Saturday, February 9, 2013

अयोध्याकाण्ड


  
 दिसम्बर शुरू हो गया है, उसके पास फुर्सत नहीं कि आते-जाते दिनों, महीनों का हिसाब रख सके. पता नहीं कहाँ से एकाएक इतनी व्यस्तता आ गयी है. लाइब्रेरी से लायी किताबें व घर से लायी दो किताबें भी अनपढ़ी रह गयी हैं, पत्रिकाएँ भी बिन पढ़े लौटा दी जाती हैं, कुछ मित्रों ने मिलकर एक पत्रिका क्लब बनाया है, हर हफ्ते ही नई आ जाती हैं. पिछ्ले दिनों वीसीपी पर तीन फ़िल्में जरूर देखीं, पर्दे सिले, चादर पूरी की, मिक्सी का कवर भी बनाना आरम्भ किया है उसने. नन्हे के लिए एक टोपी भी बनानी है उसे. चिट्ठियाँ लिखीं. अभी नए साल के कार्ड सहित कुछ पत्र और लिखने हैं.  कल बड़े भाई का जन्मदिन था, उन्हें कार्ड मिला होगा, उसने मन ही मन पुनः शुभकामनायें दीं. कल पंजाबी दीदी का भी एक बड़ा लम्बा सा पत्र आया है. सुबह से सूरज महाशय छिपे हुए थे बादलों के पीछे, अभी-अभी दर्शन दिए हैं. परसों जो बड़ियां बनाई थीं, वह तो रसोईघर में सूख रही हैं, यहाँ गैस का चूल्हा चौबीसों घंटे जलता रहता है कभी मद्धिम कभी तेज, सो गीले कपड़े हों या चिप्स और वड़ियाँ, सभी किचन में सुखाये जा सकते हैं. लेकिन उसे आश्चर्य होता है, हर बार जब भी मुन्गौड़ी आदि बनाये, धूप गायब..मौसम का मिजाज समझना बहुत मुश्किल है यहाँ..

आज फिर वही कल का वक्त है, लेकिन धूप नहीं है, कल थोड़ी बहुत निकली भी थी, आज तो बदल छंटे भी नहीं, ठंड काफी बढ़ गयी है. सुबह किसी का भी बिस्तर छोड़ने का मन नहीं था, नन्हा सुबह स्कूल जाने में एक बार तो डरा. पर फिर समझ गया कि स्कूल एक दिन छोड़ सकता है पर ठंड तो रोज रहेगी ही. महीने के अंतिम सप्ताह में छोटा भाई परिवार सहित आने वाला है, वे बहुत उत्साहित हैं. कल शाम जून का एक मित्र परिवार विदा लेने आया, वे अपना मकान बनवाने का शुभारम्भ करने जा रहे हैं, उनका भी मकान बनवाने का स्वप्न है, जमीन खरीदने की बात वे करके आये थे.

अयोध्या में हुए टकराव की वजह से देश के कई शहरों में, उतर प्रदेश के अठारह जिलों में कर्फ्यू लगना पड़ा है. हालात कब तक सुधरेंगे कहा नहीं जा सकता. पता नहीं यात्राएँ भी सुरक्षित होंगी या..उसे भाई का स्मरण हो आया. कहीं उसे कार्यक्रम स्थगित न करना पड़े, क्या इतना निराश होना सही है, पर इस अनिश्चित वातावरण में कुछ भी नहीं कहा जा सकता. नन्हे की परीक्षाएं चल रही हैं, आज उसका तीसरा पेपर है, गणित का. कल शाम से ही उसका मन अस्थिर है, बात यूँ तो कुछ भी नहीं, पर मन का कोई क्या करे जो ‘आ बैल मुझे मार’ की तर्ज पर चलता है.


 


Friday, February 8, 2013

लहराती अलकें



मौसम में बदलाव आने लगा है, कितनी ठंडी हवा बह रही है, गर्मी का नामोनिशान नहीं. शायद यह सुबह हुई तेज वर्षा का ही असर है. आज दोपहर जून के साथ दो सहकर्मी भी आए थे. वह व्यस्त सुबह की बजाय इस खाली अपराह्न में डायरी लेकर बैठी है. बातें बहुत सी हैं, दिमाग में स्फुलिंगों की तरह आती हैं एक क्षण के लिए चमक दिखाकर चली जाती हैं. यह तो सच है कि आज वह अपने अच्छे मूड्स में से एक में है. ऐसे में कोई कविता भी बन सकती है या...इस हफ्ते अभी तक कोई पत्र नहीं आया. छोटी बहन का स्वास्थ्य अब ठीक होगा, पिछले पत्र में उसने लिखा था. ननद की शादी में शामिल होने उन्हें घर जाने में कुछ ही दिन ही रह गए हैं, उसे कोलकाता से एक साड़ी खरीदनी है और कुछ उपहार भी.
   सर्वोत्तम में एक पंक्ति अच्छी लगी कि लोग लेखक होने का स्वप्न तो रखते हैं पर अकेले घंटों टाइपराइटर पर बैठने की कल्पना नहीं कर पाते, लिखना एकांतिक, वैयक्तिक कर्म है जो समय मांगता है. समय की तो उसके पास कमी नहीं है, लेकिन इतनी अधिकता भी नहीं है. लिखने के लिए कुछ तो मन में होना चाहिए, कुछ कहने के लायक. वह कहाँ से आता है, वह कहीं रखा तो नहीं रहता कि उठाया और लिख दिया, वह तो अंदर से आता है अपने आप, जब कोई विषय लेखक चुनता है तो अब तक का सारा ज्ञान उस विषय के बारे में याद आने लगता है. धीरे धीरे पर्दे हटने लगते हैं और पर्त दर पर्त उधड़ती चली जाती है. जैसे सबसे सामान्य विषय है प्रेम, जितना सामान्य उतना ही असामान्य - लाखों प्रेम कहानियाँ लिखी जा चुकी हैं फिर भी हर कहानी  नई लगती है. जब किसी को बिना मांगे अपने आप ही सबका प्रेम मिलता रहता है, तो उसका महत्व पता नहीं चलता, फिर एक दिन जब कुछ अधूरेपन का अहसास होता है तब कीमत पता चलती है अनमोल प्रेम की. सर्वोत्तम के साथ एक उपहार आया है, “सर्वोत्तम मुशायरा” जिसमें कई गजलें बहुत उम्दा हैं. एक शेर उसे काफी पसंद आया जिसका भाव कुछ ऐसा था कि अब दुखी होने से क्या फायदा, राहे इश्क में ऐसा ही होता है. जगजीतसिंह, चित्र सिंह व लता के स्वरों में गायीं गजलें सुनती रही दोपहर बाद.. ऑंखें बंद करके चुपचप लेटकर..बहुत अच्छा लगा उसे.

जीवन में दुःख है, दुःख का कारण है, कारण दूर किया जा सकता है. कारण है इच्छापूर्ति में बाधा, बाधा तभी न रहेगी जब इच्छा ही न हो, इच्छाओं से परे एक मुक्त जीवन की कल्पना ही कितनी सुखद लगती है. उस दिन बुद्ध के ये वचन सुने थे तो अच्छा लगा था, अच्छी बातें किसे अच्छी नहीं लगतीं, पर उन पर अमल... करने का प्रयत्न तो किया जा सकता है न..आज उन्हें सोनू के स्कूल जाना है, छुट्टी के लिए प्रार्थनापत्र देना है और प्रोजेक्ट वर्क के बारे में बात करनी है. रवीन्द्रनाथ टैगोर का एक लेख पढ़ा, creation vs construction, शुरू में अच्छा लगा पर बाद में भाषा दुरूह होने के कारण समझ नहीं आ रहा था. कल वे एक परिचित के यहाँ बरसों बाद गए, अच्छा लगा, लोगों से मिलते-जुलते रहो तभी उनके बारे में पता चलता है.

पूरा अक्टूबर और आधे से ज्यादा नवम्बर बीत गया आज जाकर डायरी खोलने का सुअवसर आया है. इतने सारे दिनों में कई अच्छी बातें और कई बुरी बातें हुईं, लेकिन कुछ लिखे ऐसा मन नहीं हुआ. कोलकाता में ट्रैफिक जाम में जब फंसे थे तो एक कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आयी थीं लेकिन घर लाकर इतने सारे लोगों से मिलकर..तरह-तरह की व्यवस्ताओं में याद नहीं रही. उसने फेमिना से जून के लिए कुछ बातें नोट कीं, बालों की देखभाल के लिए, कह रहे थे, उनके बाल झड़ने शुरू हो गए हैं.  
  

Wednesday, February 6, 2013

जगजीत सिंह की गजल



नन्हा आज स्कूल नहीं गया, कितना उदास था, चुपचाप आँखों से आंसू गिर रहे थे, इतने छोटे बच्चे को इस तरह चुपचाप रोते नहीं देखा उसने कभी, उसको टेस्ट की चिंता थी, जो शायद आज होता भी नहीं, सुबह से दो-तीन बार टायलेट गया तो उसे चिंता हो गयी, स्कूल नहीं भेजा, सेंट्रल स्कूल में टायलेट गंदे हैं, पानी भी नहीं रहता, यह सब नन्हे ने ही तो बताया था, अभी तक तो ठीक है वह, खेल रहा है, स्कूल उसके लिए बहुत आवश्यक है, उसका दिल स्कूल में रहता है. फिर भी बच्चा आखिर बच्चा है, जितनी जल्दी उदास होता है उतनी ही जल्दी भूल भी जाता है. कल छोटे भाई का पत्र मिला, अब वह खुश है ऐसा उसके पत्र से लगा तो है. कल रात उसे नींद नहीं आ रही थी, पिछले कई दिनों से घर में काम चल रहा है, घर दिन भर पूरा खुला रहता है, रात को नन्हे को सुलाने के लिए जल्दी-जल्दी काम निपटा कर वे सोने आ जाते हैं, कभी कभी ज्यादा थकन भी विश्राम में बाधा बनती है.

सितम्बर का एक दिन बीत गया है कल और पिछले तीन-चार दिनों से डायरी नहीं खोली, जून का दफ्तर बंद था, और नन्हे का स्कूल भी, वे डिब्रूगढ़ गए थे. जगजीत सिंह की गजल आ रही है-
“खत लिखते कभी और कभी खत को जलाकर तनहाई को रंगीन बना क्यों नहीं लेते
तुम जग रहे हो मुझे अच्छा नहीं लगता चुपके से मेरी नींद चुरा क्यों नहीं लेते”

जो कुछ वह सोचा करती है अक्सर कोई काम करते समय या रात को जब नींद नहीं आ रही होती है वह सब लिखते समय याद क्यों नहीं आता है. एक उड़ता-उड़ता सा विचार मन में रहता है कि उसे एक स्कूल खोलना है गरीब बच्चों के लिए, उन्हें पढाना है, लेकिन यह विचार मात्र ही है, कैसे होगा यह इसके बारे में सोचा ही नहीं, जून को कहने से उनकी प्रतिक्रिया अनुकूल तो नहीं होगी, कहेंगे, समय कहाँ है ? जगह कहाँ है? और न जाने कितने सवाल जिनका उत्तर वह नहीं दे पायेगी.

क्यों नहीं दर्द फूट पड़ता
अगर कोई दर्द सचमुच है कहीं
नम कर दे आँखों को अंदर ही अंदर
क्यों नहीं कोई खुशी छलक उठती
अगर कोई खुशी सचमुच है
रोशन कर दे जो भीतर बाहर
क्यों नहीं कोई गीत उग आता
अगर कोई गीत सचमुच है
रसमय कर दे जो अंतर
क्यों नहीं कोई स्वप्न सजता
अगर कोई स्वप्न सचमुच है
एक कर दे जो बिछुड़े हुओं को

शब्दों की कमी क्यों खटकती है
थी पहले विचारों की, क्यों है ऐसा कि
जब यह है तो वह नहीं...वह है तो..

उसने कल एक कहानी पढ़ी, दो मित्रों की कहानी..जिनमें शत्रुता हो जाती है, शत्रु बनने के लिए पहले मित्र बनना ही पड़ता है, गलतफहमियों की दीवार अपनों के बीच ही तो खड़ी हो सकती है, अनजानों के मध्य तो नहीं...जितनी जल्दी यह गिर जाये उतना ही अच्छा ये बात दोनों ही चाहते हैं, क्योंकि शत्रुता ओढ़ी हुई है, चुभती है, भीतर मित्रता का सरवर बह ही रहा है, उसकी याद अभी ताजा है. पहले की दोस्ती याद आती है, एक को चोट लगती थी तो दर्द दूसरे को होता था, अब एक दूसरे की तरफ से उदासीन हो गए हैं, लेकिन यह उदासीनता कब तक टिकेगी...जब प्रेम नहीं टिका जो दैवीय गुण है तो शत्रुता कब तक टिकेगी..कहानी का अंत सुखद था. गलतफहमियां गिर जाती हैं और फिर दोनों एक हो जाते हैं एक बार फिर झगड़ने के लिए शक्ति जुटाने के लिए...शायद यही जीवन है.




Monday, February 4, 2013

चित्रकूट की शोभा



आज कृष्ण जन्माष्टमी है, टीवी पर सुबह भी और दोपहर को भी इसी उपलक्ष में अच्छे कार्यक्रम दिखाए गए. अभी-अभी सोनू देखकर सोया है, जो खुद भी एक नन्हा कन्हैया है, उनका प्यारा सा पुत्र, कितने आराम से सो रहा है, शायद कोई स्वप्न देख रहा है. आज उसका स्कूल बंद है, तभी सुबह से उसका मन लगा है उसके छोटे-छोटे कामों में हाथ बंटाते..कैसे रहेगी वह जब वह हॉस्टल में रहेगा..वह रह तो पायेगा न. यहाँ की तरह कभी घुटनों पर तो कभी हाथों पर चोट लगाकर तो नहीं आयेगा स्कूल से.

पिछले तीन-चार दिनों से..हाँ पिछले गुरुवार से ही घर में कार्य चल रहा है. दिन भर यानि सुबह सात बजे जून के दफ्तर जाने के बाद ही काम करने वाले आ जाते हैं, साढ़े तीन तक रहते हैं, अभी काफी दिन लगेंगे. उसे समझ नहीं आता कहाँ बैठे, वैसे इसमें कोई परेशानी की बात नहीं है, क्योंकि यह काम उन्होंने अपनी इच्छा से ही शुरू करवाया है. जब पूरा घर साफ हो जायेगा, नए पेंट की खुशबू से महकेगा तो यह सारी गड़बड़ी भूल जायेगी, गड़बड़ी यानि अव्यवस्था, इस कमरे का सामान उधर और उधर का इधर..अभी तो ऐसे ही चल रहा है. कल चार पत्र लिखे उसने, पिछले हफ्ते घर से पत्र नहीं आया है इस बार तो आना ही चाहिए, बहुत दिन हो गए हैं.

कल आखिर वह खत आ ही गया, जिसका उसे इंतजार था. पिता ने लिखा है, शब्दों का प्रवाह निर्झर की तरह था, और माँ को भी भाव सुंदर लगे. छोटे भाई ने अभी तक जवाब नहीं दिया है शायद वह ज्यादा ही उदास है. आज ही पिलानी से चिट्ठी भी आ गयी है, रजिस्ट्रेशन हो गया है, जून आज परीक्षा शुल्क भेज रहे हैं. नन्हा आज सुबह बिस्तर छोड़ना ही नहीं चाह रहा था, पर स्नान के बाद ठीक हो गया..एक बार तो बोला ‘रोज-रोज स्कूल जाते जाते मेरा मन स्कूल से उठ गया है’, वह जानती थी की वह जायेगा अवश्य...सिर्फ कह रहा है, उसका टेस्ट भी हो सकता है आज. घर के अंदर डिस्टेम्पर का कार्य हो चुका है आज बाहर हो रहा है, परसों से अंदर खिड़कियों की पेंटिंग का काम शुरु हो जायेगा. पिता ने लिखा है, चिंतन, अध्ययन और लेखन यूँ ही चलता रहे तो..उसे जरूर गम्भीरतापूर्वक कुछ करना चाहिए इस दिशा में. जून ने खत पढ़ा मगर कुछ नहीं कहा..कविता उनके लिए..इतनी महत्वपूर्ण नहीं है..अपना-अपना स्वभाव है, लेकिन उनका मन जब प्यार करता है तो एक कवि का सा ही लगता है..एक साथ ही वह इतने  भावुक और इतने कठोर हैं. कठोर इस माने में कि वह लोगों पर शीघ्रता से विश्वास नहीं करते..खैर.. उसने यहीं लिखना बंद किया और पत्र लिखना शुरू किया.

आज मौसम ने फिर दरियादिली दिखाई है, सुबह से टप-टप सुनाई दे रही है, नन्हा स्कूल गया है, जरूर उसके स्कूल के मैदान में पानी भर गया होगा, कल रात से जो जल अनवरत बरस रहा है. ग्यारह बजने में कुछ ही मिनट हैं, मन बार-बार रामायण में पढ़ी उन सुंदर पंक्तियों की और जा रहा है जो राम चित्रकूट की शोभा का बखान करते हुए सीता से कहते हैं. सुंदर नीलधर मेघ उच्च शिखरों पर वृष्टि करते हैं फिर मन्दाकिनी की शोभा का वर्णन भी अद्भुत  है, एक सुंदर प्राकृतिक दृश्य आँखों के सामने आ जाता है.






Sunday, February 3, 2013

रिमोट कंट्रोल वाली कार


आज नन्हा घर पर है, उसके स्कूल में रक्षाबंधन का अवकाश है. उसने नारियल की बर्फी बनाई है जो यकीनन जून को पसंद आयेगी. कल छोटे भाई का खत आया, वह उदास है पर उसकी कविता उसे मिली होगी..शायद कुछ पलों के लिए ही सही उसे उत्साह मिला तो होगा. कल शाम जून के विभाग के दक्षिण भारतीय सहकर्मी अपनी नव विवाहिता पत्नी को लेकर आए थे, उनकी माँ भी साथ थीं. वे लोग बहुत अच्छे लगे खासतौर पर उनकी पत्नी जिसका नाम भी पूछना वह भूल गयी. वह जीवन-उर्जा से भरी हुई थी और उसका व्यक्तित्त्व भी बहुत आकर्षक था.

साल का आठंवा महीना भी आधा बीत गया यानि यह डायरी अब उसके साथ कुछ ही वक्त रहेगी, फिर नया साल और नई डायरी. कितने वर्षों से कितनी ही डायरियां उसके साथ चली हैं लेकिन सही अर्थों में लिखना उसे अभी तक नहीं आया. डायरी अपने मन का आईना होती है लेकिन क्या वह, वह सब लिख पाती है जो लिखना चाहिए, कभी मूड नहीं होता, कभी समय नहीं, कभी रात को सोते वक्त कोई बात याद आती है लेकिन सुबह तक भूल जाती है. वैसे भी मन पर वश है कहाँ, जैसे आज लिखने को कह रहा है कल पलट भी सकता है. आज मौसम  अच्छा है, धुप मद्धिम है, जून के आने का वक्त हो गया है, अभी भोजन का कुछ कार्य शेष है मसलन रोटी बनाना, सो वह पाकशाला में चली गयी.

कल वह तीसरी बार कर्मचारियों के क्लब में लगा मेला देखने गयी, सोनू और उसका मित्र उत्साह से भरे थे, उसकी असमिया सखी को लॉटरी खेलने का मन था. वह यूँ ही सबके साथ गयी थी. कल कोई खत नहीं आया, पता नहीं उसे किन पत्रों की प्रतीक्षा है. दीदी, माँ-पिता, छोटी बहन, तीनों भाई, शायद सभी के पत्रों का. नन्हे को अगले वर्ष से वे पिलानी के पब्लिक स्कूल में पढ़ाएंगे, ऐसा उनका विचार तो है और अब धीरे-धीरे वह भी रूचि लेने लगा है.उसे एडजस्ट करने में ज्यादा मुश्किल नहीं होगी क्योंकि साल भर में मानसिक रूप से वह तैयार हो जायेगा. जुलाई में परीक्षा होगी. अभी पूरा एक वर्ष है. और इस एक वर्ष में उसे यहाँ के सेंट्रल स्कूल में जाना है, जो किसी भी लिहाज से आदर्श स्कूल नहीं है.

उसके साथ कई बार ऐसा हुआ है, पिछले हफ्ते एक दिन उसने सोचा कि बहुत दिनों से वह अस्वस्थ नहीं हुई है और कल से परेशान है इस सर्दी से. कल व परसों हल्की खराश सी थी गले में, लेकिन आज ऑंखें भी भारी लग रही हैं और आवाज भी बदल गयी है. कल शाम वे कहीं जाने के लिए तैयार हो रहे थे कि उनका परिचित एक पंजाबी परिवार आ गया, अच्छा लगा उनसे बातें करके, उनकी छोटी सी गुड़िया खूब बातें करती है. कल दोपहर को उसने गोलगप्पे बनाने का असफल प्रयास किया, पांच-छह ही फूले, बाकी की पापड़ी बन गयी. फिर जून ने अच्छी सी चाट बनाई-पापड़ी, आलू, चने की चाट. नन्हे की रिमोट कंट्रोल वाली कार का एक छोटा सा पार्ट कहीं खो गया कल रात, सुबह जल्दी उठकर वह ढूँढ भी रहा था..लेकिन मिला नहीं. कल उसका अंग्रेजी का टेस्ट है. कल नूना ने असमिया की किताब पढनी शुरू की थी, कम से कम इतनी असमिया तो सीख ही लेनी चाहिए कि किसी का हालचाल पूछ सकें.








Saturday, February 2, 2013

बोर्डिंग स्कूल



आज बहुत देर से डायरी और पेन लेकर बैठी है वह. कल रात को सोते वक्त मन में कई डर थे और उन्हीं के कारण ईश्वर की याद आयी. फिर ईश्वर के साथ-साथ यह ख्याल कि हमेशा वह तभी याद आता है जब...शायद यह बात शायद हर शै के लिए सच है कोई भी चीज हमें तभी चाहिए जब उसकी जरूरत हो, लेकिन खुशी तो हर वक्त चाहिए. फिर खुशी में ईश्वर याद नहीं आता...ईश्वर को इंसान ने तभी बनाया होगा जब वह पहली बार डरा होगा...और चाहे युग बदल जाएँ इंसान की प्रवृत्तियां नहीं बदल सकतीं. तो रात को एक पंक्ति जहन में आयी थी –

एक नया दिन

कल रात अँधेरा बहुत घना था
बादलों ने ढ़क लिया था सारा आकाश
चाँद और तारे
उसने सोचा अगर कल न उगा सूरज
यूँ ही सोता रह जायेगा शहर
अँधेरे में लिपटे रहेंगे बाग-बगीचे, झोंपड़ी और महल
कोई फर्क नहीं रहता नींद में ड़ूबे राजा और फकीर में
लेकिन उसकी सोच को परे धकेल
सूरज की पहली किरण द्वार पर आ खड़ी है
एक नया दिन नई उम्मीदों के साथ
दस्तक दे रहा है
स्वागत करें या न करें सूरज हर रोज
एक नया मेहमान लाता रहेगा
कितना बड़ा दानी है सूरज
और हम खोखले दम्भ में अपनी छोटी सी उदारता का दम भरते नहीं थकते

आज शनिवार है लेकिन जून को कहीं न कहीं जरूर जाना होगा, हर शनिवार की तरह...पिछले दो बार ऐसा ही हुआ. सोनू स्कूल गया है सुबह उठा तो छींक रहा था. आज टेस्ट है उसका विज्ञानं का, पहली बार टेस्ट हो रहें स्कूल में. पिछले महीने भी इन्हीं दिनों उसे खांसी थी उसके जन्मदिन के आसपास. लेकिन वह बहादुर है अपनी सहायता खुद कर  सकता है, स्कूल में अगर कोई समस्या हुई तो फोन कर देगा ऐसा कहकर गया है. कितने काम आज नहीं कर पायी, नन्हे की देखभाल में लगी रही, उसने सोचा अगर बोर्डिंग स्कूल में उसे सर्दी लगी तो....लेकिन और बच्चे भी तो रहते हैं, फिर यह छोटी सी बात है. उसने सोचा, देखें, लौट कर उसकी तबियत कैसी है, वैसे स्कूल जाकर वह सब कुछ भूल जाता है..अखबार वाला कल देर शाम अखबार दे गया, रात को वर्षा में भीग गए, उसने खोलकर सुखाये अब जून ही आकर सिलसिलेवार लगाएंगे. लेकिन यह कैसी बात लिख दी उसने कि ईश्वर को इंसान ने बनाया है.. ईश्वर ने इंसान को बनाया है यही तो कहते हैं सब.

शनि-रवि-सोम-मंगल चार दिन वही उलझन भरे, वैसे भी इतवार को तो डायरी खोलने का सवाल ही नहीं पैदा होता, सोम को जून ने फोन करके कहा कि लंच पर किसी को साथ लायेंगे सो सारी सुबह उसमें लग गयी. कल यानि मंगल को दुलियाजान बंद था, दोनों पिता-पुत्र भी घर पर थे, ‘जागृति’ फिल्म भी देख ली उन्होंने, बस ऐसे ही है, करिश्मा कपूर इसमें उतनी अच्छी नहीं लगी जितनी प्रेमकैदी में लगी थी. परसों छोटी बहन की चिट्ठी आयी, घर से भी, माँ-पिता को उसकी कविता अच्छी लगी. कल उसकी असमिया सखी आयी उसके पतिदेव को लम्बे समय तक फील्ड में रहना होता है, उसने सोचा यदि जून को भी ऐसे ही रहना होता तो ... सोचने से ही घबराहट होती है. शायद इतनी समस्या नहीं होती जितनी अभी सोचकर लगती है, एडजस्ट कर ही लेते वे. आज गर्मी जरा भी नहीं है, भला-भला सा मौसम हो रहा है. ओलम्पिक खेलों की शुरुआत हुए पांचवा दिन है, भारत का नाम दूर-दूर नहीं है, वे लोग पच्चीस जुलाई को उद्घाटन समारोह भी नहीं देख सके थे.

अगस्त महीने का शुभारंभ हो चका है, पिछले दो दिन वैसे ही गुजरे जैसे हर शनि-रवि गुजरते हैं, अगर ये दो दिन न हों तो जिंदगी कितनी बोझिल हो जाये. इतवार की बेफिक्री हफ्ते के किसी और दिन नहीं मिल सकती. नन्हा भी साढ़े तीन बजे लौटेगा, दोपहर  को काफी वक्त मिलेगा, वह मेजपोश इसी हफ्ते पूरा कर लेगी.




Thursday, January 31, 2013

सपने में ही मैन



आज शनिवार है, यानि जून लंच के बाद घर पर रहेंगे, पर नन्हे का स्कूल खुला है. कल वे तिनसुकिया गए शाम चार बजे, सात बजे लौट तक आये. वहाँ इतना कीचड़ था. मुख्य सड़क पर ही पानी भरा था, गंदा बदबूदार पानी, कितनी बीमारियों के कीटाणु रहे होंगे, फैलते होंगे वहाँ. कोई कुछ करता क्यों नहीं, जैसे वे कुछ नहीं करते. अखबार में एक बूढ़े पिता की अपील पढ़ी, जिसका अंतिम बेटा अस्पताल में है, किडनी का आपरेशन होना है, दो लाख रूपये इक्कट्ठे करने हैं. पढकर सहानुभूति होती है, लेकिन मात्र सहानुभूति तो काफी नहीं. पैसे वैसे ही बहुत खर्च हो गए हैं इस बार, किताबों पर ही सात-आठ सौ रूपये. पैसे के बारे में उसे कभी कोई चिंता नहीं करनी पड़ी. जून ने कभी होने ही नहीं दी. इस मामले में वह बेहद भाग्यशाली है. यूँ तो और भी कई मामलों में है. आजकल रात को उसे स्वप्न बहुत आते हैं, खासतौर पर सुबह के वक्त, जो याद भी रह जाते हैं, नींद शायद ठीक से नहीं आती. दिन में सोना बिलकुल बंद करना होगा. जून भी आजकल सुबह जल्दी नहीं उठ पाते क्या उन्हें भी गहरी नींद नहीं आती, उनके बारे में कुछ न लिखे तो लगता है कुछ छूट गया है क्या यह कर्त्तव्य बोध के कारण है या...बाल्मीकि रामायण का अयोध्या कांड पढ़ रही है आजकल, राम का चरित्र कितना महान दर्शाया गया है, तभी तो आज हजारों साल बाद भी राम नाम इतना पवित्र है, सीता-राम संवाद बेहद सुंदर है.

कल शाम को एक परिचित परिवार आया, काफी देर तक रहे वे लोग, अच्छा लगा. आज बहुत दिनों बाद फिर से समय मिला है स्वयं के पास आने का पर माध्यम बाहरी है. कैसेट बज रहा है, ‘बच्चन की मधुशाला’ और किताब भी वही खुली है कविता की. उसे अपना आप कविता में ही मिलता है शायद. कल मोहन राकेश की कहानी पर बना धारावाहिक देखा, लगता है यह कहानी पढ़ी है उसने. आज मौसम कल से ठंडा है. अभी हवा में शीतलता है दोपहर तक जो गर्मी में बदल जायेगी. लक्ष्मी का स्वास्थ्य अभी भी ठीक नहीं हुआ है, आज अस्पताल गयी है, बहुत कमजोर लग रही थी आज सुबह. लम्बी बीमारी है, अब साल भर ऐसा ही चलेगा शायद.

जुलाई का महीना खत्म होने को है, सुबह टीवी पर देखा, आज श्रावण मास की दूसरी तिथि है. मालपुए बनाने का महीना. किसी दिन बनाएगी जब खूब तेज वर्षा हो रही होगी. आज दस बजे तक ही सब काम हो गया है, देर तक रामायण भी पढ़ सकी. आज धूप अपने पूरे शबाब पर है.. चमकदार.. झनझनाती हुई. नन्हा आज बड़ी बोतल ले गया है पानी की, उसे बहुत प्यास लगती है स्कूल में. कक्षा में पंखे भी तो ठीक से नहीं चलते. उसने आज सुबह एक सपना बताया. बड़ा मजेदार था ‘हीमैन’ का सपना. उसने भी कल किराये के मकान का एक सपना देखा. जून और वह कुछ दिनों पहले बात कर रहे थे कि उन्हें आसाम छोड़कर चले जाना चाहिए और किराये के मकान में रहना चाहिए जब तक अपना मकान  न बन जाये. इसी की परिणति थी यह सपना. लेकिन इतनी सुख-सुविधाओं को छोडकर चले जाना बुद्धिमानी नहीं कही जायेगी. बात जून के विभाग की समस्याओं को लेकर शुरू हुई थी जो हर जगह होती होगी.