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Wednesday, August 17, 2016

इन्द्रधनुष के रंग


दीदी का फोन आया आज, उन्होंने स्मृति पर आधारित वह कविता पढ़ी, कुछ और बातें भी बतायीं जो उसे ज्ञात नहीं थीं. उनकी उस बहन को डिप्थीरिया हुआ था, जो बचपन में ही चल बसी थी. आज तो उसका टीका है उस वक्त नहीं था. आज शाम को वर्षा में वे भीगे, जून और वह, उन्हें देखकर पिताजी भी आ गये, फिर कुछ देर तेज मूसलाधार वर्षा के बाद आकाश में इन्द्रधनुष बन गया बहुत सुंदर ! उसने वर्षा पर कुछ पंक्तियाँ लिखी हैं, कल सुबह उन्हें टाइप करेगी. इस वक्त शाम गहराती जा रही है. वह लॉन में है. हवा में ठंडक है और वातावरण धुला-धुला सा है. पंछियों की आवाजें आ रही हैं. प्रकृति का जैसा सान्निध्य यहाँ प्राप्त है वैसा बड़े शहरों में रहने वालों को शायद ही होता हो ! कल रात को नैनी के यहाँ झगड़ा हुआ पर आज शांति है, देखे, कब तक टिकती है. उसके पति को उसने समझाया और वादा भी किया कि उसे काम पर जाने में कोई बाधा नहीं होने देगी. ईश्वर उसकी सदा की तरह मदद करेंगे ! यह वाक्य ही गलत है, ईश्वर और वह क्या दो हैं ?

परसों लेडीज क्लब की मीटिंग है, उसे कविता याद करनी है. निराला की कविता भिक्षुक, बचपन में पहली बार पढ़ी थी. आज भी हल्की-हल्की फुहार पड़ रही है. कुछ नई कविताएँ लिखीं, ब्लॉग पर डालीं. हजारों लोग हजारों कविताएँ लिख रहे हैं. वास्तव में कवि स्वान्तः सुखाय ही लिखता है, रचना का पहला पाठक भी तो वही होता है. आज योग अभ्यास व क्रिया साधना करते समय बीच में ही रुककर उसने जून से जो कहा, वह पहले कभी कहा ही नहीं जा सकता था, अब भीतर साहस आया है, साहस जो ध्यान से उपजा है. सद्गुरु कहते हैं, ध्यान प्रार्थना की पराकाष्ठा है. ध्यान में जो ताकत है जो करते हैं वे जानते हैं !

कल दीदी से बात की, छोटी भांजी दुबई आ रही है, ओपेरा का जॉब उसने छोड़ दिया है. उसके नार्वेजियन पतिदेव पिछले पांच महीने से लन्दन में हैं. दोनों के बीच सम्पर्क कम होता जा रहा है, ऐसा दीदी ने कहा. वह जरा भी परेशान या दुखी नहीं थीं. जीवन जब जैसा हो वैसा ही वे स्वीकार करें तो..दुःख कैसा ? उसे यहाँ आने का निमन्त्रण दिया है, शायद वह आये..कभी न कभी यह इच्छा भी पूरी होगी ही ! आज उनकी मीटिंग है, कविता उसे याद हो गयी है, देखे, क्या होता है. आज सुबह उसने एक बात कही तो जून ने कहा कि उन्हें सदा सकारात्मक सोच रखनी चाहिए, अब वह उसकी भाषा बोलने लगे हैं. कल माँ-पिताजी का जन्मदिन वे मना रहे हैं. कल पिताजी का फोन आया, वह कह रहे थे कि जितना-जितना ज्ञान उन्हें होता जाता है , उतना-उतना लगता है वे तो कुछ भी नहीं जानते. उसे अब इस जगत में जानने जैसा कुछ भी नहीं लगता, जो है सो है, जो जैसा है तब वैसा है..बस यही ज्ञान है, ज्यादा पढ़ना-सुनना अब व्यर्थ ही लगता है और सुनती भी है क्योंकि कुछ न कुछ तो करना ही है, कुछ किये बिना रहना हो नहीं सकता...शाम की तैयारी करनी है.

जुलाई माह का आरम्भ हो चुका है. मौसम भी बदल रहा है, उमस और चिपचिपाहट भरी गर्मी का मौसम. जब तक बादल बरसते हैं तभी तक ठंडक रहती है वरना..आज नन्हे के लिए उन्होंने गोंद के लड्डू तथा एक कविता भेजी है. इसी महीने छोटी बहन आ रही है. जून को कोलकाता तथा जोधपुर जाना है. उनका दर्द अभी पूरा गया नहीं है, थोडा़-थोडा़ सा शेष है, सद्गुरू की कृपा से उनके भीतर भक्ति, श्रद्धा व ध्यान का उदय हुआ है, प्रार्थना करना उनकी आदत में शुमार हो गया है.आशा नामकी एक लडकी जो कभी-कभी उसके पास पढ़ने आती है, आज पीतल के बर्तनों को चमका रही है. कभी-कभी मेहमानों को आना चाहिए अथवा तो त्योहारों को..

सलाह देने या दूसरों को उपदेश देने का उसे रोग है. कोई मांगे या न मांगे हर बात पर सलाह उसके भीतर तैयार ही रहती है, शायद इसकी वजह यही है कि उसे भीतर समाधान मिल गया है और उसे लगता है कि सभी को फटाफट समाधान मिल जाये, कि वे क्यों व्यर्थ ही परेशान रहें, हो सकता है उसके सूक्ष्म अहम् की पुष्टि होती हो..लेकिन सद्गुरु कहते हैं कि इस जग में जो सबसे ज्यादा दी जाती है और सबसे कम ली जाती है वे हैं सलाहें..यहाँ हर एक आत्मा को अपना समाधान स्वयं ही खोजना होता है कोई बना बनाया उत्तर किसी के काम नहीं आता तो आज के बाद यह निश्चय किया कि कई सलाह नहीं देनी है, किसी को भी नहीं देनी है, सभी अपनी मंजिल स्वयं ही तलाशेंगे, जब परमात्मा उन्हें जगायेगा तब वे जागेंगे !                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        


Tuesday, October 20, 2015

इन्द्रधनुष के रंग


मन तरल है, इसे जहाँ लगायें वैसा ही आकार ग्रहण कर लेता है, मन वही सोचता है वही करता है जो इसे कहा गया है. जैसे संस्कार मन को दिए हैं वैसा ही यह बन जाता है. मन से बड़ा मित्र भी कोई नहीं और इससे बड़ा शत्रु भी कोई नहीं. जब तक मन में आनंद की कोंपले नहीं खिलीं तब तक यह कृतज्ञता के गीत नहीं गता और जब तक कृतज्ञता के गीत नहीं गाता तब तक कृपा की वर्षा नहीं होती, कृपा मिलने से आनंद स्थायी होता है. इस समय उसका मन अद्भुत शांति का अनुभव कर रहा है, निस्तब्ध, निस्पंदन ! पिछले दिनों उन्होंने एडवांस कोर्स किया उसके दौरान भी शायद इतनी शांति महसूस नहीं की थी. इस शांति के सापेक्ष जून के व्यवहार की हल्की सी नकारात्मकता भी कैसी चुभती है. उन्हें अपना व्यवहार सामान्य लगता है पर जिसने एक बार प्रेम का अमृत चख लिया हो वह क्यों तीखा पसंद करेगा पर उतना ही सही यह भी है जिसने अमृत चखा ही नहीं वह तो बस तीखा ही स्वाद जानता है. उनका क्या दोष, उनकी दृष्टि में वही एकमात्र स्वाद है. कल उन्होंने उपहार दिए, जो दे दिया बस वही तो अपना है, जो उनके पास है वह तो छिन जायेगा मृत्यु की उस घड़ी में !

कल सुबह जब पाठ करने बैठी तो बायं आँख के नीचे इन्द्रधनुष दिखाई दिया, कितना सुंदर और कितना विस्मयकारी ! आज सुबह उठी तो सदा की तरह मन में विचार चल रहे थे पर जैसे ही जाग्रत अवस्था हुई जैसा सारा शोर शांत हो गया. ऐसा लगा जैसे कोई भीड़ भरे कमरे से एकाएक एकांत में आ गया हो, पूर्ण शांति में, कैसा अद्भुत था वह पूर्ण मौन, उसकी स्मृति अभी तक बनी हुई है. साधना करते समय जून को थोडा सा रोष हुआ पर उसे जरा भी नहीं और अब तो वह पिछले जन्म की बात लगती है. सुबह ध्यान किया, इस समय संगीत सुन रही है सद्गुरु ने खुद से जुड़े रहने के कितने सारे तरीके बताये हैं. जो अपने से जितना दूर होता है वह उतना ही शीघ्र दुखी हो जाता है. साधना में अब ज्यादा रस आने लगा है, इसलिए ही गुरूजी हर छह महीने पर कोर्स करने को कहते हैं.

कोई उनके कार्यों की प्रशंसा करे अथवा निंदा करे या उपेक्षा करे, उन्हें हर हाल में निर्लेप रहना है. अज्ञान के कारण ही लोग दुर्व्यवहार करते हैं उनके भीतर भी परमात्मा उतना ही है. परमात्मा ने इस जगत को मात्र संकल्प से रचा है, जैसे कोई स्वप्न में रचता है. स्वप्न में यदि कोई हानि हो तो क्या उसका दोष देखा जाता है ? यह जगत तो एक नाटक है, लीला है, खेल है, इसमें इतना गंभीर होने की कोई बात नहीं है. यहाँ सभी कुछ घट रहा है, यहाँ वे बार-बार सीखते हैं, बार-बार भूलते हैं. नित नया सा लगता है यह जगत. वर्षों साथ रहकर भी कितने अजनबी बन जाते हैं एक क्षण में लोग और जिनसे पहली बार मिले हों एक पल में अपनापन महसूस कर लेते हैं ! कितनी अनोखी है यह दुनिया, कितनी विचित्र और वे यहाँ क्या कर रहे हैं ? उन्हें यहाँ भेजा क्यों गया है ताकि वे इस सुंदर जगत का आनंद ले सकें और उस आनंद को जो भीतर है बाहर लुटाएं. जो अभी उस आनंद को नहीं पा सके हैं उन्हें भी उसकी ओर ले जाएँ !

नये वर्ष का दूसरा महीना आरम्भ हो चुका है, मौसम में बदलाव भी नजर आने लगा है. पहले की तरह ठंड अब नहीं रह गयी है. सुबह नींद साढ़े चार पर खुली, सुबह के सभी कार्य सुचारू रूप से हुए. आज भी गुरूजी को सुना, “ध्यान अति उत्तम प्रार्थना है. भीतर ही ऐसा कुछ है जहाँ पूर्ण विश्राम है. मन तो सागर की लहरों की तरह है अथवा आकाश के बादलों की तरह जो आते हैं और चले जाते हैं. सारे विकार वे भी तो मात्र विचार हैं उनका कोई अस्तित्त्व ही नहीं, भय का विचार कैसे जड़ कर देता है जबकि वह है एक कल्पना ही तो ! वे खाली हैं उनका शरीर तथा मन दोनों खाली हैं, ठोस तो उसमें केवल अस्त्तित्व है, जो स्थायी है, सदा रहने वाला है एक समान..जो वास्तव में वे हैं जिसमें से रिसता है प्रेम, कृतज्ञता और शांति, जिसमें से झरता है आनंद. ऐसे हैं वे. पहले कितनी बार विचारों ने उसे आंदोलित किया है पर अब वे बेजान हो गये हैं, वह उन्हें देखती भर है, उनमें स्वयं की शक्ति नहीं है, वे आते हैं और चले जाते हैं. अब से उसके जीवन में जो भी होगा वह श्रेष्ठतम ही होगा, उससे कम नहीं, ईश्वर श्रेष्ठतम है और वह हर क्षण उसके साथ है, सारा अस्त्तित्व उसके साथ है तो कुछ भी कम या हल्का नहीं चलेगा. उसकी वाणी, कर्म विचार सभी श्रेष्ठतम होंगे !