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Friday, March 8, 2019

बनारसी साड़ियाँ




ग्यारह बजने को हैं. आज सुबह छह बजे वे उठे. स्वास्थ्य ठीक लग रहा था. कल दोपहर बाद से तबियत कुछ नासाज थी. सम्भवतः चुनार घूमते समय लू लग गयी थी. शाम को बाजार जाना था. विवाह के लिए तीन बनारसी साड़ियाँ व एक सूट खरीदा. दूकानदार ननद की सहेली की जान-पहचान का था और बनारसी साड़ियों का थोक विक्रेता था, बहुत धैर्य के साथ उसने वस्त्र दिखाये. वापसी में वे विश्वनाथ गली गये. कंगन, हार, चूड़ियाँ आदि कुछ सामान खरीदा. भीड़ भरी सड़कों से गुजरना यहाँ एक बड़े साहस का काम है. धूल, धुआं, भीड़ आदि की इंतिहा होती है. घर से वे कुछ दूरी पर ही थे कि उसकी तबियत बिगड़ने लगी. घर पहुंचने तक ठंड लगने लगी थी. चार-पांच कम्बल ओढ़ने के बावजूद भी ठंड लग रही थी. काफी देर बाद ठंड कम हुई और नींद आ गयी. सुबह उठी तो सब कुछ ठीक लग रहा था. शाम को जून के एक मित्र के यहाँ निमन्त्रण है.

संध्या के पांच बजे हैं. आज उन्हें वापस जाना है, यानि कुल पांच घंटे यहाँ और शेष हैं. दोपहर को भोजन के बाद विश्राम के लिए भीतर के कमरे में जा ही रहे थे कि एक बहुत पुराने परिचित वृद्ध मिलने आ गये, जिनकी बातें करने की आदत है. जून पहले उनसे मिलने गये थे पर जितनी देर बैठे रहे, वह पहुंच ही नहीं पाए. इसी बात पर अपने एक डाक्टर मित्र की समय की पाबन्दी के कितने किस्से उन्होंने सुना दिए. मकान की खरीद-फरोख्त का काम करते हैं, कई दुकानें आदि भी हैं, जहाँ भारतीय व विदेशी पर्यटक आते हैं. उनके तीन सुपुत्र हैं, अपने एक पोते के विवाह के चक्कर में जेल भी हो आये हैं. दहेज उत्पीड़न के केस में उनकी पतोहू व उसके पिता ने परिवार के पांच लोगों को बीस दिन तक जेल की हवा खिलवा दी थी. उनकी बातें किसी कहानी के पात्र के मुख से निकली हुई लग रही थीं. मौसम यहाँ गर्म है, तापमान इकतालीस डिग्री होगा. अज फेसबुक पर आश्रम के फोटो प्रकाशित किये, जो सक्तेश गढ़ में स्थित है, और तहसील चुनार व जिला मिर्जापुर में आता है.

पूरे ग्यारह दिनों के बाद डायरी उठायी है. कितना कुछ घटा पिछले दिनों. तेरह की रात वे ट्रेन में बैठे, पन्द्रह की सुबह घर पहुँचे. सोलह को इतवार था, बच्चों को योग भी सिखाया. अगले दिन जून को दिल्ली जाना था. वह बुध को लौटे, तब तक भी उसका स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक नहीं हुआ था. अगले दिन वे अस्पताल ले गये, दवा शरू हुई. इस इतवार तक स्वास्थ्य पुनः प्राप्त हुआ. कल सोमवार को  जून के एक सहकर्मी ने अपने घर बुलाया था. उन्होंने योग का एक नया सीडी दिया है, आज उसमें से देखकर कुछ आसन किये. कल पहली बार ॐ ध्यान’ कराया, आज ‘राम ध्यान’ करना है, अवश्य ही साधिकाओं को अच्छा लगेगा. बंगाली सखी ने व्हाट्सएप पर प्रश्न का कोई जवाब नहीं दिया. वे आज वे लोग वापस आ रहे हैं. लोग वफा उतनी शिद्धत से नहीं निभाते जितनी शिद्धत से बेवफाई निभाते हैं. शनिवार को एक नयी यात्रा पर निकलना है. नन्हे ने अगले इतवार के लिए वह होटल बुक कर दिया है, जहाँ पर वे विवाह समारोह करने वाले हैं. कल स्कूल से लौटते समय क्लब की एक सदस्या के यहाँ गयी, जिसका विदाई समारोह होने वाला है. उसके लिए एक कविता लिखनी है.

Saturday, December 8, 2018

मणिकर्णिका घाट



आज अचानक उसे चार वर्ष पहले बनारस में बिताये दिनों की याद हो आई है, कोई न कोई कारण अवश्य होगा इसके पीछे, हो सकता है इसलिए कि एक और यात्रा पर अगले माह उन्हें जाना था, वह शायद सम्भव नहीं हो पायेगी. वे कोलकाता तक फ्लाइट से गये थे और उसके आगे कालका मेल से. सुबह उठे तो बिहार आ गया था, खेतों में सुनहरी फसल खड़ी थी, कहीं कट रही थी, कहीं कटने के इंतजार में. मीलों तक फैले खेत कहीं खाली पड़े थे. खेतों में नर-नारी दोनों काम कर रहे थे. मुगलसराय स्टेशन पर उतरे तो एक टैक्सी वाला सामने आ गया, उसके पास अम्बेसडर थी, कहने लगा एक-दो वर्षों में ये कारें दिखनी बंद हो जाएँगी, अब पार्ट्स नहीं मिलते. अगले दिन वे गंगा घाट गये. होटल बिलकुल घाट पर था, मीर घाट पर जो अपेक्षाकृत साफ-सुथरा था. कमरे में सामान रखकर दशाश्वमेध घाट पर शीतला माता के मन्दिर गये, आस-पास बहुत गंदगी थी, पर लोगों की कतार लगी हुई थी. गंदगी से जैसे उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था. मणिकर्णिका घाट का दृश्य विचित्र था. दस-बारह शव जल रहे थे, जैसे ही एक शव जलता, चिता पर पानी डालकर उसे ठंडा कर दिया जाता व फूल चुनकर वे लोग गंगा में बहा देते थे. सीढ़ियों पर लोग बैठे थे जिनके प्रियजन जल रहे थे, पर कोई रोना-धोना नहीं था. माहौल उत्सव सा ही लग रहा था, मृत्यु का उत्सव ! लकड़ियों के ढेर लगे थे और तेज हवा में चिताएं धू-धू कर जल रही थीं. पुआल में एक अंगारा रखकर चिता जलाने के लिए लाया जाता था. देखते-देखते ही नई-नई लाशें चिता पर रखी जा रही थीं. यह कर्म चौबीस घंटे चलता रहता है. कहते हैं काशी में मरने वालों को मोक्ष मिल जाता है. गंगा की धारा हजारों वर्षों से यहाँ बह रही है, मृतकों को अपने आश्रय में लेती आ रही है, लोग इसे पावनी गंगा मानते हैं. कुछ देर बाद उन्होंने भी एक दूसरे घाट से गंगा पार जाकर इसकी धारा में स्नान किया. अपने अंदर के कल्मष को दूर करने में यह अवश्य ही सहायक होगा इस भावना के साथ. पानी पहले तो ठंडा लगा फिर देह अभ्यस्त हो गयी. गंगा के पावन जल का स्पर्श अत्यंत सुखद था, पैरों के नीचे लोगों द्वारा छोड़े गये वस्त्र छूने में आ रहे थे. सफाई की बहुत आवश्यकता है यहाँ, पर लोगों की भीड़ अनवरत आती रहती है की सफाई के लिए अलग से समय निकलना कठिन होता होगा. वापसी में उन्होंने आरती का भी आनंद लिया. आरती भव्य थी, अद्भुत क्षण थे वे, परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव हो रहा था. उसके बाद विश्वनाथ मंदिर भी गये थे वे, जहाँ पुलिस का सख्त इंतजाम था. देवी अन्नपूर्णा के दर्शन किये शनिदेव के और बड़े हनुमान के भी. विशालाक्षी मन्दिर तथा अन्य भी कई मन्दिर मार्ग में देखे. होटल लौटे तो चाँद आकाश में चमक रहा था और शीतल हवा बह रही थी. अगले दिन सुबह घाट पर ही होने वाले योगाभ्यास में भाग लिया. उसके बाद घर लौटते समय वारही देवी के दर्शन किये. एक गली में था मन्दिर. मूर्ति दर्शन भी विचित्र था. ऊपर से एक चौकोर छिद्र में से झांककर देखने होता था, नीचे जिस कक्ष में मूर्ति थी वहाँ जाना सम्भव नहीं था. बनारस की हर गली में कोई न कोई छोटा बड़ा मन्दिर है, अद्भुत नगरी है यह. कुछ देर एक चबूतरे पर बैठकर गंगा की लहरों से आती ठंडक तथा सूर्य की नव रश्मियों का स्पर्श करते हुए ध्यान भी किया. शाम को नगर में स्थित आयुर्वैदिक केंद्र में पहली बार शिरोधारा का अनुभव लिया. पडोस के घर में विवाह था, उसमें भी सम्मिलित हुए थे. बनारस से वे वापस कोलकता आये थे और बंगाली सखी की बिटिया के विवाह में सम्मिलित हुए थे.

रात्रि भोजन हो चुका है. नन्हा अभी तक नहीं आया है, शायद मार्ग में हो, लगभग बारह घंटे की उसकी ड्यूटी है. अपने काम के अलावा आजकल उसका कोई दूसरा शौक नहीं रह गया है. शाम को वे टहलने गये. दुकान से इडली के लिए सूजी खरीदी. आज अपेक्षाकृत ठंड ज्यादा है. सुबह छह बजे से थोड़ा पहले उठे. फूलवाली ने तब तक अपनी दुकान नहीं लगाई थी, जब वह प्रातः भ्रमण के लिए गयी, न ही सूर्य देवता ने दर्शन दिए जब छत पर गयी. हर दिन अन्य दिनों से कितना भिन्न होता है. उनकी भावनाएं भी भिन्न हों तो क्या बड़ी बात है. मन बदलता है, आत्मा सदा एक सी रहती है, द्रष्टा है, साक्षी है. जून ने कहा वह बहुत धीरे-धीरे खाती है. उसने इस बात को गम्भीरता से ले लिया, पल भर के लिए ही सही अपनी मूल स्थिति से डिग गयी, पर आत्मा को मंजूर नहीं है. वह एक बार अपने सिंहासन पर बैठ गयी है तो उसे अपनी गद्दी से उतरना मंजूर कैसे होगा.


Tuesday, February 28, 2017

बनारस के पान


सुबह सवा छह बजे वे स्टेशन पहुंच गये, मुगलसराय स्टेशन. रात्रि को ट्रेन में नींद आती-जाती रही, एक कोई जन तेज ध्वनि में खर्राटे ले रहे थे, दिन भर की बातें भी मन में आ रही थीं, पर भीतर कोई जाग रहा था जो सचेत कर रहा था. कल एक नई पुस्तक भी पढ़नी शुरू की ट्रेन में, “The Einstein Factor” अच्छी किताब है, इसके अनुसार कल्पना में जो चित्र भीतर दीखते हैं उन पर ध्यान देने से कितने नये आयाम खुल सकते हैं जीवन में. जीवन को वे जैसा चाहे मोड़ सकते हैं, स्वयं के मालिक बनना ही धार्मिक होना है. कल दोपहर पूर्व ग्यारह बजे ही वे कोलकाता तक की हवाई यात्रा के लिए निकले थे, जहाँ पहुँचकर सीधा रेलवे स्टेशन, रस्ते में पुराना कोलकाता दिखा, पच्चीस वर्ष पूर्व जैसा देखा था लगभग वैसा ही. मुगलसराय से बनारस तक की यात्रा में सड़कों में कुछ सुधार अवश्य दिखा पर झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले गरीब वैसे ही थे, विकास का का फल उन्हें नहीं मिल रहा है. यहाँ घर पर पूर्व से ज्यादा स्वच्छता व सम्पन्नता दिख रही है, मौसम में हल्की ठंडक है.

आज नवरात्रि का तीसरा दिन है. कल वे जून के एक बचपन के मित्र के यहाँ गये. वाराणसी की रौनक देखी, भीड़ भरा बाजार, जगह-जगह सजे हुए मन्दिर, सडक पर कीर्तन करती महिलाओं का जुलूस, देवी के भजन जो गूँज रहे थे. उनके घर में प्रेम भरा स्वागत हुआ. लौट कर उसने विवरण लिखा.

बनारसी दावत

एक स्कूटर, एक बाइक, एक किया आटोरिक्शा
चले सभी मिल एक साथ, लक्ष्य था घर उनका !

भीड़ भरा हर चौराहा था, चौकाघाट से चली सवारी
लहुराबीर से सिगरा होके, औरंगाबाद की आयी बारी !

नीचे था पान गोदाम, पान सहेजे गिने जा रहे
घर के लोग भी सँग औरों के, हरे पान को छांट रहे

अम्मा की तस्वीर पुरानी, याद दिलाती दिवस पुराने
झुक-झुक बच्चे पैर छू रहे, ऊपर मिले सभी सयाने !

घर में इक मंदिर सजा था, देवी पूजा का आयोजन
एक दीप अखंड जल रहा, सुबह-शाम जहाँ होता वन्दन !

सभी बैठ मिल बातें करते, तभी नाश्ते सम्मुख आये
बर्फी, लड्डू, और समोसे, काजू और मखाने लाए !

गाजर का हलवा स्वादिष्ट, आलू के कटलेट भी आये
खट्टी, मीठी चटनी के सँग, एक-एक को थे सब भाए !

साबूदाने की फिर खिचड़ी, मठरी, भुजिया कुरमुरी थी
अंत में मिली चाय बनारसी, ऐसी अद्भुत आवभगत की !

तीसी, खसखस के लड्डू थे, शुद्ध घी में डूबे पूरे
इससे भी बढ़कर थे दिल वे, बच्चों, बड़ों सभी के प्यारे !


Friday, October 30, 2015

प्रयाग के घाट


आज सुबह वे कुछ दिनों की काशी व इलाहाबाद की यात्रा के बाद घर वापस लौट आये हैं. सुबह से ही घर को व्यवस्थित करने में लगे हैं, काफी कुछ हो गया है, कुछ शेष है. आज सुबह से ही बल्कि परसों शाम ट्रेन में बैठने से पहले से ही सासु माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं है, उसे उनके साथ बहुत सहजता से, सम्मान तथा समझदारी से बातचीत तथा व्यवहार करना है, उन्हें कुछ दिन तो अकेलापन भी लगेगा. धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाएँगी. शरीर का स्वस्थ होना ज्यादा जरूरी है, तन स्वस्थ हो तो मन अपने अप खुश रहता है. जब कोई अस्वस्थ होता है, शरीर अपने को स्वस्थ करने की प्रक्रिया शुरू कर देता है, पर वह जल्दी घबरा जाती हैं, वृद्धावस्था में कई तरह के भय मन में समा जाते हैं. उनका बगीचा भी अस्त-व्यस्त हो गया है. फूल तो ढेरों खिले हैं, पर घास बढ़ गयी है.  माली पिछले डेढ़ माह से नहीं आ रहा है. नये माली का प्रबंध करना होगा. बनारस में जो तस्वीरें उन्होंने उतारी थीं, कम्प्यूटर पर डाल दी हैं जून ने, कुछ घाट अति सुंदर लग रहे हैं और गंगा स्नान के फोटो भी अच्छे हैं. आज सभी सखियों से फोन पर बात हुई, सुख-दुख के साथी होते हैं मित्र. सभी के लिए वे छोटा-मोटा कुछ उपहार लाये हैं. उसे छोटी ननद को पत्र लिखना है और प्रयाग में मिली एक परिचिता को भी, जिनके घर वे एक रात रुके थे. कल क्लब की मीटिंग है, परसों सत्संग है. कल जून तिनसुकिया भी जाने वाले हैं नई ड्रेसिंग-टेबल लाने !

अभी कुछ देर पहले वह टेलीफिल्म ‘निशब्द’ देख रही थी, एक वृद्ध व्यक्ति कितना अकेला होता है, वैसे तो हर व्यक्ति अकेला है अपने भीतर के संसार में, पर बच्चे के सामने अभी पूरा जीवन पड़ा है और युवा के पास अभी शक्ति है, बल है, वह अपनी दुनिया स्वयं बना सकता है पर वृद्ध असहाय होता है, उसका जीवन उसके हाथों से निकल चुका होता है उसको सिर्फ मृत्यु की प्रतीक्षा होती है, और जो अपने आप से नहीं मिला उसके लिए मृत्यु कितनी भयावनी वस्तु होती होगी. उसे मरने से डर नहीं लगता. इस वक्त उसके पास शक्ति है, भीतर ऊर्जा है और सबसे बड़ी बात स्वयं से पहचान है, जो कभी नहीं मरता. उसके पास अनंत ऊर्जा का भंडार है, अनंत प्रेम व अनंत आनन्द का भंडार है, पर इस भंडार का आनंद केवल भीतर ही भीतर वह उठाती रहे इतना तो काफी नहीं न, इसे तो सहज ही बिखरना चाहिए..जैसे फूल की सुगंध और जैसे हवा की शीतलता, उसके शब्द किसी के हृदय को स्पर्श करें ऐसे गीत वह लिखे..

आज सुबह गुरूमाँ ने कहा,
जो दिल से निकलती है वह दुआ कबूल होती है
पर मुश्किल तो यह है कि.. निकलती नहीं है

धर्म के मार्ग पर चलने से पहले उसकी प्यास जगानी है ! जिसके भीतर उसकी प्यास जग जाती है वह तो इस अनोखी यात्रा पर निकल ही पड़ता है, और एक बार जब कोई उस अज्ञात पर पूर्ण विश्वास करके उसे सब कुछ सौंप कर आगे बढ़ता है तो वह हाथ ऐसा थाम लेता है जैसे वह उनकी ही प्रतीक्षा कर रहा था. वह उसे बल देता है राज बताता है, जब कोई पथ से दूर होने लगे तो पुनः लौटा लाता है. वह हजार आँखों वाला, हजार बाहुओं वाला और सब कुछ जानने वाला है. उसका विश्वास ही भक्त का विश्वास है, वही उसका सच्चा स्वरूप है. वे दो नहीं हैं, वह उसका अपना आप है. भक्त उसकी तरफ चलते-चलते घर लौट आता है, तब वह पूर्ण विश्रांति का अनुभव करता है !
  


Tuesday, June 4, 2013

बेबी'ज डे आउट


कल रात समाचारों में सुना कि भूतपूर्व प्रधानमन्त्री श्री मोरार जी देसाई का निधन हो गया, जून का ऑफिस आज बंद है. परसों उन्हें घर जाना है, सो आज ही तैयारी कर लेंगे. एक वर्ष बाद यात्रा करने का विचार ही मन को आनन्दित कर रहा है. नन्हे की वार्षिक परीक्षा ठीक चल रही है, आज तीसरा पेपर है. उसने घड़ी की ओर देखा, लिखित परीक्षा हो चुकी होगी, मौखिक चल रही होगी. उसका रोल नम्बर देर से आता है, सो वह बैठे-बैठे कल की तरह बोर हो रहा होगा या मन ही मन “ब्रेकफास्ट सॉंग” याद कर रहा हो. कल दिन भर गर्मी थी पर शाम होते होते बादल इकट्ठे होने शुरू हो गये, रात भर पानी बरसता रहा, वे दूसरे कमरे में सोये थे पर उमस के कारण नींद ठीक से नहीं आयी, जून उठते ही बोले, वह रात भर नहीं सो पाए, नन्हा भी कैसे चुप रहता बोला, मुझे रात भर ठंड लगती रही. आज वे अपने कमरे में ही सोयेंगे, खुला हवादार कमरा है यह. मदर टेरेसा पर डेसमंड डेजी की किताब पढ़कर उसके मन में भी कुछ करने की प्रेरणा जगी है, रात को सोते समय ये विचार स्पष्ट होते हैं पर दिन भर के कामों में जाने कहाँ गम हो जाते हैं. फिर भी घर से आकर छोटी सी ही सही शुरुआत अवश्य करेगी.

वे यात्रा से लौट आये हैं, इस बार बनारस पहले से कहीं ज्यादा अस्वच्छ लगा. उस घर में लोग भी बहुत हो गये हैं, गर्मी भी काफी थी सो वे तीनों ही वहाँ परेशान से रहे, आने से एक दिन पहले नौका विहार का आनन्द लिया जो सदा याद रहेगा, फोटोग्राफ भी अच्छे आये हैं, काशी विश्वनाथ मन्दिर भी देखा जो बहुत प्राचीन है और बहुत विशाल भी, इसी कारण तो बनारस अपनी अस्वच्छता तथा भीड़भाड़ के बावजूद पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. वे वापस आए तो उसकी पुरानी पड़ोसन बस स्टैंड पर लेने आई थी, उसका स्वागत दिल को छू गया, वह  कल कोलकाता जा रही है इलाज कराने, इंशाल्लाह वह बिलकुल ठीक हो जाये और अगले साल तक उसकी मनोकामना पूर्ण हो. कल दोपहर वह अपनी बंगाली सखी के घर गयी, वे लोग सदा के लिए दिल्ली जा रहे हैं, पहले-पहल यह खबर सुनकर वह बहुत उदास हुई थी, पर अब मन संभल गया है.

नन्हे की टेनिस की कोचिंग चल रही है, सुबह पांच बजे जाता है और दोपहर बाद भी. स्कूल बंद है सो समय ही समय है उसके पास. कल वह दोपहर को अपना एक कुरता काढ़ने में व्यस्त थी, शाम को लाइब्रेरी गये वे. आज सुबह समय निकाल कर बेडरूम की दोनों अलमारियां साफ़ कीं. दोपहर को गेस्टरूम की करने का इरादा है, फिर रह जाती है स्टोर व  किचन की सफाई तथा डाइनिंग रूम के शेल्फ की सफाई, इतवार तक पूरा घर स्वच्छ दिखेगा. नन्हा इस वक्त पडोस के मित्र के यहाँ गया है.


आज इतवार है, सुबह नाश्ता करके दोनों चले गये, नन्हा अपनी आर्ट क्लास में और जून कार को गैराज ले गये हैं. कल शाम वे उन्हें अपने दफ्तर ले गये नन्हे को कम्प्यूटर गेम खिलाने. आज मौसम गर्म है, मई शुरू हो गया है पर कल उन्होंने पहली बार एसी चलाया. शाम को जब टहलने गये तो गेस्ट हॉउस से घर तक का रास्ता बोझिल लगने लगा, जैसे-जैसे गर्मियां बढ़ती जाएँगी शामों को टहलना मुश्किल होगा, फिर रात्रि भ्रमण या प्रातः भ्रमण ही उचित होगा. नन्हे की टेनिस कोचिंग के कारण सुबह जल्दी उठने की आदत पड़ती ही जा रही है. कल शाम वे ‘बेबी’ज डे आउट’ का कैसेट भी लाये, अच्छी फिल्म है, छोटे से बच्चे का अभिनय काबिले तारीफ है.

Sunday, September 16, 2012

छत पर बंदर



कल जून को पत्र लिखा, कहीं वह नाराज न हो गए हों कि उसने उन्हें मेस ज्वाइन करने को कहा, अब यह तो उनका पत्र आने पर ही मालूम होगा. उसे पूरी आशा है आज उसका पत्र भी आयेगा. सुबह पांच बजे से पहले ही उसकी नींद खुल गयी उमस और गर्मी के कारण. उसने सोचा आज रात से यहीं छत पर सोयेगी जब सुबह छत पर टहलने गयी, हवा बहुत ठंडी थी, तन-मन को सहलाने वाली. उसे कालेज के जमाने में घर के सामने वाले बगीचे में गुलाबों की झाड़ी से निकलने वाली खुशबू और सुबह की शीतल पवन याद आ गयी. अगले महीने पिता रिटायर हो रहे हैं अब वह कभी उस मकान में नहीं रह सकेगी. कल देवर के मित्र अपने एक मित्र की पत्नी को लेकर आए, उसकी बातें और स्टाइल देखकर उसे भाभी व उनकी बहन की याद आ रही थी. पर उसकी कुछ बातें सुनने में कानों को चुभने वाली थीं, सो वह उठकर चली गयी.

कल उसका पेन फिर कहीं खो गया, सो सुबह डायरी नहीं लिख पायी थी. इस समय सुबह के साढ़े छह बजे हैं पर कमरे में गर्मी बहुत है. कल रात वे सभी छत पर सोये. कितने वर्षों बाद उसे छत पर सोने का मौका मिला है, खुले आसमान के नीचे. बचपन में वे सभी किस्से कहानी कहते हुए छत पर सोया करते थे गर्मियों में. आरम्भ में इतने लोगों के कारण नींद ही नहीं आ रही थी, पर बाद में, कब सो गयी पता ही नहीं चला. सुबह पौने पांच बजे के लगभग नींद खुली, कानों में मंदिर से आती मंत्र ध्वनि व स्तुति सुनाई दी जो प्रातःकालीन मंद शीतल हवा में भली लग रही थी तो बनारस की सुबह के प्रसिद्ध होने का अर्थ समझ में आया. नन्हा अभी तक सोया है. छत पर से आकर यहाँ इस कमरे में. सुबह-सुबह मकानों की छतों पर यहाँ कितने बंदर भी घूमते दिखाई देते हैं. कल महावीर जयंती का अवकाश था सो पोस्टमैन नहीं आया. जून को खत भेजने का दिन आज है, पर वह उसका पत्र आने पर ही लिखेगी.
कल जून का पत्र मिला एक नहीं दो पत्र एक साथ. वह भी उसकी तरह परेशान था पत्र न मिलने से. विवाह से पूर्व जिस तरह लम्बे पत्र लिखता था वैसा ही स्नेह भरा पत्र पाकर उसकी ऑंखें भर आयीं, ऐसा तो उसे उसका पत्र पाकर कितनी ही बार हुआ है पर इसको सामान्य ढंग से न लेकर माँ-पिताजी यह सोचने और फिर कहने लगे कि यहाँ उसका मन नहीं लगता. एक महीना हो गया है उसे यहाँ रहते याद नहीं कि कभी ऐसा उन्हें महसूस होने दिया हो. नन्हा अस्वस्थ होने के कारण या उसका पूरा ध्यान न मिलने के कारण परेशान कर रहा था, उसका मन पहले से ही भरा था. उसने तय किया है आज से सोनू का पूरा ध्यान रखेगी, चाहे पढ़ाई हो या न हो. घड़ी देखी, साढ़े पांच बजने को थे वह दिन का कार्य आरम्भ करने के लिए उठी.