Friday, October 30, 2015

प्रयाग के घाट


आज सुबह वे कुछ दिनों की काशी व इलाहाबाद की यात्रा के बाद घर वापस लौट आये हैं. सुबह से ही घर को व्यवस्थित करने में लगे हैं, काफी कुछ हो गया है, कुछ शेष है. आज सुबह से ही बल्कि परसों शाम ट्रेन में बैठने से पहले से ही सासु माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उसे उनके साथ बहुत सहजता से, सम्मान तथा समझदारी से बातचीत तथा व्यवहार करना है, उन्हें कुछ दिन तो अकेलापन भी लगेगा. धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाएँगी. शरीर का स्वस्थ होना ज्यादा जरूरी है, तन स्वस्थ हो तो मन अपने अप खुश रहता है. जब कोई अस्वस्थ होता है, शरीर अपने को स्वस्थ करने की प्रक्रिया शुरू कर देता है, पर वह जल्दी घबरा जाती हैं, वृद्धावस्था में कई तरह के भय मन में समा जाते हैं. उनका बगीचा भी अस्त-व्यस्त हो गया है. फूल तो ढेरों खिले हैं, पर घास बढ़ गयी है.  माली पिछले डेढ़ माह से नहीं आ रहा है. नये माली का प्रबंध करना होगा. बनारस में जो तस्वीरें उन्होंने उतारी थीं, कम्प्यूटर पर डाल दी हैं जून ने, कुछ घाट अति सुंदर लग रहे हैं और गंगा स्नान के फोटो भी अच्छे हैं. आज सभी सखियों से फोन पर बात हुई, सुख-दुख के साथी होते हैं मित्र. सभी के लिए वे छोटा-मोटा कुछ उपहार लाये हैं. उसे छोटी ननद को पत्र लिखना है और प्रयाग में मिली एक परिचिता को भी, जिनके घर वे एक रात रुके थे. कल क्लब की मीटिंग है, परसों सत्संग है. कल जून तिनसुकिया भी जाने वाले हैं नई ड्रेसिंग-टेबल लाने !

अभी कुछ देर पहले वह टेलीफिल्म ‘निशब्द’ देख रही थी, एक वृद्ध व्यक्ति कितना अकेला होता है, वैसे तो हर व्यक्ति अकेला है अपने भीतर के संसार में, पर बच्चे के सामने अभी पूरा जीवन पड़ा है और युवा के पास अभी शक्ति है, बल है, वह अपनी दुनिया स्वयं बना सकता है पर वृद्ध असहाय होता है, उसका जीवन उसके हाथों से निकल चुका होता है उसको सिर्फ मृत्यु की प्रतीक्षा होती है, और जो अपने आप से नहीं मिला उसके लिए मृत्यु कितनी भयावनी वस्तु होती होगी. उसे मरने से डर नहीं लगता. इस वक्त उसके पास शक्ति है, भीतर ऊर्जा है और सबसे बड़ी बात स्वयं से पहचान है, जो कभी नहीं मरता. उसके पास अनंत ऊर्जा का भंडार है, अनंत प्रेम व अनंत आनन्द का भंडार है, पर इस भंडार का आनंद केवल भीतर ही भीतर वह उठाती रहे इतना तो काफी नहीं न, इसे तो सहज ही बिखरना चाहिए..जैसे फूल की सुगंध और जैसे हवा की शीतलता, उसके शब्द किसी के हृदय को स्पर्श करें ऐसे गीत वह लिखे..

आज सुबह गुरूमाँ ने कहा,
जो दिल से निकलती है वह दुआ कबूल होती है
पर मुश्किल तो यह है कि.. निकलती नहीं है

धर्म के मार्ग पर चलने से पहले उसकी प्यास जगानी है ! जिसके भीतर उसकी प्यास जग जाती है वह तो इस अनोखी यात्रा पर निकल ही पड़ता है, और एक बार जब कोई उस अज्ञात पर पूर्ण विश्वास करके उसे सब कुछ सौंप कर आगे बढ़ता है तो वह हाथ ऐसा थाम लेता है जैसे वह उनकी ही प्रतीक्षा कर रहा था. वह उसे बल देता है राज बताता है, जब कोई पथ से दूर होने लगे तो पुनः लौटा लाता है. वह हजार आँखों वाला, हजार बाहुओं वाला और सब कुछ जानने वाला है. उसका विश्वास ही भक्त का विश्वास है, वही उसका सच्चा स्वरूप है. वे दो नहीं हैं, वह उसका अपना आप है. भक्त उसकी तरफ चलते-चलते घर लौट आता है, तब वह पूर्ण विश्रांति का अनुभव करता है !
  


Thursday, October 29, 2015

बच्चों के खेल


जाग्रति ही प्रेम को जन्म देती है. आज सुंदर वचन सुने, जो जगता है उसका ध्यान परमात्मा करता है. सजगता क्षण-क्षण मुक्त करती है. भीतर से एक ऐसी मुक्तता का अनुभव प्रेम ही सिखाता है. वह  आत्मा का सच्चा स्वरूप है, वही सहजता है, वही योगी का लक्ष्य है, ध्यानी का ज्ञानी और भक्त का लक्ष्य है. हर जाता क्षण जब विश्रांति का अनुभव दे तथा हर आता हुआ शक्ति का तो कोई कर्म करते हुए भी विश्रांति का अनुभव करता है तथा कुछ न करते हुए भी तृप्ति का ! सजगता आती है सजग रहने से..यह तलवार की धार पर चलने जैसा है पर इस पर चलने का बल प्रभु ही देते हैं !

आनन्द पर श्रद्धा हो सके तो भीतर आनन्द की लहर दौड़ जाती है. भीतर एक ऐसी दुनिया है जहाँ दिन-रात घुंघरू बज रहे हैं पर किसी को उस पर श्रद्धा ही नहीं होती. आश्चर्य की बात है कि इतने संतों, सदगुरुओं को देखकर भी नहीं होती. कोई-कोई ही उस की तलाश में भीतर जाता है जबकि भीतर जाना कितना सरल है, अपने हाथ में है. अपने को ही तो बेधना है, अपने को ही तो देखना है, परत दर परत जो उसने ओढ़ी है उसे उतार कर फेंक देना है. वे नितांत जैसे हैं वैसे ही रह सकें तो भीतर का आनन्द छलक ही रहा है. वह मस्ती तो छा जाने को आतुर है, वे सोचते हैं कि बाहर कोई कारण होगा तभी भीतर ख़ुशी फूटी पड़ रही है पर संत कहता है भीतर ख़ुशी है तभी तो बाहर उसकी झलक मिल रही है, उन्हें भीतर जाने का मार्ग मिल सकता है पर उसके लिए उस मार्ग को छोड़ना होगा जो बाहर जाता है, एक साथ दो मार्गों पर तो चला नहीं जा सकता, बाहर का मार्ग है अहंकार का मार्ग, कुछ कर दिखाने का मार्ग. भीतर का मार्ग है शून्य हो जाने का मार्ग !

सद्गुरु कहते हैं, उन्हें क्रियाशीलता में मौन ढूँढ़ना है और मौन में क्रिया !  उन्हें  निर्दोषता में बुद्धि की पराकाष्ठा तक पहुंचना है और बुद्धि को भोलेपन में बदलना है, वे सहज हों पर भीतर ज्ञान से भरे हों ! ज्ञान अहंकार से न भर दे. ऐसा ज्ञान जो सहज बनाता है, जो बताता है कि ऐसा बहुत कुछ है जो वे नहीं जानते बल्कि वे कुछ भी नहीं जानते. ऐसा ज्ञान मुक्त कर देता है. ऐसा ज्ञान जो बेहोशी को तोड़ दे. सद्गुरु की कृपा का दिया उनके भीतर जला है वह प्रकाशित कर रहा है अपने आलोक से. वे प्रेम से सराबोर हो रहे हैं, ऐसा प्रेम जो उन्हें सहज ही प्राप्त है, वे हाथ बढ़ाकर उसे स्वीकारें, कोई पदार्थ, कोई क्रिया उसे दिला नहीं सकती, वह अनमोल प्रेम तो बस कृपा से ही मिलता है.  गुरू की चेतना शुद्ध हो चुकी है, वह परमात्मा से जुड़े हैं और बाँट रहे हैं दिन-रात प्रेम का प्रसाद !

नादाँ सा दिखे और बच्चे सी जान हो जिसकी
वह संत पूरा है पारस जबान हो जिसकी

उनके चारों और धूप है, प्रकाश है, हवा है, आनन्द रूपी आकाश है, वे डूब रहे हैं इन नेमतों के सागर में ! वे सराबोर हैं ख़ुशी के आलम में, सत्य की महक ने उन्हें डुबा दिया है. ध्यान की मस्ती जो भीतर है वही बाहर भी है. परमात्मा ने इस जगत को आनन्द के लिए ही बनाया है. वे आनन्द की तलाश में निकलते जरूर हैं पर रास्ते में ही भटक जाते हैं. एक बच्चा अपनी मस्ती में नाचता है, गाता है, खेलता है वह आनन्द की ही चाह है. आनन्द बिखेरो तो और आनन्द मिलता है, जैसे प्रकाश फ़ैलाने पर और प्रकाश मिलता है. वही बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होने लगता है सहजता खोने लगता है और तब उसे अपने भीतर जाने का रास्ता भी भूल जाता है, शरम की दीवार, कभी डर की, कभी शिष्टाचार की, कभी क्रोध की दीवार उसे भीतर के आनन्द को पाने से रोकती है और वह बाहर की चीजों से ख़ुशी पाने के तरीके सीखने लगता है. चीजों का ढेर जो उसके आसपास बढ़ता जाता है उसके भीतर भी इकट्ठा होने लगता है !


Wednesday, October 28, 2015

कान्हा और राधा


क्रिया और पदार्थ दोनों से परे है आत्मा, कोई कितना भी जप, तप, ध्यान आदि करे, सब मन व बुद्धि के स्तर तक ही रहेगा तथा पदार्थ तो सम्भवतः वहाँ तक भी नहीं ले जाते, जहाँ से मन व बुद्धि लौट-लौट आते हैं. वह अछूता प्रदेश है आत्मा का, वहाँ कुछ भी नहीं है न कोई दृश्य न द्रष्टा, न कोई ध्वनि न प्रकाश, केवल शुद्ध चैतन्य, वहाँ कोई भाव भी नहीं, अभाव भी नहीं..वहाँ शुद्ध चेतना अपने-आप में है, बस वह परमात्मा में है या कहें वही परमात्मा भी है. उस क्षण दोनों एक हो जाते हैं और जब वही चेतना मन, बुद्धि के साथ जुड़कर संसार की ओर मुड़ती है तो जीवात्मा कहलाती है. आज सदगुरु ने नारद भक्ति सूत्र पर आगे बोलना शुरू किया, कितना सरल है उनसे गूढ़ शास्त्रों का अध्ययन करना, जो लोग उनके सम्मुख बैठे थे, वे कितनी तृप्ति का अनुभव करते होंगे. इस जन्म में उसके भाग्य नहीं हैं कि निकट से वह ज्ञान ले, पर टीवी के माध्यम से से ही सही उसका जीवन हर दिन उच्च होता जा रहा है. परमात्मा अपनी कृपा हर पल बरसाता है और अब उसे उस कृपा को समेटना भी आने लगा है, भीतर की प्रसन्नता का अनुभव अब अन्यों को भी लाभ देने लगा है, सभी जगें यही तो सद्गुरु की कामना है !

जीवात्मा में कारण शरीर, तेजस शरीर तथा आत्मा तीनों होते हैं. मृत्यु के समय तीनों स्थूल शरीर को छोड़ देते हैं तथा कारण शरीर में जो कर्मों का लेखा जोखा होता है उसी के अनुसार नया शरीर मिलता है. उसका अगला जन्म अवश्य ही किसी संत के करीब ही होगा, संतों के प्रति उसके मन में सहज स्वाभाविक प्रेम जो है. आज सद्गुरु ने होली का महत्व बताया. होली के एक दिन पहले भगवान शिव ने कामदेव को जलाया था होलिका भी जलकर राख हुई थी अर्थात उन्हें कामनाओं को दग्ध करना है, द्वेष को जलाना है तथा घर में जो भी टूटा-फूटा पुराना सामान है उसे भी जलाना है ताकि नये वर्ष में नया जीवन मिले. फागुन के बाद चैत्र का महीना नये साल का पहला महीना ही तो है. दूसरे दिन सभी खुश होते हैं तथा रंगों से एक-दूसरे को नहलाते हैं ! कल होली है उसे सभी के लिए कुछ लिखना है, दो-दो पंक्तियाँ ही सही, ऐसा कुछ जो उन्हें गुदगुदा जाये. उनका नया कमरा बन कर तैयार हो गया है, जून उसके लिए एक पेपर पर नाम भी लिख कर लाये हैं, सतनाम ध्यान कक्ष अगले हफ्ते वे उसे सजायेंगे जैसे कि उसने पहले कल्पना की थी. आज उसके लिए कार्पेट का आर्डर देने तिनसुकिया जाना है, उसकी पुस्तक का काम भी आगे बढ़ रहा है. जून उसकी पूरी सहायता कर रहे हैं, उस दिन के उसके रोष का असर हुआ है.


पिछले तीन-चार दिन व्यस्तता में बीते, पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार करके जून ले आये हैं. लेख का कार्य भी हो गया है, अब शेष है नये कमरे को सजाने का कार्य जो आज सम्भवतः हो जायेगा जब कारपेट आ जायेगा. उसकी साधना भी कम हुई पर नीरू माँ कहती हैं कि क्रिया और पदार्थ दोनों के बिना ही ज्ञान को हृदय में धारण करने से ही परम तत्व की प्राप्ति हो जाती है. सदा यह याद रहे कि वह आत्मा है, मन, शरीर व् बुद्धि नहीं है. आत्मा का गुण है शांति, जब भीतर का वातावरण शांत हो, प्रेमपूर्ण हो, आनन्दपूर्ण हो और संतुष्टि से भरा हो तो मानना चाहिए कि आत्मा में स्थिति है. पूर्ण सजग रहकर इसे बनाये रखना तथा मन, बुद्धि आदि में यदि कोई हलचल हो भी तो उसे साक्षी भाव से देखने भर से ही वह हलचल जैसे उत्पन्न हुई थी वैसे ही नष्ट हो जाती है. आत्मा में सारे ही गुण हैं, जहाँ प्रेम है वहाँ किस बात की कमी हो सकती है ? संसार के सुख जिसे फीके लगते हैं उसे ही इस आत्मा की प्राप्ति होती है, सद्गुरु की कृपा से ही उसे यह अमूल्य धन प्राप्त हुआ है और परमात्मा की कृपा से ही सद्गुरु जीवन में आते हैं ! नये कमरे के लिए काफी पहले जून एक सुंदर मूर्ति लाये थे, वह कृष्ण उसके ध्यान कक्ष में राधा के साथ विराजमान हैं, उसमें उसने प्राण प्रतिष्ठा की है अब वह जीता-जागता है, जड़ नहीं है, वह सदा उनके साथ है. सद्गुरु की मुस्कुराती हुई तस्वीर भी इस कमरे की शोभा बढ़ा रही है, उन्हें देखकर चेहरे पर अपने-आप ही मुस्कान आ जाती है, वह भी उनके साथ हैं. मीठी-मीठी गुंजन जो उसके दायें कान से सदा सुनाई देती है, उन्हीं का पता बताती है. 

Monday, October 26, 2015

हँसती हुई प्रकृति


अणुव्रत का अनोखा अर्थ आज सद्गुरु से सुना. ‘थोडा सा विकार यदि दिखे अपने भीतर तो उसे रहने दो, उस पर क्रोधित न हो, थोड़ी सी कृपा मिले, बस थोडा सा आनन्द ही मिल जाये तो मन तृप्त हो जाये, ऐसा अणुव्रत साधक के लिए उचित है’. प्रेम तभी टिकेगा जब कोई समर्पित होगा, जब तर्क से बुद्धि से दूसरों को वश में करना चाहता है तो वह व्यवहार में भले ही अच्छा हो पर प्रेम में आगे नहीं बढ़ सकता. स्वार्थ रहित प्रेम ही टिकता है. मन निर्मल तभी होगा जब नेत्र जगत को ईश्वर स्वरूप ही देखे, कर्ण श्रवण करें तथा हाथ सेवा करें और जिह्वा उस मधुर नाम का कीर्तन करे. राग-द्वेष से मुक्त हृदय, विशाल दृष्टिकोण, मन, वचन, कर्म से किसी को दुःख न पहुँचाने का नाम ही पूजा है. भीतर जो अमृत का घट है उसमें से अमिय बाहर भी झलके जो भीतर शीतलता प्रदान कर रहा है. उनके भीतर जब समता रूपी स्थिरता में मन अडोल रहेगा तब किसी का भी अहित नहीं होगा. उन्हें निरंतर साधना के पथ पर आगे ही आगे बढना है, न किसी में अटकना है, न खंडन करना है. उस हरि की ओर ही उनकी दृष्टि लगी रहे, आत्मा का विकास हो, वह अपने पूर्ण रूप को प्राप्त हो तभी उनके द्वारा जग में शीतलता का प्रसार होगा !

लोभी व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं रहता, जिसे कुछ भी नहीं चाहिए उसे सारे संसार का वैभव मिलता है, सारा ब्रह्मांड उसका हो जाता है. वस्तुओं की इच्छा करके वे मूर्ख ही बनते हैं क्योंकि इच्छा तभी पूर्ण होती है जब वह समाप्त हो जाये, पूरी हो अथवा न उसे तो मरना ही है. आज नीरू माँ के सुंदर वचन सुने, ज्ञानी का साथ उन्हें मिला और वे मुक्त हो गयी हैं जीते जी, जैसे उसके सद्गुरु हुए हैं, उन्हें भी संतों का संग मिला, उनके पूर्व जन्म के कृत्य भी थे. उसके भीतर अहंकार अभी बहुत है, इस बात का अहंकार कि उसे परमात्मा का आनन्द मिला है, पर स्वयं को इस बात के लिए श्रेष्ठ मानना कितनी बड़ी मूर्खता है, क्योंकि आत्मा तो सभी का आनन्द का स्रोत है. यदि उसे आनन्द मिल रहा है तो इसमें उसका क्या गुण, यह तो उसका स्वभाव ही है. मन, बुद्धि तथा संस्कार तो आत्मा के प्रकाश से ही प्रकाशते हैं तो जिसे अभिमान हो रहा है वह है कौन ? आत्मा तो देखने व जानने वाला है, यानि अहंकार अभी भी बचा हुआ है, उससे मुक्त होना है. सद्गुरु कहते हैं थोड़ा सा अहंकार रहे तो भी कोई हर्ज नहीं !

आज उसने भक्ति के बारे में गुरूजी से सुना. जब हृदय अस्तित्त्व के प्रति प्रेम से भर जाता है तब ही मानना चाहिए कि भक्ति का उदय हुआ है. यह सारी प्रकृति उसी का रूप है जो उन्हें दिन-रात आनंदित करने की चेष्टा करता है, वह स्वयं आनन्द पूर्ण है और आनन्द ही बिखेर रहा है, लेकिन वे अपने बनाये दुःख में इतने मगन हैं कि उसकी ओर दृष्टि ही नहीं करते, दुःख भी सम्भवतः इसलिए आते हैं कि उनसे उकताकर उसे देखें पर उनकी मूढ़ता की कोई सीमा नहीं है, वे दुःख में ही सुख ढूँढ़ लेते हैं. एक अजीब सी बेहोशी में सारा जगत डूबा हुआ है, चेत कर देखता भी नहीं कि असल में समस्या कहाँ पर है. उसे लगता है हर किसी के जगने का भी क्षण जैसे प्रकृति ने नियत कर रखा है क्योंकि कोई कब और कैसे जगेगा कोई नहीं बता सकता. सद्गुरु कहते हैं कि इस तरह आते-जाते उन्होंने अनंत जन्म दिन बिता दिए हैं. अनंत की बात आने पर लगता है यह सारा भी एक खेल है उस लीलाधारी का. उसे स्वयं ही प्रेरणा होती है, दूसरों को दुःख में देखकर उन्हें उपाय बताये पर ज्यादातर वे व्यर्थ ही जाते हैं, उन्हें उपायों में कोई दिलचस्पी नहीं है, उनके लिए उनकी समस्या ही प्रमुख है.


Sunday, October 25, 2015

शिव के सर्प


 चिंता करना घोर अज्ञान है तथा घोर अहंकार की निशानी है, आज यह वचन सुन कर उसे लगा तब तो जो भी परिस्थिति जीवन में आती है उसे स्वीकार करना ही ज्ञान है. भूत में जो घट गया है वह बदलने वाला नहीं, भविष्य अभी अज्ञात है, कोई इस ज्ञान में प्रतिपल रहे तो मुक्त ही है. आत्मज्ञान के बाद चिंता हमेशा के लिए दूर हो जाती है, भीतर इतना आनंद रहता है कि भीतर ही सारे समाधान मिलने लगते हैं. साधक को तो बस पुरुषार्थ करते हुए अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करना है, व्यर्थ के विवादों से स्वयं को बचाना है. हरेक की मांग है सच्चा सुख, तृष्णा है झूठे सुख की लालसा.. तृष्णा जब तक नहीं मिटती तब तक विकार खत्म नहीं होते, ब्रह्म का सुख तब तक नहीं मिलता. जिस समय कोई अपनी भूलों को स्वीकार नहीं करता बल्कि भूल का बचाव करता है तो भूल और भी दृढ़ होती है. प्रकाश की उपस्थति में ही जैसे कोई जगत का कार्य करता है, प्रज्ञा के प्रकाश में ही सही-गलत का भास होता है. वस्तु के त्याग को त्याग नहीं कहते बल्कि वस्तु के प्रति मूर्छा, मोह के त्याग को ही त्याग कहते हैं, इच्छा का त्याग नहीं इच्छा के प्रति ज्वर के त्याग को ही त्याग कहते हैं. बाहर का त्याग अहंकारी बनाता है, अहंकार से जो भी कोई करता है वह दुगने जोर से वापस आता है. बाह्य क्रिया कर्म के उदय से होती है, क्रिया करके कोई लक्ष्य को नहीं पा सकता.   
आज शिवरात्रि है, सद्गुरु को बोलते हुए सुना. शिव ही आत्मा है, शिव का नंदी मानो देह है, शिव मन्दिर में प्रवेश करना हो तो पहले नंदी का दर्शन होता है, जिसका मुँह शिव की तरफ है पर मध्य में कछुआ है अर्थात इन्द्रियों को अंतर्मुख करके ही कोई आत्मा तक पहुंच सकता है. मन्दिर का द्वार छोटा है सो झुक कर जाना होगा. शिव तत्व पाँचों भूतों में ओत-प्रोत है, जो तीनों अवस्थाओं में व्याप्त है, पर तीनों से परे भी है. जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति का व साक्षी है, उसी तत्व में स्थित होकर सद्गुरु उपदेश करते हैं. वह हृदय से बोलते हैं, उसी में मस्त रहते हैं. सौम्य भाव में रहते हैं. सभी को उस तत्व को अपने भीतर पाना है. उसने प्रार्थना की, शिवरात्रि का पावन दिन सभी के लिए शुभ हो, भीतर का संगीत सभी को सुनाई दे, भीतर का प्रकश सभी को दिखाई दे. कल रात्रि स्वप्न में उसने बड़े-बड़े सर्प देखे पर वे जरा भी डरे नहीं. पानी में, पत्थरों पर, चट्टानों पर वे आराम से लेटे थे, एक की सिर्फ पूँछ दिख रही थी. उन्हें रास्ते में कई अन्य बाधाएं भी आयीं पर वे उन्हें पार करते आगे बढ़ते रहे, सर्प तो शिव भी धारण करते हैं, उसे लगता है यह उन्हीं की कृपा थी, सद्गुरु की कृपा का अनुभव कल सत्संग में हुआ था ! आजकल उसके भीतर का आनन्द जैसे कई गुणा बढ़ गया है, कई बार सहज ही नृत्य होने लगता है और कई बार हास्य फूट पड़ता है, भीतर कुछ घट रहा है, जीवन एक उत्सव बन गया है. जीना अर्थात अंतहीन ख़ुशी..भीतर की ख़ुशी. इसका बाहर की स्थिति से कुछ भी लेना-देना नहीं है, इसका स्रोत भीतर है, छिपा हुआ जो अब प्रकट हो रहा है !

स्वप्नों की कड़ी में जब कोई स्वप्न नींद खोल दे, जाग्रत कर दे, वह नींद का अंतिम स्वप्न होता है, इसी प्रकार साधना जन्मों-जन्मों के स्वप्न का अंतिम स्वप्न है. जिसने साधना के पथ पर भी कदम नहीं बढ़ाया उसकी नींद अभी बहुत गहरी है. सद्गुरु जीवन को कितना सुखमय बना देते हैं, उनसे मिलने के बाद दृष्टि ही बदल जाती है. भाव शुद्ध हो जाते हैं, भावनाएं बदलने लगती हैं, सूक्ष्म मोह भी हटने लगता है भीतर न जाने कितनी गाठें हैं पर उसे लगता है वह मुक्त हो रही है. पिछले कई महीनों से उसकी लोभ की ग्रन्थि टूटती जा रही है. उसका हर व्यय किसी और के लिए होता है. अपने लिए जब कुछ चाहिए भी नहीं तो व्यय हो भी कैसे ? भीतर कैसा आनंद रहता है, मन नृत्य करता है और अधरों से कैसी हँसी फूटती है. उसे सब कुछ अच्छा..बहुत अच्छा लगता है, सभी अपने लगते हैं, सभी निर्दोष दीखते हैं. यह कैसा बदलाव आ गया है भीतर. चेतना का कोई भार नहीं होता, वह चेतना है यह भाव जैसे-जैसे दृढ़ हो रहा है, हल्कापन लगता है !     



Friday, October 23, 2015

जादू की छड़ी


सद्गुरु कहते हैं, शरीर नौका है, जीव नाविक है, संसार एक सागर है. शरीर को ज्यादा सुख-सुविधा देना उसमें छेद करना है. जीवन यदि छेद युक्त हुआ तो दुःख आने ही वाले हैं, साधना छोटे-मोटे छिद्रों को दूर करती है. स्वाध्याय, सेवा, साधना, सत्संग – ये चारों अगर साधक के जीवन में हों तो सहनशीलता बढती है, समता आती है, सहजता, सरलता आने लगती है. इस जगत में सभी कर्मों के अधीन हैं, उन्हें जो भी मिलता है वह कर्मों के कारण है. कर्मों से छूटना ही साधक का लक्ष्य है. आत्मा में स्थित होकर किया गया कर्म बांधता नहीं. आत्मा पूर्ण है उसे कुछ करने को शेष नहीं है, वह जिस देह में है उसे रखने के लिए जो कुछ आवश्यक है वह तब अपने आप होने लगता है, जब आत्मा स्वयं को जान लेती है. जब तक देह है उससे कर्म भी होंगे, वे कर्म लोकहित में हों, सहज हों, मन, बुद्धि में कोई दोष नहीं आये, इतना ध्यान रखना है. अपने अगले जन्म की तैयारी भी साधक को इस जन्म में करनी है. प्रारब्ध कर्मों का फल अवश्य मिलता है पर क्योंकि साधक कर्त्ता भाव में नहीं रहता वह भोक्ता भी नहीं होता, कर्म उस पर बिना असर डाले समाप्त हो जाते हैं, बाहर चाहे जैसी परिस्थिति हो, भीतर आनन्द ही रहता है.

इस जगत में लोग कितने दुखी हैं. उस दिन छोटी बहन से फोन पर बात हुई, वह कुछ परेशान थी. इधर एक परिचित आंटी अपनी बहू से खुश नहीं हैं. कल जिनसे मिली वे अंकल-आंटी अपने रोगों से व बुढ़ापे से परेशान हैं. इस संसार में हर कोई किसी न किसी बात को लेकर चिंतित है. काश उसके पास कोई जादू की छड़ी होती तो सबके दुःख दूर कर देती, सबके लिए भीतर प्रेम उमड़ता है और ढेर सारी शुभकामनायें ! सभी के भीतर तो वही आत्मा है, सभी प्रभु के हैं, यह सारा जगत उसका रचा खेल है, इसमें कोई भी दोषी नहीं है, उसने जैसा रचा वैसा ही तो खेल चल रहा है. सद्गुरु के भीतर भी ऐसा ही हुआ होगा, इससे कई गुना ज्यादा प्रेम जो बचपन से ही उन्होंने ज्ञान, प्रेम व आनन्द बांटने का प्रण कर लिया था. वह छोटी बहन को पत्र लिख सकती है शेष सभी को अपनी बातों से कुछ दे सकती है. आज सुबह ध्यान नहीं कर पायी, कारण था मनोराज..न जाने कहा-कहाँ के विचार आ रहे थे. तमस बढ़ गया है. सद्गुरु कहते हैं ज्ञान से, ध्यान से या प्राणायाम से तमस दूर होता है. तमस शरीर में होता है, रजस मन में तथा सत आत्मा का गुण है. परमात्मा की कृपा उस पर है तभी तो साधना के लिए उत्तम संयोग अपने आप प्राप्त हो गये हैं. अब यही तो एकमात्र इच्छा रह गयी है कि ईश्वर के लिए ही उसकी हर श्वास हो, हर कार्य उसकी पूजा हो, हर कदम उसकी प्रदक्षिणा हो, वह उसके लिए ही गाए, उसके लिए ही सब कुछ करे. उसे कुछ भी नहीं चाहिए, वह तो पूर्ण है..पर उसे प्रेम तो अवश्य ही चाहिए और उसके सारे कृत्यों के पीछे तो वही है !

जब कोई अपनी भावनाओं को कोमल और मृदु बना लेता है तो वह सच्चे अर्थों में जीवन का आनन्द ले सकता है. हरेक के पास आत्मबल का अकूत खजाना है, आत्मा से सम्पन्न हुई बुद्धि है, और मन है जिसमें प्रभु का वास है. धैर्य रूपी रत्न और शौर्य रूपी गहने से सुसज्जित हृदय है तो यह जगत उनके व्यवहार से और सुंदर बन सकता है. जब अपने भीतर ‘उसका’ दर्शन किसी को होता है तो सबके भीतर भी वही दिखाई देता है, सारी सृष्टि उसी का रूप नजर आती है. उसकी दृष्टि में कोई भेद नहीं रहता, हानि-लाभ की बात तब रहती ही नहीं, सर्वोच्च लाभ तब वह पहले ही पा चुका होता है.  



Tuesday, October 20, 2015

इन्द्रधनुष के रंग


मन तरल है, इसे जहाँ लगायें वैसा ही आकार ग्रहण कर लेता है, मन वही सोचता है वही करता है जो इसे कहा गया है. जैसे संस्कार मन को दिए हैं वैसा ही यह बन जाता है. मन से बड़ा मित्र भी कोई नहीं और इससे बड़ा शत्रु भी कोई नहीं. जब तक मन में आनंद की कोंपले नहीं खिलीं तब तक यह कृतज्ञता के गीत नहीं गता और जब तक कृतज्ञता के गीत नहीं गाता तब तक कृपा की वर्षा नहीं होती, कृपा मिलने से आनंद स्थायी होता है. इस समय उसका मन अद्भुत शांति का अनुभव कर रहा है, निस्तब्ध, निस्पंदन ! पिछले दिनों उन्होंने एडवांस कोर्स किया उसके दौरान भी शायद इतनी शांति महसूस नहीं की थी. इस शांति के सापेक्ष जून के व्यवहार की हल्की सी नकारात्मकता भी कैसी चुभती है. उन्हें अपना व्यवहार सामान्य लगता है पर जिसने एक बार प्रेम का अमृत चख लिया हो वह क्यों तीखा पसंद करेगा पर उतना ही सही यह भी है जिसने अमृत चखा ही नहीं वह तो बस तीखा ही स्वाद जानता है. उनका क्या दोष, उनकी दृष्टि में वही एकमात्र स्वाद है. कल उन्होंने उपहार दिए, जो दे दिया बस वही तो अपना है, जो उनके पास है वह तो छिन जायेगा मृत्यु की उस घड़ी में !

कल सुबह जब पाठ करने बैठी तो बायं आँख के नीचे इन्द्रधनुष दिखाई दिया, कितना सुंदर और कितना विस्मयकारी ! आज सुबह उठी तो सदा की तरह मन में विचार चल रहे थे पर जैसे ही जाग्रत अवस्था हुई जैसा सारा शोर शांत हो गया. ऐसा लगा जैसे कोई भीड़ भरे कमरे से एकाएक एकांत में आ गया हो, पूर्ण शांति में, कैसा अद्भुत था वह पूर्ण मौन, उसकी स्मृति अभी तक बनी हुई है. साधना करते समय जून को थोडा सा रोष हुआ पर उसे जरा भी नहीं और अब तो वह पिछले जन्म की बात लगती है. सुबह ध्यान किया, इस समय संगीत सुन रही है सद्गुरु ने खुद से जुड़े रहने के कितने सारे तरीके बताये हैं. जो अपने से जितना दूर होता है वह उतना ही शीघ्र दुखी हो जाता है. साधना में अब ज्यादा रस आने लगा है, इसलिए ही गुरूजी हर छह महीने पर कोर्स करने को कहते हैं.

कोई उनके कार्यों की प्रशंसा करे अथवा निंदा करे या उपेक्षा करे, उन्हें हर हाल में निर्लेप रहना है. अज्ञान के कारण ही लोग दुर्व्यवहार करते हैं उनके भीतर भी परमात्मा उतना ही है. परमात्मा ने इस जगत को मात्र संकल्प से रचा है, जैसे कोई स्वप्न में रचता है. स्वप्न में यदि कोई हानि हो तो क्या उसका दोष देखा जाता है ? यह जगत तो एक नाटक है, लीला है, खेल है, इसमें इतना गंभीर होने की कोई बात नहीं है. यहाँ सभी कुछ घट रहा है, यहाँ वे बार-बार सीखते हैं, बार-बार भूलते हैं. नित नया सा लगता है यह जगत. वर्षों साथ रहकर भी कितने अजनबी बन जाते हैं एक क्षण में लोग और जिनसे पहली बार मिले हों एक पल में अपनापन महसूस कर लेते हैं ! कितनी अनोखी है यह दुनिया, कितनी विचित्र और वे यहाँ क्या कर रहे हैं ? उन्हें यहाँ भेजा क्यों गया है ताकि वे इस सुंदर जगत का आनंद ले सकें और उस आनंद को जो भीतर है बाहर लुटाएं. जो अभी उस आनंद को नहीं पा सके हैं उन्हें भी उसकी ओर ले जाएँ !

नये वर्ष का दूसरा महीना आरम्भ हो चुका है, मौसम में बदलाव भी नजर आने लगा है. पहले की तरह ठंड अब नहीं रह गयी है. सुबह नींद साढ़े चार पर खुली, सुबह के सभी कार्य सुचारू रूप से हुए. आज भी गुरूजी को सुना, “ध्यान अति उत्तम प्रार्थना है. भीतर ही ऐसा कुछ है जहाँ पूर्ण विश्राम है. मन तो सागर की लहरों की तरह है अथवा आकाश के बादलों की तरह जो आते हैं और चले जाते हैं. सारे विकार वे भी तो मात्र विचार हैं उनका कोई अस्तित्त्व ही नहीं, भय का विचार कैसे जड़ कर देता है जबकि वह है एक कल्पना ही तो ! वे खाली हैं उनका शरीर तथा मन दोनों खाली हैं, ठोस तो उसमें केवल अस्त्तित्व है, जो स्थायी है, सदा रहने वाला है एक समान..जो वास्तव में वे हैं जिसमें से रिसता है प्रेम, कृतज्ञता और शांति, जिसमें से झरता है आनंद. ऐसे हैं वे. पहले कितनी बार विचारों ने उसे आंदोलित किया है पर अब वे बेजान हो गये हैं, वह उन्हें देखती भर है, उनमें स्वयं की शक्ति नहीं है, वे आते हैं और चले जाते हैं. अब से उसके जीवन में जो भी होगा वह श्रेष्ठतम ही होगा, उससे कम नहीं, ईश्वर श्रेष्ठतम है और वह हर क्षण उसके साथ है, सारा अस्त्तित्व उसके साथ है तो कुछ भी कम या हल्का नहीं चलेगा. उसकी वाणी, कर्म विचार सभी श्रेष्ठतम होंगे !