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Monday, April 29, 2013

बिटिया का जन्म



शनिवार को क्या व्यस्तता थी याद नहीं आ रहा और कल यानि रविवार को तो लिखने का समय होता ही नहीं. हर पल तो जून के साथ बीतता है न. शनि की दोपहर को वे एक मित्र के यहाँ गए, कैरम खेला. शाम को क्लब, जून ने "क्विज प्रतियोगिता" में भाग लिया था, उनकी टीम तीसरे नम्बर पर रही, इनाम में उन्हें लाल रंग की सुंदर सी बड़ी ट्रे मिली है. इतवार शाम उसने एक सखी (जिसको नौवां महीना चल रहा है) तथा उसके सास-ससुर को खाने पर बुलाया, उसके पति देश से बाहर गए हैं, उनके आने में अभी एक महीना है, उसे लगा, उसकी सखी बहादुर है और समझदार भी. धीरे-धीरे पता चल रहा है कि उसे अपने बारे में कितनी खुशफहमियां हैं...खैर ये खुशफहमियां और गलतफहमियाँ तो हरेक को होती हैं. कल शाम को लेखक ‘कुबेरनाथ राय’ का एक ऐसा लेख पढ़ा जिसमें बातें उसके मन की ही थीं. कितने सीधे-सरल परन्तु ओजपूर्ण शब्दों में देशप्रेम का भाव जगाने में सफल हुए हैं, देशप्रेम एक संकुचित भावना नहीं है, एक विशाल, उदार भावना है. आज पत्र लिखने का दिन भी है. बादलों के कारण वे आज सुबह देर से उठे, आज नन्हे का अवकाश है, सो देर से उठने से कोई विशेष परेशानी नहीं हुई.

  पिछले दो दिन फिर व्यस्तता में बीते, दोनों दिन सफाई में ही. किचन, स्टोर और किताबों की शेल्फ कितने अच्छे लग रहे हैं और स्वच्छता=सौंदर्य=अच्छाई. आज वही रोज के कार्य किये. कल बुआ जी का एक खत मिला और माँ-पिताजी का भी.बुआ जी के पत्र में एक बात मन को छू गयी, अपने ननदोई की मृत्यु पर उन्होंने लिखा है-

“जीवन से ही सब कुछ मिला है और मिल सकता है, किन्तु सब कुछ देकर भी जीवन नहीं मिल सकता”.

 कल शाम को वे एक सोशल विजिट पर गए, उसने बहुत दिनों बाद तांत की कोक कलर की साड़ी पहनी, अपना-आप अच्छा लग रहा था, आईना उस दिन से उसका मित्र हो गया है. परसों लाइब्रेरी से दो किताबें लायी थी, मन हो रहा है एक कहानी पढ़े और मन को किसी उच्च धरातल पर ले जाये, फिर तो भोजन की तैयारी करनी है. जून को आने में आधा घंटा तो है ही.
   पता नहीं क्यों आजकल वह बहुत जल्दी थक जाती है. कल रात टहलने गए, दो ही चक्करों में थक गयी, स्टैमिना कम हो गया है या आलस्य के कारण खुद को इतना कमजोर बना लिया है. मौसम इतना गर्म भी नहीं था, पर रात को गेस्ट रूम में बिना एसी के सोने की उनकी योजना असफल हो गयी, नन्हे ने एक सूत्र निकाला है, “जब वे सर्दियाँ खत्म होने पर एसी रूम में पहली बार सोते हैं तो बहुत अच्छा लगता है, पर छोड़ते समय बहुत कठिनाई होती है”

आज सुबह-सुबह ही पता चला कि उसकी सखी ने कल रात दो बजे बेटी को जन्म दिया है. वह क्या सोच रही होगी अपने पति की अनुपस्थिति पर इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है. शाम को वे अस्पताल जायेंगे, जून पहले ही हो आए हैं. सुबह धूप तेज थी अब जाने कहाँ से बदली आ गयी है. आज ओणम है, और नन्हे के स्कूल में कहानी सुनाने की प्रतियोगिता भी, कल शाम उसे अभ्यास कराते समय ज्ञात हुआ कि अब वह बड़ा हो गया है और अपनी सुदृढ़ राय रखता है, किसी भी विषय पर, उसे बहलाना आसान नहीं है. आज दोपहर के भोजन में वह जून की पसंद पर इडली बना रही है. दूध वाले सरदार जी ने इस बार भी पनीर के लिए उतना ही परेशान किया जितना नन्हे के जन्मदिन पर किया था, इनका नाम भुल्लकड़  सरदार रख देना चाहिए. कल सुबह वह पड़ोसिन के यहाँ गयी हफ्तों बाद, उसके बेटे की आँखें लाल थीं, घर आते-आते उसे भी लगने लगा कि उसकी आँख में दर्द हो रहा है, जाने क्यों मनोवैज्ञानिक असर बहुत ज्यादा होता है वस्तुओं का उस पर. आज भारत-पाकिस्तान का मैच है दोपहर बाद, जिसमें भारत की विजय की ज्यादा संभावना है.










Thursday, August 2, 2012

काबुली चने


नन्हा अब ठीक है, कुछ देर पहले उसने आँखें खोलीं फिर करवट बदल कर सो गया. आज उसके खुद के गले में हल्की खराश महसूस हो रही है, जून होते तो उसे नमक पानी का गरारा करने को कहते. उसने दही लगाकर बालों को धोया था, अब ठंड के डर से कोई कब तक बालों को न धोए...ईश्वर भली करेंगे. आज पहली अप्रैल है, अभी तक तो किसी को मूर्ख नहीं बनाया, उसने सोचा पीछे रहने वाली असमिया पड़ोसन को आज बुद्धू बनाएगी.

इतवार की सुबह, दोनों बाप-बेटा अभी सो रहे हैं वह बाहर घूमने गयी थी, सड़क किनारे एक पॉपी का सूखा पौधा दिखा जिसके कुछ बीज उसने ले लिये अगले मौसम में उन्हें उगाएगी तब ढेर सारे पॉपी के फूल खिलेंगे, और तब वह आज का दिन याद करेगी. कल रात उन्होंने एक चीनी फिल्म देखी, उदास करने वाली, रुलाने वाली एक कविता हो जैसे. उसकी आँखें एक क्षण को नहीं सूखीं, बहुत दिन पहले एक और अच्छी चीनी फिल्म देखी थी. कल शाम जून कुछ सोच रहे थे, उन्हें ऑफिस का कुछ काम भी करना है, तीन-चार घंटों का शायद इसी का तनाव हो.

आज सुबह जून बहुत खुश थे, उन्होंने विवाह के बाद के साल को याद किया. नन्हा जल्दी उठ गया था पर दूध पीकर फिर सो गया, अब खरगोश से खेल रहा है, सचमुच का नहीं, खिलौने से. आज वह ट्रंक आ ही जायेगा जिसका उन्हें इतना इंतजार है. कल उनकी पड़ोसिन ने इडली बनायी परसों उसने दोसा बनाया था और साथ में मूंगफली की चटनी, सबने मिलकर खायी. वह जो नन्हे का स्वेटर बना रही थी कल पूरा हो गया, गले के बार्डर में बहुत सफाई नहीं आयी है. उसने सोचा वह खोल कर फिर से बनाएगी.
रेलवे स्टेशन से वह ट्रंक ले आये जून, उसमें सभी कुछ था जो वे डाल कर आये थे, बस कूकम और डाला गया था. वह नन्हे को लेकर पार्क में गयी तो जून ने चने बना दिए, बहुत स्वादिष्ट, उसे बहुत अच्छा लगा, वह जैसे पहले साल में पहुँच गया था, वही भोलापन और प्यार छलकती आँखें. कल वे दोनों उसके काम के कारण ग्यारह बजे तक बैठे थे. वह अखबार पढ़ रही थी पर आँखें थीं कि नींद से बोझिल हो रही थीं.