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Wednesday, June 24, 2015

घन घन गरजें मेघा


जून माह का प्रथम दिन ! वर्षा की झड़ी लगी है, गर्जन-तर्जन भी जारी है. यात्रा से लौटने के बाद से दिनचर्या अभी तक सुव्यवस्थित नहीं हो पायी है. शनिवार को सासु माँ व ससुरजी आ रहे हैं, उसके पूर्व ही सब कुछ संवारना है. भीतर जब तक बिगड़ा है, बाहर भी बिगड़ा रहेगा. झुंझलाहट, अहंकार, कटु शब्द, अवमानना तथा आलस्य ये सारे अवगुण बाहर दिखायी देते हैं, पर इनका स्रोत भीतर है, भीतर का रस सूख गया है. सत्संग का पानी डालने से भक्ति की बेल हरी-भरी होगी फिर रसीले फल लगेंगे ही. संसार का चिंतन अधिक होगा तो उसी के अनुपात में तीन ताप जलाएंगे. प्रभु का चिन्तन होगा तो माधुर्य, संतोष, ऐश्वर्य तथा आत्मिक सौन्दर्य रूपी फूल खिलेंगे. कितना सीधा-सीधा हिसाब है. जगत जो दुखालय है दुःख ही दे सकता है, ईश्वर जो अनंत सुख का भंडार है, नाम लेते ही सारी पीड़ा हर लेता है. अविद्या, अस्मिता, राग-द्वेष तथा अभिनिवेष ये पांच ही तो क्लेश हैं जो तामसी बुद्धि होने के कारण सताते हैं. उसने ईश्वर से प्रार्थना की उसकी बुद्धि को प्रकाशित करे.

आकाश में घने बादल छाये हुए हैं, गरज भी रहे हैं और बरस भी रहे हैं. हवा शीतल हो गयी है और मन भी. ध्यान में कुछ देर बैठी, ज्यादा समय नहीं मिलता. ईश्वर प्राप्ति के लिए मन में दृढ़ता नहीं है तभी नियम में दृढ़ता नहीं रहती. मन में तड़प हो, छटपटाहट हो तभी उसका स्मरण सदा बना रह सकता है.

आज ध्यान में कई दृश्य दिखे, अंतर्मन की गहराइयों में कितना कुछ छिपा है. एक संस्कार जगते ही उसके पीछे विचारों की एक श्रंखला जग जाती है. ऊपर-ऊपर से वह कहती है कि देह नहीं है पर भीतर जाकर पता चलता है, चिपकाव देह से, मन से, बुद्धि से कितना गहरा है.


उसे फिर इस सत्य का अनुभव हुआ, न बोलना ज्यादा अच्छा है, व्यर्थ बोलने से, यह सही है कि बहुत बार वह बोलकर बाद में सचेत हुई है, न बोलने से कभी कोई समस्या नहीं हुई. वे जो बोल सकते हैं यह सोच सकते हैं पर जो बोल ही नहीं सकते वे कितनी विवशता का अनुभव करते होंगे. इस जगत में कितनी विचित्र परिस्थितियाँ हैं, एक से एक सुखकारी तथा एक से एक दुखकारी. यह जगत अनोखा है पर अब यह उसे आकर्षित नहीं करता. उसके भीतर का जगत ज्यादा सुंदर है, वह उसकी पहुंच में भी है. पूरा का पूरा ब्रह्मांड भीतर है. सूक्ष्म संवेदनाएं, सूक्ष्म भाव, सूक्ष्म तरंगें और विचित्र रंग, विचारों का उदय..ये सभी कुछ तथ कुछ दृश्य जो ध्यान में दीखते हैं , एक नयी दुनिया में ले जाते हैं, शायद मृत्यु के बाद और जन्म से पहले की दुनिया ! एक दिन तो उन्हें वहीं जाना है ! 

Wednesday, June 13, 2012

ऑरेंज कैंडी


कल संध्या जब जून ऑफिस से घर आया, उसके हाथ में एक पार्सल था जो माँ ने भेजा था. वह देखते ही समझ गयी थी कि उसमें वही बेबी एल्बम होगा जो वे लोग भी लाए थे. आज ही वह उन्हें पत्र लिखेगी, उसने सोचा. जून का दफ्तर स्थानांतरित हो रहा है अगले हफ्ते से उसे भी नयी इमारत में जाना होगा.
आज इतवार है, जून सुबह से लॉन में काम में लग गया था, जीनिया के पौधों व गुलाब की क्यारी में से घास निकाली. कल वह दो क्रोटन के पौधे व हैंगिंग पॉट में लगाने के लिये  भी पौधे लाया है, लगा भी दिए हैं और बहुत सुंदर लग रहे हैं. कल धर्मयुग में मन को छूने वाली एक कहानी पढ़ी, जून उस दिन जो किताबें लाया था उसमें भागवत् पुराण भी था.
आज के दिन के साथ कितनी मधुर स्मृतियाँ संयुक्त हैं, दो वर्ष पूर्व जून जब उनके घर आया था उसे अंगूठी पहनाई थी, और वे सोच रहे थे कि आज ही उस नवांगतुक का जन्मदिन भी होगा. पर अभी तक तो कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा है. कल से वह सभी सामान्य कार्य आराम से कर पा रही है. डॉक्टर ने तीन दिन बाद बुलाया है.  
कल बाबू जगजीवन राम जी का स्वर्गवास हो गया. पिछले कई दिनों से यह आशंका थी कई अब वे बचेंगे या नहीं, रेडियो पर तो एक बार गलती से उनकी मृत्यु का समाचार भी दे दिए था. कल चार बजे से टीवी पर कोई मनोरंजक कार्यक्रम नहीं दिखाया गया. ऑफिस भी बंद हो गया है. दोपहर को बिजली चली गयी, गर्मी बहुत थी, बाहर आइसक्रीम वाले ने आवाज दी तो वह ले आया, ऑरेंज कैंडी, पर कड़वी थी. शायद ज्यादा मीठे के कारण कड़वी हो गयी थी.

Friday, February 3, 2012

आजादी की सालगिरह


पहली बार उसके जन्म दिन पर वे दोनों साथ हैं, आज नूना बेहद खुश है जैसे उसका ही जन्मदिन हो. दोपहर को उसने विशेष भोजन बनाया, उसके आने पर पूरी बनायी, और दोपहर को गुलाबजामुन बनाने का प्रयत्न किया जो बहुत मुलायम होने के कारण टूट गए, जून पेटीज लाया था बाजार से. बनारसी साडी पहनी उसने, फिर वे मोटरसाइकिल पर नदी तक घूमने गए, स्टेशन गए और फिर क्लब, जहाँ ज्वारभाटा फिल्म चल रही थी.
१५ अगस्त ! आजादी की ३८वीं सालगिरह, प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में घोषणा की है कि असम आन्दोलन समाप्त हो जायेगा, शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो गए हैं. और इस तरह पिछले चार-पांच सालों से चली आ रही यह लड़ाई समाप्त होने को है. सचमुच यह बहुत प्यारा उपहार है राष्ट्र को. आज सुबह वे झण्डारोहण देखने तो नहीं जा सके वर्षा के कारण, बस ट्रांजिस्टर पर लालकिले पर हुए कार्यक्रम की रनिंग कमेंट्री सुनी. आयल मार्केट में खूब पटाखे चलाये गये, आवाज तो दिन में आ रही थी, शाम को बिकते हुए भी देखे. आज नूना पुष्पा सिंह के यहाँ गयी,, वही जिससे मिलकर उस दिन आयी थी, बेटा हुआ है, उसे लगा कितने अजीब लगते हैं बिल्कुल छोटे बच्चे.