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Monday, November 2, 2015

महावीर के सूत्र


आज यूँ तो द्वादशी है पर कल वह भूल गयी सो आज उपवास है, उपवास यानि निकट बैठना, उसके निकट जो वे हैं, प्रकाश, पावनता, सत्य और दिव्यता का जो स्रोत है, यानि आत्मा, वही तो परमात्मा है. आज ध्यान में अनोखा अनुभव हुआ, विचार शून्य चेतनता का अनुभव काफी देर तक होता रहा, फिर मन ने कैसे-कैसे रूप गढ़े. गीलापन, तेल, स्वाद अभी कुछ ध्यान में कितना स्पष्ट अनुभव होता है, मोती, प्रकाश और भी न जाने क्या-क्या. मानव होने का जो सर्वोत्तम लाभ है वह यही कि वे अपनी आत्मा को जानें यानि खुद को जानें. जिसके बाद यह सारा जगत होते हुए भी नहीं रहता. वे सभी कुछ करते हैं पर भीतर से बिलकुल अछूते रहते हैं. सब नाटक सा लगता है कुछ भी असर नहीं करता. वे इन छोटी-छोटी बातों (संसार ही छोटा हो जाता है) से ऊपर उठ जाते हैं. जीना तब कितना सहज होता है, मन भी हल्का और तन भी हल्का, कोई अपेक्षा नहीं, कुछ पाना भी नहीं, कुछ जानना भी नहीं, कहीं जाना भी नहीं, कहीं से आना भी नहीं, खेल करना है बस, जगना, सोना, खाना-पीना सब कुछ खेल ही हो जाता है. वह परमात्मा जो कभी दूर-दूर लगता था, अपने सबसे करीब हो जाता है, वही अब खुद की याद दिलाता है, वह जग जाता है जो जन्मों से सोया हुआ था. सद्गुरु की बातें अक्षरशः सही लगती हैं, शास्त्र सही घटित होते हुए लगते हैं. ऐसी मस्ती और तृप्ति में कोई नाचता है तो कोई हँसता है, कोई मुस्कुराता भर है !

आज ‘महावीर जयंती’ है, गुरूजी ने उस पर प्रकाश डालते हुए कहा, उन्हें आत्मलोचन करना है, उनके सिद्धांतों को व्यवहार में लाना है. अहिंसा को मनसा, वाचा, कर्मणा में अपनाना है. उन्हें संग्रह की भी एक सीमा बांधनी है, उनका मन यदि सजग हो प्रतिपल, तो चेतना की अनंत शक्तियों को पा सकता है. मन यदि पल भर के लिए भी विकार ग्रस्त होता है तो वह उस शक्ति से वंचित हो जाता है. चेतना का सूरज जगमगाता रहे इसके लिए प्रमाद के बादलों को बढ़ने से रोकना होगा, तंद्रा के धुंए से बचना होगा. जीवन थोड़ा सा ही शेष बचा है, हर व्यक्ति मृत्यु का परवाना साथ लेकर आता है, कुछ वर्षों का उसका जीवन यदि किसी अच्छे काम में लगता है तो ईश्वर के प्रति धन्यता प्रकट होती है. सद्गुरु कितनी सुंदर राह पर चलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं. साधक भटक न जाएँ इसलिए वह भीतर से कचोटते भी रहते हैं, वे मंजिल के करीब आ-आकर फिर भटक जाते हैं !

बल, बुद्धि, विद्या उन्हें श्री हनुमान से प्राप्त होते हैं तथा अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष राम से, इन सभी के साथ जब तक विवेक न हो तो यही सभी वरदान उनके लिए शाप भी बन सकते हैं. उसकी बुद्धि  में धैर्य नहीं है, उसके बल में विवेक की कमी है और उसकी विद्या में नम्रता नहीं है. नीरू माँ कहती हैं जो कोई रिकार्ड करके लाया है वही तो बोलेगा. नूना भाव शुद्ध करती है भीतर प्रण भी लेती है पर वे भीतर ही रह जाते हैं, बाहर निकलती है केवल एक उदासीनता, एक कटुता, एक खीझ और एक अतृप्ति. जो मन नाचता था, गाता था और खिला रहता था हर पल, वह किसी बाहरी प्रभाव के कारण ऐसा पीड़ित हो जायेगा, यह कहाँ पता था. पर इसके लिए यदि कोई जिम्मेदार है तो वह स्वयं  है, यात्रा के दौरान तो साधना में खलल पड़ा ही, यहाँ लौटकर भी पहले की सी तीव्रता नहीं है, बल्कि मन को इधर-उधर के कामों में ही उलझाये रखा, मन तो छोटा बच्चा है और बुद्धि उसकी बड़ी बहन, पर दोनों का आधार तो आत्मा है, आत्मा यदि स्वस्थ हो, सबल हो, सजग हो तो इनमें से किसी के साथ तादात्म्य नहीं करेगी, अपनी गरीमा में रहेगी, उस गुंजन को सुनेगी जो रात-दिन भीतर हो रही है, उस ज्योति को देखेगी जो भीतर जल रही है.

तमोगुण की प्रधानता होने पर जीवन में रजोगुण व सतोगुण दब जाते हैं. हो सकता है यह उसके किसी पूर्व कर्म का फल हो अथवा पुरुषार्थ में कमी का अथवा तो सजगता की कमी हो, पर दुःख देने वाला यह तम रूपी विष उसकी इन्द्रियों को ताप दे रहा था. आज नीरू माँ ने कहा यदि जीवन में अभी भी दुःख है तो कोई आत्मा को जानता है, ऐसी बस उसकी मान्यता भर ही है. उसका स्वभाव यानि प्रकृति वैसी की वैसी ही बनी हुई है, सम्पूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है, अपनी आजादी को किसी भी कीमत पर वह खोना नहीं  चाहती, उसका ‘स्व’ अत्यंत संकीर्ण है, आत्मा को जानने वाला तो उदार होता है, उल्लास उसका साथ कभी नहीं छोड़ता, वह कामनाओं से उपर उठा होता है. अपने भीतर झांक कर देखे तो कोई विशेष कामना नजर नहीं आती, सिवाय इसके कि..परमात्मा से उसकी भेंट हो जाये, पर उसके लिए तो हृदय को पवित्र करना होगा, राग-द्वेष से मुक्त होकर, छल-छिद्र और कपट से रहित होना होगा, वाणी को मधुर बनाना होगा, वाचा, मनसा, कर्मणा एक होना होगा, हृदय व बुद्धि का मिलन करना होगा. आज इस वक्त दोपहर के साढ़े बजे वह सद्गुरु और कान्हा की उपस्थिति में स्वयं से वादा करती है कि सजगता के साथ हर कार्य करेगी. तमोगुण का अर्थ ही है बेहोशी, प्रमाद. उसे सत्वगुण के भी पार जाना है, उसकी डायरी में नीचे लिखी सूक्ति में गाँधी जी भी यही कह रहे हैं जब किसी के मन, वाणी तथा कर्म में साम्य होगा, तभी वह प्रसन्न होगा !
 


   

Monday, September 28, 2015

बापू की आत्मकथा


आज उसने सुना, जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न चेतना का विकास ही है, पदार्थ चेतना को प्रभावित करते हैं. शुद्ध हुई चेतना ही आत्मा के पथ पर ले जाती है. आत्मा मन, बुद्धि तथा संस्कार के माध्यम से जगत को ग्रहण करती है तथा इन्हीं के माध्यम से स्वयं का अनुभव करती है, यदि देह में रहते हुए आत्मा का अनुभव करना है तो इन्हें शुद्ध बनाना होगा. मन में शुभ संकल्प उठें तथा बुद्धि उन्हें साकार करने का निर्णय दे तभी शुभ संस्कार बनेंगे. वर्तमान में रहना, प्रतिक्रिया न करना, मैत्री भाव तथा मिताहार बुद्धि को शुद्ध करने के लिए आवश्यक हैं. उसका शरीर इस समय तप रहा है, बिना बुखार के. कुछ ही पलों में पसीना निकलेगा और तपन शांत हो जाएगी, आजकल ऐसा दिन में दो-तीन बार तो हो ही जाता है. उम्र के इस दौर में ऐसा होना स्वाभाविक है डाक्टर ने कहा है.

आज महीनों बाद मृणाल ज्योति गयी. माहौल थोडा शांत व हल्की उदासी से ओत-प्रोत लगा. बच्चे भी पहले की तरह हँसते हुए नहीं लगे. एक बच्चे ने कहा, फिर मिलेंगे. मन में करुणा जगी, कितने विवश लगे वे, उनकी आत्मा उन अधूरे शरीरों में कितनी तंग होती होगी, कौन जाने उनके भीतर कैसे  विचार उठते हैं? वे अपने को व्यक्त कहाँ कर पाते हैं ? उनकी एक टीचर ने शाम को फोन किया, वह कम वेतन के बारे में बात कर रही थी. स्कूल के अधिकारियों ने बताया कि वे तंग आ चुके हैं सरकार की योजनाओं का पूरा लाभ उन्हें नहीं मिल पाता है. सरकारी अधिकारी काम को आगे नहीं बढ़ाते. संसार में कितने दुःख हैं. आतंक का शिकार यह प्रदेश कितना पिछड़ा हुआ है. गाँधी जी ने सेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया, सेवा के माध्यम से वह अपने सत्य और अहिंसा के साधनों की परख करते थे. उसके जीवन में सेवा के अवसर अब थोड़े-बहुत आने लगे हैं पर वे बहुत कम हैं. जून उसकी पूरी मदद करते हैं. वह उसे ईश्वर से दूर ले जाने का प्रयत्न करते हुए ईश्वर के निकट ले जाते हैं. वह अभी इस बात को नहीं समझते कि ईश्वर से प्रेम करना मानवीय आवश्यकता है. उसे उनसे कोई वाद-विवाद नहीं करना चाहिए, उनकी समझ में तो यह पागलपन ही है. वह तो उन्हें शुद्धात्मा ही देखती है और इस सृष्टि के जर्रे-जर्रे की तरह उनसे भी असीम प्रेम करती है. ईश्वर हर क्षण उसके साथ हैं और ईश्वरीय प्रेम उसके भीतर-बाहर हर ओर फैला है. यह सारा जगत उसी का रूप है. मनसा-वाचा-कर्मणा वह किसी का अहित न करे, यही उसका प्रयास है. वह उसकी इच्छा की पूर्ति तत्काल करते हैं और सोचते हैं कि जगत के मोहजाल में उसे खींच लेंगे, पर उसकी वे सारी इच्छाएं परमात्मा के मार्ग पर ले जाने वाली ही हैं. वह भी तो पुण्य के भागी हो रहे हैं. उसका हृदय प्रेम से लबालब भरा है. इस प्रेम का कारण कोई नहीं, पात्र भी कोई नहीं. यह तो सहज ही है सारी समष्टि के लिए और उससे परे उस परम पिता परमात्मा के लिए, बल्कि वही तो प्रेम रूप में उसके भीतर विराजमान है !
पिछले कुछ दिनों से वह बापू की आत्मकथा पढ़ रही थी, अभी कुछ देर पूर्व ही समाप्त की. वे सत्य के अन्वेषक थे और उनका साधन एकमात्र अहिंसा था. अहिंसा के बल पर वे सत्य की खोज कर रहे थे. बुद्धि की शुद्धि के बिना कोई अहिंसा का पालन नहीं कर सकता और राग-द्वेष से मुक्त हुए बिना वह सम्भव नहीं. राग-द्वेष से मुक्त होने के लिए अहंकार का सर्वथा त्याग करना होगा, स्वयं को भुलाकर समष्टि के साथ एकता का अनुभव करना होगा. उसके बाएं कान में सुबह से तथा इस समय दायें कान में सोहम् की मधुर गुंजन सुनाई दे रही है, भीतर अखंड शांति का साम्राज्य है.

आज सुबह पिता जी आ गये, जून रात्रि को ढाई बजे ही उन्हें लेने चले गये थे. सासुमाँ बहुत खुश हैं, वे अपने साथ खाने-पीने का ढेर सारा सामान लाये हैं. दीपावली का त्योहार आने ही वाला है, तैयारी तो हफ्तों पूर्व ही आरम्भ हो जाती है. वे अपने भीतर भी दीवाली मनाते हैं और बाहर भी, भीतर की सफाई तथा शुद्धि भी करते हैं जैसे बाहर की. अमावस के अंधकार का प्रतीक है अज्ञान..जिसे आत्मज्ञान का दीपक जलाकर मिटाना है. मधुर भावों की मिठास से उर को मीठा करना है. उसके भीतर भी उजाला ही उजाला हो, चिदाकाश में दीप जले हों, अनहद का संगीत गूँजता हो तो ही सदगुरू की शिक्षा की अधिकारिणी वह कही जा सकती है. आज उन्हें सुना, नारद भक्ति सूत्र के आधार पर वह व्याख्या कर रहे थे, प्रेम का वर्णन नहीं कर सकते, वह भाव से परे है, भावुकता प्रेम नहीं है, भीतर की दृढ़ता ही प्रेम है, सत्यप्रियता ही प्रेम है और असीम शांति भी प्रेम का ही रूप है. भीतर ही भीतर जो मीठे झरने सा रिसता रहता है वह भी तो प्रेम है. प्रभु हर पल प्रेम लुटा रहे हैं. तारों का प्रकाश, चाँद, सूर्य की प्रभा, पवन का डोलना तथा फूलों की सुगंध सभी तो प्रेम का प्रदर्शन है. प्रकृति प्रेम करती है, घास का कोमल स्पर्श और वर्षा की बूंदों की छुअन सब कुछ तो प्रेम ही है. वृद्ध की आँखों में प्रेम ही झलकता है शिशु की मुस्कान में भी प्रेम ही बसता है. प्रेम उनका स्वभाव है और प्रेम से ही वे बने हैं. प्रेम ही ईश्वर है !