एक दिन और बीत गया। सुबह आकाश में बादलों के पीछे से झांकता चाँद देखा और सूरज का नारंगी प्रकाश भी सलेटी बादलों के पीछे से।
प्रेम का द्वार
इस पल से गुजर कर आता है
आनंद झरता है
वर्तमान में ही
खिल रहा है
शांति का फूल
बस ! इस क्षण सजग होने की ज़रूरत है
हर मिलन अनोखा है
हर मुलाक़ात संपूर्ण
यदि कोई अतीत या भविष्य को न लाए मध्य में
यह सुबह जो आज आयी है
वह सृष्टि के आरंभ से आज तक
कभी नहीं आयी पहले
हर पल छिपाये है जीवन की चाभी
अपने भीतर
जीवन का सार यही है
आज जो फूल खिलेंगे
वे कल नज़र नहीं आयेंगे !
आज ‘स्ट्रेंजर थिंग्स’ का अगला भाग देखा। यह विज्ञान कथा बहुत रोचक है पर विचित्र और रोमांचक भी, किसी हद तक डरावनी, इलेवन की मासूमियत को देखते ही बरबस चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। पता नहीं कब तक इसमें रुचि बनी रहेगी। जून की पीठ में पिछले कुछ दिनों से हल्का दर्द है। वह नेट पर इसके बारे में जानकारी ले रहे हैं। वे दोनों अभी-अभी रात्रि भ्रमण से आये हैं, हवा ठंडी थी और दो बच्चे सड़क पर टेनिस खेल रहे थे, कौन जाने उनमें से कोई एक दिन टेनिस का बड़ा खिलाड़ी बन जाये। जून आज शाम ढेर सारे फल लाए, पपीता, आम, शरीफा, आलूबुख़ारा, तरबूज़, ख़रबूज़, केला और जामुन! कुल मिलकर आठ तरह के रंग-बिरंगे फल। पापाजी से बात हुई, वह निरंतर अभ्यास की बात कहते हैं। जब तक भीतर उस दिव्य चेतना का साक्षात्कार नहीं हो पाता, चाहे एक पल के लिए ही, तब तक निश्चय नहीं हो पाता है।
‘इचिगो इची’ ‘यह पल न आएगा दोबारा’, इस पल की ख़ूबसूरती को इसी पल में अनुभूत किया जा सकता है। एक ख़ज़ाने की तरह अनमोल है यह पल, इसे महत्व देना सीखना होगा, यही है ‘इचिगो इची’ का अर्थ ! उसके जन्मदिन पर दो किताबें मिली थीं, अभी तक पूरी नहीं पढ़ पायी है।दूसरी किताब इकिगाई का अर्थ भी महत्वपूर्ण है। इकिगाइ का अर्थ है जीवन का लक्ष्य, यदि कोई उसे पाने के लिए श्रम करता है तथा नियमित रूप से उसमें कुछ समय लगता है, तो सफलता अवश्य मिलती है। छोटी बहन को ‘स्पंद कारिका’ की रिकार्डिंग भेजी। वह आजकल चित्रकला सीख रही है। कल उसे हैप्पीनेस कोर्स का फ़ॉलोअप भी लेना है।
आज का इतवार काफ़ी अलग था। सुबह आठ बजे से पहले ही नन्हा और सोनू आ गये थे, उनके साथ ‘गो-नेटिव’ गये, जहाँ बड़े भाई व भतीजी भी आये, नाश्ता किया। उसके बाद नन्हा ‘गो कार्टिंग’ के लिए ले गया, पर वहाँ बहुत भीड़ थी। इसके बाद एचएएल, भारत का पहला एयरोस्पेस संग्रहालय देखने गये, बहुत सारे लड़ाकू विमानों के मॉडल्स वहाँ देखे। वहाँ का बगीचा भी बहुत शानदार था। इसके बाद पैलेस लीला में दोपहर का भोजन। होटल भी बहुत विशाल और हरियाली से युक्त है। बाग-बगीचे, झीलें झरने सभी कुछ आकर्षक है।
गुरुजी कह रहे हैं, यही सृष्टि शिव से उपजी है, उसी में स्थित है और उसी में लीन हो जाती है।जैसे एक बालक के नृत्य का उद्देश्य केवल आनंद है, खेल का उद्देश्य भी आनंद है, जीवन का उद्देश्य भी अपने भीतर आनंद महसूस करना और उसे बहाना है। यहाँ हर घड़ी अपने आप में शुरुआत है और अंत भी ! जीवन का हर क्षण अपने आप में पूर्ण है।जब कोई अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होता है, दुर्बल महसूस करता है। शक्ति का स्रोत भीतर है। वे जगत में कई भूमिकाएँ निभाते हैं, पर मात्र वही नहीं हैं। अपने शुद्ध रूप में वे अनंत से जुड़े हैं।भक्त वही है जो अस्तित्त्व से जुड़ा है, उसे न कुछ पाना है, न कहीं जाना है।जब मन तनावग्रस्त होता है, साधक साधना का भी त्याग कर देते हैं। प्रमाद तथा आलस्य भी तभी घेर लेते हैं। यदि कोई नियमित साधना करता है तो दुख उसे छू भी नहीं सकता। कई तरह की समाधि का वर्णन भी गुरुजी ने किया। सात्विक शक्तिपात में साधक धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। ज्ञान का कोई अंत नहीं है, ज्ञान व्यक्ति को विनम्र बनाता है, ज़्यादा जानकर भी वे क्या कर लेंगे।जैसे भौतिक ज्ञान का कोई अंत नहीं वैसे ही आध्यात्मिक ज्ञान का भी कोई अंत नहीं है।
आज सुबह साढ़े दस बजे वे सब बड़े भांजे के परिवार से मिलने पुन: गो-नेटिव जाने के लिए निकले, जो नार्वे से आया हुआ है। दोनों बालिकाओं और बड़ों से मिलकर अच्छा लगा।भोजन अच्छा था पर कुछ गरिष्ठ भी। वह उन्हें तस्वीरें भेजेगी। वापस आकर वे टहलने गये। एक परिचिता का फ़ोन आया, पंचायत की अध्यक्षा ने गाँव के एक स्कूल में बच्चों के लिए एक झूला लगवाने के लिए कहा था, उसी सिलसिले में।जून को पिछले दिनों जो अनुभव हुआ उसके बाद वह उसे सामाजिक कार्यों से दूर ही रहने के लिए कह रहे हैं। यह स्वाभाविक भी है।कल उन्हें ‘रॉकेट्री’- द नांबी इफ़ेक्ट देखने जाना है, जो इसरो वैज्ञानिक नांबी नारायणन के जीवन पर आधारित है। तब तक अवश्य ही जून का मन ठीक हो जाएगा। पापाजी ने कहा, वह भी अध्यात्म को जीवन में सर्वोपरि मानते हैं, इसलिए उन्हें नूना का सृजन अच्छा लगता है।
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