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Wednesday, April 1, 2015

तहरी का स्वाद


उसे लगता है क्रोध व्यक्तित्व को मिटा देता है, इच्छा अपने इशारों पर नचाती है और मोह विवेकहीन कर देता है. अपना आपा भूल जाएँ तो ऐसे शब्द निकल आते हैं जिनपर बाद में पछताना पड़ता है. एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी सिर उठा लेती है और मोह भय का कारण बनता है. जीवन की धारा तभी बदल सकती है जब यह ज्ञान हो कि देह साधन रूप में मिला है. मुस्कुराते, गुनगुनाते तथा सबके भीतर तरंग पैदा करते हुए जीना होगा. मन का स्नेह, बुद्धि का विचार और आत्मा का आनंद सभी तो परमात्मा का दिया हुआ है. जो मिला है वह कभी भी छूट सकता है. जब तक देह में बल है तब तक इसकी कद्र करनी है. मन की सौम्यता को बनाये रखना है. ईश्वर हर क्षण साक्षी रूप से साथ है, अल्प बुद्धि से वे अल्प ही तो सोचेंगे. उसके साथ योग लगा रहेगा तो बुद्धि मार्ग पर रहेगी. मन एकदम हल्का हो जाये, पारदर्शी.. तो उसकी झलक अपने आप ही दिखायी देगी.

आज अमावस्या है, यानि उसके उपवास का दिन. सही मायनों में उपवास तो तभी होगा जब मन दिन भर भगवद् भाव से परिपूर्ण रहे. सुबह ब्रह्म मुहूर्त में वे उठे. ‘क्रिया’ की और सत्संग सुना. संतों की वाणी सुनकर मन भाव विभोर हो गया है. भगवद् प्रेम की एक बूंद भी मन को भरने के लिए पर्याप्त है, वही मन जो संसार भर की वस्तुएं पाकर भी अतृप्त ही रहता है, ईश प्रेम के रस में पूर्ण हो जाता है. वह जो इस सृष्टि का स्रोत है, उसे प्रिय है. उसका स्मरण ही उसे सारे दुखों से दूर ले जाता है.

आज दीदी का फोन आया. उन्हें व बुआजी को पत्र मिल गये हैं यानि दो के जवाब उसे मिल गये. आज सुबह वे देर से उठे. कल सत्संग से आयी तो जून ने खाना ( तहरी)  बना लिया था. खाते-खाते थोड़ी देर हुई. कल योग अध्यापक भी आये थे. उन्होंने शास्त्रीय संगीत पर आधारित बहुत अच्छे कुछ नये भजन गाए. इसी माह एक दिन विश्व शांति दिवस है, गुरूजी ने उस दिन शाम को साढ़े चार बजे सभी को अपने अपने सेंटर पर सत्संग करने को कहा है. इससे सब ओर शांति का संदेश फैलेगा, उनका भी योगदान उसमें रहेगा. आध्यात्मिकता का एक बड़ा उद्देश्य है लोकसंग्रह, यानि सेवा, दूसरों के जीवन में यदि कोई ख़ुशी का संचार कर सके, तो समाज के ऋण से कुछ तो मुक्त हो सकता है. एक व्यक्ति अपने लिए समाज से कितना कुछ लेता है यदि उसका शतांश भी लौटा सके तो समाज का कितना भला होगा. आज सुबह उसने सुना साधना के लिए पहला गुण है पवित्रता, अर्थात मन कभी कपट का आश्रय न ले, प्रमादी न हो. भक्ति मार्ग सरल कर देती है. कल शाम उन्होंने कृष्ण के कई भजन गाए, अच्छा लगता है उसके नाम का उच्चारण ! वह अति निकट है, इतना निकट,...इतना निकट कि दरम्यान से गुजर सके न हवा !


आज सुबह ध्यान में कृष्ण की अनुभूति हुई, जैसे वह उसके प्रश्नों को सुन रहे थे और जवाब दे रहे थे. ऐसा होता है कि कुछ दिन उसका हृदय, मन, बुद्धि पूरी तरह उसे अपनी धारणा का विषय बना लेते हैं और फिर अपने आप ही कभी-कभी वह दूर चला  जाता है. करने से कुछ नहीं होता. ‘थापिया न जाई, कीता न होई, आपे आप निरंजन सोई’ वह अपने आप ही हृदय में आकर दस्तक देता है. लेकिन इतना तो निश्चित है कि एक बार उसे चाहने की कला आ जाये वह उन्हें कभी छोड़कर नहीं जा सकता. वह भी उतना ही अपना लेता है. आज शनिवार है उसकी संगीत कक्षा का दिन, वर्षा कल रात से ही हो रही है. नन्हा स्कूल गया है, आज वह अपना प्रोजेक्ट ले गया है. उसे आराम-आराम से अपना काम करना पसंद है. जून की तरह जल्दबाजी उसके स्वभाव में नहीं है और यह भी कि जितना जरूरी हो उतना ही काम किया जाये, व्यर्थ ही अपने ऊपर बोझा लादना भी उसे पसंद नहीं, यह मानसिक स्थिरता की निशानी है. ईश्वर उसे सद्बुद्धि भी दे और वह सफलता प्राप्त करे. 

Thursday, July 25, 2013

नये वर्ष में पिज़ा पार्टी

आज का दिन कुछ इस तरह व्यस्तता में गुजरा कि नये वर्ष के प्रथम दिन न तो वे ढंग से सुबह का नाश्ता ही खा सके न लंच. सुबह देर से उठे क्योंकि रात बारह बजे तक जगना था नये वर्ष का स्वागत करने के लिए. देर से उठने पर कैसा तो आलस्य छा जाता है, थोड़ा सा कुछ खाकर एक मित्र के यहाँ कैसेट लेने निकले वे मिले नहीं, बाजार होते हुए दूसरे मित्र के यहाँ पहुंच गये, वहाँ से बारह बजे लौटे तो शाम की पार्टी का कार्यक्रम बनाकर. वापसी में फिर पहले मित्र के यहाँ गये वापस आये दो बजे, उन्हें लंच पर आने का निमत्रंण देकर, पहले तहरी बनाई, फिर कैरम खेला, उनके जाने के बाद शाम की पिज़ा पार्टी की तैयारी, जो खत्म हुई रात के दस बजे. सो पहला दिन रहा मित्रों के नाम. पिज़ा ठीक बना था बस बेस थोड़ा पतला था जिससे कड़ा हो गया था, मित्रों के मध्य वेज, नॉन  वेज को लेकर थोड़ी बहस भी हो गयी, बात उसने ही शुरू की थी पर यहाँ तक फ़ैल जाएगी अंदेशा नहीं था. नन्हे ने दोस्तों के लिए कार्ड बनाये हैं, उसे मिले भी हैं, उसे पिज़ा भी पसंद आया, उसने अपनी लिखी कविता भी सबको सुनाई.
 आज बहुत दिनों बाद नन्हे का स्कूल खुला है, सुबह से वही पुरानी दिनचर्या शुरू हो गयी. उसे इतवार को धुले कपड़े भी प्रेस करने थे और रात की पार्टी के बाद किचन में फैले सामान को भी. काम तो सभी हो गया जून के आने से पहले, फिर खाना खाते वक्त उन्होंने वह कैसेट भी देख लिया जो कल लेने गये थे, ‘सिलसिला’ फिल्म उसे तो अच्छी नहीं लगी किसी भी लिहाज से. अभी एक और फिल्म ‘नमक हराम’ जो उसकी सखी ने उनके लिए रिकार्ड की है, भी देखनी है, पर समय कहाँ है, आज शाम से क्लब में क्लब मीट के कार्यक्रम आरम्भ हो गये हैं, वे लोग देर से पहुंचे तब तक ‘टी’ लगभग समाप्ति पर थी. कुछ देर बैडमिन्टन का मैच देखते रहे फिर एक कटलेट और चाय ली, ठंड बहुत थी. दोपहर को वह savey पढ़ती रही, ऋचा दत्त का इन्टरव्यू पढ़ा, कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से ग्रसित होने पर भी वह इतनी आशावान है, दुःख इन्सान को साहसी बना देता है. और एक वह है जो छोटी-छोटी बातों से घबरा जाती है. यूँ थोड़े बहुत परिवर्तन उसमें भी आये हैं, मसलन अब वह बीमार पड़ने पर या सिरदर्द होने पर उतनी परेशान नहीं होती. नन्हे पर झुंझलाती भी कम है और जून से नाराज हुए तो महीनों बीत जाते हैं, वैसे वह इतना ख्याल रखते हैं कि ऐसा मौका ही नहीं दते, पहले-पहल वह यूँ ही बहस करने लगती थी पर अब न तो वक्त है न ही energy. रोजाना के काम से थोड़ा सा ज्यादा काम किसी दिन हो जाये तो सिर में दर्द हो जाता है, फिर ऐसे में गुस्सा करके सरदर्द मोल ले ऐसा मूर्ख कौन होगा ?