये. माली के लिए अपनी चप्पल निकाल दी., ट्रैक सूट भी देने को कहा. आज शाम को मौसम सुहावना हो गया था, शायद रात को वर्षा हो.

आज दोपहर अस्पताल गयी थी. उस नन्ही बच्ची को देखने, जो आज सुबह ही जन्मी है दस बजे के लगभग. जून के सहकर्मी की पत्नी ठीक थी, कोई दर्द नहीं हुआ, दवाइयों की मदद से कितना आसान हो गया है बच्चे को जन्म देना. उसकी टीचर माँ ने भी बताया, उनके स्कूल की तीन शिक्षिकाओं के बच्चे भी सिजेरियन हुए हैं. आज सद्गुरू की लिखी पुस्तक ( उन्होंने तो बोला है, उसे संकलित किया गया है) दोबारा पढ़ रही है. समझ कुछ बढ़ी है, सो ज्यादा समझ में आ रही है. फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ी बाज पक्षी के बारे में. वृद्ध होने पर वह अपने को पुनः युवा बनाता है. एक सौ पचास दिनों का समय लगता है उसे अपने पंजों, पंखों व चोंच को तोड़कर पुन नया उगाने में. उसके बाद कुछ वर्ष और जीवित रहता है. उन्हें भी स्वयं को पुनः-पुनः नया करना है. आज सुबह उठी तो मन में कई विचार थे. ध्यान में उत्तर मिले. परमात्मा उनके भीतर ही है, उन्हें उसे देह से पृथक जानना है. जानना तो शुद्ध बुद्धि से ही होगा. मन का दर्पण जब शुद्ध होगा तभी उसमें वह झलक दिखायेगा. उनका जीवन विशाल हो, प्रेममय हो तथा उस परमात्मा की गवाही देने वाला हो तभी मानना होगा उसको उन्होंने प्रेम किया है. अगले माह राखी है. उसके लिए सामान लाना है. इस माह के अंत में गुरू पूर्णिमा है. साधना का फल है सेवा, अब यही मन्त्र है जिसे उन्हें जपना है. क्लब का काम भी सेवा की भावना से साधना है, तब यह बोझ न लगकर आनन्द ही देगा !  


Thursday, September 22, 2016

दीवाली के कार्ड


कोई है जो हर क्षण जागता रहता है, उनके भीतर वह साक्षी ही उनका वास्तविक मित्र है. मन, इन्द्रियों से परे जो एक शांत अवस्था है उसी का नाम है साक्षी भाव ! कल रात ऐसा लगा कि सोते-सोते भी कोई भीतर जगा हुआ था ! कल सत्संग में दो भजन गाने वाली सखियाँ आयीं, गाने की बारी उसकी भी आयी. कल बहुत सी पत्रिकाएँ, किताबें तथा पेपर्स निकाले, घर में सामान जितना कम हो उतना अच्छा है, एक दिन सारे कार्ड्स भी निकाल देने हैं अथवा तो उन्हें रहने देते हैं कितनी यादें जुड़ी हैं उनसे..दीवाली पर सबको कार्ड्स भेजने का उत्साह जगा है, पिताजी, तीनों भाई, चचेरे व फुफेरे भाई सबको भेजेगी बहनों को भी..आज सुबह वेद ज्ञान सुना, कितने अद्भुत श्लोक हैं, आत्मा को बलशाली बनाने की ही सारी प्रार्थनाएं हैं. कल ओशो को सुना हरेक को अपने ईश्वर का निर्माण स्वयं करना है उसकी माँ बनना है. इसका भी अर्थ वही है कि उन्हें स्वयं को शक्ति से भरना है. आत्मा को जागृत करना है. मन, बुद्धि के पार जाकर एक ऐसी शून्यावस्था का अनुभव करना है जो प्रेम, शांति व ज्ञान से ओत-प्रोत है. उनका छोटा मन जब शांत हो जाता है तो आत्मा जो सदा से वहीँ है उजागर हो जाती है, वह आत्मा ही अपने शुद्धतम स्वरूप में परमात्मा है जब वह देह से परे होती है, वासना तथा तृष्णा से मुक्त होती है, उसे भी अपने भीतर उस आत्मशक्ति को परिपक्व करते जाना है, व्यर्थ विचारों से स्वयं को बचाना है, ऊर्जा बचानी है ताकि वह ऊर्जा ध्यान में सहायक हो. लेखन में, पठन में सहायक हो. ऊर्जा को व्यर्थ गंवाया तो भीतर नकारात्मकता छाएगी स्वयं को आत्मा रूप में अनुभव करने के बाद भी यदि कोई उदास रहे तो ...कहीं कुछ धोखा है..हँसी ही उनकी पहचान हो और शांति उनका घर..प्रेम उनका स्वभाव..कल छोटी बहन से बात हुई, वह भी खुद की तलाश में लगी है, यात्रा जारी है, एक दिन मंजिल भी मिल जाएगी. आज देखा, गीतांजलि के भावानुवाद पर कुछ कमेंट आये हैं तथा तीन महिलाएं फ़ॉलो भी कर रही हैं. अभी कितनी कविताएँ ब्लॉग पर डालनी हैं. कल लक्ष्मी पूजा का अवकाश है. जून नयी गाड़ी ले रहे हैं. अपने भोजन का खास ख्याल रखते हैं, दर्द भी कम हो गया है. अगले महीने मेहमान आ रहे हैं घर की सफाई का काम ठीक चल रहा है अब कुछ ही शेष है. बड़ी भांजी को निबन्ध के लिए कुछ जानकारी भेजनी थी, वही काम शेष रह गया है.


होश को कायम रखना तलवार की धार पर चलने जैसा है, बार-बार मन फिसल जाता है, पुराने संस्कारों का शिकार होकर वाद-विवाद में फंस जाता है. अहंकार अपना सिर उठाने लगता है, भीतर कोई देख रहा है, साक्षी है, यह भाव खो जाता है. जाग-जाग कर भी वे सो जाते हैं, लेकिन जैसा कि सद्गुरू कहते हैं पहले तो इतना भी होश नहीं था कि वे अज्ञानी हैं, कम से कम अब अपने अज्ञान का बोध तो होता है ! पांच एम्पीयर का एक स्विचबोर्ड लगाने दो लोग आये हैं, शोर हो रहा है पर बाहर का यह शोर भीतर की शांति को भंग नहीं करता, उसे तो भीतर का शोर ही भंग करता है. अभी एक सखी को फोन किया सुबह उनके यहाँ फूल भिजवाये थे, लगता है वह कुछ परेशान है या व्यस्त है. धीरे-धीरे स्पष्ट होता जा रहा है कि सारे संबंध ओढ़े हुए होते हैं, वे अपनी सुविधा के अनुसार जब चाहे उन्हें उतार देते हैं, जब चाहे पहन लेते हैं ! यहाँ हर कोई अपने आप में एक द्वीप है. उन बुजुर्ग आंटी की शिकायत कम होने में नहीं आती, बढ़ती ही जाती है यहाँ माँ की भी. अभी-अभी उस सखी का फोन आया, उनके यहाँ भी बिजली नहीं है. उनका जीवन जितना सुविधाजनक होता जाता है उतने ही वे बेहोश होते जाते हैं. 

Thursday, April 21, 2016

उत्तर पूर्वी भारत - सात बहनें


होश में जीना, साक्षीभाव में जीना, जागते हुए जीना ही असली बात है, वे अचेतावस्था में ही सारी भूलें करते हैं. आज सुबह उसने व्यस्तता के कारण फोन नहीं उठाया पर यह मान लिया कि कोई दूसरा उठा लेगा, यह मानना होश में नहीं हो सकता क्योंकि सभी व्यस्त हो सकते हैं. इस एक घटना के अलावा बेहोशी में कुछ विशेष नहीं हुआ. जून ने मृणाल ज्योति के हॉस्टल के लिए काफी चीजें बनवा दी हैं, उनके भीतर कितना परिवर्तन आता जा रहा है, वह मुस्कुराने लगे हैं, सामाजिक कार्य  करने लगे है. जीवन के प्रति नयी ललक जागी है, घर में नये-नये सामान ला रहे हैं. रजोगुण बढ़ रहा है धीरे-धीरे सतोगुण भी आएगा, अब क्रोध नहीं रहा, प्राणायाम का असर स्पष्ट दीख रहा है. जीवन है ही आनन्द के लिए, सेवा के लिए और परोपकार के लिए, वे मानव होने का सबूत तभी दे सकते हैं जब उनके चारों ओर आनन्द का वातावरण हो शांति हो और लोगों को उनसे कुछ न कुछ मिलता रहे, वे दाता बनें तभी जीवन का सच्चा मर्म समझ पाते हैं. प्रकृति हर पल लुटा रही है, बिना किसी आकांक्षा के, वे भी तो उसी प्रकृति का अंश है जैसे प्रकृति के पीछे वह अव्यक्त छिपा है ऐसे ही उनके पीछे आत्मा का साम्राज्य है, वे ही वह चेतन हैं, जड़ हाथों में क्या शक्ति कि अपने आप कुछ कर सकें !

आज ‘मृणाल ज्योति’ गयी थी, उस दिन एक परिचित ने पूछा था, आपकी वह संस्था कैसी है, और एक दिन क्लब की अध्यक्षा ने भी कहा कि वह इस संस्था से जुड़ी ही है तो उससे जुड़ा लेडीज क्लब का भी काम कर दे. कोई थोड़ा सा भी पुण्य का काम करे तो पहचान अपने-आप मिलने लगती है, लेकिन एक सच्चा साधक अपने लक्ष्य पर ही नजरें रखता है, वह लक्ष्य है परमात्मा, उससे कम कुछ भी नहीं ! आज सुबह ‘क्रिया’ के बाद गुरूजी की कृपा का अनुभव हुआ, उन्होंने जैसे उसके मन में उठने वाले सवालों का जवाब दिया. आज जून ने कहा कि अगले महीने मुम्बई में उनकी पांच दिनों की ट्रेनिंग है, क्या वह यात्रा बीच में छोड़कर वहाँ जाएँ ? तो उसने कहा, हाँ, वह जा सकते हैं, भीतर कोई द्वंद्व नहीं बचा, कोई संदेह नहीं. इस दुनिया में ऐसा कुछ रहा ही नहीं बल्कि था ही नहीं जो परमात्मा से बढ़कर हो, वह जिसे मिल जाये अथवा उसकी जिसे तलाश हो वह किसी भी परिस्थिति में प्रसन्न रह सकता है. गायत्री परिवार के संस्थापक श्रीराम शर्मा आचार्य की अमृत वाणी पढ़ी, उनकी वाणी में आग है, कितने स्पष्ट दो टूक हैं उनके वचन. महामानव थे वह और बने कैसे, केवल परमात्मा की कृपा से ! उनके भीतर जो अनंत शक्ति छुपी है वह उसी की तो है, परमात्मा प्रकट होने को उत्सुक है, वे प्रमाद के कारण कभी अज्ञान के कारण स्वयं को दीन-हीन जानते हैं, वास्तव में वे शक्ति के ऐसे पुंज हैं जो इस दुनिया को बदल सकती है ! अगले दो घंटे उसे पढ़ाना है. शाम को सत्संग भी है.
कल दोपहर ‘मिजोरम’ पर पढ़ती रही, शाम को क्लब में मीटिंग थी. इस बार जो सदस्या संपादन कर रही हैं, उनका काम करने का तरीका बिलकुल अलग है. पहले तो उसे पत्रिका के मुखपृष्ठ, सज्जा आदि से कोई मतलब ही नहीं रहता था, केवल हिंदी की प्रूफ रीडिंग तक ही उसका काम सीमित था. कल एक नाम भी उसने सुझाया ‘AAMI NAM METRI’ उत्तर भारत की सात बहनों के सारे नामों के पहले अक्षरों को लेकर. आज अंकुर में दो दर्जन बच्चे आए थे, रामलीला खेली, उससे पहले रामायण की कहानी सुनाई, बच्चों को नाटक में बहुत मजा आता है. आज आकाश में बादल छाये हैं. 

Monday, March 16, 2015

मूंग का हलुआ


आज पूर्णिमा है. उसके हृदय गगन में भी परमात्मा रूपी चन्द्रमा का आगमन होगा ऐसी सूचना मिल रही है. मन शांत है, ध्यानस्थ है, सद्गुरु की छवि हटती नहीं. सुमिरन अपने आप चलता है. ईश्वर को छोड़कर कोई विचार मन में नहीं टिकता. एक उसी की याद हर वक्त बनी हुई है और कैसी अद्भुत गहराई का अनुभव हो रहा है. जैसे सब कुछ ठहर गया हो. सारा जगत स्थिर हो मन की तरह, कहीं कोई उहापोह नहीं, विक्षेप नहीं, अद्भुत है यह क्षण ! कल दोपहर स्वामी योगानन्द जी की आत्मकथा पढ़ी. साधना के अनगिनत सूत्र उनकी इस पुस्तक से हाथ लगते हैं. पढ़ते-पढ़ते मन ध्यान में टिक जाता है. परसों ध्यान में आवाज सुनी थी “निरभिमानी बन” उसके और प्रभु के मध्य अहंकार का पर्दा ही तो है, इसे चूर-चूर करना होगा. मन के सूक्ष्म अहंकार को निर्दयता से उखाड़ फेंकना होगा. कठोर बनना पड़ेगा मन के प्रति, कड़ी नजर रखनी होगी कि कहीं कोई भाव ऐसा तो नहीं आ रहा जो अहंकार को पोषित करे. पूर्ण समर्पण तभी सम्भव है. सद्गुरु इतनी दूर रहकर भी उसे सचेत कर रहे हैं. सुबह स्वप्न देखा जो उसकी एक और कमजोरी की ओर ध्यान दिला रहा था. मिथ्याभाषण अथवा तो आवश्यकता से अधिक भाषण, एक बात को बार-बार कहने की बुरी आदत, नन्हे और जून को कई बार इसका शिकार होना पड़ा है. ज्यादा बोलने से बातें अतिरंजित भी हो जाती हैं और निर्दोष असत्य भी मुख से निकल जाता है. कल शाम को सत्य का सामना वह ठीक से नहीं कर पायी. हर क्षण सजग रहना होगा तभी पाषाण हृदय चमक उठेगा और उसमें परमात्मा की छवि प्रकट होगी. कृष्ण की गीता पढ़े या सद्गुरु के वचन सुने सभी मन की शुद्धि चाहते हैं !   

उसका हृदय परमात्म सुख से परिपूर्ण है, कोई होश में रहे तो विकार पास नहीं फटकते और यदि कोई भाव ऐसा उठा भी तो होश में उसे देखा जा सकता है. सुबह उठी तो एक स्वप्न देख रही थी. उसके हाथ में स्वादिष्ट हलुआ है, शायद मूंग की दाल का, शुद्ध घी और मेवों से युक्त, मीठा और स्वादपूर्ण पर दो छोटी बच्चियों के कारण बहुत सा व्यर्थ जमीन पर गिर जाता है. सपना सचेत करता है कि परमात्मा का जो आनंद उसे मिला है उसे छोटे-छोटे सुखों के पीछे कहीं व्यर्थ न गंवा दे. सुबह क्रिया के बाद किसी के होने का, किसी अशरीरी के होने का अहसास हुआ, एक लय में जैसे किसी के साँस लेने की आवाज आ रही थी. बहुत पहले भी उसे ऐसा अनुभव हुआ था. सद्गुरु की स्मृति भी हर क्षण रहती है, ऐसा लगता है जैसे उनसे मानसिक सम्पर्क बन रहा है. वह उसकी प्रार्थना ईश्वर तक पहुँचा देते हैं क्योंकि वह हर क्षण उनसे जुड़े रहते हैं. ऐसा लगता है सारे संशय मिट गये हैं और अंततः एक ऐसा प्रकाश मिला है जो उसे कभी छोड़ नहीं सकता. कृष्ण की अनुकम्पा है. यह सारा विश्व उसी का विस्तार है. उस एक की शक्ति ही हर ओर बिखरी है. जिसके मूल में प्रेम है अहैतुक प्रेम ! यह संसार प्रेम से ही बना है, प्रेम पर ही टिका है और प्रेम में ही स्थित है ! 

कल शाम वे एक विवाह भोज में गये. कल रात स्वप्न में माँ को देखा, वह ठीक नहीं लग रही थीं, अस्त-व्यस्त सी कहीं जा रही थीं. दीदी की सास को भी कल बहुत सालों के बाद स्वप्न में देखा, कहीं ऐसा तो नहीं उनकी आत्माएं ही उसे दिख रही हों. आत्मा का अस्तित्त्व शरीर छूटने के बाद भी रहता है. वह इतनी सूक्ष्म होती है कि दिखती नहीं, तरंग का सा रूप होता है, एक ऊर्जा ! वास्तव में प्राणी सारा जीवन उस मृत्यु की ओर पल-पल बढ़ते रहते हैं जो अवश्यम्भावी है, फिर भी वे उसके लिए कोई तैयारी नहीं करता. मृत्यु से पूर्व ही उन्हें यह जानने का प्रयास करना है कि वे कहाँ से आये हैं, क्योंकि वहीं लौटना होगा..