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Wednesday, June 17, 2020

सूरज की बिंदी


सुबह के साढ़े आठ बजे हैं. दो दिनों के ‘बंद’ के बाद आज जून दफ्तर गए हैं. सरकार सिटिजनशिप बिल के द्वारा कुछ अन्य देशों के धर्म के आधार पर पीड़ित हिंदुओं को भारत की  नागरिकता देना चाहती है, जो किसी तरह जान बचाकर भारत आते रहे हैं, बिना नागरिकता के रह रहे हैं. इसके खिलाफ ही था परसों का बंद. आज जो सफाई कर्मचारी आया है कह रहा है, उसके पूर्वजों को अंग्रेज बिहार से यहाँ असम लाये थे, पर अब तो यही उनका घर है. कल रात भर गर्जन-तर्जन के साथ वर्षा होती रही, कई बार बिजली चमकने व गड़गड़ाहट से नींद भी खुली. सुबह टहलने गए तो बारिश रुकी हुई थी, सड़क खाली थी, कुछ देर बाद ही सारी बत्तियां भी बुझ गयीं, लगभग अँधेरे में ही प्रातः भ्रमण हुआ. कल शाम को क्लब की मीटिंग थी, वर्तमान प्रेजिडेंट की अंतिम कमेटी मीटिंग. कुछ जिम्मेदारी उसे सौंपी गयी है, भावी प्रेसीडेंट ज्यादा व्यस्त है इसलिए. दुबई से लाये खजूर वह सबके लिए ले गयी थी.  आज दोपहर मृणाल ज्योति जाना है नए वर्ष के कैलेंडर, डायरी और केक लेकर, हर वर्ष वहाँ टीचर्स को प्रतीक्षा रहती है. बाहर से झगड़ने की आवाजें आ रही हैं, पिछले घर में रहने वाली किशोरियां हैं जो पिता की बात जरा नहीं मानतीं, स्कूल जाना भी छोड़ दिया है. दुबई यात्रा पर दो कविताएं लिखीं, दो सखियों की विदाई कविताएं टाइप करनी हैं जिनके पतिदेव सेवा निवृत्त हो रहे हैं. 

उस पुरानी डायरी में लिखा है, जीवन में कुछ पल भी अवसाद भरे क्यों हों, कुछ क्षण भी बोझिल क्यों हों. जिन पलों में मन की शांति भंग हो जाये, आँखों में अश्रु आ जाएँ. मुख से कोई शब्द न फूटे पर भीतर मौन भी रुचि न रहा हो. मन खुद से बात करे पर बाहर चुप्पी छायी हो. क्या ऐसा पहले भी कितनी बार नहीं हुआ होगा, इस जन्म में या पिछले जन्मों में. जीवन इसी तरह गिरता-पड़ता, रोता हुआ अपनी यात्रा तय करता आया है. ऐसे क्षण ही मन की दुर्बलता के, मन के अंधियारे के पोषक हैं. इन्हें दूर फेंक कर जलती हुई शिखा की तरह मुस्काना होगा. जीवन सुख का ही नाम है और सुख जीवन का. जिन पलों में आँखें हँसी हैं उन स्मृतियों का ऋण है मन पर, कुछ गीतों का और सपनों का भी. हँसते-गाते कुछ बच्चों का भी और सबसे बढ़कर इक धरती और इक सूरज का ऋण है उस पर ! 

मेरे गीत अमर कर दो ! इंसानी दिल को को ही यह फरियाद करने की जरूरत पड़ती है क्योंकि ऐसा करने से उसे सुकून मिलता है, पर ‘सूरज’ उसे कभी कहने की आवश्यकता नहीं हुई, वह जो नित नए गीत लिख जाता है आकाश पर, धरती पर भी ! अभी कुछ क्षणों पहले सूर्योदय का भव्य और रोमांचकारी दृश्य देखकर आयी है. मन जो पोर-पोर तक उस उस वक्त सूरज का कृतज्ञ था, ग्रे और श्वेत रंग की विशाल स्लेट पर जैसे कोई लाल चमकदार बिंदी सजा दे, और वह बिंदी उसके साथ-साथ चल रही थी. वह दो कदम आगे तो वह भी आगे पीछे तो वह भी पीछे ! कोई अन्य सजीव या निर्जीव वस्तु नहीं दिख रही थी. कोहरे की परत ने सभी पर आवरण कर दिया था, सिर्फ एक सूरज और दूसरी वह स्वयं... 

जॉली और ड्यूक ! राजकुमारी और जॉली, सिल्विया और राजा, ये पात्र बचपन से उसके मन में सजीव हैं. जब भी ‘एक गीत की मौत’ रेडियो नाटक  सुनती है, करुणा से भर जाता है मन ! जॉली और ड्यूक का अद्भुत ऊँचा प्रेम ! सोहराब मोदी की तीसरी फिल्म ‘पृथ्वी वल्लभ’ देखी आज. छोटे भाई ने एक घायल चिड़िया का बच्चा उसे लाकर दिया जैसे वह दम तोड़ने की प्रतीक्षा कर रहा था. हाथों में आते ही बिना पानी पिए चला गया, उसने ऐसा क्यों किया, पहले वह हिल-डुल रहा था फिर शांत... किसी की मौत अपने हाथों में.. पता भी नहीं चला एक सेकण्ड से भी कम समय में उसके प्राण निकल गए. उसने उसे मिट्टी में दबा दिया चंद आँसुओं के साथ ! 

Thursday, April 9, 2020

चिड़िया की कूजन


दोपहर के ढाई बजे हैं, कुछ ही देर में दोपहर की योग कक्षा के लिए महिलाएं आएँगी. कुछ देर पहले दो ब्लॉग्स पर लिखा. कमरे में एसी चल रहा है पर उसकी आवाज को भी चीरते हुए बाहर से चिड़िया की मधुर चहकार आ रही है, भले ही तेज धूप हो पर इसके बावजूद पंछी दोपहर भर  कूजते हैं, विश्राम वे रात को ही करते हैं सूर्यास्त के बाद. कल शिक्षक दिवस सोल्लास मनाया, सुबह मृणाल ज्योति में, दोपहर को बाहर बरामदे में बच्चों के साथ और शाम को गायत्री समूह की योग साधिकाओं के साथ ! गुरूजी के प्रेम का जादू उन पर भी चलने लगा है, कल वे बहुत सुंदर दीपदान लायीं पूजा कक्ष के लिए, साथ ही ढेर सारी खाने की वस्तुएं, उनका उत्साह देखते ही बनता था. एक ने कबीर के दोहे गाए, दूसरी ने अपनी रची दो पंक्तियाँ और एक अन्य ने सुंदर बंगाली भजन गाया।  मन होता है उनके लिए एक कविता लिखे. दोपहर को भी बच्चों ने सुंदर सजावट की. समोसे, केक व कोल्डड्रिंक्स का इंतजाम किया, उन्होंने आपस में पैसे जमाकर के ये सामान खरीदा. उनका भी उत्साह बहुत था. स्कुल में सभी टीचर्स को उपहार अवश्य ही पसन्द आये होंगे. कल जाने पर फीडबैक मिलेगा. जीवन एक उत्सव है , यह गुरूजी का वाक्य सत्य सिद्ध हो रहा है. दोपहर बाद उसने लिखा 

दिलों में प्रेम और उत्साह भरे
चमकते हुए ख़ुशी से आपके चेहरे
चुपके-चुपके से उत्सव का आयोजन
मानो लौट आया हो फिर से बचपन

दीप स्तम्भ सजा थाल में
 भरा मिष्ठान और फूलों-फलों से
चहकते पंछियों से सुमधुर गान
याद आएंगे जब तक हैं प्राण

गुरु का ज्ञान जब फलता है
तभी जीवन में ऐसा फूल खिलता है
मिलन घटता है पावन आत्माओं का
जीवन एक सुवास बन झरता है

वैसे तो कभी न आएगा अब
पतझड़ दिल के मौसम में
यदि कभी भूले से आ भी जाये
तो इस शाम का वसन्त भर देगा उसे
जीवन पथ को प्रकाशित कर देगा
फूलों, दीपों और मिठास से

बनी रहे इसी तरह मुखड़े पर मुस्कान हर पल
भरी रहे जीवन सरिता छल छल
कोई आस न रहे अधूरी, हर साध हो पूरी
क्योंकि खुद को जानकर मिल जाती है
श्रद्धा और सबूरी !

सुबह के पौने आठ बजे हैं, ड्राइवर अभी आने वाला होगा, फिर कार निकालेगी, वैसे अकेले भी जा सकती है पर घर में सफाई का काम चल रहा है. पोहे का नाश्ता किया और केला, जून ने कहा केला खाने से वजन बढ़ता है. वह बंगलूरू में अपना मेडिकल चेकअप कराके आये हैं, उनका वजन ज्यादा है. उन्होंने टहलने का वक्त भी बढ़ा दिया है और लंबा रास्ता लिया है पहले से. वापस आकर भी देह में स्फूर्ति नहीं लग रही थी, तमस का अनुभव हुआ पर प्राणायाम से फर्क पड़ा. कल रात को नींद ठीक से नहीं आयी, जून को एओल के कोर्स में जाने के लिए दुबारा कहा तो वह नाराज हो गए और उनकी नकारात्मक ऊर्जा शायद उसे विचलित कर रही हो, सूक्ष्म स्तर पर ऐसा हो सकता है. कुछ वर्ष पूर्व किसी आवाज ने भीतर से बार -बार कहा था, दूसरे कमरे में सोने जाओ पर वह भीरु आजतक हिम्मत नहीं जुटा पायी, जून क्या सोचेंगे, उन्हें बुरा लगेगा. इसलिए विवाह को बन्धन कहा गया है, एक-दूसरे की भावनाओं का ख्याल रखना होगा. आँखों में नींद का सा अनुभव हो रहा है अब बाहर जाना चाहिए. कल दोपहर बाद मृणाल ज्योति की एक परिचारिका को देखने अस्पताल जा रही थी, एक अध्यापिका से पता चला वह दो दिन पूर्व ही रिलीज हो गयी है. सो पब्लिक लाइब्रेरी चली गयी, एक किताब ली, लाइब्रेरियन ने बताया, माह के अंत में बच्चों की कहानी प्रतियोगिता है, जिसमें कक्षा छह से दस तक के छात्र-छात्राएं भाग लेंगे. उसे हिंदी में निर्णायक के रूप में सहायता करनी है. कल मृणाल ज्योति में मीटिंग है, विधान परिषद के एक सदस्य ने पांच लाख की सहायता का वचन दिया है जिससे स्कूल में एक स्टेज बनेगा, जहां भविष्य में कई कार्यक्रम हो सकते हैं. 

Thursday, August 11, 2016

श्याम श्वेत चिड़िया


कल बुद्ध पूर्णिमा थी, एक सखी के साथ उसने भजन गाये, फिर माँ-पिताजी के साथ सबने ध्यान किया. फुलमून मैडिटेशन ! ध्यान में एकत्व का अनुभव हो तो भीतर कैसी शांति का अनुभव होता है. अब यह स्वभाव ही हो गया है. व्यर्थ के विचार अब भी आते हैं लेकिन तत्क्षण ही कोई भीतर से सचेत कर देता है. आज ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ टीचर का फोन आया, जो यहाँ आई थीं, उन्होंने मेल ही नहीं देखा सो गुरूजी के जन्मदिन पर लिखी कविता भी नहीं पढ़ी. एक पुरानी परिचिता से फोन पर बात हुई जिनके पति का देहांत कुछ वर्ष पहले हो गया था और जो मृणाल ज्योति में स्वेच्छा से काम कर रही थीं. वह कल बेटी की शादी के बाद लौट आई हैं, स्कूल के पास ही एक कमरा लेकर रहना चाहती हैं. जून कोर्स में गये हैं, वह मानसिक रूप से ज्यादा सबल हुए हैं. सत्य को स्वीकारने लगे हैं. वह आज फिर वह बगीचे में झूले पर बैठी है. परसों कविता लिखी थी, देखे, आज क्या लिखाता है वह ! अभी सूर्यास्त में समय है. पिताजी ने पानी दिया है पौधों को. आज मौसम गर्म है, घास में एक काली सफेद चिड़िया अपनी पूंछ को ऊपर-नीचे करती एक अनोखे अंदाज में कीट खोज रही है. आज सुबह उन्होंने कितने पंछियों की आवाजें सुनीं. कल वे वीडियो कैमरा लेकर जायेंगे, फिल्माएँगे एक सुबह.. आज पड़ोसी  कुछ खेल रहे हैं, शायद बैडमिंटन या ऐसा ही कुछ..बगीचे में कितने रंगों के फूल खिले हैं, जीनिया, कॉसमॉस, जरबेरा, गुलाब, फॉरगेट मी नॉट, पेशेंस तथा अन्य दो-तीन तरह के, जिनके नाम वह नहीं जानती. कुछ वर्षों के बाद जब इस जगह से नाता छूट जायेगा तब कोई और बगीचा होगा लेकिन फूल तो हर कहीं एक से ही होते हैं, अभी-अभी एक ज्योति की झलक मिली, कई बार लगता है जैसे एक क्षण के लिए प्रकाश झलका हो...परमात्मा की कृपा उस पर हर पल बरस रही है..सद्गुरु के लिए एक और कविता लिखनी है गुरु पूर्णिमा के लिए.....भीतर के शून्य को दिखाने वाले..जीवन के सारे सवालों के हल पल में हाजिर कर देने वाले सद्गुरू के लिए जितना लिखे कम है..

आज दीदी की बहू का जन्मदिन है, अभी-अभी फेसबुक पर पढ़ा तो शुभकामना दी और उसे फोन भी किया. आज सुबह तीन बजे अचानक बिजली चली गयी, वे जल्दी उठे फिर प्रातःभ्रमण के लिए गये, फोटोग्राफी की. दोपहर भर गर्मी से त्रस्त रहे, इस समय मौसम अच्छा हो गया है, हवा में ठंडक है जिसका स्पर्श सुकून से भर रहा है.


आज से नया महीना आरम्भ हो गया है. परसों उसका जन्मदिन आया और चला गया. दिन भर व्यस्तता में गुजरा. दोपहर को बच्चों के लिए मिठाई लेकर गयी. शाम को मैंगो शेक के साथ छोटी सी पार्टी. कल सुबह-सुबह श्री श्री के आश्रम में गोली चलने की बात सुनी, दिन भर एक अजीब सी उदासी छायी रही. उनका एक इंटरव्यू सुना. वह कह रहे थे कि उन्हें यह सोचना चाहिए कि आस-पास के लोगों के प्रति वे कैसे अधिक प्रेम से भरे कैसे हो सकते हैं, उनके काम कैसे आ सकते हैं. कल सबके साथ उनके लिए प्रार्थना की, सुबह से जो अवसाद भीतर था अश्रुओं में बह गया. आज भी सुबह से मन एक गम्भीर शांति में डूबा है. कल दीदी की कविता भेज दी. जून आज व्यस्त हैं, देर से आने वाले हैं, आज ब्लॉग पर उस दिन झूले पर बैठ कर लिखी कविता डाली है. नन्हे का एक मित्र अपने घर आया है, उससे बात करनी है और बात करनी है एक सखी से. सुबह थोड़ा बहुत सफाई का काम किया, कुछ बाकी है पर फ़िलहाल तो इस शीतल मौसम में हरी घास पर बैठकर ‘पट्टमोहिनी शांतला’ को पढ़ना है. 

Tuesday, July 26, 2016

नीली गर्दन वाली चिड़िया


जीवन पुनः-पुनः एक पहेली बन कर सामने आता है. कितनी बार ऐसा लगता है मानो सारे राज खुल गये अब जो जानना था जान लिया पर आगे चलते ही एक नया मोड़, एक अनजानी डगर, एक नया रहस्य सम्मुख आ खड़ा होता है, और वे भौंचक तकते रह जाते हैं. उसे अपने कर्त्तव्य का पता था, ऐसा लगता था. परमात्मा की कृपा का अनुभव होता है, अपने भीतर उस विराट के साथ एकता का अनुभव होता है, भीतर शांति व आनंद भी पाया है लेकिन जीवन है तो सहज ही कर्म करने की इच्छा जागृत होती है. प्रकृति के वशीभूत होकर सभी कर्म कर रहे हैं. अच्छे-बुरे, खरे-खोटे जैसे भी कर्म प्रकृति में हो रहे हैं वे न्याय हैं अर्थात वैसे ही होने हैं. मन में संकल्प उठते हैं जो कार्यों में परिणत होते हैं. जो इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं, वे स्वप्न बनकर आती हैं, अथवा तो विचारों के रूप में मन में घूमती रहती हैं. जो क्रियान्वित हो जाती हैं, वे तृप्ति दे जाती हैं. यही कर्म दिन-रात चला करता है. इस विशाल सृष्टि का कोई प्रयोजन है क्या ? शायद नहीं, यह आनंद का विस्तार है, प्रेम का प्रदर्शन है, जो आत्मा के सहज गुण हैं..इनका अनुभव करना और इनका अनुभव औरों को कराना ही आत्मा का लक्ष्य है. इसके सिवा इस जग में क्या करने को है ? क्या पाने को है ? और क्या जानने को है ? तो निर्णय यही हुआ कि निज आनंद में मगन रहना और अन्यों को भी ख़ुशी बांटना, बस यही जीवन का मकसद है. ढेर सारी उपलब्धियाँ हासिल करके अभिमान का पुलिंदा बढ़ाए चले जाने से तो बेहतर है कि निरहंकारी होकर मुस्कान बिखेरना ! उसे अब पढ़ने में रूचि नहीं रह गयी है, लगता है पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ..
उस दिन एक सखी से कहा था कि उसकी अनुपस्थिति में उसके पतिदेव व सासुमाँ दोनों उसे याद कर रहे थे, अच्छा लगा था उन्हें. उन्होंने चिड़िया का एक वीडियो दिखाया, जिसमें नीले गले व हरे पंखों वाली एक छोटी सी चिड़िया पेड़ में अपनी चोंच के हथियार से बिल्कुल गोल आकार में एक घोंसला बनाती है, भीतर घुसकर बुरादा निकलती है और घूमकर मुआइना करके आती है, चिड़िया का साथी भी आता है, वह उड़ जाती है और तब वह काम करता है. फिर दोनों मुग्ध भाव से अपने घर को देखते हैं. हर वर्ष वे नया घर बनाते हैं. कौन जाने वे पंछी भी नये हों, नये पेड़ पर बनाते हों हर साल ! उसने कहा था कि एक कविता लिखेगी इन भावों पर. आज वक्त है. मौसम भी अच्छा है. गगन पर बादल हैं, नीचे हरियाली है. पिताजी घर गये हैं. जून ऑफिस में हैं. माँ अपने रोग के कारण थोड़ी परेशान सी उस कमरे में बैठी हैं. खाली बैठे रहने से मस्तिष्क भी कुंद हो जाता है, वृद्धा  हो या वृद्ध कुछ न कुछ करना सबके लिए बहुत जरूरी है. पिताजी के न रहने से माँ का अकेलापन और बढ़ गया है, अभी कुछ देर पूर्व उसे देखने आई थीं और अब आवाज लगा रही हैं, देखना चाहती हैं कि वह मौजूद है या नहीं ! पड़ोसिन से उसने कहा कि वे अपनी लेन तथा पीछे की लेन की महिलाओं व पुरुषों को बुलाकर सत्संग की शुरुआत क्यों न करें. उसके पतिदेव आर्ट ऑफ़ लिविंग के टीचर हैं. देखें क्या होता है, जून भी अब सत्संग में उत्सुक हैं. उसने लिखा-
मदमाता मार्च ज्यों आया
सृष्टि फिर से नयी हो गयी
मधु के स्रोत फूट पड़ने को
नव पल्लव नव कुसुम पा गयी I

भँवरे, तितली, पंछी, पौधे
हुए बावरे सब अंतर में
कुछ रचने जग को देने कुछ
आतुर सब महकें वसंत में I

याद तुम्हें वह नन्हीं चिड़िया
नीड़ बनाने जो आयी थी
संग सहचर चंचु प्रहार कर
छिद्र तने में कर पाई थी I

वृत्ताकार गढ़ रहे घोंसला
हांफ-हांफ कर श्रम सीकर से
बारी-बारी भरे चोंच में
छीलन बाहर उड़ा रहे थे I

आज पुनः देखा दोनों को
स्मृतियाँ कुछ जागीं अंतर में
कैसे मैंने चित्र उतारे
प्रेरित कैसे किया तुम्हीं ने I

देखा करतीं थी खिड़की से
क्रीडा कौतुक उस पंछी का
 ‘मित्र तुम्हारा’ आया देखो
कहकर देती मुझको उकसा I

कैद कैमरे में वह पंछी
नीली गर्दन हरी पांख थी
तुमने दिल की आँख से देखा
लेंस के पीछे मेरी आँख थी I