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Monday, March 4, 2019

अस्सी घाट पर दादरा



शाम के सात बजने को हैं, वे पांच बजे घर से चले थे. उस समय आकाश में सूरज बादलों के पीछे से झांक रहा था. धीरे-धीरे साँझ ढलती गयी, गगन गुलाबी से सुरमई हो गया और स्टेशन पहुँचने तक तो पूर्ण अंधकार हो चुका था. मार्ग में हरे-भरे चाय बागान, झोपड़ियाँ और बांसों के झुरमुट थे. कहीं-कहीं खेतों में पानी भरा था. कहीं महिलाएं घरों के सामने बैठ कर बातें कर रही थीं तो कहीं ठूँठ बचे खेतों में दूर तक कोई पंछी भी नजर नहीं आ रहा था. डिब्रूगढ़ शहर का मुख्य बाजार रोशनियों से जगमगा रहा था. कई नई दुकानें भी नजर आयीं. रेलवे स्टेशन काफी साफ-सुथरा था, कहीं भी गंदगी नजर नहीं आई. लगभग खाली ही था पूरा स्टेशन. टीटी के दफ्तर में जाकर पता किया, प्रथम श्रेणी के चार के कूपे में अन्य दो यात्री कौन हैं, तथा कहाँ से चढ़ने वाले हैं. पता चला कोई मारवाड़ी दंपति हैं, आधी रात के बाद ही चढ़ेंगे. वे लगभग तीन वर्ष बाद वाराणसी जा रहे हैं. ट्रेन की इतनी लंबी यात्रा किये भी काफी अरसा हो गया.

दस बजे हैं अभी सुबह के. ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी हुई है. सुबह वे पांच बजे के बाद ही जगे. रात को देर तक नींद नहीं आ रही थी, फिर आयी भी तो स्वप्नों भरी. रेल यात्रा बहुत दिनों बाद कर रहे हैं सो जैसे अभ्यास ही नहीं रहा. जून ने नाश्ते में आलू परांठा व दही मंगवाया. कॉर्न फ्लेक्स तो था ही. सहयात्री आ चुके हैं, उनका एक चार-पांच वर्ष का पुत्र भी है, जिसकी आँखें बहुत कमजोर हैं. मोबाइल को लगभग आँख से सटाकर देखता है. उसके दांत में भी दर्द था. माता-पिता तो बन जाते हैं लोग पर उसके लिए ज्यादा श्रम नहीं करना चाहते. माँ को सोने में ज्यादा आनंद आ रहा है, बजाय इसके कि पुत्र के साथ खेले जो मोबाइल में ही खेल रहा है. उसने एक कहानी लिखी छोटी बहन के साथ घटी घटना पर आधारित.

कल रात्रि समय पूर्व ही उनकी ट्रेन वाराणसी स्टेशन पर पहुँच गयी थी. पौने दो बजे घर पर थे. छोटी ननद व ननदोई ने स्वागत किया. हाल-चाल पूछ कर सो गये पर सुबह साढ़े पांच बजे ही लगातार आती तोते की आवाज ने उठा दिया, पता चला पड़ोस के घर में रहता है और सुबह से रटना शुरू कर देता है. प्रातः भ्रमण भी किया और वापस आकर प्राणायाम भी. नाश्ते में छोलिया-पोहा था और फल. शाम को विवाह उत्सव में जाना है, जहाँ बहुत लोगों से मुलाकात होगी. कल शाम बाजार जाना है, परसों गंगा आरती देखने, एक दिन चुनार का किला देखने तथा किसी आश्रम में भी. यहाँ मौसम थोडा गर्म है, पर बहुत अधिक भी नहीं.

दोपहर के ढाई बजे हैं. बाहर धूप तेज है पर कमरा एसी के कारण ठंडा है. वे दोपहर का विश्राम करके अभी उठे हैं. शाम से पूर्व बाहर निकला नहीं जा सकता है. आज की सुबह शानदार थी. वे साढ़े चार बजे उठ गये थे और अस्सी घाट गये. घर के पास ही इ-रिक्शा वाला रहता है, जिसे शाम को ही बुक कर लिया था. छह बजे घाट पर पहुंचे तो शास्त्रीय संगीत का कार्यक्रम चल रहा था, कुछ कुर्सियां लगी थीं और दरियां भी बिछी थीं. सुबह पांच बजे ही आरती होती है, जो वे नहीं देख सके. एक गायिका जो कोलकाता से आई थी, स्थानीय तबला वादक ( युवा छात्र) तथा हारमोनियम वादक के साथ बहुत ही सधे हुए अंदाज में दादरा गा रही थी. सात बजे योग का कार्यक्रम आरम्भ हुआ. योगाचार्य जी ने पहले नौ प्राणायाम कराए-अनुलोम-विलोम, कपालभाती, शीतलीकरण, भस्त्रिका, उज्जायी, अग्निसार, भ्रामरी तथा तीन बंध. उनकी वाणी ओजस्वी थी तथा उत्साहवर्धक भी. उसके बाद आसन करवाए, ताड़, अर्ध चन्द्र, मंडूक, पर्वत आसन. कुछ क्रियाएं पैरों हाथों तथा सर्वाइकल के लिए भी थीं, जिनमें पैरों को जमीन पर पटकना भी शामिल था. सिंहासन तथा हास्यासन भी करवाए. योग करने के बाद तन-मन ऊर्जा से भर गया, फिर वे नाव से गंगापार गये. स्नान करके नाव से वे दशाश्वमेध घाट पर उतरे. नाश्ता किया, शालिग्राम तथा नर्मदेश्वर से मिलने वाला एक पत्थर लिया. दुकानदार का नाम धर्मेन्द्र था, जो बातें बनाने में कुशल था. उसने दोनों पत्थरों के बारे में बताया तथा उनकी पूजा करने से पूर्व उन्हें पंच गव्य से अभिषिक्त करने को कहा. उसके बाद वे पैदल ही चलकर पुरानी गली में गये. कुछ समय पुराने घर में बिताया. वर्षों पूर्व वहाँ जो विद्यार्थी उससे गणित के सवाल पूछा करता था, अपने परिवार के साथ रह रहा था. दो बच्चों का पिता वह एक अख़बार में काम करता है. एक स्वयं सेवी संस्था से भी जुड़ा है.   

Monday, August 17, 2015

प्रकृति के नियम


उसने प्रभु से जो माँगा है, वह उसने उसे प्रदान किया है. उसने उससे ‘सदगुरू’ मांगे थे जो सहज ही उसे मिले, स्वयं ही उसके जीवन में आये. उसने उससे भक्ति मांगी जो प्रेम के रूप में उसके रग-रग में समाई है. उसके भीतर अनंत प्रेम उस परमात्मा ने भर दिया है कि उसके लिए उसका अंतर छोटा पड़ता है, तो उसने उससे सेवा का अवसर माँगा और अब उन्हें एक दिन गुरूजी के जन्मदिन के उपलक्ष में सेवा का कार्य करना है. अवश्य ही उनका प्रयास सफल होगा. वे अपने साधनों के द्वारा तथा अपने प्रेम के द्वारा उन लोगों तक पहुंचेंगे जो एक तरह से उनके समाज का अंग होते हुए भी  उनसे कटे हुए हैं. उनके घरों में काम करने वाली महिलाओं के घरों की वास्तविक स्थिति से वे अनभिज्ञ ही हैं. उनके दिलों में झांककर कभी देखा ही नहीं. उन्हें भी उनका प्रेम व ज्ञान मिले तो वे अपने परिवारों को अच्छा पोषण दे पाएंगी. उसका इरादा नेक है और सद्गुरु की कृपा है. सेवा करने का भाव भीतर प्रकट हो तभी से सफलता का आरम्भ हो जाता है. वे अपना आप देना चाहते हैं, सामुदायिक चेतना का विकास करना चाहते हैं. जो भी धर्म के मार्ग पर चलता है उसकी मंजिल लोक संग्रह ही होती है, सभी के भीतर उसे परमात्मा की छवि दिखाई पड़ती है. परमात्मा से प्रेम करने का अर्थ ही है उसके बन्दों के काम आना.

आज सुबह वे उठे तो वर्षा हो रही थी, वर्षा होने में कर्ता तो कोई भी नहीं, फिर भी कार्य तो हुआ, कृष्ण कहते हैं जो कर्म में अकर्म को देखता है अर्थात कर्तापन से मुक्त है और जो अकर्म में कर्म को देखता है अर्थात कुछ न करते हुए भी करता है, उसके द्वारा सहज ही कृत्य हो रहे हैं. वे कर्म तो करें पर फल की इच्छा न हो तो कितनी परेशानियों से बचे रहते हैं, जब कुछ भी न करें तो न करने के अपराध बोध से भी ग्रसित न हों, क्योंकि सहज रूप से जो सामने आये वही करना तथा विशेष कर्म का आग्रह न रखना भी साधक के लिए आवश्यक है. उसने सोचा नहाना-धोना, भोजन आदि कर्म तो सहज ही होते हैं, लिखना-पढ़ना भी होता रहे, सामने कोई पत्थर आ जाये तो हाथ उसे उठाते रहें, कोई दुखी आये तो हाथ उसके आँसूं पोछते रहें, पर करने का अभिमान न आये, तभी वह कर्मों के बंधन से मुक्त रहेगी. मन खाली रहेगा और खाली मन में प्रभु आकर बसते हैं. पता नहीं कौन सा पल होगा जब उसे ऐसा अनुभव होगा.

आजकल वह एक नई पुस्तक पढ़ रही है. अच्छी है, प्रकृति के नियमों की जानकारी यदि उन्हें हों और वे उसके अनुसार जीना शुरू कर दें तो जीवन एक उत्सव बन जाता है, उनका हर क्षण एक अमूल्य अनुभव ! वे इस धरा पर मानव देह पाकर एक अनोखी यात्रा पर निकले हैं, वह यात्रा है उनके भीतर की यात्रा, अनंत सम्भावनाएं उनके भीतर छुपी हैं. अनंत ऊर्जा, आनंद तथा शांति का खजाना उनके भीतर है. वे जब इस धरा पर आये थे तो निर्दोष थे. जगत के प्रभाव में आकर दिन-प्रतिदिन अपने मूल स्वरूप पर आवरण चढ़ाते गये, वे असहज होकर जीने लगे और परिणाम हुआ कि वे अपने भीतर एक दर्द और तथा डर को जगह देते गये. जब-जब वे अपने मूल स्वरूप से खिलाफ कार्य करते हैं, तब-तब एक दर्द भीतर उत्पन्न होता है. उनके भीतर जो परमात्मा है वह साक्षी है उनके कृत्यों का. वे ऊपर-ऊपर से अपनी गलतियों पर भले पर्दा डाल दें या उन्हें उचित सिद्ध कर दें, भीतर जो सही है वही सही है, जो गलत है वह गलत है. उनके भीतर जो डर हैं, वे भी उन्हें सच बोलने से रोकते हैं. वे डरते हैं कि यदि लोगों से ज्यादा प्रेमपूर्ण व्यवहार करेंगे तो फंस जायेंगे, डर के कारण ही वे अपने भीतर के प्रेम को घुट-घुट कर खत्म हो जाने पर विवश कर देते हैं. प्रेम करना उनका स्वभाव है, सत्य बोलना भी उनका स्वभाव है, दया, करुणा तथा अपनत्व.. ये भी उनका मूल स्वभाव है इसके विपरीत जो भी है, वह झूठ है, ओढ़ा हुआ है और वह उन्हें नुकसान पहुँचाता है !