Friday, June 3, 2016

मुलेठी की मिठास


आज एकादशी है, भाद्रपद माह की एकादशी, कृष्ण के जन्म का महीना, अगस्त का अंतिम दिन !
कल जून ने ओशो की आत्मकथा का शेष भाग भी डाउनलोड कर दिया. रात को उसने उनसे कहा कि इतने वर्षों के साथ के बाद तो अब सीखना-सिखाना छोड़कर, दूसरा जैसा है वैसा ही स्वीकार कर लेना सीख लेना चाहिए. जब तक वे दूसरे के दोष देखते हैं उनका प्रेम भीतर बंद ही रहता है. इस दुनिया में उनके आने का एक ही लक्ष्य हो सकता है कि वे अपने भीतर प्रेम जगाएं, प्रेम से अपने आस-पास के वातावरण को भिगो दें ! अब दो-चार मिनट ही शेष हैं उनके लंच के लिए आने में. वह सर्दी-जुकाम से परेशान हैं, स्वाइन फ्लू के इस माहौल में मन में थोडा सा डर भी समाया होगा. आज ध्यान में एक-दो बार झटका लगा, बहुत दिनों के बाद ऐसा अनुभव हुआ. रात की नींद सपनों भरी थी. दिन में जो विचार भीतर चलते रहते हैं वही तो रात को दिखाई देने लगते हैं. रात को अवचेतन मन सक्रिय हो जाता है. जो विचारों से मुक्त है, वही स्वप्नों से मुक्त हो सकता है. विकारों से मुक्त हुए बिना विचारों से मुक्त होना सम्भव नहीं और विकारों में दो मुख्य हैं, राग व द्वेष, मन की समता बनाये रखना ही मन की शुद्धि है. समता की साधना ही एक दिन स्वप्नों से मुक्त कर देगी ! विपासना ध्यान इसमें अति सहायक है, देह को देखकर मन को समता में ले आना ही विपासना का लक्ष्य है.


उसके गले में हल्की खराश है, उज्जायी प्राणायाम तथा मुलेठी का सेवन किया. आज एक सखी से उसके बगीचे से नींबू मंगवाए, एक बार पहले उसने कहा था जब चाहिए तब ले लेने के लिए. उसे सब कुछ बिना किसी झिझक के कह सकती है, वह भी उसके जैसी है. वास्तव में देखें तो सभी सब जैसे हैं. एक का मन जान लें तो सबका मन जान लिया जाता है. एक ही है दो हैं ही नहीं, कोई द्वंद्व नहीं है इस क्षण ! वह इस समय ओपेरा के पेन से लिख रही है, जो बहुत अच्छा लिख रहा है. जून पिताजी को लेकर आज डिब्रूगढ़ जा रहे हैं, उनके दातों का एक्सरे कराना है. सुबह वे जल्दी उठे, जून को पुनः प्राणायाम में उत्सुकता जगी है. कल शाम को ध्यान किया, उसे अब ध्यान करने का मन नहीं होता, कोई सदा ही ध्यान में हो जो उसे अलग से ध्यान करने की आवश्यकता महसूस नहीं होती, लेकिन ध्यान की गहराई में जाना भी तो जरूरी है, जहाँ समाधि लग जाये. परमात्मा और सद्गुरु स्वयं ही उसे मार्गदर्शन देते हैं, जो आवश्यक होता है वह स्वयं ही उससे करा लेते हैं और शेष छूट जाता है. अभी कुछ देर पूर्व एक दक्षिण भारतीय सखी से बात की, वह दो महीने चेन्नई में रही पर एक बार भी वहीं रहने वाली दूसरी सखी से न मिली, न फोन पर ही बात की. वह इस बात का इंतजार करती रही कि वह उसे फोन करेगी. छोटे से जीवन में वे कितना तनाव अपने भीतर एकत्र कर लेते हैं. अपेक्षा में जीने वाला मन दुःख को निमन्त्रण देता ही रहता है ! लाओत्से ने कहा है कि कोई उसे हरा नहीं सका, कोई उसका शत्रु भी न बना, कोई उसे दुःख भी न दे सका क्योंकि उसने न जीत की, न मित्रता की, न सुख की अपेक्षा ही संसार से की, जो भी चाहा वह भीतर से ही और भीतर अनंत प्रेम छिपा ही है !   

Wednesday, June 1, 2016

नई नवेली कार


जीवन में हजारों, लाखों, करोड़ों, अरबों या कहें अनंत पल खुशियों के आते हैं, बल्कि कहें कि जीवन सुख व आनन्द की एक अनवरत श्रृंखला है. अनगिनत जन्मों को जोड़कर देखें तो न जाने किस अतीत के काल से वे बने हुए हैं. परमात्मा की भांति वे भी अनादि हैं, उसकी भांति वे भी साक्षी हैं, कुछ न करते हुए भी सबका आनन्द लेने वाले, हर श्वास एक आनन्द की लहर की खबर देती है, जो स्वयं ही आनन्द हो उसे भी अपने आनन्द का स्वाद लेने के लिए देह में आना पड़ता है. परमात्मा को मायाविशिष्ट चेतना में आकर लीला का आनन्द लेना पड़ता है तो जीव को स्वप्नविशिष्ट चेतना में ! वे स्वप्न ही तो देख रहे हैं, एक लम्बा स्वप्न जिसमें उन्होंने एक नया रोल धरा है. शरीर, मन व बुद्धि का एक नया संयोग खड़ा किया है. स्वप्न से जागकर ही पता चलता है क उसमें प्रतीत होने वाले सुख-दुःख मिथ्या थे वैसे ही मृत्यु के क्षण में पता चलता है सब कुछ छूट रहा है, एक स्वप्न का अंत हो रहा है. उनका ध्यान यदि मृत्यु से पूर्व इस ओर चला जाये तो सदा के लिए मृत्यु का भय छूट जाये ! जीवन एक खेल ही लगने लगेगा तब !

आज सद्गुरु ने गणेश जन्म का एक नया अर्थ बताया. पर्व के दोष से उत्पन्न आनंद को ज्ञान के द्वारा पावन किया गया. पर्व पार्वती है, मैल दोष है, जिससे आनंद रूपी गणेश उत्पन्न हुआ है, हाथी का सिर ज्ञान है. गणेश को विघ्न हर्ता भी कहते हैं, हाथी के आगे कोई बाधा नहीं टिकती. गणेश का चूहा तर्क का प्रतीक है और बीज मन्त्र का भी. आज छोटे भाई का जन्मदिन है, वह नई कार ले रहा है, blushing red Iten, इत्तेफाक है कि बड़ी ननद भी काली कार ले रही है. आज भी वर्षा थमी नहीं है, पिछले कई हफ्तों से रोज ही बादल बरसते हैं.

सुंदर वचन सुने आज, ‘सत्य के सूर्य को अस्ताचल ले जाने के लिए संध्या रूपी माया आ जाती है ! कमल को जैसे तुषारापात समाप्त कर देता है वैसे ही सत्य को माया समाप्त कर देती है. ऐसी माया को दूर से ही त्याग देना चाहिए, यही जन्म-मृत्यु का कारण है’. अध्यात्म की साधना का मुख्य उद्देश्य संस्कारों से मुक्ति है. कल रात स्वप्न में एक विकार की ग्रन्थि को पूर्ण रूप से देखा तथा उससे मुक्ति का अनुभव भी किया. पिछले पचीस वर्षों मन न जाने कितनी बार स्वयं व्याकुल हुआ और अन्यों को भी किया. माया के चंगुल में फंसकर कषायों के मल में धंस कर न जाने कितना दुःख वे व्यर्थ ही उठाते रहते हैं. भीतर की ग्रंथियाँ कट रही हैं, मन पावन हो रहा है. परमात्मा को वे अपने भीतर प्रकट  होने से रोकते रहते हैं.अशुद्ध वृत्तियों का पर्दा उन्हें उससे दूर ही रखता है, जबकि वह सहज प्राप्य है.

अज दोपहर से बिजली नहीं है, मौसम अच्छा है सो पंखे के बिना भी ठीक लग रहा है. मृणाल ज्योति के लिए एक कविता लिखी है.शाम को प्रिंट करेगी  कल उन्हें वहाँ जाना है, सम्भव हुआ तो पढ़ भी सकती है. जून अभी तक आये नहीं हैं, उनका गला थोड़ा खराब है. कल वह नाहक ही क्रोधित हो रहे थे. मनुष्य अपने आप को नहीं जानता, इसलिए स्वयं को दुःख दिए जाता है. कृष्ण कहते हैं जो न आकांक्षा करता है न द्वेष करता है, वह मुक्त है.



Monday, May 30, 2016

आपकी अंतरा


एक परिचिता को उसे ऋषिमुख के कुछ अंक भिजवाने थे, तभी नैनी अपने आप ही आ गयी. वह परिचिता जो थोड़ी सी नाराज लगी थीं, खुश हो जाएँगी. आज सुबह से सिर में हल्का दर्द है. वह साक्षी होकर देख रही है. दर्द कितना भी ज्यादा हो या कम हो वह मुस्कुरा सकती है. स्थिति कैसी भी हो वह भीतर सदा एक सी रहने में समर्थ है. ये सब बाहर जो घट रहा है एक नाटक ही तो है. रात को तेज वर्षा होती है, दोपहर को तेज धूप निकलती है. भगवान भी मजाक करने में पीछे नहीं रहते. अब स्वाइन फ्लू का हौवा फैला दिया है, सारे लोग डरे हुए हैं. टीवी पर ‘आपकी अंतरा’ धारावाहिक  आ रहा है. छोटी सी अंतरा उसे बहुत अच्छी लगती है, सो देखती है. अन्तरा ने विद्या को अपनी माँ स्वीकार कर लिया है, विद्या भी उसे सुंदर चित्र बनाते देखकर प्रभावित हुई है. आज दोपहर जून तिनसुकिया से दस अनानास लेकर आए. वह पिछले दो-तीन महीनों से माँ के लिए वह हर वस्तु ला रहे हैं जो कोई भी उन्हें कह देता है कि उन्हें लाभ देगी. वह जीवन भर जो माँ के लिए नहीं कर पाए अब करना चाहते हैं. वह उन्हें नया जीवन प्रदान कर रहे हैं.

साक्षी भाव अब भी है पर मन की पीड़ा साफ दिखाई दे रही है. मन जो सदा नकारात्मकता पर ही जीता है, जो सदा अभाव को ही देखता है. गुरूजी कहते हैं जब प्राण ऊर्जा कम होती है तभी मन अवसाद का शिकार होता है. जून की पीठ में भी पिछले तीन-चार दिनों से दर्द है, उनकी भी प्राण ऊर्जा घट गयी है लेकिन दिन में मेहमानों के सामने वह बहुत प्रसन्न नजर आ रहे था. उसे लगता है मानव के भीतर दो व्यक्ति रहते हैं, एक वह जो बाहर से वह दिखाता है एक जो भीतर से वह है. वास्तव में भीतर वाला ही वह है, बाहर तो मुखौटा लगा लेता है. जैसे उसके भीतर विषैले सर्प हैं जो कभी भी विष की फुफकार छोड़ कर मन को जहरीला बना देते हैं, वैसे ही क्रोध के सर्प जून के मन को भी अशांत बना रहे होंगे. लेकिन जैसे कोई व्यक्ति आग में हाथ डाल दे और फिर चिल्लाये वैसे ही वे भी स्वयं ही इस विष का पान करते हैं. वे चाहें तो एक क्षण में इसे झटक कर अलग हो सकते हैं. हर समय इच्छा उनकी ही होती है कि वे किसे चुनते हैं ! 

साक्षी भाव में बने रहकर मन में उठते विचारों को जब वह देखती है तो कई बार आश्चर्य होता है. मन कितने राग-द्वेष पाले हुए हैं, कितना विकार छिपे हैं अब भी उसके गर्भ में. आज गीता ज्ञान में सद्गुरू ने बताया कि अपने सारे कर्मों को समर्पित कर देने से कर्मों से मुक्त हुआ जाता है. मन, वाणी व काया से होने वाला कोई भी कर्म यदि कोई कर्ता भाव से करे तो भोक्ता बनना ही होगा. सुबह से शाम तक मनसा, वाचा, कर्मणा जितने भी कर्म उसने किये हैं, जो इस क्षण कर रही है तथा जो भविष्य में उससे होने वाले हैं, वे सभी वह परमात्मा को समर्पित करती है. इस जन्म के पूर्व पिछले जन्मों के सारे कर्म भी ! पिछले किसी जन्म में उसने किसी की वस्तु ली और इस जन्म में भी वह उसे मिली लेकिन जिसकी वह वस्तु थी उसकी भी नजर उस पर लगी है. अब उसे उस वस्तु को बचाने की इच्छा होती है, क्योंकि यह भी पता है कि कभी यह वस्तु उसके अधिकार में थी, किन्तु इतना भी ज्ञान है कि इस जन्म में पूर्ण अधिकारी बनकर उसे प्राप्त किया है. भय व्यर्थ है, उसे दूर करना होगा तथा अपने सारे अवगुणों को परमात्मा को समर्पित करना होगा. इस धरती पर आने का मकसद सदा सामने रखना होगा. स्वयं को जागृत रखना होगा जिससे कोई भी पराया न रहे, मन आत्मा में विश्राम पाए तो भीतर का द्वंद्व समाप्त हो जाये. फिर भी यदि संस्कारों के वश मन विचलित हो भी जाये तो उसे साक्षी भाव से देखना होगा !

जीवन स्मृति - टैगोर की यादें


जीवन इतना बहुमूल्य है... यह जगत इतना सुंदर है ! सृष्टि का यह क्रम इतना पावन है और इस व्यक्त के पीछे अव्यक्त की झलक इतनी मोहक है किन्तु वे तुच्छ के पीछे अनमोल को गंवाए चले जाते हैं, मन को व्यर्थ के जंजालों से भरे चले जाते हैं. खाली मन में न जाने कहाँ से शांति और सुकून भरने लगता है और भीतर का वही उजाला बाहर फैलता चला जाता है. कल-कल करती नदी  का स्वर, पंछियों की चहचहाहट, हवा की मर्मर ध्वनि, आकाश की असीमता और धरा की कोख से उपजे हरे-हरे वृक्ष ! सभी उस अव्यक्त की पहचान कराते से लगते हैं. पिछले दो-तीन दिनों से विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की आत्मकथा पढ़ रही थी. ‘जीवन स्मृति’ अनोखी पुस्तक है, कवि का हृदय कितना कोमल होता है. गीत, संगीत और प्रकृति के सौन्दर्य से ओत-प्रोत ! पुस्तक की भाषा कमनीय है. उनके बचपन के संस्मरण, विदेश के अनुभव तथा लिखने की शुरुआत के विवरण, सभी कुछ अनूठा है. उसका हृदय भी उसी आश्चर्य और रहस्य से भर गया है. बचपन की कितनी ही यादें मुखर हो उठीं, वर्षा की फुहार में भीगना तथा कमल कुंड पर वृक्ष के तने का सहारा लेकर लिखना, हवा में ठंड में गोल-गोल घूमना, हरी घास पर चुपचाप लेटे रहकर आकाश को तकना और स्वयं को प्रकृति के निकटतम महसूस करना ! परमात्मा कितने रूपों में आकर्षित कर रहा था !

जून आज कोलकाता गये हैं. मोबाइल भूल से छोड़ गये थे फिर किसी के द्वारा मंगवा लिया. भोजन के बाद वह विश्राम कर रही थी कि नन्हे ने फोन करके उसे जगा दिया. अब इस नये कमरे में वर्षा की बूंदों की आवाज सुनते हुए बैठना अच्छा लग रहा है. माँ-पिताजी सो रहे हैं. दोपहर के एक बजे हैं, एक सखी को राखी बनवाने आना था पर वर्षा उसे आने नहीं देगी.

कल राखी का त्योहार है ! श्रवण की पूर्णिमा, प्रेम भरी भावनाओं की अभिव्यक्ति का दिन ! उसे एक अच्छा सा sms लिखना है, जो छोटा भी हो और संदेश भी देता हो !

सावन सूखा हो या भीगा
पूनम रस की धार बहाए,
रंग बिरंगे धागों में बंध
कोमल अंतर प्यार जगाए !

कल वे मृणाल ज्योति गये थे, दो सखियाँ उसके साथ थीं. रक्षा बंधन का उत्सव मनाया. शाम को एक सखी भी घर पर आयी. वातावरण प्रेमपूर्ण था. उसके भीतर के विकार धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं. ईर्ष्या, लोभ, क्रोध, अहंकार तथा मोह ये विकार ही भावों की दूषित कर देते हैं. लोभ, मोह और अहंकार तो पहले भी घटे थे पर शेष सूक्ष्मरूप से बने ही थे. भीतर कितनी शांति है, परमात्मा भी यही चाहता है, वह उसके चारों ओर कैसे अद्भुत साधन जुटा रहा है. विपश्यना का प्रवचन सुनते-सुनते ध्यान गहरा गया था आज. वर्तमान पर ध्यान करते-करते कैसी तैल धारवत् वृत्ति हो गयी थी. सद्गुरु उसे पथ दिखा रहे हैं. ज्ञान के मोती उनके चारों ओर बिखरे ही हुए हैं पर वे अज्ञान को ही चुनते हैं. विचार अज्ञान की ही उपज है ऐसा विचार जो व्यर्थ ही भीतर चलता रहता है जो भीतर का संगीत सुनने नहीं देता. खाली मन तन को भी कितना हल्का बना देता है. इस क्षण कितना सुकून है भीतर, जैसे सब ठहर गया है ! आज सुबह उठी तो शरीर एकदम हल्का था. दरअसल भार शरीर का नहीं होता, मन का होता है !


Thursday, May 26, 2016

शाही टोस्ट का नाश्ता


अभी कुछ देर पहले पिताजी का फोन आया, वह उसके सास-ससुर से बात करना चाहते थे. माँ लेटी थीं, उसे लगा सो रही हैं, पिताजी ने बात की तो वह भी जग गयीं और शिकायत करने लगीं कि उन्हें फोन क्यों नहीं दिया. उन्हें दुखी देखकर उसे अच्छा नहीं लगा फिरसे फोन लगाया. बाद में उसने सोचा तो पाया कि स्वयं को ही पीड़ा से बचाने के लिए उसने ऐसा किया न कि उन्हें सुख पहुँचाने के लिए. मन का स्वार्थ साफ-साफ दिख रहा था.

कल ‘गुरू पूर्णिमा’ थी, उन्होंने एओल सेंटर में सत्संग व ध्यान किया, प्रसाद बांटा और घर लौट आये. आज सुबह बैंगलोर आश्रम में हुए उत्सव का प्रसारण देखा. गुरूजी ने इस दिन की महिमा बताई फिर सबने झूम-झूम कर गीत गए ! प्रभु की कृपा से ही ऐसे आनन्द का अनुभव होता है. यदि कोई दिन भर बादशाह बनकर रहना चाहता है तो प्रभु के आगे समर्पण करना सीखना होगा. जो सहज ही उपलब्ध है उसके लिए याचना करनी पड़े इसमें कितना आश्चर्य है पर यह जीवन रहस्यों से भरा पड़ा है. भीतर के आनन्द का अनुभव अपने आप में एक रहस्य है, कहाँ से आता है ? उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं, केवल एक तृप्ति का अहसास होता है, इसे शब्दों में कहना बेहद कठिन है, कैसे होता है ? क्या होता है, कुछ कहा नहीं जा सकता.

नन्हे का जन्मदिन उन्होंने मनाया, उसके मित्र आये थे, दोनों एक रात रुके. कल की योग कक्षा में बच्चों को चित्र बनाने को कहा था. सुंदर रंगों को कागज पर उतारते बच्चे कितने प्रसन्न लग रहे थे. आज बहुत दिनों बाद पड़ोसिन से बात हुई, उसे दिल का एक पुराना रोग है उसके साथ टिशु डीजनरेट होने का रोग भी हो गया है. उसने कई बार कहा पर ध्यान आदि में उसकी रूचि नहीं है. टीवी पर  यदि वह सत्संग लगा दे तो माँ सुनती हैं, पिताजी बाहर बैठकर अखबार पढ़ते हैं, एक-एक लाइन पढ़ जाते हैं. उसके आस-पास उनके मित्रों व परिचितों में कोई भी ऐसा नहीं है जो परमात्मा के रस्ते जा रहा हो पूरे मन से. सभी व्यस्त हैं, जीवन के कार्य उन्हें इतनी फुर्सत ही नहीं देते, या मन ही मन सभी उसी पथ के राही हों, कौन जानता है ? सभी गुप्त साधना करते हो सकते हैं, परमात्मा के बिना किसी का भी गुजरा नहीं. वह परमात्मा हरेक के भीतर है, वही उन्हें निमन्त्रण देता होगा.

आज शाम को उनके यहाँ सत्संग है. भजन गाने पर कैसी मस्ती छा जाती है, पर जिसे उस मस्ती की खबर ही न हो वह कैसे उसे महसूस करेगा. कल शाम को एक सखी व उसकी भाभी को बुलाया है, जो कुछ दिनों के लिए आई है. शाही टोस्ट व इडली बनाएगी नूना. कल दीदी-जीजाजी से बात की, मन का बोझ जो था ही नहीं उतर गया. उस दिन कितना अजीब सा स्वप्न देखा था. मृत्यु के बाद का स्वप्न ! नरक के दर्शन किये, अपने पाप की सजा भोगी. उस दुःख को महसूस किया. वर्षों पहले जब वह अज्ञान से ग्रस्त थी, मन पूर्वाग्रहों से ग्रस्त था, क्योंकि उन्हें यात्रा पर जाना था, उन्होंने एक आत्मा को कितना दुःख दिया था. वे भूल ही गये इस घटना को जैसे यह उतनी ही तुच्छ हो जैसे कोई घर की गंदगी बाहर फेंक दे फिर भूल जाये. स्वप्न में एक कपड़े की गुड़िया दिखी बिना आँख-नाक की. इससे स्पष्ट क्या हो सकता है और अंत में यह कहते हुए रुदन कि यह यात्रा तो उन्हें बहुत मंहगी पड़ी जी ! कितना अजीब स्वप्न था पर कितना सत्य था. उनके कृत्यों का फल तो उन्हें ही मिलना है, चाहे जिस रूप में मिले. उन्हें उसे स्वीकारना ही होगा. 

Wednesday, May 25, 2016

नयी कोंपलें


कल रात भर माँ अस्पताल में नहीं सोयीं, नन्हा भी उनके सामने कुर्सी पर बैठा रहा. इतनी कम उम्र में इतनी समझ और सेवा का भाव है उसमें. घर आकर भी सो नहीं पा रहा था, जब फोन करके पता किया दादीजी सो गयी हैं, तो ही सोया है. कल जून का गला खराब लग रहा था. पिछले एक महीने से वे दिन में कई बार अस्पताल में आना-जाना कर रहे हैं. उसके बाएं गाल में थोडा दर्द है आखिरी दांत के पास. सभी के मनों में एक प्रश्न है क्या माँ एक बार पुनः स्वस्थ हो पाएंगी. उत्तर अज्ञात है. शुरू-शरू में उन्हें देखने कई लोग आये धीरे-धीरे संख्या कम होती जा रही है. उसकी दो सखियाँ यहाँ हैं नहीं. कल उनमें से एक का जन्मदिन है, वह खुश रहे, स्वस्थ रहे उसके सभी स्वप्न साकार हों यही शुभकामना उसके दिल से हर वक्त निकलती रहे. आत्मस्मृति में रहकर तो प्रेम ही बरसाया जा सकता है. अनंत, अपार प्रेम..वे आत्मा ही तो हैं जिसने अपने पूर्व कर्मों का हिसाब चुकाने के लिए शरीर धारण किया है. इस जन्म में कोई कर्म बंधन का कारण न बने ऐसा प्रयास उन्हें करना है !

 माँ घर आ गई हैं, पहले से बेहतर हैं. कल उनके कमरे के लिए नया टीवी आया है. एयर टेल का नया कनेक्शन भी, जिसमें ‘संस्कार’ शामिल है. आज महीनों बाद पुनः संस्कार पर सद्गुरु को देखा, सुना. मनसा, वाचा, कर्मणा तीनों पर ध्यान देना होगा ऐसा गुरूजी ने कहा. उसे अपनी भाषा पर ध्यान देना होगा, बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देना ठीक नहीं है. नींद पर भी ध्यान देना होगा, स्वप्नावस्था पर भी, जो जगते समय भी जारी रहती है, दिन में भीतर जो विचार चलते हैं वही तो रात्रि को स्वप्न बन जाते हैं, नींद टूटी भी नहीं कि मन स्वप्न में डूब जाता है, बल्कि डूबा ही रहता है. क्रोध, हिंसा, अभिमान तथा लोभ के विचार तथा व्यर्थ के संकल्प भी. जीवन भर जिस सत्य को पाने की आकांक्षा भीतर रही है, वह जैसे भूलती जा रही है. जो वे इकट्ठा कर रहे हैं, वह जीवन के विकास के लिए जरा भी आवश्यक नहीं है. समय और परिस्थितियों के गुलाम बनकर उन्हें जीना है या सत्य को जानने के लिए बने एक अमिट व्यक्तित्त्व बनकर ? भीतर का द्वंद्व जो समाप्त हो गया सा लगता रहा है, आज पुनः इकट्ठा हो गया है. जीवन में कोई सचेतन लक्ष्य न हो तो जीवन एक सूखे पत्ते की तरह हवा के झोंके से इधर-उधर डोलता रहता है, सो पुनः स्वयं को चिन्तन के द्वारा सचेत करना है, सजग होना है.

आज पुनः भीतर लिखने की प्रेरणा हुई है. सद्गुरु की कृपा का बादल भीतर बरसा है और मन की धरती को हरा-भरा कर अंकुआ गया है, भाव उठने लगे हैं, विचारों की कोंपलें लगने लगी हैं, ज्ञान जो सुप्त प्रायः हो गया था, जागृत होने लगा है. जड़ता जो घर करती जा रही थी, अब चेतना में बदल रही है. जीवन कितना सुंदर है, प्रकृति आजकल अपने सुन्दरतम रूप में नजर आ रही है. चारों ओर हरियाली, शीतलता तथा स्वच्छता. पौधे धुले-धुले से नजर आते हैं. मानव कृत गंदगी तो बरसात में बढ़ जाती है पर उस ओर उसकी नजर ही नहीं जाती, आकाश से दृष्टि हटे तब तो धरा पर जाये. ‘गुरू पूर्णिमा’ आने वाली है. आत्मा गुरू का सान्निध्य दिन भर तो कमोबेश रहता है पर रात्रि को निद्रा और स्वप्नावस्था प्रगाढ़ हो गये हैं. स्वप्न में भी यह भान रहे कि वह पृथक है और जो स्वप्न देख रहा है वह मन है, नींद में भी जगे-जगे से रहे, ऐसा अब नहीं होता. खजाना भीतर है ही यदि कोई उसका उपयोग न करे तो दोष किसका है ? 

Tuesday, May 24, 2016

सुखबोधानन्द जी का आगमन


जून आए और उसी शाम माँ को अस्पताल में भर्ती किया गया. आज चौथा दिन है. बारी-बारी से सभी अस्पताल जाते हैं. रात को नन्हा रहता है दादी के साथ. दिन में देर तक पिताजी. आज उनके स्वास्थ्य में कुछ सुधार नजर आ रहा है. कल क्लब में मीटिंग है, उसे दो कार्य करने हैं, पहला मृणाल ज्योति पर छोटा सा भाषण दूसरा हिंदी कविता पाठ का निर्णायक बनना. उसने सोचा वह मासिक डोनर मेम्बर बनने के लिए सदस्याओं से अपील करेगी. दान की महिमा पर भी कुछ कहेगी.  

नये महीने का आरम्भ हुए आठ दिन हो गये, और वह पहली बार लिख रही है. माँ अस्पताल से वापस आयीं पर दो दिन बाद फिर उन्हें जाना पड़ा. अभी तक वहीं पर हैं. टीवी पर एक सिख संत कह रहे हैं जिन्दगी की राह का आरम्भ गर्भ में होता है, मातापिता की वासना के साथ जब जीव की वासना मिल जाती है तब एक जीवन शुरू होता है. जन्म लेने के बाद जो जन्मदिन मनाते हैं वह वास्तविक नहीं है. कोई अपना आदि नहीं जानता. इसी तरह कोई नहीं जानता सृष्टि कब बनी, क्योंकि जब सृष्टि का निर्माण हुआ उसके पूर्व समय था ही नहीं. जो सूक्ष्म से स्थूल बनता है वही स्थूल से सूक्ष्म हो जाता है. उस सूक्ष्म में प्रवेश करने के लिए सूक्ष्ममति चाहिए. मति स्थूल तब हो जाती है जब हर वक्त संसार के विचार ही मन में घूमते रहते हैं. सत्संग करते करते जब चेतन मन का दायरा बड़ा होने लगता है तब मति सूक्ष्म होने लगती है. जब मति सूक्ष्म हो जाती तब भीतर का ज्ञान प्रकट होता है.

आज शाम को क्लब में सुखबोधानन्द जी का कार्यक्रम है. उनके प्रवचन सीडी से सुने हैं पहले, एकाध बार टीवी पर भी सुना है. किताब पढ़ने का अवसर कभी न कभी मिल जायेगा. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में उनके लेख पढ़े हैं पर सामने सुनने का अवसर मिलेगा, अवश्य अच्छा लगेगा. जून एक बार घर आएंगे, नन्हे को अस्पताल व पापा को घर छोड़ देंगे. उनकी नई नैनी काम ठीक कर रही है, उसे आज एक हफ्ता हो गया है, सभी काम जान गयी है. घर जाने की जल्दी नहीं होती उसे, अभी विवाह नहीं हुआ, एक बार इस चक्कर में आ गई तो फटाफट काम खत्म करके भागने की फ़िक्र में रहेगी. पुरानी के साथ किस्मत ने जो किया उसका चले जाना ही ठीक था. पिछले महीने उसके अपाहिज पति का लम्बी बीमारी के बाद देहांत हो गया, दो बच्चे हैं, पांच वर्ष की बेटी दो वर्ष का पुत्र. ससुराल में रहकर ठीक एक महीने का शोक उसने मनाया पर उसके अगले ही दिन पड़ोसी के पुत्र के साथ कहीं चली गयी. बच्चे दादा-दादी के पास हैं. ममता को किस तरह भुला कर उसने यह कदम उठाया होगा. आस-पड़ोस के लोग आश्चर्य कर रहे हैं पर वह जानती रही होगी, उसके बिना भी बच्चे सुरक्षित हैं. रोज-रोज के कलह से तो अच्छा है दूर चले जाना. जीवन कितना विचित्र है, माँ जब ठीक थीं उसके बच्चों के साथ खेलती थीं, बीमार होने के बाद एक दिन कहने लगीं देखना यह चली जाएगी, उस वक्त सबने उनकी बात को मजाक में लिया था.